Friday, March 16, 2018

विष्णु पद छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

अहंकार

अहंकार के दानव बर तैं,तीर कमान उठा।
ले  डुबही एहर तोला गा,हावस  धरे मुठा।

धन दौलत अउ माल खजाना,बइरी तोर बने।
जेखर  तीर  म  एहर  होथे , रहिथे  देख तने।

इही हरे जड़ अहंकार के,झगरा इही करे।
बाढ़त  रहिथे  तन भीतर,रहिबे  कहूँ धरे।

होथे  शुरू मोर अउ मैं  ले ,आखिर लड़े मरे।
पनपन झन दे अहंकार ला,इही बिगाड़ करे।

मनखे के मन मति छरियाथे,बोली जहर बहे।
खाथे बिन बिन मीत मया ला,एहर जिहा रहे।

अपन सुवारथ बर दूसर ला,फाँसे फेक गरी।
कटरे दाँत फोकटे फोकट ,मसकत हवे नरी।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को, छत्तीसगढ़

22 comments:

  1. विष्णु छंद ला गाबो हम तो, गुरतुर लागत हे
    सब झन जाबो मोद मनाबो, मन सुरतावत हे।

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  2. बड़ सुघर विष्णुपद छंद भैया जी

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  3. वाह वाह जितेंद्र जी। लाजवाब विष्णुपद छंद हावय।हार्दिक बधाई।

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    1. पायलागी गुरुजी

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  4. बहुत सुग्घर अउ लाजवाब विष्णु पद छंद हे भैया। बधाई अउ शुभकामना।

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  5. वाह्ह वाह्ह शानदार विष्णु पद छंद हे सरजी।सादर बधाई

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  6. वाह्ह वाह्ह शानदार विष्णु पद छंद हे सरजी।सादर बधाई

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  7. वाहःहः भाई जितेंन्द्र
    बहुत बढ़िया सृजन

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  8. वाह भईया जी... बहुत बहुत बधाई हो

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  9. वाह भईया जी... बहुत बहुत बधाई हो

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  10. शानदार सर जी बधाई हो

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  11. शानदार सर जी बधाई हो

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  12. अब्बड़ सुघ्घर विष्णुपद छंद हे भाई

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  13. गजब सुघर रचना विष्णुपद छंद विधा म सर जी हार्दिक बधाई।

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    1. धन्यवाद भैया जी

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