Tuesday, May 1, 2018

भुजंग प्रयात छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"

पसीना गिराये सरी जिन्दगानी।
नही पाँव जूता न मूड़ी म छानी।

टिके खाँध मा हे बड़े कारखाना।
तभो ले नही भाग मा चारदाना।

धरे नौकरी ठाठ मा हे दु तल्ला।
गली मा फिरे तोर बेटा निठल्ला।

कहाँ कोन हा तोर बाँटा नँगाथे।
फँसा ढोंग मा राख तोला धराथे।

कहाँ कोन से ढोल मा पोल हे जी।
चिन्हारी करौ कोन सो झोल हे जी।

बिना आँख खोले न होवै बिहानी।
कथें बात सच्चा गुरू संत ज्ञानी।

रचनाकार:- श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
                 गोरखपुर,कवर्धा( छ.ग.)
                       01/05/2018

26 comments:

  1. सादर प्रणाम।आभार गुरुदेव।

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  2. वाहःहः भाई सुखदेव
    बहुते बढ़िया छंद सिरजाय हव।
    बहुत बहुत बधाई

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  3. वाह्ह्ह् सुग्घर रचना भइया जी

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  4. वाह्ह्ह् सुग्घर रचना भइया जी

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  5. वाह्ह्ह् भइया, सुग्घर छंद

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  6. वाह्ह्ह् बहुत बढ़िया रचना अहिलेश्वर जी

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  7. वाह्ह्ह् बहुत बढ़िया रचना अहिलेश्वर जी

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  8. शानदार छंद के रचना करे हस, सुखदेव भाई। बहुत बहुत बधाई।

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  9. बहुत बहुत बधाई बहुत बढ़िया

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  10. बहुत बहुत बधाई बहुत बढ़िया

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  11. अनुपम रचना सर

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  12. अनुपम रचना सर

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  13. अनुपम सृजन। हार्दिक बधाई।

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  14. भुजंग प्रयात छंद बढ़ सुघ्घर लिखे हव सुखदेव भाई आपके सृजन ल सत् सत् नमन् बधाई हो

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  15. बहुँत सुग्घर रचना अहिलेश्वर जी।बधाई

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