Monday, May 28, 2018

मनहरण घनाक्षरी - श्री जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 भोला बिहाव -

अँधियारी रात मा जी,दीया धर हाथ मा जी,
भूत  प्रेत  साथ  मा  जी ,निकले  बरात  हे।
बइला  सवारी  करे,डमरू  त्रिशूल धरे,
जटा जूट चंदा गंगा,सबला  लुभात हे।
बघवा के छाला हवे,साँप गल माला हवे,
भभूत  लगाये  हवे , डमरू  बजात  हे।
ब्रम्हा बिष्णु आघु चले,देव धामी साधु चले,
भूत  प्रेत  पाछु  खड़े,अबड़ चिल्लात  हे।


टोनही झूपत हवे,कुकुर भूँकत हवे,
भोला के बराती मा जी,सरी जग साथ हे।
मूड़े मूड़ कतको के,कतको के गोड़े गोड़,
कतको के आँखी जादा,कोनो बिन हाथ हे।
कोनो हा घोंड़ैया मारे,कोनो उड़े मनमाड़े,
जोगनी परेतिन के ,भोले बाबा नाथ हे।
देव सब सजे भारी,होवै घेरी बेरी चारी,
अस्त्र शस्त्र धर चले,मुकुट जी माथ हे।

काड़ी कस कोनो दिखे,डाँड़ी कस कोनो दिखे,
पेट  कखरो  हे  भारी,एको  ना सुहात हे।
कोनो जरे कोनो बरे,हाँसी ठट्ठा खूब करे,
नाचत  कूदत  सबो,भोले  सँग  जात हे।
घुघवा हा गावत हे, खुसरा उड़ावत हे,
रक्सा बरत हावय,दिन हे कि रात हे।
हे मरी मसान सब,भोला के मितान सब,
देव  मन  खड़े  देख,अबड़  मुस्कात हे।

गाँव  मा  गोहार  परे,बजनिया सुर धरे,
लइका सियान सबो,देखे बर आय जी।
बिना  हाथ  वाले  बड़,पीटे गा दमऊ धर,
बिना गला वाले देख,गीत ला सुनाय जी।
देवता लुभाये मन,झूमे देख सबो झन,
भूत प्रेत सँग देख,जिया  घबराय जी।
आहा का बराती जुरे,देख के जिया हा घुरे
रानी  राजा तीर जाके,बड़ खिसियाय जी।

फूल कस नोनी बर,काँटा जोड़ी पोनी बर,
रानी कहे राजा ला जी,तोड़ दौ बिहाव ला
करेजा के चानी बेटी,मोर देख रानी बेटी,
कइसे  जिही  जिनगी,धर  तन घाव ला।
पारबती  आये  तीर,माता  ल  धराये धीर,
सबो जग के स्वामी वो,तज मन भाव ला।
बइला  सवारी  करे,भोला  त्रिपुरारी  हरे,
माँगे हौ विधाता ले मैं,पूज इही नाव ला।

बेटी  गोठ  सुने  रानी,मने  मन  गुने  रानी,
तीनो लोक के स्वामी हा,मोर घर आय हे।
भाग सँहिरावै बड़,गुन गान गावै बड़,
हाँस मुस्काय सुघ्घर,बिहाव रचाय हे।
राजा घर माँदीं खाये,बराती सबो अघाये,
अचहर    पचहर , गाँव   भर   लाय   हे।
भाँवर टिकावन मा,बार तिथि पावन मा,
पारबती हा भोला के,मया मा बँधाय हे।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया
बाल्को(कोरबा)  छत्तीसगढ़ 

Wednesday, May 23, 2018

आल्हा छंद - श्री कन्हैया साहू अमित

24 मई जेठ दसमी वीर आल्हा जयंती -

*** *कथा प्रसंग* ***

हे गनेस तैं सबद बरन दे, सदा सहायक सारद माय।
हाँथ धरे हँव तुँहर लेखनी, अक्छर-अक्छर 'अमित' लिखाय।~1

जोंड़ जाँड़ के आखर-आखर, लिखय 'अमित' अँड़हा मतिमंद।
गुरु किरपा के बरसे बरसा, तभे लिखत हँव आल्हा छंद।~2

अब्बड़ अद्भुत अलखा आल्हा, अलहन अलकर टार मिटाय।
अटकर अजरा अलवा-जलवा, अड़हा अगियानी का बताय।~3

महाबीर बन जनमें आल्हा, बाहुबली ये 'अमित' कहाय।
जोश जवानी जउँहर जिनगी, सुन के कायर लड़ मर जाय~4

आल्हा ऊदल दू झन भाई, रहँय महोबा बीर महान।
गाँव-गाँव मा गाथैं गाथा, आल्हा ऊदल जस गुनगान।~5

धरमराज अवतारी आल्हा, भीम सहीं ऊदल दमदार।
लड़ें लडा़ई बावन ठन जी, जिनगी भर नइ जानिन हार।~6

कौरव पांड़व कुल हा जूझे, लड़गे कुरूक्षेत्र मैदान।
जनम धरें कलजुग मा दूनों, आल्हा ऊदल होंय महान।~7

जस गुन गावँव इन जोद्धा के, हमरे बस के नइहे बात।
जेखर कीरति घर-घर बगरे, जस गाथा गावँय दिन रात।~8

** *आल्हा के जनम* **

*जेठ महीना दसमी* जनमे, आल्हा देवल पूत कहाय।
बन जसराज ददा गा सेउक, गढ़ चँदेल के हुकुम बजाय।~9

ददा लड़त जब सरग सिधारे,आल्हा होगे एक अनाथ।
दाई  देवल परे  अकेल्ला, राजा रानी  देवँय  साथ।~10

तीन महीना पाछू जनमे, बाप जुद्ध में जान गवाँय।
बीर बड़े छुट भाई आल्हा, ऊधम ऊदल नाँव धराय।~11

राजा परमल पोसय पालय, रानी मलिना राखय संग।
राजमहल मा खेंलँय खावँय, आल्हा ऊदल रहँय मतंग।~12

सिक्छा-दीक्छा होवय सँघरा, लालन-पालन पूत समान।
बड़े बहादुर बलखर बनगे, लागँय राजा के संतान।~13

बड़े लड़इया आल्हा ऊदल, जेंखर बल के पार न पाय।
रक्छक बन परमाल देव के, आल्हा ऊदल जान लुटाय।~14

आल्हा संगी सिधवा मितवा, नइहे चोला एको दाग।
थरथर कापँय कपटी खोड़िल,बैरी बर बड़ बिखहर नाग।~15

बन चँदेल राजा के सेउक, अपन हँथेरी राखँय प्रान।
नित चँदेल हो चौगुन चाकर, दुनिया भर मा बाढ़य शान।~16

'अमित' महोबा के बलवंता, आल्हा आगू कोन सजोर।
बाढ़त नदियाँ पूरा पानी, पुन्नी कस चन्दा अंजोर।~17

झगरा माते बात-बात मा, मार काट अउ हाहाकार।
पोठ लहू के होरी होवय, पवन सहीं खड़कय तलवार।~18

काँही तो नइ भावय इनला, रास रंग अउ तीज तिहार।
फड़फड़ फरकय भक्कम भुजबल, रहँय जुद्ध बर बीर तियार।~19

सुते नींद नइ आवय दसना, बड़ बज्जर बलखर बलबीर।
लड़त-लड़त बीतय दिन रतिहा, दँय झट बैरी छाती चीर।~20

राजपाट राजा रज रक्छक, आल्हा नइ तो चिटिक अबेर।
कुकुर कोलिहा सौ का करहीं, आल्हा ऊदल बब्बर शेर।~21

सतरा बछर उमर मा होवय, आल्हा के शुभ लगन बिहाव।
नैनागढ़  नेपाली  राजा,  बेटी  मछला  संग  धराव।~22

राजकुमारी मछला जानय, जादू के जब्बर जर ग्यान।
नाँव सोनवा मछला जानव, रहय एक नइ इँखर समान।~23

बीर बहादुर बघवा बेटा, मछला आल्हा के संतान।
बाप कका कस बड़ बलवंता, इंदल बरवाना बलवान।~24

**आल्हा के पराक्रम**

राग रागिनी नइ तो भावय, राजमहल अब नइच सुहाय।
बोल बचन सुन महतारी के, बेटा बाघ मार घर लाय।~25

आज बाघ कल बैरी मारव, तब छतिया के दाह बुताय,
बिन अहीर के मैं नइ मानँव, दाई ताना इही सुनाय।~26

जेखर बेटा कायर निकले, महतारी रो-रो पछताय।
सुनव दुनों तुम आल्हा ऊदल, असल पूल जे बचन निभाय।~27

कुकुर बछर बारा बस जीयय, जीयय सोला साल सियार।
बरिस अठारा छत्री जीये, आगू के जिनगी धिक्कार।~28

मूँड़ टँगागे बाप कका के, माँडूगढ़ बर रुख के डार।
अधरतिया के अध बेरा मा, मूँड़ी बड़ पारय गोहार।~29

आवव आल्हा ऊदल आवव, मोर लड़ंका लठिया लाल।
बँच के आहू माँडूगढ़ मा, बन बघेल के जी के काल।~30

खूब लड़इया लहुआ आल्हा, दूसर ले देवी बरदान।
भगत भवानी सारद माँ के, जइसे सीया के हनुमान।~31

बइठ बछर बारा बन तपसी, मैहर माई के दरबार।
मूँड़ काट अरपन देवी ला, होय अमर आल्हा अवतार।~32

आल्हा ऊदल चलथें अइसे, जइसे रामलखन चलि जाय।
भुजबल भारी भक्कम भइगे, आँखी भभका कस भमकाय।~33

आल्हा ऊदल सिरतों सेउक, समझँय येला अपन सुभाग।
धरम करम हे राजपूत के, लड़त-लड़त दँय प्रान तियाग।~34

धरम धजा कस उड़े पताका, नाँव धराये हे अलहान।
सूरुज बूड़य बुड़ती बेरा, नइ बूड़े आल्हा के शान।~35

जीत-जीत के जिनगी जीयँय, जउँहर जोद्धा जय जयकार।
जेखर बैरी जीयँत जागय, ओखर जिनगी हा बेकार।~36

रन मा आल्हा करँय सवारी, पुष्यावत हाथी के नाँव,
खदबिद-खदबिद घोडा़ दउँड़े, कहाँ थोरको माढ़य पाँव।~37

देशराज बर खाये किरिया, आल्हा जोरय जम्मों जात।
एकमई सब राहव काहय, भेदभाव के छोड़व बात।~38

सबके हितवा आल्हा ऊदल, परहित मा ये भरँय हुँकार।
रक्छक बहिनी महतारी के, बैरी के कर दँय सरी उजार।~39

आल्हा ऊदल बड़ बलिदानी, राज महोबा के बिसवास।
करनी अइसन करें तियागी, अमर नाँव लिखगे इतिहास।~40

रचनाकार - श्री कन्हैया साहू "अमित"*
शिक्षक ~भाटापारा, छत्तीसगढ़
संपर्क ~ 9200252055

Saturday, May 12, 2018

चौपइया छन्द - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान

चल तरिया जाबो, खूब नहाबो, तउड-तउड़ के संगी ।
खूब मजा पाबो, दम देखाबो, नो हय काम लफंगी ।।
तउड़े ले होथे, काया पोठे, तबियत सुग्घर रहिथे ।
पाछू सुख पाथे, तउड़ नहाथे, आज झेल जे सहिथे ।।

जब तरिया जाबे, संगी पाबे, चार गोठ बतियाबे ।
गोठ गोठियाबे, मया बढ़ाबे, पीरा अपन सुनाबे ।।
दूसर के पीरा, सुनबे हीरा, मनखे बने कहाबे ।
घर छोड़ नहानी, करत सियानी, तरिया जभे नहाबे ।।

हे लाख फायदा, देख कायदा, धरती बर तरिया के ।
धरती के पानी, धरे जवानी, बड़ झूमे छरिया के ।।
पानी के केबल, वाटर लेबल, तरिया बने बनाथे ।
बाते ला मानव, ये गुण जानव, कहिदव तरिया भाथे ।।

रचनाकार - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान
नवागढ़ (बेमेतरा) छत्तीसगढ़ 

Friday, May 11, 2018

आल्हा छन्द - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"

"पेंड़ लगाहौं करके चेत" -

सुरुज नरायण क्रोधित होगय,गुस्सा अपन दिखावै आज।
आगी बरसावै बादर ले,अब गा कोन बचाही लाज।

रुखराई ला काट डरे हन,बनके लोभी मुरुख गँवार।
अब काखर छँइहा सुसताबो,सुनही भैया कोन पुकार।

रुखराई बिन ये भुँइया के,पीरा हरही कोन सियान।
मनखे मुक्का बन बैठे हे,ठेठा डारे हावय कान।

करलाई होगे जिनगी के,घोर बिपत्ती टारय कोन।
अँतस पूछै सच्चाई ला,अब तयँ कहाँ लगाबे फोन।

काम बुता बर घर ले निकलव,भुँमरा चटचट जरथे पाँव।
घाम झकोरा परे उपर मा,लहकत जिनगी खोजय छाँव।

पानी खोजै घूम घूम के,खोजै ठउर ठिकाना जाय।
नदिया नरवा बोरिंग तरिया,पानी कहूँ नजर ना आय।

सोंचत हावय बइठे बइठे,ये सब करनी के फल आय।
बड़ इतराये हस तँय मानुष,गोठ गँवारी समझ म आय।

करनी अइसन अब मँय करिहौ,गाँव गली सँग हाँसय खेत।
धरती के सिंगार करे बर,पेंड लगाहौं करके चेत।

रचनाकार - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
              गोरखपुर,कवर्धा

आल्हा छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

वीर महाराणा प्रताप -

जेठ   अँजोरी   मई   महीना,नाचै   गावै   गा  मेवाड़।
बज्र शरीर म बालक जन्मे,काया दिखे माँस ना हाड़।

उगे उदयसिंह के घर सूरज,जागे जयवंता के भाग।
राजपाठ के बने पुजारी,बैरी मन बर बिखहर नाग।

अरावली पर्वत सँग खेले,उसने काया पाय विसाल।
हे हजार हाथी के ताकत,धरे  हाथ  मा  भारी भाल।

सूरज  सहीं  खुदे  हे  राजा,अउ संगी हेआगी देव।
चेतक मा चढ़के जब गरजे,डगमग डोले बैरी नेव।

खेवन हार बने वो सबके,होवय जग मा जय जयकार।
मुगल राज सिंघासन डोले,देखे अकबर  मुँह ला फार।

चले  चाल अकबर तब भारी,हल्दी घाटी युद्ध रचाय।
राजपूत मनला बहलाके,अपन नाम के साख गिराय।

खुदे रहे डर मा खुसरे  घर ,भेजे  रण मा पूत सलीम।
चले महाराणा चेतक मा,कोन भला कर पाय उदीम।

कई हजार मुगल सेना ले,लेवय लोहा कुँवर प्रताप।
भाला भोंगे  सबला भारी,चेतक के गूँजय पदचाप।

छोट छोट नँदिया हे रण मा,पर्वत ठाढ़े हवे  विसाल।
डहर तंग विकराल जंग हे, हले घलो नइ पत्ता डाल।

भाला  धरके किंजरे रण मा, चले बँरोड़ा संगे संग।
बिन मारे बैरी मर जावव,कोन लड़े ओखर ले जंग।

धुर्रा  पानी  लाली होगे,बिछगे  रण  मा  लासे लास।
बइरी सेना काँपे थरथर,छोड़न लगे सलीम ह आस।

जन्मभूमि के रक्षा खातिर,लड़िस वीर बन कुँवर प्रताप।
करिस नहीं गुलामी कखरो,छोड़िस भारत भर मा छाप।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795


Wednesday, May 9, 2018

रूपमाला छन्द - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान

नानपन ले काम करव -

आज करबे काल पाबे, जानथे सब कोय ।
डोलथे जब हाथ गोड़े, जिंदगी तब होय ।।
काम सुग्घर दाम सुग्घर, मांग लौ दमदार ।
काम घिनहा दाम घिनहा, हाथ धर मन मार ।।

डोकरापन पोठ होथे, ढोय पहिली काम ।
नानपन ले काम करके, पोठ राखे चाम ।।
नानपन मा जेन मनखे, लात राखे तान ।
भोगही ओ काल जूहर, बात पक्का मान ।।

नानपन ले काम कर लौ, देह होही पोठ ।
आज के ये तोर सुख मा, काल दिखही खोट ।।
कान अपने खोल सुन लौ, आज दाई बाप ।
खेल खेलय तोर लइका, मेहनत ला नाप ।।

देह बर तो काम जरुरी, बात पक्का मान ।
खेल हा तो काम ओखर, गोठ सिरतुन जान ।।
तोर पढ़ई काम भर ले, बुद्धि होही पोठ ।
काम बिन ये देह तोरे, होहि कइसे रोठ ।।

खेल मन भर नानपन मा, खोर अँगना झाक ।
रात दिन तैं फोर आँखी, स्क्रीन ला मत ताक ।।
नानपन ले जेन जानय, होय कइसे काम ।
झेल पीरा आज ओ तो, काल करथे नाम ।।

रचनाकार - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान
नवागढ़ (बेमेतरा) छत्तीसगढ़)

Monday, May 7, 2018

चौपई छंद :- - श्री जगदीश "हीरा" साहू

*ट्रैफिक सिग्नल देख के*

संगी सिरतों कहना मान। हवय कीमती सबके जान।
गाड़ी चलत हवय अनलेख। रेंगव ट्रैफिक सिग्नल देख।।1।।

हरा कहत हे जल्दी जाव। कहय पींवरा धीरे आव।।
लाल कहय तुरते रुक जाव। जानव येला उमर बढ़ाव।।2।।

डेरी बाजू रेंगत जाव। कभू कहूँ धोखा नइ पाव।।
सड़क नियम ला जानव आज। इही हवय गा सुख के राज।।3।।

करना हवय सड़क ले पार। पहिली दाँया देखव यार।।
फेर देख लव बाँया ओर। आगू देखव उहाँ अगोर।।4।।

खाली हे जब दूनों छोर। पार करव जी कोरे-कोर।।
रस्ता देखत हे परिवार। इही बात हे जग मा सार।।5।।

चढ़व साइकिल करके चेक। राहय जेमा पुख्ता ब्रेक।
अलवा-जलवा ला दव फेंक। नइते राखव घर मा छेंक।।6।।

गाड़ी झन चलावव रेस। मारव झन गा ओमा टेस।।
बस दूये झन चढ़के जाव। जिनगी भर जी मजा उड़ाव।।7।।

हेलमेट जे राहय ठीक। रोज लगावव होवय नीक।।
करव कभू झन ओवरटेक। झनकर जल्दी कभू अतेक।।8।।

दारू पीके जेन चलाय। दुर्घटना ला अपन बलाय।।
जे गाड़ी मा करथे होड़। घर बइठय वो हड्डी तोड़।।9।।

मानुस जीवन हे अनमोल। रेंगव सबझन आँखी खोल।।
दिये हवय सबला भगवान। अपन बरोबर सबला मान।।10।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़

Sunday, May 6, 2018

हरिगीतिका छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर "अँजोर"

"होही सदा फुरमान"

दाई ददा के पाँव छू,परगट खड़े सतनाम जी।
आशीष लेके जाय मा,होथे सफल सब काम जी।
सँउहे म चारो धाम हे,सँउहे गुरू के ज्ञान हे।
पबरित चरन परताप हे,मूरत बसे भगवान हे।

बेटा अपन माँ बाप के,करले बिनय करजोर गा।
खुश हो जही भगवान हा,बिगड़ी बनाही तोर गा।
खच्चित पहुँचिहौ ठाँव मा,अंतस धरौ बिसवाँस जी।
पाहौ सदा आशीष ला,जिनगी म जब तक साँस जी।

जाथस कहाँ गा छोड़ के,पुरखा पहर के गाँव ला।
पाबे कहाँ संसार मा,अइसन मया के ठाँव ला।
दाई ददा के संग हा,जिनगी म सुख के खान जी।
मूड़ी म रइही हाँथ ता,होही सदा फुरमान जी।

रचनाकर - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर "अँजोर"
              गोरखपुर,कवर्धा
               04/05/2017

Thursday, May 3, 2018

अमृतध्वनि छन्द - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान

कटय बिमारी शुगर के, करू करेला राँध ।
रोटी भर खाना हवय, अपन पेट ला बाँध ।।
अपन पेट ला,  बाँध रखे हँव, लालच छोड़े ।
गुरतुर-गुरतुर, स्वाद चिखे बर, मुँह ला मोड़े ।।
लीम बेल अउ, तुलसी पत्ता, हे गुणकारी ।
रोज बिहनिया, दउड़े ले तो, कटय बिमारी ।।

रचनाकार - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान 
मिश्रापारा,नवागढ़
जिला-बेमेतरा (छ.ग.)
मो.9976069545

Wednesday, May 2, 2018

कुण्डलिया छन्द - श्री जगदीश "हीरा" साहू

बिहाव -

*मड़वा*
बेटा के मड़वा सजे,  छाये डूमर डार।
बाजय बाजा झूम के, नाचय सब परिवार।।
नाचय सब परिवार, कका काकी अउ मामी।
दीदी भाँटो पोठ, नचनिया हावय नामी।।
बूढ़ी दाई आय, मार लूगरा लपेटा।
नाचय नइ शरमाय, बिहाव रचे हे बेटा।।1।।

*चुलमाटी*
घर मा सब सकलाय हे, करथे बड़ उतलंग।
नाचत जावत हे गली, लेके बाजा संग।।
लेके बाजा संग, सबो जावय चुलमाटी।
हरदी तेल चढ़ाय, चले जइसन परिपाटी।।
बबा पहिरके सूट, डारके पटकू गर मा।
होगे हे तइयार, देख सब हाँसे घर मा।।2।।

*भड़ौनी*
जाके बर के छाँव मा, खड़े बरतिया जाय।
परघाये बर देख के, सबो घरतिया आय।।
सबो घरतिया आय, पाय जब मौका सुग्घर।
गीत भड़ौनी गाय,  बरतिया अउ दूल्हा बर।।
आनी-बानी गीत, सुने जब सब इतराके।
कतको हावय ढीठ, खड़े आगू मा जाके।।3।।

*टीकावन*
मड़वा मा दाई-ददा, बेटी पाँव पखार।
टीकावन लेके खड़े, आँखी आँसू ढार।।
आँखी आँसू ढार, सबो टीके टीकावन।
अचहर-पचहर लाय, गाय बछरू अउ पड़वा।
सबके पा आशीष, खड़े हे बेटी मड़वा।।4।।

*बिदाई*
करथे बेटी के बिदा, रुकय न आँसू धार।
सुसक-सुसक रोवय ददा, दाई कर गोहार।।
दाई कर गोहार, सहेली रोवय धरके।
पहुना बनगे आज, छूटगे अँगना घर के।।
भाई पानी लाय, पियाके पँवरी परथे।
होके सब बेहाल, बिदा बेटी के करथे।।5।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
छत्तीसगढ़

Tuesday, May 1, 2018

भुजंग प्रयात छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"

पसीना गिराये सरी जिन्दगानी।
नही पाँव जूता न मूड़ी म छानी।

टिके खाँध मा हे बड़े कारखाना।
तभो ले नही भाग मा चारदाना।

धरे नौकरी ठाठ मा हे दु तल्ला।
गली मा फिरे तोर बेटा निठल्ला।

कहाँ कोन हा तोर बाँटा नँगाथे।
फँसा ढोंग मा राख तोला धराथे।

कहाँ कोन से ढोल मा पोल हे जी।
चिन्हारी करौ कोन सो झोल हे जी।

बिना आँख खोले न होवै बिहानी।
कथें बात सच्चा गुरू संत ज्ञानी।

रचनाकार:- श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
                 गोरखपुर,कवर्धा( छ.ग.)
                       01/05/2018