Tuesday, August 28, 2018

त्रिभंगी छन्द - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"




                 परहित बर जी ले....
                   
सत मारग धर ले,कारज कर ले,सही गलत ला,सोंच जरा।
कर  काम भलाई, जग अच्छाई,फूँक  फूँक रख,पाँव धरा।।
तब पाबे जग मा,सुख हर पग मा,मान मिले जी,सबो करा।
पर हित बर जी ले,दुख ला सहिले,राख जगत ला,हरा भरा।1।
                     
नदियाँ कस पानी,हो जिनगानी,छोड़ किनारे,बीच बहै।
देखय  ना पाछू,बोहय आघू,बीच  भँवर  ना,मोड़ कहै।।
नरवा का जानै,चिखला  सानै,भाव  भजन ला,दूर रहै।
गंगा मा  मिलथे,पाप ह  धुलथे,जे  भवसागर,पीर सहै।2।
                      
धीरज  रख  बाबू,खुद मा  काबू,पाँव  बढ़ा कर,काम भला।
तब मान ह मिलही,नाम ह चलही,तोर मोर झन,सोच चला।।
सुख के  हे  गहना,मिलके  रहना,भाग  जही सब,दूर बला।
जग मा  उजियारी,कर  सँगवारी,सत्य नाम के,जोत जला।3।
                    
सादा  के  गमछा,लगथे  अच्छा,बाँध  मूड़  मा,मान  मिले।
सत के ये चिनहा,भाथे मन हा,फूल कमल कस,देह खिले।।
पुरखा  के  थाती,सुमता  बाती,राख  बने  तैं,नाम  चले।
भागय अँधियारा,हो उजियारा,पाप मिटे सब,जोत जले।4।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

11 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद गुरुदेव!!छंद खजाना म मोर रचना ल जगह दिये बर।।

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  2. बहुत ही बढ़िया, बहुत सन्देश परक रचना हे आदरणीय।

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  3. बहुत बढ़िया छंद सृजन हे पात्रे भाई

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  4. बहुत बढ़िया बधाई हो पात्रे भईया जी

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  5. शानदार त्रिभंगी छंद लिखे हव भैया जी। सादर बधाई।

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  6. शानदार त्रिभंगी।हार्दिक बधाई पात्रे जी।

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  7. बहुत सुग्घर रचना सर

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  8. बहुत सुग्घर रचना सर

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  9. बहुत सुन्दर छंद रचना सत्यबोध गुरुजी।वाहहहह

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  10. बहुत सुंदर रचना

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  11. बहुत सुघ्घर रचना

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