Tuesday, January 30, 2018

रोला छंद - श्री असकरन दास जोगी

बीतत हे इतवार,बाँध डारवँ का डोरी !
ठलहा बइठे यार,देखथे कइसे गोरी !!
भदरे करिया जाड़,वाह रे दाँत निपोरी !
मन मा पूस सवार,करय नयनन मा चोरी !!1!!

सोवँव कथरी साँट,पूस के बात निराली !
लेवँव कलथी मार,रात हे बड़ मतवाली !!
आथे सपना तोर,अरे रानी अलबेली !
झकना के उठ जाँव,देख तोला कजरेली !! 2!!

देखे हमला यार,पूस के रात कनेखी !
लागे तुरते जाड़,करे जोही अनदेखी !!
प्रेमी होगे सार,मया के जाड़ छँटाही !
मोहन करथे रास,संग में रात पहाही !!3!!

मेला मड़ई होय,चलव जाबो देखे ला !
रोला गाबो पोठ,गोठ लागय सोंचे ला !!
समझै हमरो बात,आस हे मन हिरदे में !
खाली हावय जेब,चाट खाबो कइसे में !!4!!

चिंतन करत सजोर,सोंच मन के फल देथे !
करथे करम अँजोर,सफल जिनगी हर होथे !!
बढ़िया चिंतन तोर,वाह का कहना जोही !
सुनले कहना मोर,बात ले जन-जन बोही !!5!!

बोरे बासी खाय,नून हे जेमा डारे !
चटनी चाँटे पोठ,गोठ में आभा मारे !!
थारी लागे सोन,बरत हे चाँदी माली !
हाँसत बइठे जोर,कहे अउ खाहूँ काली !!6!!

नवा साल के फेर,डहर ला सत गढ़बो जी !
आवत जावत भोर,बने कस के बढ़बो जी !!
जोहारत हे धान,देख के कोठी माँथा !
भरके कोठी धान,देत हें बढ़िया हाँथा !!7!!

भरती गाड़ी थाम,चले जी रस्ता रस्ता !
चक्का बाजे जोर,मेहनत लागे सस्ता !!
बोझा बाँधे डोर,धान हे पक्का-पक्का !
बइला रेंगे चाल,उड़त हे हक्का-बक्का !!8!!

आँखी छेरी ताय,दरस के माँगे चारा !
खोजत रइथे रोज,आस में आरा-पारा !!
पुतरी बनगे जीभ,चरत हे रुप के सुकवा !
पागे पीपर पान,पुरस तो हावे रुखवा !!9!!

आव-भाव में ताव,टेटका कस हे नेता !
हाँथ जोड़ के बोट,लेत हे चतुरा बेटा !!
बछर-बछर के बात,फेर तो बदले बानी !
नवा-नवा रे साध,देख ले अब मनमानी !!10!!

अरजे-बरजे बात,काल तो सुरता आही !
जरथे-बरथे रात,काट के संसो खाही !!
बैरी पावत पोल,खोंट के टोरत जाही !
होगे दुनिया खाक,नास ले कोन बँचाही !!11!!

पुतरी पुतरा खेल,आत हे सुरता भारी !
होही कइसे मेल,बोल दे मोला कारी !!
दया-मया के डार,लहर के नाचन लागे !
कइसे मानय चोर,छुछन के तोला माँगे !!12!!

रचनाकार - श्री असकरन दास जोगी
ग्राम-डोंड़की,पो.+तहसील-बिल्हा, जिला-बिलासपुर
छत्तीसगढ़
www.antaskegoth.blogspot.com

Thursday, January 25, 2018

शक्ति छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

अपन देस

पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।
अहं जात भाँखा सबे लेस के।
करौं बंदना नित करौं आरती।
बसे मोर मन मा सदा भारती।

पसर मा धरे फूल अउ हार मा।
दरस बर खड़े मैं हवौं द्वार मा।
बँधाये  मया मीत डोरी  रहे।
सबो खूँट बगरे अँजोरी रहे।

बसे बस मया हा जिया भीतरी।
रहौं  तेल  बनके  दिया भीतरी।
इहाँ हे सबे झन अलग भेस के।
तभो  हे  घरो घर बिना बेंस के।
------------------------------------|

चुनर ला करौं रंग धानी सहीं।
सजाके बनावौं ग रानी सहीं।
किसानी करौं अउ सियानी करौं।
अपन  देस  ला  मैं गियानी करौं।

वतन बर मरौं अउ वतन ला गढ़ौ।
करत  मात  सेवा  सदा  मैं  बढ़ौ।
फिकर नइ करौं अपन क्लेस के।
वतन बर बनौं घोड़वा रेस के---।

रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Wednesday, January 24, 2018

गीतिका छंद - श्री मोहन लाल वर्मा

सरस्वती-वंदना
     
 (1)-

माँ भवानी शारदा दे,ज्ञान के भंडार ला।
कंठ मा सुर-साज दे दे,छंद के परिवार ला ।।
शब्द सागर बूड़ के हम,रोज करथन साधना।
भक्ति मा अउ शक्ति भर दे,सुन हमर आराधना  । ।

     (2)

आव जिभिया मा बिराजौ,छंद के आगाज़ हे ।
तोर चरणन मा समर्पित,पुष्प साहित आज हे ।।
ये जगत कल्याण खातिर,लेखनी मा धार दे ।
कर सकन नित काव्य सिरजन,माँ भवानी शारदे  ।।

        (3)

हाथ वीणाधारिणी माँ,ज्ञान के परसाद दे ।
कर अलंकृत हम सबो ला,आज आशिर्वाद दे  ।।
काव्य के बरसा करन वो,तोर अँचरा छाँव मा ।
छंद के जुरियाँय साधक,आज पबरित गाँव मा।।

      (4)
तोर किरपा पाय हावन,काव्य-रस के ज्ञान ला।
शब्द-कोठी झन रितावय,दे असल वरदान ला ।।
हे सदा कमलासिनी माँ,सात सुर झँकार  दे ।
देश बर सद्भावना  अउ ,शाँति के  उपहार दे ।।

         
रचनाकार - श्री मोहन लाल वर्मा,
ग्राम-अल्दा,पो.आॅ.-तुलसी (मानपुर),व्हाया-हिरमी,तहसील-तिल्दा,जिला-रायपुर( छत्तीसगढ )
      

Sunday, January 21, 2018

बरवै छंद - श्रीमती वसंती वर्मा

पुन्नी के चंदा हर,बरय अंजोर ।
नाचत देखय ओला,आज चकोर ।।

करे सिंगार सोला,चंदा आय ।
जेहर देखय ओला,मन ला भाय।।

अमरित लेके चंदा,बरसे आय ।
छानी परवा दाई,खीर मढ़ाय ।।

ओरमे धान बाली,अमरित पाय ।
पुन्नी शरद म सुघ्घर, रात नहाय ।।

भुइयाँ महतारी के ,पाँव पखार ।
आगे बेटी लछमी,घरे हमार  ।।

रचनाकार  - श्रीमती वसंती वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़


Wednesday, January 17, 2018

महाभुजंग प्रयात सवैया - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

            1(अर्जी-विनती)
निसेनी चढ़ा दे मया मीत के दाइ अर्जी करौं हाथ ला जोड़ के वो।
बने  मोर  बैरी  जमाना  ह माता गिराथे उठाथे जिया तोड़ के वो।
जघा पाँव मा दे रहौं मैं सदा मोह माया सबे चीज ला छोड़ के वो।
रहे तोर आशीश माता पियावौं पियासे ल पानी कुँवा कोड़ के वो।

                         2(भाजी)
मिले हाट बाजार भाजी बने ना हवौं टोर के लाय मैं खार ले गा।
निमारे बने काँद दूबी सबे  ला  चिभोरे हवौं मैं  नदी  धार ले गा।
बनाके रखे  हौं  कढ़ाई  म भाजी चनौरी चरोटा चना दार ले गा।
नहा खोर आ बैठ तैं पालथी मोड़ कौरा उठा भूख ला मार ले गा।

                    3(मुवाजा)
गली खोर खेती ठिहा मोर चुक्ता नपाके कका कोन दीही मुवाजा।
मुहाँटी  बने  रोड  गाड़ी  घरे  मा झपागे कका कोन दीही मुवाजा।
धुँवा  कारखाना  ह  बाँटे जियाँ  जाँ खपागे कका कोन दीही मुवाजा।
लिलागे खुशी भाग मा दुक्ख पोथी छपागे  कका कोन दीही मुवाजा।

                     4(बेटी के रिस्ता)
ठिहा ना ठिकाना जिहाँ हे न दाना उँहा फोकटे हे ग बेटी बिहाना।
हवे  फालतू  जे  सगा  के  घराना  उँहा फोकटे हे ग बेटी बिहाना।
जिहाँ काखरो हे न आना न जाना उँहा फोकटे हे ग बेटी बिहाना।
जिहाँ ना नहानी जिहाँ ना पखाना उँहा फोकटे हे ग बेटी बिहाना।

                    5(दुष्ट मनखे)
लगाये  मया  मीत  मा जेन आगी भला का रथे ओखरो लागमानी।
गिराथे ठिकाना ल जे काखरो भी रथे ओखरो तीर का छाँव छानी।
सुखाये नहीं का गला ओखरो रोज जेहा मताथे फरी देख पानी।
करे जे बिगाड़ा गरू फोकटे ओखरो होय छाती दुई ठोक चानी।

                   6(जमाना)
जिया भीतरी मा हमाये हवे गोठ जुन्ना नवा गा कहाये जमाना।
सजाये सँवारे करे गा दिखावा मया छोड़ माया बहाये जमाना।
करे  जेन चोरी चकारी दलाली सदा ओखरे ले लहाये जमाना।
खुले आम रक्सा ह घूमे गली खोर मा थोरको ना सहाये जमाना।

                        7(दाई)
पहाती  पहाती  उठे  दाइ  रोजे  करे काम बूता बहारे  बटोरे।
मिठाये सबो ला बनाये कलेवा मिठाई भरे कोपरी खूब झोरे।
लगाये फिरे छोट बाबू ल छाती सुनाये ग लोरी मया गीत घोरे।
करौं  बंदना  आरती  रोज  पाँवे  परौं तैं सहारा बने मात मोरे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Monday, January 15, 2018

सार छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

मकर सक्रांति
सूरज जब धनु राशि छोड़ के,मकर राशि मा जाथे।
भारत  भर  के मनखे मन हा,तब  सक्रांति  मनाथे।

दिशा उत्तरायण  सूरज के,ये दिन ले हो जाथे।
कथा कई ठन हे ये दिन के,वेद पुराण सुनाथे।
सुरुज  देवता  सुत  शनि  ले,मिले  इही  दिन जाये।
मकर राशि के स्वामी शनि हा,अब्बड़ खुशी मनाये।
कइथे ये दिन भीष्म पितामह,तन ला अपन तियागे।
इही  बेर  मा  असुरन  मनके, जम्मो  दाँत  खियागे।
जीत देवता मनके होइस,असुरन नाँव बुझागे।
बार बेर सब बढ़िया होगे,दुख के घड़ी भगागे।
सागर मा जा मिले रिहिस हे,ये दिन गंगा मैया।
तार अपन पुरखा भागीरथ,परे रिहिस हे पैया।
गंगा  सागर  मा  तेखर  बर ,मेला  घलो  भराथे।
भारत भर के मनखे मन हा,तब सक्रांति मनाथे।

उत्तर मा उतरायण खिचड़ी,दक्षिण पोंगल माने।
कहे  लोहड़ी   पश्चिम  वाले,पूरब   बीहू   जाने।
बने घरो घर तिल के लाड़ू,खिचड़ी खीर कलेवा।
तिल  अउ  गुड़ के दान करे ले,पाये सुघ्घर मेवा।
मड़ई  मेला  घलो   भराये,नाचा   कूदा    होवै।
मन मा जागे मया प्रीत हा,दुरगुन मन के सोवै।
बिहना बिहना नहा खोर के,सुरुज देव ला ध्यावै।
बंदन  चंदन  अर्पण करके,भाग  अपन सँहिरावै।
रंग  रंग  के  धर  पतंग  ला,मन भर सबो उड़ाये।
पूजा पाठ भजन कीर्तन हा,मन ला सबके भाये।
जोरा  करथे  जाड़ जाय के,मंद  पवन  मुस्काथे।
भारत भर के मनखे मन हा,तब सक्रांति मनाथे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Sunday, January 14, 2018

कुण्डलिया छन्द - श्री सूर्यकान्त गुप्ता

मोर गुरतुर भाखा छत्तीसगढ़ी

बोली भाखा के अपन, करौ सबो सन्मान।
दूसर भाखा के मगर, झन करिहौ अपमान।।
झन करिहौ अपमान, मान देवव अउ पावव।
जिनगी जउन चलाय, गीत ओकर तुम गावव।।
हिम्मत राखौ संग, छोड़ दौ हँसी ठिठोली।
मोला बिक्कट भाय, मोर ए गुरतुर बोली।।

                  कोंदा जनता
कोंदा जनता ल रथे, एके के दरकार।
फोकट मा मिल जाय अउ, बइठे खावैं यार।।
बइठे खाँवैं यार, मेहनत करना काबर।
मध्यमवर्गी जाय, पिसावय ओही मर मर।।
बाबा चाँउर बाँट, रहन दे उनला भोंदा।
खुरसी मा तँय बइठ, बनावत सबला कोंदा।।

                 मोबाइल लीला
मोबाइल लीला गजब, सब झन हन अइलाय।
लिखत पढ़त रहिथन इहें, पीठ घेंच लचकाय।।
पीठ  घेंच  लचकाय,  चलावत  गाड़ी  घोड़ा।
डारे   हेल्थ   गँवाय,   बनावत   एला   रोड़ा।।
सकल करम ला देख, इही मा बन उतियाइल।
सब झन हन अइलाय, गजब लीला मोबाइल।।

                     खउलत पानी

खउलत  पानी  मा  कभू,  दिखय  न  अपने चित्र।
गुस्सा  मा  जी  ओइसने,  सुध  बुध  खोथन मित्र।।
सुध बुध खोथन मित्र, अल्हन बड़ हम कर जाथन।
खऊलावत   तन  मन,   ब्यर्थ  काछन  चढ़वाथन।।
काम  क्रोध  मद  लोभ,  बाँध  झन  मन  घानी मा।
दिखय  न  अपने  चित्र,  कभू  खउलत  पानी  मा।।

रचनाकार..
सूर्यकांत गुप्ता
सिंधिया नगर दुर्ग

Friday, January 12, 2018

दोहा गीत - श्री जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

मड़ई मेला

मोर  गाँव  दैहान   मा,मड़ई  गजब भराय।
दुरिहा दुरिहा के घलो,मनखे मन जुरियाय।

कोनो सँइकिल मा चढ़े,कोनो खाँसर फाँद।
कोनो  रेंगत  आत   हे,झोला   झूले  खाँद।
मड़ई मा मन हा मिले,बढ़े मया अउ मीत।
जतके हल्ला होय जी,लगे  ओतके  गीत।
सब्बो रद्दा बाट मा,लाली कुधरिल छाय।
मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।

किलबिल किलबिल हे करत,गली खोर घर बाट।
मड़ई   मनखे    बर    बने,दया   मया   के   घाट।
संगी  साथी  किंजरे,धरके देखव हाथ।
पाछू  मा  लइका चले,दाई  बाबू साथ।
मामी मामा मौसिया,पहिली ले हे आय।
मोर गाँव  दैहान मा,मड़ई गजब भराय।

ओरी   ओरी   बैठ  के,पसरा  सबो   लगाय।
सस्ता मा झट लेव जी,कहिके बड़ चिल्लाय।
नान  नान  रस्ता  हवे,सइमो  सइमो होय।
नान्हे लइका जिद करे,चपकाये बड़ रोय।
खई खजानी खाय बर,लइका रेंध लगाय।
मोर  गाँव  दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।

चना चाँट गरमे गरम,गरम जलेबी लेव।
बड़ा  समोसा  चाय हे,खोवा पेड़ा सेव।
भजिया बड़ ममहात हे,बेंचावय कुसियार।
घूमय तीज तिहार कस,होके सबो तियार।
फुग्गा मोटर कार हा,लइका ला रोवाय।
मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई गजब भराय।

बहिनी मन सकलाय हे,टिकली फुँदरी तीर।
सोना  चाँदी  देख  के, धरे  जिया  ना  धीर।
जघा जघा बेंचात हे, ताजा ताजा साग।
बेंचइया चिल्लात हे,मन भावत हे  राग।
खेल मदारी ढेलुवा,सबके मन ला भाय।
मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई गजब भराय।

चँउकी  बेलन बाहरी,कुकरी मछरी गार।
साज सजावट फूल हे,बइला के बाजार।
लगा  हाथ  मा   मेंहदी,दबा  बंगला   पान।
ठंडा सरबत अउ बरफ,कपड़ा लगे दुकान।
कई किसम के फोटु हे, देखत बेर पहाय।
मोर  गाँव दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।

जिया भरे झोला भरे,मड़ई मनभर घूम।
संगी साथी सब मिले,मचे रथे बड़ धूम।
दिखे कभू दू चार ठन,दुरगुन एको छोर।
मउहा पी कोनो लड़े,कतरे पाकिट चोर।
मजा उही हा मारही,मड़ई जेहर आय।
मोर गाँव दैहान मा,मड़ई गजब भराय।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Tuesday, January 9, 2018

विधान - हरिगीतिका छन्द

*हरिगीतिका छन्द*


तँय  रुख लगा (हरिगीतिका)

झन हाँस जी, झन नाच जी , कुछु बाँचही, बन काट के ?
कल के  जरा  तयँ  सोच ले , इतरा नहीं  नद पाट के  
बदरा  नहीं  बिजुरी  नहीं , पहिली  सहीं  बरखा  नहीं
रितु  बाँझ  होवत  जात हे , अब खेत मन बंजर सहीं

झन  पाप  पुन  अउ  धरम ला, बिसरा कभू बेपार मा 
भगवान  के  सिरजाय  जल, झन  बेंच हाट-बजार मा 
तँय  रुख लगा  कुछु पुन कमा,  रद्दा  बना भवपार के 
अपने - अपन   उद्धार  होही   ये   जगत - संसार के        

*हरिगीतिका के विधान*

डाँड़ (पद) - ४, ,चरन - ८ 

तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा. आख़िरी मा रगन माने बड़कू,नान्हें,बड़कू (२,१,२)

हर डाँड़ मा कुल मातरा – २८ , बिसम चरन मा मातरा – १६  , सम चरन मा मातरा- १२  मातरा मा  

यति / बाधा – १६, १२ मातरा मा (या १४,१४ मातरा मा) 

खास- ५,१२ १९, अउ २६ वाँ मातरा नान्हें होय ले गाये मा जियादा गुरतुर लागथे.

बिसम अउ सम चरन मा १४, १४ मातरा घलो हो सकथे

मात्राबाँट -
हरिगीतिका हरिगीतिका, हरिगीतिका
112  1 2    112 12     112 12
हरिगीतिका
 112 12

या
श्रीगीतिका श्रीगीतिका, श्रीगीतिका
 2212       2212        2212

श्रीगीतिका
 2212

*अरुण कुमार निगम*

Friday, January 5, 2018

शोभन छन्द - शकुन्तला शर्मा

सरगुजा मा हे बिसाहिन

सरगुजा - मा हे बिसाहिन, देख हे बिन - हाथ
फेर दायी संग गजहिन, भाग - बाचय - माथ।
रोज मजदूरी - बजावय, मोगरा - सुख धाम
देख नोनी ला सिखोवय, पंथ के सत - नाम।

देवदासा - गुरु - सिखोवय, पंथ के अन्दाज
रोज - दायी हर पठोवय, सफल होवय काज।
गोड मा सब काम करथे, हे - बहुत हुसियार
हासथे - गाथे मटकथे, मीठ - सुर - कुसियार।

सुरुज - ऊथे रोज बुडथे, दिन खियावत रोज
देखते - देखत गुजरथे, देख ले अब - खोज ।
अब बिसाहिन नाचथे जब, नाचथे - सन्सार
बिधुन हावय नाच मा सब, छोड़ के घर बार।

सुन - बजाथे देख माण्दर, नाव हे बन - खार
मन - मधुर मुरली मनोहर, बाजथे - सुकुमार।
बिकट - पैसा आत हावय, मोगरा - घर आज
बर बिहा के बात बाँधय, बाज - माण्दर बाज।

मोगरा हर बात कर लिस, माढ गइस - बिहाव
देख मडवा आज गडगिस,सब सुआसिन गाव।
आज खुश हावय बिसाहिन, नाचथे बन - खार
सरगुजा जस - पुर नहाइन, आज बारम् - बार।

शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Wednesday, January 3, 2018

अरविन्द सवैया - श्री दिलीप कुमार वर्मा

(1)

बिटिया कहिथे ग ददा सुन ले,मन मोर कहे ग पढ़े बर जाँव।
सँगवारिन हा सब जावत हे,सँग ओखर जाय महूँ सुख पाँव।
सब सीखत हे पढ़ना लिखना, कुछ सीख महूँ अपने घर आँव।
कुछ ज्ञान बटोर धरे मन मा,घर आवत ही सब ला बतलाँव।

(2)

जब ज्ञान बढ़े सनमान बढ़े,तब अंतस हा अबड़े सुख पाय।
सब लोगन पूछत हे अबड़े,यह काखर गा बिटिया हर आय।
सँगवारिन नाम कहे तुँहरो, सुन के मनवा बड़ नाचन भाय।
अब भेज ददा बड़का स्कुल मा,बिटिया हर जावय नाम कमाय।

(3)

सब सीखत सीखत सीख गये,अब जावत हे बिटिया परदेश।
पढ़ना लिखना सब पूरन हो,बदले रहिथे बिटिया हर भेष।
उड़ियावत हे अब अम्बर मा,जिनगी अब लागत हावय रेस।
बिटिया ह जहाज उड़ावत हे,घर मा अब थोरिक हे न कलेश।

(4)

जब जाँगर टोर कमावत हे,तब पावत हाबय अन्न किसान।
मनखे जब खावत भात रहे,तब फेंकत अन्न करे नहि मान।
कइसे कर भोजन हा मिलथे,अब थोरिक सोंच करौ ग नदान।
कतको हर लाँघन सूतत हे,उन जानत अन्न हरे भगवान।

(5)

मरना सब ला दिन एक हवै,तुम सोंच अभी झन गा घबराव।
करनी कर के फल भोग इहाँ,अउ नेंक करौ मन मा हरसाव।
दुख मा रहिबे मरना गुन के,अपने जिनगी बिरथा न गवाव।
अब दूसर खातिर जीवव जी,तब अंतस मा अबड़े सुख पाव।

(6)

पढ़ना लिखना सिख ले बढ़िया,जिनगी भर आवय ये हर काम।
जब आय समे झन ताक सखा,अब दूसर के रसता अउ धाम।
अपने करनी फल मीठ रहे,अउ दूसर ला अब देय अराम।
करनी अइसे कर ले ग सखा,जग मा बड़ उज्जर होवय नाम।

(7)

मुसवा कहिथे अब धान कहाँ,भगवान बता अब का मँय खाँव।
परिया दिखथे सब खेत तको,घर मा नइ धान कहाँ अब जाँव।
लडुआ न मिले न मिले बरफी,कुछ राह बताव जिहाँ सुख पॉंव।
कुछ ना मिलही तब का करिहौं,मँय लाँघन गा अब जान गवाँव।

(8)

बरसा करदे भगवान बने,तब धान बने ग उगाय किसान।
भरही घर के कुरिया हर जी,तब कूदत फाँदत खावँव धान।
लडुआ चढ़ही जब आव इहाँ,तब खाहव गा कहना अब मान।
सब पूजत हे बिसवास रखे,धन देवत हौ तब हौ भगवान।

(9)

सब मोदक ला जब खावत हौ,न बचावत हौ हमरो बर एक।
जब लाँघन राख सवार रहौ,तब दौड़ सके न रहे हम टेक।
कइसे करके हम काम करे,बतलाव भला मुसवा कह नेक।
जब धान किसान भरे घर मा,सुख आवत हे जग मा बिन छेंक।

(10)

मुसकावत हे इठलावत हे,अउ खेलत हावय हाँथ उठाय।
उबड़ी जब होवत हे मुनिया,तब पाँव उठा मड़ियावन भाय।
मड़ियावत हे अँगना परछी,तब लेत सहाय खड़ा कर जाय।
जब ठाढ़ गये मुनिया हमरो,अब रेंगत दौड़त ओ सुख पाय।

(11)

जिनगी सबके कइसे चलथे,मुनिया हमरो दुनिया ल बताय।
कब कोन इहाँ सनतोस करे,सब चाहत हे अघवावत जाय।
मड़ियावत रेंगत दौड़ पड़े,जिन भागत हे उन मंजिल पाय।
जिन बैठ रहे पछवावत हे,उन साल बिते अबड़े पछताय।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Tuesday, January 2, 2018

सार छन्द - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया

छेर छेरा तिहार के बधाई

छेरछेरा(सार छंद)

कूद  कूद के कुहकी पारे,नाचे   झूमे  गाये।
चारो कोती छेरिक छेरा,सुघ्घर गीत सुनाये।

पाख अँजोरी पूस महीना,होय छेर छेरा हा।
दान पुन्न के खातिर पबरित,होथे ये बेरा हा।

कइसे  चालू  होइस तेखर,किस्सा   एक  सुनावौं।
हमर राज के ये तिहार के,रहि रहि गुण ला गावौं।

युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।
राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।

हैहय    वंशी    शूर  वीर   के ,रद्दा    जोहे   नैना।
आठ साल बिन राजा के जी,राज करे फुलकैना।

सबो  चीज  मा हो पारंगत,लहुटे  जब  राजा हा।
कोसल पुर मा उत्सव होवय,बाजे बड़ बाजा हा।

परजा सँग रानी फुलकैना,अब्बड़ खुशी मनाये।
राज  रतनपुर  हा मनखे मा,मेला असन भराये।

सोना चाँदी रुपिया पइसा,बाँटे रानी राजा।
बेरा  रहे  पूस  पुन्नी के,खुले  रहे दरवाजा।

कोनो  पाये रुपिया पइसा,कोनो  सोना  चाँदी।
राजा के घर खावन लागे,सब मनखे मन माँदी।

राजा रानी करिन घोषणा,दान इही दिन करबों।
पूस  महीना  के  ये  बेरा, सबके  झोली भरबों।

राज पाठ हा बदलत गिस नित,तभो दान हा होवय।
कोसलपुर  के  माटी  मा  जी,अबड़ धान हा होवय।

मिँजई कुटई होय धान के,कोठी तब भर जाये।
अन्न  देव के घर आये ले, सबके  मन  हरसाये।

अन्न दान बड़ होवन लागे, आवय जब ये बेरा।
गूँजे अब्बड़ गली गली मा,सुघ्घर छेरिक छेरा।

टुकनी  बोहे  नोनी  घूमय,बाबू  मन  धर झोला।
देय लेय मा ये दिन के बड़,पबरित होवय चोला।

करे  सुवा  अउ  डंडा  नाचा, घेरा  गोल   बनाये।
माँदर खँजड़ी ढोलक बाजे,ठक ठक डंडा भाये।

दान धरम ये दिन मा करलौ,जघा सरग मा पा लौ।
हरे  बछर  भरके  तिहार  ये,छेरिक  छेरा  गा  लौ।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)