Wednesday, February 28, 2018

सर्वगामी सवैया -श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"

                     पुराना भये रीत
                            (०१)

सोंचे बिचारे बिना संगवारी धरे टंगिया दूसरो ला धराये।
काटे हरा पेंड़ होले बढ़ाये पुराना भये रीत आजो निभाये।
टोरे उही पेंड़ के जीव साँसा ल जे पेंड़ हा तोर संसा चलाये।
माते परे मंद पी के तहाँ कोन का हे कहाँ हे कहाँ सोरियाये।

                              (०२)

रेंगौ चुनौ रीत रद्दा बने जेन रद्दा सबो के बनौका बनावै।
सोचौ बिचारौ तभे पाँव धारौ करे आज के काल के रीत आवै।
चाहौ त अच्छा हवै एक रद्दा जँचै ता करौ नीव आजे धरावै।
कूड़ा उठा रोज होले म डारौ ग होले बढ़ै औ गली खर्हरावै।

रचनाकार:-         श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
                        गोरखपुर,कवर्धा

Tuesday, February 27, 2018

दोहा छन्द - श्री अजय अमृतांशु

////   होली के दोहा   ////

ब्रज मा होरी हे चलत, गावत हे सब फाग।
कान्हा गावय झूम के,किसम-किसम के राग।।1।।

राधा डारय रंग ला,सखी सहेली संग।
कान्हा बाँचे नइ बचय, होगे हे सब दंग।।2।।

ढोल नगाड़ा हे बजत, पिचकारी में रंग।
राधा होरी में मगन, सखी सहेली संग।।3।।

गोकुल मा अब हे दिखत,चारो कोती लाल।
बरसत हावय रंग हा,भींगत हे सब ग्वाल।।4।।

लाल लाल परसा दिखय,आमा मउँरे डार।
पींयर सरसों हे खिले,सुग्घर खेती खार।।5।।

               ===000===

तन ला रंगे तैं हवस,मन ला नइ रंगाय।
पक्का लगही रंग हा, जभे रंग मन जाय।। 6।।

छोड़व झगरा ला तुमन,गावव मिलके फाग।
आपस में जुरमिल रहव,खूब लगावव राग।।7।।

आँसों होरी मा सबो,धरव शांति के भेष।
मेल जोल जब बाढही,मिट जाही सब द्वेष।।8।।

कबरा कबरा मुँह दिखय,किसम किसम के गोठ।
मगन हावय सब भाँग मा,दूबर पातर रोठ।।9।।

मिर्ची भजिया देख के,जी अड़बड़ ललचाय।
छान छान के तेल मा, नवा बहुरिया लाय।।10।।

रचनाकार -श्री अजय अमृतांशु
भाटापारा, छत्तीसगढ़

Monday, February 26, 2018

आल्हा छन्द - श्री जगदीश हीरा साहू

अंगद रावण संवाद

दूत  बनाके  अंगद  जी  ला,  लंका  मा  भेजे  श्रीराम।
समझाबे रावण ला जाके, बन जाही जी हमरो काम।।

अंगद जावय तुरते  लंका, पहुँच गए रावण दरबार।
पूछय रावण कोनच तैहा, आये हच काबर ये पार।।

रावण ला  समझावय  अंगद, झन  कर  शंका  कहना मान।
अबड़ कृपा करथे प्रभु राघव, झन तँय ओला मनखे जान।।

सीता ला  लहुटादे  तैहा, बैर  छोड़के  कुल  ला तार।
अजर अमर हो जाबे तैहा, सुरता रखही जी संसार।।

रावण हा गुस्साके कहिथे, नइ चाही  फोकट के ज्ञान।
अपन भलाई चाहत हच ता, भाग इहाँ ले लेके जान।।

नइते  आजा  मोर  शरण मा, ताकत ला नइ  जानच मोर।
थर-थर काँपय ये दुनिया हा, का सकही मालिक हा तोर।।

गुस्साके अंगद हा कहिथे, फोकट के फाँकी झन मार।
पाँव पटक के बोलय सबला, हिम्मत हे ता येला टार।।

लहुट जही  प्रभु राम अवधपुर, सीता ला  जाहूँ मैं हार।
सुनके रावण गरजत कहिथे, मौका हावय जी ए बार।।

सुनके सब राक्षस मन दौड़े,  उठा सकय ना अंगद पाँव।
तब रावण  हा मन मा  सोचय, पाँव  उठाये मैंहा जाँव।।

आवत  देखय  जब  रावण ला, अपन  पाँव  ला देथे टार।
मोर पाँव ले गति नइ बनही, प्रभु ला भजके सबला तार।।

जावत हौं तँय  सुरता  रखबे, झन बिसराबे तैहा ज्ञान।
पाँव धरे बिन प्रभु के रावण, नइ होवय तोरे कल्यान।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़

Sunday, February 25, 2018

सरसी छंद - श्री असकरन दास जोगी

*शंकर तान्डव*

शंकर तान्डव झुमरत नाचे,धरती दाई देख !
पटक-पटक के गोड़ दबाथे,छाती अपन सरेख !!1!!

चालै तिरछुल घेरी बेरी,डमरु ठोंक बजाय !
कामदेव तो रोवै दाई,कइसे जान बचाय !!2!!

मोह तीर के कारन जाते,संकर जोग रमाँय !
तीर मार के काबर भागे,अतनू आज डराय !!3!!

रती तको तो थरथर काँपे,सुनके संकर भाख !
तीसर आँखी उगले आगी,अतनू होगै राख !!4!!

तान्डव करके नटराज बने,महादेव भगवान !
येकर सेवा जेन करे जी,होवत हे गुनवान !!5!!

*गोदी*

गोदी खनथे हँकरत रामा,रोजी मजुरी ताय !
पानी डोंकत पोछे माथा,जाँगर भूँख मिटाय !!1!!

गैंती झउहाँ राँपा कुदरी,लाने घर ले रोज !
बड़का ढ़ेला कोड़त फेंके,मारे धरहा सोज !!2!!

बेंठ रोंठ हे अजिरन लागै,थथर-मथर हे हाल !
नापै गोदी फीता डारै,फेर खनै रे पाल !!3!!

माई पिल्ला जम्मे खनथें,पेट-पीठ ला देख !
बनी-भुती तो जिनगी बनगे,मेंट लिखे जी लेख !!4!!

राहत आये राहत नइहे,जाँगर टोरैं रोजे !
गरीबहा हा गरीबहा हे,दुनिया सुख के खोजे !!5!!

*रोटी*

रोटी राँधे बड़का दाई,खाबो दूध मँ बोर !
परसा पाना कसके तोपे,आगी बढ़िया जोर !!1!!

रोठ-मोठ तो रोटी हावै,अँगरा सेंकत नेत !
बबा बने हे देखत गोई,मन तो लाहो लेत !!2!!

नवा-नवा हे पत्तो लाने,पैरी बाजे लोर !
बेटा बइठे जोहत हावे,लाही रोटी टोर !!3!!

चटनी पीसत हावे दाई,माली मा धर लाय !
घर भर बइठें आसा बाँधे,चाँट-चाँट के खाँय !!4!!

सबके पेट भरे जी रोटी,लेत अँगाकर नाव !
कइथैं रोटी राजा जेला,बढ़िया नेक बनाव !!5!!

*बलात्कार*

बलात्कार ले होवत पीरा,सिहरत हंसा रोज !
माथा पटकत रोवै नारी,सतजुग खोजा खोज !!1!!

लाज हार तो टोरत हावै,कइसे पापी होत !
दारू-मंद के खेला खेले,मुँह में कालिख पोत !!2!!

कइसन भाग पाय रे नारी,रोथच चिहरत आज !
जाग तहूँ तो धरले लाठी,बनके गिरते गाज !!3!!

पापी आँखी घुरथे तोला,अली-गली मा देख !
फोरत जाते अइसन आँखी,काया अपन सरेख !!4!!

बलात्कार के दागी दागे,रोवत हिरदे मोर !
संविधान के धारा टोरें,साँठ-गाँठ ला जोर !!5!!

हमर आदिवासी के माटी,होगे बिरबिट लाल !
बस्तर बिगड़े कारन कोने,देखव  संगी हाल !!6!!

जाति बलात्कारी के बेर्रा,मान-धरम हे नास !
जिनगी ओकर महुरा होथे,जरथे बनके लास !!7!!

छत्तीसगढ़ तको तो कोसे,अपन भाग के रात !
देख राजधानी सो होथे,बलात्कार के घात !!8!!

*जीमी काँदा*

जीमी काँदा राँधे हावै,चलव चलीं जी खाय !
बबा डोकरा तोला हमला,सबला लेहे आय !!1!!

दही-महीं के अम्मठ भारी,पत्तो रोज सधाय !
सोसन भर तो खाही संगी,कतको सुँघत अघाय !!2!!

बढ़िया डबका डबके हावै,करछुल मात मँताय !
मिरचा हरदी धनिया मेथी,नून रगबग डराय !!3!!

गली-खोर तो कहरत हावै,उड़त बने हे सोर !
काकर घर में राँधे संगी,सुँघे नाक ला जोर !!4!!

रचनाकार : श्री असकरन दास जोगी
ग्राम-डोंड़की,तह.+पोस्ट-बिल्हा,जिला-बिलासपुर(छ.ग.)
www.antaskegoth.blogspot.com

Saturday, February 24, 2018

आल्हा छंद - शकुन्तला शर्मा

सही कहत हे फागुन पुन्नी

कर्म कलम हर भाग बनाथे, मोर बात ला सब पतियाव
मनखे जन्म मिले हे बढिया, सोच समझ के पाँव बढाव।

हाथ गोड हर कर्म करत हे, पाप पुण्य के मालिक भाव
भाव प्रमुख ए हर प्राणी मा, भाव मुताबिक सुख दुख पाव।

देख होलिका खुद जर जाथे, बाँचिस हे बपुरा प्रहलाद
साँच आँच ले नइ घबरावै, कतको बड होवय जल्लाद।

होरी मा झन रंग लगावव, हरदी के बस टीका टीक
पानी ला झन खूब बहावव, मनखे मुँहरन रहव सटीक।

अरसा कुशली खाव खवावौ, नाचौ गावौ सब परिवार
दया मया धर के बतियावव, करव समस्या के निरवार।

हरियर रुख ला झन काटव रे, एहर पाप कर्म ए जान
कचरा के होरी बारव रे, सही बुता के कर पहिचान।

भाँग धतूरा झन पीहौ जी, सब झन ला जावव समझाव
बहिनी मन के हाथ बँटावौ, वोहू मन ला भलुक बचाव।

देश धर्म सबले आघू हे, तेकर पाछू सबो तिहार
सही कहत हे फागुन पुन्नी, होरी के कर जय जयकार।

रचनाकार -शकुन्तला शर्मा,
भिलाई, छत्तीसगढ़

Friday, February 23, 2018

हरिगीतिका छन्द - अरुण कुमार निगम

(1)
झन भूल के बरबाद कर,पानी हवै अमरित सहीं
सुन्ना रही दुनिया सरी, पानी बिना जिनगी नहीं ।
बिन झाड़ जंगल के कहाँ, बादर घुमड़ही तैं बता
सूरुज सदा तपते रही, बरसात होही लापता।

(2)
झन काट जंगल झाड़ ला, तज आज के तैं फायदा
देही प्रकृति हर डाँड़ जी, तोड़े कहूँ जे कायदा।
जब बाँचही पीढ़ी नहीं, पुरखा बलाही कोन जी
कतको इहाँ तैं जोर ले, नइ काम आही सोन जी।

(3)
रहि रहि इशारा हे करत, भूकम्प अउ अंकाल मन
हल्का समझ के बात ला, तैं काल ऊपर टाल झन ।
पानी बचा पौधा लगा, खुरपी कुदारी साज ले
पीढ़ी बचाये के जतन, तैं कर शुरू बस आज ले ।।

रचनाकार - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़ 

Monday, February 19, 2018

चौपई छंद - श्रीमती आशा देशमुख

छंद के महिमा - 

आवव जानव छंद विधान , 
ये हावय साहित के जान | 
दोहा रहे धीर गंभीर , 
छोट बात भी मारे तीर | 

रोला के होवय पद चार , 
जेखर महिमा हवे अपार | 
आठ चरण के खांचा खास 
भाव विषय सब रहिथे पास | 

उल्लाला के तीन प्रकार 
दोहा के हावय ये यार | 
कभू ऐठथे एहर मूँछ 
कभू हिलावत रहिथे पूँछ | 

कुण्डलिया ला का बतलांव 
नाम सुनत ही आथे झाँव | 
जइसे मेर्री मारे साँप | 
देखत पोटा जाथे काँप | 

वाह वाह रे आल्हा वाह , 
सबके मन मा भरे उछाह | 
राई ला ये करे पहाड़ 
सुई देत हे पेड़ उखाड़ | 

सरसी सरस बनावय गीत 
आल्हा दोहा के हे मीत | 
पढ़ लिख के राखव संस्कार 
साहित हावय सबले सार | 

जइसे सुघ्घर लगे मयंक 
वइसे ही लागय ताटंक | 
नाम भले ही लगय कठोर 
पर बोली हा करय विभोर |

शंकर विष्णु छंद जे गाय 
साहित सागर में तर जाय | 
लीला इंखर अपरम्पार 
नाम करम गुन सब हे सार |

रोला उल्लाला के हे साथ 
छप्पय गढ़व नवावव माथ | 
कुण्डलिया के भाई लाग 
जइसे पाय बराबर भाग | 

लागय अपन नाम कस बोल 
अमृतध्वनि हवय अनमोल | 
एखर रचना नइहे खेल 
निकले बड़े बड़े के तेल |

शोभन मदन अबड़ भरमाय 
लागय जइसे जुड़वा आय | 
दूनो के एक्के हे चाल 
जइसे पवन चले मतवाल | 

रचनाकार - श्रीमती आशा देशमुख
एन टी पी सी , जमनीपाली, कोरबा
छत्तीसगढ़

Sunday, February 18, 2018

सरसी छंद - श्री जगदीश "हीरा" साहू

मन के पीरा  

नाँव हवय जगदीश मोर जी, खोलत हावँव राज।
देख जगत के पीरा ला मँय, बोलत हावँव आज।।1।।

घर के भीतर कुकुर बँधाये, बाहिर घूमे गाय।
का होही ये देश-राज के, कुछु समझ नहीं आय।।2।।

रोवत बइठे दाई बाबू, दुख ला कोन मिटाय।
धरके बाई होटल जावय, आनी-बानी खाय।।3।।

कठल-कठल के रोवय लइका, तभो तरस नइ आय।
भरके बोतल दूध पियाये, घर मा रोग बलाय।।4।।

भाई होगे बैरी देखव, मुँह देखन नइ भाय।
बनगे हितवा आज परोसी, मन के बात बताय।।5।।

मंदिर मा लगगे हे तारा, दूध गली बोहाय।
दारू खातिर भीड़ लगे हे, पीके बड़ इतराय।।6।।

संस्कृति हर गा कहाँ नँदागे, देख आज के काम।
कपड़ा-लत्ता छोटे होगे, नख होगे हे लाम।।7।।

राम-राम बोले मा काबर, लगथे अड़बड़ लाज।
हाय-हलो मा सबो भुलाये, बिगड़त हवय समाज।।8।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़ 

Friday, February 16, 2018

सर्वगामी सवैया -श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर


                            (०१)

गड्ढा खने जे धरे ईरखा द्वेष बेरा कुबेरा खुदे गीर जाही।
धोखाधड़ी काखरो ले करैया ह आही समे घोर धोखा ल पाही।
बूड़े हवै जौन निंदा म प्रानी इँहे दूहरी मार बाँटा म आही।
जे छींचही बीज जैसे धरा मा पके बाद बीजा उही काट खाही।

                               (०२)

पापी कुचाली करे दृष्टि छोटे त जीते म आँखी इँहे फूट जाही।
दंभी घमंडी उड़े पाँख पा के समे एक दिना धरा मा गिराही।
होही इँहे न्याय के संग न्याये त अन्याय के दंड होही गवाही।
पौधा लगा बंबरी के इँहा छाँय आमा सरीखा कहाँ कोन पाही।

                                (०३)

सोंचे बिचारे बिना संगवारी धरे टंगिया दूसरो ला धराये।
काटे हरा पेंड़ होले बढ़ाये पुराना भये रीत आजो निभाये।
टोरे उही पेंड़ के जीव साँसा ल जे पेंड़ हा तोर संसा चलाये।
माते परे मंद पी के तहाँ कोन का हे कहाँ हे कहाँ सोरियाये।

                                 (०४)

रेंगौ चुनौ रीत रद्दा बने जेन रद्दा सबो के बनौका बनावै।
सोचौ बिचारौ तभे पाँव धारौ करे आज के काल के रीत आवै।
चाहौ त अच्छा हवै एक रद्दा जँचै ता करौ नीव आजे धरावै।
कूड़ा उठा रोज होले म डारौ ग होले बढ़ै औ गली खर्हरावै।

                                 (०५)

पानी बिना जिन्दगानी अधूरा ग पानी बिना आज सुक्खा किसानी।
का के भरोसा तनै गोठियावै ग कामा चलै जोर बोली सियानी।
मेला मड़ाई न छट्ठी न शादी कहाँ नेवतावै कहूँ लागमानी।जुच्छा परे हे बिना अन्न कोठी करे काय ज्ञानी बिना हाथ पानी।

रचनाकार- श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर,कवर्धा
छत्तीसगढ़

Thursday, February 15, 2018

आल्हा छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

लड़ाई मैना के

बड़े बाहरा उगती बेरा,हो जावै सूरज  सँग लाल।
अँधियारी रतिहा घपटे तब,डेरा डारे बइठे काल।

घरर घरर बड़ चले बँरोड़ा,डारा पाना धूल उड़ाय।
दल के दल मा रेंगय चाँटी,चाबे  त  लहू आ जाय।

घुघवा  घू  घू  करे  रात  भर,सुनके  जिवरा जावै काँप।
झुँझकुर झाड़ी कचरा काड़ी,इती उती बड़ घूमय साँप।

बनबिलवा नरियावत भागै,करै कोलिहा हाँवे हाँव।
मनखे  मनके आरो नइहे,नइहे तीर तखार म गाँव।

डाढ़ा टाँग टेड़गी रेंगय,घिरिया डर डर मुड़ी हलाय।
ऊद भेकवा भागे पल्ला,भूँ भूँ के रट कुकुर लगाय।

खुसरा रहि रहि पाँख हलावै,गिधवा देखै आँखी टेंड़।
जुन्ना  हावय  बोइर  बँभरी,मउहा कउहा पीपर पेड़।

आसमान  मा  डारा पाना,जड़ हा धँसे हवे पाताल।
पानी बरसे रझरझ रझरझ,भीगें ना कतको डंगाल।

उही  डाल  मा  मैना  बइठे,गावै   मया  प्रीत   के  गीत।
हवै खोंधरा जुग जोड़ी के,कुछ दिन जावै सुख मा बीत।

दू ठन पिलवा सुघ्घर होगे, मया ददा दाई के पाय।
चारा चरे ददा अउ दाई,छोड़ खोंधरा दुरिहा जाय।

सुख  मा  बीतै  जिनगी  सुघ्घर , आये नहीं काल ला रास।
अब्बड़ बिखहर बिरबिट करिया,नाँग साँप हा पहुँचे पास।

जाने  नहीं  उड़े  बर पिलवा,पारै  डर  मा बड़ गोहार।
इती उती बस सपटन लागे,मारे बिकट साँप फुस्कार।

उही  बेर  मा  मादा मैना ,अपन खोंधरा तीरन आय।
देख हाल ला लइका मनके,छाती दू फाँकी हो जाय।

तरवा  मा  रिस  चढ़गे ओखर,आँखी  होगे लाले लाल।
मोर जियत ले का कर सकबे,कहिके गरजे बइठे डाल।

पाँख हले ता चले बँड़ोड़ा,चमके बड़ बिजुरी कस नैन।
माते   लड़ई   दूनो  के   बड़,आसमान   ले  बरसे  रैन।

चाकू छूरी बरछी भाला,खागे नख के आघू मात।
बड़े बाहरा के सब प्राणी,देखे झगड़ा बाँधे हाथ।

पड़े  चोंच  के  मार साँप  ला,तरतर तरतर लहू बहाय।
लइका मन ला महतारी हा,झन रोवौ कहि धीर बँधाय।

उड़ा उड़ा के चोंच गड़ाये,फँस फँस नख मा माँस चिथाय।
टपके   लहू  पेड़   उप्पर  ले, जीव तरी  के  घलो  अघाय।

मादा   मैना   के  आघू  मा, बिखहर   डोमीं   माने  हार।
पहिली बेरा अइसन होइस,खाय रिहिस कतको वो गार।

जान  बचाके  भागे  बइरी,मैना  रण  मा  बढ़ चढ़ धाय।
पिलवा मन ला गला लगाके,फेर खुसी दिन रात पहाय।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

रोला छन्द - श्री सूर्यकान्त गुप्ता

सामाजिक बुराई

(1)
बनथे हमर समाज, जोर परिवार सबो के
हित ला राखैं ध्यान, नफा नुकसान समोखे
समझैं नही सियान, बनाथें रीत कहाँ ले
मरनी अऊ बिहाव, हेरथे प्रान तँहा ले।।

(2)
जरथें नोनी आज, घलो दाईज हवन मा
नइ आँवय गा बाज, रहइया कुटी भवन मा
आना जाना जान, आय जिनगी के हिस्सा
रहिथे बनके मान, एक दिन कहनी किस्सा।।

(3)
वाह तेरही भोज, चलत हे आजो कसके
चटकारत हें जीभ, देख लौ खा के खसके
टूटे रथे पहाड़, दुःख के जेकर घर मा
आवै इही समाज, लादथे बोझा सर मा।।

(4)
जात पात के जाल, देख लौ हावै पसरे
सब जी के जंजाल, हेराही कइसे कस रे
आवौ करन प्रयास, हटावन सबो बुराई
बनही हमर समाज, तभे खुशहाल ग भाई।।

रचनाकार - श्री सूर्यकांत गुप्ता
सिंधिया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

Wednesday, February 14, 2018

सर्वगामी सवैया- श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

1,(भोला भण्डारी)
माथा म चंदा जटा जूट गंगा गला मा अरोये हवे साँप माला।
नीला  रचे  कंठ  नैना भये तीन नंदी सवारी धरे हाथ भाला।
काया लगे काल छाया सहीं बाघ छाला सजे रूप लागे निराला।
लोटा म पानी रुतो के रिझाले चढ़ा पान पाती ग जाके सिवाला।

2,(गाड़ी सड़क के)
लामे हवे रोड चारों मुड़ा मा लिलागे गली खोर खेती ग बाड़ी।
कोनो अकेल्ला त कोनो चढ़े चार मारे ग सेखी धरे देख गाड़ी।
आगी लगे  हे  मरे  जी  कुदावै  गिरे  हाथ टूटे  फुटे मूड़ माड़ी।
भोगे सजा देख कोनो के कोई कभू तो जुड़ागे जिया हाथ नाड़ी।

3,(ताजा भोजन)
तातेच खाना मिठाये सुहाये बिमारी ल बासी ग खाना ह लाने।
ताजा रहे साग भाजी घलो हा पियौ तात पानी ग रोजेच छाने।
धोवौ बने हाथ खाये के  बेरा म कौरा कभू  पेट जादा न ताने।
खाये  ग  कौरा  पचाये  बने  तेन गा आदमी रोग राई न जाने।

4,(बेटी बिहाव म पानी)
आये बराती खड़े हे मुहाटी म पानी दमोरे करौं का विधाता।
राँधे गढ़े भात बासी म पानी पनौती मिहीं हा हरौं का विधाता।
एकेक कौड़ी ल रोजेच जोड़ेव आगी लगा मैं बरौं का विधाता।
सोज्झे गिरे गाज छाती म मोरे तभो फेर आशा धरौं का विधाता।

5,(होली के रंग,डोली मा)
होरा चना के खवाहूँ ग आबे घुमाहूँ सबो खेत डोली ल तोला।
हे  कुंदरा  मेड़  मा बैठ लेबे सुनाहूँ ग पंछी के बोली ल तोला।
टेसू फुले खूब लाली गुलाली दिखाहूँ ग भौंरा के टोली ल तोला।
पूर्वा  बसंती  घलो फाग  गाये खवाहूँ  बने भांग गोली ल तोला।

6,(बने बूता बने बेरा म)
माटी के काया म माया मिलाये ग बूता बने संग साने नही गा।
बूता बड़े हे हवे नाम छोटे दिही काम हा साथ आने नही गा।
टारे बिधाता के लेखा भला कोन होनी बिना होय माने नही गा।
बेरा रहे काम बूता सिराले अमीरी गरीबी ल जाने नही गा।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा), छत्तीसगढ़

Tuesday, February 13, 2018

हरिगीतिका छन्द - श्रीमती आशा देशमुख

प्रेम के पीरा

(1)
पुरखा बनाये रीत ला ,बिधना धराये मीत ला |
खाई बड़े छोटे अबड़,कइसे निभाये प्रीत ला |
बोली भुलागे मान ला ,मनखे भुलागे दान ला |
चारो डहर स्वारथ भरे ,कुचलत हवे सम्मान ला |
(2)
बेड़ी बँधाए जात के ,अंतस पुकारत हे मया |
कइसे छुड़ावव गांठ ला ,करदे विधाता तैँ दया |
पीरा सुनावव कोन ला ,बदनाम दुनियाँ हा करे |
गहरा अबड़ हे घाव हा ,सब झन जहर महुरा धरे |
(3)
रद्दा कठिन हे प्रेम के ,कांटा गड़े हे पाँव मा |
रोवत हवे अंतस घलो ,नइहे ठिकाना छाँव मा |
नइहे मया बर ठौर अब ,छाये गरब के राज हे |
बोली तको अब ठाड़ हे ,जइसे गिराये गाज हे |
(4)
ताना कसे संसार हा ,जिनगी लगे हे पाप कस |
एके सबो मनखे हवे ,ये जात बनगे श्राप कस |
कोनो बता दे आज गा ,हावय धरम का भात के |
का रंग के हावय हवा ,पानी हवय का जात के |
(5)
दिन रात सिसके हे मया ,बोली मिले अपमान के |
जाबे चिरैया तैं कहाँ ,भूखा हवय जग प्रान के |
आँसू भरे आंखी हवय ,दिन रात जोहय मीत ला |
बैरी बने जग प्रेम के ,कइसे बचावव प्रीत ला |
(6)
चारो डहर अँधियार हे ,उगलत हवय हर झन धुआँ |
रद्दा घलो सूझय नही ,खाई हवे या हे कुआँ |
भीतर झँकैया कोन हे ,चारो मुड़ा बीरान हे |
बस मन निहारे प्रीत ला ,एके लगन के ध्यान हे |
(7)
मन हा पुकारे मोहना ,बंशी बजादे प्रीत के |
हर गाँव वृन्दावन बने ,बोली ठिठोली गीत के |
तोरे रचे संसार हे ,रखदे मया के मान ला |
बस एक तोरे आसरा ,अब का कहव भगवान ला |

रचनाकार - श्रीमती आशा देशमुख
एन टी पी सी जमनीपाली
कोरबा, छत्तीसगढ़ 

Saturday, February 10, 2018

सार छन्द - श्री मोहन कुमार निषाद

बेटी - बहू

देवव बेटी ला दुलार जी , बन्द करव ये हत्या ।
जीयन दव अब बेटी मन ला , राखव मनमा सत्या ।

बेटी होही आज तभे जी ,  बहू अपन बर पाहू ।
बेटा कस जी मान देय ले , जग मा नाम कमाहू ।

करव भेद झन इन दूनो मा , एक बरोबर जानव ।
बेटी जइसे लक्ष्मीरूपा , अपन बहू ला मानव ।

छोड़व अब लालच के रद्दा , झन दहेज ला लेवव ।
बन्द होय गा गलत रीति सब , शिक्षा अइसे देवव ।

मारव झन कोनो बेटी ला , जग मा  जब वो आही ।
हाँसत खेलत घर अँगना मा , जिनगी अपन बिताही ।

होवय बंद भ्रूण के हत्या , परन सबे जी ठानव ।
बेटी बिन जिनगी हे सुन्ना , बेटा इन ला मानव ।।

रचनाकार - श्री मोहन कुमार निषाद
ग्राम - लमती, भाटापारा, छत्तीसगढ़

Thursday, February 8, 2018

सिहांवलोकनी दोहा--श्री दिलीप कुमार वर्मा

बइठव बिरवा छाँव मा,पावव सुग्घर ज्ञान।
बाँटत हे गुरुदेव हा,आवव सबो सुजान।।1।।

आवव सबो सुजान मन,सिखलव रचना छंद।
बिना ज्ञान के देख लव,छंद लिखइ हे बंद।।2।।

छंद लिखइ हे बंद जे,तेला चला उठाव।
साधव बढ़िया छंद ला,साहित पोठ बनाव।।3।।

साहित पोठ बनाय बर,करबो सबझन काम।
भाखा होही पोठ जी,हमरो होही नाम।।4।।

हमरो होही नाम जब,देबो मोती सार।
कचरा मन सब जर जही,सार रहे भरमार।।5।।

सार रहे भरमार तब,पढ़ही लोगन जान।
नियम बद्ध अउ ब्याकरण,कसे रही सब मान।।6।।

कसे रही सब मान ले,बनही ओ इतिहास।
चीर समे लोगन पढ़े,हमला हाबय आस।।7।।

हमला हाबय आस जी,रहिथे सच गा बात।
कचरा मन सब जर जथे,लबरा खाथे लात।।8।।

लबरा खाथे लात ला,नइ पावय ओ मान।
सच्चा साहित सिख सखा,सोना येला जान।।9।।

सोना येला जान ले,जरे आँच नइ आय।
अंतकाल तक ये रहे,सब के मन ला भाय।।10।।

रचना कार--श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार,छत्तीसगढ़

Wednesday, February 7, 2018

अमृत ध्वनि छंद-- श्री चोवा राम "बादल"

        1 आगू बढ़बे
झनकर अतियाचार जी, भरे जवानी जोस ।
खइता जिनगी तोर गा, खोथस काबर होस ।
खोथस काबर, होस राखले, मीठ बोल ले।
मया बाँट ले, सुमत आँट ले, गाँठ खोल ले।
दू मन आगर, मिहनत तैं कर, सुरता छिन भर ।
पढ़बे लिखबे , आगू बढ़बे , आलस झन कर ।

     2 पद पइसा
पद पइसा के खेल मा, नाचत हाबय न्याय ।
निरपराध फाँसी चढ़य, अपराधी बँच जाय।
अपराधी बँच ,जाय घूस के, नोट धराके ।
धौंस जमाके, गुंडा लाके, मार खवाके ।
पहुँच बताथे , रउँदत जाथे , नेता के कद ।
बड़ इँतराथे, जोर लगाथे , सब पाके पद ।

   3 भारत भुइँयाँ
जेकर चारों खूँट हे, पावन चारों धाम।
धरम धजा फहरत रथे, देवभूमि हे नाम ।
देवभूमि हे ,नाम सोन के , सुघर चिरइया ।
भारत भुइँया , लागवँ पँइया, अलख जगइया ।
लाल जवाहर , हवय घरो घर , बेटा शेखर ।
सागर परबत , पहरा देथे , निसदिन जेखर ।

   4 जिम्मेदारी
जिम्मेंदारी छोंड़ के , आलस ला झन थाम ।
अइसन मनखे के सदा , बिगड़त रहिथे काम ।
बिगड़त रहिथे , काम सबो जी , नइ समझै जी ।
मन मुरझाथे , मान गँवाथे , दुख अरझै जी ।
परे लचारी , घर के नारी , सहिथे भारी।
खुशी मनाथे , जेन उठाथे , जिम्मेंदारी ।

रचनाकार -- श्री चोवा राम " बादल"
हथबंद , छत्तीसगढ़

Tuesday, February 6, 2018

सार छंद- श्री ज्ञानु'दास' मानिकपुरी

धन दौलत अउ माल खजाना,छोड़ एक दिन जाना।
कंचन काया माटी होही,काबर जी इतराना।।

ये दुनिया ला जानौ संगी,दू दिन अपन ठिकाना।
संग रहौ सब मिलजुल संगी,रिश्ता नता निभाना।।

बैर कपट ला दुश्मन जानौ,गीत मया के गाना।
मुट्ठी बाँधे आय जगत में,हाथ पसारे जाना।।

सुग्घर मनखे तन ला पा के,जिनगी सफल बनाना।
गुरतुर बोली बोल मया के,हिरदे अपन बसाना।।

दया मया अउ करम धरम हा,सबले बड़े खजाना।
सत्य प्रेम के पाठ पढ़ौ अउ,सबला हवै पढ़ाना।।

रचनाकार - श्री ज्ञानु'दास' मानिकपुरी
चंदैनी (कवर्धा)
जिला-कबीरधाम, छत्तीसगढ़

Sunday, February 4, 2018

लावणी छ्न्द - श्री अजय "अमृतांशु"

रक्तदान -

रक्तदान करके संगी हो ककरो प्राण बचावव जी।
दान हवय ये सबले बढ़ के,सब ला बात बतावव जी।

रक्तदान ईश्वर के पूजा,बात सबो झन जानव गा।
येहू आय भक्ति के रद्दा,बात तुमन ये मानव गा।

पइसा मा जब खून मिलय ना,उही बेरा चेत आथे।
जिनगी अधर म लटके रहिथे,तब ये बात समझ पाथे।

लहू नइ बनय लेब म संगी, कीमत येकर जानव जी।
येहा केवल देह मा बनथे,येला सब झिन मानव जी।

रक्तदान कमजोरी लाथे,ये भरम भूत झन पालव।
खून साफ होथे येकर ले,मन मा येला बइठालव।

नइ परय कभू दिल के दौरा, रक्तदान के गुण भारी।
स्थिर रहिथे बी पी लेबल,गुनव थोरिक संगवारी।

वजन घलो नइ बाढ़य संगी, मोटापा होथे जी कम।
मंत्र हवय ये स्वस्थ रहे के,रक्तदान मा काबर गम।

रचनाकार - श्री अजय "अमृतांशु"
भाटापारा, छत्तीसगढ़

Saturday, February 3, 2018

रोला छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

रितु बसंत -

गावय  गीत बसंत,हवा मा नाचे डारा।
फगुवा राग सुनाय,मगन हे पारा पारा।
करे  पपीहा  शोर,कोयली  कुहकी पारे।
रितु बसंत जब आय,मया के दीया बारे।

बखरी  बारी   ओढ़,खड़े  हे  लुगरा  हरियर।
नँदिया नरवा नीर,दिखत हे फरियर फरियर।
बिहना जाड़ जनाय,बियापे मँझनी बेरा।
अमली बोइर  जाम,तीर लइका के डेरा।

रंग  रंग  के साग,कढ़ाई  मा ममहाये।
दार भात हे तात,बने उपरहा खवाये।
धनिया  मिरी पताल,नून बासी मिल जाये।
खावय अँगरी चाँट,जिया जाँ घलो अघाये।

हाँस हाँस के खेल,लोग लइका सब खेले।
मटर  चिरौंजी  चार,टोर  के मनभर झेले।
आमा  बिरवा   डार, बाँध  के  झूला  झूलय।
किसम किसम के फूल,बाग बारी मा फूलय।

धनिया चना मसूर,देख के मन भर जावय।
खन खन करे रहेर,हवा सँग नाचय गावय।
हवे  उतेरा  खार, लाखड़ी  सरसो अरसी।
घाम घरी बर देख,बने कुम्हरा घर करसी।

मुसुर मुसुर मुस्काय,लाल परसा हा फुलके।
सेम्हर हाथ हलाय,मगन हो मन भर झुलके।
पीयँर पीयँर  पात,झरे पुरवा जब आये।
तन मन बड़ हर्षाय,गीत पंछी जब गाये।


रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा) छत्तीसगढ़ 

Thursday, February 1, 2018

कुण्डलिया छन्द - श्री असकरन दास जोगी

माते कड़कत जाड़ हे,हबरे हमरो तीर !
ओढ़े बइठे साल ले,डरथे कतको बीर !!
डरथें कतको बीर,तान के आगी बारव !
पहिरव चमकत कोठ,जाड़ ले आँसो टारव !!
होवत नइहे घाम,सुरुज ला खींचत लाते !
कटकट करथे दाँत,बने अस जाड़ा माते !!1!!

बेटी पढ़बे आज वो,रोसन करबे नाँव !
दुलरी गढ़बे भाग तँय,बनबे सुख के छाँव !!
बनबे सुख के छाँव,टार ले जग अनहोनी !
अबड़े पाबे मान,लान पोथी पढ़ नोनी !!
नारी समरथ लाज,बनाके धरबे पेटी !
रोसन करबे नाँव,दमक के पढ़बे बेटी !!2!!

आसन बइठे संत हे,जोहय नयना आज !
काया माया तंग हे,राखव सतगुरु लाज !!
राखव सतगुरु लाज,छिटक के निरमल पानी !
तारव हंसा खोज,आप हव परम गियानी !!
पावन संगत छाँव,सुआ कस सुघ्घर बासन !
हबरव जी घर मोर,सजे हे सतगुरु आसन !!3!!

काटे लकड़ी रोज तँय,फाती करते आज !
आगी बरही पोठ जी,चुलहा करही राज !!
चुलहा करही राज,बने अस चुरही जेवन !
मरही कतको भूँख,सबो झन करहीं सेवन !!
गाँजे लकड़ी लान,चीर दे साँटे-साँटे !
कबके माढ़े ताय,परे हे काटे-काटे !!4!!

भाजी चुरगे साध के,लेड़गा पइधे आय !
हरियर-हरियर डार हे,खेंड़हा भाजी ताय !!
खेंड़हा भाजी ताय,महीं मा अड़बड़ खाथें !
घपटे बारी पोठ,कोड़ के कतको लाथें !!
बेंचे जाते आज,देख हो जाते राजी !
धरते बोझा बाँध,बेंच के आते भाजी !!5!!

जोहत आज बसंत ले,आही कइके संत !
मातत-झुमरत आत हे,लागत निच्चट कंत !!
लागत निच्चट कंत,पंचमी आँसो छाहित !
आमा मँउरे डार,बेंदरा मारत राहित !!
कतको बनही बात,माँघ तो मनवा मोहत !
पावत नइहे संत,मया के रद्दा जोहत !!6!!

माते हावे खेत में,सरसो ओरी ओर !
ताना हमला देत हे,परसो भेजे सोर !!
परसो भेजे सोर,हबर नइ पाये चिट्ठी !
पारत खिड्डी कार,रिसा झन होले मिट्ठी !!
काहे देथच दोस,तहीं हर गाँवे आते !
सरसो ओरी ओर,खेत में हावे माते !!7!!

जाड़ा भागत छोड़ के,माँघी आये देख !
कहरे-महरे पोठ जी,अँगना तोर सरेख !!
अँगना तोर सरेख,आत हे गरमी बेरा !
बाँदर आही रोज,छानही परही डेरा !!
होबे कतका खार,हरक के टारत गाड़ा !
माँघी आये देख,छोड़ के भागत जाड़ा !!8!!

टोरे पाना डार कस,होगे तन के हाल !
बिरहा आगी लेस के,ठोंक बजावय गाल !!
ठोंक बजावय गाल,बाँध के सुरती डोरी !
सुनथच मोर बसंत,बात नइ माने गोरी !!
कतका तरसवँ दोस,परत हे ताना तोरे !
होगे बारा हाल,मया के पाना टोरे !!9!!

माते फूल बसंत के,भँवरा मनवा भाय !
देखे ताके टेंड़ के,लाहो लेहे आय !!
लाहो लेहे आय,करे चुहके के जोखा !
काँटा लेवत टार,उदिम तो हावय चोखा !!
झुमरे भँवरा देख,कहाँ तँय देखे पाते !
भँवरा मनवा भाय,फूल तो चुहके माते !!10!!

डारव खातू खेत में,डुठरा होवत धान !
पानी बरसे झोर के,अइला जावत पान !!
अइला जावत पान,डार दव खातू माटी !
रुपिया लागय लाख,लान लव दवई खाँटी !!
कतको बाधा आय,फेर मेहनत मँ मारव !
हरिया जावय धान,बने अस खेत म डारव !!11!!

ठलहा होगे हाल हर,ताना सुनत पहावँ !
खोजे न मिले नौकरी,जाँगर चोर कहावँ !!
जाँगर चोर कहावँ,नौकरी साहब देथे !
बेंचे कइथे खेत,दमक के वो घुँस लेथे !!
अइसन मोरे हाल,जइसने बइला बलहा !
ताना सुनत पहावँ,बितावँव दिन ला ठलहा !!12!!

लाते गमछा सेत के,राजा पुरखा तान !
छत्तीसगढ़ हमार हे,धँवरा गमछा सान !!
धँवरा गमछा सान,बाँध के पागा देखन !
तातर मेछा राख,गली में अँइठत रेंगन !!
धर के पइसा आज,सेठ सो लेके आते !
राजा पुरखा तान,सेत के गमछा लाते !!13!!

हाँसत हावय देख के,बइरी चंदा आज !
बाढ़त पीरा मोर रे,आवत नइहे लाज !!
आवत नइहे लाज,हाँस के देखच मोला !
पीरा होगे गाढ़,सोर तो लमरा ओला !!
हिरदे कलपे रोज,लुका के काहे पासत !
बइरी चंदा आज,देख के हावय हाँसत !!14!!

चाँदी असन चक-चमकत,आगे फागुन फेर !
माते चारो ओर रे,खेलत हावय घेर  !!
खेलत हावय घेर,गुलाबी बढ़िया छाही !
रंगत हमला रंग,बछर भर सुरता आही !!
तरसे सरपट खार,सुखागे कइसे काँदी !
आगे फागुन फेर,दिखत हे जइसे चाँदी !!15!!

रचनाकार-श्री असकरन दास जोगी
पता:ग्राम-डोंड़की,पोस्ट+तहसील-बिल्हा,जिला-बिलासपुर(छ.ग.)
www.antaskegoth.blogspot.com

सरसी छंद - श्री जगदीश "हीरा"साहू

काया खंडी -

मनखे अच ता मनखे कस रह, झन उलझा तँय काम।
अपन जनम ला सफल बनाले, लेवत गा प्रभु नाम।।1।।

कहना मान मोर गा भाई, हरी नाम हे सार।
माया के चक्कर मा झन फँस, सबकुछ हे बेकार।।2।।

जिनगी दूभर हो जाही गा, भटकत सुबहों शाम।
 जिनगी भर पछताबे तैहा, नइ गाबे प्रभु नाम।।3।।

पाप करे ले नरक भोगबे, खाबे यम के मार।
खौलत पानी मा ओमन जी, तोला दिही उतार।।4।।

तड़पत रहिबे दुख मा भाई, सुरता आही बात।
भटकत रहिबे जनम जनम तँय, आनी बानी खात।।5।।


साँप-डेरु अउ बिच्छी कीरा, बघवा छेरी गाय।
बइला भइसा जोनी पाके, मालिक संग कमाय।।6।।

अपन करम ला आज सँवारौ, लेके शिव के नाम।
सबो जनम बर तार दिही वो,भोले सुख के धाम।।7।।

तोर करम जब बढ़िया रइही, मिलही तोला राज।
ये जग हावय करम भरोसा, कहिथे संत समाज।।8।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा"साहू
कड़ार (भाटापारा)
छ.ग.