Tuesday, July 31, 2018

ताटक छंद-श्रीमति आशा आजाद

*शिक्षा के लाभ*

शिक्षा के अनमोल रतन ले,करलव मन उजियारा जी।
हर विपदा  मा पार  लगाही,मिट जाही अँधियारा जी।।

जम्मो कारज  बन जाथे जी,तुरते हल मिल जाथे जी।
जेखर मन मा ज्ञान दीप हे,जिनगी भर सुख पाथे जी।।

वैज्ञानिक बन जाथे कतको,खोज करें आनी बानी।
जब मशीन नावा खोजे ता,तब कहलाथे ओ ज्ञानी।।

शिक्षा के तकनीक देखले,नव विधि आज पढ़ाये गा।
प्रोजेक्टर  मा  चित्र  देख ले,सबला  देख  बताये गा।।

कम्यूटर  मा  सबो  आँकड़ा,राख  सुरक्षा  दे जानौ।
जनम मरन के कागद लेले,सुग्घर सुविधा ला मानौ।।

आनी  बानी  ज्ञान देख  ले,इंटर-नेट कहाथे गा।
एक जगा मा बइठे संगी,जम्मो खबर बताथे गा।।

मोबाईल  हे  घरो  घर मा,लेवय  घर  बइठे  सेवा।
एखर तँय हा लाभ उठाले,राख ज्ञान के तँय मेवा।।

वैज्ञानिक अउ शिक्षक बनजा,सब बोलै तोला ज्ञानी।
बनके  डाक्टर  सेवा करले,दे जिनगी  बनजा दानी।।

शिक्षा  लेके  ज्ञान  बाँट दे,शिक्षा सुख पहुचाथे गा।
शिक्षक नव रद्दा देवय सुन ,नव आधार बनाथे गा।।

सुनले  सुख  हा  ज्ञान मा बसे,मन मा दीप जलाले गा।
जिनगी मा तँय शिक्षित होके,जिनगी अपन बनाले गा।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा(छ.ग)

सरसी छंद-श्रीमति आशा आजाद

*सफाई*

कूड़ा कचरा काहे राखौ,साफ रखव घर द्वार।
बीमारी झन हो कोनो ला,स्वस्थ रहे परिवार।।

कूड़ादान  म कचरा डालँव,झन रख  रद्दा  तीर।
नइ होवय हैजा मलेरिया,रहिथे स्वस्थ शरीर।।

गरवा कोठा दुरिहाँ राखौ,नहलाना  नित  जान।
सुग्घर जम्मो दवई छिड़कौ,पशु के देवव ध्यान।।

शौचालय  ला   दुरिहा   राखौ,बीमारी   नइ  आय।
दवा छिड़क ले समय-समय मा,सबला ये समझाय।।

खेत खार मा शौच करव झन,बड़ बीमारी होय।
बीमारी  हा  घुस  जाथे  जी,दमा  होय मा रोय।।

गंदा  पानी  झन पीयव जी,आंत  करे नुकसान।
बीमारी हा कतक पेट के ,रहिथन हम अनजान।।

जूठा   बरतन   तुरते   माँजौ,खाये   जेमा  भात।
सुग्घर तन-मन रोज राखके,स्वस्थ रहव दिन रात।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग.)

छन्न पकैया छंद-श्रीमति आशा आजाद

*छत्तीसगढ़ी रोटी पीठा*

छन्न  पकैया  छन्न   पकैया,खई  खजानी  जानौ।
किसम किसम के रोटी पीठा,हमर राज के मानौ।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,लाटा  सबला  भाये।
गुड़ के सँग मा अमली डालौ,चाट-चाट सब खाये।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,चटनी  मा खा चीला।
बेसन के कड़ही सब खालौ,दिखँय पीला पीला।।

छन्न   पकैया   छन्न   पकैया,चाउँर  अरसा   खालौ।
अब्बड़ गुलगुल मीठा लागँय,गुन ओखर सब गालौ।।

छन्न  पकैया  छन्न पकैया,अंगाकर ला जानौ।
परसा पाना ले बन जाथे,एखर गुन ला मानौ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,स्वाद फरा के जानौ ।
नून  दूध  मा   एहा  बनथे, नून-चूरहा  मानौ।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,उरिद  दार मा बनथे।
बरा सबो ला अब्बड़ भावय,जम्मो ऐला चखथे।।

छन्न    पकैया   छन्न    पकैया, बोरे   बासी   खालौ।
सुरुट-सुरुट सब पीलव पसिया,मिरचा बुकनी डालौ।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,दही  मही  ला  जानौ।
अम्मटहा मा कांदा भावँय,अबड़ मजा मा खालौ।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,अरसा रोटी चखलौ।
गुड़ के सँग मा पाक धरँय जी,गांठ बाँध के धरलौ।।

छन्न  पकैया  छन्न  पकैया,इहाँ  ठेठरी  बनथे ।
बेसन के बन जाथे पातर,ठुठरुम एहा बजथे।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा( छ.ग)

सार छन्द--श्रीमती नीलम जायसवाल

-नारी-

नारी गुन के खान बहुत हे,मान मगर नइ पावय।
अपन फर्ज ला करथे पूरा,तब ले गारी खावय।।१।।

नारी के शोषण करवइया,मूरख हे वो प्रानी।
नारी सब ला मोहे हरदम,बोले गुरतुर बानी।।२।।

जग जननी के रूप हवय जी,ममता हवय समाये।
बगरावत हे मया जगत मा,सबके दुःख मिटाये।।३।।

नारी बिन संसार अधूरा,नारी जीवन देथे।
देव जगत मा आए खातिर,इँखर सहारा लेथे।।४।।

नारी के सम्मान करव तुम,सिरतों वेद बताथैं।
जिहाँ पूजथे नारी मन ला,उहेँ देवता आथैं।।५।।

-पानी बिन-

मनखे पानी खूब गँवावय,कीमत नइ हे जानत।
कतको पढ़-लिख ज्ञान ल पागे,बात नहीं हे मानत।।१।।

आज गँवाही कल पछताही,धरती बंजर होही।
उड़ही धुर्रा सब्बो कोती,रही पेड़ ना जोही।।२।।

बादल के दरसन नइ होही,तीपे हवा ह चलही।
जीव जन्तु सब मरय पियासे,माँस देह ले गलही।।३।।

रुख-राई सब मर जाही तब,तिल-तिल मरही मानस।
बने रही तँय चेत अभी ले,पानी महिमा जानस।।४।।

-होरी-

होरी के त्योहार मनावव,जुर-मिल के सँगवारी।
रंग मया के घोरव संगी,भर लेवव पिचकारी।।१।।

पानी ला झन व्यर्थ गँवावव,खेलव फूल के होली।
मन कोनो के नहीं दुखावव,बोलव गुरतुर बोली।।२।।

होरी मा झन मातव पी के,माते नहीं लराई।
सौ झगरा के इक्के कारन,दारू हवय बुराई।।३।।

रचनाकार--श्रीमती नीलम जायसवाल
पता--खुर्सीपार,भिलाई,जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, July 29, 2018

दुर्मिल सवैया:- जगदीश "हीरा" साहू

*1. पढ़व जी*
पढ़ना लिखना झन छोड़व जी, अब बात सबो झन मानव जी।
अपनावत जावव अक्षर ला, भगवान बरोबर जानव जी।।
बिरथा झन जावय ये तन हा, मन मा अतका सब ठानव जी।
बिन ज्ञान चलै न इँहा जिनगी,  मिल आज नवा दिन लानव जी।।

*2. बरसे बदरा*
बरसे बदरा बिजली चमके, सुन झींगुर गीत सुनावत हे।
छइँहा खुसरे बइला गरुवा, सब जा परछी सकलावत हे।।
दबके बइठे मनखे घर मा, घबरावय जीव लुकावत हे।
नइ रेंगत हे रसता मनखे,  मन मा डर आज सतावत हे।।

*3. बिटिया ला पढ़ावत हौं*
सपना सजथे सबके अँखिया, सपना सिरतोन सजावत हौं।
बड़की बिटिया बढ़के बनही, अब डॉक्टर सोंच पढ़ावत हौं।
करजा कतको करहूँ कहिथौं,  किरिया कलसा धर खावत हौं।।
मन हे मनखे मन के मन मा, महिमा मन ले बगरावत हौं।

जगदीश "हीरा"  साहू
कडार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़

Saturday, July 28, 2018

बरवै छंद - श्री मोहन कुमार निषाद

बेटी बेटा ला दव मान  -

बेटी बेटा हावय , एक समान ।
करही मिलके सेवा , तँय हर जान  ।1।

अधिकार बरोबर दे, होहय नाम ।
संग रही जीयत ले , आहय काम ।2।

बेटी जस बगराही , जगमा तोर ।
बेटी बनके लछमी , करही शोर ।3।

बेटी बिन सुन्ना हे , ये संसार ।
बेटी बेटा जिनगी , के आधार ।4।

भेदभाव झन करबे , तैंहर आज ।
बेटा बनके बेटी , करही राज ।5।

रचनाकार - श्री मोहन कुमार निषाद
   पता - लमती भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, July 26, 2018

उल्लाला छंद- श्री बोधन राम निषाद राज

हरियर खेती खार हे,दुलहन कस सिंगार हे।
छाए फुलवा डार हे ,झूमत आय बहार हे।।1।।

देखव संगी देख लव,सुघ्घर लगय पहाड़ हा।
झर झर झरना हा बहय,फूल लदे हे झाड़ हा।।2।।

रिगबिग ले  फूले  हवे, पियर  गोंदा  फूल हा।
सुघ्घर अँगना हा लगे,जइसे फुँदरा झूल हा।।3।।

हे जग जननी शारदे,पाँव परत हँव तोर ओ।
दे मोला बरदान तँय,बिनती सुनले मोर ओ।।4।।

दाई तोरे आसरा,नइ हे कउनों मोर ओ।
जग हा अब बैरी लगे,बिनती हे करजोर ओ।।5।।

बहुते जाड़ जनात हे,अब तो सहे न जाय जी।
आगी अँगरा के बिना,तन कइसे सुख पाय जी।।6।।

नदिया हा सुघ्घर दिखै,निरमल जल बोहात हे।
सोन सहीं मछरी दिखै,कइसन तउरत जात हे।।7।।

माटी   मोर  परान  हे, जिनगी  के आधार हे।
अन पानी सिरजाय हे,बहुते मया दुलार हे।।8।।

अजर अमर कोनों नहीं,झन टूटय जी मान हा।
मन से गरब उतार लव्, हो  जाही कल्यान हा।।9।।

जादा झन गरजव इहाँ,समय होत बलवान जी।
एक समय जब आ जही,मिट जाही अभिमान जी।।10।।

नस्वर   ए  संसार   हे, नस्वर   ए  तन  जान जी।
मत कर माया मोह ला,झन कर गरब गुमान जी।।11।।

काम करव फल छोड़ के ,रखलव जी बिस्वास ला।
धीरज के फल मीठ हे,झन छोड़व जी आस ला।।12।।

दुनिया दुख के खान हे,पग पग मा दुख होय जी।
हँस के तँय पग राखबे, सपना  ला  संजोय जी।।13।।
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उल्लाला छंद (1) माटी

हरि के रूप कुम्हार हे,गढ़ गढ़ ठाठ बनाय जी।
माटी के चोला रचय,माटी मा मिल जाय जी।।1।।

महतारी माटी हवै,अन धन सब उपजात हे।
एखर रक्छा  मिल करव,बेटा ल सोरियात हे।।2।।

चल उठ जाग जवान रे,माटी माथ नवाइ ले।
बेरा होगे चल बढ़े,धरती ला सिरजाइ ले।।3।।

माटी   के  कर  बंदना,धुर्रा  माथ  लगाव जी।
खून पसीना छींच लव,धरती सरग बनाव जी।।4।।

ए माटी मा मन बसे,तन करबो न्योछार जी।
एखर करजा छूँटबो,तब होही उद्धार जी।।5।।

माटी ए तन जान ले,छोड़ कपट सब चाल रे।
माटी माटी हो जही,करले  अपन खियाल रे।।6।।

दुनिया माटी  के  बने, माटी  ले सब  पात हे।
सकल पदारथ हे इहाँ,इहें दार अउ भात हे।।7।।

माटी के कुरिया हवे, दुनिया इहें बसाय जी।
पाप पून होवय इहाँ,माटी सबो समाय जी।।8।।

सब  ग्रह अउ  नक्षत्र  मा, धरती  मोर  महान  हे।
जीवन हा मिलथे इहाँ,करम धरम के खान हे।।9।।

उल्लाला छंद (2)

जिनगी ला तँय तार दे,नइया पार उतार दे।
हे जगजननी शारदे,हमला मया दुलार  दे।।1।।

पाँव परत हँव तोर ओ,माता  सुनले  मोर ओ।
रखले अँचरा छोर ओ,दया मया तँय जोर ओ।।2।।

भाई मोर मितान तँय,रखले  मोर  परान तँय।
दया मया झन सान तँय,इही बात ला जान तँय।।3।।

झन बनहू  नादान रे,मिट जाही सब  मान रे।
रखव अपन पहिचान रे,जग में बनव महान रे।।4।।

सुन मुरली के तान ला,राधा भुलगे मान ला।
नाचय सूध भुलाइ के,कृष्णा कृष्णा गाइ के।।5।।

श्याम जपव कर जोर के,मन के गठरी छोर के।
हो जाही उद्धार हा,करही पालन हार हा।।6।।

तन मन ला तँय धोइ ले,बीज मया के बोइ ले।
गुरतुर बानी बोल ले,तहूँ मया रस घोल ले।।7।।

बेटी कस हितवा नहीं,बेटी कस मितवा नहीं।
बेटी मोर दुलार हे,दुनिया के सिंगार हे।।8।।

कोयल कुँहके डार मा,परसा फुलगे खार मा।
फुलवा झूमय नार मा,देख बसंत बहार मा।।9।।

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उल्लाल छंद (3)

ए बेटी तँय वरदान हस,लछमी तहीं कहाय ओ।
तँय बेटी मोर गरीब के,जग मा नाम कमाय ओ।।1।।

अब देख उरिद के दार ला,मन ओखर  ललचात हे।
जब बरा मुँगेड़ी हा चुरय,खात खात गोठियात हे ।।2।।

चल श्याम जपव कर जोर के,मन मा ध्यान लगाइ के।
हो जाही जी उद्धार हा,चरन शरन मा जाइ के।।3।।

हे अम्बे तँय  वरदायनी,दे  मोला वरदान ओ।
मँय दीन हीन बालक हवौं,दे दे मोला ज्ञान ओ।।4।।

चल आजा जाबो डोंगरी,खाबो तेंदू चार  ओ।
अउ महुआ बिन बिन नाचबो,दूनों जोड़ीदार ओ।।5।।

सिरजाथे जी परिवार ला,सबके वो आधार हे।
ए बेटी के गुन देखले,सब बर मया दुलार हे।।6।।

बड़ गुरतुर जी बोली हवै,छत्तीसगढ़ी राज के।
हे सिधवा मनखे मन इँहा,बलकरहा हे काज के।।7।।

बन उपवन मा ए फूल हा,देखव कइसे छाय हे।
ए दे मन भँवरा हा घलो,देख देख बइहाय हे।।8।।

कर स्वागत माँघ बसंत के,अब पुरवाई देत हे।
सुघ्घर अब अमराई दिखै,जस दुलहिन कस खेत हे।।9।।

चल महानदी के तीर मा,राजिम लोचन धाम के।
करबो दरसन भगवान के,दाई राजिम नाम के।।10।।

आ राजिम मेला कुम्भ के,संगम डुबकी मार लव।
चल महादेव दरसन करव,जिनगी अपन सँवार लव।।11।। 

ए राम नाम हा सार हे,बाँकी झूठ लबार हे।
तँय जपले एखर नाम ला,जिनगी के उद्धार हे।।12।।

रचनाकार:- श्री बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता(वाणिज्य विभाग)
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छत्तीसगढ़)

आल्हा छंद - श्री ललित साहू "जख्मी"

भारतीय लइका के चाह

ददा एक  बंदूक  बिसा दे, महूँ  चलाहूँ  गोली सोज।
बैरी मनला  मार भगाहूँ, चिपा कोनहा ले सब खोज।1।

आठ बछर के लइका मेहा, देंह  नानकुन  पातर हाथ।
फेर जबर हे  आगी  मन मा, देहूँ  मँय  सेना  के साथ।2।

रंग केरवच चुपर गाल मा, खाँखी चैनस मा तन ढाँक।
करिया लंबा बूट पहिर के, कइहूँ बैरी तँय झन झाँक।3।

भारत माँ  के महूँ  लाल अँव, बनहूँ  मँय बैरी बर काल।
राजनीति के दाँव पेंच अउ, उँखर बिफल करहूँ सब चाल।4।

मोर  जतन ला  दाई  करथे, पीरा अड़बड़  सइके रोज।
कलपत वोला देखत रहिथँव, बता मोर कइसे हो भोज।5।

आँखी बड़का  करके  मेहा, कइहूँ  ले अब येती कूद।
लइका-लइका ये भारत के, खुदे  हरे  गोला बारूद।6।

बैरी के छाती ला चिर के, महूँ  निभाहूँ  सेना रीत।
जइसे चाँटी बड़ हाथी ले, हिम्मत करके जाथे जीत।7।

लड़त-लड़त मर जहूँ भले मँय, तबले नइ देखावँव पीठ।
कोनों काहीं कहिले करले, देश जतन बर मँय हौं ढीठ।8।

ददा एक अउ अरजी सुनले, दाई के तँय रखबे ध्यान।
मुरछा खाके वो गिरही जब, मोर देखही तन बेजान।9।

बहिनी राखी धरे खोजही, कहिबे अब रद्दा झन देख।
गोठ बात पतिया ले बेटी, अब जादा झन तहूँ सरेख।10।

झन धरबे तँय तमगा एको, अउ पइसा ला देबे फेंक।
हाथ जोड़ बस बिनती करबे, मतलब के रोटी झन सेंक।11।

तीन रंग के कपड़ा लपटे, भले मोर तन हा झन आय।
फेर देश के जम्मों जनता, भारत माँ के जय बोलाय।12।

रचनाकार- ललित साहू "जख्मी"
पता- छुरा, जिला- गरियाबंद, छत्तीसगढ़

Tuesday, July 24, 2018

मदिरा सवैया -- आशा देशमुख

1--हे गणराज करौं बिनती ,सुन कष्ट हरो प्रभु दीनन के ।
रोग कलेश घिरे जग में,भय दूर करो सबके मन के ।
हाँथ पसारय द्वार खड़े भरदे घर ला प्रभु निर्धन के ।
तोर मिले बरदान तहाँ दुखिया चलथे सुखिया बनके।

2--राम रहीम धरे मुड़ रोवत नाम इँहा बदनाम करे ।
उज्जर उज्जर गोठ करे अउ काजर के कस काम करे ।
रावण के करनी करके मुख मा कपटी जय राम करे ।
त्याग दया तप नीति बतावय भोग उही दिन शाम करे ।


3--काम करो अइसे जग मा सब निर्मल देश समाज रहे।
मानय नीति निवाव सबो झन सुघ्घर गाँव सुराज रहे ।
दीन दुखीकउनो झन  राहय हाँथ सबो श्रम काज रहे ।
हाँसत खेलत बीतय गा सबके जिनगी सुर साज रहे।

4--सूरज चाँद उवे जग में गुरु के बिन ये अँधियार हवे ।
जे जिनगी उजियार करे गुरु हे जगतारन हार हवे ।
वेद पुराण मिले जग ला सब ये गुरु के उपकार हवे ।
अंतस जोत जलावत हे  महिमा गुरु ज्ञान अपार हवे ।


5--मान मरे पुरखा मन के अउ जीयत बाप इँहा तरसे ।
रीत कहाँ अब कोन बतावय नीर बिना मछरी हरसे ।
देखत हे जग के करनी सब रोवत बादर हा बरसे ।
फोकट के मनखे अभिमान दिनों दिन पेड़ सही सरसे ।

रचनाकार - आशा देशमुख
एन टी पी सी कोरबा, छत्तीसगढ़

गीतिका छंद :- जगदीश "हीरा" साहू

*हे गजानन*
हे गजानन विघ्नहर्ता, कर कृपा गणराज जी।
काम बिगड़े  तँय  बनाबे, अउ बचाबे लाज जी।।
छोड़ सबला आय हावँव, आज तोरे धाम जी।
मोर बिनती  हे इही  प्रभु, तोर सुमिरँव नाम जी।।1।।

तोर मुसवा के सवारी, लाभ शुभ हे साथ मा।
मोर जिनगी डोर हावय, आज तोरे हाथ मा।।
हे  भरोसा   काज करबे,   लाज रखबे  मोर  तँय।
दुःख-पीरा दूर करबे,  राख सबला जोर तँय।।2।।

*सुनता*
तँय बने निरवार खेती, पाग आही नेत मा।
धान उपजाबो जगत बर, काम करबो खेत मा।।
खाँध मा हे भार जग के, आज तैहा जान ले।
तोर पाछू नाँव होही, बात तैहा मान ले।।3।।

*विश्व गुरु भारत*
विश्व गुरु भारत बनय गा, मोर ये अरमान हे।
देवता कस मान पूजय, जे जगत बर शान हे।।
एक दूसर बैर टूटय, मिल बढ़ाहौ नाम ला।
जे विरोधी हे हमर गा, कर सबो के काम ला।।4।।

आस रख झन कोन आही, तोर जग मा काम गा।
बढ़ अपन रस्ता निवारत, तँय बिहनिया शाम गा।।
एक दिन सब साथ होही, नीक कहना मान गा।
तप सुफल होगे समझ ले, अउ बने पहचान गा।।5।।

*पानी हे अनमोल*
रख जतन के आज पानी, काम आही काल ये।
कीमती हावय घटे ये, जान सालों-साल ये।
एक दिन पानी बिना जब, होय हाहाकार  गा।
तब समझ आही कहत हँव, जग म पानी सार गा।।6।।

पेंड़ काटे घर बनाये, संग नदिया पाट गा।
कर प्रदूषण टोर बँधना, तँय बिगाड़े घाट गा।।
हित अपन भर देख तैहा, कर सबो सो बैर गा।
फल करम के तोर मिलही, तब न तोरे खैर गा।।7।।

रचना :- जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा), छत्तीसगढ़

Saturday, July 21, 2018

ताटंक छंद - श्री पुरूषोत्तम ठेठवार

बिना ढंग के बाल कटाये, करिया चश्मा मारे हे
पढ़े लिखे मा भारी गदहा, बड़खा बात बघारे हे ।।1 ।।

बड़े बिहनिया घर ले निकरे, जोर कुदावत हे गाड़ी
अस लागत हे गिरे परे मा, टूट जही दूनो माड़ी ।।2 ।।

गुटखा खाये आनी बानी, गिरधारी के ठेला मा
टोरा फोरा मार पीट के, टूरा परे झमेला मा ।।3 ।।

बड़खा दादा बने गाँव के, बात करे आनी बानी
फोकट खाना ठग के खाये, पीयत हे  मउँहा पानी ।।4 ।।

काम धाम ले दुरिहा भागे, पढ़ना लिखना छोड़े हे
कतको झन ले झगरा करके, रिश्ता नाता टोरे हे ।।5 ।।

घर मा रोज तकादा करथें, टूरा लदे उधारी मा
दसो जघा मा हावै लागा, गिनती करें भिखारी मा ।।6 ।।

गाँव गली मा नाक कटाये,  नइ भावै महतारी ला
गहना धरके लागा लेथे, घर के लोटा थारी ला ।।7 ।।

सट्टा के लत लागे ठौका,  बइठे जोड़ घटाना मा
घर के धन ला नाश करत हे, बेचे धान किराना मा ।।8 ।।

बारा बजिहा रात होय मा, छुछवारत घर ला आथे
चोर बरोबर धीरे धीरे, कथरी ओढ़े सो जाथे ।।9 ।।

बाप कमाये बेटा खाये, आये गजब जमाना हे
सुख दुख ले का लेना देना, बस  अटिया के खाना हे ।।10 ।।

जाँगर चोट्टा काम करे बर,  अब झन कर  आना कानी
बने हकन के रोज कमा तँय, जस मिलही  आनी बानी ।।11 ।।

रचनाकार
पुरूषोत्तम ठेठवार
ग्राम -भेलवाँटिकरा
पोस्ट - उरदना
जिला - रायगढ
छत्तीसगढ

Friday, July 20, 2018

छप्पय छंद-श्रीमति आशा आजाद

*प्राथमिक ज्ञान*
पढ़लव पहिली पाठ,पहल कर स्कूल जाके।
बनही  जी  आधार,पढ़ँव  सब सुग्घर गा के।।
खेलव  कूदँव  रोज,सँग  मा  भोजन  खावौ।
मध्यांतर  मा  खेल,मजा  कर सब घर जावौ।।
कहँय प्राथमिक ज्ञान हा,देवय सुघ्घर सार जी।
मिलय  इही ले मान हा,बनथे सुन आधार जी।।

*जा बेटी ससुरार*
जा  बेटी  ससुरार, मया  तँय  राखे रहिबे।
हवँय  उही  घर बार,सास ला दाई कहिबे।।
देबे  सबला  मान, ससुर  के  सेवा  करबे।
सबो नता ला जान,मान गुन तँय हा धरबे।।
सुमता रखबे मान ले,जम्मो दुख सुख साँठ ले।
झन  छूटय घर बार हा,मया  दया  के  गाँठ ले।।

*नेक रद्दा चुनले*
करम  अपन  हे  हाथ,नेक  तँय   रद्दा  चुनले।
फल  के  आशा  छोड़,धीर  ला तयँ हा गुनले।।
मिहनत  मा दे  ध्यान, डहर हा  तोला मिलही।
ठलहा झन तयँ बइठ,करम हा सबला दिखही।
पूजा काम ला मान ले,मिहनत देही साथ गा।
जिनगी इही हे जान ले,हाथ हा जगन्नाथ गा।।

*झन फेंकँव भात*
काहे  फेंकँय  भात,जगत  मा पूजे जाथे।
जीवन चलथे जान,भूख ला इही मिटाथे।।
जांगर टोर कमाय ,अन्न  के कौरा बर जी।
करौ अन्न के दान,मदत करके सुन तर जी ।।
अन्न  कुँवारी   मान   हे,जीवन   इही  चलाय  गा।
भोजन बिन तन नाश हे,कतका सुख पहुँचाय गा।।

*होली आगे*
होली  आगे  देख,सबो  संगी  जुरियावय।
छेड़  नगाड़ा थाप,थिरक के गाना गावय।।
अपने  धुन के साज,तान ला छेड़ँव संगी।
दिखत हवँय  जी आज,बने हे रंग बिरंगी।।।
बने  मजा के खेल ले,ठेनी  झगड़ा  छोड़ दे।
मया पिरित के रंग ले,सब नाता ला जोड़ दे।।

*मानुष तन ला जान*
मानुष तन ला जान,काल कब कहाँ ले जावय।
अइसन कर तँय काम,जगत मा गुन ला गावय।।
मानवता  ला  जान,करम  तँय  सुग्घर  करबे।
मानुष  ला  पहिचान,गलत  झन  रद्दा  चलबे।।
मरना  सत  हे  मान  ले,मानुष के नइ जोर गा।
जियते  करम  सुधार  ले,मरबे ता  हो सोर गा।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा(छ.ग.)

Thursday, July 19, 2018

आल्हा छंद--श्रीमती नीलम जायसवाल

-स्वामी विवेकानंद -

दाई भुवनेश्वरी जनम दिस, अद्भुत लइका एक महान।
विश्वनाथ परिवार ल पोसय, जेखर रहिस इही संतान।। 1।।

कोलकता के पावन धरती, सभ्य कुलीन दत्त परिवार।
बचपन नरेंद्र नाथ कहाइस, स्वामी करिस जगत उजियार।। 2।।

हर्वट स्पेंसर नास्तिक मनखे, जेखर इनपर रहय प्रभाव।
रामकृष्ण ले मिलके बनगे, बड़का आस्तिक एखर नाव।। 3।।

नाम विवेकानंद पड़िस जी, परमहंस हा शिष्य बनाय।
परमहंस के प्रिय चेला तँय, गुरु सन सरी ज्ञान ला पाय।। 4।।

वेद पढ़िस भइ संगे-सँग मा, साहित-दरसन अउ इतिहास।
सोलह साल उमर होइस तब, करिस वकालत होइस पास।। 5।।

राजयोग के रचना रच दिस, ज्ञानयोग के ग्रंथ बनाय।
सरी जगत मा घूम-घूम के, धर्म सनातन ला बगराय।। 6।।

अमेरिका के शहर शिकागो, धर्म सभा बर भेजे गीस।
स्वामी उँहा करिस अगुवाई, कालजयी इक भासन दीस।। 7।।

इक-इक आखर सौ-सौ ताली, बात-बात पे बजते जाय।
सात समंदर पार म जाके, भारत माँ के शान बढ़ाय।। 8।।

सोसायटी बना के तँय हा, अमेरिका ला वेद पढ़ाय।
रामकृष्ण के मिशन चलाए, भारत ला रस्ता दिखलाय।। 9।।

भूखे रहिके भोजन देना, देशभक्ति अउ शिष्टाचार।
भाषा बर सम्मान सिखोए, संयम-पूर्ण रहय व्यवहार।। 10।।

हिन्दी हिन्दू के जस बाढ़य, अइसन तँय हा करे उपाय।
सन्यासी के रूप धरे तँय, दुनिया भर मा नाम कमाय।। 11।।

खिचड़ी तोर परम प्रिय भोजन, कूद गए छानी ओ पार।
लक्ष्य पाय बर ध्यान लगावव, शिक्षा दिए जगत के सार।। 12।।

दाई के सम्मान करव सब, सहनशील बन धीरज धार।
डर के सँग मा करव लड़ाई, हो जाहू तुम भव ले पार।। 13।।

जीवन के दरसन ला बाँटिस, तेज-चेतना के भरमार।
उनचालिस के थोर उमर मा, स्वामी छोड़ गइस संसार।। 14।।

युवा-दिवस के रूप म दुनिया, जनम-दिवस ला तोर  मनाय।
स्मारक हावय बीच समंदर, शोभा ओखर कहे न जाय।। 15।।

गुन ला गावँव शीश नवावँव, मोरे मन तब बड़ सुख पाय।
कलम विवेकानंद लिखय ता, नीलम जन्म धन्य हो जाय।। 16।।

रचनाकार--श्रीमती नीलम जायसवाल
पता--खुर्सीपार,भिलाई,जि.-दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Wednesday, July 18, 2018

गीतिका छंद:- श्री जगदीश "हीरा" साहू

झन बाँट मनखे ला

एक हे संसार के सब, आदमी सब जान लव।
छोड़ मनखे बाँटना ला, बात सिरतो मान लव।।
जग चलाये बर बनाये, ये जगत के रीत ला।
छोड़ रूढ़ीवाद देखव, एक दूसर के प्रीत ला।।1।।

कोन बाँटे हे मनुज ला, आज देखव सोंच के।
झन लड़व कउवा बरोबर, जेन खाही नोंच के।।
राज पाये बर लड़ाथे, हम सबो ला आज गा।
फूट डालय बीच सबके, तब पहिरथे ताज गा।।2।।

ये गरीबी अउ अमीरी, बाँटथे इंसान ला।
भूल जाथे सब धरम अउ, बेंचथे ईमान ला।।
भूख मा कतको मरत हे, देख ये संसार ये।
अउ मरे कोई अबड़ खा, सुन इही अँधियार ये।।3।।

ऊँच एहा नीच ओहा, ए भरम झन पालबे।
दूरिहा जाही सबो झन, बात ये झन चालबे।।
हे बरोबर आज सबझन, बस समय के बात हे।
आज तक उजियार दिन हा, ढल जथे तब रात हे।।4।।

रंग गोरा रूप करिया, सब दिए भगवान गा।
मन रहय निरमल हमेशा, हे इही सत ज्ञान गा।।
साँवरा कान्हा बढ़ाथे, मान जग के जान ले।
बाँट झन मनखे जनम मा, बात संगी मान ले।।5।।

मान देबे मान पाबे, मान मा भगवान हे।
चीज के अभिमान मत कर, वक़्त के ये ज्ञान हे।।
कोन राजा कोन परजा, सब बखत के बात ये।
राज दिल मा कर सबो के, ये बड़े सौगात ये।।6।।

रचनाकार:- श्री जगदीश "हीरा" साहू
कडार (भाटापारा) छत्तीसगढ़

Monday, July 16, 2018

अमृत ध्वनि छंद-श्रीमति आशा आजाद

*सुग्घर सिरजन*

सुग्घर सिरजन सब करौ,करदँव सब उद्धार।
नव मारग मा होय जी,चले कलम के धार।।
चले कलम के-धार होय जी,नित उजियारा।
सुग्घर कविता, गढ़ देवव जी,लागय प्यारा।।
साहित सिरजन,ज्ञान  बढ़ावँय,सीखँय  सबझन।
नेक  सोच  ले,कवि मन रचदयँ,सुग्घर  सिरजन।।

*नसा नास के जड़ हवय*

दारू  पीना  छोड़   दे,खुद   मा  रख  विश्वास।
नसा नास के जड़ हवँय,जिनगी झन कर नास।।
जिनगी झन कर-नास कभू गा,रहिबे बचके।
टूट जथे   घर , ठेनी   झगरा, पीके   बमके।।
होही  अपजश,तय करले तँय,कइसे  जीना।
सब  मिलही सुन,छोड़  दिये जें, दारू पीना।।

*जय जय भारत देश*

जय जय भारत देश के, हमर तिरंगा शान।
जम्मो मिलके कहयँ जी,देश हमर हे जान।।
देश  हमर  हे,मान  अमर  हे, हे  महतारी।
जान   इही   हे, रंग   तिरंगा, हे   चिन्हारी।।
जनमन   गावँय, वंदे   गावँय ,हे  एके लय ।
जुरमिल गावँव,तान लगालव,भारत जय जय।।

*महाशिवरात्रि*

बमबम भोले बोल रे,काँवर ला तँय थाम।
महाशिवरात्रि  आज हे,शंभू  के  ले नाम।।
शंभू  के  ले,नाम  जगत  मा,माथ  नवाले।
पूरा   होही,तोर  कामना,जय  जय  गाले।।
काँवर    धरके,आजा    संगे,एके   होले।
पार  लगाही,बोल  तहूँ हा ,बमबम  भोले।।

*दाई बनगे मौम*

दाई   बनगे   मौम   जी,बेटा   के   नव   बोल।
जान  इंग्लिस  बोलथे,गोठ  करय  बिन  तोल।।
गोठ  करय  बिन-तोल  सतावय,गवँइ गाँव मा।
शहरी    बाबू, बनगे   हावँय, रहय   छाँव   मा।।
चरन  पायलगी ,नइ  जानय जी, मुश्किल भाई।
नाता    जम्मो, भुला    गये    हे, रोवत    दाई।।

*झन काटँव*

काहे  काटँव  रुख  रई,एहा  हावँय शान।
सुग्घर  हावा  देत  हे,इही  बचावँय  प्रान।।
इही  बचावँय,प्रान  हमर  जी,पेड़  लगालव।
जीवन  देही,झन  काटँव  जी,मान  बढ़ालव ।।
पउधा लगाँव,जतन करौ सब,सुख ला पावँव।
देही    बढ़िया,छाँव   जान   के,काहे   काटँव।।

*बेटी हे अनमोल*

हावँय  बेटी शान जी,बेटा  जइसन मान।
बेटी हा अनमोल हे,समता ला तँय जान।।
समता ला तँय-जान जगत के,हे महतारी।
जीवन  देवँय,मान  बढ़ावय,ओहय नारी।।
मात-पिता के,जतन सकल कर,सुग्घर पालय।
जनम  देत  हे,पालन  करथे,नारी  हावँय।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता -एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग)

Saturday, July 14, 2018

सरसी छन्द - - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

रथ यात्रा(सरसी छंद आधारित गीत)

अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।
संग   सुभद्रा  बहिनी  बइठे,बइठे  हे  बलराम।

चमचम चमचम रथ हा चमके,ढम ढम बाजय ढोल।
जुरे  हवै  भगतन  बड़  भारी,नाम  जपे  जय  बोल।
झूल झूल के रथ सब खीँचय,करे कृपा भगवान।
गजा - मूंग  के  हे  परसादी,बँटत  हवे  पकवान।
नाचत  गावत  मगन सबे हे, रथ के डोरी थाम।
अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।

दूज अँसड़हूँ पाख अँजोरी,तीनों होय सवार।
भगतन मन ला दर्शन देवै,बाँटय मया दुलार।
सुख अउ दुख के आरो लेके,सबके आस पुराय।
भगतन मनके दुःख हरे बर,अरज दूज मा आय।
तीनों भाई  बहिनी लागय,सुख के सुघ्घर धाम।
अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बॉलको(कोरबा)

Friday, July 13, 2018

आल्हा छंद-श्रीमति आशा आजाद

*हमर देश के जवान*

भारत हावय देश हमर जी,करें सुरक्षा बढ़थे मान।
सैनिक हावय मान हमर जी,इही बचावय सबके जान।।

फौजी बनके सेवा करथे,भारत भुइयाँ हवे महान।
दुश्मन ले लड़ जाथे ओमन,हमर देश के हावै शान।।

भारत के सीमा मा ठाड़े ,रात रात भर जागय जान।
नमन सबो झन इनला करलव,हावय देखौ सब बलवान।।

अपन खून ला बहा देय गा,लोहा लेथे अब्बड़ मान।
दिन देखय नइ रतिहा देखय,दे देथे जी अपने जान।।

भारत के झण्डा ला धरके,दुश्मन ला जी मार गिराय।
रखवाली सुन करय हमर गा,देख माथ सबके झुक जाय।।

अबड़ बहादुर हावय देखव,हमर देश के सबो जवान।
दुश्मन देखे थर-थर काँपै,ओखर करलौ सब गुनगान।।

मार गिरावाय हिम्मत ले वो,करें सामना बिन हथियार।
दुश्मन भागे देख फौज ला,सैनिक करथें सब उद्धार।।

बुरी नजर जे राखय सुनले,ओखर करथे गा संहार।
धर-धरके ओ मार गिराये,सैनिक के होथे ललकार।।

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा, छत्तीसगढ़

Thursday, July 12, 2018

रोला छंद - श्री बोधन राम निषाद राज

(1) बसंत बहार:-

देखौ छाय  बहार, आय  हे  गावत  गाना।
मन होगे खुश आज,देख के परसा पाना।।
फूले परसा  लाल, कोयली  बोलय  बानी।
गुरतुर लागे बोल,करौं का मँय अब रानी।।

(2) पानी:-

पानी पीयव छान,छान लव  बढ़िया दाई।
सुघ्घर घइला धोय,होय झन ओ करलाई।।
इही बात ला सोच,करौ झन नादानी ला।
जिनगी के आधार,देख लौ जिनगानी ला।।

(3) आगी:

आगी ला तँय बार, जोर दे  लकड़ी  छेना।
साग भात अउ दार,चाय ला बढ़िया देना।।
आगी सबो चुरोय,जेन ला  तँय ह  चुरोबे।
चुर पक के तइयार,खाइ के बढ़िया सोबे।।

(4) बेटी:

बेटी  फूल  गुलाब, बाग के  सुघ्घर  लाली।
देखौ खुशियाँ छाय,बनौ जी ओखर माली।।
घर के  वो  सिंगार, ददा के मन मा बसथे।
दाई  देय   दुलार, मया  मा  बेटी  हँसथे।।

(5) लछमी दाई:-

लछमी दाई तोर,पाँव ला परथौ मँय हा।
दे मोला आशीष,तार दे मोला  तँय हा।।
दीन हीन मँय तोर,देखले  बेटा  आवव।
रहिबे कुरिया मोर,आरती तोरे  गावव।।

(6) माटी :-

धरती दाई मोर,जनम ला मँय हा पावँव।
तोला माथ  नवाय, बंदना  रोजे  गावँव।।
अन पानी सिरजाय,चलौ जी महिमा गाबो।
गंगा जमना धार,मया के  फूल  चढ़ाबो।। 

(7) हाट बजार :-

मोर  गाँव  के  हाट, लगे  हे  भारी  रेला।
देखव मनखे आय,भीड़ जस लागै मेला।।
रंग - रंग के साग,आय  हे  भाजी  पाला।
मुर्रा लाडू  सेव, देख ले  गुप-चुप  वाला।।

(8) विरहा:-

करिया बादर आय,मोर मन मा छावत हे।
रही रही के सोर,पिया जी  के  लावत हे।।
नाचय बने  मँजूर,देख  लव ताना  मारय।
सुरता मोला आय,कोन अब जिनगी तारय।।

(9)ए तन माटी

ए तन माटी जान,मोह ला झन कर जादा।
रहिले तँय हा साथ,राख ले जिनगी सादा।।
कोन  जनी ए जीव, उड़ा जाही कब भाई।
करले  बने  उपाय,राम  जी  रही  सहाई।।

(10)सुरता आथे

सुरता आथे तोर,भुलावँव नइ मँय तोला ।
घड़ी घड़ी मन रोय,सोच हा आथे मोला।।
चैन घलो नइ आय,करौ का कान्हा मँयहा।
अब्बड़ धरथौ धीर,तीर आ जल्दी तँयहा।।

रचनाकार - श्री बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता (वाणिज्य)
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

Wednesday, July 11, 2018

हरिगीतिका छंद :- जगदीश "हीरा" साहू

*अरजी हवय हनुमान जी*

अरजी हवय हनुमान जी, पूरा करव मनकामना।
ले आस ठाड़े हे भगत, झन होय दुख ले सामना।।
अब टोर माया मोह ला, प्रभु जी सुनव आराधना।
मन मा रहय प्रभु नाम हा, सब छोड़ करिहौं साधना।।1।।

*मोर गाँव*
सुनता लगा के सब रहव, मिलके करव सब काम गा।
बनही सरग तब गाँव हा, होही सबो जग नाम गा।।
बीते जिहाँ ननपन हमर, खेलेन कतको खेल गा।
झन छोड़ जाबे भूल के, लगही शहर हर जेल गा।।2।।

*मजदूर अब मजबूर हे*
मजदूर अब मजबूर हे, मजधार मा जिनगी लगय।
बड़ दुःख मा परिवार हे, घर छोड़ दूसर मन ठगय।।
अब मान नइहे काम के, कोनो बतावव राह जी।
दे दाम बड़ अहसान कर, लेथे अमीरी आह जी।।3।।

कतको बनाये घर तभो, खुद झोपड़ी मा रहि जथे।
वो घाम पानी जाड़ सब, बाहिर सबो ला सहि जथे।।
जानव अपन कस आज ले, हे आस अब सम्मान दव।।
झन छोड़ पिछवाये डगर, अब संग अपने जान दव।।4।।

*बेटी ला बेटा बरोबर जानव*
झन मारिहौ बेटी अपन, देवी सहीँ हे जान लव।
अब सोंच ला बदलव सबो, बेटा बरोबर मान लव।।
जे काम बेटा नइ करय, बेटी करय वो काम जी।
हर काम मा आगू हवय, बगराय कुल के नाम जी।।5।।

भेजव सबो इसकूल अब, बेटी घलो हा पढ़ लिही।
होही खड़ा खुद पाँव मा, जिनगी अपन वो गढ़ लिही।।
संसार मा सम्मान हे, वो शक्ति के अवतार ये।
आगू बढ़ावय सृष्टि ला, नर के हवय आधार ये।।6।।

जगदीश "हीरा" साहू
कडार (भाटापारा) छत्तीसगढ़

Tuesday, July 10, 2018

रोला छंद - श्री राजेश कुमार निषाद

(1) काम धाम ला छोड़,जुवा मा हारे सब ला।
चोरी उदिम मढ़ाय,नीच करथे करतब ला।।
सुनय नही जी बात,अपन ओ करथे मन के।
बनगे हावय चोर,देख ले हन बचपन के।।

(2) बचपन ले हे चोर,करत हे ये हा चोरी।
सुने हवन जी गोठ, करय बड़ ओ मुँहजोरी।।
लगगे हावय थाप, हवय जी बनके लबरा।
चोरी करथे पोठ, रखे हे भरके डबरा।।

(3) चोरी ये हा जान,रोज छुप छुप के करथे।
दिखथे कोनो आत, छोड़ के सबला भगथे।।
हावय बड़ बदनाम,सबो ले गारी खाथे।
नइये थोरुक लाज,चुराये बर अगुवाथे।।

(4) चोरी हावय पाप , तभो ले चोरी करथे ।
जानत हावय बात , कहाँ ये मन मा धरथे ।
लोटा थारी बेच , मान का ओ हर पाही।
छुट जाही परिवार , संग का लेके जाही।।

रचनाकार-  श्री राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद (समोदा) तह. आरंग जिला रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, July 9, 2018

कज्जल छंद -श्री पुरूषोत्तम ठेठवार

जिनगी के दिन चार जान
काबर करे गरब गुमान
छोटे बड़खा हें समान
मनखे मनखे एक मान ।।1 ।।

जाति धरम अउ भेद भाव
तजँव सुमत के गीत गाव
अपन अपन बाँटा कमाव
नवा नवा रिसता बनाव ।।2 ।।

अनीति नरुवा मा चिभोर
जिनगी मा झन जहर घोर
काय मोर अउ काय तोर
मया भुलागे तोर सोर ।।3 ।।

आश साँस के ठेठवार
गिनती के हे तीन चार
राम नाम हे जग अधार
करही चोला राम पार ।।4 ।।

रचनाकार
पुरूषोत्तम ठेठवार
ग्राम -भेलवाँटिकरा
पोस्ट -उरदना
जिला - रायगढ
छत्तीसगढ़

Saturday, July 7, 2018

जयकारी छंद - श्री ललित साहू "जख्मी"

फैशन संस्कृति

उमर डोकरा के हे साठ। तभो देख ले ओखर ठाठ।।
पहिरे कुरता आधा पेंट। तन मा अड़बड़ छींचे सेंट।।०१।।

पान गाल मा रोज दबाय। तम्बाकू उपराहा खाय।।
जुआँ नशा वोला बड़ भाय। सज्जन संग कभू नइ जाय।।०२।।

मटमटहा हे ओखर चाल। चाहे बिगड़े घर के हाल।।
मेछा मा पोते हे रंग। जम्मों हवय देख के दंग।।०३।।

कतको ओखर हवय मितान। सबके बीच बघारे शान।।
उमर घलो वो कमे बताय। घर के लइका लोग लजाय।।०४।।

देख डोकरी पार्लर जाय। फैशन करे केंश बगराय।।
आनी-बानी चीज बिसाय। चारी करके समे बिताय।।०५।।

नाती पोता ला सब छोड़। घूमे बर हावय जी होड़।।
गाल होंठ ला लेवय पोत। मुख बिगड़े तब राहय रोत।।०६।।

फैशन रक्सा लेहे घेर। मनखे करे अबड़ अंधेर।।
जम्मों समझे खुद ला शेर। बात करे वो नयन तरेर।।०७।।

नोनी बाबू सब झन आज। अलकरहा करथे जी साज।।
फटे जींस मा तन देखाय। लोक-लाज ला कोन बचाय।।०८।।

बेटा बहू घलो मोहाय। फैशन मा सुख चैन गँवाय।।
पश्चिम संस्कृति भारत आय। हमर देश मा पाँव जमाय।।०९।।

कम बूता मा जादा दाम। खोजत हे सब ऊँचा नाम।।
सबो करे जब उल्टा काम। कइसे कलजुग बाँचे राम।।१०।।

रामायण पढ़थे अब कोन। दिनभर धरथे सबझन फोन।।
ललित गोठ मा करव विचार। तभे बाँचही संस्कृति सार।।११।

देखावा मा तुम झन जाव। परंपरा ला अपन बचाव।।
जीवन के जानव आधार। सुग्घर हे सादा श्रृंगार।।१२।।

रचनाकार- श्री ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

कुण्डलिया छंद - श्रीमती नीलम जायसवाल

 1-वीणापाणी

वीणापाणी दे मया, कर मोरो उद्धार।
मोला तँय हा ज्ञान दे, अतका कर उपकार।।
अतका कर उपकार, मोर तँय अवगुण हर ले।
दे विद्या के दान, अपन तँय सेवक कर ले।।
ओखर जग मा नाम, बसे तँय जेखर वाणी।
दाई आशा मोर, तहीं हस वीणापाणी।।

2-गुरु

गुरु के चरण पखार लव, मन ले देवव मान।
गुरु के किरपा ले बनय, मूरख हा गुणवान।।
मूरख हा गुणवान, चतुर अउ निर्मल बनथे।
जेखर पर गुरु हाथ, उही आकाश म तनथे।।
जइसे गरमी घाम, छाँव निक लागे तरु के।
वइसे शीतल होय, वचन हा हरदम गुरु के।।

3-मेहमान

जाए जब कोनो कहूँ, घर होथे  सुनसान।
कुरिया सब्बो हे भरे, आये हें मेहमान।।
आये हें मेहमान, भीड़ घर मा हय भारी।
हल्ला-गुल्ला गोठ, चलत हे दुनियादारी।।
अंतस हा सुख पाय, सबो झन के सकलाए।
मन भारी हो जाय, लहुट सब झन जब जाए।।

4-गरहन

गरहन लागिस चाँद ला, होगे ओहा लाल।
थोरिक बेरा ले रहिस, ओखर ऊपर काल।।
ओखर ऊपर काल, धरम मा अइसन कइथे।
 सूतक जब ले होय, सबो झन लाँघन रइथे।।
कइथे जी विज्ञान, नहीं मानव गा अलहन।
सब्बे करलव काम, रहय जब लागे गरहन।।

5-सँगवारी

सँगवारी के साथ मा, होगे कोरी साल।
सात जनम के साथ हे, रहिथन हम खुशहाल।।
रहिथन हम खुशहाल, जगत ले का करना हे।
दुख-सुख लेबो बाँट, सँग म जीना-मरना हे।।
चार-मुड़ा ममहाय, फुले जीवन फुलवारी।
जेखर नाम उपेन्द्र, उही मोरे सँगवारी ।।

6-मानसून

गरमी हा जावत हवय, आ गे हे बरसात।
जिउ मा ठंडक हे पड़े, मानसून के आत।।
मानसून के आत , सबो के मन हरसागे।
उमड़-घुमड़ के देख, अबड़-अक बादर आ गे।।
हरियर हो गे खेत, देख माटी के नरमी।
पड़ गे हे बौछार, लहुट जावत हे गरमी।।

रचनाकार- श्रीमती नीलम जायसवाल।
खुर्सीपार, भिलाई, जि. - दुर्ग, (छत्तीसगढ़)

Friday, July 6, 2018

रूपमाला छंद -श्री पुरूषोत्तम ठेठवार

पाप नाचे काल बनके, ठाड़ छानी आज
चोर मनके राज आगे, बेंच डारे लाज
सत लुकागे झूठ छागे, मार माते रार
तोर काहे मोर काहे, बाँट खेती खार ।।1 ।।

बाप होगे बेसहारा, रोय माथा पीट
काम बेटा आन करथे, होय जादा ढीठ
रोय दाई सोंच भारी, होय का भगवान
आग लागे हे बिधाता, चेत होगे आन ।।2 ।।

रोज होवय मार झगरा, देख रोय सियान
आन होगे हे जमाना, नीति होगे आन
झूठ बानी सच कहाये, साव होगे चोर
रोय नारी बिपत भारी, मान बाँचे मोर ।।3 ।।

मान बरजे चेत करले, छोट बड़खा जान
कर भलाई जस कमाले, मिलय भारी मान
तोर जिनगी चार दिन के, साँस के का आश
मन रमाले राम गाले, कुमत होही नाश ।।4 ।।


रचनाकार - श्री पुरूषोत्तम ठेठवार
ग्राम -भेलवाँटिकरा
जिला -रायगढ  (छत्तीसगढ़)

Thursday, July 5, 2018

कज्जल छंद- श्री राजेश कुमार निषाद

मनखे मनखे बने जोड़।
भेद भाव ला अपन छोड़।
आथे कतको राह मोड़।
झन तैं सबले नता तोड़।

सबला संगी अपन जान।
झन कोनो मा भेद मान।
दू दिन के सब सगा तान।
एक सबो के हवय जान।

माटी के तन हवय तोर।
सुनले संगी गोठ मोर।
रखले गठरी बाँध जोर।
छूट जही कब प्राण तोर।

भरम भेद के अपन खोल।
बात मान ले झने डोल।
जिनगी के तैं समझ मोल।
मोह मया मा झने तोल।

रचनाकार- श्री राजेश कुमार निषाद
ग्राम चपरीद, छत्तीसगढ़

Wednesday, July 4, 2018

चौपाई छंद - श्री बोधन राम निषाद राज

        श्री राम महिमा
       -- दोहा--
आजा माता शारदा, गर मा बस जा मोर ।
 गणपति मोला ज्ञान दे,बिनती हावै तोर ।।

चौपाई--
राम नाम सुमिरन कर प्रानी । तर  जाही तोरे   जिनगानी।।
हो जही सुफल जीवन नइया । रामसिया ला सुमरव भइया।।

काम सबो बिगड़े बन जाही । हनुमत जी के जे गुन गाही।।
डुबती  नैया पार  करइया। जन-जन के वो कष्ट हरैया।।

बिपदा बेरा देख बुलाके। करथे सेवा सूध भुलाके ।।
कतको  धरमी-पापी तारे। अपन चरन मा राम   उबारे ।।

तर जाही सब जन के चोला। राम सिया के मन हे भोला।।
राम के हावै  एक   कहानी। रामायन तुलसी  के  बानी ।।

जनम अवध मा चारों  भैया । देवय जम्मो देव बधैया।।
राजा दशरथ हे बड़भागी । माता कौशिल्या अनुरागी।।

दोहा-
किलकारी अब होत हे,राम लखन अवतार।
भरत-शत्रुहन   संग  मा, उतरे  पालनहार।।

चौपाई-
भर  ममता   कैकेई   माता । भाग सुमित्रा के सुख दाता ।।
ऋषिमुनि के वो काज  सँवारे । दानव दल ला छिन मा मारे ।।

पथरा होय अहिल्या नारी । जग के वो हा पालनहारी।।
रहे    गुरु  के   आज्ञाकारी । सीता मइया बन सँगवारी ।।

चउदह बछर राम बन जावै । दानव मन ला मार भगावै।।
पापी रावन छल  के आये। सीता मइया हर  ले जाये।।

बन अशोक मा  पहरादारी । सीता संग पिसाचिन नारी ।।
धरे रूप बहु भिन्न बनाइस। रावन सीता बहुत डराइस।।

थर-थर काँपे  रावन   भइया। तिनका हाथ उठाइस  मइया ।।
बानर कहिके रावन बोलिस । फरिया पूँछ तेल मा बोरिस ।।

दोहा-
आग लगावव पूँछ मा,रावण कहे बुलाय।
जर-बर देखै राम हा,सीता सोच भुलाय।।

चौपाई-
भर-भर-भर-भर लंका जरगे।छोड़ विभीषण सब घर बरगे ।।
उड़त-उड़त वो झटकुन आवै। सागर कूदय आग  बुझावै।।

आके सीता ला समझावै। राम काज ला सबो बतावै।।
हनुमत महिमा रघुबर गाए। लंका   रावन  मार गिराए ।।

राज विभीषण लंका देके। आय अयोध्या  सीता लेके।।
हाँसत कुलकत हे नर-नारी। घर-घर  दियना अउ देवारी।।

सिंहासन में राम बिराजे । तीन लोक में डंका बाजे।।
उही समय जी बिजली गिरगे। सीता   ऊपर   बिपदा  परगे।।

फिर बन के   होगे   बैदेही । राम-लखन के परम सनेही।।
मुनि बाल्मिक देखौ कइसे। पोसिस-पालिस   बेटी जइसे।।

दोहा-
बेटी  जस  परिवार  में, सीता  के  रहवास।
कुटिया एक बनाय के,राम भजन के आस।

चौपाई-
लव-कुश दू झन बेटा आये। ननपन  ले   गुरुदेव  पढ़ाये।।
शिक्छा गुरु ले बढ़िया पाइस। राम कथा के सार सुनाइस।।

इक दुखिया नारी के पीरा। काबर छोड़ दिये रघुबीरा।।
सुकुमारी के महिमा  भारी। जनकसुता हे राज दुलारी।।

बन में भटकत समय पहाथे। ओखर भाग कहाँ सुख आथे।।
राम अवध के   राजा   भइया। ले गिस सीता  धरती   मइया।।

लव-कुश दूँनों   राम पियारे। माता अब तो लोक सिधारे।।
इक-इक करके सरयू मइया। पाँव  पखारे पार  लगइया।।

चलदिस अपन लोक हे रामा। संग देव जम्मो बलधामा ।।
अतके मरम  निषाद बतावै। मोरो   पुरखा  पार   लगावै।।

                  -- दोहा--

राम लखन ला मानले,तन अउ जीव समान।
जप ले माला राम के, मनुवा साँझ-बिहान।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

रचनाकार--
बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता (वाणिज्य विभाग)
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

सरसी छन्द - श्री मथुरा प्रसाद वर्मा

 सुनले मोर पुकार

हाथ जोर के बिनती  करथौ, सुनले मोर पुकार।
हर ले विपदा मोर देस के, दाई कर उद्धार।।

भूख गरीबी गाँव ल छोड़य, खेत खार आकाल।
मिहनत करने वाला हाथ ल, कर दे माला माल।।

अब झन आये कभू बिमारी, मनखे रहे निरोग।
साफ सफाई अपनाये सब, मोर देस के लोग।।

भारत के सेना ला बल दे, बइरी के बल तोड़।
आतंकी मन थरथर काँपय, भागय सीमा छोड़।।

स्वाभिमान जनता के जागय, होवय देस विकास।
कर दे दाई भ्रष्टाचारी, नेता मन के नास।।

भेद मिटय बेटा बेटी के , मानन एक समान।
सब नर नारी संग चले जी, करय देस गुणगान।।

धरम जात के झगरा टूटय, बड़े सबो मा प्यार।
शोषन करने वाला मन के, डूब जाय व्यापार।।

मिट जाए अज्ञान अँधेरा, सजग रहे इंसान।
दारू दंगा छोड़ बुधारू, बन जाय बुद्दिमान।

पूरब ले सूरज कस निकलय, खुशहाली के भोर।
चहकय सोनचिरैया चिव चिव, देस म चारो ओर।

रचनाकार - श्री मथुरा प्रसाद वर्मा
      ग्राम कोलिहा, बलौदाबाजार

Tuesday, July 3, 2018

सार छंद-श्रीमति आशा आजाद

*आगे होली*

आगे हाँसत खेलत ऐदे,रंग भरे जी होली।
रंग भरे पिचकारी लेलव,मारव सबला गोली।।

छेड़ौ सबझन साज नगाड़ा,गावव मिल जुल गाना।
बिछे रहय रंगोली जइसन,मउसम लगय सुहाना।।

गुत्तुर-गुत्तुर भाखा राखे,बोलव सुग्घर बोली।
तान लगाके सब झन बोलव,होली हे जी होली।।

हरियर हरिहर रंग रहय जी,नीला पीला डालौ।
ढोल नगाड़ा बाजा बाजय,गीत मया के गालौ।।

संगी साथी साथ रहय जी,कूदत खेलय होली।
देखव कोनो झन रिसाय जी,अइसन होवय बोली।।

होली हे भाई होली हे,तान लगाके घूमौ।
रंग बिरंगी ए भुइयाँ ला ,माथ नवा के चूमौ।।

लागय अइसन जइसे भुइयाँ,रंग रंग मा साजे।
जेन डहर चल देवव खेले,थाप नगाड़ा बाजे।।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग.)

Monday, July 2, 2018

कुंडलिया छंद - श्री मोहन कुमार निषाद

जिनगी के आशा

आसा जादा झन करव , जिनगी के दिन चार ।
भाग दउड़ जी हे लगे , थकना हे बेकार ।
थकना हे बेकार , रोज आघू हे बढ़ना ।
नइ होवन कमजोर , नवा रद्धा हे गढ़ना ।
मनले झन जी हार , जान ले हे परिभासा ।
रही बने खुशहाल , इही जिनगी के आसा ।।

मानव झन हार

होवय झन अब हार जी , करत रहव परयास ।
मिलबे करही जीत हर , राख अटल विश्वास ।
राख अटल विश्वास , धीर जी मनमा धरले ।
होबे झन कमजोर , परन जी अइसन करले ।
बैरी तोला देख , रोज जी दुख मा रोवय ।
मान कभू झन हार , नाम जी जग मा होवय ।।

सेवा जिनगी सार

करले सेवा जी बने , जिनगी अपन सँवार ।
बात कहत हँव मानले , सेवा हावय सार ।
सेवा हावय सार , भेद जी झन तँय करबे ।
एक सबे ला मान , सबो के दुख ला हरबे ।
मिलही जी भगवान , सत्य के रद्धा धरले ।
होबे भवले पार , करम जी अइसन करले ।।

खेती

खेती ला जी कर बने , सुग्घर होही धान ।
गोबर खातू डार ले , कहना मोरो मान ।
कहना मोरो मान , धान ला सुग्घर पाबे ।
नइ होवय नुकसान , बाद मा नइ पछताबे ।
बात हवय जी सार , कहत हँव येखर सेती ।
आगे हे विज्ञान , करव जी सुग्घर खेती ।।

नारी शक्ति

नारी शक्ति रूप ये , झन समझव कमजोर ।
महिमा जेखर हे कहे , देवन मन चहु ओर ।
देवन मन चहु ओर , सार जी येला मानव ।
कर लेवव पहिचान , रूप ला येखर जानव ।
सुख दुख मा हे संग , आय जी ये अवतारी ।
बोहे जग के भार , सबल हावय जी नारी ।।

रचनाकार - श्री मोहन कुमार निषाद
  पता - लमती भाटापारा, छत्तीसगढ़

Sunday, July 1, 2018

कुण्डलिया छन्द - श्री जगदीश "हीरा" साहू

सुवा

नाचत हे सबझन सुआ, एक जगा जुरियाय।
लुगरा पहिरे लाल के, देखत मन भर जाय।।
देखत मन  भर जाय, सबो झन मिलके गावँय।
सुग्घर सबके राग, ताल मा ताल मिलावँय।।
देखत हे  जगदीश, लगन  ला इकरे जाचत।
देवत हवय अशीष, मगन हे जम्मो नाचत।।

देवारी

सुनता  के   लेके  दिया,  घर-घर  रखबो  आज।
मिलजुल के सब संग मा, घर कुरिया ला साज।।
घर  कुरिया  ला  साज, आज लीपव सब कोती।
लेलव   कुरता  पैंट,   बबा  बर   सादा   धोती।।
सब  ला रख  तँय जोड़,  इही रस्ता ला चुन ता।
देवारी     उपहार ,  लगा   के   राहव   सुनता।।

 पूजव मनखे जिन्दा

जिन्दा मा पूछय नहीँ, मरे नवावय शीश।
मंदिर मा हो आरती, बाहर हे जगदीश।।
बाहर हे जगदीश, खड़े कोनो नइ जानय।
खोजय सब भगवान,बात काबर नइ मानय।।
मनखे   सेवा   सार,  मान  ना  हो   शर्मिंदा।
जिनगी अपन सँवार, पूजले मनखे जिन्दा।।

शौचालय

घर  मा शौचालय बना, बढ़ही  घर के मान।
खुश  रइही  बेटी  बहू, जे  हे घर के  शान।।
जे हे घर के शान,  राख ले खुश तँय ओला।
सँवर जही  घर-बार, पड़य ना रोना तोला।।
कहय आज जगदीश, बना ले तँय पल भर मा।
साथ दिही सरकार, बात  रखना  तँय घर मा।।

रचनाकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
छत्तीसगढ़