Tuesday, August 28, 2018

त्रिभंगी छन्द - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"




                 परहित बर जी ले....
                   
सत मारग धर ले,कारज कर ले,सही गलत ला,सोंच जरा।
कर  काम भलाई, जग अच्छाई,फूँक  फूँक रख,पाँव धरा।।
तब पाबे जग मा,सुख हर पग मा,मान मिले जी,सबो करा।
पर हित बर जी ले,दुख ला सहिले,राख जगत ला,हरा भरा।1।
                     
नदियाँ कस पानी,हो जिनगानी,छोड़ किनारे,बीच बहै।
देखय  ना पाछू,बोहय आघू,बीच  भँवर  ना,मोड़ कहै।।
नरवा का जानै,चिखला  सानै,भाव  भजन ला,दूर रहै।
गंगा मा  मिलथे,पाप ह  धुलथे,जे  भवसागर,पीर सहै।2।
                      
धीरज  रख  बाबू,खुद मा  काबू,पाँव  बढ़ा कर,काम भला।
तब मान ह मिलही,नाम ह चलही,तोर मोर झन,सोच चला।।
सुख के  हे  गहना,मिलके  रहना,भाग  जही सब,दूर बला।
जग मा  उजियारी,कर  सँगवारी,सत्य नाम के,जोत जला।3।
                    
सादा  के  गमछा,लगथे  अच्छा,बाँध  मूड़  मा,मान  मिले।
सत के ये चिनहा,भाथे मन हा,फूल कमल कस,देह खिले।।
पुरखा  के  थाती,सुमता  बाती,राख  बने  तैं,नाम  चले।
भागय अँधियारा,हो उजियारा,पाप मिटे सब,जोत जले।4।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

Monday, August 27, 2018

चौपाई छंद - श्री हेमलाल साहू

मच्छर अपन जहर फैलावत। गाँव शहर के घर घर जावत।
 डेंगू बीमारी बगरावत। कहर मौत के हे बरपावत।1।

देख राज मच्छर के आगे। तोर स्वच्छता कहाँ गवागे।
रोज एक झन ला मरना हे। मच्छर के तो ये कहना हे।2।

रहे गन्दगी गाँव शहर मा। रइहव सबके मयँ घर घर मा।
जिनगी मोर गंदगी अंदर। कहिथे मच्छर जंतर मंतर।3।

जात पात ला मँय नइ देखव। थोर थार सफई नइ घेपव।
गन्दा में हे रहना बसना। सबो डहर हे मोर बिछवना।4।

हवे गन्दगी दुनिया भर के। गाँव शहर मा देखव कसके।
कहाँ स्वच्छता तोर लुकागे। भुन भुन बोले मच्छर भागे।5।

फेंक गन्दगी घर के अँगना। जन कहिथे हमला का करना।
अब मच्छर के होंगे बढ़ना। हवे गन्दगी मा ओला रहना।6।

नेता मन ला का हे करना। उनला तो कोठी हे भरना।
रहिस स्वच्छता चारे दिन के। फेर बइठ गे पैसा बिन के।7।

बनिस हवे सब घर सौचालय। काम अधूरा ला करवावय।
रख रखाव ला नइ बनवावय। गली गन्दगी हा बोहावय।8।

हाल गाँव मन के अब देखव। स्वच्छ गन्दगी मा जी  रेगव।
गाँव गली घर मच्छर बसगे। डेंगू के प्रकोप सब बनगे।9।

डेंगू ले पाबे तँय काबू। अपन स्वछता ला रख बाबू।
दूर भागथे जी बीमारी। राख स्वच्छ घर अँगना बारी।10।

छन्दकार - श्री हेमलाल साहू 

Sunday, August 26, 2018

राखी विशेषांक - छन्द के छ परिवार









सरसी छंद - श्री चोवा राम "बादल "

    राखी तिहार मा

 1 बहिनी के वचन

तिलक सार भैया के माथा , राखी ला पहिनाय ।
साज आरती करिहँव सुग्घर ,भाग अपन सँहराय।।

डार मिठाई मुँह भैया के , रोटी खीर खवाय।
हाँस हाँस इँतराहूँ गउकिन , अब्बड़ मया जताय ।।

सदा सुखी राहय भइया हा , मन मा भर के भाव ।
देव मनाहूँ हाथ जोर के, छोंड़े भेद दुराव ।।

नता हवय भाई बहिनी के , सब रिश्ता ले सार ।
दउँड़त आथे किशन सहीं वो ,सुन के मोर पुकार ।।

 पाँव गड़ै झन काँटा कभ्भू ,सुखी रहै परिवार ।
मइके मा बोहावत राहय ,दया मया के धार।।

मोर दुलरवा भइया रखही , ए राखी के लाज ।
रक्षा खातिर ठाढ़े रइही , बीर सँवागा साज ।।

        2  भाई के वचन

बहिनी मोर भरोसा रखबे ,तैं हच प्राण अधार ।
मोर रहत ले तोर दुवारी , नइ आवय अँधियार ।।

सब दुख ला तोरे हर लेहूँ , देहूँ अँचरा फूल ।
तीज तिहार लिहे बर आहूँ ,नइ जाववँ मैं भूल ।।

मातु पिता के आच दुलौरिन ,मइके के तैं शान ।
जेन माँग ले वो सब मिलही , लहुटय नहीं जुबान ।।

भाँचा भाँची अउ दमाँद के , हवय इहाँ अधिकार ।
हिरदे भितरी रथौ समाये , मोर सबो परिवार ।।

रक्षा बंधन बाँधे हच तैं ,तेकर अबड़ प्रताप ।
तोरो रक्षा होही बहिनी ,हर संकट ला नाप ।।

तोर मोर में का अंतर हे ,नस नस एके धार ।
भले हवन छछले दू शाखा , हावय एके नार ।।

    3  शिष्य के वचन

पिता तुल्य तैं हे गुरुवर जी , पूरा करबे आस ।
मन भितरी के मइल हटा के , भर दे सुघर उजास ।।

ए दुनिया दारी के चक्कर , मन हावय बउराय ।
रक्षा धागा बाँध कलाई , लेबे नाथ बँचाय ।।

देव ब्रिहस्पति कस बन जाबे , मैं हावँव मतिमंद ।
झन पावँव मैं तोर हृदय के , दरवाजा ला बंद ।।

जिनगी डोंगा डगमगात हे, बूड़ जही मँझधार ।
तहीं डोंगहा बनके आके , लेबे आज उबार ।।

मन डोरी ला तोर चरण मा , बाँध रखौं थिरबाँव ।
दे असीस सिर ऊपर छाहित , राहय किरपा छाँव ।।

मोरो राखी के तिहार मा ,हावय अतके आस ।
छंद बंध मा मैं बँध जावँव , दुख के होवय नास ।।

छन्दकार - श्री चोवाराम "बादल"

छन्नपकैया छंद - आशा देशमुख

छन्नपकैया छन्नपकैया ,किसम किसम के राखी।
भाई बहिनी मन चहकत हे ,जइसे चहके पाखी।1।

छन्नपकैया छन्नपकैया,भैया देखय रस्ता।
अबड़ मोल राखी के बँधना, झन जानव गा सस्ता।2।

छन्नपकैया छन्नपकैया ,मन पहुना लुलवाथे।
ननपन के सब मान मनौवा ,अब्बड़ सुरता आथे।3।

छन्नपकैया छन्नपकैया ,भठरी मन सब आवै।
पहिली के सब रीत चलन अब ,जाने कहाँ नँदावै।4।

छन्नपकैया छन्नपकैया ,में बहिनी मति भोरी।
देखत हँव भाई के रद्दा ,धरके मया अँजोरी।5।

छन्नपकैया छन्नपकैया,घर घर बने मिठाई।
माथ सजे हे मंगल टीका, राखी सजे कलाई।

बरवै छंद - आशा देशमुख: आशा देशमुख 

किसम किसम के राखी ,सजे दुकान।
ये डोरी के होवय ,बड़ सम्मान।1।

बहिनी मन सज धज के,देखय  बाट।
भैया बर खोले हे ,द्वार कपाट।2।

सुघ्घर राखी लानय ,थाल सजाय।
खीर मिठाई जेवन ,बने बनाय।3।

भाई बहिनी कुलके ,दूनो आज।
ये तिहार ला मानय ,सबो समाज।4।

भाई बर बहिनी के ,मया दुलार।
पबरित डोरी बाँधय,ये संसार।5।

सजे कलाई राखी ,माथ गुलाल।
ये तिहार ला मानय,जग हर साल।6।

हमर देश के पबरित ,आय तिहार।
सुघ्घर लागय संस्कृति ,अउ संस्कार।7

छन्दकार - आशा देशमुख, NTPC कोरबा

इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" के रोला छंद
                 *राखी*

मया  पिरित  के  डोर,हवय  ये  बंधन राखी।
भाई  के  विश्वास,उड़य  बहिनी  धर  पाखी।।
करम लिखाये जान,जगत मा मिलथे बहिनी।
महकावय  दू  द्वार, फूल ये  खिलके  टहनी।1।

देख  जगत  के  हाल,गोहरावत  हे  बहिनी।
खड़े  दुसासन खोर,गली  दुर्योधन  शकुनी।।
कोन  बचाही लाज,खड़े  हे  हवस  पुजारी।
इज्जत  राखे  मोर,फेर  नइ  आय  मुरारी।2।

बनके आग दहेज,जलावत हौ बेटी ला।
जरके  होहू  राख,सकेले  धन  पेटी ला।।
आज हवे दिन तोर,समय आघू पछताबे।
सुरता  आही  बात,गोद  जब बेटी  पाबे।3।

बेटा के  रख चाह,कोंख करथौ  हत्या ला।
देख भला इतिहास,सवित्री अउ सत्या ला।।
बेटी  से  संसार,बात  मानव  जी भाई।
राखी बाँधै कोन,हमर जी हाथ कलाई।4।

देवत  शुभ  संस्कार,पढ़ावव  बेटी  बेटा।
गढ़ही  नेक  समाज,दूर अँधियारी मेटा।।
माँगव रक्षा आज,सबो  बहिनी भाई से।
राखी  के उपहार,बँधे  हाथ  कलाई से।5।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

ताटंक छंद - श्री मनीराम साहू 'मितान'

देखत होही रस्ता मोरे, बिहना ले गड़िया आँखी।
दीदी घर मैं जाहू दाई, बँधवा के आहूं राखी।1।

बारा महिना होगे हाबय, नइ देखे अँव ओला वो।
रहि-रहि के बड़ आवत रइथे, ओकर सुरता मोला वो।2।

सजा-धजा के राखे होही, मिठई राखी ला थारी।
तरपँवरी खजवावत हाबय, मोर करत होही चारी।3।

बने जोर दे रोठी-पीठा, अरसा खुरमी सोंहारी।
खाहीं सुग्घर भाँची भाँचा, खुश ओमन होहीं भारी।4।

भाँटो ला तो भाथे दाई,गँहू चना के होरा वो।
ओकर बर मैं लेके जाहूं, झटकुन करदे जोरा वो।5।

छन्दकार-  श्री मनीराम साहू 'मितान'
  कचलोन(सिमगा) जिला- बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

*राखी* - छन्नपकैया छन्द - श्री अजय अमृतांशु

छन्न पकैया छन्न पकैया,पक्का हम अपनाबो।
नइ लेवन अब चीनी राखी,देशी राखी लाबो।1

छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी आँसों आबे।
हमर देश के रेशम डोरी,सुग्घर तैं पहिराबे।2

छन्न पकैया छन्न पकैया, सावन आय महीना।
हमर देश के राखी ले के,पहिरव ताने सीना।

छन्न पकैया छन्न पकैया,चलन विदेशी छोड़ी।
किसन सुभद्रा जइसे भैया,राहय सब के जोड़ी।

छन्न पकैया छन्न पकैया,राखी कीमत जानौ।
मया बँधाये बहिनी मन के,येला तुम पहिचानव।5

छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी भेजे राखी।
सरहद मा भाई मन पहिरे,देवत हे सब साखी।6

छन्न पकैया छन्न पकैया,ये तिहार हे पावन।
बहिनी जब पहिरावय राखी,लागय जी मनभावन।7

छन्दकार -  श्री अजय अमृतांशु, भाटापारा

भोजली दाई (मनहरण घनाक्षरी) - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

माई खोली म माढ़े हे,भोजली दाई बाढ़े हे
ठिहा ठउर मगन हे,बने पाग नेत हे।
जस सेवा चलत हे, पवन म हलत हे,
खुशी छाये सबो तीर,नाँचे घर खेत हे।
सावन अँजोरी पाख,आये दिन हवै खास,
चढ़े भोजली म धजा,लाली कारी सेत हे।
खेती अउ किसानी बर,बने घाम पानी बर
भोजली मनाये मिल,आशीश माँ देत हे।

अन्न धन भरे दाई,दुख पीरा हरे दाई,
भोजली के मान गौन,होवै गाँव गाँव मा।
दिखे दाई हरियर,चढ़े मेवा नरियर,
धुँवा उड़े धूप के जी ,भोजली के ठाँव मा।
मुचमुच मुसकाये,टुकनी म शोभा पाये,
गाँव भर जस गावै,जुरे बर छाँव मा।
राखी के बिहान दिन,भोजली सरोये मिल,
बदे मीत मितानी ग,भोजली के नाँव मा।

भोजली दाई ह बढ़ै,लहर लहर करै,
जुरै सब बहिनी हे,सावन के मास मा।
रेशम के डोरी धर,अक्षत ग रोली धर,
बहिनी ह आये हवै,भइया के पास मा।
फुगड़ी खेलत हवै,झूलना झूलत हवै,
बाँहि डार नाचत हे,मया के गियास मा।
दया मया बोवत हे, मंगल ग होवत हे,
सावन अँजोरी उड़ै,मया ह अगास मा।

राखी के पिंयार म जी,भोजली तिहार म जी,
नाचत हे खेती बाड़ी,नाचत हे धान जी।
भुइँया के जागे भाग,भोजली के भाये राग,
सबो खूँट खुशी छाये,टरै दुख बान जी।
राखी छठ तीजा पोरा,सुख के हरे जी जोरा,
हमर गुमान हरे,बेटी माई मान जी।
मया भाई बहिनी के,नोहे कोनो कहिनी के,
कान खोंच भोजली ला,बनाले ले मितान जी

छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

राखी तिहार के आप सबो ला गाड़ा गाड़ा बधाई अउ शुभकामना💐🙏

दोहावली - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी

भाई बहिनी के मया,देखत हे संसार। 
जिनगी भरके बंधना,राखी आज तिहार।।

चंदन कुमकुम आरती,देख सजाये थार।
मिठई नरियर हे रखे,पावय  अउ उपहार।।

दया मया हा झन छुटै,रखबे भइया याद।
लोटा भर पानी मिलै,अतके हे फरियाद।।

धन दौलत मा तौल झन,बड़का हे परिवार।
टूटय झन रिश्ता नता,इही हमर संस्कार। ।

मोर मया ला झन समझ,रेशम डोरी तार।
जिनगी भर राहय बने,दया मया हे सार।।

बेटी बहिनी के बिना,सुन्ना घर  परिवार।
भेद-भाव ला छोड़ दव,ये जग के आधार।।

छन्दकार - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी, चंदैनी कवर्धा

राखी - श्री सूर्यकान्त गुप्ता

बँधय बँधावय नहीं  राखी डोरी के जी गाँठ,
होवत  रथे  ए  ढिल्ला  घेरी  बेरी  आज  तो।
काबर   बेटी  माई  दुष्कर्म के शिकार  होथे,
सरे   आम   उंकर   बेचात   हवै  लाज  तो।।
आथे  हर   साल ए  तिहार भाई  बहिनी के,
रहिथे   मगन   नेंग   रीत   मा   समाज  तो।
हिरदे  ले  जागै  प्रीत   निभय निभावँय बने,
पबरित   रिश्ता  ऊपर  गिरै  झन  गाज  तो।।

छन्दकार - श्री सूर्यकान्त गुप्ता, सिंधिया नगर दुर्ग (छ.ग.)

कुकुभ छंद - श्री राजेश कुमार निषाद

चलना भाई आज हमन गा, राखी जाके बँधवाबो।
रहिथे बहिनी हमरो दुरिहा,देख हमन वोला आबो।।

मया पिरित के हमरों बँधना, हावय बहिनी ये राखी।
लइका पन मा राहस तैंहर, हमरों वो आखी आखी।।

चल दे हावस तैंहर दुरिहा,सुरता तोरे बड़ आथे।
भेजे हावस लिखके खत तैं,पढ़के मन ला ओ भाथे।।

राहस तिर मा तैंहर बहिनी,बाँधस राखी ल कलाई।
माँगस तैंहर वचन हमर से,करबे भइया ग भलाई।।

हमर मया ला बाँधे रहिबे,राखी के ये बँधना मा।
आवत जावत रहिबे बहिनी,सदा हमर ओ अँगना मा।।

छन्दकार - श्री राजेश कुमार निषाद
ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर (छ. ग.)


गीत-"राखी आगे"
श्री बोधन राम निषाद राज
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
राखी के आगे हे तिहार,
सखी रे चलो नाचो गाओ।
भाई-बहन के ये प्यार,
सखी रे चलो नाचो गाओ।।

भइया हमारो आवत हे घर ले,
रद्दा अगोरत राखी ला धर ले।
पारत हँव गली ले गोहार,
सखी रे चलो नाचो गाओ।
राखी के आगे हे तिहार...........

आथे तिहार दीदी बछर भर में,
सुख के दिन आथे हमर घर में।
राखी के ये बँधना हमार,
सखी रे चलो नाचो गाओ।
राखी के आगे हे तिहार...........

माथे मा चन्दन टीका लगाबो,
भइया ले सुग्घर आशीष पाबो।
हमरो तो हावय अधिकार,
सखी रे चलो नाचो गाओ।
राखी के आगे हे तिहार...........
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
छन्दकार:-
श्री बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता वाणिज्य विभाग
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम (छ.ग.)

छप्पय छंद - श्री मोहनलाल वर्मा

सावन पुन्नी खास,मनाथें रक्षाबंधन   ।
बहिनी राखी बाँध,लगाथे रोली चंदन। 
भाई दे उपहार,मया बहिनी के पाथे।
रक्षा के जब डोर,कलाई मा बँध जाथे।।
भाई-बहिनी के मया,हे अटूट संसार मा। 
रक्षाबंधन के परब,दिखथे जे परिवार मा।।

छन्दकार - श्री मोहनलाल वर्मा ,
ग्राम-अल्दा,तिल्दा,रायपुर(छ.ग.)


अमृतध्वनि छंद - श्री दिलीप कुमार वर्मा

रेशम डोरी बाँध के,माँगय दुआ हजार। 
भाई हा जुगजुग जियय,सुखी रहे घरद्वार। 
सुखी रहे घर, द्वार कभू ना,विपदा आवय।  
छाहित राहय,सुख के बादर, दुख झन छावय। 
ऊपर वाले,अब तो सुनले,बिनती मोरी। 
दया मया भर,बहिनी बाँधय,रेशम डोरी। 

छन्दकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदा बाज़ार, छत्तीसगढ़


आल्हा छन्द -  श्रीमती आशा देशमुख

ये राखी के रीत चलागन ,कोन करे हावय शुरुआत।
आवव सुनलव भाई बहिनी ,कथा कहानी के ये बात।1।

राजा बलि के परछो लेबर ,वामन रूप धरे भगवान।
तीन पाँव भुइँया ला माँगय ,राजा बलि देवत हे दान।2।

एक पाँव मा धरती नापय ,एक पाँव ला रखे अकास।
एक पाँव मा बलि ला नापय, जा बलि कर पाताल निवास।3।

वचन निभावय बलि राजा हा ,तब बोलत हावय भगवान।
माँग जेन चाही बलि तोला  ,मैं देहँव ओही वरदान।4।

मोर राज्य के रक्षा करबे ,बन जा प्रभु मोरे रखवार।
राज सिंहासन बइठे बलि अउ ,विष्णु देव हे पहरेदार।5।

येती लक्ष्मी बइठे सोचे, चिंता दिखन लगय अब माथ।
बड़ दिन होगे हावय अब तो,कहाँ गए हे मोरे नाथ।6।

जान डरिस लक्ष्मी हर जइसे ,प्रभु हर रमे लोक पाताल।
जग हित बर सब खेल करत हे ,लीलाधारी दीनदयाल।7।


लक्ष्मी पहुँचे बलि के द्वारी ,रक्षा सूत्र रखे हे थाल।
लक्ष्मी बनगे बलि के बहिनी ,माथ लगावय तिलक गुलाल।8।

भाई बनके बलि हा बोलय ,माँग बहिन कोनो उपहार।
दे दे भैया मोला तैहर ,तोर खड़े हे पहरेदार।9

तब ले भाई अउ बहिनी के, रक्षा बंधन बनिस तिहार।
बड़ पबरित ये राखी रिश्ता ,मान त हे जम्मों संसार।10

हरिगीतिका छंद

रक्षा करव रक्षा करव ,निर्बल दुखी असहाय के।
बगराव ये जग मा मया, झन सँग धरव अन्याय के।
भाई बहिन बंधु सखा,पबरित रखव सबसे नता।
ये देश तो परिवार हे ,मन मा रखव  बस नम्रता।

छन्दकार - श्रीमती आशा देशमुख


सरसी छंद आधारित गीत -  श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी

मोर मयारू भइया सुनले,अतके मोर गुहार।
दया मया जिनगी भर देबे,पावँव संग दुलार।

1-ननपन मा संग संग खेलन,गुजरे कतको साल।
   बिधि के लिखना कोन मिटाथे,जावत हँव ससुराल।
शोर खबर ला लेवत रहिबे,आही तीज तिहार
दया मया-------

2-सोना चाँदी रुपिया पइसा,नइ चाही उपहार।
   मीठ बचन लोटा भर पानी,इही मोर बर सार।
मोर मयारू भइया सबले,हावय गा दिलदार।
दया मया-----

3-एक बचन बस माँगव भइया,राखी आज तिहार।
   नसा पान ले दुरिहा रहिबे,झन भुलबे संस्कार।
कर लेबे दाई बाबू के ,सेवा अउ सत्कार।
दया मया-----

छन्दकार - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी


दोहा छंद - श्री पोखनलाल जायसवाल

बहिनी सुरता ला लमा ,  राखी धर जब आय ।
भाई मया परेम के , बँधना मा बँध जाय ।।

बहिनी राखी बाँध के , माथा तिलक लगाय ।
भइया के कर आरती , मिठई घला खवाय।।

बहिनी राखी बाँध के , माँगय ये उपहार ।
पावत रहँव दुलार ला , आके तोर दुआर ।।

भाई बहिनी ले कहय , टूटन नइ दँव आस ।
सुख दुख मानन संग मा , करबे तैं परयास ।।
       
बचा बचा के राखबे , मइके के तैं लाज ।
मया लुटा ससुरार मा ,करबे तैंहर राज ।।

छन्दकार - श्री पोखन लाल जायसवाल
 पठारीडीह ( पलारी ) जिला बलौदाबाजार भाटापारा  (छ ग)


लावणी छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

बहिनी के बाँधे राखी

पावन पबरित नेह निशानी,बहिनी के बाँधे राखी।
वेद मंत्र के शक्ति समाहित,जे मा गुरुवाणी साखी।

केवल डोरी नोहय राखी,बहिनी के विश्वास हरे।
भाई बर अंतस अराधना,फलदायक उपवास हरे।

बहिनी जस असीस के मूरत,धरे आरती के थाली।
माथ लगावय चंदन टीका,बाँधय धागा बलशाली।

रक्षा कवच हरय भाई बर,राखी के पावन धागा।
नेह नता के रक्षा होही,भाई के सिर हे पागा।

मान-गउन बहिनी के करिहँव,अस भाई भाखा भाखय।
चिरंजीव जीवन धन यश बल,बहिनी भाई बर मांगय।

कतको झन मन बाँधँय राखी,रुखराई ला रस्ता मा।
हमर पढ़इया लइकन बाँधँय,कापी पुस्तक बस्ता मा।

घर के मुखिया बाँधय राखी,दरवाजा पूजाघर मा।
ईष्ट ग्रंथ मा दाबँय कतको,राखी ला पन्ना तर मा।

छन्दकार - श्रीसुखदेव सिंह अहिलेश्वर
         गोरखपुर,कवर्धा(छत्तीसगढ़)


ताटंक छन्द -  श्री कुलदीप सिन्हा "दीप"

राखी तिहार

सावन महिना मा बहिनी मन, याद अबड़ के आथे जी।
बहिनी मन हा धर के राखी, भइया के घर जाथे जी।।

रेशम के डोरी ला बाँधे, माथा तिलक लगाथे जी।
बहिनी के रक्षा के वादा, भइया घलो निभाथे जी।।

पा के आशिष भइया मन ले, बहिनी खुश हो जाथे जी।
हँसी खुशी मा परब प्यार के,जुर मिल सबो मनाथे जी।।

इही बहाना मात पिता ला, देख सबो गा आथे जी।
बड़ सुघ्घर हे सावन महिना, मया प्रेम बगराथे जी।।

आही जब जब महिना सावन, तब तब राखी आही जी।
भाई बहिनी मन ला सुरता, येहा घलो कराही जी।।

छन्दकार - श्री कुलदीप सिन्हा "दीप"


Friday, August 24, 2018

भुजंग प्रयात छंद - आशा देशमुख

कृष्णा -

बचाये हवे लाज जे दौपदी के।
उही हे जँचैया ग नेकी बदी के।

महायुद्ध में जेन गीता सुनाये।
सबो लोक मा ज्ञान गंगा बहाये।

अमीरी गरीबी दिए पाट खाई।
सुदामा सखा के निभाए मिताई।

धरा मा बढ़े हे जभे पाप भारी।
धरे हे तभे जन्म कृष्णा मुरारी।

भाव -

रिसाये हवे मोर तो लेखनी जी।
इँहा भाव आवै न एको कनी जी।
बिसे हा लुकाये गये कोन कोती।
चुपे चाप कॉपी नही शब्द मोती।  1

कहाँ मेर खोजौं कहाँ मेर जावौं।
रिसाये हवे भाव कैसे मनावौं।
लगे भावना के दिया हा बुतागे।
अँधेरा तरी मा जिया हा लुकागे। 2

गुरू मोर रोजे लुटाये खजाना।
सिखाये विधा छंद गावै तराना।
जिहाँ ज्ञान के रोज जोती जले हे।
तिहाँ एकता प्रेम मोती पले हे। 3

नवा सोच आवै पुराना मनावै।
इहाँ आज काली म जीना सिखावै।
लगे जिंदगी हा नवा रूप पावै।
दया प्रेम बैठे घृणा लोभ जावै।4

मया हे दया हे कहे एक नारा।
सबो ला गुरू छाँव लागै पियारा।
बड़े हे न छोटे सबो एक जैसे।
मिले मातु गोदी गुरू प्रेम वैसे। 5

जहाँ ज्ञान संस्कार दूनो पले हे।
उहाँ मान रिश्ता भरोसा मिले हे।
जिहाँ साधना छंद के हे पुजारी।
धरे प्रेम बंशी बजाए मुरारी। 6

देश के दुर्दशा -

बढ़े देश मा आज बेरोजगारी।
धरे घूमथे जान डिग्री ग धारी।
कहूँ मेर कोनो मिले काम बूता।
चले रोज देखौ घिसाये ग जूता। 1

सबो तो करे हे लिखाई पढ़ाई।
करे स्कूल कालेज भारी कमाई।
लगे आज विद्या ह व्यापार होगे।
छले और कोनो भले लोग भोगे। 2

बढ़े रोज देखौ ग चोरी चकारी।
बने आदमी हा बने हे भिखारी।
सबो भ्रष्ट हे आज नेता सिपाही।
दिखे बंद रस्ता कहाँ लोग जाही। 3

बड़े नाम वाले तिजोरी भरे हे।
कहूँ मेर हत्या डकैती करे हे।
धरे हे तराजू हवे न्याय अंधा।
चुपे साँच बैठे करे झूठ धंधा। 4

करे कोन उद्धार ये देश रोवै।
रखैया हवे मोर वो जान खोवै।
बता देश के कोन पीरा सुनैया।
जहाँ मेर देखौ वहाँ हे लुटैया। 5

छन्दकार - आशा देशमुख

आल्हा छन्द - श्री हेमलाल साहू


आजाद भगत गौतम गाँधी, जइसन बनहूँ महूँ महान।
अपन देश बर मर मिट जाहू, रखहूँ दाई के मँय मान।1।

भारत माता के चोला ला, बनहूँ पहन शिवाजी वीर।
भुइँया दाई के सेवा कर, जन जन के हरहू मँय पीर।2।

कपट भेद ला मेटव मन के, नाता रिश्ता सुघ्घर जोर।
प्रेम दया ला बाटव सुघ्घर, अपन देश के चारो ओर।3।

अपन देश मा मानवता ला, हमन जगाबो बन पहचान।
मिल नवा नवा रद्दा गढ़बो, भुइँया मा लाबो भगवान।4।

हरियर हरियर लुगरा पहिने, सुघ्घर धरती दाई मोर।
हाँसत रइही भुइँया दाई, दया मया धर अँचरा छोर।5।

सबो डहर खुशयाली रइही, चिरई चिरगुन के बन सोर।
गाँव गाँव ला सरग बनाबो, आवय भैया नवा अँजोर।6।

छन्दकार - श्री हेमलाल साहू 
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़ बेमेतरा
मो.नम्बर 9977831273

Thursday, August 23, 2018

जलहरण घनाक्षरी - श्री दिलीप कुमार वर्मा

1
करत बिकास देश,बदलत हावे भेष,
आनी बानी मिले क्लेश,देख ले सबो डहर।
बड़े बड़े कारखाना,धुवें धुँवा आनाजाना,
तभो सुख बतलाना,तन मा भरे जहर। 
बड़े बड़े हे अटारी,कहाँ मिले कोलाबारी,
गाँव ह गंवागे संगी, चारो कोती हे शहर।
घर मा लुकाये रथे, जिनगी उही ल कथे,
गरमी सताये रथे, साँझ हो या दुपहर। 

2
रुख राई कटा गे हे, नदी नाला पटा गे हे,
तरिया ह अँटा गे हे, मनखे के हे कहर।
पहाड़ी ल खाँच डारे,भाँठा सब बाँट डारे,
खेत खार चाँट डारे,जाके बस गे शहर।
करिहौं विकास कहे,जन जन आस रहे,
 हवा जाने काय बहे, चारोकोति हे जहर।
अब तो मरन होगे,सुख सब के गा खोगे,
करनी अपन भोगे,दुख हे चारो डहर।

छन्दकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार, छत्तीसगढ़

Wednesday, August 22, 2018

सुंदरी सवैया - श्री मोहन लाल वर्मा


                      (1) 

परके  दुख ला नइ तैं समझे ,अउ रोज करे अपने मनमानी।
गरजे अबड़े  बल के मद मा,बनके जस रावण गा अभिमानी।
ककरो नइ बात सुने भइया, मद मा तँय चूर करे ग सियानी।
बइरी बड़ पोंस डरे जग मा,सिरतो करके खइता जिनगानी।।

                  (2)

भइया हमरे समझाय कहे,चल फाँद तहूँ बइला अउ गाड़ी।
बड़की भउजी खिसियाय कहे, नइ टारस तैं पथरा अउ काड़ी।
उपजे अबड़े बन खेत हवे, सब मेंड़ दिखे जस जंगल झाड़ी।
बइठे-बइठे कइसे चलही, जब बोर खनाय  रखे घर बाड़ी।।
                       
                          (3)

लइका हमरे गुणवान बने,चल कारज ला अइसे करबो जी।
पढ़के लिखके जुग योग्य बने,सत मारग ला अइसे गढ़बो जी।
सुरता करबो पुरखा मन के,अउ ध्यान सदा उँकरे धरबो जी।
सँहरावय गा इतिहास घलो,रचना अपने  अइसे रचबो जी।।

                         (4)

बइठे- बइठे गुनथौं मन मा ,कइसे अब आय हवे ग जमाना।
झगरा सुलझाँय नहीं मनखें,तज गाँव गुड़ी झट रेंगँय थाना।
करथें बरबाद सबो धन ला ,बिरथा गिनथें अबड़े तलवाना।
नइ हासिल गा कुछु होय उहाँ,तब मूँड़ धरे परथे पछताना।।

                       (5)

बरसै जब थोरिक बादर हा,उथली नरवा नदिया उफनाथें।
अध ज्ञान धरे मनखें अबड़े ,खुद के मुख मा गुणगान सुनाथें।
कमती मति के बस कारण मा,धनवान सहीं नुकसान गिनाथें।
छलके जल आध भरे गगरी,जइसे अपने सब हाल बनाथें।।

       रचनाकार:-  मोहन लाल वर्मा 
     पता:- ग्राम- अल्दा,पोस्ट आफिस-     तुलसी(मानपुर),व्हाया-हिरमी,विकास खंड-तिल्दा,जिला-रायपुर (छत्तीसगढ़)

Sunday, August 19, 2018

लावणी छन्द - श्री अजय अमृतांशु




रक्तदान - महादान

रक्तदान करके संगी हो,ककरो प्राण बचावा जी।
दान हवय ये सबले बढ़ के,सब ला बात बतावा जी।1

रक्तदान ईश्वर के पूजा,बात सबो झन जानव गा।
सेवा सबले बढ़ के येहा,बात तुमन ये मानव गा।2

पइसा मा जब खून मिलय ना,उही समय सब पछताथे।
जिनगी अधर म लटके रहिथे,तब ये बात समझ पाथे।3

खून बनय ना लेब म संगी,कीमत येकर जानव जी।
येहा केवल देह म बनथे,येला सब झन मानव जी।4

रक्तदान कमजोरी लाथे,भरम भूत तुम झन पालव।
खून साफ होथे येकर ले,मन मा येला बइठालव।5

कभू परय नइ दिल के दौरा,रक्तदान के गुन भारी। बी.पी.लेबल स्थिर रहिथे जी,बात बने हे सँगवारी।6

वजन घलो नइ बाढ़य संगी,मोटापा होथे जी कम।
मंत्र हवय ये स्वस्थ रहे के,रक्तदान मा काबर गम।7

रक्तदान ले बढ़ के भैया,दुसर दान नइ होवै गा।
पीरा हरथे जेन दुसर के, तेन कभू नइ रोवै गा।8

छन्दकार - श्री अजय अमृतांशु
भाटापारा, छत्तीसगढ़

Saturday, August 18, 2018

सार छन्द - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी



सार छंद 

बिधि के बिधना कोन मिटाही,जो होना हे होथे।
अपन-अपन तकदीर हवै जी,पाथे कोनो खोथे।
दुख-सुख मा ये जिनगी बीतय,हाँसे कोनो रोथे।
खेलत-कूदत रहिथे कतको,जागे कोनो सोथे।

हे अमीर देखव जी कतको,अउ गरीब हे कोनो।
हवै बिछड़ के कोनो रोवत,अउ करीब हे कोनो।
कतको हावय सीधा-सादा,अउ अजीब हे कोनो।
कतको मनखे हवै अभागा,बदनसीब हे कोनो।

धन दौलत अउ महल अटारी,दू दिन के सँगवारी।
मनखे स्वारथ मा अँधरा  हे,करे गजब मतवारी।
भूल मान मर्यादा जाथे,भाथे झूठ लबारी। 
चारी चुगली हरदम भाथे,आदत ले लाचारी।

दया मया ला भूले रहिथे,हावय दानव बनके।
कइसे होगे देखव मनखे,चलथे रसता तनके।
करम धरम हा अउ नइ भावय,लड़े लड़ाई डँटके।
का मिले बतादे तँय संगी,जाँत-पाँत मा बँटके।

छन्दकार - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी

हरिगीतिका छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर



जिनगी पहावत जात हे

दुख ला धरे सुख ला धरे,जिनगी पहावत जात हे।
कखरो अवइया साँझ हे,कखरो पहाती रात हे।
कोन्हो जगावैं जाग के,कोनो उँघावत हें इँहा।
आखिर मना थक हार के,चूल्हा जलावत हे इँहा।

कोनो कुलुप अँधियार मा,दीया जलावत जात हें।
भटकँय न कोनो राह मा,रस्ता दिखावत जात हें।
होवय कहूँ त्यौहार ता,कोन्हो मनावँय गम इँहा।
सुख मा हँसत हे आँख हा,दुख मा नयन हे नम इँहा।

कोनो परे परपंच मा,अंतस अपन भरमात हें।
कोनो शबद साबुन धरे,मन मइल ला उजरात हें।
अरजी हवै परमातमा,अँगुरी दसो ठन जोर के।
रस्ता धराहौ हे पिता,जिनगी ल सुग्घर भोर के।

                रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
                        गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

Thursday, August 16, 2018

अरविंद सवैया - आशा देशमुख


1- मनखे
मनखे अतका चतुरा बनगे मन ही मन सोचत हे भगवान ।
सुख में सुमिरै तक नाम नही दुख मा सब बोलत हे भगवान ।
तन थोकिन जर्जर होवत हे कहिथे तब घोरत हे भगवान ।
खुद आलस में मनखे रहिथे अउ बोलय सोवत हे भगवान ।

2 - क्षमा याचना
जिभिया गलती कर डारिस हे पर अंतस पावन हे गुरुदेव ।
पथरा पटके कस लागत हे अँखिया बर सावन हे गुरुदेव ।
परछो गुरु लेवत हे कहिके मन मोद उछावन हे गुरुदेव ।
जड़ हे मति मोर क्षमा कर दौ मुड़ लाज लजावन हे गुरुदेव ।।

3 -पूस के रात
बिन कंबल के तरसे हलकू जब आइस पूस जनाइस जाड़ ।
अति ठंड लगे ठिठुरे तन हा अउ हाँथ जुड़ावय काँपय हाड़ ।
जबरा बइठे रतिया भर संग म पूँछ  हिलावय पावय लाड़ ।
बिहने हलकू जब खेत ल देखय रोवय अब्बड़ गा बम फाड़ ।

4 - गुरु
मनखे मनखे सब एक हवे ,गुरु ज्ञान दिया सत जोत जलाय ।
सुमिरै गुरुनाम तरे भवसागर अंतस मा लहरा लहराय ।
दिन रात बरे सत जोत जिहाँ सुख के अँवरा सब ओर समाय ।
जिनगी सुधरे सब ताप मिटे सत के रसता गुरु ज्ञान बताय ।

5-तिवरा बटरा
तिंवरा बटरा गहदे अति सुघ्घर देखत ये मन हा हरसाय ।
अति कोंवर कोंवर पान उलोहय  अब्बड़ इंखर साग मिठाय ।
धरके जब हाट म लाय मरारिन भाव बढ़ाय तभो बिक जाय ।
अतका मन भावत हे तिंवरा बटरा सबके मन ला ललचाय ।

छन्दकार - आशा देशमुख, कोरबा, छत्तीसगढ़

Wednesday, August 15, 2018

विशेषांक - स्वतंत्रता दिवस



(1) इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" - चौपाई छंद

वीर शहीद दिये  कुरबानी,शत शत नमन  इँखर बलिदानी।
देश धरम राखँय पहिचानी,अर्पन कर दिए सरी जिनगानी।1।

वीर भगत सिंह चढ़गे फाँसी,खूब  लड़य मर्दानी झाँसी।
लाल बाल पाल  चंद्रशेखर,देख फिरंगी काँपय  थरथर।2।

गरम नरम दल अहिंसावादी,एक साथ मिल करिन अजादी।
सपना  सुघ्घर आँख  सँजोवय,सोन  चिरइँया भारत  होवय।3।

माह अगस्त क्रांतिवादी,पन्द्रह तारीख लिन अजादी।
सन सैंतालीस  खुशी  छागे,छोड़  देश अंग्रेजी भागे।4।

देश अजादी परब मनाबो,लाल किला मा धज फहराबो।
देश  भक्ति के  गीत  सुनाबो,शान  तिरंगा  मान  बढ़ाबो।5।

केसरिया रंग चुनर घानी,राह बतावय त्याग निशानी।
श्वेत रंग हे शांति निशाना,हरा रंग  समृद्धि बताना।6।

चंदन  जइसे  जेकर  माटी,पहरादार  हिमालय  घाटी।
भारत भुइँया सोन चिरइँया,चरन पखारय गंगा मइँया।7।

पर अब देखव हालत भारी,झूठ पाप मारत किलकारी।
बात भुलागे सबो  सियानी,राजनीति के चलत कहानी।8।

सपना भारत आज  उजड़गे,मनखे  हा मनखे  बर अड़गे।
जाति धरम बर लड़त लड़ाई,हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई।9।

एक धरम बस देश धरम हो,देश बिकास सबके करम हो।
तब  होबो  हम  भाई  भाई,हिन्दू  मुस्लिम  सिक्ख  इसाई।10।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

(2) हरिगीतिका छंद - श्रीमति आशा आजाद

सुग्घर देश

सुग्घर हवय सुन देश जी,हे मान गा ये शान गा।
जिनगी बसय सुन देश मा,बसथे इहे सम्मान गा।
अरपन करव सब देश बर,सेवा करव मिल देश के।
हिरदय बसे समता सुनव,सम्मान कर सब भेष के।।

बोली अलग मनखे अलग,ऐके रहय मिल साथ दे।
कतको रहय पीरा सुनौ,मनखे सबो सुन हाथ दे।।
सब मान लौ समता रखौ,मिलके करव सब काम ला।
सब राखलौ सब बाँध लौ,नाता निभा कर नाम ला।

श्रीमति आशा आजाद
(3) दोहा छन्द - श्रीमति आशा आजाद

भारत माँ

भारत माँ के चरन मा,माथ नवावँव आज।
भारत माँ के शान मा,जनगण छेड़ौ साज।।

मनखे मनखे जान ले, हे भारत के शान।
भुइँया सबके जान हे,हवँय हमर अभिमान।।

वीर अपन जवान हे,भारत के पहिचान।
रक्षा करके देश के,दीन हवय सम्मान।।

माथ तिरंगा मा झुके,नतमस्तक हो आज।
जय हिंद के ऐ शोर ले,गूजँय एके साज।।

छन्दकार - श्रीमती आशा आजाद


(4) सार छंद -  श्री कुलदीप सिन्हा "दीप"

अमर तिरंगा

आज समय हे आजादी के, बात सबो गा मानो।
अमर तिरंगा अमर रही गा, मन मा पक्का ठानो।।

इही हरय गा शान देश के, सबके मान बढ़ाथे।
समरसता अउ मानवता के, सबला पाठ पढ़ाथे।।

येहा होथे सबले ऊपर, जाति धरम भाषा ले।
येला ऊपर सब राखव गा, खुद के अभिलाषा ले।।

पावन दिन आज हमर हे, चलव मनाबो तिहार।
प्रेमभाव ले रहिबो हम सब, सुघ्घर रखव विचार।।

वीर भगत हा फाँसी चढ़गे, पाये बर गा येला।
येखर खातिर लगे रिहीस हे, जेल घलो मा मेला।।

करिस तपस्या बापू जी हा, लाइस हे आजादी।
माल विदेशी जलवा दिस अउ, पहिनिस कपड़ा खादी।।

गाँव गाँव अउ शहर शहर मा, फहराबो ग तिरंगा।
हम सब भारत वासी बर ये, हरय ग पावन गंगा।।

इही हरय गा जान देश के, येखर मान बढ़ाबो।
आवव संगी आज सबो मिल, येला माथ नवाबो।।

छन्दकार - श्री कुलदीप सिन्हा "दीप"

(5) चौपाई छन्द - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

      देश अजादी परब मनाबो

वीर शहीद दिये  कुरबानी,शत शत नमन  इँखर बलिदानी।
देश धरम राखँय पहिचानी,अर्पन कर दिए सरी जिनगानी।1।

वीर भगत सिंह चढ़गे फाँसी,खूब  लड़य मर्दानी झाँसी।
लाल बाल पाल  चंद्रशेखर,देख फिरंगी काँपय  थरथर।2।

गरम नरम दल अहिंसावादी,एक साथ मिल करिन अजादी।
सपना  सुघ्घर आँख  सँजोवय,सोन  चिरइँया भारत  होवय।3।

माह अगस्त क्रांतिवादी,पन्द्रह तारीख लिन अजादी।
सन सैंतालीस  खुशी  छागे,छोड़  देश अंग्रेजी भागे।4।

देश अजादी परब मनाबो,लाल किला मा धज फहराबो।
देश  भक्ति के  गीत  सुनाबो,शान  तिरंगा  मान  बढ़ाबो।5।

केसरिया रंग चुनर घानी,राह बतावय त्याग निशानी।
श्वेत रंग हे शांति निशाना,हरा रंग  समृद्धि बताना।6।

चंदन  जइसे  जेकर  माटी,पहरादार  हिमालय  घाटी।
भारत भुइँया सोन चिरइँया,चरन पखारय गंगा मइँया।7।

पर अब देखव हालत भारी,झूठ पाप मारत किलकारी।
बात भुलागे सबो  सियानी,राजनीति के चलत कहानी।8।

सपना भारत आज  उजड़गे,मनखे  हा मनखे  बर अड़गे।
जाति धरम बर लड़त लड़ाई,हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई।9।

एक धरम बस देश धरम हो,देश बिकास सबके करम हो।
तब  होबो  हम  भाई  भाई,हिन्दू  मुस्लिम  सिक्ख  इसाई।10।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

(6) आल्हा छन्द--श्रीमती नीलम जायसवाल

 सैनिक

हमर देश के सैनिक भइया, करथे सेवा देश बचाय।
सीमा के रखवार हवय जी,भारत खातिर जान गँवाय।।

धरती माँ के करथे पूजा, गगन तिरंगा ला फहराय।
आफत-बिपत इही हा टारय,हर मुस्किल मा साथ निभाय।।

दया-भाव जनता बर राखय,दुसमन के छाती चढ़ जाय।
एक खून के खातिर भइया, दस-दस मूड़ काट के लाय।।

इखर नाम ले दुसमन काँपैं,थर-थर थर-थर उन थर्राँय।
भारत के सेना ले दुसमन,बच के जाय नहीं गा पाँय।।

छन्दकार - श्रीमती नीलम जायसवाल

(7) अमृत ध्वनि छन्द - श्रीमती नीलम जायसवाल

वीर सैनिक

हमर देश के वीर मन,रन मा देथें जान।
भारत माँ के लाल हें,हवँय हमर जी शान।।
हवँय हमर जी,शान-मान अउ,गरब सबो गा।
सैनिक मन के,गुण ला निस दिन,चलो कबो गा।।
बन्दुक धर के,पलटन चलथे, सुघर भेस के।
सरी विपत ला,सैनिक हरथें,हमर देश के।।

छन्दकार - श्रीमती नीलम जायसवाल

(8) आल्हा छंद - श्री राजेश कुमार निषाद

भारत माँ के बेटा संगी,अपन कभू नइ मानव हार।
वीर वंश के मैं बलिदानी, देवय चाहे मोला मार।

चढ़के संगी सरहद मैं हर, खड़े रहूँ जी सीना तान।
बइरी मन ला मार गिराहूं,चाहे छूटे मोरो प्राण।

जब जब बइरी आँख दिखाही,खींच उठा हूँ जी तलवार।
शोला बनके कहर बरस हूँ, भागय बइरी सुन ललकार।

सरहद मा जी गोला बरसे,होवय गोली के बौछार।
अपन कदम ला कभू न रोकँव,भरके लड़हूँ मैं हुंकार।

मरदानी झांसी की रानी, भरथे मोरो अंदर जोस।
लड़ जाहूँ मैं बइरी मन से,बनके वीर सिपाही बोस।

गाँधी भगत तोर कुरबानी, राखे हाँवव मैं हर याद।
कइसे आज भुलाहूँ ये दिन,होइस हमर देश आजाद।

छन्दकार - श्री राजेश कुमार निषाद

(9) दोहा गीत - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

लहर लहर लहरात हे,हमर तिरंगा आज।
इही हमर बर जान ए,इही  हमर ए लाज।
हाँसत  हे  मुस्कात  हे,जंगल  झाड़ी देख।
नँदिया झरना गात हे,बदलत हावय लेख।
जब्बर  छाती  तान  के, हवे  वीर  तैनात।
संसो  कहाँ  सुबे   हवे, नइहे  संसो   रात।
महतारी के लाल सब,मगन करे मिल काज।
लहर------------------------------ आज।

उत्तर  दक्षिण देख ले,पूरब पश्चिम झाँक।
भारत भुँइया ए हरे,कम झन तैंहर आँक।
गावय गाथा ला पवन,सूरज सँग मा चाँद।
उगे सुमत  के  हे फसल,नइहे बइरी काँद।
का  का  मैं  बतियाँव गा,हवै सोनहा राज।
लहर------------------------------लाज।

तीन रंग के हे ध्वजा, हरा गाजरी स्वेत।
जय हो भारत भारती,नाम सबो हे लेत।
कोटि कोटि परनाम हे,सरग बरोबर देस।
रहिथे सब मनखे इँहा, भेदभाव ला लेस।
जनम  धरे  हौं मैं इहाँ,हावय मोला नाज।
लहर-----------------------------लाज।


छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

(11) दोहा छन्द - श्री मनीराम साहू "मितान"

सुग्घर नील अगास मा, लहर-लहर लहराय।
दृष्य तिरंगा देख के, अंतस  बड़ सुख  पाय।।

छन्दकार - श्री मनीराम साहू 'मितान'

(12) आल्हा छंद- श्री बोधन राम निषाद राज

 वीर जवान

महूँ देश के बेटा आवौ,भारत माता के अँव लाल।
जावन दे सीमा मा मोला,करहूँ बइरी बारा हाल।।01।।

आँख उठाके देखै मोला,ओखर आँखी देहूँ फोर।
गद्दारी करके वो घुसरै,भितरी-भितरी बनके चोर।।02।।

कायर बनके लड़ना जानै,आगू मा हिम्मत नइ होय।
पाछू पाछू गड्ढा कोड़य,तभो पार नइ पावय कोय।।03।।

का मिलही रे लहू रकत मा,काबर धार लहू बोहाय।
कतका बल ला गरजत हावय,पगला हाथी कस बउराय।।04।।

भारत माता के बेटा अँव,खड़े हवँव मँय छाती तान।
मँय ललकारत हावँव तोला, हिम्मत ला मोरो पहिचान।।05।।

काखर बल मा बल गरजत हस,आगू मा तँय आके देख।
हम सेनानी मर मिट जाबो,सरहद पाँव बढ़ाके देख।।06।।

हमर दुवारी आके गरजे,आँखी लाल दिखाए तँय।
धरके गोला आज उड़ाबो,कहूँ कभू गुर्राए तँय।।07।।

आज हमर ताकत ला देखत,दुनिया हा सब शीश झुकाय।
तँय हर कोन खेत के मूली,जग मा अपने हँसी कराय।।08।।

जतका सेना तोर दुवारी,एक राज मा मोर समाय।
एखर जादा बल झन करबे,गुसियाबो ता हवा उड़ाय।।09।।

आजा बेटा मोर तीर मा,हाथ लड़ा के तँय तो देख।
हाथ काट के मुड़ मा रखहूँ,आँख लड़ा के तँय तो देख।।10।।

पथरा ढेला तहीं चलाथस,थोरिक लाज शरम नइ आय।
देहूँ मुटका अइसन करबे,लहू रकत तोरो बह जाय।।11।।

छन्दकार - श्री बोधन राम निषाद राज

(13) कुण्डलियाँ छन्द - श्री कन्हैया साहू "अमित"

देश के नाम

01-
धजा तिरंगा देश के, फहर-फहर फहराय।
तीन रंग के शान ले, बैरी घलो डराय।
बैरी घलो डराय, रहय कतको अभिमानी।
देबो अपन परान, निछावर हमर जवानी।
कहै अमित कविराय, कभू आवय झन अड़ंगा।
जनगण मन रखवार, अमर हो धजा तिरंगा।

02-
भुँइयाँ भारत हा हवय, सिरतों सरग समान।
सुमता के उगथे सुरुज, होथे नवा बिहान। 
होथे नवा बिहान, फुलँय सब भाखा बोली।
किसिम किसिम के जात, दिखँय जी एक्के टोली।
कहे अमित कविराय, कहाँ अइसन जुड़ छँइयाँ।
सबले सुग्घर देश, सरग कस भारत भुँइयाँ।

छन्दकार - श्री कन्हैया साहू "अमित" 

(14) आल्हा छंद- श्री असकरन दास जोगी 
         स्वतंत्रता सेनानी 

धरती माता के बेटा जी,स्वतंत्रता सेनानी ताँय |
जान गँवाके करदिन रक्षा,अइसन बड़ बलिदानी आँय |1|

गरज-गरज के सब झन कहिथैं,भागव हमर देश ला चोर |
अतका शोषण कइसे सहिबो,लड़बो हम तो बँइहाँ जोर |2|

बढ़गे मान तिरंगा के जी,छेड़िन भारत भर मा क्रांति |
वो अंग्रेजी शासन डरगे,खो गे मन के जम्मों शांति |3|

किरिया खाके आइन रण मा,कलम धरे कोनो तलवार |
कहिन सबो तुम शासन करथव,रखथव हमला बड़ भुलवार |4|

भगत-चंद्र अउ गाँधी आँधी,बोस हिन्द के सेना लाय |
स्वतंत्रता आंदोलन फइले,तभे देश आजादी पाय |5|

बन आजादी के दीवाना,रंग बसंती गाइन यार |
हंसा अउ चोला तरगे जी,मिलै शहीदी के जब प्यार |6|

छन्दकार - श्री असकरन दास जोगी

(15) आल्हा छंद - श्री मनीराम साहू "मितान"
तिरंगा

तीन रंग के हवय तिरंगा, नील गगन मा वो लहराय।
देखब मा जी बड़ निक लागय, हरषावय अउ मन ला भाय।1।

हमर देश के शान हरय वो, मान घलो वो हमरे आय।
आजादी के हे चिनहारी, देश धरम के पाठ पढ़ाय।2।

केसरिया हे सबले उप्पर, सुमता के वो जोत जलाय।
सबो बीर बलिदानी मन के, रहि रहि के सुरता देवाय।3।

हवय बीच मा सादा सुग्घर, सादा सादा बात बताय।
कहय चलव जी सत्य बाट मा, सदा शांति के गाथा गाय।4।

हरियर हाबय सबले खाल्हे, हरियाली के करय बखान।
सुख समृद्धि हा रहय देश मा, धरती सेवा करव सुजान।5।

हवय बीच मा चक्र बने जी, देवत हे सुग्घर संदेश।
प्रगति बाट मा सबो चलव गा,  अउ आगू जावय देश।6।

कहय चाक आरा चौबीसो, सजग रहव गा सबो मितान।
लहुट फेर बेरा नइ आवय , काम बुता बर करव धियान।7।

 छन्दकार - श्री मनीराम साहू "मितान"


(16) शंकर छंद - श्री जगदीश "हीरा" साहू

जय बोलव भारत माता के

जय बोलव  भारत माता के,  आय सबके शान।
मौका  हे  करजा  छूटे  के,  लगा  देवव  जान।।
बैरी  ऊपर  टूट  परव  जी, तुमन  बनके  काल।
सोचव झन आगू का होही, आज ठोंकव ताल।।

कूटी-कूटी दुश्मन ला  करके, भेज ओकर देस।
भूला जाही खुसरे  बर जी, वो  बदल के भेस।।
कसम हवय  दाई के तोला,चुका करजा आज।
तोर  रहत  ले झन  बगरै  जी, इहाँ  गुंडाराज।।

जाति धरम मा बाँट-बाँट के, टोरय  हमर देस।
वो मनखे ला गोली मारव, मिट जाही कलेस।।
मार भगावव  तुमन  सबो ला, जेन देवय संग।
तब मिटही  दुनिया ले  भाई, आतंक  के रंग।।

छन्दकार - श्री जगदीश "हीरा" साहू


(17) चौपाई छंद - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

ध्वजा तिरंगा हाथ धरादे

राष्ट्र परब हे आजादी के।कपड़ा पहिरादे खादी के।
दाई झट मोला सम्हरादे।ध्वजा तिरंगा हाथ धरादे।1।

फेरी मा शामिल हो जाहूँ।भारत माँ के जय बोलाहूँ।
झण्डा ऊँचा रहय हमारा।कहि के खूब लगाहूँ नारा।2।

सात बजे झण्डा वंदन हे।बेरा के बड़ अनुशासन हे।
राष्ट्र गान माँ जन गण मन हे।नृत्य गीत कविता भाषन हे।3।

देश प्रेम अउ अखण्डता के।भाईचारा मानवता के।
हाथ उठा के किरिया खाहूँ।जिनगी भर संकल्प निभाहूँ।4।

माइक मा देहूँ मँय भाषन।सुनहीं लोग लगाके आसन।
जनता के मुद्दा अलखाके।बतलाहूँ जनता कर जा के।5।

वंचित होये के पीरा ला।भ्रष्टाचार सही कीरा ला।
खूदत ऊँच नीच खाई ला।सरलग बाढ़त मँहगाई ला।6।

वीर नरायण के सद् गत के।राजगुरू सुखदेव भगत के।
बिस्मिल संग चन्द्रशेखर के।गाहूँ अमर शहादत हर के।

बाबा भीम राव के मन ला।गाँधी के जीवन दर्शन ला।
नेता जी झाँसी के रानी।सुरता कर गाहूँ निज वानी।8।

तन मन हर्षित हो जथे,होथे अनुपम गर्व।
आथे जब हर साल के,आजादी के पर्व।

छन्दकार - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
       

(18) दोहा/चौपाई छन्द - श्री ज्ञानु दास मानिकपुरी

सुरता मोला आत हे,होय जेन बलिदान।
हँसत हँसत फाँसी चढ़य,वीर शहीद जवान।

आजादी के अजब कहानी। सुनले संगी मोर जुबानी।
जइसे होय मिलें आजादी।चाहय दुश्मन के बरबादी।

जान देश बर अरपण करके। होय अमर जी दिल मे सबके।
शत शत नमन हवय जी सादर।देवव सब झन हरदम आदर।

खेल छोड़ के गिल्ली डंडा। थामे हाथ तिरंगा झंडा।
आगू सदा बढ़त जी जावय।पकड़ै दुश्मन मार गिरावय।

भरे जोश मा राहय हरदम।करे देख दुश्मन ला तम तम।
महिमा गाववँ मेहा कतका।करहूँ जतके कम हे वतका।

मौत लजाके देख के,मिटगे मन के भेव।
कइसे भूलँव जी भगत,राजगुरू सुखदेव। ।

छन्दकार - श्री ज्ञानु दास मानिकपुरी


(19) आल्हा छंद - - श्रीमती आशा आजाद

सुनले दुश्मन

सुनले दुश्मन मोर देश के,अबड़ मोर हिम्मत हे जान।
दुश्मन ला मँय मार गिराहूँ,अतका मोरे हावँय शान।।

मँय झाँसी के रानी आवँव,दुश्मन ला सब मार गिराँव।
बुरी नजर जे डाले सुनलव,नारी मनला न्याय दिलाँव।।

कहे मदर टेरेसा मोला ,दीन दुखी के लाज बचाँव।
दर-दर भटके जे मनखे मन,ओला अपने घर मा लाँव।।

कहे इंदिरा गाँधी मोला,नारी होके देश चलाँव।
अतियाचारी ला नइ छोड़ँव,नारी मनके लाज बचाँव।।

सैनिक बनके सेवा करथौं,दुश्मन ला जी देथौं मार।
डर के भागे दुश्मन सुनले,अइसन रहिथे मोरे वार।।

महिला मनके शान हवँव मँय,जानौ अपने सब अधिकार।
बाँह अबड़ मँय ताकत रखथौं,धरथौं हाथे मा तलवार।।

नारी ला सम्मान दिलावौं,इही हवे मोरो आधार।
नारी के मँय मान बचाथौं,जिनगी के बस एके सार।।

जुरुम करे जे प्रानी सुनले,ओखर करथौं गा संहार।
धर-धरके मँय मार गिराथौं, करौं देश के मँय उद्धार।।

कोर कपट के भेद जानथौं,दुश्मन बर ठाढ़े हे कान।
चलै नही जे रद्दा सत के,जीवन नइ देवँव मँय दान।।

छन्दकार - श्रीमती आशा आजाद


(20) सार छन्द - श्री महेन्द्र देवांगन माटी

देश हमर हे सबले प्यारा , येकर मान बढ़ाबो ।
नइ झूकन देन हम तिरंगा , झंडा ला फहराबो ।।

भेदभाव ला छोड़ के सँगी , सब झन आघू बढ़बो ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई , मिल के हम सब लड़बो ।।

अपन देश के रक्षा खातिर , बाजी सबो लगाबो ।
नइ झूकन देन हम तिरंगा  , झंडा ला फहराबो ।।

रानी लक्ष्मी बाई आइस , अपन रूप देखाइस ।
गोरा मन ला मार काट के  , सब ला मजा चखाइस ।।

हिलगे सब अंग्रेजी सत्ता  , ओकर गुन हम गाबो ।
नइ झूकन देन हम तिरंगा  , झंडा ला फहराबो ।।

आन बान अउ शान तिरंगा  , लहर लहर लहराबो ।
देश विदेश जम्मो जगा मा , येकर यश फइलाबो ।।

भारत भुँइया के माटी ला , माथे तिलक लगाबो ।
नइ झूकन देन हम तिरंगा  , झंडा ला फहराबो ।।

छन्दकार - श्री महेन्द्र देवांगन माटी

(21) अमृत ध्वनि छन्द - श्री मोहन लाल वर्मा 

            " जय हो भारत माता "

    भारत माता तोर बर ,  देहूँ अपन परान  । 
    बइरी ला धुर्रा चटा  , लड़हूँ सीना तान ।।
    लड़हूँ सीना,तान अपन मँय,सीमा जाके। 
    बइरी पल्ला,भाग जहीं तब,आरो पाके।।
    तोर संग मा ,जनम-जनम के,हावय नाता।
             करँव वंदना,जय हो जय हो,भारत माता।।         
            
छन्दकार - श्री मोहन लाल वर्मा


(22) दोहा छंद - श्री पोखन लाल जायसवाल

थामे लइका हाथ मा ,धजा तिरंगा भाय ।
देश भक्ति के गीत ले ,आगू कदम बढ़ाय ।।

गावय सुग्घर गीत ये , मैं गाँधी बन जाँव ।
बुता देश बर मैं करत , रघुपति राघव गाँव ।।

धरे तिरंगा हाथ मा , नारा बहुत लगाय ।
फेरी मारत गाँव के , देश भक्ति बरसाय ।।

तीन रंग ले हे सजे , हमर तिरंगा जान ।
केसर हरियर संग मा , सादा हे पहिचान ।।

सपना देखे हे ददा , सैनिक बन जातेंव ।
आगू कदम बढ़ाय के, गीत रोज गातेंव ।।

जात धरम मा बाँट के , देख करत हे राज ।
मनखे मनखे एक हव , समझन एला आज ।।

आवव करन उदीम ये , बाँचे रहय सुराज ।
बाढ़त राहय देश हर , करथन जुरमिल काज ।।
      
छन्दकार - श्री पोखन लाल जायसवाल