Friday, October 27, 2017

कज्जल छंद- श्री मोहन लाल वर्मा

कज्जल छंद- श्री मोहन लाल वर्मा

कहाँ बिलमगे धनी मोर।
हिरदे मा रस मया घोर।
सुन्ना लागय गली खोर।
पूछत रहिथँव पता सोर।1।

सास ननद नइ गोठियाँय।
ताना मारँय अउ चिढ़ाँय।
लागय घर हा भाँय भाँय।
रहिथँव मूँड़ी मँय नवाँय।2।

बेटी होगे हे सजोर।
किंजरत रहिथे गली खोर।
नइ मानय अब बात मोर।
कइसे राखँव बाँध छोर ।3।

बेटा हा नइ पढ़े जाय।
मोला नइ कुछु समझ आय।
घर नइ आवय बिन बलाय।
चिंता ओकर बड़ सताय।4।

बिजरावय लइका सियान।
तोर धनी हाबय महान।
करय बुता ला आन तान।
सिरिफ बघारय अपन शान।5।

आजा संगी लुबो धान।
लुवत सबो हे किसान।
का तोला नइहे धियान।
होगे हँव मँय हलाकान।6।

रचनाकार - श्री मोहन लाल वर्मा
ग्राम -अल्दा, पोस्ट - तुलसी मानपुर,
तहसील - तिल्दा, जिला -रायपुर
छत्तीसगढ़

25 comments:

  1. बहुत बढ़िया मोहन भैया बधाई हो आपला

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  2. बहुत सुग्घर कज्जल छंद मा रचना सर।सादर बधाई

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  3. बहुत सुग्घर कज्जल छंद मा रचना सर।सादर बधाई

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  4. कहाँ बिलमगे धनी मोर बहुत बढ़ियाँ कज्जल छंद मोहन भाई आप लिखे हव बधाई हो भाईजी

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  5. बहुत बढ़िया रचना भइया ,सादर बधाई

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  6. मोहनलाल जी, सुग्घर कज्जल छन्द

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    1. आपके आशीष ,मार्गदर्शन के प्रतिफल आय ,गुरुदेव।

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  7. सुग्घर कज्जल छंद वर्मा जी। बधाई

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  8. सुंदर रचना रचे हस, मोहन !

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  9. वाहःहः मोहन भाई सुघ्घर छंद सृजन

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  10. वाहःहः मोहन भाई सुघ्घर छंद सृजन

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  11. बहुत सुग्घर लिखे हव

    वर्मा जी

    बधाई हो आपला

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