Monday, December 18, 2017

रोला छन्द - अरुण कुमार निगम

गुरु घासीदास जयंती पर विशेष
(1)
मनखे मनखे एक, इही हे सुख के मन्तर
जिहाँ नहीं हे भेद, उहीं असली जन-तन्तर
बाबा घासी दास, हमन ला इही बताइन
जग ला दे के ज्ञान, बने रद्दा देखाइन ।।
(2)
जिनगी के दिन चार, नसा पानी ला त्यागौ
दौलत माया जाल, दूर एखर ले भागौ।
जात-पात ला छोड़, सबो ला मनखे जानौ
बोलव जय सतनाम, अपन कीमत पहिचानौ।।
(3)
काम क्रोध मद मोह, बुराई लाथे भाई
मिहनत करके खाव, इही हे असल कमाई
सत्य अहिंसा प्रेम, दया करुणा रख जीयव
गुरु के सुग्घर गोठ, मान अमरित तुम पीयव।।

रचनाकार - अरुण कुमार निगम
दुर्ग, छत्तीसगढ़

Saturday, December 16, 2017

आल्हा छन्द - शकुन्तला शर्मा

(1) कोदूराम "दलित"

छत्तीसगढ़ के जागरूक कवि, निच्चट हे देहाती ठेठ
वो हर छंद जगत के हीरा, छंद - नेम के वोहर सेठ।

कोदूराम दलित हम कहिथन,सब समाज ला बाँटिस  ज्ञान
भाव भावना मा हम बहिथन,जेहर सब बर देथे ध्यान।

देश धर्म के पीरा जानिस,सपना बनिस हमर आजाद
आजादी के रचना रच दिस, सत्याग्रह होगे आबाद।

अपन देश आजाद करे बर,चलव रे संगी सबो जेल
गाँधी जी के अघुवाई मा, आजादी नइ होवय फेल।

शिक्षा के चिमनी ला धर के, देखव बारिस कैसे जोत
मनखे मन ला जागृत करके,समझाइस हम एके गोत।

मार गुलामी के देखिस हे,जानिस आजादी अभिमान
ओरी ओरी दिया बरिस हे,अब कइसे होवय निरमान ।

जाति पाति के भेदभाव के,अडबड बाढ़त हावय नार
सुंदर दलित दुनो झन मिलके,सब्बो दुखले पाइन पार।

दलित सही शिक्षक मिल जातिन, जौन पढ़ातिन दिन अउ रात
सब लइका मन मिल के गातिन, हो जातिस सुख के बरसात ।
 (2) बाबा घासीदास

गुरु बाबा हर पंथ परोसिस,नाम दिहिस सुग्हर सतनाम
छत्तीसगढ़ ला तीर्थ बनाइस, जैत खंभ हर बनगे धाम।

सत के रसदा मा सब रेंगव, गुरु - दीक्षा बन गे वरदान
सबो परस्पर सुख दुख बाँटव,सबके भीतर हे भगवान।

सबके हित मा मोरो हित हे, एही मा सबके कल्याण
आमा - बोए आमा पाबे, दुख के काँटा लेवय प्राण।

देश रिणी हे गुरु बाबा के, बहु - जन ला देइस हे पंथ
बिना पंथ के मनुज भटकथे,कहिथें वेद उपनिषद् ग्रंथ।

कतको - भाई भटके हावैं, दुरिहा जा के होगिन आन
हमर बिकट नकसान होय हे, कैसे मैंहर करौं बखान।

पंथ सबो ला जोरिस हावै, देश - धर्म के होथे काम
कलाकार मन जस बगराथें, पंथी देवदास के नाम।

एक - पंथ मा ठाढे हावयँ, सब्बो भाई चतुर - सुजान
स्वाभिमान हर सबला भावै,करथें सबो देश बर गान।

मनखे मनके महिमा भारी, देस राग ला जानव आज
देख देश बर बुता करौ जी,तब्भे बनही सुखी समाज।

 रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Wednesday, December 13, 2017

सरसी छन्द - श्री संतोष फरिकार

धान लुवे के बाद देख ले,सुन्ना होगे खेत।
ओन्हारी बोये बर कखरो,नइहे एको चेत।

गाय गरू सब छेल्ला घूमय,संसो करे किसान।
हात हूत दिन रात करत मा,लटपट होइस धान।

लाख लाखड़ी चना गहूँ बिन,सुन्ना खेती खार।
अरसी सरसो कायउपजही,सोचय बइठे हार।

ढ़ील्ला हवे गाँव मा एसो, राउत कहाँ लगाय।
मिलके सब किसान हा जम्मो, गरवा अपन चराय।।

मिले नही अब खोजे मा जी ,तिवरा भाजी नार।
बिना उतेरा ओन्हारी के,रोवय खेती खार।।

रचनाकार - श्री संतोष फरिकार
छत्तीसगढ़

Tuesday, December 12, 2017

कुकुभ छन्द - श्री चोवाराम "बादल"

योग करव जी

मनखे ला सुख योग ह देथे,पहिली सुख जेन कहाथे ।
योग करे तन बनय निरोगी,धरे रोग हा हट जाथे।।1

सुत उठ के जी रोज बिहनियाँ,पेट रहय गा जब खाली ।
दंड पेल अउ दँउड़ लगाके, हाँस हाँस ठोंकव ताली ।।2

रोज करव जी योगासन ला,चित्त शांत मन थिर होही ।
हिरदे हा पावन हो जाही,तन सुग्घर मंदिर होही।।3

नारी नर सब लइका छउवा, बन जावव योगिन योगी ।
धन माया के सुख हा मिलही,नइ रइही तन मन रोगी।।4

जात पाँत के बात कहाँ हे, काबर होबो झगरा जी।
इरखा के सब टंटा टोरे, योग करव सब सँघरा जी।।5

जेन सुभीता आसन होवय,वो आसन मा बइठे जी।
ध्यान रहय बस नस नाड़ी हा,चिंता मा झन अइठे जी।।6

बिन तनाव के योग करे मा, तुरते असर जनाथे गा ।
आधा घंटा समे निकालव, मन चंगा हो जाथे गा ।।7

अनुलोम करव सुग्घर भाई, साँस नाक ले ले लेके ।
कुंभक रेचक श्वांसा रोंके, अउ विलोम श्वांसा फेके ।।8

प्राणायाम भ्रस्तिका हावय, बुद्धि बढ़ाथे सँगवारी ।
अग्निसार के महिमा गावँव, भूँख जगाथे जी भारी ।।9

हे कपालभाती उपयोगी, अबड़े जी असर बताथे ।
एलर्जी नइ होवन देवय, ए कतको रोग भगाथे ।।10

कान मूँद के करव भ्रामरी, भौंरा जइसे गुंजारौ ।
माथा पीरा दूर भगाही, सात पइत बस कर डारौ ।।11

ओम जपव उद्गीत करव जी, बने शीतली कर लेहौ ।
रोज रोज आदत मा ढालव, आड़ परन जी झन देहौ ।।12

    रचनाकार - श्री चोवा राम "बादल"
                 हथबंद, छत्तीसगढ़

Monday, December 11, 2017

सार छन्द - श्रीमती आशा देशमुख

दुखिया के गोठ

कइसन दिन आगय वो फूफू ,बोलत हवे भतीजा |
पाक गए वो नीम धतूरा ,निकलत हावय बीजा |

हाँथ गोड़ मा फोरा परगे ,आँखी अँधरी होगे ,
अंतस होगे छर्री दर्री ,का करनी ला भोगे |

मोर सायकिल के पैडिल हा ,माढ़े हावय टूटे |
हाथी बर अब बाड़ा नइहे ,राजमहल हा फूटे |

नरम मुलायम मीठ मिठाई ,अब तो चेम्मर लागे ,
दाँत ओंठ हा बइठत हावय ,मन हा पल्ला भागे |

हमर जमाना मा वो फूफू ,सबो रिहिस हे सच्चा |
आज मशीन घलो हा देवय ,हमर भाग ला गच्चा |

बखत बखत के फेर भतीजा ,रानी भरथे पानी |
समझावत हे फूफू दीदी ,अखिल लोक कस ज्ञानी 

झूठ लबारी अँधियारी के ,कब तक चलही माया |
दिन के भरे घाम मा तपथे ,सब प्रानी के काया 

 रचनाकार - श्रीमती आशा देशमुख 
 एन टी पी सी कोरबा, छत्तीसगढ़ 

Saturday, December 9, 2017

शक्ति छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

गँवई गाँव

बहारे  बटोरे   गली   खोर  ला।
रखे बड़ सजाके सबो छोर ला।
बरे   जोत  अँगना  दुवारी   सबे।
दिखे बस खुसी दुख रहे जी दबे।

गरू  गाय  घर  मा बढ़ाये मया।
उड़े लाल कुधरिल गढ़ाये मया।
मिठाये  नवा धान के भात जी।
कटे रात दिन गीत ला गात जी।

बियारी करे मिल सबे सँग चले।
रहे बाँस  के  बेंस   थेभा  भले।
ठिहा घर ठिकाना सरग कस लगे।
ददा  दाइ  के  पाँव  मा  जस जगे।

बरे  बूड़  बाती    दिया   भीतरी।
भरे जस मया बड़ जिया भीतरी।
बढ़ाले मया तैं बढ़ा मीत जी।
हरे गाँव  गँवई मया गीत जी।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, December 8, 2017

दोहा छन्द - श्री जगदीश "हीरा" साहू

छत्तीसगढ़ के 36 भाजी-

भाजी  *तिवरा*  *गोंदली*,  *मुनगा*  अउ *बोहार*।
*चुनचुनिया* अउ *चौलई*,मिलय *चरोटा* खार।।

*कुरमा पटवा  खेंडहा*, *पुतका*  भाजी *लाल*।
*भथवा आलू लहसुवा*, *सरसों* करे कमाल।।

*गोभी कुसुम  मछेरिया,बर्रे  मखना* लाय।
*चना अमारी* राँध ले, *कजरा* गजब सुहाय।।

*गुडरू  उरला  चिरचिरा,  चेंच  चनौरी* सार।
*तिनपनिया* अउ *करमता*, *कांदा* बगरे नार।।

*पालक मुसकेनी* हवय, सब भाजी मा शान।
*उरला मुरई* खाय जब, कोंदा  करय  बखान।।

भाजी-भाजी झन कहव, एकर करव बखान।
खावव  येला  मन  लगा, हो जावव बलवान।।

 रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
ग्राम - कड़ार, व्हाया भाटापारा
छत्तीसगढ़

Thursday, December 7, 2017

शक्ति छंद - श्री मोहनलाल वर्मा

सरग निसैनी -

भजन नइ करे तँय सियाराम के।
कभू नइ जपे तँय बिना काम के।
करे काय हावस इहाँ आय के।
बता दे सबो आज फरियाय के।।1।।

फँसे रात दिन तँय मया जाल मा।
भरे पाप कोठी अपन चाल मा।
बने काम करके सबो हाल मा।
बनौका बनाले बुढ़त काल मा।।2।।

बसा साँस मा ले सियाराम ला।
तहूँ पाय लेबे परमधाम ला।
भजन कर सबो दिन समय पाय के।
निसैनी बनाले सरग जाय के।।3।।

लगा भक्ति चंदन सदा माथ मा।
बना मुक्ति मारग अपन हाथ मा।
रहस नइ पियासे कुआँ कोड़ के।
रखे रहि भरोसा गरब छोड़ के।।4।।

परोसी रहिस तोर जब गा दुखी।
जुगत नइ लगाये करे बर सुखी।
कभू तो करे कर करम दान के।
दरश पाय खातिर ग भगवान के।।5।।

गये गा  शरण नइ बिना मान के।
लिखे नाँव सूची म धनवान के।
इहें छूट जाही सबो चीज हा।
करम खेत बो भक्ति के बीजहा।।6।।

लिखे भाग ला जी उही राम हे।
धरम काज मा ओकरे धाम हे।
करम खेल करथन सबो साथ मा।
बँधे डोर जे राम के हाथ मा।।7।।

रचनाकार - श्री मोहनलाल वर्मा
ग्राम अल्दा (तिल्दा), जिला रायपुर
छत्तीसगढ़

Tuesday, December 5, 2017

सुंदरी सवैया - श्री दिलीप कुमार वर्मा

(1)
ठुठवा रुख मा जब बैठ रहे,तब सोंचत हे जग के कुछ होही।
धनहा मन मा अब धान घलो,बिकटे अब होय ग जेहर बोही।
परही जब घाम त हो अबड़े,धन पाय किसान ह सुग्घर सोही।
पर पेंड़ बिना बरसा नइ हो,तब देख ग मूँड़ धरे सब रोही।

(2)
बरखा बन के बदरा गिरथे,बखरी भर मा बगरे बड़ पानी।
बखरी बनवावत हे बनिहार म,बारत हे कचरा तब नानी।
बनिहार घलो बगरावत हे,बखरी भर बीज बने सब खानी।
बउरे बढ़िया बखरी सब ला,बड़ सुग्घर साग उगाय सयानी।

(3)
रसता धर के जब जावत हे,धरसा पर जावत हे सब खारे।
गरवा मन के चलना हर जी,अब खेत घलो सब देत उजारे।
कतका रखवार बने बइठे,पर कोन कहाँ कतका कर पारे।
अबड़े गरवा मन घूमत हे,उखरो नइ मालिक दीख सखा रे।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Saturday, December 2, 2017

कुंडलिया छंद - जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"



जस गीत -

काली गरजे काल कस,आँखी हावय लाल।
खाड़ा  खप्पर  हाथ हे,बने असुर  के काल।
बने  असुर के  काल,गजब  ढाये रन भीतर।
मार काट कर जाय,मरय दानव जस तीतर।
गरजे बड़ चिचियाय,धरे हाथे मा थाली।
होवय  हाँहाकार,खून  पीये बड़ काली।

सूरज ले बड़ ताप मा,टिकली चमके माथ।
गल मा माला  मूंड के,बाँधे  कनिहा  हाथ।
बाँधे  कनिहा  हाथ,देंह  हे  कारी कारी।
चुंदी हे छरियाय,दाँत हावय जस आरी।
बहे  लहू  के  धार,लाल  होगे बड़ भूरज।
नाचत हे बिकराल,डरय चंदा अउ सूरज।

घबराये तीनो तिलिक,काली ला अस देख।
सबके बनगे  काल वो,बिगड़े   ब्रम्हा लेख।
बिगड़े  ब्रम्हा  लेख, देख  रोवय  सुर दानँव।
काली बड़ बगियाय,कहे कखरो नइ मानँव।
भोला सुनय गोहार,तीर काली के आये।
पाँव तरी गिर  जाय,देख काली घबराये।

काली देखय पाँव मा,भोला हवय खुँदाय।
जिभिया भारी लामगे,आँखी आँसू आय।
आँखी आँसू आय,शांत  काली  हो जाये।
होवय जय जयकार,फूल  देवन बरसाये।
बंदव   माता  पाँव,बजाके    घंटा  ताली।
जय हो देबी तोर,काल कस माता काली।

रचनाकार - श्री

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Thursday, November 30, 2017

विधान - शक्ति छन्द

शक्ति छन्द

*डाँड़ (पद) - 4*

तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा, आखिरी मा सगन या रगन या नगन आना चाही.

माने डाँड़ के आख़िरी मा नान्हें, नान्हें, बड़कू (112) या बड़कू,नान्हें,बड़कू (212) या नान्हें, नान्हें, नान्हें (111) आना चाही.

हर डाँड़ मा कुल मातरा – 18

हर डाँड़ मा पहिली अक्छर के मातरा नान्हें (लघु) होना चाही.

*खास - हर डाँड़ मा १, ६ ,११ अउ १६ वीं मातरा नान्हें होना चाही*

उदाहरण -

गाँव मा (शक्ति छन्द)


दया हे मया हे , सगा ! गाँव मा
चले आ कभू , लीम के छाँव मा
हवै  जिंदगी का ? इहाँ जान ले
सरग आय सिरतोन , परमान ले।।

सचाई  चघे  हे , सबो  नार मा
खिले फूल सुख के , इहाँ डार मा
सुगंधित हवा के चिटिक ले मजा
चिटिक झूम के आज माँदर बजा।।

मजा आज ले ले न , चौपाल के
भुला दे  सबो दु:ख , जंजाल के
दया हे मया हे , सगा ! गाँव मा
चले आ कभू , लीम के छाँव मा।।

*अरुण कुमार निगम*

Wednesday, November 29, 2017

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर मा छन्द के छ परिवार के साधक मन के विशेष कविगोष्ठी सम्पन्न होइस। ये गोष्ठी मा अरुण कुमार निगम(दुर्ग), चोवाराम "बादल" जी(हथबन्द), आशा देशमुख(एन टी पी सी कोरबा), दिलीप कुमार वर्मा(बलौदाबाजार), जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"(बाल्को), सुखदेव सिंह अहिलेश्वर (गोरखपुर,कवर्धा), इंजी. गजानन्द पात्रे (बिलासपुर), मनीराम साहू "मितान"(कचलोन), हेमलाल साहू(गिधवा), दुर्गाशंकर इजारदार(सारंगढ़), बलराम चंद्राकर(भिलाई), ज्ञानुसिंह मानिकपुरी(चंदैनी, कवर्धा), पोखन जायसवाल(पलारी), मोहन लाल वर्मा(अल्दा), अउ मोहन कुमार निषाद(भाटापारा) अपन छत्तीसगढ़ी गीत मा छत्तीसगढ़ी भाखा के महत्ता ला गुरतुर स्वर मा सुनाइन। कुछ कवि मन के गीत इहाँ प्रस्तुत हे-

1. अरुण कुमार निगम के गीत" -

 "नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु"….

आई लव यू………आई लव यू….
तयं बोल रे मिट्ठू , आई लव यू….
तपत कुरु के गये जमाना
बोल रे मिट्ठू – आई लव यू…..

राम-राम के बेरा -मा, भेंट होही तो गुड मार्निंग कहिबे
ए जी,ओ जी झन कहिबे,कहिबे तो हाय डार्लिंग कहिबे
सबो पढ़त हे इंग्लिश मीडियम
तयं काबर रहिबे पाछू …..
आई लव यू………आई लव यू….
तयं बोल रे मिट्ठू , आई लव यू….

हाट – बजार के नाम न ले , तयं मार्केटिंग बर जाये कर
कोन्हों क्लब के मेंबर बन के ,रोज स्वीमिंग बर जाये कर
समझ न आये इंग्लिश पेपर
तभो मंगाए कर बाबू…..
आई लव यू………आई लव यू….
तयं बोल रे मिट्ठू , आई लव यू….

बड़े बिहाने ब्रेक-फास्ट , मंझनिया लंच उड़ाए कर
चटनी-बासी छोड़ के अब तयं रतिहा डिनर खाए कर
नवा जमाना ,शहर-नगर -मा
छागे इंग्लिश के जादू ………
आई लव यू………आई लव यू….
तयं बोल रे मिट्ठू , आई लव यू….

(अतका सुन के मिट्ठू बोलिस…………)

तपत कुरु………तपत कुरु……..
नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु
छत्तीसगढ़ी बड़ गुरतुर लागे
इंग्लिश लागे करू -करू………..

अपन देस के रहन-सहन,अउ भासा के तुम मान करव
चमक-दमक मा झन मोहावौ, हीरा के पहिचान करव
“सबूत-बीजा ” हमर धरोहर
बाकी जम्मो ढुरु – ढुरु……….
तपत कुरु………तपत कुरु……..
नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु ……नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु ……
नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु ……नइ भूलय मिट्ठू तपत कुरु ……

 2. चोवा राम "बादल " -छत्तीसगढ़ी भाखा (गीत)

मोर छत्तीसगढ़ी भाखा मा , अइसन भरे मिठास जी।
सुनत पढ़त उठ पराथे  भूँखन अउ पियास जी।मोर-------

एमा गीता ज्ञान के मंतर ,बेद पुरान के सार हे।
इबादत जी हे कुरान के, बाइबिल के बैवहार हे ।
तुलसी के रमायेन एमा गुरु ग्रन्थ प्रकास जी।मोर--------

सुन के ददरिया दरद मेंट ले,करमा ह रस घोरे कान ।
सुवा हा जी अबड़ सुहाथे, दोहा देवारी के सान ।
बालमीकि कस बोलिस एला गुरु घासीदास जी।मोर------

पढ़े लिखे मा बड़ सोझवा हे, हावय एहा दुलौरिन ।
सब भाखा ले सुंदर हे, सिरतोन जानव गउकिन ।
अब्बड़ जल्दी सब सीख जाथें, थोकुंन करे प्रयास जी।
मोर छत्तीसगढ़ी भाखा मा, अइसन भरे मिठास जी।

 
3. दिलीप कुमार वर्मा - गीत

सुन ले छत्तीसगढ़िया संगी
बोलत झन ग लजाबे रे।
ये दुनिया मा जिहाँ ग जाबे
छत्तीसगढ़ी गाबे रे।

जे हर जइसन भाखा समझय
तइसन तँय गोठियाले।
पर भाई छत्तीसगढ़िया ले
बोली मा बतियाले।
अइसन गुरतुर भाखा संगी
अउ कहाँ तँय पाबे रे।
ये दुनिया.........

छत्तीसगढ़िया कहिथे कोनो
झन गा तँय सरमाबे।
अउ छाती ला तान ग तँय हा
छत्तीसगढ़ी गोठियाबे।
नाम धराले छत्तीसगढ़िया
बने मान तँय पाबे रे  ।
ये दुनिया........

छत्तीसगढ़ी म मया भरे हे
सब ला तँय बतलाबे।
दया मया म बाँध ग रखबे
काम करे जब जाबे।
भोला समझ के चाल चले ता
अपनों रूप दिखाबे रे।
ये दुनिया मा.......

4. दिलीप कुमार वर्मा - गीत

मोर भाखा छत्तीसगढ़ी ये
तेखर हवय गुमान गा।
ये भाखा मोर छत्तीसगढ़ के
बने हवय पहिचान गा।

सुआ ददरिया करमा गाले
ठलहा बइठे मन बहलाले।
लइका हा जब रोवय संगी
लोरी गा ओला सहलाले।
अइसन भाखा छत्तीसगढ़ी
मन बर दवा समान गा।
मोर भाखा......

छत्तीसगढ़ी गोठियाथँव संगी
लाज कभू मोला नइ लागय।
अंतस ले अंतस जुड़ जाथे
सूते भाग घलो हर जागय।
ये भाखा के किरपा संगी
जानय सकल जहाँन गा।
मोर भाखा .......

पढ़े लिखे शिक्षक हँव संगी
अड़हा मोला झन मानव।
अंगरेजी हिंदी पड़हाथँव
भकला मोला झन जानव।
पर गोठियाथँव छत्तीसगढ़ी
जेमा बसे परान गा।
मोर भाखा .........

5. आशा देशमुख - गीत

मोर छतीसगढ़ के भाखा
मोर छतीसगढ़ के बोली बड़ गुत्तुर लागय बहिनी
बड़ गुत्तुर लागय दीदी
मँय का बतावँव वो ।

धरती हा सिंगार करे वो
हरियर मन ला भावय ।
झूम झूम के जिवरा मोरे
सुआ ददरिया गावय ।
मांदर थाप मँजीरा बाजय ,दाई के करे सुमरनी ।
मँय का बतावंव वो ।
मोर छतीसगढ़ के भाखा ,बड़ गुत्तुर लागय बहिनी ,मँय का बतावंव वो ।

किसम किसम के परब मनावय
सबो के गुत्तुर गाना ।
दोहा पारत राउत नाचय ,
बर बिहाव मा हाना ।
पंथी सत के अलख जगावय ,गुरु बाबा के कहिनी ।
मँय का बतावंव वो ।
मोर छतीसगढ़ के भाखा ,बड़ गुत्तुर लागय बहिनी ।
मँय का बतावंव वो ।

साहब सुभा बनके भैया हो,
तुमन झन गरियावव्।
ये भाखा गा शान हमर हे,
हर झन हा अपनावव ।
ये भाखा बोली के भीतर ,अमरित के हे रहिनी ।
मँय का बतावँव वो ।
मोर छतीसगढ़ के भाखा ,बड़ गुत्तुर लागय बहिनी ।
मँय का बतावँव वो ,
मँय का बतावँव वो ।

6.  जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"  महतारी भाँखा(गीत)

मोर छत्तीसगढ़िया बेटा बदलगे,
बिसरात  हे भाँखा बोली......।
बड़ई नइ करे अपन भाँखा के,
करथे जी ठिठोली..............।

गिल्ली भँवरा बाँटी भुलाके,
खेले       क्रिकेट     हाँकी।
माटी   ले   दुरिहाके   संगी,
मारत       हावय    फाँकी।
चिरई पिला चींव चींव कइथे,
कँउवा   के     काँव    काँव।
गइया के बछरू हम्मा कइथे,
हुँड़ड़ा    के    हाँव      हाँव।
फेर मंदरस गुरतुर बोली मा,
मिंझरत हावय अब गोली..।

हटर हटर जिनगी भर करे।
छोड़े मीत मितानी।
देखावा  हा   आगी  लगे हे,
मारे  बड़   फुटानी।
पाके माया गरब करत हे,
बरोवत  हवे  पिरीत ला।
नइ  जाने  दया मया ला,
तोड़त  हावय  रीत  ला।
होटल ढाबा लॉज  भाये,
नइ भाये रँधनी खोली..।

सनहन पेज महिरी बासी,
अउ अँगाकर  नइ  खाये।
अपन मुख ले अपन भाँखा के,
गुण   कभू      नइ         गाये।
छत्तीसगढ़ महतारी के गा,
कोन    ह   नांव   जगाही।
हमर छोड़ अउ कोन भला,
छत्तीस गढ़िया    कहाही।
तीजा पोरा ल का जानही,
नइ जाने देवारी होली....

7. मनीराम साहू  "मितान" - गीत

मिसरी कस मीठ गोठियाथे दाई,
भले हवय वो अढ़ी जी।
बड़ गुरतुर लागे संगी ,
मोर भाखा छत्तीसगढ़ी  जी ।

हाँस के  करथे पहुनाई ,
एक लोटा पानी  मा।
बटकी भर बासी खवाथे,
नानुक अथान के  चानी।
कभू तसमई कभू महेरी,
भाटा खोइला मही मा कढ़ी जी ।
बड़....

बड़ सरसूदिहा छत्तीसगढ़िया,
मया हा भरे हे गोठ मा।
पिरित डोरी मा जम्मो  बँथाये ,
कोनो पातर कोनो रोठ मा।
गरती आमा कस रसा भरे हे,
नइये कोनो मेर हड़ही जी।
बड़....

कोनो भोजली गंगा जल,
महापरसाद जँवारा लागे हे।
बोली बोले दया धरम के,
परेम रस मा पागे हे।
बने बने हितवा मितवा ,
कोनो हा काबर लड़ही जी।
बड़...

छोटका बड़का सबो बरोबर
नइये भेद नैनू नैनी मा।
जुरमिल के  जम्मो  चढ़त हें,
सुनता सरग निसैनी मा।
आवव हमू अइसन कुछ करबो,
जेमा भाखा के  मान बढ़ी जी।
बड़...

8.  हेमलाल साहू -  कुकुभ छन्द

छत्तीसगढ़ी बोली भाखा, बड़ गुरतुर मोला लागे।
जन्म जन्म के रिश्ता हावे, जेला मोरे मन भागे।

मोर हवय जे दाई भाखा, मानव जेला भगवाने।
मीठ मीठ अउ गुरतुर बोली, बोलव जी सीना
 ताने।

नाचत पन्थी अऊ सुवा ला, करथन जेमा गुनगाने।
राग ददरिया करमा सुघ्घर, भाषा दे हे पहचाने।

दान दया ला राखे सुघ्घर, मया प्रीत ला हे बाँधे।
करम धरम के गुन ला गाथे, राम नाव ला हे साधे।।

फेर देख हालत भासा के, आँखी ले आँसू आथे।
हमर शहर ला हमरे भाखा, काबर अइसन नइ भाथे।

छोड़व मन के संका अबतो, राज काज देवव मोरो।
पढ़ लिख ले दाई भाखा मा, भाग जागही अब तोरो।

9. दुर्गाशंकर इजारदार - विष्णु पद छंद

महतारी के भाखा सुग्घर , बढ़िया चलो  पढ़े ,
ममता सुग्घर छलकत रहिथे , जिनगी जोन गढ़े ।
रोए खेले दाई भाखा , जेमा पेट भरे ,
गोठ करे बर काबर अब तँय , निच्चट लाज करे ।
गुरतुर सुग्घर बानी रहिथे ,अमरित कान भरे ,
सुनत मिठावत अइसन जइसन , मरहा जान डरे ।
***********************
  10. ज्ञानु'दास' मानिकपुरी -  

दोहा -
आवव छत्तीसगढ़िया,छत्तीसगढ़ी बोल।
भेदभाव ला छोड़ के,दया मया रस घोल।।

गीत -
नून बासी संगमा जइसे कढ़ी रे।
गुरतुर भाखा बोल छत्तीसगढ़ी रे।

-पड़की मैना सुआ के
             जइसे सुग्घर बोली हे।
  दया मया के रंगे रंग मा
              जइसे हँसी ठिठोली हे।
बोलव;तोलव:आँखी खोलव तभे मन बढ़ी रे।
गुरतुर भाखा बोल.....

-महतारी ये भाखा के
            मिलके लाज बचाना हे।
  होय पोठ हमर गोठ
            अपने काज बनाना हे।
हमर राज अउ काज बर नवाँ रद्दा गढ़ी रे।
गुरतुर भाखा बोल.....

-छत्तीसगढ़ी बोली मा
               मीठा मँदरस झरते रे।
  छत्तीसगढ़ के पावन भुइयाँ
                देवी देवता बसथे रे।
पढ़बो;लिखबो आगू बढ़बो तभे सीढ़ी चढ़ी रे।
गुरतुर भाखा बोल.....

11.     पोखन लाल जायसवाल - गीत
छत्तीसगढ़िया कहावव
भाखा के मान बढ़ावव।
     अपन भाखा अउ बोली मा ;
     खेत खार धनहा डोली मा ;;
     दुख पीरा के गोठ सुनावव ।
     भाखा के मान ----

     कहिनी संग गीत ला सिरजन ;
     लिख लिख के नवा छंद सबझन ;;
     बने बने साहित सिरजावव ।
     भाखा के मान ------

     गोठिया ले सुख दुख के गोठ ;
     करे बर अपने भाखा पोठ ;;
     लाज शरम के नांव बुतावव ।
भाखा के मान बढ़ावव
छत्तीसगढ़िया कहावव ।।

12. सुखदेव सिंह अहिलेश्वर - गीत

छत्तीसगढ़ी गीत

अब तो दिन दिन आघू बढ़ही मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।
अब तो दिन दिन आघू बढ़ही मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।

समरिध साहित के पन्ना मा
समरिध साहित के पन्ना मा,
नेक नगीना गढ़ही,
अब तो दिन दिन आघू बढ़ही
मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।

(०१)
जे  भाखा मा घासी गुरु सत के संदेश बताइन हे।
जे धरती मा वाल्मीकि पहली रचना सिरजाइन हे।

दया माया भाईचारा के
दया मया भाईचारा के,
उत्तिम रद्दा गढ़ही,
अब तो दिन दिन आघू बढ़ही
मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।

(०२)
भाखा के छंद बानी जइसे महानदी के पानी हे।
सुआ ददरिया करमा पंथी गायन आनी बानी हे।

रेंगत हाँसत बोलत ठोलत
रेंगत हाँसत बोलत ठोलत,
अंतस मा सुख भरही,
अब तो दिन दिन आघू बढ़ही
मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।

(०३)
गुरतुर बोली लागे खुरमी चौंसेला अउ चीला कस।
हली भली खुशियाली लागे जुरे माई पिल्ला कस।

पढ़व लिखव बोलव बउरव
पढ़व लिखव बोलव बउरव,
भाखा रोज सँवरही,
अब तो दिन दिन आघू बढ़ही
मोर भाखा छत्तीसगढ़ी।

रचनाकार:-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
                 गोरखपुर,कवर्धा(छ.ग.)

13. बलराम चंद्राकर - गीत

भाखा ये छत्तीसगढ़ी

भाखा ये छत्तीसगढ़ी, गुरतुर अब्बड़ मोर ।
गा ले संगी ददरिया, होही जग मा सोर ।।
1)
होही जग मा सोर गा, नीक हे हमरो बोली।
दाई भाखा मा हमर, गुंजही धनहा डोली।।
सरगुजिया लरिया कथन, हरे गा इॅकरे साखा ।
बिलासपुर रायपुर अउ, दुरुग मा इही भाखा।।
पंथी करमा अउ सुआ, गा ले गा रस घोर।
भाखा ये छत्तीसगढ़ी, गुरतुर अब्बड़ मोर।।
2)
हाना के भंडार हे, जनउला कोठी कोठी।
भइया दोहा पार ले, बाॅच ले कतको पोथी।
गजब कहानी गीत के, हवै जी बढ़िया थाती।
साहित् के निस दिन इहाँ, बरत हे दीया बाती।।
मया पिरा के गोठ ला, लिख ले गा बेजोड़।
भाखा ये छत्तीसगढ़ी, गुरतुर अब्बड़ मोर।।
3)
तसमई सोहारी फरा, इहाँ के डुबकी कढ़ी।
राज हमर छत्तीसगढ़, कहाबो छत्तीसगढ़ी।।
हलबी सुग्घर बोल हे, नीक हे गोंडी भतरी।
पोठ हमर भाखा बनै, मिलो के जम्मो बखरी।।
पढ़बो लिखबो बोलबो, होही नवा अॅजोर ।
भाखा ये छत्तीसगढ़ी, गुरतुर अब्बड़ मोर ।।

रचना :बलराम चंद्राकर
     

Monday, November 27, 2017

आल्हा छन्द - श्री कन्हैया साहू "अमित"

महतारी भाखा 

आखर आखर भाखा बनथे,
भाखा प्रगटे भाव बिचार।
महतारी बोली ला बोलव,
निज भाखा बिन सब बेकार।1

सिखव सबो भाखा ला सब झन,
होथे एमा गुन के खान।
फेर अपन महतारी भाखा ,
इही हमर हे गरब गुमान।2

बाढ़ँय फूलँय जम्मो भाखा,
ना हिजगा हे नही बिरोध।
भाखा हमरो आगू बढ़ही,
राखव अपने अंतस बोध।3

जनमे जेखर कोरा मा मैं,
वो भुँइयाँ हे सरग समान।
नान्हेंपन के गुरतुर लोरी,
वो भाखा हे ब्रम्ह गियान।4

लोककला महतारी संस्कृति,
निज भाखा के आय अधार।
जतका जादा करबो सेवा,
मया बाढ़ही अमित अपार।


रचनाकार - श्री कन्हैया साहू "अमित"*
भाटापारा, छत्तीसगढ़ 

Saturday, November 25, 2017

चौपई छंद - इंजी.गजानंद पात्रे




















1- गँवई गाँव

बर पीपर के जुड़हा छाँव।
खूब सुहाये गँवई गाँव।।
सुघ्घर मया पिरित के गोठ।
खा रोटी अंगाकर रोठ।।

हरियर हरियर खेती खार।
नदियाँ नरवा छलके धार।।
राहर गेहूँ तिवरा धान।
कोदो चना बढ़ावत मान।।

पंथी सुवा ददरिया गीत।
बाँधे बँधना आपस मीत।।
मड़ई मेला हाट बजार।
राउत नाचे दोहा पार।।

गाँव गुड़ी होवे चौपाल।
बात सियनहा लेंय सँभाल।।
छोट बड़े के होथे सम्मान।
मैं हा करँव गाँव गुणगान।।

धन्य धन्य हे गाँव किसान।
जेकर से हेे देश महान।।
जग के तैं हा पालनहार।
बंदन तोला बारंबार।।

2- मचोली

चार खुरा अउ पाटी चार,
बमरी कउहा लकड़ी सार।
बीच म डोरी बेनी पार,
मिलके बने मचोली यार।।

गाँव गँवई के खुरसी जान,
बइठ मचोली मिटय थकान।
बइला आँखी सुघर गथान,
कासी डोरी बरय सियान।।

जब जब पहुना घर मा आय,
निकले अँगना गजब सुहाय।
गाँव कहाँ जी सोफ़ा दीवान,
थोकुन बइठ बढ़ा दे मान।।

शहरी जिनगी थोकुन छोड़,
गाँव तरफ भी नाता जोड़।
बड़ सुघ्घर हे गँवई रीत,
देथे भाई चारा मीत।।

3- सतनामी के का पहिचान

सतनामी के का पहिचान।
सादा झंडा श्वेत निशान।।
सुमता के हे का परमान।
बालक गुरु के हे बलिदान।।

डारा लमगे लोरी लोर।
लेवव संगी बइहाँ जोर।।
लावव मिलके नवा बिहान।
रखना हे पुरखा के मान।।

सत के महिमा अपरंपार।
घासी गुरु के कहना सार।।
मनखे मनखे एक समान।
सबो धरम के कर सम्मान।।

जपले जिनगी मा सतनाम।
बनही तोरे बिगड़े काम।।
समझे जे जिनगी के दाम।
लेथे वो सत ला जी थाम।।

माघ पंचमी मेला जाव।
गुरु बाबा के दर्शन पाव।।
सुन लेबे गुरु के संदेश।
मिट जाही जी मन के क्लेश।।

4- छत्तीसगढ़ नारी गहना

नारी गहना हवे अपार,
आठो अंग दिखे भरमार।
सोना चाँदी के सिंगार,
जेकर बरनन हे बिस्तार।।

माथ म मोतीमाला यार,
नाक म फुल्ली नथ सिंगार।
कान म खिनवा झुमका झूल,
पहिने ढार करन के फूल।।

गर मा जी नौलख्खाहार,
रुपियामाला पुतरी डार।।
सूता तिलरी सुण्डरा हार,
देखव भइया आँख निहार।।

हाथ म ऐंठी कंगन चार,
बाँह म बहुटा चाँद अकार।
कमर करधनी लपटा मार,
पाँव म पैरी के झंकार।।

बिछिया चाँदी गजब सुहाय,
मुँदरी सोना अँगरी भाय।
छत्तीसगढ़ी गहना ताय,
कवि गजानंद राय बताय।।

   5- वर्ण विस्तार

मनु वर्ण बनाये तैं चार,
जेकर बरनन हे बिस्तार।
आवव सुनलौ मोर बिचार,
अँधरा मन के खुलय दुवार।।

बाम्हन चिन्हा माथ बताय,
माथा लागी कोन कहाय।
बाम्हन के सिर होतिस चार,
बहतिस अंग दूध के धार।।

क्षत्री चिन्हा भुजा बताय,
छै ठा बाजू कहाँ लुकाय।
रण म लड़त हे असली कोन,
देख सबो बइठे हौ मौन।।

बनिया चिन्हा पेट बताय,
काबर बड़का नही बनाय।
दिन रात सुबह अउ शाम,
पेट कहय खाली हे राम।।

चिन्हा शुद्र बताये गोड़,
दुनिया ला जे देवय जोड़।
जात पात के पाटय खान।
मनखे मनखे एक समान।।

रचनाकार -  इंजी.गजानंद पात्रे बिलासपुर (छ.ग.)

Friday, November 24, 2017

छन्द के छ - दीपावली मिलन, हथबन्ध के सुरता


राज्य स्तरीय छंद कवि गोष्ठी संपन्न

 छन्द  के छ परिवार के  दीवाली मिलन अउ राज्य  स्तरीय  कवि गोष्ठी के सफल आयोजन दिनांक 12/11/17 के वि.खं. सिमगा के  ग्राम  हदबंद मा अतिथि साहित्यकार छन्द विद् श्री अरुण  निगम दुर्ग, विदूषी श्रीमती शंकुन्तला शर्मा भिलाई, श्रीमती सपना निगम, श्री सूर्यकांत गुप्ता दुर्ग के गरिमामयी उपस्थिति मा सम्पन्न होइस । कार्यक्रम मा  गाँव के सरपंच श्रीमती सरिता रामसुधार जाँगड़े, श्री संतोष धर दीवान मन अतिथि  के  रूप  मा उपस्थित  रहिन।
       कार्यक्रम  के  शुरुआत अतिथि मन द्वारा मां सरस्वती  के  छाया चित्र मा पूजा अर्चना अउ दीप प्रज्वलन  ले होइस। छ्न्द साधक श्री मोहनलाल वर्मा  हा गीतिका छंद  मा सरस्वती बंदना
प्रस्तुत करिन। स्वागत सत्कार के बाद कार्यक्रम के  संचालक श्री अजय अमृतांशु  हा सबले पहिली छंद पाठ  करे के नेवता  श्री  जितेन्द्र वर्मा कोरबा ला दीन। वर्मा  जी  हा सार छन्द  मा अपन रचना "मोर पंख ला मूँड़ लगा दे" प्रस्तुत करके सबके मन ला मोह लीन । तेकर पाछू कबीर धाम ले पधारे  श्री  ज्ञानु दास मानिकपुरी "प्रभु  तोला खोजव कहाँ मंदिर  मस्जिद  द्वार" दोहा छन्द मा अउ श्री मोहन  निषाद भाटापारा  मन घलो  दोहा छंद  मा अपन प्रस्तुति  देके सुनइया मन ले नँगते ताली बटोरिन।अब पारी आइस सिमगा के मनीराम मितान के  अपन दोहा छंद  " सुरता ननपन खेल  के  आथे संगी मोर" पढ़ के  माहौल  ला आनंददायी बना दीन।कोरबा ले आये छन्द  साधिका श्रीमती आशा आजाद मन तो  गुरतुर आवाज़  मा दोहा छन्द  पढ़के खूब ताली बजवइन।मधुर  कंठ के  धनी गोरखपुर ले आये  श्री  सुखदेव  सिंह अहिलेश्वर हा कुकुभ छंद पढ़के सब ला ताली बजाय बर मजबूर कर दीन। श्री दिलीप वर्मा बलौदाबाजार अपन चौपई  छंद के  माध्यम  ले अंधविश्वास उप्पर खूब प्रहार  करिन। अब तो एक के पाछू एक छंद रस के बरसा शुरु होगे।
         छुरा ले आय श्री  ललित  साहू  दोहा  छंद, मुगेली ले  आय श्री गजानंद पात्रे  हा
हरिगीतिका छन्द , श्री जगदीश  साहू कड़ार हा दोहा छंद ,श्री  राजेश निषाद आरंग दोहा छंद , श्री मती नीलम जायसवाल  भिलाई  दोहा  छंद,श्री हेमलाल साहू  कोरबा त्रिभंगी छंद  पोखन  जायसवाल पलारी दोहा छंद, श्री कौशल साहू सुहेला दोहा छंद श्री  आसकरन दास  जोगी बिलासपुर मोहन सवैया,  श्री हेमंत  मानिकपुरी भाटापारा  दोहा  छन्द,श्री  संतोष  फरिकार भाटापारा  कुंडलिया छंद ,श्री मथुरा  प्रसाद वर्मा कौशल पुर दोहा छंदअउ श्री  नरेन्द्र वर्मा  भाटापारा हाइकू  छंद माअपन अपन प्रस्तुति  दे के खूब  वाहवाही  लूटिन।
     कार्यक्रम के छेंवाती बेरा मा शानदार आयोजन करइया श्री  चोवाराम वर्मा  बादल हा देवारी बिषय मा अपन आल्हा  छंद  के पाठ करके  सबके मन मा जोश अउ उमंग  भर दीन।
     कार्यक्रम  के  संचालक  श्री  अजय अमृतांशु के तो कोनो जवाब  नइ रहिस। संचालन करत बीच-बीच मा अपन दोहा  छंद  के माध्यम ले नँगते ताली बजवावत रहिन।  भिलाई ले पधारे श्री मती सपना निगम मन अपन मिसरी कस मीठ आवाज़ मा सुग्घर छत्तीसगढ़ी गीत "सुन सुन वो दाई भइया ला पठोबे" गा के अबड़े ताली बजवाइन। आसु छंद कार श्री  सूर्यकांत गुप्ता हा आनी बानी के छन्द पाठ करके सुनइया मन ले अबड़ेच ताली सकेलिन।
    छंदकार अउ संस्कृत के   विदुषी शकुन्तला शर्मा  हा आसीस के बचन संग किसिम किसिम के छंद पढ़के सब ला छन्द रस मा सराबोर  कर दीन । उँकर रोला छंद  "नटवर नागर नंद आज मोरो घर आबे" सब ला नँगते भाइस संगे संग छत्तीसगढ़ी  के मानकीकरण एला पोठ बनाय के  सम्बन्ध मा घलो  चर्चा  करिन। छंद के छ परिवार  के नेव धरइया अउ एकर मुखिया  श्री अरुण निगम हा आशीर्वाद  के बचन कहत कहिन कि डेड़ बछर के भीतर आज छत्तीसगढ़ मा छत्तीसगढ़ी छंद  लिखइया 30 छंद कार होगे हें। आगू ओमन कहिन कि छत्तीसगढ़ी  भाखा  ला पोठ बनाय बर हमला आन भाखा के शब्द  मन ला अपनाय बर परही। छत्तीसगढ़ी  ला हम रूपवती भले नइ बना सकबो फेर गुणवती तो जरुर बना सकथन।जेन किसम हिन्दी  ला आने आने प्रांत के  मन आने आने बोलथे फेर लिखे के  बेरा एके किसम के लिखथें वइसने छत्तीसगढ़ी ला भले आने आने जिला माआने आने बोलयँ फेर लिखे के बेर हमला एके किसम  ले लिखे ला परही
तबहे छत्तीसगढ़ी  के मानकीकरण  मा सहूलियत  होही।
     कार्यक्रम  मा पहुना  के रुप मा आय प्रो. मधुलिका  अग्रवाल ,गाँव  के  गणमान्य  डॉ  जमाल कुरैशी अउ शा.उ.मा  विद्यालय के  प्राचार्य   श्री  मुबारक हुसैन मन घलो अपन विचार  रखत सम्बोधित  करिन। आयोजन के  भार बोहइया श्री  चोवाराम वर्मा  बादल के तरफ ले बीच बीच मा जम्मो  पहुना मन ला साल श्री फल अउ मया चिन्हारी भेंट  करे गीस। आयोजक डहर ले जलपान मा ठेठरी, खुरमीअउ अरसा रोटी परोसे गीस जेन ए कार्यक्रम  मा खास बात रहिस।श्री  मुबारक  हुसैन  प्राचार्य जी  आभार  के  शब्द  संग कार्यक्रम  के  समापन होगे।
   
 रिपोर्ट - श्री मनीराम साहू "मितान"
ग्राम - कचलोन, छत्तीसगढ़

Wednesday, November 22, 2017

सार-छंद - श्री अतनु जोगी

सार नाम के बाँधे गठरी,
तेने लखही भाई !
अाने ताने भज के मैना,
कोड़ै खुद बर खाई !!

अंत्ते तंत्ते देखत नैना,
लाहो लेथच काहे !
सत्तनाम रे ! अंत्तस साखी,
लबरा होगय काहे !!

साध-साध में कोनो जाही,
रस्ता संकट छाये !
साधे साधक तब तो पाही,
नइते रोवत आये !!

रूप रंग के नोहय रस्ता,
माया कपटी होथे !
कंचन काया साधक तोरे,
साधे जस ला धोथे !!

जपव नाम रे निरगुन मनवा,
ओही पार लगाही !
जगत भगत तो राखे साँई,
सतगुरु आज लखाही !!

रचनाकार -  श्री अतनु जोगी
छत्तीसगढ़

Sunday, November 19, 2017

दोहा छंद - ईंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

मँय

मँय के उपजे फाँस मा,अरझे साँसा रोज।
मँय के ये बुनियाद ला,अपन भीतरी खोज।।१

छांव परे मँय के कहूँ,जर जर मानुष जाय।
करे बुद्धि ला खोखला,अंत घड़ी पछताय।।२

मँय के जानव भेद ला,छोड़व जी अभिमान।
हँसी जगत संसार मा,देवत जी अपमान।।३

रावन मरगे काल मँय,करके कुल के नाश।
मँय मा मरगे कंस हा,मँय के बनके दास।।४

मँय के सही इलाज हे,समानता के सोच।
छोड़ अहं के भाव ला,मँय ला खूँटी खोंच।।५

रचनाकार - ईंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
छत्तीसगढ़

Saturday, November 18, 2017

अमृतध्वनि छन्द - श्री मनीराम साहू

(1)
अड़बड़ सुग्घर लागथे,सरग बरोबर गाँव।
नदिया नरवा ढोड़गा,बर पीपर के छाँव।
बर पीपर के,छाँव गजब हे,मन ला भाथे।
हरियर-हरियर, रुखराई मा,चिरई गाथे।
कोनो मनखे,करय नही जी, कब्भू गड़बड़।
उँकर गोठ हा,नीक लागथे,मोला अड़बड़।

(2)
काखर करे गुमान तैं,जाना हे सब छोड़।
नइ मानच तव देख ले,लगा घटाना जोड़।
लगा घटाना,जोड़ जमाले,जुच्छा जाबे।
बने करम के, दान धरम के,पुन बस पाबे।
हवय काम के,राम नाम के,ढाईआखर।
नइ समझत हच,गरजत हाबच, बल मा काखर।

रचनाकार - श्री मनीराम साहू "मितान"
ग्राम - कचलोन, जिला - बलौदाबाजार-भाटापारा छत्तीसगढ़

Friday, November 17, 2017

दोहा छंद – शकुन्तला शर्मा

दोहा छंद – शकुन्तला शर्मा 

छ्त्तीसगढ मा राम हें, सुन वो कर ननिहाल 
गाँव - कोसला नाव हे, बनिस राम के ढाल।

कौशल्या के मायके, भानु - मन्त के राज
भानुमंत दशरथ बनिन, समधी राज समाज।

महा - नदी के तीर मा, हावय शबरी - धाम
शबरी - बोइर चिखत हे, खावत हावय राम।

भेद - भाव के नार ला, बड सुंदर तिरियाय
गाँधी हर गुरुमान लिस, तेजस ओजस पाय।

सुरता - आथे दलित के, छंद - राग के दूत
देश - प्रेम के राग मा, बन गे खुद अवधूत।

छत्तीसगडही गीत ला, पागिस साव – खुमान
जगमगाय आकाश मा, गुरतुर - गान गुमान।

छ्त्तीसगढ - अभिमान ए, तीजन - बाई नाम
पँडवानी के गायिका, लौह नगर घर – धाम।

देव दास जब नाचथे, पहिरय - पिवँरा पाग
पंथी ला बगरा - दिहिस, दुनियाँ गावय राग।

मूर्ति बनाथे – बढिया, जग जाहिर अब नाव
नेल्सन के जस हे बडे, सुनव - सबो सहँराव।

रिखी खत्री बहुते गुनी, समझय सुर अउ ताल
छ्त्तीसगढ तुरही - बजा, बन - प्रदेश के ढाल।

नारायन जय - खंभ मा, ठाढे - हावय आज
सब्बो झन ला कहत हे, करव देश हित काज।   

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा
भिलाई, छत्तीसगढ़

Thursday, November 16, 2017

सरसी छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

सरसी छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

खुमरी

बबा  बनाये  खुमरी  घर  मा,काट काट के बाँस।
झिमिर झिमिर जब बरसे पानी,मूड़ मड़ाये हाँस।

ओढ़े खुमरी करे बिसासी,नाँगर बइला फाँद।
खेत  खार ला  घूमे  मन भर,हेरे  दूबी  काँद।

खुमरी ओढ़े चरवाहा हा, बँसुरी गजब बजाय।
बरदी के सब गाय गरू ला,लानय खार चराय।

छोट मँझोलन बड़का खुमरी,कई किसम के होय।
पानी   बादर  के दिन मा सब,ओढ़े काम सिधोय।

धीरे धीरे कम होवत हे,खुमरी के अब माँग।
रेनकोट  सब  पहिरे घूमे, कोनो  छत्ता टाँग।

खुमरी मोरा के दिन गय अब,होवत हे बस बात।
खुमरी  मोरा  मा  असाड़ के,कटे नहीं दिन रात।

लइका कहाँ अभी के जाने,खुमरी कइसन आय।
दिखे  नहीं अब कोनो मनखे,खुमरी  मूड़ चढ़ाय।

 रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Wednesday, November 15, 2017

आल्हा छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

मैं वीर जंगल के -

झरथे  झरना  झरझर  झरझर,पुरवाही मा नाचे पात।
ऊँच ऊँच बड़ पेड़ खड़े हे,कटथे जिँहा मोर दिन रात।

पाना   डारा   काँदा   कूसा, हरे   मोर   मेवा   मिष्ठान।
जंगल झाड़ी ठियाँ ठिकाना,लगथे मोला सरग समान।

कोसा लासा मधुरस चाही,नइ चाही मोला धन सोन।
तेंदू  पाना  चार   चिरौंजी,संगी  मोर  साल  सइगोन।

घर के बाहिर हाथी घूमे,बघवा भलवा बड़ गुर्राय।
आँखी फाड़े चील देखथे,लगे काखरो मोला हाय।

छोट मोट दुख मा घबराके,जिवरा नइ जावै गा काँप।
रोज  भेंट  होथे  बघवा ले, कभू संग सुत जाथे साँप।

लड़े  काल  ले  करिया  काया,सूरुज  मारे  कइसे  बान।
झुँझकुर झाड़ी अड़बड़ भारी,लगे रात दिन एक समान।

घपटे  हे  अँधियारी  घर मा,सूरुज नइ आवै गा तीर।
बघवा भलवा हाथी सँग मा,रहिथौं मैं बनके गा बीर।

रेंग  सके  नइ कोनो मनखे,उँहा घलो मैं देथौं  भाग।
आलस जर जर भूँजा जाथे,हरे खुदे तन मोरे आग।

गरब गठैला  तन के करथौं,चढ़ जाथौं मैं झट ले झाड़।
सोना उपजाथौं महिनत कर,पथरा के छाती ला फाँड़।

उतरौं  चढ़ौ  डोंगरी  घाटी ,तउरौं  मैं  नँदिया के धार।
कतको पीढ़ी इँहिचे खपगे,मानन नहीं कभू जी हार।

डर नइ लागे बघवा भलवा,डर नइ लागे बिखहर साँप।
मोर जीव  हा  तभे  कापथे,जब  होथे  जंगल  के नाँप।

पथरा  कस  छाती ठाहिल हे,पुरवा पानी  कस  हे  चाल।
मोर उजाड़ौ झन घर बन ला,झन फेकव जंगल मा जाल।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Tuesday, November 14, 2017

चौपई छन्द - श्री दुर्गाशंकर इजारदार

बेटी के कतको अवतार ,
झन कर जी तँय अत्याचार ,
बेटी बहनी दाई जान ,
अउ जीवन के साथी मान ।

नारी बिन तो  जग अँधियार
रुक जाही जीवन संचार ,
कहना ला तँय मोरे मान ,
नारी हे जीवन के खान ।

आग दहिज मा झन तँय झोंक ,
बेटी नइये माथा  ठोंक ,
भाग धइन घर बेटी आय ,
सात जनम ओकर बन जाय ।

रचनाकार -  श्री दुर्गाशंकर इजारदार
सारंगढ़, छत्तीसगढ़ 

Monday, November 13, 2017

बरवै छन्द - श्री हेमलाल साहू

(1)
हेमलाल जी नावे, गिधवा गाँव।
चिरई करै बसेरा, पीपर छाँव।।

माँ शीतला बिराजे, तरिया पार।
मया दया ला दाई, रखे अपार।।

माटी सेवा भैया, करँय किसान।
नागर अऊ तुतारी, हे पहचान।।

ऊवत सूरुज करथे, सब परनाम।
होत बिहनिया जाथे, संगी काम।।

जियत मरत ले संगी, गुन ला गाव।
माटी सेवा करके, समय बिताव।।

राखव छोटे के जी, बढ़िया ध्यान।
करव अपन ले बड़का, के सम्मान।।

आपस में राखव जी, सबसे प्रेम।
लगा काम में मनला, तै हर टेम।।

जिनगी मा झन बनहू, कभू अलाल।
समय कीमती हावे, राखव  ख्याल।।

एक बरोबर मानुस , सबला जान।
दुनियाँ मा पूजय सच, अउ ईमान।।

संगी सबले  हावे,   बड़का   ज्ञान।
साधव अंतस मा रख, प्रभु के ध्यान।।

2) महँगाई -

बाढ़े भावे कसके, हर दिन साल।
बइरी महँगाई हा,  बनके काल।।

झार गोंदली मारत, बइठे हाट।
होवय चर्चा जेकर, रस्ता बाट।।

लाल लाल होवत हे, सबके आँख।
मिरचा बइरी देवत, कसके काँख।।

रोवात हवय सबला, देख पताल।
संग कोचिया रहिके, करें बवाल।।

जनता  के मरना हे, बाढ़त दाम।
काम धँधा तो नइहे, फोकट राम।।

नेता  मन सब बइठे  देखत हाल।
अपन भरे बर कोठी, चलथे चाल।।

शासन ला का चिंता, भष्टाचार।
परगे महँगाई के, सबला मार।।

3) मोर मया के पाती -

मोर मया  के पाती,  ले  संदेश।
सबला बढ़िया राखे, मोर गनेश।

बबा डोकरी दाई, जय सतनाम।
बाबू दाई दीदी, करवँ प्रणाम।।

भैया भाभी संगी, कर स्वीकार।
भेजत हव संदेशा, जय जोहार।।

घर अउ अँगना बढ़िया, होही मोर।
सपना देखत रहिथव, रतिहा जोर।।

बने मनाबो मिलके, हमन तिहार।
आहू  देवारी  मा, दिन  गुरुवार।।

दीया हमन जलाबो, घर अउ द्वार।
लाबो बढ़िया जग मा, नव उजियार।।

जगमग जगमग होवय, घर अउ खोर।
पढ़य लिखय नोनी अउ, बाबू मोर।।

राखय सबला बढ़िया, खुश भगवान।
आगू जावय बढ़िया,  मोर  किसान।।

सबझन ला पायलगी, अउ जय राम।
मोर कलम ला  देवत,  हव विश्राम।।

4)

रहिथे गोल गोल जी, दिखथे लाल।
बारी मा फरथे जी, करय कमाल।।

जेकर हे पताल गा, सुनलव नाव।
घर बारी मा पाबे, सबके गाँव।।

बारो महिना रहिथे, जेकर माँग।
बना डारके संगी, बढ़िया साग।।

बने पीसके खाले, चटनी भात।
फेर बोलबे बढ़िया, तैहर बात।।

रहिथे जेमा अड़बड़, संगी स्वाद।
आथे सुघ्घर जेहा, बारिस बाद।।

5) आवव रे संगी -

आवव रे संगी मिल, करबो काम।
भुइँया सरग बनाबो, परभू धाम।।

करम धरम ला बढ़िया, करँन प्रकास।
सच के पूजा होवय, छुवय अगास।।

सुख अउ शांति रहै जी, मन संतोष।
दाई रमा बिराजे, भरही कोष।।

पाप होय झन संगी, रखबो ख्याल।
परभू के गुन गाबो, टर ही काल।।

जात पात ला छोड़व, सबो समान।
मनखे मनखे भाई, इहि पहचान।।

बोलव प्रेम मया के, सुघ्घर बोल।
सबो कटै जग माया, मन ला खोल।।

नारी, लछमी, दुरगा, देबी जान।।
होय कभू झन संगी, जग अपमान।।

सुघ्घर सरग बनाबो, देवव साथ।
करबो सब मिल बूता, बाँटव हाथ।।

रचनाकार - श्री हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा,
तहसील नवागढ़, बेमेतरा

Sunday, November 12, 2017

सरसी छन्द - शकुन्तला शर्मा

सरसी छन्द -  शकुन्तला शर्मा

तुलसी

आशा के प्रतीक ए तुलसी धरिस एक अभियान
राम - नाव के पाइस डोगा शकुन देख अउ जान ।

रामचरित आधार बनिस हे जाग शकुन तै आज
पय-डगरी जब मिल जाथे तव सुफल होय सब काज ।

जैसे सोच समझ फल तैसे चिंतन लै आकार
शुभ चिंतन के फल भी शुभ हे देख शकुन हर बार ।

तुलसी राज-धर्म समझाइस शकुन तोर  अधिकार
धर्म - अर्थ चारों ला पा ले भवसागर कर पार ।

मनखे जनम बहुत दुर्लभ हे शकुन बात ला मान
धर्म गली मा चल तुलसी कस तै मत बन अनजान ।

तुलसी - बबा बताइस धरसा शकुन तहू पहिचान
अब दिन बूडत हावै नोनी झट के तंबू तान ।

  रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Saturday, November 11, 2017

चौपई छन्द - श्री सूर्यकान्त गुप्ता

"ऊँ गं गणपतये नमः"

उमा उमापति के संतान।
कातिक गनपति आँय महान।।
कोटि कोटि के लैं अवतार।
करैं देव दानव संहार।।

ईश्वर के तो रूप अनेक।
करैं काज उन जग बर नेक।।
पशु पक्षी नर वानर रूप।
किसम किसम के तोर सरूप।।

कइसे बनिन गजानन देव।
किस्सा थोकिन जानिच लेव।।
चलिस देव दानव संग्राम।
चलिन लड़न शिव छोड़िन धाम।।

गौरी इच्छा जागिस जान।
सोचिन करौं अभी असनान।।
रहिन भवन माँ गौरी माय।
पहरा बर काला बलवाय।।

काया के दिस मइल उतार।
करिन पुत्र माता  तैयार।।
बालक बली, बुद्धि के खान।
पहरेदारी करिन सियान।।

महादेव राक्षस ला मार।
लहुटिन तहाँ अपन घर बार।।
जइसे चाहिन घुसरन द्वार।
पिता पुत्र के होइस वार।।

गुस्सा मा मदहोस महेस।
कलम करिस सर तोर गनेस।।
दाई पारबती के क्रोध।
होइस शंकरजी ला बोध।।

महतारी के मया सियान।
कहिन उमा डारे बर प्रान।।
असमंजस मा परिन महेस।
विष्णु देखाइन राह विशेष।।

लइका मात सुते पहिचान।
लइका डहर पीठ हो जान।।
हथिनी मिलिस अइसने काय।
बालक हाथी मूँड़ गँवाय।।

लगिस सती सुत हाथी मूड़।
बड़का दाँत कान अउ सूँड़।।
फूँकिन शंकर तहाँ परान।
प्रकटिन देव गजानन जान।।

रचनाकार - श्री  सूर्यकांत गुप्ता
सिंधिया नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Friday, November 10, 2017

दोहा छन्द - श्री मोहनलाल वर्मा

दोहा छन्द - श्री मोहनलाल वर्मा

नखशिख सिंगार वर्णन

पावँय नारी के जनम,जेमन पुण्य कमाय।
दाई दीदी के सबो,सुग्घर नता निभाय ।।१।।

घटा सही चूँदी दिखय,घपटे करिया जान ।
छरिया देवय तब लगय,देवी चढ़े समान ।।२।।

नागिन कस बेनी दिखय,गजरा कर सिंगार ।
माँग लाल सेंदूर हे,टिकली लगे कपार ।।३।।

काजर आँखी आँज के,खिनवा पहिरय कान ।
नथनी फुल्ली नाक के,लेवत हवे परान।।४।।

खोपा मा हे मोंगरा,दौना पान लगाय ।
बुरी नजर नइ तो लगय,सुँदरी रूप कहाय ।।५।।

मुँहरंगी लग होंठ मा,भाग अपन सँहराय ।
तेलइ गोरी गाल के,चंदा देख लजाय ।।६।।

गर मा रुपिया ला पहिर,अउ नवलखिया हार ।
ऐंठी पहुँची हाथ मा,मुँदरी अँगरी डार ।।७।।

लगे हथेरी मेंहदी,सँहरावत हे भाग ।
दर्जन भर चूरी नरी,चिनहा हवय सुहाग ।।८।।

करधन कनिहा झूलके,करय गाँव भर शोर ।
टोंड़ा लच्छा गोड़ के,पैरी बाजय तोर ।।९।।

चाँदी बिछिया पाँव मा,माहुर हवे रचाय ।
पहिरय लुगरा पोलखा,इत्तर ले महकाय ।।१०।

रचनाकार - श्री मोहनलाल वर्मा
ग्राम -अल्दा, पोस्ट - तुलसी मानपुर,
तहसील - तिल्दा, जिला -रायपुर
छत्तीसगढ़

Thursday, November 9, 2017

चौपई छन्द - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

चौपई छन्द - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

बसदेवा गीत

जय गंगान.....

बेटा ताश जुआ झन खेल।
घर मा बैठव गोड़ सकेल।
धन दौलत होथे बरबाद।
हो जाथे बेघर औलाद।

जय गंगान....

झन करिहौ गा मदिरा पान।
नाहक के झन घेपव प्रान।
कोठी के नइ बाँचय धान।
कचरा होथे घर के मान।

जय गंगान.....

फोकट घर मा आथे रार।
बिन कारन पर जाथे मार।
मदिरा ला तँय महुरा जान।
दूर रहे बर मन मा ठान।

जय गंगान.....

तंबाखू बीड़ी सिगरेट।
देथे गा घरघुँदिया मेट।
पटरी ले जिनगी के रेल।
झन तँय अपने हाँथ ढकेल।

जय गंगान....

चुगली के झन झाँकौ द्वार।
कखरो मन आगी झन बार।
ये तो दू धारी तलवार।
दूनो डहर खवाही मार।

जय गंगान.....

बेटा बन तँय मनखे नेक।
धरम करम कर धरे विवेक।
सत रद्दा धर करके चेत।
हरियाही जिनगी के खेत।

रचनाकार - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर(कवर्धा), कबीरधाम, छत्तीसगढ़

Wednesday, November 8, 2017

सरसी छन्द - आशा देशमुख


सीता हरण

आघू आघू मिरगा भागे ,पाछू मा रघुबीर ,
येती ओती कूदत फांदत ,भागय जंगल तीर | 5)

टहक टहक के मुड़ी घुमावय ,फेर दुरिहा जाय ,
बाण धरे रामा हा खोजे ,मिरगा कहाँ लुकाय | 6)

कतका दूर निकलगे दूनो ,जंगल हे घनघोर
सरसर करथे पाना डारा ,करय झिंगुर मन शोर | 7)

सोचत हे माया मिरगा हा ,अब बन जाही काम
रेंगत हावय थकहा जइसे ,देखत हावय राम |8)

साधत हे अब राम निशाना ,मारत हावय बाण
मारीच बने माया मिरगा ,तड़फय ओकर प्राण |9

असल रूप मा आये मिरगा ,सिया लखन चिल्लाय
देखय रामा मायावी ला ,अबड़ अचम्भा खाय | 10

सीता ला लागत हे अइसे ,रामा करे पुकार
सुन लक्ष्मण तुँहरे भैया हा ,पारत हे गोहार | 11)

 लक्ष्मण हा बोलय सीता ला ,ये सब माया चाल
मोरे प्रभु के आघू मैया ,खुदे डराथे काल | 12)

कहाँ सुनय गा बात सिया हा ,शंका मा बड़ रोय
बरपेली वोहा लक्ष्मण ला ,तुरते उहाँ पठोय | 13)

रक्षा रेखा खीच लखन हा ,दउड़त जंगल जाय
अब येती गा पर्णकुटी मा ,भारी विपदा आय | 14)

सबो खेल ला जेन रचे हे ,वो रावण अब आय
छल कपट के झोला धरके ,साधू रूप बनाय |15)

लक्ष्मण रेखा के भीतर मा ,साधू पांव मढ़ाय
उठय उहाँ आगी के ज्वाला ,रावण देख डराय |16)

भिक्षा दे दे द्वार खड़े हव ,कपटी ह गोहराय |
देखय साधू ला कुटिया मा ,सीता भिक्षा लाय | 17)

भीतर रहिके दान करत हस ,होय मोर अपमान
साधू कहत हवय सीता ला ,नइ लेवव मैं दान | 18)

साधू मान रखे बर सीता ,जइसे बाहिर आय
असल रूप में आए रावण ,देखत सिया डराय 19)

सिया हरण करके रावण हा ,बैठ विमान उड़ाय
रोवत हे अबला नारी हा ,राम राम चिल्लाय |

रचनाकार - आशा देशमुख
एन टी पी सी कोरबा, छत्तीसगढ़

Tuesday, November 7, 2017

शकुन्तला शर्मा: छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण 2017 मा सम्मानित




"छन्द के छ" परिवार के शकुन्तला शर्मा ला छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण - 2017 मा "संस्कृत भाषा सम्मान" मिलिस। छन्द के छ परिवार के साधक मन ये बेरा ला "आनंदोत्सव" के रूप मा मनाइन अउ अपन छन्दमय बधाई दिन।

1. अरुण कुमार निगम -

शकुन्तला शर्मा हवैं, छत्तीसगढ़ के शान
संस्कृत भाषा के मिलिस, हे बड़का सम्मान ।।

बात गरब के हमर बर, सोला आना आय
मिलै बधाई छन्दमय, अइसन करव उपाय।।

धन के हमन गरीब हन, मन के राजा आन
हमर असन शुभकामना, का देही धनवान।।

अपने घर परिवार के, मनखे पाथे मान
सच मानौ परिवार के, हो जाथे सम्मान।।

2. गजानंद पात्रे -

दीदी हमर शकुंतला,हम सबके हे शान।
संस्कृत भाषा मा मिले,आज हवे सम्मान।।

हमर छंद परिवार के,साधक हवे सुजान।
लिखथे बढ़िया छंद अउ,रखथे बहुते ज्ञान।।

शक्ति अबड़ नारी जगत,साबित कर दिस आज।
शासन ये छत्तीसगढ़,पहनाइस हे ताज।।

3. सुखदेव सिंह -

अबड़ विदुषी हे मृदुभाषी,नइ कर सकौं बखान।
देत बधाई उँहला हम सब,पावत हावन मान।

शकुन्तला शर्मा हे जेखर,बहुते सुग्घर नाम।
संस्कृत भाषा बर दीदी मन,करे रहिन शुभ काम।

जाँच परख छत्तीसगढ़ शासन,देखिस काम महान।
संस्कृत भाषा बर दीदी ला,देइन हे सम्मान।

शुभ संदेशा सुनत हमागे,अंतस खुशी अपार।
दीदी के सँग गौरव पागे,छँद के छ परिवार।

4. वसंती वर्मा -

दीदी हावय हमर जी,शकुन्तला हे नाम ।
संस्कृत विदुषी ला करँव,कोरी पाँच प्रणाम ।।

बहुत गरब के बात जी,पावय बेटी मान ।
दीदी हमर शकुन्तला,बेटी मन के शान।।

5. ज्ञानु दास मानिकपुरी -

शकुन्तला दीदी हमर,रचे हवे इतिहास।
जिनगी ओखर साधना,सत साहित बर ख़ास।।

लगन मेहनत ले अपन,हे जगमा पहिचान।
संस्कृत विदुषी के मिले,आज हवे सम्मान।।

7. अजय अमृतांशु -

शकुंतला दीदी हमर,पाइन हे सम्मान।
अबड़ मया करथन हमन,कतका करन बखान।।

8. सूर्यकान्त गुप्ता -

दीदी ज्ञानी हें हमर, दुरिहाथे अभिमान।
देथें संबल हर समय, ए भाई ला जान।।
ए भाई ला जान, कतेक सुग्घर समझाथें।
रद्दा साहित रेंग कहत उन आस जगाथें।।
सन्मान हकदार, सही उन अतका जानी।
देथौं बारंबार, बधाई दीदी ज्ञानी।।

9. राजेश निषाद -

संस्कृत भाषा मा मिले, तोला ओ सम्मान।
दीदी हमर शकुंतला,सबके तैं हर शान।।

10.  चोवा राम " बादल" -

शकुंतला दीदी हमर,जम्मो गुण के खान ।
शारद कस बानी हवय, कतका करौं बखान ।।

संस्कृत के संस्कार हे, सादा उच्च बिचार ।
जेखर अंतस मा बसे, सब बर मया दुलार ।।

दिब्य हवय जी चेहरा , झलकय देवी रूप ।
भाखा गुरु गम्भीर हे, साहित के अनुरूप ।।

सँउहे वो ईनाम ए, प्रभु के दे वरदान ।
छंद के छ परिवार के, जेन बढ़ाथे सान ।।

धन्यवाद सरकार ला, जेन करिस पहिचान ।
तिकड़म बाजी छोंड़ के, विदुषी ला दिस मान ।।

दीदी से विनती हवय , झोंकय मोर प्रणाम ।
छंद फूल धर हँव खड़े, साधक चोवा राम।
 
11. हेमलाल साहू -

साहित्यकार जान ले, सुघ्घर तँय पहचान ले।
सुघ्घर जेकर काम हे, शकुन्तला दी नाम हे।

संस्कृत के विदुषी इहे, बड़े बड़े ज्ञानी कहे।
छंद भरे रचना करे, उपनिषद अनुवादक हरे।।

अपंगता के जीत ला, सुघ्घर लिखथे गीत ला
देश प्रेम के मीत ला, राखे माटी प्रीत ला।

बेटी मन के शान जी, बनिस हवै पहचान जी।
हावय बड़ गुनवान जी, कइसे करवँ बखान जी।

संस्कृत भाषा ज्ञान ला, पाइस जी सम्मान ला।
झोंक बधाई आज तँय, करथस सुघ्घर काज तँय।

रहन सदा तोरे छाँव मा, आशीष पान पाँव मा।
एक रहन परिवार हम, राखत मया दुलार हम।।

दूवा करथे हेम हाँ,  खुश रइही हर टेम हाँ।।
देत मया ला हेम दी, अपनो रखबे प्रेम दी।।

12. ललित साहू जख्मी -

पाये   हे   सम्मान  ला,  दीदी  बर  हे  नाज।
जिनगी भर वोहा करे, जन हित के सब काज।
जन हित के सब काज, संग मा साहित सेवा।
देश  भक्ति  सम  भाव,  राम  ला  माने  देवा।
महाकाव्य अउ गीत, सबे ल  सहज वो गाये।
करे हवय बड  त्याग, तभे  सम्मान  ल  पाये।

13. आशा देशमुख -

साहित के हे साधिका ,शकुन्तला हे नाम ।
जनम धरे हावय जिंहा ,कहे कोसला धाम।

 शकुन्तला दीदी हमर ,सँउहत शारद आय ।
जेकर गुण ला देख के ,जग हा माथ नवाय ।

संस्कृत विदुषी के मिले ,दीदी ला सम्मान ।
दीदी तोरे संग मा ,बाढ़य हमरो शान ।

14. दुर्गाशंकर इजारदार -

दीदी शकुन्तला सुनव ,हावय गुन के खान ,
मैं मूरख मति मंद जी ,कतका करौं बखान ।

भगवन भाखा मा मिले ,दीदी ला सम्मान ,
दाई भाखा के घला , जेन हर रखथे आन ।

शकुन्तला शर्मा -

छंद - राग के बाँधे गठरी, मोला मिल गिस गहना
राग पाग के स्वाद मिठाइस, रसदा के का कहना।

रसदा - धर के चल रे भाई, मिलही देख ठिकाना
आस - धरे विश्वास धरे - हन, छंद - राग हे गाना।

अरुण निगम के छंद देख के, मोरो मन ललचागे
सीखे - बर विद्यार्थी बनके, शकुन्तला हर आ गे।

शकुन रश्मि वासंती आशा, बहिनी मन जुरियागें
बड़ मुश्किल मा भले पाय हन, राग पाग ला पागें।

बहुत - मयारुक हें भाई मन, अरुण प्रधान पढाथे
बिकट चाव से बने सिखो के, धुन मा बने गवाथे।

सब झन के आपस मा बढ़िया, हावय भाई चारा
देश धर्म बर हमूँ लगाबो, जय जय जय के नारा।

हमर छंद भारत के महिमा, सुग्हर धुन मा गाही
भूले भटके मनखे मन ला, छंद डहर मा लाही।

15. मोहन लाल -

शकुन्तला  जी नाँव हे, दीदी आय हमार।
देवत हन शुभकामना,सबो छंद परिवार।।

साहित सेवा साधना ,हे उँकरे पहिचान।
सुखी रहय दीदी सदा,बिनती हे भगवान।।

संस्कृत भाषा के मिले,हवे बड़े सम्मान।
साहित कुल के आज गा ,बाढ़िस हाबय शान।।

बड़ विदुषी दीदी हमर,रचना करय  महान।
सब भाखा के ज्ञान हे,बोलय मीठ जुबान।

साहित  सेवा अउ  करव,होवय जग मा नाम।
झोंक बधाई संग लव, मोहन  के परनाम।।

16. मनीराम साहू -

बधई हे सम्मान बर, दीदी ला जी मोर।
गाँव शहर मा जी जिँकर, उड़त हवय बड़  शोर।

17. पोखन जायसवाल -

जुड़गे तमगा एक ठन , बाढ़िस दीदी शान ।
गुंजे शोर चारो मुड़ा , दिखत हवय परमान ।।

18. ललित साहू जख्मी -
दीदी हमर महान हे, कतको हे परमान।
ओखर जस दुनिया कहे, महूँ करँव गुनगान।।🙏🏻🙏🏻

19. सूर्यकान्त गुप्ता -

दीदी तो अवतार एँ, मातु शारदा ताँय।
संस्कृत के विदुषी हवैं, साहित बाग सजाँय।।

शकुन्तला शर्मा -
मैं हर "छंद के छ" संग अपन उपलब्धि ल बाँट के बहुत गौरव के अनुभव करत हँव।👏

Monday, November 6, 2017

कज्जल छन्द - श्री हेमलाल साहू

1)
वरुण देव हा जी रिसाय।
पानी आसो नइ गिराय।।
रोवत नदिया बहत जाय।
हाल देख भुइँया सुनाय।

रोवत हावे सब किसान।
आसो होइस नहीँ धान।
भुइँया जेकर हवै जान।
सुक्खा मा छूटत परान।

पानी के नइ पास धार।
सुन्ना हावय खेत खार।
रोवय बारी बइठ मरार।
पानी बिन नइ हवै नार।

जिनगी बर जी हवै काल।
सबके निकलत हवै खाल।
तीन साल परगे अकाल।
होवत नइ हे अंत राल।

जिनगी मा ला तँय बहाल।
वरुण देव करदे कमाल।
बारिश होय टरै दुकाल।
मन हरियर हो इही साल।

2)
जप ला करके राम राम।
छाँव रहय या बने घाम।
करले बढ़िया सँगी काम।
होयव जग मा तोर नाम।

जाँगर बढ़िया सँगी पेर।
जिनगी मा नइहे अँधेर।
पाबे सुख तँय बने फेर।
जिनगी बर तँय समे हेर।

होवय चर्चा गली खोर।
अपन मेहनत लगा जोर।
जस हा बाढ़त बने तोर।
पानी मा आलस ल बोर।

छोड़व मनके अंहकार।
दुरिहा होवय अंधकार।
दिया करम के बने बार।
आवय लछमी घर दुवार।

3)
सबो डहर हे लूट पाट।
बने रथें साहेब लाट।।
मानवता ला देत पाट।
खोल चोर सबके कपाट।।

मिलै न बिन सबूत चोर।
न्याय हवे  अंधरा मोर।।
घुमय चोर हा गली खोर।
कहाँ पुलिस ला हवै सोर।

करत परोसी हवै खोट।
जबले देखे हवै नोट।।
भाई  के मन होय छोट।
पइसा खातिर बिके वोट।।

गार पसीना करव काम।
अपन समे के हाथ थाम।
रही जगत मा तोर नाम।
पेरव जाँगर छाँव घाम।

आवव देवव जी सबो साथ।
काम बाँट सब अपन हाथ।।
सबो डहर गढ़ नवा गाथ।
धरती सेउक नवा माथ।।

रचनाकार -हेमलाल साहू
ग्राम-गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
(छत्तीसगढ़) मो. 9977831

Saturday, November 4, 2017

चौपाई छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

चौपाई छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 बइगा गुनिया

दोहा -
आदत ले लाचार हे, सुने नही गा बात।
बन बन मा किंजरत रथे,बिहना ले वो रात।1

चौपाई -

सरी मँझनिया  घूमे टूरा। सिरतों मा बइहा हे पूरा।
पीपर  पेड़   तरी  जा  बइठे।सबझन जिहाँ भूत हे कइथे।

झुँझकुर छइँहा हे मनभावन। उँही   मेर   लागे   सुरतावन।
बइठे   टूरा  गोड़  लमाये।खुसरा घुघवा देख डराये।

खारे खार  कोलिहा भागय।देखय भोड़ू बड़ डर लागय।
नांग  साँप  के  हरय बसेरा। दँतिया  भाँवर   डारे   डेरा।

हवा  चले   बड़  डारा  डोले। रहि रहि के बनबिलवा बोले।
काँव काँव  कौवा  चिल्लाये। टेटका बिन बिन चाँटी खाये।

साँप पेड़ के उप्पर नाचे। चिरई  अंडा कइसे बाँचे।
चील  बाज उड़ बादर नापे। भूँके कुकुर जिया हा काँपे।

झरे पछीना तरतर तरतर। काँपय टूरा थरथर थरथर।
हुरहा   बड़का  डारा   टूटे। मुँह ले बोल कहाँ ले  फूटे।

सुध बुध खोये भागे पल्ला। पारा  भर  मा  होगे  हल्ला।
दाई  दाई   कहि   चिल्लाये। मनखे तनखे बड़ सँकलाये।


दोहा -
हफरत  हफरत  काँपथे, रहि रहि  के चिल्लाय।
घाम जेठ अब्बड़ जरे,चक्कर खा गिर जाय।2

चौपाई -

बोली बोलय आनी बानी। डारव सिर मा ठंडा पानी।
खींच बाहरी कोनो मारव। भूत  धरे  हे कोनो झारव।

लान जठावव खटिया खोर्रा। मारव  भँदँई   मारव   कोर्रा।
हाथ गोड़ ला चपकव दोनो। जावव बइगा  लानव कोनो।

जल्दी  मरी  मसान  भगावव। लइका लोग तीर झन आवव।
रोवय     दाई    बाबू    बइठे। आये   बइगा    मेंछा   अँइठे।

आँखी मा छाये हे लाली। पहिरे  मूँदी  माला बाली।
गुर्री   गुर्री   देखय    बइगा। माँगे नरियर लिमवा सइघा।

भूत  भाग   जा रे पीपर के। छीचे राख जाप कर करके।
लानव खैरी कूकरी चंदन। माँ  काली  के करहूँ बंदन।

लहूँ  भरे  हाथे   हे लोटा। देखब काँपे सबके पोटा।
बइगा  लेवय  लउहा  लउहा। जल्दी  लानव लिमवा मउहा।

हँसिया  धरे  करे  दू चानी। काटे लिमऊ फेकय छानी।
बोलय मंतर बड़ चिल्लाये। कुकरी  काटे बली चढ़ाये।

दोहा -
जंतर  मंतर  मार  के,बइगा   भूत   भगाय।
बंदन चाँउर छीच के, देह भभूत लगाय।3

चौपाई -

फूँके  मंतर   बाँधे    डोरी। पइसा माँगे चालिस कोरी।
बोले  भूत  भाग  गे कहिके। चेत ह आही थोरिक रहिके।

भीड़ देख के डॉक्टर आगे। बइगा  गठरी   बाँधे   भागे।
बोले डॉक्टर चेकप  करके। गिरे हवय  ये लइका डरके।

जरत घाम मा लू के डर हे। बइगा नइ जाने का जर हे।
दवई ला जब  लइका पीही। का होइस  तेला उठ कीही।

भूत प्रेत अउ  जादू टोना। हरे वहम  एखर गा होना।
भूत  प्रेत  के डर देखाके। ले जाथे पइसा गठियाके।

बइगा  गुनिया के चक्कर मा। मर जाथे लइका मन जर मा।
बइगा तीर कभू झन  जावव। कहीं होय  डॉक्टर  देखावव।

जादू   टोना   टोटका ,हरय   अन्ध  विश्वास।
बइगा गुनिया झन धरव,लेगव डॉक्टर पास।4

 रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा) छत्तीसगढ़
9981441795

Friday, November 3, 2017

चकोर सवैया छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

चकोर सवैया छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
(1)

कातिक के महिना धरके अपने सँग मा घर लावय जाड़।
अग्घन हा बनगे जस निंदक कान भरै भड़कावय जाड़।पूस घलो सुलगावत हे बनके कुहरा गुँगवावय जाड़।
काँपत ओंठ ल देख परै तब अंतस मा सुख पावय जाड़।

(2)
                                   
घूमत हे लइका उघरा उँहला नइतो डरुहावय जाड़।
कोन जनी बुढ़वा मन के मन ला कइसे नइ भावय जाड़।
देखत हे कमिया कर जाँगर मूड़ ल ढाँक लुकावय जाड़।
काम बुता नइहे कुछु हाँथ त रोज अलाल बनावय जाड़।

(3)

धान लुवावत माढ़त जावत हे करपा बड़ हाँसय ठाँव।
हे खलिहान घलो फभथे मइया परथे तुँहरे शुभ पाँव।
देख किसानन के श्रम ला भगवान घलो सँहरावय नाँव।
राँधत पोवत खावत मानुष के सँग मा खुश हे सब गाँव।

रचनाकार - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

Thursday, November 2, 2017

चकोर सवैया - श्री दिलीप कुमार वर्मा

 चकोर सवैया  - श्री दिलीप कुमार वर्मा

(1)

देखत हौं बड़का मन हा हर छोटन ला अबड़े ग दबाय।
छोटन छोटन बात म भी अबड़े बड़का मन रोब दिखाय।
ऊंखर हो कतको गलती पर ओमन ला कुछु कोन सुनाय।
साँच कहे तुलसी हर जी बड़का मन ला कब दोस लगाय।

(2)
भीड़ भरे मनखे मन के पर दीखत हे मनखे अब कोन।
होवत हे अपराध तभो सब देखत हे उँहचे कर मोन।
आज घरो नइ बाँचत हे अबड़े अपराध भरे घर तोन।
काबर ये मनखे ह भुलावय मानवता हर होवय सोन।

(3)
नोंचत खावत हे गिधवा मुड़ मा बइठे मुरदा कर कान।
लेवत हे रस नाक चबावत बाँच सके कुछ ना अब जान।
ये गिधवा नइ सोंचत हे उन जीवत मा कतका ग महान।
ये तन हा कुछ काम न आवय जावय जीव छुटे जब प्रान।

(4)
जाँगर टोर कमावत हे जब खेत म जावत हे ग किसान।
खानत जोंतत छींचत हे अउ लूवत हे जब होवय धान।
बाँधत जोरत लानत हे खरही सब मीजत संग मितान।
भाव कहाँ पर पावत हे जब जावत जे धर बेचन धान।

(5)
लालच मा सब आय रचावत हे दुनिया भर के जब खेल।
होवत हे अपराध तहाँ पकड़ावय जावत हे तब जेल।
जेलर मारत कूटत हे अउ पीसत रोज निकारय तेल।
काबर काम करे मन सोंचत लालच के फल पावय सेल।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
 बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Sunday, October 29, 2017

बरवै छंद - श्री दिलीप कुमार वर्मा

बरवै छंद  - श्री दिलीप कुमार वर्मा

पेड़ लगाव  -

जगा खोज ले सुग्घर,पौधा लान।
राँपा कुदरी सँग मा,गड्ढा खान।

करिया माटी सँग मा,खातू डार।
कीरा झन राहय जी,बने निहार।

रोपव पौधा बीच म,जाली मार।
रोज  बिहानी उठ के,पानी डार।

लइका पालव जइसे,तइसन पाल।
गरमी के मौसम मा,पानी डाल।

होही बड़का पौधा,सिरतो मान।
सेवा जाय न बिरथा,तेला जान।

छइहाँ सुग्घर दीही,संगी मोर।
जेहर पाही लीही,नाम ल तोर।

चिरई चिरगुन आही,नीड़ बनाय।
चींव चींव नरियाही,सुख ला पाय।

फुलही फरही पेंड़ ह,सब ला भाय।
लइका मन चढ़ जाही,फर ला खाय।

तोरो छाती फुलही,पा के मान।
सब ले बड़का पुन ये,पौधा दान।

धरती हर हरियाही,ख़ुशी मनाय।
सब ला सुख दे जाही,तोर लगाय।

तोर लगाये पौधा,रौनक लाय।
फुलय फरय जब ओ हर,नाती खाय।

जाबे जब दुनिया ले,तन ला छोंड़।
सुरता करहि सबझन,फर ला तोड़।

नाम अमर हो जाही.संगी मान ।
पेंड लगइ ला असने,तँय झन जान।

आवव पेंड़ लगाइन,समय निकाल।
धरती ला सुघराइन,श्रम ला डाल।

बिना लगे जी पइसा,नाम कमाव।
थोरिक करलव मिहनत,अमर कहाव।


सफाई -

साफ़ रखव घर कुरिया,लीप बहार।
अँगना परछी बरवट,अउ कोठार।

कचरा झन फेंकव जी,संगी खोर।
बिगड़ जही सँगवारी,तबियत तोर।

गन्दा रहिथे नाली,मच्छर होय।
अइसन होय बिमारी,जिनगी खोय।

पानी हर मइलाथे,करे बिमार।
बाढ़य पेट बिमारी,सब लाचार।

हैजा तक हो जाथे,सुन नादान।
आस पास कचरा ले,सिरतो जान।

माछी पनपय भारी,घर मा जाय।
बइठय ओ जे खाना,मनखे खाय।

कहत हवँव सँगवारी,कहना मान।
मैल बिमारी के जड़,कर पहिचान।

कचरा डारव घुरुवा,सबो निकाल।
गीला सुखा सब ला,अलग सम्हाल।

पानी झन माढ़य जी,डबरा पाट।
नाली साफ़ रखे ले,जीहव ठाट।

शौचालय मा जावव,घर बनवाय।
बाहिर मा झन जावव,मल फइलाय।

मान रखव मनखे के,घर मा जाव।
साफ़ स्वच्छ घर आँगन,आदर पाव।

खुद समझव समझावव,कहना मान।
गाँव शहर सफ्फा तब,देश महान।


रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Friday, October 27, 2017

कज्जल छंद- श्री मोहन लाल वर्मा

कज्जल छंद- श्री मोहन लाल वर्मा

कहाँ बिलमगे धनी मोर।
हिरदे मा रस मया घोर।
सुन्ना लागय गली खोर।
पूछत रहिथँव पता सोर।1।

सास ननद नइ गोठियाँय।
ताना मारँय अउ चिढ़ाँय।
लागय घर हा भाँय भाँय।
रहिथँव मूँड़ी मँय नवाँय।2।

बेटी होगे हे सजोर।
किंजरत रहिथे गली खोर।
नइ मानय अब बात मोर।
कइसे राखँव बाँध छोर ।3।

बेटा हा नइ पढ़े जाय।
मोला नइ कुछु समझ आय।
घर नइ आवय बिन बलाय।
चिंता ओकर बड़ सताय।4।

बिजरावय लइका सियान।
तोर धनी हाबय महान।
करय बुता ला आन तान।
सिरिफ बघारय अपन शान।5।

आजा संगी लुबो धान।
लुवत सबो हे किसान।
का तोला नइहे धियान।
होगे हँव मँय हलाकान।6।

रचनाकार - श्री मोहन लाल वर्मा
ग्राम -अल्दा, पोस्ट - तुलसी मानपुर,
तहसील - तिल्दा, जिला -रायपुर
छत्तीसगढ़

Thursday, October 26, 2017

बरवै छंद(12-7मात्रा) - श्रीमती वसंती वर्मा


बरवै छंद(12-7मात्रा) - श्रीमती वसंती वर्मा


🌷🌷पुन्नी के चंदा🌷🌷🌷

पुन्नी के चंदा हर,बरय अँजोर ।
नाचत देखय ओला,आज चकोर।।

सोला करे सिंगार ,चंदा आय ।
जेहर देखय ओला,मन ला भाय।।

अमरित लेके चंदा,बरसे आय ।
छानी परवा दाई,खीर मढ़ाय ।।

धान ओरमे बाली,अमरित पाय ।
पुन्नी शरद म सुघ्घर, रात नहाय ।।

भुइयाँ महतारी के ,पाँव पखार ।
आगे बेटी लछमी,घरे हमार  ।।

रचनाकार - श्रीमती वसंती वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

कज्जल छंद - श्री दिलीप कुमार वर्मा

कज्जल छंद -  श्री दिलीप कुमार वर्मा

धरती जंगल रहे मान।
जीव जन्तु के रहे सान।
मन मरजी सब आय जाय।
बंधन ला तब कोन भाय।1।

गरवा मन सब खाय घाँस।
जीव जन्तु सब रहे पास।
मांस खवइया कर सिकार।
जीव जन्तु ला खाय मार।2।

बन मानुस तक पाय जाय।
जीव जन्तु ओ मार खाय।
पथरा के हथियार ताय।
धीरे लोहा तको पाय।3।

पत्ता ला सब ओढ़ आय।
या पेड़न के छाल पाय।
जीव जन्तु के खाल लाय।
तन बर सब कुरता बनाय।4।

धीरे धीरे धान जान।
खेती सब करथे ग मान।
बइला मन ला बाँध लान।
पालय पोसय बन किसान।5।

धीरे धीरे ग्यान आय।
तब ओ हर मनखे कहाय।
कपड़ा पहिरे अबड़ भाय।
आनी बानी रंग लाय।6।

पर जीवन के रीत ताय।
आय जहाँ ले तहाँ जाय।
कपड़ा लकता सब कटाय।
जादा कपड़ा अब न भाय।7।

जे मनखे ला देख आज।
छोड़त हाबय सबो लाज।
लुगरा ला सब टाँग दीच।
खुल्लम खुल्ला रहे बीच।8।

धोती कुरता छोड़ आय
पाजामा अब कोन भाय।
बरमूडा के संग संग।
देखय दुनिया रहे दंग।9।

फेसन के ये कहे बात।
चिरहा फटहा धरे जात।
ओ मनखे अब सभ्य होय।
जे मनखे कपड़ा ल खोय।10।

जाने अब का होय देस।
बदलत हाबय कोन भेस।
बिन कपड़ा तक सबो होय।
मरियादा ला सबो खोय।11।

फिर से बन मानुस कहाय।
पर जंगल अब कहाँ पाय।
पथरा मा सब सर खपाय।
गरमी ले तब जान जाय।12।

कहना ला अब मान जाव।
मरियादा के संग आव।
मनखे बन के मान पाव।
बंद जिनिस के बढ़े भाव।13।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़