Wednesday, April 4, 2018

हरिगीतिका छंद - श्री मनीराम साहू "मितान"

(1)
तैं हरि चरन मा मन लगा,ये पाप रद्दा छोंड़ के।
मिलही खुशी बड़ देख ले,प्रभु ले नता ला जोड़ के।
झन बूड़ संगी झूठ मा,तैं फँस जबे मँझधार मा।
ये फोकला मा झन भुला,रम जा बने गा सार मा।

(2)
ऊँचा महल दौलत नँगत,नइ थोरको ये काम के।
भागे गजब धन पाय बर,पीछू दँउड़ तैं राम के।
चक्कर परे मा मोह के,नइ होय बेंड़ा पार गा।
बेरा रहत करले जतन,झन कर समे बेकार गा।

(3)
अंतस भरे इरखा कपट,दुरगुन सबो ला त्याग गा।
करले करम सच हा फलै,काबर सुते हच जाग गा।
जी झन अपन बर तैं कभू,करले बुता उपकार के।
पाबे मया अइसन करे,अासीस मिलही चार के।

रचनाकार - श्री मनीराम साहू "मितान"
ग्राम कचलोन (सिमगा) छत्तीसगढ़

11 comments:

  1. बहुत सुग्हर छंद, मनीराम।

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  2. मनी भाई के सुग्घर हरिगीतिका छन्द ।हार्दिक बधाई।

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  3. सुग्घर हरिगीतिका मितान जी

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  4. सुग्घर हरिगीतिका मितान जी

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  5. आप सब ला बहुत बहुत धन्यवाद आभार

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  6. वाह्ह्ह वाह्ह् अति सुन्दर हरिगीतिका के सृजन "मितान" सर।

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  7. वाह वाह सर जी अति सुघ्घर

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  8. मनी भाई बहुत सुघ्घर हरिगीतिका आप ल बहुत बहुत बधाई

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  9. वाह वाह बेहतरीन हरिगीतिका छंद के सृजन करे हव "मितान "भैया जी। बधाई अउ शुभकामना।

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  10. शानदार रचना सर।सादर बधाई

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  11. शानदार रचना सर।सादर बधाई

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