Thursday, August 31, 2017

श्री अजय साहू "अमृतांशु" के दोहा

श्री अजय साहू "अमृतांशु" के दोहा -

             *इंटरनेट*

छागे इंटरनेट हा, महिमा अपरंपार।
घर बइठे अब होत हे, बड़े-बड़े व्यापार।।

बिन खरचा के होत हे, बड़े-बड़े सब काम।
दउड़े भागे नइ लगय,अब्बड़ हे आराम।।

नेट हवय तब सेट हे,दुनिया के सब रंग।
बिना नेट के लागथे,जिनगी हा बदरंग।।

रात-रात भर नेट मा,झन कर अतका काम।
चिंता कर परिवार के,कर ले कुछ आराम।।

घर मा बइठे देख लव,दुनिया भर के रीत।
आनी बानी गोठ अउ,अब्बड़ सुग्घर गीत।।

लइका मन पुस्तक पढ़य,घर बइठे अभ्यास।
होत परीक्षा नेट मा,तुरते होवय पास।।

का कहना हे नेट के करथे,अबड़ कमाल।
येमा सोशल मीडिया ,देवत है सब हाल।।

रचनाकार - अजय साहू "अमृतांशु"
                   भाटापारा, छत्तीसगढ़

Wednesday, August 30, 2017

श्री हेमलाल साहू के दोहे

श्री हेमलाल साहू के दोहे

श्री हेमलाल साहू के दोहे

गिधवा

सोनमती दाई हरै, राखे मया दुलार।
बैसाखू मोरे ददा, करथे मया अपार।।

दसरू के नाती हरव, बेटा आँव किसान।
पर सेवा उपकार मा, बसथे मोर परान।।

गिधवा हावे गाँव जी, हेमलाल हे नाव।
आय जिला बेमेतरा, कन्हार माटी गाँव।।

चिरई चुरगुन हा करै, जिहाँ बसेरा जान।
चना उन्हारी संग मा, बोथे सुघ्घर धान।।

पंथी

ढोलक तबला थाप मा, बाजे मांदर संग।
नाचे साधक साधके, देखव पन्थी रंग।।

बाबा  घासीदास के, करथे  सुघ्घर  गान।
गाए महिमा देखले, गुरु के करत बखान।।

चोला पहिर सफेद गा, नाचे पंथी नाँच।
बाँधे घुँघरू गोड़ मा, गोठ करै गा साँच।।

सादा हवै लिवाज गा, सादा झण्डा जान।
सबला देवत सोर गा, मानव एक समान।।

देव दास सिरजिस हवै, पन्थी  नाँच बिधान।
देश विदेश सबो जगा, करिस हवै गुरु गान।।

खेल

खेलत खेलत सीख ले, जिनगी के तै ज्ञान।
खेल कूद जिनगी हरै, रख अपने पहिचान।।

खेलव खोखो कब्बडी, सुघ्घर दौड़ लगाव।
गिल्ली डंडा खेल के , आँखी नजर बढ़ाव।।

खेलव पचरंगा अऊ, सुघ्घर खेल कुदाल।
राजा रानी खेल मा, दुश्मन खोलव चाल।।

रेस टीप खेले सबो, सबझन देख लुकाय।
टीप हेम पहला परिस, दाम देत रो आय।।

चल ठप्पा ला खेलबो, देखव सबो लुकाय।
पहली ठप्पा हेम के, सब मिलके चिड़हाय।।

संत घासीदास

बाबा घासीदास गा, आये हवव दुवार।
तैहा दीया ज्ञान के, मोरो मन मा बार।।

हव अज्ञानी निचट मे, बता ज्ञान के सार।
बाबा अड़हा हवव मे, मोला जग से तार।।

दुनिया मा हावे भरै, माया के भण्डार।
आके मोरो तै लगा, बाबा बेड़ा पार।।

सबो जीव बाबा हवै, जग मा तोर मितान।
सत्य बचन बाबा हवै, तोरे जग पहिचान।।

मानव मानव एक हे, जगत तोर संदेश।
भेद भाव ला ए मिटै, आपस के सब क्लेश।।

सादा जिनगी तोर हे, सादा हवै लिवाज।
सत रद्दा जिनगी चलै, रखै सत्य के लाज।।

सतनाम पन्त जगत मा, बाबा हा फैलाय।
सत के झंडा देख ले, बाबा जग फहराय।।

सत के पूजा ला करै, बाबा घासीदास।
सत के रद्दा मा चलै, रहिके सत के पास।।

धान

गली खोर ममहाय गा, महके जब दुबराज।
धान महंगा आय गा, रखथे सुघ्घर साज।।

पहली बिसनू भोग के, रहिस हवै गा राज।
अइस महामाया अभी, होवे नही अकाल।।

करिया करिया धान हे, कहिथे केसर नाग।
बढ़िया खेती होय गा, कचरा जाये भाग।।

सबले  मोटा होय गा, रानी  काजर धान।
बड़का बाली हा रहै, कुत आय घमासान।।

सब एक हन

मनखे मनखे एक हन, काबर हे मन खोट।
भाई ला भाई करै,  काबर अइसन चोट।।

जाति धरम हा एक हे, काबर करथे भेद।
मानवता ला छोड़के, अन्तस् करथे छेद।।

राम  रहिम  सब  एक हे, छोड़व मनके द्वेष।।
मिलके रहिबो हम सबो, होय नहीँ कुछ क्लेश।।

मँय चाहत हँव

मँय चाहत हँव जी सबो, मिलके रहिबो ऐक।
करबो साहित बर बने, काम सबो मिल नेक।।

मँय चाहत हँव मन रहै, सुघ्घर काबू मोर।
करके चिंतन साधना, लाव नवा अँजोर।।

मँय चाहत हँव देश मा, आय  नवा  अँजोर।
सबके घर रहतिस खुसी, देत मया के सोर।।

मँय चाहत हँव  दी बने, आय  बहुरिया  तोर।
रखतिस सबके ख्याल ला, बाँध मया के डोर।।

मोला अइसे लागथे

मोला अइसे लागथे, देश बदलही मोर।
आही सुघ्घर देश मा, फेर नवा अंजोर।।

मोला अइसे लागथे, बढ़ी मया के डोर।
पर सेवा जिनगी रही, सबके लेवत सोर।।

मोला अइसे लागथे, गीता  जग  हे सार।
करै पाप के नाश ला, बिसनू ले अवतार।।

मोला  अइसे  लागथे, अब  खाहू में  मार।
ए शोभन काका हवै, गुस्सा करत अपार।।

पूस

आय महीना पूस के, जाड़ा लावय संग।
हाथ गोड़ होवय करा, लागे जी बेरंग।।

पूस मास करिया कहै, करै नहीँ शुभ काम।
बेरा लीलत पूस हा, झटकुन होवय शाम।।

आय महीना पूस के, लेवव आगी ताप।
तन पथरा होंगे हवै, मुँह ले फेकय भाप।।

जूनी दाई

जूनी दाई नाव हे, महिमा हवय अपार।
दाई तरिया पार मा, हवै बिराजे खार।।

ठगड़ी ठाठा मन फले, दरसन ला जब पाय।
मिटै रोग तनके सबो, जब तरिया म नहाय।।

कोरबा

उरजा के नगरी हरै, नाँव कोरबा जान।
सबला दे अंजोर गा, रखै अलग पहिचान।।

आवव देखव कोयला, करिया हीरा जान।
बड़े कारखाना चलै, देखव ओकर शान।।

बिलासपुर

न्याय राजधानी बसे, बिलासपुर हे नाँव।
मिलथे सबला न्याय हा, हरै बिलासा गाँव।।

केवटिन ओ नारी सती, आय बिलासा जान।
लाज बचाये बर अपन, ओ गवाइस परान।।

रइपुर
हमर राजधानी हरै, रइपुर ला पहिचान।
रंग भरै जग के हवै, देखव ओखर शान।।

आनी बानी बोल हे, किसम किसम के लोग।
मानव के माया नगर, अपन दिखायै योग।।

मारो

मान सिंह राजा रहय,  मारो गढ़ के शान।
हावे ओकर आज भी, देख किला के जान।।

भारी बड़का गढ़ रहै, रखै अलग पहिचान।
देख समे बलवान हे, खोइस ओकर शान।।

कांकेर

तपोभूमि रिषि कंक के, आय पहाड़ी धाम।
दाई   ए  कांकेश्वरी,  पूरन   करथे   काम।।

धरम देव राजा रहै, सिंह बनाय दुवार।
कंडरा रक्छा ला करै, दुश्मन पाये हार।।

हे सोनाई रूपई, एकठन तरिया जान।
राजा के बेटी रहै, दुनो  गवाय परान।।

ए सुक्खा होवय नहीँ, जेकर हे परमान।।
आधा पानी सोन गा, आधा चाँदी जान।

बस्तर

आवव बस्तर देखलव, जंगल झाड़ी आय।
हरियर हरियर देखलव, कुदरत रंग भराय।।

देख आदिवासी हवै, हमर इहाँ के शान।
भोला भाला सादगी, जेकर हे पहिचान।।

देखव बस्तर महल ला, सुघ्घरता के खान।
दलपत सागर देख ले, बस्तर के हे आन।।

आवव संगी देखलव, सुघ्घर जलप्रपात।
सबला तीरथगढ़ अऊ, चित्रकोट हे भात।।

खास हवै गा दशहरा, अबड़ ख्याति जग जान।
सबले  हावय  अलग गा, बढ़ाय  बस्तर मान।।

कैलास कुटुमसर गुफा, देखव बढ़िया ढंग।
एक बार  आके बने,     देखव बस्तर रंग।।

पानी कस निरमल हवै, निच्छल गुरु के प्रेम।
बाँटय ज्ञानी ज्ञान ला,  छोड़ आस हर  टेम।।

बार दिया मन प्रेम के, सुघ्घर करले दान।
हवै महीना धरम के, आही घर भगवान।।

दाई लछमी के मया, घर बरसय गा तोर।
भैया ला बधई हवै, बहुत अकन ले मोर।।

आत्मा बिन काया नहीँ, इही जगत के सार।
दीया बाती तेल मिल, करै जगत उजियार।।

माटी के दियना जले, जगत होय अंजोर।
जिनगी के बाती जले, तेल रहत ले मोर।।

आगे धनतेरस हवै, दिया अपन घर बार।
लछमी दाई संग मा, लाय नवा उजियार।।

सुरता आवय रोज गा, गोठ मया के तोर।
निक लागे हमला सँगी, करथौ सबके सोर।।

अंधियार मन मोर हे, कइसे लाव अँजोर।
खुद के दीया भुझत हे, कइसे देहू खोर।l

नोनी मन खातिर लिखे, सुघ्घर हवय किताब।
आव बचाबो मिल सबो, जिनगी हमर जनाब।।

सही बात बोले हवस, दी दी हम रे आस।
सब्द लान के तै बुझा, हमर छंद के प्यास।।

मानव मानव एक हन, मया प्रेम ला जोड़।
राहय नाता प्रेम के, अपन गरब ला छोड़।।

जुआ

गोसइया खेलय जुआ, घर बार होय नास।
पावय पार न कोउनो, कहिथे जेला तास।।

जबले खेले  तै जुआ, लछमी रहै न साथ।
बात मान ले मोर गा, धन न आवय हाथ।।

मंद

दारू पीके झन करव, अपन बुद्धि ला मंद।
करथे बढ़ नुकसान गा, करै साँस ला बंद।।

बइला

पुरखा के चीन्हा हमर, बइला गाड़ी आय।
आज देखले समय ला, सबहा गये नदाय।।

दुनिया मा सबले हवे, बइला हा अनमोल।
जिनगी जाँगर पेर थे, मरके बनथे ढोल।।

छेरी

छेरी पालन ला करव, बढ़ी बने जी आय।
माँस मंदिरा के चलन, कलयुग ला हे भाय।।

सबके घर छेरी रहय, मेर मेर नरियाय।
बढ़िया साधन आय के, अइसने कहाँ पाय।।

जाता

गोल गोल चक्का चले, तरी उपर लौ जान।
कनकी ठोम्हा ओइरे, बनके गिरे पिसान।।

घड़र घड़र जाँता बजे, लागे निक ले तान।
दार दरय घर मा बने, देख बना के घान।।

साधक

साधक ला विनती हवे, बढ़िया लगन लगाव।
अपन मेहनत मा बने, सुघ्घर फसल उगाव।।

खेत लहलहाही तुहर, हाँसय मन हा मोर।
हवे अगोरा फसल के, सुरता करते सोर।।

सुन्ना काबर आज हे, मोला समझ न आय।
ज्ञानी ध्यानी आप सब, काबर फेर रिसाय।।

सूरुज ऊगय देख ले, उठ जा भइया मोर।
ज्यादा झन सो देख ले, होंगे हावय भोर।।

छत्तीसगढ़ मिष्ठान

देसी रोटी चौसला, सबके मन ला भाय।
चटनी बने पताल के, ससने भरले खाय।।

लाड़ू मिलै बिहाव मा, जाबो सगा बरात।
देख कलेवा मा बने, लाड़ू भात खवात।।

बूढ़ी दाई हा हमर, रोटी गजब बनाय।
संगी साथी रोजके, चुरा चुरा के खाय।।

टपकत हावे लार हा, सुनके सबके बात।
जागेव अभी नींद ले, आय बिजौरी भात।।

अरसा खुरमी ठेठरी, सुघ्घर सबला भाय।
तीजा पोरा परब मा, सब घर खूब बनाय।।

कपड़ा हावय काचना, होंगय अबतो टेम।
उठके चल तै काचले, जल्दी जल्दी हेम।।

भजिया सोंहारी बरा, चीला मुठिया खाय।
सुरता मोला आत हे, घर मा हमर बनाय।।

फूल

फूले फूल गुलाब के, भँवरा हा मँडराय।
सुघ्घर के चक्कर पड़े, काँटा मा छेदाय।।

सबके पातेव दुलार ला, बनके सुघ्घर फूल।
सबके मन ला मोह के, रखले सबला कूल।।

चम्पा मन मुस्कात हे, गीत चमेली गात।
गोंदा ठोकथ ताल ला, देख चंदैनी रात।।

सुघ्घर कहत गुलाब हा, मोंगरा सुने बात।
जाबो दाई दुवरिया, गीत बने हम गात।।

टूटी फूटी मोर हे, करहूँ गलती माफ़
मोला कुछ आये नहीँ, मनके हव में साफ।

गुरु

सुन के गुरु बानी मिटै, मन के माया हेम।
धुलथे मनके पाप हा, बाँच जथे बस प्रेम।।

अहंकार जबले बढ़ै, जग मा होय विनास।
ककरो नइहे फायदा, छोड़ अहम के दास।।

चलबो गुरु के नाँव मा, हमतो होय सवार।
डुपती नइया ला करै, भव सागर से पार।।

साग

भाटा आलू देख ले, सबले चालू साग।
ज्यादा खाबे पेट ले, देथे बिगाड़ पाग।।

हवै नेवता गुरुददा, आँव चीख ले साग।
हावय मोरो घर बने, एक तुमा के भाग।

आलू भाटा साग अउ, हावे भाजी प्याज।
बढ़िया खाले पेट भर, झन करबे तै लाज।

गहना

माथे मा बिंदिया सजे, गला गजमुखन हार।
करधन राजे कमर मा, सोला कर सिंगार।।

लाली हे बिंदिया पटा, हावय चूरी लाल।
लाली हावे होठ हा, लाली लाली गाल।।

रुपया टोड़ा ला पहिर, देख जाय बाजार।
ऐंठी लच्छा संग मा, लेवव नथली हार।।

जनभासा

सुघ्घर बिचार आपके, मोरो मन ला भाय।
लिखबो जन भाषा बने, सबला बने मिठाय।।

शब्द सहज दोहा सरल, जगा छंद के भाग।
सूर ताल बढ़िया रहय,  धरके गावव फ़ाग।।

भासा छत्तीसगढ़ के, होवय हमार पोठ।
बोल मया के बात ला, गुरतुर लागे गोठ।।

पहनावा

लुगरा छाया पोलखा, पहनावा तँय जान।
धोती कुरता रहिस हे, पुरखा के पहचान।।

नंदा वत हावे सबो, तइहा के पहचान।
खुमरी टोपी कोट हा, नन्दा गए सियान।।

सूट पीस अउ जीन्स हा, आये अब पहनाव।
तइहा लुगरी पहिर के, टूरी निकलय गाँव।।

धोती कुरता पहिन के, बबा जाय बाजार।
झुमके नाचय देखले, पहिर करेला नार।।

नोनी  पहिरे  फ्रॉक  ला, बाबू हाफे पेन्ट।
जाथे रद्दा बाँट मा, पहिर जीन्स के सेट।।

धोती  कुरता  छोड़ के, पहिरे  जींसे  टाप।
लाल सरम ला बेच के, बनै ब्रिटिश के बाप।।

मातर मड़ई

राउत निकले देखले, लउठी धरके हाथ।
दोहा पारत जात हे, हावय मड़ई साथ।।

लउठी चाले हाथ मा, चलै अखाड़ा खेल।
देखइया आये हवय, कतका ठेलम ठेल।।

जाँच जाँच के देख ले, दोहा सुघ्घर आज।
बता हमर गलती बने, तभे निखरही काज।।

मड़ई मातर के हवै, ननपन सुरता मोर।
संगी मन देखे गये, आन गाँव के खोर।।

@चीला रोटी@

हावे छत्तीसगढ़ के, चीला रोटी शान।
खाके तैहा देखबे, तब पाबे पहिचान।।

चक्का जइसे गोल हे, रहिथे छेद मितान।
सोंहारी तो नइ हरे, एकर कर पहिचान।।

आय नहीँ गेंहू बता, चाँउर आय पिसान।
चाँउर ला पिसके हवै, एला बनाय जान।।

बनही चीला आज गा, आये घर के आन।
नोनी अउ बाबू सबो, एला खावय जान।।

भउजी चूल्हा बारके, पिसान देवय घोर।
जइसे तावा हा तिपय, डाले चारो ओर।।

ढकनी देवय तोप गा, बने फेर सेकाय।
सुघ्घर चीला हा बने, मुँह मा पानी आय।।

अड़बड़ रहिथे स्वाद हा, एला सबो बनाय।
चटनी संग पताल के, माँग माँग सब खाय।।

@भाजी@

भाजी तिवरा अउ चना, देख सबो ललचाय।
फेव-रेट सब के हवे, सिरतो गजब मिठाय।।

खाले भाजी साग ला, सेहत के संसार।
रोग दूर तन के करै, देवत मया अपार।।

टोर खेड़हा खोटनी, भाजी राँध बघार।
सबला हवे पसंद गा, सेहत के भरमार।।

भाजी तिंपनिया रहै, हर पानी के छोर।
दार डाल के राँध ले, देत मया के सोर।।

नाव सोल भाजी हवय, छू के देख लजाय।
अबड़ मिठाथे साग हा, खाये जीभ लमाय।।

मुसकेनी भाजी रहै, गाँव गाँव अउ खार।
लान मुफत मा टोरके, रुपया लगे न चार।।

@जाड़ा@

हेमन्त अपन रंग ला, सबो मुड़ा देखाय।
बनके जाड़ा देखले, अँगमा सरी समाय।।

होत बिहनिया सीत के, छोड़य तीर कमान।
अड़बड़ बड़गे जाड़ हा, सबके लेत परान।।

कड़कत हावे जाड़ हा, माँगत चादर साल।
लकड़ी जइसे तन लगे, पाये पता न खाल।।

उठके भइया बिहनिया, भूरी तापे जाय।
तन के जाड़ा दूर हो, फेर काम हा भाय।।

घामे लागे निक अबड़, जबले जाड़ा आय।
बइठ रवनिया मा बने, तन ला सेके जाय।।

स्वस्थ रखै तन मन बने, सबला जाड़ा भाय।
कसरत करले तँय बने, रोग कभू नइ आय।।

काँपत तन सबके हवे, जाड़ा अबड़ जड़ाय।
बाँधव पागा कान मा, जाड़ फेर न जनाय।।

तुलसी

बिन्दा के सुरता रहै, महिमा हवे अपार।
हरथे सबके रोग ला, तुलसी पूजा सार।।

तुलसी बिरवा तँय लगा, परभू के रख मान।
लछमी घर आही सदा, बिसनू के वरदान।।

1) सावन

सावन महिना मा गिरे, पानी बरस फुहार।
ओम नमः शिववाय के, चारो मुड़ा पुकार।।

2) हरियर

धरती सँवरे हे इहाँ, लुगरा हरियर रंग।
परब हरेली आत हे, लेके नवा उमंग।।

3) चिखला

माते चिखला देखले, गिरबे झन तै हेम।
चार महीना काट ले, रहै नहीं हर टेम।।

4) झिपार

पानी आय झिपार के, घर भीतर गे माढ़।
परगे मोर गरीब बर, महिना दुठिन असाढ़।।

5) असाढ़

नागर धरै असाढ़ मा, जोतै खेत किसान।
रोपाई होवै कहूँ, कहूँ बोय गा धान।।

योग

आवव संगी सीखबो, जिनगी मा गा योग।
होये तन मन पुष्ठ गा, नई लगय जी रोग।।

काल

कलजुग माया जान के, फूँक फूँक रख पाँव।
आही हमरो काल तौ, नइ मिलही जी ठाँव।।

सबले बड़का काल हे, हवे समय के मान।
कतको छुपाय जीव ला, बाँचय नही परान।।

जिनगी के ए रहत लेेे, हाय हाय म कमाय।
मोर तोर कहते रहेे, चैंन कहा ते पाय।।

परदेसिया करे राज

देखव गा परदेसिया, इहा करत हे राज।
बने कोकड़ा साधु गा, सादा फहिर लिबाज।।

एक रुपया चउर दे, अपन बनावै काज।
दारू अड्डा खोलके, देख करत हे राज।।

बनगे छत्तीसगढ़िया, मनखे आज अलाल।
चलत हवे परदेसिया, देखव बिघवा चाल।।

देखव लइका ला करय, भात दैय बीमार।
झन पढ़ छत्तीसगढ़िया, बने रहय गंवार।।

देख मोर छत्तीसगढ़, रोवत हावे आज।
टपटप आँसू हा गिरे, बचाव मोरे लाज।।

माटी दाई मोर गा, हावे करत पुकार।
बेटा मोरे जाग रे, झन सो मुँह ला फार।।

ऊवत सूरुज के जिहाँ, परथे सबझन पाव।
बढ़ निक लागे गाँव हा, हवे मया के छाँव।।

सुघ्घर दाई के मया, महिमा हवय अपार।
अपन पीर अंतस रखै, हमला देथे प्यार।।

बनके दीया मेटलव, जग के सब अँधियार।
बनव रौशनी जगत के, लाव नवा उजियार।।

बइला कस जाँगर हवै, ओला कसके पेर।
दूर करीबी ला करै, मिलै छाँव सुख फेर।।

साबासी टॉनिक हमर, लागे अड़बड़ मीठ।
मन करथे चंगा भला, देख बजा के पीठ।।

दोष दूर करथे सबो, गोठ करव करु भोग।
कड़ू करेला हा रखै,   देख शरीर निरोग।।

मिलै धीर में खीर जी,  करव रोज अभयास।
जाँगर के फल मीठ हे, करत रहव परयास।।

आँखी रहिके अंधरा, हावे मोर समाज।
पइसा मा मनखे बिकै, करै दोगला राज।।

धरम करम नाव रहिगे, नई हे सतइमान।
कटै इमानदार के गला, हाँसत हे शैतान।।

गूँगा, बहरा न्याय हे, नई सुनै फरियाद।
मोर मोर के शोर हे, पइसा बने दमाद।।

रचनाकार - श्री हेमलाल साहू
ग्राम - गिधवा (बेमेतरा)
छत्तीसगढ़

Tuesday, August 29, 2017

रोला छंद - श्री सुखन जोगी

रोला छंद - श्री सुखन जोगी

(1)

लगगे महिना पूस, करे हे कस के जाड़ा |
कतको कम्बल ओंढ़ , चढ़ा करहीच कबाड़ा ||
लगे निकलगे जान , तभो ले दउड़ै साँसा |
धीरन कटही पूस , सुखन बाँधे हे आसा ||

(2)

जोहत बइठे बाट , कहाँ ले आही राजा |
रानी होय हतास , कहे अब तो तैं आजा ||
हिरनी फांसे जाल , लगे हे डोरी फाँदा |
राजा लेवत सोर , रखे हे खींच लबादा ||


चनाकार - श्री सुखन जोगी
ग्राम - डोंडकी, पोस्ट - बिल्हा , जिला - बिलासपुर 
छत्तीसगढ़

Monday, August 28, 2017

रोला छन्द - श्रीमती वसंती वर्मा

रोला छन्द - श्रीमती वसंती वर्मा

(1)

छिन हो जाथे सांझ,नानकुन बेरा भइगे ।
लागय कुड़कुड़ जाड़,पूस के महिना अइगे ।।
बासी रोटी बनय,गोरसी आगी बारे ।
बीड़ी देहूॅ छोड़,नॅगरहा किरिया पारे  ।।

(2)

जाड़ा अड़बड़ लाय, पूस के महिना आवे ।
पानी ठरत नहाय, बहुरिया तरिया जावे ।।
भुर्री बबा जलाय,सबों तापें गा लइका ।
बड़का दाई कहय, बारिहा आगी कतका ।।

रचनाकार - श्रीमती वसंती वर्मा
                   बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

Sunday, August 27, 2017

श्री सूर्यकान्त गुप्ता के दोहा

श्री सूर्यकान्त गुप्ता के दोहा

 बेटी ला शिक्षा अउ सन्सकार दौ

बिन शिक्षा सँसकार के, जिनगी बिरथा जान।
मानुस तन हम पाय हन, बन के रहन सुजान।।

बेटा अउ बेटी घलो, शिक्षा के हकदार।
संस्कार के आज हे, दूनो ला दरकार।।

नर नारी बिन जगत के, रचना कइसे होय।
लानत बेटी कोंख मा , मनखे काबर रोय।।

दाई देवी मान के,  पूजौ पथरा चित्र।
घर मा ओकर प्रान के, काबर भूखे मित्र।।

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परियावरन बचाव

चीरत हौ का समझ के, मोरद्ध्वज के पूत।
काटे पेड़ जियाय बर, नइ आवय प्रभु दूत।।

रूख राइ काटौ मती, सोचौ पेड़ लगाय।
बिना पेड़ के जान लौ, जिनगी हे असहाय।।

बिन जंगल के हे मरें, पशु पक्षी तैं जान।
बाग बगइचा के बिना, होही मरे बिहान।।

आनन फानन मा सबो, कानन उजड़त जात।
करनी कुदरत ला तुँहर, एको नई सुहात।।

पीये बर पानी नही, कइसे फसल उगाँय।
बाढ़े गरमी घाम मा, मूड़ी कहाँ लुकाँय।।

जँउहर तीपन घाम के, परबत बरफ ढहाय।
परलय ओ केदार के, कउने सकय भुलाय।।

एती बर बाढ़त हवै, उद्यम अउ उद्योग।
धुँगिया धुर्रा मा घिरे, अनवासत हन रोग।।

खलिहावौ झन देस ला, जंगल झाड़ी काट।
सरग सही धरती हमर, परदूसन मत पाट।।

करौ परन तुम आज ले, रोजे पेड़ लगाव।
बिनती "सूरज" के हवै, परियावरन बचाव।।

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मनखे के तेवर

तेवर मनखे के चढ़ै, सम्हले ना सम्हलाय।
चिटिकुन गलती देख के, नानी याद कराय।।

भय भीतर माढ़े रथे, तभे उपजथे क्रोध।
जब अंतस मा झांकथे, होथे एकर बोध।।

बड़े बड़े विद्वान के, अलग अलग हे झुंड।
सुधा पान स्नान बर, जघा जघा हे कुंड।।

गुस्सा ले बढ़के कथें, करौ क्षमा के दान।
गलती बर जी डांट दौ, समझ तनिक नादान।।

जय जोहार......

सूर्यकांत गुप्ता
1009 सिंधिया नगर
दुर्ग (छ. ग.)

Saturday, August 26, 2017

श्री रमेश कुमार सिंह चौहान के दोहा -

श्री रमेश कुमार सिंह चौहान के दोहा -

               सुमरनी

1. हे आखर के देवता, लंबोदर महराज ।
भरे सभा मा लाज रख, सउॅंहे आके आज ।।

2. जय जय मइया षारदे, रख दे मोरो मान ।
तोर षरण मैं आय हॅव, दे दे मोला ज्ञान ।।

3. दुर्गा दाई तोर तो, परत हंव मैं पांव ।
दे दे मोला आय के, सुख अचरा के छांव ।।

राधा राधा बोल तैं, पा जाबे भगवान ।
जिहां जिहां राधा रहय, उहां उहां गा ष्याम ।।


               दोहा के मरम

4. कविता के हर षब्द मा, अनुषासन के बंद ।
आखर आखर के परख, गढ़थे सुघ्घर छंद ।।

5. चार चरण दू डांड़ के, होथे दोहा छंद ।
तेरा ग्यारा होय यति, रच ले तै मतिमंद ।।

6. विशम चरण के अंत मा, रगण नगण तो होय ।
तुक बंदी  सम चरण रख, अंत गुरू लघु होय ।।

7. सागर ला धर दोहनी, दोहा हा इतराय ।
अंतस बइठे जाय के, अपने रंग जमाय ।।

8. बात बात मा बात ला, मनखे ला समझाय ।
दोहा अइसन छंद हे, जेला जन जन भाय ।।

9. दोहा हर साहित्य के, बने हवय पहिचान ।
बीजक संत कबीर के, तुलसी मानस गान ।।

10. छत्तीसगढ़ी मा घला, दोहा के हे मान ।
धनीधरम जी हे रचे, जाने जगत महान ।।

11. विप्र दलित मन हे रचे, रचत हवे बुधराम ।
अरूण निगम ला देख लौ, रचत हवय अविराम ।।

12. बोली ले भासा गढ़ी, रखी सोच ला रोठ ।
षिल्प विधा मा हम रची, जुर मिल रचना पोठ ।।

13. अनुसासन के पाठ ले, बनथे कोनो छंद ।
देख ताक के षब्द रख, बन जाही मकरंद ।।

14. छोट बुद्धि तो मोर हे, करत हंवव परयास ।
चतुरा चतुरा बड़ हवय, लाही जेन उजास ।।

                 कविता मा रस

15. सुने पढ़े मा काव्य ला, जउन मजा तो आय ।
आत्मा ओही काव्य के, रस तो इही कहाय ।

16. चार अंग रस के हवय, पहिली स्थाई भाव ।
रस अनुभाव विभाव हे, अउ संचारी भाव ।।

17. भाव करेजा मा बसे, अमिट सदा जे होय ।
ओही स्थाई भाव हे, जाने जी हर कोय ।।

18. ग्यारा स्थाई भाव हे, हास, षोक, उत्साह ।
क्रोध,घृणा,आष्चर्य भय,षम,रति,वतसल,भाह ।। (भाह-भक्ति)

19. कारण स्थाई भाव के, जेने होय विभाव ।
उद्दीपन आलंबन ह, दू ठन तो हे नाव ।।

20. जेन सहारा पाय के, जागे स्थाई भाव ।
जेन विशय आश्रय बने, आलंबन हे नाव ।।

21. जेन जगाये भाव ला, ओही विशय कहाय ।
जेमा जागे भाव हा, आश्रय ओ बन जाय ।।

22. जागे स्थाई भाव ला, जेन ह रखय जगाय ।
उद्दीपन विभाव बने, अपने नाम धराय ।।

23. आश्रय के चेश्टा बने, व्यक्त करे हेे भाव ।
करेे भाव के अनुगमन, ओेही हेे अनुभाव ।।

24. कभू कभू जे जाग के, फेर सूत तो जाय ।
ओही संचारी भाव गा, अपने नाम धराय ।।

25. चार भाव के योग ले, कविता मा रस आय ।
पढ़े सुने मा काव्य के, तब मन हा भर जाय ।।

रचनाकार - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान
                    नवागढ़ (बेमेतरा)
                    छत्तीसगढ़

Friday, August 25, 2017

श्री असकरन दास जोगी के दोहा

श्री असकरन दास जोगी के दोहा

*सतगुरु सुमरन*

सतगुरु सुमरवँ देख लौ,चरन मनावँवँ तोर !
सबल होय संत तुँहरे,लाज बचावव मोर !!1

सतगुरु सुमरवँ रोज जी,बढ़िया मिलगे भाग !
दया मया ला राखबे,लागै झन जी दाग !!2

छाँया माया रंग दे,सार नाम के रंग !
साँसा हंसा अंग ले,करले अपने संग !!3

तुँहर ज्ञान भाये बड़ा,शुध्द खरा मन सोन !
पुछत रहै काया कला,पाय भला जी कोन !! 4

आखर आखर लान दे, तोला सउँपन बुध्दि !
सब्बे कचरा देख लौ, करदव मन के शुध्दि !!5

करबो मैहनत पोठ जी, जिनगी साहित ढ़ाल !
सतगुरु आसिस पाय के,ठोंकन जमके ताल !!6

नीत प्रीत ला देख के,भाव भजन ला डार !
छाही जिनगी सादगी,लागै सतगुरु भार !!7


*मोर परिचय*

जानवँ परिचय मोर जी,नाव असकरन दास !
गाँव डोंड़की हे पता,लगथवँ सबला खास !!1

बेलासपुर जिला बने,थाना बेल्हा मोर !
बेल्हा पोस्ट घलो हवै,भेजव मितवा सोर !! 2

शीतल बाबू मोर हे, मात दुलेसर ताय !
भारी दुख ला भोग के,मोला जग मा लाय !! 3

जनम सफल हो जाय रे,मिलगे इँकरे छाँव !
गोड़ तरी मा माथ हे,बढ़िया आसिस पाँव !!4

छै भाई के जोड़ हे, बहिनी एक सजोर !
भौजी दू झन आय हे,अँगना महकै मोर !!5

भतिजी एक हवै सगा,भतिजा तीन हमार !
कुलकत मटकत देख लौ,गाँव गली म सुमार !!6

चहकन चमकन रोज जी,पावन सुख के रंग !
जिनगी सुघ्घर के सजै,बने रहन सब संग !! 7

*भारत माता*

भारत माता रोत हे, हाल बड़ा हे तंग !!
आँसो परत अँकाल रे,कइसे लड़हव जंग !!1

सुक्खा माते देख ले,दर्रा मारे खेत !
पानी-पानी माँग हे,सत्य नाम ला लेत !!2

होवत नइहे धान हा,आस लगाय किसान !
बादर होगे दोकहा,खोलव आँख सियान !! 3

चीन-पाक ललकार के,देवत ताना रोज !
सेना तो तैयार हे, देथे उत्तर सोज !!4

राजनीति के चाल मा,देश मरत हे रोज !
मनखे-मनखे भेद हे,समता खोजा  खोज !!5

नारी लाज लतेड़ के,पापी किंजरत देख !
न्याय बिना सब नास हे,रोत भाग के लेख !!6

राष्ट्र गाय के नाव मा, मार-काट हे होत !
सोसित जनता माथ मा,बोझा दुख के ढ़ोत !!7

भारत माता हा कहै,आही सुख कब लाल !
लावव समता खोज के,टोरव दुख के जाल !!8

*पीपर*

पीपर जुन्ना पेंड़ हे, पाहव सुख के छाँव !
मया दया ला बाँध के,आहव मोरे गाँव !!1

पीपर पिकरी स्वाद ला,जानै हमर मितान !
गाँठ बाँध के लाय गा,माँगै रोज सियान !!2

पीपर पाना देख रे,कहे हवच अनमोल !
नइहे मोल पिरीत के,बाजे हिरदे ढ़ोल !!3

पीपर बइठे बेंदरा,करथे हुँप-हुँप देख !
कुदही छानी दौड़ के,छानी अपन सरेख !!4

देथे पुरवा शुध्द गा,पीपर पावन पेंड़ !
बइठे एकर छाँव मा,बँसरी धुन ला छेंड़ !!5

असकरन दास जोगी
ग्राम - डोंडकी, पोस्ट - बिल्हा , जिला - बिलासपुर 
छत्तीसगढ़

Thursday, August 24, 2017

श्री चोवाराम वर्मा के दोहा

श्री चोवाराम वर्मा के दोहा

*छत्तीसगढ़ के तीरथ धाम*(दोहा)

चंदखुरी श्री राम के, ममा गाँव तो आय ।
छत्तीसगढ़ म जी तभे, भाँचा पाँव पराय ।।

कुस राजा कसडोल के, त्रेता जुग के बात ।
रहिस राज लव के लवन, सूर्यवंस बिख्यात ।।

सिरपुर मा मंदिर हवय,ईंटे ईंट बनाय ।
जग मा अबड़ प्रसिद्ध हे, लछिमन मंदिर ताय ।।

राजिम मेला घूम ले, अउ बाबा के धाम ।
सिवरीनारायण हवय, जिहाँ बिराजे राम ।।

गंगा मइया झलमला , हवय जिला बालोद ।
पाटेस्वर मा हे बनत, मंदिर धरती खोद ।।

दाई हे दन्तेस्वरी, दन्तेवाड़ा स्थान ।
देवी हा छाहित रथे, जुग जुग ले हे मान ।।

भोरमदेव ला देख के, संगी तैंहा आव ।
खजुराहो जाबे कहाँ, ओइसने ए ठाँव ।।

डोंगरगढ़ बमलेस्वरी, रतनपुरी महमाय ।
जग जननी के कर दरस, दुख जावय बिसराय ।।

काँसी सहीं खरौद हे, राजिम हमर प्रयाग ।
महानदी मा स्नान कर, अपन जगा ले भाग ।।

मंदिर हे भाँचा ममा, बारसूर हे गाँव ।
दरसन करव गनेस के, उपर पहाड़ी ठाँव ।।

घपटे घन जंगल हवय, बस्तर जेन कहाय ।
चित्रकोट झरना जिहाँ , करमा गीत सुनाय ।।

पावन धाम गिरौद हे, झंडा हा फहराय ।
जय बोलत सतनाम के, दरसन बर सब आय ।।

आरंग हा इतिहास मा, मंदिर नगर कहाय ।
जैनी मन आथे इहाँ , मूर्ति देख हरसाय ।।

लवकुस जन्में हेँ जिहाँ, तुरतुरिया हे नाम ।
बालमिकी रचना रचिस , सुमर सुमर के राम ।।

*भाजी पाला*(दोहा)

डार अमारी राँध ले, बखरी के तैँ चेंच ।
खाही भइया माँग के, लमा लमा के घेंच ।।

भाजी हवय मछेरिया ,मछरी असन सुवाद ।
साकाहारी जेन हे, तेकर बर परसाद ।।

मुनगा भाजी जी हवय, अबड़े गुन के खान ।
कतको रोग ल ए हरय, खावव दवा समान ।।

मुनगा भाजी ला सुखो, बुकनी करके छान ।
सीसी मा भरके रखव, पाबे कहाँ दुकान ।।

रोज रोज दीदी कथे, मुनगा भाजी लान ।
आरा पारा मोर ले , होगे हें हलकान ।।

तिनपनिया भाजी बिसा,  चटनी कस भुँजवाय ।
एखर स्वाद ला पा जथे, भात ल आगर खाय ।।

गुजगुजहा होथे अबड़, पेट ल देथे झार ।
कजरा भाजी वो हरे, जामै भर्री  खार ।।

खीसा पइसा धर बने, जाना तैं ह बजार ।
करमत्ता के संग मा, ले भाजी बोहार ।।

*सब्जी*(दोहा)

परवर आलू अउ मटर, कुंदरु संग मिलाय ।
सुक्खा राँधे बिन रसा, देखत मुँह पंछाय ।।

 रमझाझर रमकेरिया, अड़बड़ झोर मिठाय ।
चेर्रा चेर्रा ला तको, चुहक चुहक सब खाय ।।

लउकी सेमी कोंहड़ा, तुमा तरोई साग ।
पाचन हो जाथे बने, जाय बिमारी भाग ।।

गुनकारी होथे जरी, रेसा के भरमार ।
बने भितरहिन राँधथे , रखिया बरी ला डार ।।

बाँबी सेमी ला कहूँ , राँधय तिली बघार ।
अइसन तिरिया ला मिलय, घर भर के सत्कार ।।

आलू मुनगा संग मा, भाँटा हा लपटाय ।
सँघरा मिलथे जब चना, ताकत घात बताय ।।

राँध करेला छोल के, सुक्खा भूँज बघार ।
चानी चानी मा भरे, सेहत के भंडार ।।

चना दार के संग मा , लउकी अबड़ मिठाय ।
फोरन डारे गोंदली, देखत मुँह पंछाय  ।।

खट्टा राँध मसूर ला, देवय बहू परोस ।
सास ससुर खुस हो जथे, छमा करय सब दोस ।।

*मेला मड़ई*(दोहा)

मेला मा मनिहार के ,लगथे अबड़ दुकान ।
मोल भाव नारी करे, लेवय तभे समान ।।

फुग्गा चसमा देख के, छोटू हाथ लमाय ।
नोनी गुड़िया लेय बर, दाई ल गोहराय ।।

पागा कलगी साज के, नाचय दोहा पार ।
राउत बाजा मा बिधुन, मानय गाँव तिहार ।।

नाचय दोहा पार के, घेरा गोल बनाय ।
रिंगी चिंगी लाठी धरे, राउत सोभा पाय ।।

रच रच बाजय ढेलवा , बइठइया मुसकाय ।
कतको झन देखत रथें, झूले मा डर्राय ।।

पूजा कातिक देव के, कर लव भाई आज ।
मेला पुन्नी के परब, सुग्घर हमर रिवाज ।।

 रचनाकार - चोवाराम वर्मा
हथबन्ध (भाटापारा) छत्तीसगढ़ 

Wednesday, August 23, 2017

श्री दुर्गाशंकर इजारदार के दोहा छन्द

श्री दुर्गाशंकर इजारदार के दोहा छन्द

परिचय के दोहा

दुर्गा शंकर नाम हे ,मौहापाली गाँव ,
सड़क तीर जी घर हवय ,महुवा के जी छाँव ।

जिला रायगढ़ में रथँव ,सारंगढ़ तहसील ,
लइका मन के संग सिखँव ,आखर आखर खील ।

कोख नानदाई जनय ,ददा मोर कल्यान ,
दू भाई दू झिन बहिन , छोटे तेमा जान ।

राजकुमारी संग में ,घूमें भाँवर सात ,
सुख दुख में जी संग रहय , रांधय सुग्घर भात।

सुर ताल अऊ राग बिन ,लिखथँव कविता जान ,
गुरु असीस ला पाय के ,सिखत हँवव विधान ।

"मैं"  ऊपर दोहा

सुन तँय मँय ला छोड़ दे ,  बात हमन हे सार ,
जतका मँय हो गिस हवय , जरके ओमन खार ।

मँय अक्षर अभिमान के , माथा पाटी जान ,
टूटे फिर ना जुड़ सकय , सिरतो एला मान ।

मँय के कारन होत हे , भाई दुश्मन जान ,
कहिके हमन देख चलव , मिल जाही भगवान ।

मैं  मा जग ला देख लव ,करव मंत्र उच्चार ,
मैं मा तो खुद तीन भुवन , तीन देव अवतार ।

मँय के माया मा बँधे , अपने मा सकलाय ,
मर रोवइया नइ मिलय ,  मन काबर भरमाय ।

मोर मोर कह तै मरे , कहूँ काम नइ आय ,
मै माया मा मोह बश , राम चरन नइ भाय ।

करनी जइसन तैं करे , भरनी तइसन पाय ,
तैं मैं के जी फेर मा , सकल  जीवन बिताय ।


गौरैय्या के दोहा

फुदक फुदक खेलत हवय , नोनी बाबू तीर ,
गौरैय्या हर देख तो , हाथ से छिनय खीर ।

गौरैय्या ला देख के , खेलय ताली मार ,
किलकारी देवत हवय , चाउर आगू डार ।

गौरैय्या फुदकय अगर , खँचवा पानी मान ,
पानी गिरही गा कहय ,बबा सिरतोच जान ।

पानी राखव छत सुनव , दाना दे दव द्वार ,
गौरैय्या ला दव मया , करलव धरम अपार ।

हाट बाजार पर दोहा

भइया ये संसार मा,लगे मया के हाट ,
आनी बानी के चीज हे ,लेवव तुमन छाँट ।

झूठ लबारी भरे हवय ,मया लगे हे हाट,
खाँटी तुमन छाँट धरव,राम नाम के बाट ।

मन में धीरज धर चलव ,मानव कहना बात ,
लाड़ू नोहय हाट के ,खाबे ताते तात ।

धरले झोला हाथ मा, चल जाबो जी हाट ,
टिकली फुँदरी तोर बर ,ले लेबे जी छाँट ।

रचनाकार - दुर्गाशंकर इजारदार
सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)

Tuesday, August 22, 2017

श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर के दोहा


श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर के दोहा छन्द -

मोर परिचय -

बेटा दाऊलाल के,मातु सुमित्रा मोर।
नाव धरे सुखदेव सिंह,मोरे बबा अँजोर।

देख मया माँ बाप के,उँकर मया के डोर।
आँखी के सँउहे रखैं,निकलन नइ दैं खोर।

स्कूल रहै ना गाँव मा,घर मा ददा पढ़ाय।
कोरा मा बइठार के,सिलहट कलम धराय।

बूता करवँ पढ़ाय के,गुरुजी परगे नाँव।
झिरना के भंडार मा,गोरखपुर हे गाँव।

लिखत रथवँ मन भाव ला,नान्हे बुद्धि लगाय।
होय कृपा सतनाम के,सो गुरुदेव मिलाय।

करिन निगम गुरुदेव मन,बिनती ला स्वीकार।
फोन करिस सर हेम हा,होइस खुशी अपार।

पाये हवँ सानिध्य ला,तरसत हवयँ हजार।
जनकवि कोदूराम के,सूरुज अरुण कुमार।

दोहा

अँगना बारी डीह मा,या डोली के मेंड़।
भुँइया के सिंगार बर,सिरजालौ दू पेंड़।

गरुवा के दैहान मा,या तरिया के पार।
झाड़ लगावत साठ जी,रूँधौ काँटा तार।

बड़ महिमा हे पेंड़ के,कोटिन गुण के खान।
कर सेवा नित पेंड़ के,खच्चित हे कल्यान।

"होली"

शहर नगर अउ गाँव मन,होगे हे तइयार।
होली ला परघाय बर,सम्हरे हाट बजार।

पिचका रंग गुलाल के,जघा जघा भरमार।
लइका संग सियान के,रेम लगे हे झार।

घर अँगना ममहात हे,चूरत हे पकवान।
मुठवा खुरमी ठेठरी,भजिया चना पिसान।

टोली निकले खोर मा,अलग अलग हे रंग।
कोनो मन सिधवा लगैं,कोनो मन हुड़दंग।

माथा टीका लगाय के,छूवत हावय पाँव।
अइसन सुग्घर दृश्य ला,देख सहेजे गाँव।

छोड़व मन के भेद ला,टोरव भ्रम के जाल।
मन हिरदे चतवार के,पोतव रंग गुलाल।

मानवता सिरजाय बर,आथे सबो तिहार।
मनखे पन ला छोड़ के,लड़ना हे बेकार।

सखियन मन के बीच मा,उत्तर पाय सवाल।
आँख कान ला छोड़ के,रँगले गाल गुलाल।

"बासी"

भइया नांगर जोत के,बइठे जउने छाँव।
भउजी बासी ला धरे,पहुँचे तउने ठाँव।

भइया भउजी ला कहय,लउहा गठरी छोर।
लाल गोंदली हेर के,लेय हथेरी फोर।

बासी नून अथान ला,देय गहिरही ढार।
उँखरु बइठ के खात हे,मार मार चटकार।

भइया भउजी के मया,पुरवाही फइलाय।
चटनी बासी नून कस,सबके मन ला भाय।

"दारू"

दारू हमर समाज के,टोरत हावय रीढ़।
तभो मान मरजाद ला,लागत नइहे चीढ़।

पीके कहूँ शराब तयँ,धन करबे बरबाद।
बाई गारी देय ही,खिसियाही अवलाद।

तोर नशा के संग मा,जाही छूट परान।
समय रहत तयँ चेत जा,इही बबा के ज्ञान।

पीये कहूँ शराब तयँ,लोटा थारी बेंच।
बेटा बूढ़त काल मा,तोर चपकही घेंच।

कोन जनी का सोंच मा,जागत सारी रात।
खाँस खाँस के डोकरा,बीड़ी ला सिपचात।

गाँव गली मा आज कल,मिलथे नशा तमाम।
लइकन संग सियान मन,छलकावत हें जाम।


डिस्पोजल बोतल धरे,बइठे नरवा तीर।
आखिर युवा हमार गा,जाही कतका गीर।

दोहा:-

बउरत खानी चेत कर,पानी गजब अमोल।
बिन पानी जिनगी नही,जीबे कइसे बोल।।

सुन संगी एक मशविरा,त्याग अहं अभिमान।
धरले गुरु के गोठ ला,बइठ लगा ले ध्यान।।

सक्षम समरथ सैन्य बल,बादर लेवय नाप।
दुनिया देखत आज हे,भारत के परताप।

काबर किम्मत नइ करै,अपन बबा के गोठ।
बदरा बर किँजरत फिरै,छोड़य दाना पोठ।

बेटा काबर नइ सुनय,अपन ददा के बात।
किँजरत फिरथे खोर मा,नाहक खाथे लात।

नींद गँवागे बाप के,दुरिहागे सुख चैन।
रोवत रहिथे रात भर,बोहत रहिथे नैन।

दाई समझावत थके,बाप घलो गै हार।
बड़े ददा थकगे कका,थकगे सब परिवार।

नाव हवय सुखदेव सिंह,गोरखपुर हे गांव।
हाथ जोर बिनती करव,रखहु अशिष के छाँव।

मोर बुता शिक्षण हवै,नइहे दूसर काम।
नान मून लिखत रथौं,बड़का नइहे नाम।

पुरवा महक बिखेरही,सुरता आही कंत।
हटही पहरा जाड़ के,आगे नवा बसंत।।

चारो कोती फूल के,गंध हवा मा छाय।
पुरवाही के संग मा,तन मन हा ममहाय।


"अँगना"

अँगना ले घर हा फबे,अँगना घर के नाक।
आव जवइया बइठ ले,कहिके पारै हांक।

चिक्कन चाँदन राखले,अँगना तुलसी दूब।
देख मगन हो जाय मन,बइठ सुहावै खूब।

मदिरा महुरा एक हे,एक हवय गा रास।
तन मन धन के होत हे,इँकरे कारन नाश।

"भाजी""

खाले भाजी करमता,भाजी मा हे खास।
गुणकारी हे आँख बर,संगे सुघर मिठास।

भाजी रांधौ चेंच के,डार अमारी पान।
गुणकारी हे पेट बर,बात बबा के मान।

भाजी उरला हा घलो,बड़ गुणकारी आय।
नस मा दउड़त खून के,शक्कर ला हटियाय।

"लोटा"

घर आये महिमान ला,लोटा मा जल देव।
आसन मा बइठार के,राम रमउवा लेव।

शौचालय घर घर रहै,बड़ सुग्घर अभियान।
लोटा धरके जाव झन,बात सियानी मान।

खुला शौच के प्रश्न मा,काबर हावव मौन।
लोटा धरके जाय बर,छोड़व गा सिरतोन।

टठिया लोटा बेच के,पीयै दारू मंद।
ते प्रानी के जान ले,दिन बाचे हे चंद।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर 'अँजोर"
गोरखपुर, कवर्धा (छत्तीसगढ़)

Monday, August 21, 2017

अरुण कुमार निगम के दोहा छन्द

अरुण कुमार निगम के दोहा छन्द -

दोहा छन्द के विधान 

डाँड़ (पद) - २, ,चरन - ४

तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)

हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ , बिसम चरन मा मातरा – १३, सम चरन मा मातरा- ११

यति / बाधा – १३, ११ मातरा मा

खास- बिसम चरन के सुरु मा जगन मनाही.

बिसम चरन  के आखिर मा सगन, रगन या नगन या नान्हें,बड़कू(१,२)

सम चरन  के आखिर मा बड़कू,नान्हें (२,१)

बड़कू अउ नान्हें मातरा के गिनती के हिसाब से दोहा के २३ किसम होथे.

देसी-बिदेसी 

मँय  बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव
मँय  गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव |

मँय  सेवैया-खीर हौं, तँय नूडल- चउमीन
मँय  बनथौं परसाद रे, तोला खावैं  छीन |

मँय  चीला देहात के, मँय  भर देथौं  पेट
तँय  तो खाली चाखना, अंडा के अमलेट |

मँय  अंगाकर मस्त हौं, तँय पिज्जा अनमोल
अंदर बाहिर एक मँय , तँय पहिरे हस खोल |


स्वच्छ भारत अभियान 

सहर  गाँव मैदान – ला, चमचम  ले  चमकाव
गाँधी जी के सीख – ला , भइया  सब अपनाव ||

लख-लख ले अँगना दिखै, चम-चम तीर-तखार
धरौ   खराटा   बाहरी,  आवौ    झारा  -   झार ||

भारत भर - मा चलत हवै , सफई के अभियान
जुरमिल करबो साफ हम , गली  खोर खलिहान ||

आफिस  रद्दा  कोलकी  ,  घर  दुकान  मैदान
रहैं साफ़ – सुथरा सदा, सफल होय अभियान ||

साफ - सफाई   धरम  हे , एमा  कइसन  लाज
रहै  देस - मा स्वच्छता, सुग्घर स्वस्थ समाज ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Saturday, August 19, 2017

श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के दोहे


श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के दोहे

मोर परिचय

नाँदगाँव के तीर मा,खैरझिटी  हे गाँव।
नाँव मोर जीतेंद्र हे,लोधी लइका आँव।

अगम बहल दाई ददा,बंदौं निसदिन पाँव।
भाई  हेबे  चार झन, बड़का  मैंहर  आँव।

मोर संगिनी वंदना,भरे भरे हे कक्ष।
पुष्पित  बेटा हे बड़े,छोटे  हेबे दक्ष।

मोरो घर परिवार  के,हरे किसानी नेंव।
बुता करे बर कोरबा,आके मैं बस गेंव।

नान्हे  कद के आदमी,  हवे   रंग   हा   गौर।
लिखथौं मनके बात ला,माथ नहीं कुछु मौर।

छा नइ जानौं छंद के,सीखे  के  हे  आस।
निगम सरन आये हवौं,बइठे हौं बन दास।

                जिनगी

होके   मनखे   जात   तैं,जिनगी  दिये उझार।
फोकट के अँटियात हस,धरम करम ला बार।

जिनगी  जेखर  देन ए,उही  जही जी लेज।
दूसर बर काँटा बिछा,अपन बना झन सेज।

मानवता  के  रंग  ला,झन  देबे  धोवान।
जिनगी हरे तिहार जी,मया रंग मा सान।

जिनगी अपन सँवार ले,करले बढ़िया काम।
कारज  बिन  काखर बता,बगरे हावय नाम।

संगत  गाँजा  मंद के,जिनगी दीही बोर।
संगत संत समाज के,भाग जगाही तोर।

बोली  हा  बाँटत  हवे, एला ओला घाव।
जिनगी पानी फोटका,तभो बढ़े हे भाव।

           मनखे

काया  माया  मा फँसे, हाँस  हाँस इतराय।
लउठी थेभा जब बने,मनखे तब पछताय।

मनखे बिसरागेस तैं,अपन चाल अउ ढाल।
आज लगत हे बड़ बने,काली बनही काल।

बनके मनखे टेटका,बदलत रहिथे रंग।
दया  मया  ला  छोड़ के,रेंगे माया संग।

मनखे माया जोड़ के,अब्बड़ करे गुमान।
चाल ढाल ला देख के,पछताये भगवान।

रुपिया खातिर रूप ला,बदले मनखे रोज।
कौड़ी कौड़ी जोड़ के,खुश हे माया खोज।

भीतर मइल भराय हे,बाहिर छीचे इत्र।
देखावा  के  रंग  मा,मनखे रँगे विचित्र।

कोन  रंग मनखे धरे,रोजे वो अँटियाय।
दया  मया के रंग मा,कभू रंग नइ पाय।

रंगबाज  मनखे  मिले, मिलथे  ढोंगी  चोर।
बढ़िया मनखे हे कहाँ,खोजय मन हा मोर।

मनखे माया मा मरे,स्वारथ मा चपकाय।
पापी के संगत करे,बिरथा जनम गँवाय।

तोरे  खोदे  खोंचका,जाबे  तिहीं झपाय।
सबला मयारु मान ले,बैरी कोन ह आय।

मनखे देखव नाम बर,पर के खींचे पाँव।
गिनहा रद्दा  मा भला,कइसे  होही नाँव।

जिनगी भर सिर लाद के,लोभ मोह ला ढोय।
माया छिन भर के मजा,मनखे  रहि रहि रोय।

हालत  देख  समाज  के,तोर  मोर हे छाय।
मनखे एक समाज ए,कोन भला समझाय।

         गौरैय्या

चींव चींव कहि गात हे,गौरैय्या हा गीत।
दल  के  दल  आये हवे, दाना देबे छीत।

कनकी  चाँउर खात हे,गौरैय्या  धर  चोंच।
अपन पेट ला खुद भरे, मानुस तैंहर सोंच।

परवा  मा  झाला  रहे,कूद  कूद बड़ गाय।
बनगे छत के अब ठियाँ,गौरैय्या नइ आय।

गौरैय्या  फुदकत रहे,गाँव गली अउ खोर।
फेर आज रहिथे कहाँ,खोजत हे मन मोर।

मनखे देख उड़ात हे,छानी मा चढ़ जाय।
चींव चींव चहकत हवे,गौरैय्या मन भाय।

बइठे  बइठे   पेड़   मा ,गौरैय्या    हा   रोय।
गरमी जाड़ असाड़ मा,दुख अब्बड़ हे होय।

हरँव  चिरँइयाँ   नानकुन , गौरैय्या।   हे   नाँव।
फुदकत चहकत खोजथौं,महूँ अपन बर छाँव।

झाला  कहाँ बनाँव मैं,परवा हे ना पेड़।
चारो मूड़ा छत सजे,देखँव आँखी तेंड़।

बिता बिता बर देख ले,माते हे बड़ लूट।
जघा मोर बर नइ दिखे,रोवँव मैंहा फूट।

गिरे  मूसला  धार  जल, मोर  पिटाई  होय।
कभू सुखावँव घाम मा,पानी बिन मन रोय।

गरमी घाम असाड़ मा,दाँव लगे हे साख।
संख्या हमर सिरात हे,टूटत हावय पाँख।

बइठे  रहिथों  जाड़ मा,ओढ़े  कोनो पात।
भारी दुख ला झेलथों,मैंहा दिन अउ रात।

कोन डारही चोंच मा , दाना  पानी  लान।
साँस चलत ले घूमथों,नइ हे मीत मितान।

पाबे  मरे  कछार  मा,मरे  मिलौं  मैं मेड़।
मर मरके मैं हौं जियत,कटके भारी पेड़।

आँधी अंधड़ आय जब,हले पेड़ के डाल।
टूटे  डारा  पान बड़, होवय   बारा   हाल।

गिरे  परे   हे  अधमरा,लेवत हे बस साँस।
गौरैय्या खग जाति के,होवत हावय नास।

चिरई  चोंच  उलाय हे, दाना  देबे   डार।
माटी मा हे बिस मिले,खाही काला यार।

माटी  मा  छीचत हवे,रंग रंग के खाद।
जिनगी चिरई जात के,होवत हे बर्बाद।

चिरई  अँगना  आय  हे,दाना  देबे  छीत।
पानी रखबे घाम मा,जिनगी जाही जीत।

गौरैय्या चिरई हरौं,फुदकत रहिहौं खोर।
चींव चींव  चहकत रहूँ,नाँव लेत मैं तोर।

                   मँय

पड़के मँय के फेर मा,मँय का कर डारेंव।
नइ तो होइस जीत गा,उल्टा  सब  हारेंव।

कतको झन ला चाब दिस,मँय नाम के साँप।
तोर  मोर  कहिके   लड़े, इंच  इंच  ला  नाप।

मँय  मनखे  बर मोह ए,बदले नीयत ढंग।
चक्कर मा मँय मोर के,होथे अब्बड़ जंग।

सेवा  खातिर  मँय  नहीं,ना  दुखिया  के  तीर।
मँय कहिके तैं जा निकल,गढ़ सबके तकदीर।

करबे   बूता   तैं   बने, होही   तोरो    नाम।
काबर तैंहा नइ कहस,मँय करहूँ सत काम।

मँय मँय कहिके तैं  लड़े, का  लेबे  धन जोड़।
बढ़ आघू उपकार कर,स्वारथ अउ मँय छोड़।

चिथही चोला ला गजब,मँय नाम के चील।
अपन समझ झन पाल तैं,आजे देगा ढील।

वो मूरख  मनखे हरे,रहिथे मँय के साथ।
मँय के माया देख ले,स्वारथ उपजे माथ।

मँय मा नइ तो कुछु मिले,सबके धरले हाथ।
मनखे  बनके तैं रहा,मिलके चल सब साथ।


      जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

@@@@@@करम@@@@@@@

करम  सार  हावय इँहा,जेखर  हे  दू  भेद।
बने  करम ला राख लौ,गिनहा ला दे खेद।

बिना करम के फल कहाँ,मिलथे मानुष सोच।
बने   करम   करते   रहा,बिना  करे   संकोच।

करे  करम  हरदम  बने,जाने  जेहर  मोल।
जिनगी ला सार्थक करे,बोले बढ़िया बोल।

करम  करे  जेहर   बने,ओखर  बगरे नाम।
करम बनावय भाग ला,करम करे बदनाम।

करम  मान नाँगर जुड़ा,सत  के  बइला फाँद।
छीच मया ला खेत भर,खन इरसा कस काँद।

काया बर करले करम,करम हवे जग सार।
जीत करम ले हे मिले, मिले  करम ले हार।

करम सरग के फइरका,करम नरक के द्वार।
करम गढ़े जी  भाग ला,देवय  करम  उजार।  

बने करम कर देख ले,अड़बड़ मिलथे मान।
हिरदे  घलो हिताय बड़,बाढ़े अड़बड़ शान।

मिल जाये जब गुरु बने,वो सत करम पढ़ाय।
जिनगी  बने  सँवार   के,बॉट  सोझ  देखाय।

हाथ   धरे  गुरुदेव  के,जावव जिनगी जीत।
धरम करम कर ले बने,बाँट मया अउ मीत।

करम जगावय भाग ला,लेगय गुरु भवपार।
बने  करम बिन जिन्दगी,सोज्झे  हे  बेकार।

##############ज्ञान#############

ज्ञान रहे ले साथ मा ,बाढ़य जग मा शान।
माथ  ऊँचा  हरदम रहे,मिले  बने सम्मान।

बोह भले सिर ज्ञान ला,माया मोह उतार।
आघू मा जी ज्ञान के,धन बल जाथे हार।

लोभ मोह बर फोकटे,झन कर जादा हाय।
बड़े बड़े धनवान मन ,खोजत  फिरथे राय।

ज्ञान मिले सत के बने,जिनगी तब मुस्काय।
आफत  बेरा  मा  सबे,ज्ञान काम बड़ आय।

विनय मिले बड़ ज्ञान ले ,मोह ले अहंकार।
ज्ञान  जीत  के  मंत्र  ए, मोह हरे खुद हार।

गुरुपद पारस  ताय जी,लोहा होवय सोन।
जावय नइ नजदीक जे,मूरख ए सिरतोन।

बाँट  बाँट  के  ज्ञान  ला,करे जेन निरमान।
वो पद देख पखार ले,गुरुपद पंकज जान।

अइसन  गुरुवर  के  चरण,बंदौं बारम्बार।
जेन ज्ञान के जोत ले,मेटय सब अँधियार।

&&&&&&&&नसा&&&&&&&&&

दूध  पियइया  बेटवा ,ढोंके  आज  शराब।
बोरे तनमन ला अपन,सब बर बने खराब।

सुनता बाँट तिहार मा,झन पी गाँजा मंद।
जादा लाहो लेव झन,जिनगी हावय चंद।

नसा करइया हे अबड़,बढ़  गेहे  अपराध।
छोड़व मउहा मंद ला,झनकर एखर साध।

दरुहा गँजहा मंदहा,का का नइ कहिलाय।
पी  खाके  उंडे   परे, कोनो हा  नइ  भाय।

गाँजा चरस अफीम मा,काबर गय तैं डूब।
जिनगी  हो  जाही  नरक,रोबे  बाबू  खूब।

फइसन कह सिगरेट ला,पीयत आय न लाज।
खेस खेस बड़ खाँसबे,बिगड़ जही सब काज।

गुटका  हवस दबाय तैं,बने  हवस  जी  मूक।
गली खोर मइला करे,पिचिर पिचिर गा थूक।

काया  ला   कठवा  करे,अउ  पाले  तैं   घून।
खोधर खोधर के खा दिही,हाड़ा रही न खून।

नसा नास कर देत हे, राजा हो या रंक।
नसा देख  फैलात हे,सबो खूंट आतंक।

टूटे  घर   परिवार    हा, टूटे  सगा   समाज।
चीथ चीथ के खा दिही,नसा हरे गया बाज।

घर  दुवार  बेंचाय के,नौबत  हावय आय।
मूरख माने नइ तभो,कोन भला समझाय।

नसा करइया चेत जा,आजे  दे  गा छोड़।
हड़हा होय शरीर हा,खपे हाथ अउ गोड़।

एती ओती  देख ले,नसा  बंद  के जोर।
बिहना करे विरोध जे,संझा बनगे चोर।

कइसे छुटही मंद हा,अबड़ बोलथस बोल।
काबर पीये  के  समय,नीयत  जाथे  डोल।

संगत  कर  गुरुदेव  के,छोड़व  मदिरा मास।
जिनगी ला तैं हाथ मा,कार करत हस नास।

नसा  करे ले रोज के,बिगड़े तन के तंत्र।
जाके गुरुवर पाँव मा,ले जिनगी के मंत्र।

रचनाकार - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)