Tuesday, August 15, 2017

कुण्डलिया छन्द

कविता गढ़ना काम हे, कवि के अतकी जान
जुग परिबर्तन ये करिस, बोलिन सबो सियान
बोलिन  सबो  सियान, इही  दिखलावे दरपन
सुग्घर सुगढ़ बिचार, जगत बर कर दे अरपन

कविता-  मा  भर जान, सदा  हे आगू बढ़ना
गोठ  अरुण के  मान, मयारू  कविता गढ़ना ।।

अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

13 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर कुंडली छंद गुरुदेव
    सादर प्रणाम

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  2. पयलगी गुरुदेव,
    उत्कृष्ट कुण्डली।

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    1. सादर प्रणाम गुरुदेव।
      सुग्घर कुण्डलिया ।

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  3. सुग्घर कुण्डलिया ,बधाई दीदी

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  4. अब्बड़ सुघ्घर कुंडली गुरुदेव,सादर पायलागी

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  5. सुग्घर कुंडली छंद गुरुदेव।सादर प्रणाम

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  6. सुग्घर कुंडली छंद गुरुदेव।सादर प्रणाम

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  7. बहुँत सुघ्घर गुरुदेव

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  8. बहुँत सुघ्घर गुरुदेव

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  9. बहुत सुग्घर कुण्डलिया,गुरुदेव। सादर प्रणाम।

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  10. बहुत सुग्घर कुण्डलिया,गुरुदेव। सादर प्रणाम।

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  11. वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् जबरदस्त कुण्डलियाँ गुरुदेव।

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