Sunday, March 25, 2018

बरवै छंद - शकुन्तला शर्मा

रामनवमी -

देख राम - नवमी ए, बडे - तिहार
सबके दुख ला समझिस बारम्बार।

राम बनिस जन जन के, मन के भाव
सब झन ला तारत हे, बन के नाव।

शबरी घर मा आइस, चीन्हिस प्रेम
जूठा बोइर खाइस, निभ गिस नेम।

शबरी तरगे चल दिस, गंगा धाम
जपते रहिस बरोबर, राजा राम।

देख दोनिया रुख ला, शबरी गाँव
आजो कथे कहानी, परथन पाँव।

महा - नदी ए गंगा, चलव नहाव
वाल्मीकि के डेरा, माथ नवाव।

तुरतुरिया मा लवकुश, बासी खाँय
अश्व मेध के घोडा, बिकट कुदाँय।

मान सिया के बहुरिस, अतका जान
भुइयां भीतर चल दिस, रोइस प्रान।

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा,
भिलाई, छत्तीसगढ़

7 comments:

  1. बढ़िया बरवै दीदी बधाई हो

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  2. अब्बड़ सुग्घर बरवै छंद दीदी जय जय श्री राम सादर प्रणाम बड़की दीदी

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  3. वाह दीदी सुग्घर बरवै छन्द जय जय श्री राम

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  4. दीदी जी ला सादर प्रणाम।
    लाजवाब बरवै छन्द।

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  5. बहुत सुग्घर बरवै छंद के रचना करे हव दीदी। सादर प्रणाम अउ बधाई।

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  6. लाजवाब बरवै छंद दीदी।सादर प्रणाम

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  7. जवाब नही दीदी।बेहद सुघ्घर।सादर पायलागी

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