Monday, December 18, 2017

रोला छन्द - अरुण कुमार निगम

गुरु घासीदास जयंती पर विशेष
(1)
मनखे मनखे एक, इही हे सुख के मन्तर
जिहाँ नहीं हे भेद, उहीं असली जन-तन्तर
बाबा घासी दास, हमन ला इही बताइन
जग ला दे के ज्ञान, बने रद्दा देखाइन ।।
(2)
जिनगी के दिन चार, नसा पानी ला त्यागौ
दौलत माया जाल, दूर एखर ले भागौ।
जात-पात ला छोड़, सबो ला मनखे जानौ
बोलव जय सतनाम, अपन कीमत पहिचानौ।।
(3)
काम क्रोध मद मोह, बुराई लाथे भाई
मिहनत करके खाव, इही हे असल कमाई
सत्य अहिंसा प्रेम, दया करुणा रख जीयव
गुरु के सुग्घर गोठ, मान अमरित तुम पीयव।।

रचनाकार - अरुण कुमार निगम
दुर्ग, छत्तीसगढ़

Saturday, December 16, 2017

आल्हा छन्द - शकुन्तला शर्मा

(1) कोदूराम "दलित"

छत्तीसगढ़ के जागरूक कवि, निच्चट हे देहाती ठेठ
वो हर छंद जगत के हीरा, छंद - नेम के वोहर सेठ।

कोदूराम दलित हम कहिथन,सब समाज ला बाँटिस  ज्ञान
भाव भावना मा हम बहिथन,जेहर सब बर देथे ध्यान।

देश धर्म के पीरा जानिस,सपना बनिस हमर आजाद
आजादी के रचना रच दिस, सत्याग्रह होगे आबाद।

अपन देश आजाद करे बर,चलव रे संगी सबो जेल
गाँधी जी के अघुवाई मा, आजादी नइ होवय फेल।

शिक्षा के चिमनी ला धर के, देखव बारिस कैसे जोत
मनखे मन ला जागृत करके,समझाइस हम एके गोत।

मार गुलामी के देखिस हे,जानिस आजादी अभिमान
ओरी ओरी दिया बरिस हे,अब कइसे होवय निरमान ।

जाति पाति के भेदभाव के,अडबड बाढ़त हावय नार
सुंदर दलित दुनो झन मिलके,सब्बो दुखले पाइन पार।

दलित सही शिक्षक मिल जातिन, जौन पढ़ातिन दिन अउ रात
सब लइका मन मिल के गातिन, हो जातिस सुख के बरसात ।
 (2) बाबा घासीदास

गुरु बाबा हर पंथ परोसिस,नाम दिहिस सुग्हर सतनाम
छत्तीसगढ़ ला तीर्थ बनाइस, जैत खंभ हर बनगे धाम।

सत के रसदा मा सब रेंगव, गुरु - दीक्षा बन गे वरदान
सबो परस्पर सुख दुख बाँटव,सबके भीतर हे भगवान।

सबके हित मा मोरो हित हे, एही मा सबके कल्याण
आमा - बोए आमा पाबे, दुख के काँटा लेवय प्राण।

देश रिणी हे गुरु बाबा के, बहु - जन ला देइस हे पंथ
बिना पंथ के मनुज भटकथे,कहिथें वेद उपनिषद् ग्रंथ।

कतको - भाई भटके हावैं, दुरिहा जा के होगिन आन
हमर बिकट नकसान होय हे, कैसे मैंहर करौं बखान।

पंथ सबो ला जोरिस हावै, देश - धर्म के होथे काम
कलाकार मन जस बगराथें, पंथी देवदास के नाम।

एक - पंथ मा ठाढे हावयँ, सब्बो भाई चतुर - सुजान
स्वाभिमान हर सबला भावै,करथें सबो देश बर गान।

मनखे मनके महिमा भारी, देस राग ला जानव आज
देख देश बर बुता करौ जी,तब्भे बनही सुखी समाज।

 रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Wednesday, December 13, 2017

सरसी छन्द - श्री संतोष फरिकार

धान लुवे के बाद देख ले,सुन्ना होगे खेत।
ओन्हारी बोये बर कखरो,नइहे एको चेत।

गाय गरू सब छेल्ला घूमय,संसो करे किसान।
हात हूत दिन रात करत मा,लटपट होइस धान।

लाख लाखड़ी चना गहूँ बिन,सुन्ना खेती खार।
अरसी सरसो कायउपजही,सोचय बइठे हार।

ढ़ील्ला हवे गाँव मा एसो, राउत कहाँ लगाय।
मिलके सब किसान हा जम्मो, गरवा अपन चराय।।

मिले नही अब खोजे मा जी ,तिवरा भाजी नार।
बिना उतेरा ओन्हारी के,रोवय खेती खार।।

रचनाकार - श्री संतोष फरिकार
छत्तीसगढ़

Tuesday, December 12, 2017

कुकुभ छन्द - श्री चोवाराम "बादल"

योग करव जी

मनखे ला सुख योग ह देथे,पहिली सुख जेन कहाथे ।
योग करे तन बनय निरोगी,धरे रोग हा हट जाथे।।1

सुत उठ के जी रोज बिहनियाँ,पेट रहय गा जब खाली ।
दंड पेल अउ दँउड़ लगाके, हाँस हाँस ठोंकव ताली ।।2

रोज करव जी योगासन ला,चित्त शांत मन थिर होही ।
हिरदे हा पावन हो जाही,तन सुग्घर मंदिर होही।।3

नारी नर सब लइका छउवा, बन जावव योगिन योगी ।
धन माया के सुख हा मिलही,नइ रइही तन मन रोगी।।4

जात पाँत के बात कहाँ हे, काबर होबो झगरा जी।
इरखा के सब टंटा टोरे, योग करव सब सँघरा जी।।5

जेन सुभीता आसन होवय,वो आसन मा बइठे जी।
ध्यान रहय बस नस नाड़ी हा,चिंता मा झन अइठे जी।।6

बिन तनाव के योग करे मा, तुरते असर जनाथे गा ।
आधा घंटा समे निकालव, मन चंगा हो जाथे गा ।।7

अनुलोम करव सुग्घर भाई, साँस नाक ले ले लेके ।
कुंभक रेचक श्वांसा रोंके, अउ विलोम श्वांसा फेके ।।8

प्राणायाम भ्रस्तिका हावय, बुद्धि बढ़ाथे सँगवारी ।
अग्निसार के महिमा गावँव, भूँख जगाथे जी भारी ।।9

हे कपालभाती उपयोगी, अबड़े जी असर बताथे ।
एलर्जी नइ होवन देवय, ए कतको रोग भगाथे ।।10

कान मूँद के करव भ्रामरी, भौंरा जइसे गुंजारौ ।
माथा पीरा दूर भगाही, सात पइत बस कर डारौ ।।11

ओम जपव उद्गीत करव जी, बने शीतली कर लेहौ ।
रोज रोज आदत मा ढालव, आड़ परन जी झन देहौ ।।12

    रचनाकार - श्री चोवा राम "बादल"
                 हथबंद, छत्तीसगढ़

Monday, December 11, 2017

सार छन्द - श्रीमती आशा देशमुख

दुखिया के गोठ

कइसन दिन आगय वो फूफू ,बोलत हवे भतीजा |
पाक गए वो नीम धतूरा ,निकलत हावय बीजा |

हाँथ गोड़ मा फोरा परगे ,आँखी अँधरी होगे ,
अंतस होगे छर्री दर्री ,का करनी ला भोगे |

मोर सायकिल के पैडिल हा ,माढ़े हावय टूटे |
हाथी बर अब बाड़ा नइहे ,राजमहल हा फूटे |

नरम मुलायम मीठ मिठाई ,अब तो चेम्मर लागे ,
दाँत ओंठ हा बइठत हावय ,मन हा पल्ला भागे |

हमर जमाना मा वो फूफू ,सबो रिहिस हे सच्चा |
आज मशीन घलो हा देवय ,हमर भाग ला गच्चा |

बखत बखत के फेर भतीजा ,रानी भरथे पानी |
समझावत हे फूफू दीदी ,अखिल लोक कस ज्ञानी 

झूठ लबारी अँधियारी के ,कब तक चलही माया |
दिन के भरे घाम मा तपथे ,सब प्रानी के काया 

 रचनाकार - श्रीमती आशा देशमुख 
 एन टी पी सी कोरबा, छत्तीसगढ़ 

Saturday, December 9, 2017

शक्ति छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

गँवई गाँव

बहारे  बटोरे   गली   खोर  ला।
रखे बड़ सजाके सबो छोर ला।
बरे   जोत  अँगना  दुवारी   सबे।
दिखे बस खुसी दुख रहे जी दबे।

गरू  गाय  घर  मा बढ़ाये मया।
उड़े लाल कुधरिल गढ़ाये मया।
मिठाये  नवा धान के भात जी।
कटे रात दिन गीत ला गात जी।

बियारी करे मिल सबे सँग चले।
रहे बाँस  के  बेंस   थेभा  भले।
ठिहा घर ठिकाना सरग कस लगे।
ददा  दाइ  के  पाँव  मा  जस जगे।

बरे  बूड़  बाती    दिया   भीतरी।
भरे जस मया बड़ जिया भीतरी।
बढ़ाले मया तैं बढ़ा मीत जी।
हरे गाँव  गँवई मया गीत जी।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, December 8, 2017

दोहा छन्द - श्री जगदीश "हीरा" साहू

छत्तीसगढ़ के 36 भाजी-

भाजी  *तिवरा*  *गोंदली*,  *मुनगा*  अउ *बोहार*।
*चुनचुनिया* अउ *चौलई*,मिलय *चरोटा* खार।।

*कुरमा पटवा  खेंडहा*, *पुतका*  भाजी *लाल*।
*भथवा आलू लहसुवा*, *सरसों* करे कमाल।।

*गोभी कुसुम  मछेरिया,बर्रे  मखना* लाय।
*चना अमारी* राँध ले, *कजरा* गजब सुहाय।।

*गुडरू  उरला  चिरचिरा,  चेंच  चनौरी* सार।
*तिनपनिया* अउ *करमता*, *कांदा* बगरे नार।।

*पालक मुसकेनी* हवय, सब भाजी मा शान।
*उरला मुरई* खाय जब, कोंदा  करय  बखान।।

भाजी-भाजी झन कहव, एकर करव बखान।
खावव  येला  मन  लगा, हो जावव बलवान।।

 रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
ग्राम - कड़ार, व्हाया भाटापारा
छत्तीसगढ़

Thursday, December 7, 2017

शक्ति छंद - श्री मोहनलाल वर्मा

सरग निसैनी -

भजन नइ करे तँय सियाराम के।
कभू नइ जपे तँय बिना काम के।
करे काय हावस इहाँ आय के।
बता दे सबो आज फरियाय के।।1।।

फँसे रात दिन तँय मया जाल मा।
भरे पाप कोठी अपन चाल मा।
बने काम करके सबो हाल मा।
बनौका बनाले बुढ़त काल मा।।2।।

बसा साँस मा ले सियाराम ला।
तहूँ पाय लेबे परमधाम ला।
भजन कर सबो दिन समय पाय के।
निसैनी बनाले सरग जाय के।।3।।

लगा भक्ति चंदन सदा माथ मा।
बना मुक्ति मारग अपन हाथ मा।
रहस नइ पियासे कुआँ कोड़ के।
रखे रहि भरोसा गरब छोड़ के।।4।।

परोसी रहिस तोर जब गा दुखी।
जुगत नइ लगाये करे बर सुखी।
कभू तो करे कर करम दान के।
दरश पाय खातिर ग भगवान के।।5।।

गये गा  शरण नइ बिना मान के।
लिखे नाँव सूची म धनवान के।
इहें छूट जाही सबो चीज हा।
करम खेत बो भक्ति के बीजहा।।6।।

लिखे भाग ला जी उही राम हे।
धरम काज मा ओकरे धाम हे।
करम खेल करथन सबो साथ मा।
बँधे डोर जे राम के हाथ मा।।7।।

रचनाकार - श्री मोहनलाल वर्मा
ग्राम अल्दा (तिल्दा), जिला रायपुर
छत्तीसगढ़

Tuesday, December 5, 2017

सुंदरी सवैया - श्री दिलीप कुमार वर्मा

(1)
ठुठवा रुख मा जब बैठ रहे,तब सोंचत हे जग के कुछ होही।
धनहा मन मा अब धान घलो,बिकटे अब होय ग जेहर बोही।
परही जब घाम त हो अबड़े,धन पाय किसान ह सुग्घर सोही।
पर पेंड़ बिना बरसा नइ हो,तब देख ग मूँड़ धरे सब रोही।

(2)
बरखा बन के बदरा गिरथे,बखरी भर मा बगरे बड़ पानी।
बखरी बनवावत हे बनिहार म,बारत हे कचरा तब नानी।
बनिहार घलो बगरावत हे,बखरी भर बीज बने सब खानी।
बउरे बढ़िया बखरी सब ला,बड़ सुग्घर साग उगाय सयानी।

(3)
रसता धर के जब जावत हे,धरसा पर जावत हे सब खारे।
गरवा मन के चलना हर जी,अब खेत घलो सब देत उजारे।
कतका रखवार बने बइठे,पर कोन कहाँ कतका कर पारे।
अबड़े गरवा मन घूमत हे,उखरो नइ मालिक दीख सखा रे।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Saturday, December 2, 2017

कुंडलिया छंद - जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"



जस गीत -

काली गरजे काल कस,आँखी हावय लाल।
खाड़ा  खप्पर  हाथ हे,बने असुर  के काल।
बने  असुर के  काल,गजब  ढाये रन भीतर।
मार काट कर जाय,मरय दानव जस तीतर।
गरजे बड़ चिचियाय,धरे हाथे मा थाली।
होवय  हाँहाकार,खून  पीये बड़ काली।

सूरज ले बड़ ताप मा,टिकली चमके माथ।
गल मा माला  मूंड के,बाँधे  कनिहा  हाथ।
बाँधे  कनिहा  हाथ,देंह  हे  कारी कारी।
चुंदी हे छरियाय,दाँत हावय जस आरी।
बहे  लहू  के  धार,लाल  होगे बड़ भूरज।
नाचत हे बिकराल,डरय चंदा अउ सूरज।

घबराये तीनो तिलिक,काली ला अस देख।
सबके बनगे  काल वो,बिगड़े   ब्रम्हा लेख।
बिगड़े  ब्रम्हा  लेख, देख  रोवय  सुर दानँव।
काली बड़ बगियाय,कहे कखरो नइ मानँव।
भोला सुनय गोहार,तीर काली के आये।
पाँव तरी गिर  जाय,देख काली घबराये।

काली देखय पाँव मा,भोला हवय खुँदाय।
जिभिया भारी लामगे,आँखी आँसू आय।
आँखी आँसू आय,शांत  काली  हो जाये।
होवय जय जयकार,फूल  देवन बरसाये।
बंदव   माता  पाँव,बजाके    घंटा  ताली।
जय हो देबी तोर,काल कस माता काली।

रचनाकार - श्री

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)