Monday, March 26, 2018

हरिगीतिका छन्द - श्री चोवाराम "बादल"

(1)
कचरा इहाँ कचरा उहाँ, कचरा ह कचरा फेंकथे ।
कचरा हटा घर के अपन, बाहिर गली मा लेगथे।।
घुरुवा सहीं दिखथे शहर, कुढ़वाय कचरा चौंक मा ।
घिन घिन अबड़ जी लागथे, माँछी परे जस छौंक मा ।।

(2)
समझाय समझय कोन हा,उपदेस सब झन झाड़थें।
डब्बा अगोरत रहि जथे, कचरा कहाँ जी डारथें ।
जस हे शहर के हाल हा,तस गाँव के गा हाल हे।
करके शहर के सब नकल, बिगड़े हवय अब चाल हे।।

(3)
मुँह जोहथें सरकार के, फोकट म सब कुछ मिल जवय।
बइठे रहँय चुपचाप खुद,परबत ह ओती हिल जवय।
अँधियार ला जोहार के,चाहँय अँजोरी आ मिलय।
घुघुवा ह कहिथे रात मा,फुलुवा कमल के जी खिलय ।।

(4)
टीना बदल के देख तो, मनखे ल सोना चाहिये ।
माथा म हे कचरा भरे ,वो दूर होना चाहिये ।
पालय नहीं जी गाय ला, रबड़ी मलाई चाहिये ।
शुरुवात अपने से करँय, सब ला सफाई चाहिये ।

रचनाकार - श्री चोवाराम "बादल"
ग्राम - हथबन्द (भाटापारा) छत्तीसगढ़

Sunday, March 25, 2018

बरवै छंद - शकुन्तला शर्मा

रामनवमी -

देख राम - नवमी ए, बडे - तिहार
सबके दुख ला समझिस बारम्बार।

राम बनिस जन जन के, मन के भाव
सब झन ला तारत हे, बन के नाव।

शबरी घर मा आइस, चीन्हिस प्रेम
जूठा बोइर खाइस, निभ गिस नेम।

शबरी तरगे चल दिस, गंगा धाम
जपते रहिस बरोबर, राजा राम।

देख दोनिया रुख ला, शबरी गाँव
आजो कथे कहानी, परथन पाँव।

महा - नदी ए गंगा, चलव नहाव
वाल्मीकि के डेरा, माथ नवाव।

तुरतुरिया मा लवकुश, बासी खाँय
अश्व मेध के घोडा, बिकट कुदाँय।

मान सिया के बहुरिस, अतका जान
भुइयां भीतर चल दिस, रोइस प्रान।

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा,
भिलाई, छत्तीसगढ़

Saturday, March 24, 2018

ताटंक छंद - श्री चोवा राम " बादल "

श्री राम जनम  -

लछमीपति ला नरतन धरके, लीला अपन रचाना हे।
पापी मन ला मार मिटा के, धरम धजा फहराना हे । 1।

मनु सतरूपा राजा रानी, करे रहिंन तप जी भारी।
देये वरदान निभाये के, आगे हावय गा पारी। 2।

नारद मुनि के श्राप घलो हे, राम जनम लिस त्रेता में।
धरती हाहा कार करिस जब, परके पाप सपेटा में ।3।

देव संत तपसी मनखे के,  सब दुख दरद मिटाना हे ।
धरम करम भूले बिसरे ला, फरी फरी समझाना हे । 4।

रावन कुंभकरन दूनो के, पार उतारे के बारी।
सनक सनंदन सनकादिक के, श्राप लगे हे जी भारी । 5।

राम जनम के कतको कारन , बेद पुरान बखाने हे ।
मोर छोटकुन अड़हा मति हा, अतके कस ला जाने हे ।6 ।

सुभ मुहरत अभिजित के हावय, करक लगन सुभकारी हे ।
हवय नछत्तर सुग्घर छाहित , नव ग्रह मन सँगवारी हे ।7।

समे दोपहर दिन के हावय , बढ़िया बेरा आये हे ।
जान समय अवतार नाथ के, देव सबो सकलाये हे । 8।

फुरहुर फुरहुर हवा चलत हे, जंगल सब हरियाये हें
परबत मन चमकत हावय जी, रतन अपन बगराये हें । 9 ।

कलकल कलकल गीत सुनावत , बोहावत नदिया धारा ।
कुहुक कोयली राग धरे हे , मस्त मगन भौंरा न्यारा । 10 ।

डार डार मा फूल लदे हे, रितु मनभावन होगे हे ।
श्री हरि जी हा इही समे ला , जनम धरे बर जोंगे हे ।11।

माता कौशिलिया के आगू , चार भुजा वाला ठाढ़े ।
माता अड़बड़ गदगद होगे, देखत अचरज हे बाढ़े । 12।

कोदो साँवर तन हा सुंदर ,मुँह के सोभा भारी हे ।
फूल खोखमा कस आँखी मा, पुतरी भँवरी कारी हे । 13।

गदा शंख ला धरे हवय वो , चक्र सुदर्शन हे धारी ।
रतन जड़े गहना पहिरे हे, चमकत हावय जी भारी । 14 ।

मूड़ सोन के मुकुट बिराजे, कानन कुंडल सोहे हे ।
बैजंती माला बड़ सुग्घर , तीन लोक मन मोंहे हे ।15 ।

घुँघरालू करिया चूंदी हा , बादर सहीं उनोये हे ।
अगर चँदन के तिलक लगे हे , माथा अबड़ फबोये हे ।16 ।

धोती पिंयर हवय पहिरे जी, पीताम्बर अलफी डारे ।
अदभुत रूप हवय श्री हरि के, सुंदरता लहरा मारे ।17।

बिनती करत कहिस माता हा, लइ का बनके आना तैं ।
मोर कोंख के बेटा बनके , सिसु लीला देखाना तैं ।।18।

तुरते प्रभु हा लइका बनगे , भुलवारे मति माता के ।
एहों एहों रोवन लागिस , देखव खेल बिधाता के । 19।

अवधपुरी मा मंगल होगे , बाजत हावय जी बाजा ।
हीरा मोती दान करत हे, अब्बड़ खुस दशरथ राजा । 20।

रचनाकार - श्री चोवा राम " बादल "
                हथबन्द, छत्तीसगढ़

Friday, March 23, 2018

दोहा छन्द - श्री मनीराम साहू "मितान"

छकड़ा गाड़ी मा फँदे,भागय बइला बाट।
बूढ़ी दाई अउ बबा, जावत हाबय हाट।

आगू बइठे हे बबा,धरे काँसड़ा झीक।
घल्लर-घल्लर घंघड़ा,लागत हे बड़ नीक।

बूढ़ी दाई हा कहय,नइ दे बर हे डाँक।
गाड़ी हा उदकत हवय,धीर लगा के हाँक।

कहाँ बात मानय बबा,अगुवावत हे काट।
निकले पाछू वो रहिस,पहुँचय आगू हाट।

सबले पहिली हाट मा,कपड़ा पसरा जायँ।
पटकू पंछा संग मा,लुगरा घलो बिसायँ।

बूढ़ी दाई दोहनी,लय मरकी गंगार।
माँगय नानक ठेकली,राँधे बर हे दार।

चना-फुटेना ओखरा,मुर्रा घलो बिसायँ।
लावय गठरी बाँध के,सबो बाँट के खायँ।

रचनाकार - श्री मनीराम साहू "मितान"
ग्राम - कचलोन (सिमगा) छत्तीसगढ़

Thursday, March 22, 2018

गीतिका छन्द - श्री दिलीप कुमार वर्मा

गीतिका मा गीत -

गीत गाले मीत मोरे,प्रीत के तँय राग मा।
झन जला अंतस अपन तँय,बैर रख मन आग मा।

खुश रहे ले सुख ह मिलथे,दुख़ म बाढ़य ताप जी।
जेन मन सब ला भुलाइन,ते मगन हे आप जी।
जेन रखथे बैर मन मा,खुद जले ओ आग मा।
गीत गाले मीत मोरे,प्रीत के तँय राग मा।

प्यार बाँटे प्यार पाबे,प्यार हर संसार हे।
प्यार बिन जीवन अधूरा,प्यार ही घर द्वार हे।
प्यार तो अहसास होथे,जान अंतस भाग मा।
झन जला अंतस अपन तँय,बैर रख मन आग मा।

देख दुनिया नइ रुकय गा,एक मनखे वासते।
चल चलाचल संग साथी,गम भुला चल हाँसते।
ओ सफल हे जेन चलथे,रुख हवा के साँथ मा।
 जेन उल्टा राह चलथे, कुछ न आवय हाँथ मा।

मान कहना मोर संगी,तोर तब उद्धार हे।
साँथ चल सब संग लेके,देख तब संसार हे।
सुख इहाँ हे दुख़ इहाँ हे,भोग जे हे भाग मा।
सोच के अब तन अपन गा,झन जला अब आग मा।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Wednesday, March 21, 2018

*सरसी छन्द - आशा देशमुख*

सीता हरण

कुटिया तीर सोनहा मिरगा ,चरत चरत हे आय।
देखय जब गा सिया जानकी ,मिरगा बर ललचाय। 1

अति सुंदर मिरगा ला देखय ,जागय मन मा मोह।
नइ जानय बपरी हा कारण,येहा मोर बिछोह।2

बोलत हावय रघुवीरा ला ,मिरगा लावव नाथ।
अइसन सुन्दर नइ देखे हँव,नावत हांवय माथ। 3

कहत हवय जी रघुवीरा हा ,सुन वो सीता बात।
नइ होवय वो सोना मिरगा ,छुपय शत्रु के घात। 4

आघू आघू मिरगा भागे ,पाछू मा रघुबीर ,
येती ओती कूदत फांदत ,भागय जंगल तीर | 5)

 टहक टहक के मुड़ी घुमावय ,फेर दुरिहा जाय ,
बाण धरे रामा हा खोजे ,मिरगा कहाँ लुकाय | 6)

कतका दूर निकलगे दूनो ,जंगल हे घनघोर ।
सरसर करथे पाना डारा ,करय झिंगुर मन शोर | 7)

सोचत हे माया मिरगा हा ,अब बन जाही काम ।
रेंगत हावय थकहा जइसे ,देखत हावय राम |8)

साधत हे अब राम निशाना ,मारत हावय बाण ।
मारीच बने माया मिरगा ,तड़फय ओकर प्राण |9

असल रूप मा आये मिरगा ,सिया लखन चिल्लाय
देखय रामा मायावी ला ,अबड़ अचम्भा खाय | 10

सीता ला लागत हे अइसे ,रामा करे पुकार ।
सुन लक्ष्मण तुँहरे भैया हा ,पारत हे गोहार | 11)

लक्ष्मण हा बोलय सीता ला ,ये सब माया चाल ।
मोरे प्रभु के आघू मैया ,खुदे डराथे काल | 12)

कहाँ सुनय गा बात सिया हा ,शंका मा बड़ रोय
बरपेली वोहा लक्ष्मण ला ,तुरते उहाँ पठोय | 13)

रक्षा रेखा खीच लखन हा ,दउड़त जंगल जाय
अब येती गा पर्णकुटी मा ,भारी विपदा आय | 14)

सबो खेल ला जेन रचे हे ,वो रावण अब आय ।
छल कपट के झोला धरके ,साधू रूप बनाय |15)

लक्ष्मण रेखा के भीतर मा ,साधू पांव मढ़ाय ।
उठय उहाँ आगी के ज्वाला ,रावण देख डराय |16)

भिक्षा दे दे द्वार खड़े हव ,कपटी ह गोहराय |
देखय साधू ला कुटिया मा ,सीता भिक्षा लाय | 17)

भीतर रहिके दान करत हस ,होय मोर अपमान ।
साधू कहत हवय सीता ला ,नइ लेवव मैं दान | 18)

साधू मान रखे बर सीता ,जइसे बाहिर आय ।
असल रूप में आए रावण ,देखत सिया डराय 19)

सिया हरण करके रावण हा ,बैठ विमान उड़ाय
रोवत हे अबला नारी हा ,राम राम चिल्लाय 20)

रचनाकार - आशा देशमुख
एन टी पी सी, कोरबा

Tuesday, March 20, 2018

कुण्डलिया छन्द - शकुन्तला शर्मा,

गौरैय्या बचावव -

(1)
गौरैय्या मन मा गुनै, खाए बर दव धान
अपने मा बौराय हव, मोर बचावव प्रान।
मोर बचावव प्रान, सुखावत हावै पोटा
मुश्किल मा हे जान, सबो टूटै परकोटा।
सब्बो जीव समान, कहिस बलदाऊ भैया
खाए बर दव धान, गुनै मन मा गौरैया।

(2)
गौरैय्या - खाही बने, देहे हाववँ भात
भुखही हावै खात हे, दाल भात हे तात।
दाल भात हे तात, फूँक के खावत हावै
मोरे टठिया तीर, बैठ के बढिया खावै।
संगी कस दिन रात, खेलथन भूल भुलैया
देहे हाववँ भात, बने खाही गौरैय्या।

रचनाकार -  शकुन्तला शर्मा,
भिलाई, छत्तीसगढ़

Monday, March 19, 2018

कुकुभ छंद - श्री जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

आबे महामाई अँगना

आबे  दाई  अँगना  मोरे, बोये  हौं  जोत  जँवारा।
मगन हवे घर भरके मनखे,मगन हवे आरा पारा।

घर दुवार हा लिपा छभागे,बरगे बड़ रिगबिग जोती।
हूम   धूप   के  धुँवा  उड़ावै,लागे   जइसे  सुरहोती।
केरा  खाँम  गड़े घर आघू,लहरावय ध्वजा पताका।
हाँस हाँस लइका मन खेले,नाचय पारय बड़ हाँका।
तोरन ताव सजे सब कोती,खोंचाये आमा डारा।
आबे  दाई  अँगना  मोरे,बोये  हौं  जोत  जँवारा।

सइमो सइमो करे दुवारी,सबके हे आना जाना।
लाली  कारी स्वेत पताका,माड़े हे लीम्बू बाना।
झाँझ मँजीरा माँदर बाजे,होवै जपतप जस सेवा।
पंडा  नाचे   सेउक  नाचे,नाचे  आके   सब  देवा।
सुवा परेवा गीत सुनावै,बाँटत हे कँउवा चारा।
आबे  दाई  अँगना  मोरे,बोये हौं जोत जँवारा।

टिकली  फुँदरी  माला  मुँदरी,चघे सबो ओरी पारी।
खीर पुड़ी पकवान चढ़ावैं,सबझन भरभर के थारी।
चैत महीना लागे पावन,मन ला भाये पुरवाही।
देबे  दर्शन  तैंहा  माई,तन  मन  तब्भे  हर्षाही।
गूँजत हावय चारो कोती,जय माता दी के नारा।
आबे  दाई  अँगना  मोरे,बोये  हौं  जोत जँवारा।

रचनाकार - श्री जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, March 16, 2018

विष्णु पद छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

अहंकार

अहंकार के दानव बर तैं,तीर कमान उठा।
ले  डुबही एहर तोला गा,हावस  धरे मुठा।

धन दौलत अउ माल खजाना,बइरी तोर बने।
जेखर  तीर  म  एहर  होथे , रहिथे  देख तने।

इही हरे जड़ अहंकार के,झगरा इही करे।
बाढ़त  रहिथे  तन भीतर,रहिबे  कहूँ धरे।

होथे  शुरू मोर अउ मैं  ले ,आखिर लड़े मरे।
पनपन झन दे अहंकार ला,इही बिगाड़ करे।

मनखे के मन मति छरियाथे,बोली जहर बहे।
खाथे बिन बिन मीत मया ला,एहर जिहा रहे।

अपन सुवारथ बर दूसर ला,फाँसे फेक गरी।
कटरे दाँत फोकटे फोकट ,मसकत हवे नरी।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को, छत्तीसगढ़

Thursday, March 15, 2018

आल्हा छन्द - शकुन्तला शर्मा

जीव जगत कतका अचरज हे, कतका सुग्हर हे दिन रात
कतका सुग्हर केशर रज हे, मनभावन रिमझिम बरसात।

मनखे मन बर हे सुख साधन, कर्म नाव के हे तलवार
नीति नेम के हावै बंधन,भगवत महिमा अपरंपार।

कर्म बनै सुख दुख के कारण, काला देबे तयँ हर दोष
झन कर अधम कर्म कर बारन, तोला मिल जाही संतोष।

भाव घला सुख दुख ला देथे, कर्म भाव के बनय मितान
भाव कर्म ला बहुत बिटोथे, भावे मा बसथे भगवान।

भाव भावना उज्जर राखव, एही करही बेडा पार
पलपल अंतर्मन मा झाँकव,जानौ ए जीवन के सार।

बडे भाग ले तैंहर पाए, मनखे के चोला अनमोल
कर्म धर्म के महिमा गाए, आज कर्म के गठरी खोल।

सबके हित के बात करौ अब, खुद जानौ जस के दस द्वार
एक संग मिलके रेंगव सब, हर मुश्किल के पाहव पार।

जिहाँ समस्या समाधान हे, सूझ बूझ मा हे कल्यान
जिहाँ धरा हे आसमान हे, खोज खोज के तैंहर जान।

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Wednesday, March 14, 2018

लावणी छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"

श्रद्धा के सुरता माँ मिनी माता

भारत माँ के हीरा बेटी,ममतामयी मिनी माता।
तै माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।

सुरता हे उन्नीस् सौ तेरा, मार्च माह तारिक तेरा।
देवमती बाई के कुँख ले,जन्म भइस रतिहा बेरा।

खुशी बगरगे चारो-कोती,सुख आइस हे दुख जाके।
ददा संत बड़ नाचन लागे,बेटी ला कोरा पाके।

सुख अँजोर धर आइस बेरा,कटगे अँधियारी राता।
तै माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।

छट्ठी नामकरण आयोजन,बनिन गाँव भर के साक्षी।
मछरी सही आँख हे कहिके,नाँव धराइन मीनाक्षी।

गुरु गोसाई अगम दास जी,गये रहिन आसाम धरा।
शादी के प्रस्ताव रखिन हे,उही समय परिवार करा।

अगम दास गुरु के पत्नी बन,मिलहिस नाँव मिनी माता।
तैं माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।

सन उन्नीस् सौ इंक्यावन मा,अगम लोक गय अगम गुरू।
खुद के दुख ला बिसर करे तैं,जन सेवा के काम शुरू।

बने प्रथम महिला सांसद तैं,सारंगढ़ छत्तीसगढ़ ले।
तोर एक ठन रहै निवेदन,जिनगी बर कुछ तो पढ़ ले।

पढ़े लिखे ला काम दिलावस,सरकारी खुलवा खाता।
तैं माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।

जन्म भूमि आसाम रहिस हे,कर्म भूमि छत्तीसगढ़ ओ।
शोषित ला अधिकार दिलावस,शासन ले माँ लड़ लड़ ओ।

अस्पृश्यता दहेज निवारण,दुनो विधेयक पेश करे।
समरसता के धरके आगी,भेद भाव ला लेस डरे।

सूत्रधार बाँगो बाँधा के,करुणामयी मिनी माता।
तै माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।

सन उन्नीस् सौ बछर बहत्तर,महिना तिथि अगस्त ग्यारा।
वायु यान के दुर्घटना ले,सन्नाटा पसरे झारा।

एक सत्य हे काल जगत मा,कहिथें सब ज्ञानी ध्यानी।
समय रहत कर ले सत कारज,के दिन के ये जिनगानी।

अंतस बर श्रद्धा के सुरता,छोड़ चले तैं गुरु माता।
तैं माँ हम संतान तोर ओ,बनगे हे पावन नाता।


रचनाकार-       श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
                     गोरखपुर,कवर्धा
                     

Monday, March 12, 2018

हरिगीतिका छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

सत उपदेश

किरपा करे कोनो नही,बिन काम होवै नाम ना।
बूता  घलो  होवै  बने,गिनहा मिले जी दाम ना।
चोरी  धरे  धन  नइ पुरे,चाँउर  पुरे  ना दार जी।
महिनत म लक्ष्मी हा बसे,देखौ पछीना गार जी।

संगी  रखव  दरपन  सहीं,जेहर दिखावय दाग ला।
गुणगान कर धन झन लुटै,धूकै हवा झन आग ला।
बैरी  बनावौ  मत  कभू,राखौ  मया नित खाप के।
रद्दा बने चुन के चलौ,अड़चन ल पहिली भाँप के।

सम्मान दौ सम्मान लौ,सब फल मिले इहि लोक मा।
आना  लगे  जाना लगे,जादा  रहव   झन  शोक मा।
सतकाम बर आघू बढ़व,संसो फिकर  ला छोड़ के।
आँखी उघारे नित रहव, कतको खिंचइया गोड़ के।

बानी   बनाके  राखथे ,नित  मीठ  बोलव  बोल गा।
अपने खुशी मा हो बिधुन,ठोंकव न जादा ढोल गा।
चारी   करे   चुगली   करे ,आये   नही  कुछु  हाथ  मा।
सत आस धर सपना ल गढ़,तब ताज सजही माथ मा।

पइसा रखे  कौड़ी  रखे,सँग  मा रखे नइ ग्यान गा।
रण बर चले धर फोकटे,तलवार ला तज म्यान गा।
चाटी  हवे   माछी  हवे , हाथी  हवे  संसार  मा।
मनखे असन बनके रहव,घूँचव न पाछू हार मा।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा) छत्तीसगढ़

Thursday, March 8, 2018

आल्हा छंद श्री मोहन कुमार निषाद

बैरी लाहो झनले

हमर मितानी देखत बैरी , हमला झन समझव कमजोर ।
भारत माँ के बेटा अन हम , निछ देबो खर्री ला तोर ।

हितवा मनके संगी हन हम , बैरी मनबर सउहत काल ।
जादा लाहो झन लेबे तँय , वीर हवन हम माँ के लाल ।

आघू आघू ले तँय बैरी , फोकट मा रे झन फुफकार ।
जाग जही जब हमर देश हर , देही तोला तुरते मार ।।

डरके मारे काँपत काँपत , रोवत रहिथे तोर जवान ।
आन मान बर हम लड़ जाथन , सीमा मा सीना ला तान ।।

कतको तोला हन समझाये , समझ तोर नइ आवय बात ।
भूत असन हावस तँय हर रे , पड़ही कोर्रा जूता लात ।।

फेर कहूँ तँय आबे बैरी , नइ बाचय अब तोर परान ।
परन करे हँन हम सब मिलके , सदा करत रहिबो गुणगान ।।

       
  रचनाकार  मोहन कुमार निषाद
   लमती भाटापारा छत्तीसगढ़