Wednesday, May 9, 2018

रूपमाला छन्द - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान

नानपन ले काम करव -

आज करबे काल पाबे, जानथे सब कोय ।
डोलथे जब हाथ गोड़े, जिंदगी तब होय ।।
काम सुग्घर दाम सुग्घर, मांग लौ दमदार ।
काम घिनहा दाम घिनहा, हाथ धर मन मार ।।

डोकरापन पोठ होथे, ढोय पहिली काम ।
नानपन ले काम करके, पोठ राखे चाम ।।
नानपन मा जेन मनखे, लात राखे तान ।
भोगही ओ काल जूहर, बात पक्का मान ।।

नानपन ले काम कर लौ, देह होही पोठ ।
आज के ये तोर सुख मा, काल दिखही खोट ।।
कान अपने खोल सुन लौ, आज दाई बाप ।
खेल खेलय तोर लइका, मेहनत ला नाप ।।

देह बर तो काम जरुरी, बात पक्का मान ।
खेल हा तो काम ओखर, गोठ सिरतुन जान ।।
तोर पढ़ई काम भर ले, बुद्धि होही पोठ ।
काम बिन ये देह तोरे, होहि कइसे रोठ ।।

खेल मन भर नानपन मा, खोर अँगना झाक ।
रात दिन तैं फोर आँखी, स्क्रीन ला मत ताक ।।
नानपन ले जेन जानय, होय कइसे काम ।
झेल पीरा आज ओ तो, काल करथे नाम ।।

रचनाकार - श्री रमेश कुमार सिंह चौहान
नवागढ़ (बेमेतरा) छत्तीसगढ़)

10 comments:

  1. बहुत बढ़िया संदेशप्रद छंद हे भाई

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  2. बहुत सुघ्घर सर जी

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  3. बहुत बढ़िया भईया जी

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  4. बहुत सुन्दर रचना सर

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  5. बहुत सुन्दर रचना सर

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  6. वाह सुन्दर रूपमाला छन्द

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  7. बढिया रूपमाला छंद लिखे हावस रमेश, तोला बहुत - बधाई हे ।

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  8. बढ़िया संदेश देवत छंद भइया वाह्

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  9. वाह वाह बेहतरीन रूपमाला छंद हे,चौहान जी।सादर प्रणाम अउ बधाई।

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