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Monday, June 18, 2018

चौपाई - श्री कन्हैया साहू "अमित"

धरती मँइयाँ

नँदिया  तरिया  बावली, भुँइयाँ जग रखवार।
माटी  फुतका  संग  मा, धरती जगत अधार।।

जल जमीन जंगल जतन, जुग-जुग जय जोहार।
मनमानी अब झन  करव, सुन भुँइयाँ  गोहार।।

पायलगी हे धरती मँइयाँ,
अँचरा तोरे पबरित भुँइयाँ।
संझा बिहना माथ नवावँव,
जिनगी तोरे संग बितावँव।~1

छाहित ममता छलकै आगर,
सिरतों तैं सम्मत सुख सागर।
जीव जगत जन सबो सुहाथे,
धरती मँइयाँ मया लुटाथे।~2

फुलुवा फर सब दाना पानी,
बेवहार बढ़िया बरदानी।
तभे कहाथे धरती दाई,
करते रहिथे सदा भलाई।~3

देथे सबला सुख मा बाँटा,
चिरई चिरगुन चाँटी चाँटा।
मनखे बर तो खूब खजाना,
इहें बसेरा ठउर ठिकाना।~4

रुख पहाड़ नँदिया अउ जंगल,
करथें मिलके जग मा मंगल।
खेत खार पैडगरी परिया,
धरती दाई सुख के हरिया।~5

जींयत भर दुनिया ला देथे,
बदला मा धरती का लेथे।
धरती दाई हे परहितवा,
लगथे बहिनी भाई मितवा।~6

आवव अमित जतन ला करबो,
धरती के हम पीरा हरबो।
देख दशा अपने ये रोवय,
धरती दाई धीरज खोवय।~7

बरफ करा गरमी मा गिरथे,
मानसून अब जुच्छा फिरथे।
छँइहाँ भुँइयाँ ठाड़ सुखावय,
बरबादी बन बाढ़ अमावय।~8

मतलबिया मनखे मनगरजी,
हाथ जोड़ के हावय अरजी।
धरती ले चल माफी माँगन,
खुदे पाँव झन टँगिया मारन।~9

बंद करव गलती के पसरा,
छदर-बदर झन फेंकव कचरा।
दुखदाई डबरा  ला पाटव,
रुखराई मत एको काटव।~10

 करियावय झन उज्जर अँचरा,
 कूड़ादानी  डारव  कचरा।
 कचरा के करबो निपटारा,
 चुकचुक चमकै ये संसारा।~11

लालच लहुरा लउहा लाशा,
 धरती सँउहें खीर बताशा।
 महतारी कस एखर कोरा,
 काबर सुख के भूँजन होरा।~12

पेड़ मीठ फर पथरा परथे,
हुमन करे मा हँथवा जरथे।
धरती के भरपुरहा कोरा,
दशा देख झन दाँत निपोरा।~13

सँइता सुख के सुग्घर सिढ़िया,
बाँटव बाढ़व राहव बढ़िया।
 साहू अमित करय हथजोरी,
धर रपोट झन बनव अघोरी।~14

 आवव राजा आवव परजा,
 उतारबो धरती के करजा।
 उड़ती बुड़ती उँचहा उज्जर,
 दिखही दुनिया बहुते सुग्घर।~15

देथे धरती जिनगी भर जी,
झन सकेल,तैं सँइता कर जी।
बाँटे मा मिलथे सुख गहना,
एकमई सब हिलमिल रहना।~16

रोकव राक्छस परदुसन,धरती करय पुकार।
पुरवाही फुरहुर बहय, अमित दवा दमदार।।

रचनाकार - श्री कन्हैया साहू "अमित"
शिक्षक~भाटापारा, छत्तीसगढ़
संपर्क~9200252055

Saturday, June 16, 2018

जल हरण घनाक्षरी - श्री चोवाराम "बादल"

      1  ममहाबे
ममहाबे चारों खूँट , होही भाई तोरो पूछ ,
जिनगी  सवँर जाही, उदबत्ती कस खप ।
पक्का बन जबान के, संग धर ईमान के,
 काबर कच्चा कान के, छोंड़ देना लपझप ।
मिहनत कर संगी, नइ राहै कभू तंगी,
उदाबादी झन कर ,  इही आय बड़े तप ।
भुईंया ल सिंगार के, पसीना ल ओगार के,
भाईचारा बाँट लेना , प्रेम मन्त्र माला जप ।।

      2  हवै पहात उमर
नेत नेत नेत बने, चेत चेत चेत बने,
देख देख देख बने, हवै पहात उमर ।
तन ला दिंयाँर कस, चिंता चरत हावय,
धक धक करे जीव, बाढ़े  बीपी ग सुगर ।
एको ठन दाँत नहीं, चना चाब खाहूँ कहे ,
लालच म डूब मरे , पचै नहीं खा
 कुचर ।
हरे राम हरे कृष्ण , गोविंद गोपाल भज,
चौथा पन आगे हवै, सोंच थोरको सुधर ।।

    3 लइका बिगड़ जाथे

उपराहा पैसा पाके, होटल सिनेमा जाके,
गलत संगति धर, जाथे लइका बिगड़ ।
मौका म दुलार बने, मया परवान चढ़े,
डाँट फटकार घलो, कहूँ करै गड़बड़ ।
जादा मीठ कीरा परे, रोबे तहाँ मूँड़ धरे,
बेरा म ईलाज कर, लगा दवई झाफड़ ।
सिक्छा अउ संस्कार दे, पाही रोटी रोजगार ,
बचपन सँवार दे, गुन गाही अड़बड़ ।।

रचनाकार - श्री चोवा राम " बादल"
( छन्द के छ परिवार साधक)
     हथबन्द, छत्तीसगढ़
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