Saturday, September 9, 2017

दोहा छंद - श्री दिलीप कुमार वर्मा

दोहा छंद - श्री दिलीप कुमार वर्मा

सदा सुवारथ मा बुड़े,करत रहय सब काम।
मटका भर जय पाप के,पहुँचय यमपुर धाम।।

दुख मिलथे तब जान ले,सुख पिछलग्गू आय।
जीवन मा सब रंग हे,जे जीवय ते पाय।

संग रहे परिवार हा,दुख नइ आवय मान।
जेन अकेल्ला हे रहे,बिरथा जीवन जान।

जब परान अंतस रहे,रहे ठाठ के मान।
छोंड़ चलय जब ठाठ ला,ये तन बोझा जान।

तोड़ मोंह के जाल ला,पंछी बन उड़जाव।
दुनिया हवय अथाह जी,घूम घाम के आव।

सुन लव साधक मन सबो,करत रहव अभ्यास।
चलत हवय अंताक्षरी,लिख लव दोहा ख़ास।

जग ला रखव सँवार के,खँचका डबरा पाट।
सुग्घर पेंड लगाय दव,लागय सुग्घर बाट।

बीच सभा मा आय के,रखहू मोरो लाज।
अइसन आशीर्वाद दव,पूरण होवय काज।।

करत रहे जयकार ले,मनवा पबरित होय।
घर आँगन महकत रहय,डगर कभू ना खोय।

राधा नाम पुकारथे,मुरली धर घनश्याम।
पर गोपी सुध खोय हे,सुनके अपनो नाम।

रखव भरोसा राम मा,बन जाही सब काम।
जनम मरण कट जाय जी,मिल जावय जब राम।

झन कर तँय आराम जी,बहुँत अकन हे काम।
चर दिनिया जिनगी हरे,देख होत हे शाम।

रंग जमालव फाग मा,खेलव होरी आज।
गावव फगुवा झूम के,ढोल नगाड़ा साज।

बाँटव मन के बात ला,बोझा सबो सिराय।
दुख मन मा राहय नही,जिनगी  खुस हो जाय।

तन माटी के हे बने,झन कर गरब गुमान।
घूर जही कब का पता,लेग जही समशान।

बाँटव झन माँ बाप ला,नोहय खेती खार।
इंखर आशीर्वाद ले,सुखी रहय घर द्वार।

सब के भुइँया एक हे,रहव सबो झन संग।
मोर मोर कहिके मरे,दुनिया देखय दंग।

काम बिना घर ना चले,भूख मरे परिवार।
पढ़े लखे कतको परे,काम न दे सरकार।

अपन अपन सब सोंचथे,अपन करे सब काम।
अपने करनी भूल के,पर ला दे बदनाम।

आज करम जे तँय करे,फल पाबे तँय काल।
बीते करम भुलाय के,अब होवत हच लाल।

आही पानी एक दिन,थोरिक हाबय देर।
ऊपर वाला देख के,करय नहीं अंधेर।

लाल चुनरिया ओढ़ के,दाई बइठय शेर।
रकसा मन ला देख के,तुरते करदय ढेर।

जिन मनखे मन जानथे,जिनगी के का सार।
अंतस राम बिठाय के,पूजय बारम बार।

पार लगा हे राम जी,फँसे हवँव मझधार।
जिनगी नइया डोल गे,खे दव खेवन हार।

सरग धाम ला पाय बर,कारज अपन सुधार।
मया मोह बिरथा रहे,जन सेवा हर सार।

झन भूलव माँ बाप ला,इही हमर आधार।
सेवा करलव आज जी,सुखी होय संसार।

चाम बने उजराय के,जावय गोरी काम।
छयला बाबू छेड़ के,पावय मार इनाम।

झन कर गरब गुमान जी,जिनगी के दिन चार।
दू दिन हर तो बीत गे,बाँचे काम हजार।

हर दिन जाथँव खेत मँय,आथँव मुँह लटकाय।
सुख्खा परगे खेत हा,पानी कब ये आय।

मोर मोर कहि के मरे,का ले जाबे संग।
राजा तक जर जाय जी,दुनिया देखय दंग।

छोड़य साथी संग ला,धन जब खाली होय।
ओ साथी का काम के,आय दिखावा रोय।

बैर भाव मन मा रखे,जी बे के दिन यार।
जबतक हच बतियाय ले, खुसी मिले भरमार।

मेला देखे जाय के,मन हाबय भरपूर।
कइसे के मँय जाँव जी,मेला लगथे दूर।

नर घर के मुखिया हरे,नारी घर के मान।
नर नारी सब एक हे,रचथे जेन जहान।

पिया मिलन के रात मा,दुल्हन अबड़ सरमाय।
डारे घुँघटा लाम के,धीरे धीरे जाय।

मन मा धीरज राख लव,होही सब के काम।
समय बड़ा बलवान हे,दीही दाता राम।

बबा रहय घर मा हमर,खाँसय ओ दिन रात।
बीड़ी पी बइठे रहय,जाड़ा या बरसात।

गुड़गा पोपचि बोबरा,खावत अबड़ सुहाय।
अलग अलग पकवान हे,जे हर सब ला भाय।

आय सबो जुरियाय हे,बकरा मारन लाय।
आज रहे बकरीद ता,मिलजुल के सब खाय।

हाल  चाल पूछत रहव,झन होवव जी दूर।
 मुश्किल मा संगी मिले,मया रखव भरपूर।

पानी हरदम साफ़ पी,रहिबे सदा निरोग।
बढ़िया  खाना खाय के,सुखमय जिनगी भोग।

हर मनखे दउड़त हवय,पइसा बर जी आज।
जादा के लालच रहे,गलत करे हर काज।

काम करव सब ध्यान से,गलती गा झन होय।
मौका रहत सुधार लव,परय कभू झन रोय।

मूरख मनवा मान जा,नइ हे कुछु उपाय।
करम अपन कर ले बने,जाने कब मर जाय।

धरम करम ला रख बने,सरग सुधरही तोर।
पइसा जादा पाय बर,झन दे संगी जोर।

हमरो नाम छपाय हे,पेपर मा जी आज।
सपना मा देखे हवँव,बड़े करे हँव काज।

कसनो करलय नइ बचय,पइसा कखरो हाँथ।
जइसे आवय जात हे,पइसा रहे न साँथ।

दुन्नो हाँथ उठाय के,बोलव जयजय कार।
लम्बोदर महराज के,पूजन बारम बार।

जिनगी बिरथा झन गँवा,भज ले प्रभु के नाम।
भव सागर ले पार बर,नाम ह आही काम।

कहाँ संत पाबे सखा,अब सब ढोंगी जान।
काम करे ले भाग के,करथे अबड़ बखान।

सार सार ला रख सखा,कचरा दे तँय डार।
जिनगी होवय सार जी,पूजय तब संसार।

सदा करम करते रहव,फल झन सोंचव आज।
काल मिले फल नेक हो,अइसन करलव काज।

दूर रहव झन जाप ले,सुमिरव दिन अउ रात।
प्रभु किरतन मा मन लगा,बनही बिगड़े बात।

होही जिनगी पार जी,तउरत हे मझधार।
पापी मन सब बुड़ जथे,सच के बेड़ा पार।

पेंड़ हवय तब छाँव हे,छाँव हवय उत ठाँव।
ठाँव हवय तब खेल हे,खेल होय हे गाँव।

जइसन मन चाहत हवय,तइसन कभू न होय।
वइसन फल ला पाय जी,जइसन बीजा बोय।

रचनाकार - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार, छत्तीसगढ़ 

20 comments:

  1. अंतस ले आभार गुरुदेव।

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  2. वाह्ह्ह्ह्ह् भइया शानदार दोहावली

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  3. बहुत बढ़िया सृजन दिलीप भाई जी

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  4. बहुत सुन्दर दोहावली दिलीप भइया

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  5. वाह बहुत सुंदर दोहावली है आदरणीय दिलीप भैया।।

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  6. वाह बहुत सुंदर दोहावली है आदरणीय दिलीप भैया।।

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  7. बढ़िया दोहावली भैया।बधाई

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  8. बहुत बढ़िया भैया

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  9. बहुँत बढ़िया सुघ्घर दोहा भईया जी

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  10. बहुँत बढ़िया सुघ्घर दोहा भईया जी

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  11. बहुत सुग्घर दोहावली,गुरुदेव दिलीप वर्मा जी। बधाई अउ शुभकामना।

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  12. बहुत सुग्घर दोहावली,गुरुदेव दिलीप वर्मा जी। बधाई अउ शुभकामना।

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  13. बहुत बढ़िया दोहालरी बड़े भैयाजी।

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  14. बहुत बढ़िया दोहावली दिलीप भैया

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  15. आनन्द आगे दिलीप भैया

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  16. आनन्द आगे दिलीप भैया

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  17. बहुत सुग्घर दोहावली सर।सादर बधाई

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  18. बहुत सुग्घर दोहावली सर।सादर बधाई

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  19. दिलीप भैया बहुत शानदार दोहा बधाई आपला

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