Friday, January 5, 2018

शोभन छन्द - शकुन्तला शर्मा

सरगुजा मा हे बिसाहिन

सरगुजा - मा हे बिसाहिन, देख हे बिन - हाथ
फेर दायी संग गजहिन, भाग - बाचय - माथ।
रोज मजदूरी - बजावय, मोगरा - सुख धाम
देख नोनी ला सिखोवय, पंथ के सत - नाम।

देवदासा - गुरु - सिखोवय, पंथ के अन्दाज
रोज - दायी हर पठोवय, सफल होवय काज।
गोड मा सब काम करथे, हे - बहुत हुसियार
हासथे - गाथे मटकथे, मीठ - सुर - कुसियार।

सुरुज - ऊथे रोज बुडथे, दिन खियावत रोज
देखते - देखत गुजरथे, देख ले अब - खोज ।
अब बिसाहिन नाचथे जब, नाचथे - सन्सार
बिधुन हावय नाच मा सब, छोड़ के घर बार।

सुन - बजाथे देख माण्दर, नाव हे बन - खार
मन - मधुर मुरली मनोहर, बाजथे - सुकुमार।
बिकट - पैसा आत हावय, मोगरा - घर आज
बर बिहा के बात बाँधय, बाज - माण्दर बाज।

मोगरा हर बात कर लिस, माढ गइस - बिहाव
देख मडवा आज गडगिस,सब सुआसिन गाव।
आज खुश हावय बिसाहिन, नाचथे बन - खार
सरगुजा जस - पुर नहाइन, आज बारम् - बार।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

15 comments:

  1. अद्भुत दीदी।सत्य घटना आँखी म झूले लगत हे

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    1. सही बात ल जान डारे जितेन्द्र! मोर आँखी म पहिली दृश्य दिखथे, तेकर बाद मैं हर कलम उठाथवँ । धन्यवाद भाई ।

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  2. बहुत सुग्घर शोभन छंद हे ,दीदी ।बधाई प्रणाम

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    1. साहित्य जगत म कहिनी - गीत के बड़े औकात है, मोहन ! ए दोनों विधा के जुगलबंदी हे। बहुत बहुत धन्यवाद, मोहन !

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, अजय भाई ।

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  4. बड़ सुग्घर सृजन दीदी।

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    1. सुर के साधना कर भाई ! अभ्यास हर गुरु ए ।

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  5. बहुत सुंदर संदेश दीदी
    साँगर मोँगर मन काँही करे ल
    नई धरँय....दिव्यांग मन अपन मन ले हीन भावना ल हेर के फेंक देथें...जऊन दे हे भगवान हर ओकरे कतका बढ़िया उपयोग.....
    बहुत सुंदर रचना दीदी...
    सादर प्रणाम....

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    1. सही कहत हस सूर । समय के सदुपयोग जरूरी हे ग ।

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  6. वाह्ह्ह् वाह्ह्ह् दीदी अनुपम रचना शोभन छंद मा।सादर बधाई

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  7. वाह्ह्ह् वाह्ह्ह् दीदी अनुपम रचना शोभन छंद मा।सादर बधाई

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  8. वाहःहः दीदी बहुते सुघ्घर सृजन

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