Saturday, December 29, 2018

शोभन (सिंहिका) छंद - शकुन्तला शर्मा

कथा - गीत

सरगुजा - मा हे बिसाहिन, देख हे बिन - हाथ
फेर दायी संग गजहिन, भाग - बाँचय - माथ ।
रोज मजदूरी - बजावय, मोंगरा - सुख - धाम
देख नोनी ला सिखोवय, पन्थ के सत - नाम ।

देवदासा - गुरु - सिखोवय, पन्थ के अन्दाज
रोज - दायी हर पठोवय, सफल होवय काज ।
गोड मा सब काम - करथे, हे बहुत हुसियार
हासथे - गाथे मटकथे, मीठ - सुर - कुसियार ।

सुरुज ऊथे रोज बुडथे, दिन - खियावत रोज
देखते - देखत - गुजरथे, देख ले अब - खोज ।
अब बिसाहिन - नाचथे जब, नाचथे - सन्सार
बिधुन हावय नाच मा सब, छोड़ के घर - बार।

सुन - बजाथे देख माण्दर, नाव हे बन - खार
मन मधुर मुरली - मनोहर, बाजथे - सुकुमार ।
बिकट - पैसा कमावत हे, मोगरा - हर आज
बर बिहा के बात - बोहै, बाज - माण्दर बाज।

मोगरा हर बात कर लिस, माढ गइस - बिहाव
देख मडवा आज गड गिस,सब सुआसिन गाव।
आज खुश हावय बिसाहिन, नाचथे बन - खार
सरगुजा के मन - नहाइन, आज सौ - सौ बार ।

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Sunday, December 23, 2018

किसान दिवस विशेषांक

सवैया छन्द - अरुण कुमार निगम

किसान – १ (सुमुखी सवैया)

किसान उगाय तभे मिलथे , अन पेट भरे बर ये जग ला।
अजी सुध-चेत  नहीं इनला,  धनवान सबो समझें पगला।
अनाज बिसा सहुकार भरे खलिहान , किसान रहे कँगला ।
सहे अनियाय तभो बपुरा , नइ छोड़य ये सत् के सँग ला ।

किसान – २ (मुक्ताहरा सवैया)
किसान कहे लइका मन ला तुम नागरिहा बन अन्न उगाव ।
इहाँ अपने मन बीच बसो  झन गाँव तियाग विलायत जाव ।
मसीन बरोबर लोग उहाँ न दया न मया न नता न लगाव।
सबो सुख साधन हे इहिंचे  धन - दौलत देख नहीं पगलाव ।

किसान – ३ (वाम सवैया)

किसान उठावय नागर ला अउ जोतय खेत बिना सुसताये ।
कभू बिजरावय घाम  कभू   अँगरा बरसे  तन-खून सुखाये ।
तभो नइ मानय हार सदा करमा धुन गा मन-मा मुसकाये ।
असाढ़  घिरे  बदरा  करिया  बरखा  बरसे  हर  पीर भुलाये।

किसान – ४ (लवंगलता सवैया)

किसान हवे  भगवान बरोबर  चाँउर  दार  गहूँ सिरजावय ।
सबो मनखे  मन पेट भरें  गरुवा बइला मन प्रान बचावय।
चुगे चिड़िया धनहा-दुनका मुसुवा खलिहान म रार मचावय ।
सदा दुख पाय तभो बपुरा सब ला खुस देख सदा हरसावय।

रचना - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़
****************************************

हरिगीतिका छन्द - जगदीश "हीरा" साहू

*किसान के मन के पीरा*

कर मेहनत दिनरात जे, उपजाय खेती धान के।
सेवा करे परिवार मिल, धरती अपन सब मान के।।
समझे जतन पइसा रखे, हँव बैंक मा वो सोंचथे।
मिलके सबो रखवार मन, गिधवा बने सब नोंचथे।।1।।

धोखाधड़ी कर बैंक ले, पइसा निकाले छल करे।
धिक्कार वो बइमान ला, तन मा अबड़ कीरा परे।।
नेतागिरी करवात हे, झन जाँव कहिके जेल वो।
बइमान मन के राज मा, अड़बड़ करत हे खेल वो।।2।।

देखत हवय भगवान सब, करनी करम के फल दिही।
नइ धन रहे बइमान के, आये हवय जस चल दिही।।
मानुस जनम बदनाम कर, दुख भोग जिनगी बीतही।
हारत हवय सच हा भले, सुन एक दिन वो जीतही।।3।।

रचना - जगदीश "हीरा" साहू
****************************************

(किसान दिवस विशेष )
 मनहरण घनाक्षरी - चोवा राम "बादल "

"किसान अउ किसानी"

काँटा खूँटी बिन बान, काँद दूबी छोल चान, डिपरा ला खंती खन, खेत सिरजाय जी ।
घुरुवा के खातू पाल, सरे गोबर माटी चाल , राखड़ ल बोरी बोरी, छींच बगराय जी ।
बिजहा जुगाड़ करे, बोरी बोरा नाप धरे, नाँगर सुधार करे , जोखा ल मढ़ाय जी ।
सबो के तैयारी करे , राहेर ओन्हारी धरे ,बरखा असाड़ के ला , किसान बलाय जी । 1 ।

रिमझिम पानी गिरे, कभू तेज कभू धीरे, गरजत बादर हा, भारी डरुवाय जी ।
चमक चमक चम ,बिजुरी के झमाझम , सुपाधार पानी गिरे , डोली भर जाय जी ।
नाँखा मूँही फोर फार, नरवा म बरो धार , बिजहा छिंचाय तेला , सरे ल बँचाय जी ।
दूबारा तिबारा छींचे , कोपर म घलो इँचे , देखत किसान श्रम , श्रम सरमाय जी ।2 ।

देखत बियासी आगे ,बाढ़े धान खुशी लागे , चभरंग चभरंग , नाँगर चलाय जी ।
लेंझा चाले धान खोंचे, बदौरी ल दाब दाब ,साँवा बन नींदे चूहा ,कनिहा नँवाय जी ।
यूरिया पोटाश डार , करगा ला नींच नींच , कीरा फाँफा मारे बर ,  दवई छिंचाय जी ।
पाके धान लुए लाने ,मिंज कूट कोठी भरे, भुईयाँ के भगवान , किसान कहाय जी। 3 ।

रचना - चोवा राम "बादल "
           हथबंद (छग)
****************************************

किसान दिवस विशेष

गीतिका छंद मा एक गीत - आशा देशमुख

हाँथ जोड़व मुड़ नवावँव ,भूमि के भगवान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,कर्म पूत किसान हो।

हाँथ मा माटी सनाये ,माथ ले मोती झरे।
सब किसनहा सुन तुँहर ले ,अन्न के कोठी भरे।
धूप जाड़ा शीत तुँहरे ,मीत संगी जान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,भूमि पूत किसान हो।1।

हे जगत के अन्नदाता ,मेटथौ तुम भूख ला।
मेहनत कर रात दिन फेंकव अलाली ऊब ला।
नीर आँखी मा लबालब ,सादगी पहिचान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,कर्म पूत किसान हो।2।

आज तुँहरे दुख सुनैया ,नइ मिलय संसार मा।
सब अपन मा ही लगे हे ,एक होय हज़ार मा।
ये जगत के आसरा हव ,दीन जीव मितान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव,भूमि पूत किसान हो।3।

रचना - आशा देशमुख
कोरबा छतीसगढ़
****************************************

रोला छंद - दिलीप कुमार वर्मा

"किसान"

1
कहाँ किसानी खेल,परे जाँगर ला पेरे।
कतको हपट कमाय,तभो दुख भारी घेरे।
दिन-दिन हो बदहाल,सोर कोनो नइ लेवय।
कइसे करय किसान,करज काला ओ देवय।1।

2
खरचा रुपिया होय,मिलत हे बारा आना।
घर कइसे चल पाय,रहे बस आना जाना।
भुइया के भगवान,अन्न के दाता कहिथे।
कोनो जान न पाय, किसनहा का-का सहिथे।2।

3
कभू बाढ़ आ जाय,फसल जम्मो बह जाथे।
सूखा परथे मार,खेत परिया रह जाथे।
दूनो ले बँच जाय,त कीरा अबड़ सताथे।
खड़े फसल बरबाद,रहे कीरा सब खाथे।3।

4
जतका पावय धान,लान कोठी भर देथे।
सुरही कहाँ बँचाय,मजा मुसुवा तक लेथे।
कइसे गढ़ दे भाग,विधाता तही बतादे।
बनही कोन किसान,आज मोला समझादे।4।

5
दुख मा रहे किसान, तभो ले हाँसत रहिथे।
भुइया के भगवान, तभे सब ओला कहिथे।
जग के पालन हार,अन्न ला सदा उगाथे।
भरके सब के पेट,बड़ा सुख ओ हर पावय।5।

रचना - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार, छत्तीसगढ़
****************************************

घनाक्षरी - ज्ञानुदास मानिकपुरी

(किसान दिवस विशेष)

नाँगर बइला साथ,चूहय पसीना माथ
सुआ ददरिया गात,उठत बिहान हे।
खाके चटनी बासी ला,मिटाके औ थकासी ला
भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।
गरमी या होवय जाड़ा,तीपे तन चाहे हाड़ा
मूड़ मा बोह के भारा,चलत किसान हे।
करजा लदे हे भारी,जिनगी मा अँधियारी
भूल के दुनियादारी,होठ मुसकान हे।

रचना - ज्ञानुदास मानिकपुरी
ग्राम - चंदैनी, कबीरधाम, छत्तीसगढ़
****************************************

घनाक्षरी छन्द - दुर्गाशंकर इजारदार:

*किसान दिवस विशेष*

घाम जाड़ बरसात, सबो दिन मुसकात,
करम करत हावै, देख ले किसान जी,
करम ल भगवान, करम धरम मान,
पसीना ला अपन तो, माने हे मितान जी,
सहि के जी भूख प्यास, रहिथे जी उपवास,
अन्न उपजाय बर , देथे वो धियान जी,
सनिच्चर इतवार, नइ चिन्हे दिनवार,
भुइंया के सेवा बर, उठथे बिहान जी   !

रचना - दुर्गाशंकर इजारदार
सारंगढ़, छत्तीसगढ़
****************************************

सरसी छन्द - मीता अग्रवाल

माटी के कोरा मा उपजे ,किसम किसम के धान।
अन्न-धन्न भंडार भरय जी,मिहनत करय किसान।।

सुरुज  देव ला हाथ जोड़ के,विनती करय दुवार ।
करम प्रधान बनावव मोला, नीक लगय  संसार ।।

उठ भिनसरहा फाँदत जावय,बइला गाड़ी खेत।
तत तत तत तत बइला हाँकय ,धरे हाथ मा बेंत ।।

काम बुता कर बासी खावय,तनिक अकन सुसताय।
खेत ख़ार ला बने जतन के,संझा बेरा आय।।

 आघू ले जतनात हवय अब ,खेत ख़ार के काम।
निंदई गुड़ई करय कटाई ,  मशीन दे आराम।।

अंतस चिंता  बड़ बाढत हे,नवा तरक्की द्वार ।
होवत हे कमती पशुधन अब , चलत विकास  बयार।।

रचना - मीता अग्रवाल
रायपुर, छत्तीसगढ़
****************************************

कज्जल छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

किसान

भुँइया के बेटा किसान।
खेती मा देथस धियान।
उपजाथस सोनहा धान।
कारज हे सबले महान।

धन धन जगपालक किसान।
अंतस मा नइहे गुमान।
तोर दया जिनगी परान।
तहीं असल देश के मान।

जब ले तैं उपजाय अन्न।
नइहे जी कोनो विपन्न।
करे कड़ाही छनन छन्न।
खाके जन मन हे प्रसन्न।

रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
       गोरखपुर कवर्धा छत्तीसगढ़
****************************************
सरसी छंद  - राम कुमार साहू

करजा बोड़ी मूँड़ लदाये,रोवय देख किसान।
चिंता मन मा एके रहिथे,कइसे होही धान।।

खातू कचरा महँगा होगे,मिलय नही बनिहार।
टोरत जाँगर खूब कमाये,बिन पानी बेकार।।

ठोम्हा पैली बिरता होगे,पहुँचय सेठ दुकान।
तब ले करजा कम नइ होवय,सन्सो करय किसान।।

बेंचय खेती धनहा भर्री, करजा नइ बड़हाय।
पतरी पतरी सबो सिरागे,मति ओखर छरियाय।।

सिधवा मनखे सुन नइ पावय,ताना पीरा ताय।
कोनों फाँसी डोरी झूलय,मँहुरा जहर ल खाय।।

रचना - राम कुमार साहू
****************************************
दोहा छन्द - पोखन लाल जायसवाल

किसान

लाँघन कोनो मत रहय , चिंता करय किसान ।
लहू पछीना छीत के , उपजावय सब धान ।।

भरथे सबके पेट ला , करथे लाँघन काम ।
चिंता रहिथे खेत के , करय नहीं आराम ।।

जाड़ सीत अउ घाम मा , जाँगर टोर कमाय ।
बरसा बादर मा घला , तन मन अपन लगाय ।।

करजा बोड़ी बाढ़गे ,बाढ़े बेटी हाय ।
कतका होही धान हा , चिंता हवय समाय ।।

गहना ला गहना धरे , ताकत साहूकार ।
करजा देख खवाय का ,भूखन हे परिवार।।

करय भरोसा धान के , मिलही बढ़िया दाम ।
धनहा डोली बाँचही , सुख पाहूँ सुखराम ।।

रचना - पोखन लाल जायसवाल
पठारीडीह पलारी, छत्तीसगढ़

Tuesday, December 18, 2018

सदगुरू बाबा घासीदास जयंती विशेषांक



(1)

आल्हा छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

हमर राज के  माटी मा जी,बाबा लेइस हे अवतार।
सत के सादा झंडा धरके,रीत नीत ला दिये सुधार।

जात पात अउ छुआ छूत बर, खुदे बनिस बाबा हथियार।
जग के खातिर अपने सुख ला,बाबा घासी दिये बिसार।

रूढ़िवाद ला मेटे खातिर,बबा करिस बढ़ चढ़ के काम।
हमर राज के कण कण मा जी,बसे हवे घासी के नाम।

बानी मा नित मिश्री घोरे,धरम करम के अलख जगाय।
मनखे मनखे एक बता के,सुम्मत के रद्दा देखाय।

संत हंस कस उज्जर चोला,गूढ़ ग्यान के गुरुवर खान।
अँवरा धँवरा पेड़ तरी मा,बाँटे सबला सत के ज्ञान।

जंगल झाड़ी ठिहा ठिकाना,बघवा भलवा घलो मितान।
धरे कठौती मा गंगा ला,बाबा लेवय जब कुछु ठान।

झूठ बसे झन मुँह मा कखरो,झन खावव जी मदिरा माँस।
बाबा घासी जग ला बोले,करम करव निक जी नित हाँस।

दुखिया मनके बनव सहारा,मया बढ़ा लौ बध लौ मीत।
मनखे मनखे काबर लड़ना,गावव सब झन मिलके  गीत।

सत के ध्वजा सदा लहरावय,सदा रहे घासी के नाँव।जेखर बानी अमरित घोरे,ओखर मैं महिमा ला गाँव।

रचनाकार -  श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

(2)

जयकारी छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

''सतगुरु बाबा घासीदास''

सतगुरु के संदेश महान।तहूँ समझ ले मन नादान।
लोकतंत्र के हे पहिचान।मनखे मनखे एक समान।

पर नारी माता सम जान।जग जुग जिनगी के सभिमान।
नशापान ला महुरा जान,दूर रहे बर मन मा ठान।

हम जानत हन हावय बोध।सती प्रथा के करिस विरोध।
गुरु घासी के साँच नियाव।विधवा मन के पुनर्बिहाव।

गुरु घासी लेइस संज्ञान।बेगारी हे लूट समान।नाँगर मुठिया धरे कमाय।ते खेती के मालिक आय।

देख ताक के पाँव पसार।चादर ले झन नाकय पार।
उज्जर सतनामी संस्कार।धुवा घलो के सम अधिकार।

नोनी बाबू एक्के भाव।बिना भेद के खूब पढ़ाव।
ठलहा रह ना गाल बजाव।महिनत करके रोटी खाव।

सतगुरु बाबा घासीदास।आज जयन्ती उँखरे खास।
धरे सत्य जिनगी नहकाव।हँसी खुशी से पर्व मनाव।


रचनाकार-महंत सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
               गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

(3)

बरवै छंद - बोधनराम निषादराज

"गुरु घासीदास"

बंदँव  गुरुवर   बाबा,  घासीदास।
सुन  लेहू  जी मोरो, हे अरदास।।

मँय   अज्ञानी   देदे, मोला   ज्ञान।
ददा मोर तँय दाई,अउ भगवान।।

तोर चरन मा जम्मों,सुख ला पाँव।
बाबा मँय तो तोरे, गुन  ला गाँव।।

माता  अमरौतिन  हा,पावय भाग।
बाबा मँहगू  के हे, किस्मत  जाग।

पावन माह दिसम्बर, देखव आय।
अब गिरौदपुर वासी,धज लहराय।।

सत्   रद्दा  देखाइस, बाबा  आज।
आवव संगी चलबो,करबो काज।।
~~~~~~~~~~~~~~
रचना:-
बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता,वाणिज्य
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

(4)

दोहा छन्द - श्रीमती आशा आजाद

जय जय सतनाम गुरु

जय जय कर सतनाम गुरु,पइया  लागौ  तोर।
समता पाठ सिखाय तँय,जिनगी करय अँजोर।।1

जन्में रहे गिरौद मा,धरे सदा तँय ध्यान।
बनगे  बैरागी पुरुष,बाँटे  तँय  हा  ज्ञान।।2

सुग्घर समता भाव ला,जग मा तय बगराय।
गुरु  बाबा के मान ले,सत गुरु नाव कहाय।।3

मनखे-मनखे  एक   हे,बाबा ज्ञान सिखाय।
जात-पात सब छोड़ के,मनखे ला अपनाय।।4

समरसता   संदेश    ला,हिरदे   ले   अपनाव।
कपट भाव ला त्याग दव,जग मा सुमता लाव।।5

जय  बाबा  गुरुपंथ के,नाचौ पंथी आज।
सादा झण्डा थाम लव,छेड़ौ जम्मो साज।।6

घासीदास कहाय गा,जग ला करय अँजोर।
सत के  रद्दा  तँय धरें,चरण  पखारौ  तोर।।7

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

(5)

मनहरण घनाक्षरी - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

संत शिरोमणि गुरु घासीदास जयंती के समस्त मानव जगत ला गाड़ा गाड़ा बधाई

संत गुरु घासीदास 42 अमृतवाणियाँ-

सतनाम  घट   घट, बसे  हवै  मन  पट
भरौ  ज्ञान  पनघट, कहे  घासीदास  हे
सबो संत मोरे आव,महिनत रोटी खाव
जिनगी  सुफल पाव, करम  विश्वास हे
ओतकेच तोर  पीरा,जतकेच मोर पीरा
लोभ मोह  क्रोध कीरा,करे तन नाश हे
सेवा कर दीन दुखी,दाई ददा रख सुखी
धर  ज्ञान  गुरुमुखी ,घट   देव  वास  हे।।

ऊँचा  पीढ़ा  बैरी बर,मया  बंधना ला धर
अन्याय  विरोध  बर,रहौ  सीना  तान  के
निंदा  अउ  चारि हरे,घर  के  उजार  करे
रहौ  दया   मया  धरे,कहना  सुजान  के
झगरा ना जड़ होय,ओखी के तो खोखी होय
सच ला ना  आँच  आय, मान  ले तैं  जान के
धन  ला  उड़ाव  झन,खरचा बढ़ाव  झन
काँटा  ला  गढ़ाव झन,पाँव  अनजान के।।

पानी पीयव छान के,बनावौ गुरु  जान के
पहुना  संत  मान  के,आसन  लगाव  जी
मोला देख तोला देख,बेरा ग कुबेरा  देख
कर सबो  के सरेख, मिल  बाँट खाव जी
सगा के हे सगा बैरी,सगा होथे चना खैरी
अटके  हे देख  नरी,सगा  का बताँव  जी
मोर  हर   संत  बर, तोर   हीरा  मोर  बर
हे  कीरा के  बरोबर,मैं  तो  समझाँव  जी।।

दाई हा तो दाई आय,मया कोरा बरसाय
दूध  झन  निकराय,मुरही  जी  गाय  के
गाय  भैंस नाँगर  मा,इखर गा जाँगर मा
ना रख  बोझा गर मा ,नोहय  फँदाय के
नारी  के सम्मान बर,विधवा  बिहाव बर
रीत  नवा  चालू  कर, चूरी  पहिराय  के
पितर  मनई   लगे,मरे   दाई   ददा  ठगे
जीयत  मा  दूर   भगे,मोह   बइहाय  के।।

सोवै   तेन  सब  खोवै ,जागै  तेन  सब पावै
सब्र  फल  मीठा  होवै,चख  चख  खाव जी
रोस  भरम  त्याग   के,सोये  नींद  जाग  के
ये  धरती  के  भाग  ला,खूब  सिरजाव  जी
कारन ला जाने बिना,झन न्याय ला जी सुना
ज्ञान   रसदा   ना  कभू , उरभट   पाव   जी
मन  ला हे  हार जीत,बाँटौ  जग मया  प्रीत
फिर  सब  मिल  गीत,सुमता  के  गाव  जी।।

दान  देवइया  पापी,दान  लेवइया  पापी
भक्ति भर  मन झाँपी,मूर्ति  पूजा छोड़ दे
जइसे खाबे  अन्न ला,वइसे पाबे  मन ला
सजा झन  ये तन ला,मोह  घड़ा फोड़ दे
ये  मस्जिद   मन्दिर , चर्च  अउ  संतद्वार
बना  झन  गा  बेकार, मन  सेवा  मोड़ दे
गरीब  बर  निवाला, तरिया   धरमशाला
बना कुआँ  पाठशाला ,हित  ईंट जोड़ दे।।

आँख होय जब चूक,अँगरा कस जस लूख
फोकट  के  सुख  करे,जिनगी  ला  राख हे
पर  के भरोसा  झन,खा तीन  परोसा  झन
मास  मद  बसौ  झन,नाश  के  सलाख  हे
एक  धूवा   मारे   तेनो , बराबर खुद  गिनो
जान  के मरई  जानौ,पाप  के  तो शाख़ हे
गुरु घासीदास  कहे ,कहौ  झन  मोला बड़े
सत  सूर्य   चाँद  खड़े, उजियारी  पाख  हे।।

रचना - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर 8889747888

(6)

दोहा छन्द - बोधन राम निषादराज

सादा   तोर  बिचार  हे, बाबा  घासीदास।
ऊँच नीच सब एक हे,सत् मारग के आस।।1।।

मँहगू के घर अवतरे,  ओखर  भाग   जगाय।
बालक घासीदास हा,गिरौदपुर ला भाय।।2।।

गुरु  तँय  मोला  ज्ञान दे, आए  हँव  मँय द्वार।
तोर  शरन  मा  राखले, करव   मोर  उद्धार।।3।।

जइत खाम  सतनाम के,  हावय  तोरे  धाम।
सत् के अलख जगाय बर,धरे ध्यान प्रभु नाम।।4।।

अलख जगा  सतनाम के, सत्  रद्दा  मा जाय।
मानव सेवा कर चले,घासीदास कहाय।।5।।

पंथ चले सतनाम  के, सत्  के  ज्ञान  बहाय।
जन-जन मा तँय प्रेम के,सुघ्घर पाठ पढ़ाय।।6।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
छंदकार:-
बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता वाणिज्य
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

(7)

कुण्डलिया छंद - चोवाराम वर्मा "बादल"

         "जय सतनाम"

महिमा अगम अपार हे, सत्यनाम हे सार ।
सत भाखा गुरु के हवय, बूड़व सत के धार।
बूड़़व सत के धार , मइल मन के जी धोलव।
सादा रखे विचार, बचन मा सत रँग घोलव।
मनखे मनखे एक, एक हे सबके गरिमा।
देथे सत संदेश, अबड़ हे सत के महिमा।

रचना -चोवा राम "बादल "
      हथबंद (छ.ग.)

(8)

🌹🌹गुरु घासीदास जयंती के आप सब ला बधाई अउ शुभकामना 🌹🌹🙏🙏

कुण्डलिया छंद - कौशल कुमार साहू

गुरु घासी ला तैं सुमर, जिनगी के आधार।
जोंत बार सतनाम के, मिट जाही अँधियार।।
मिट जाही अँधियार, सँगी ये मन मा धरलव।
लइका सबो सियान, आरती पूजा करलव।।
कौशल कहना मान, गया झन जावव काशी।
करही बेड़ा पार, हमर सबके गुरु घासी।।

✍कौशल कुमार साहू
सुहेला (फरहदा ) भाटापारा

(9)

बरवै छंद - आशा देशमुख

"गुरू महिमा"

अमरौतिन के कोरा ,खेले लाल।
महँगू के जिनगी ला ,करे निहाल।1।

सत हा जइसे चोला ,धरके आय।
ये जग मा गुरु घासी ,नाम कहाय।2।

सत्य नाम धारी गुरु ,घासीदास।
आज जनम दिन आये ,हे उल्लास।3।

मनखे मनखे हावय ,एक समान।
ये सन्देश दिए हे, गुरु गुनखान।4।

देव लोक कस पावन ,पुरी गिरौद।
सत्य समाधि लगावय ,धरती गोद।5।

जैतखाम  के महिमा ,काय बताँव।
येला जानव भैया ,सत के ठाँव।6।

निर्मल रखव आचरण ,नम व्यवहार।
जीवन हो सादा अउ ,उच्च विचार।7।

बिन दीया बिन बाती ,जोत जलाय।
गुरु अंतस अँंधियारी ,दूर भगाय।8।

अंतस करथे उज्जर ,गुरु के नाम।
पावन पबरित सुघ्घर ,गुरु के धाम।9।

रचना - आशा देशमुख, कोरबा छत्तीसगढ़

(10)

बाबा गुरु घासीदास जयंती के आप सब ला बहुत बहुत बधाई 🌹🙏🌹

सार छंद  - ज्ञानुदास  मानिकपुरी

बाबा घासीदास जगत ला,सत के राह दिखाये।
जाँति पाँति औ ऊँच नीच के,बाढ़े रोग मिटाये।

भरम भूत औ मूर्ती पूजा,फोकत हवय बताये।
मातपिता भगवान बरोबर,सार तत्व ल लखाये।

जप तप सेवा भावभजन ला,मन मंदिर म बसाले।
करम धरम हा सार जगत मा,जिनगी अपन बनाले।

गुरु के बानी अमरित बानी,हिरदै अपन रमाले।
भाईचारा दया मया ला,पग पग तँय अपनाले।

बैर कपट ला दुरिहा फेँकव,लोभ मोह सँगवारी।
चलव सुघर चतवारत रसता,घपटे जग अँधियारी।

परनिंदा औ परनारी हे,राह नरक के जग मा ।
गुरुवर के अनमोल बचन हा,बहय सदा रग रग मा।

रचना - ज्ञानुदास  मानिकपुरी
चंदेनी (कबीरधाम)