Wednesday, September 27, 2017

चौपई छन्द - श्री दिलीप कुमार वर्मा

चौपई छन्द - श्री दिलीप कुमार वर्मा

बइगा

चौपई छंद ( बइगा )

मोला तें असने झन जान,पकड़ौ मँय हर मरी मसान।
रतिहा जावँव मँय समसान,मोर भूत ले हे पहिचान।1।

मँय बइगा हँव ताबड़ तोड़,भूत भागथे पटकू छोड़।
टोन्ही रहिथे हाँथे जोड़,मोर आज भी धरथे गोड़।।2।।

जंतर मंतर हे भरमार,जानत हावँव पूरा सार।
दुखिया मन के दुख ला टार,करथँव मँय हर भूत सँहार।।3।।

देख पिसाचिन हर घबराय,ये बइगा हर काबर आय।
छाँव देख गा जाय लुकाय,पकड़ाये अड़बड़ पछताय।।4।।

भोले बाबा के हे देन,जादू मंतर के हे चेन।
साधक जे गुरुवन से लेन,बढ़िया बइगा बनथे तेन ।।5।।

असने गा कहिथे सब जान,मोर कहे ला सिरतो मान।
जाबे ऊहाँ छुटे परान,जल्दी पहुँचाही समसान।।6।।

ओ ढोंगी बइगा हे जान,जेहर माँगय पइसा दान।
कुकरी बकरा तें झन लान,अइसन ऊपर लाठी तान।।7।।

जादू ले नइ लइका होय,काबर मनखे पइसा खोय।
टोना जादू कुछ ना होय,पाखण्डी बाबा सब कोय।।8।।

येखर मन ले दुरिहा राख,येकर थोरिक नइ हे साख।
काबर छानत हाबच ख़ाक,डाक्टर के घर ला तँय झाँक।।9।।

करही ओहर बने निदान,ओ भुइयाँ के भगवान।
जेन बिमारी तेला लान,सब के ओला हे पहिचान।।10।।

भूत प्रेत ना मरी मसान,टोना जादू नइ हे जान।
हरे बिमारी सिरतो मान,डाक्टर करथे तुरत निदान।।11।।

नो हँव बइगा में हर जान,देवत हँव तोला मँय ज्ञान।
कहना अब तँय मोरो मान,झन रहिबे तँय हर अनजान।12।।

रचनाकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Tuesday, September 26, 2017

चौपैया छन्द - श्री हेमलाल साहू

चौपैया छन्द - श्री हेमलाल साहू
(1)
छोड़व मन माया, माटी काया, झन करहूँ अभिमाना।
चारे दिन जिनगी, सबला संगी, एक जगह हे जाना।।
संतोष रखै सुख, मिलै नहीँ दुख, अपन करम के भागे।
मन कतको जागे, कतको भागे, काल सबो ले आगे।।
(2)
तज जात पात ला, मान बात ला, आगू बड़ जा भाई।
सब संग जोर के, गाँव खोर के, रद्दा बने बनाई।।
आवौ सब पढ़बो, आगू बढ़बो, जिनगी सफल बनाबो।
सब गाँव म जाबो, अलख जगाबो, शिक्षा ला बगराबो।।

रचनाकार - श्री हेमलाल साहू
ग्राम - गिधवा (बेमेतरा) छत्तीसगढ़

Sunday, September 24, 2017

विधान रोला छन्द - अरुण कुमार निगम

विधान रोला छन्द - अरुण कुमार निगम
मतवार (रोला छन्द)

पछतावै   मतवार ,  पुनस्तर   होवै   ढिल्ला
भुगतै  घर  परिवार , सँगेसँग   माई-पिल्ला
पइसा  खइता  होय, मिलै दुख झउहा-झउहाँ
किरिया  खा  के आज ,  छोड़  दे  दारू-मउहाँ

रोला छन्द

डाँड़ (पद) - , ,चरन -  
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, बड़कू या नान्हें आवै.
हर डाँड़ मा कुल मातरा२४ ,
यति / बाधाबिसम चरन मा ११ मातरा के बाद अउ सम चरन मा १३ मातरा के बाद यति सबले बढ़िया माने जाथे, रोला के डाँड़ मा १२ बड़कू घला माने गे हे ते पाय के १२ मातरा या १२ ले ज्यादा मातरा मा घला यति हो सकथे. एकर बर कोन्हों बिसेस नियम नइ हे.
खास- डाँड़ मन के आखिर मा बड़कू या नान्हें आना चाहिए

पहिली डाँड़ (पद)

पछतावै         मतवार -              पहिली चरन  
(१+१+२+२)+(१+१+२+१)     =      ११  

पुनस्तर        होवै   ढिल्ला -      दूसर चरन   
(१+२+१+१)+(२+२)+(२+२)  =      १३

दूसर डाँड़ (पद)

भुगतै        घर     परिवार-          तीसर चरन  
(१+१+२)+(१+१)+(१+१+२+१) =     ११

सँगेसँग        माई-पिल्ला -          चउथा चरन   
(१+२+१+१)+(२+२)+(२+२)    =     १३

बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा (वार”/ वार”) माने बड़कू,नान्हें (२,१) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा बड़कू आय हे.
तुकांत- दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा (ढिल्ला / पिल्ला) आय हे. 

रचनाकार - अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Friday, September 22, 2017

आल्हा छंद - श्री चोवाराम वर्मा:

आल्हा छंद -  श्री चोवाराम वर्मा: 

*वीर शिवाजी महिमा*

पइयाँ लागँव गणपति गुरु के,हाथ जोर के माथ नवाँय ।
बिनती सुन लौ सारद माता, भूले बिसरे देहु बताय।।1

जस ला वीर शिवा के गावँव,महिमा जेकर अगम अपार।
क्षत्रिय कुल में जनम धरे तैं, कुर्मी जाति कहय संसार।।2

किला बखानँव शिवनेरी के,जनम लिए सोला सौ तीस।
नाम शिवाजी दाई राखे, शिव भोला के पाय असीस।।3

माता धरमिन जीजाबाई , पिता शाह जी सूबेदार।
कोणदेव गुरु के किरपा ले, सीखे तैं भाला तलवार |।4

हितवा बर तो अब्बड़ सिधवा, बैरी बर तो सँउहे काल।
परम भक्त माता तुलजा के,जय हो भारत माँ के लाल।5

धरम करम ले पक्का हिन्दू, हिन्दू के पाये संस्कार।
गऊ माता के रक्षा खातिर, जुद्ध करे तैं कतको बार।।6

बालकपन में करे लड़ाई, बैरी मन ला दे ललकार।
कब्जा करे किला मा कतको,लड़े लड़ाई छापा मार।।7

बीजापुर के राजा बैरी, नाम कहावै आदिल शाह।
तोर भुजा ला तउलत मरगे, फेर कभू नइ पाइस थाह।।8

समझौता के नाम बला के,लेहे खातिर तोरे जान।
घात लगाये धरे कटारी,कपटी पापी अफजल खान।।9

दाँव ह ओकर उल्टा परगे,समझ गए तैँ तुरते चाल।
बाघ नखा मा ओला भोंगे,यमराजा कस बनके काल।।10

सेना देखे जी मालव के, सबो मुगलिया बड़ घबराय।
जइसे बघवा के तो छेंके,ठाढ़े हिरना प्रान गँवाय।।11

अइसे फुरती जइसे चीता,भुजा म ताकत बज्र समान।
रूप दिखय जस पांडव अरजुन,धरे हाथ मा तीर कमान।।12

औरँगजेब बला के दिल्ली, पकड़ जेल मा देइस डार।
फल के टुकनी मा छुप निकले,गम नइ पाइन पहरेदार।।13

दसों दिसा मा डंका बाजय, धजा मराठा के लहराय।
कतका महिमा तोर सुनावँव, मोरो मति हा पुर नइ पाय।।14

जय जय जय जय वीर शिवाजी,निस दिन तोर करँव गुनगान।

जय होवय भारत माता के, जेकर बेटा तोर समान।।15

रचनाकार - श्री चोवाराम वर्मा "बादल" 
ग्राम - हथबंध , छत्तीसगढ़ 

Thursday, September 21, 2017

रोला छन्द - श्री दिलीप कुमार वर्मा


रोला छन्द - श्री दिलीप कुमार वर्मा

 दारू

राजा होथे रंक,नसा के ये चक्कर मा।
पूँजी सबो सिराय,लगे आगी घर-घर मा।
करथे तन ला ख़ाक,सचरथे सबो बिमारी।
जल्दी आवय काल,बिखरथे लइका नारी।।1।।

दारू तन मा जाय,असर करथे बड़ भारी।
पीने वाला मान,छोड़थे दुनिया दारी।
मनखे होय अचेत,कहे ओ आनी बानी।
थोरिक नही लिहाज,करय अपने मन मानी।।2।।

दारू के ये रंग,चढे जब मनखे ऊपर।
उड़य हवा के संग,समझ हीरो गा सूपर।
सुनय नहीं ओ बात,जात अपने दिखलाथे।
उतरय दारू रंग,लहुट घर रोवत आथे।।3।।

पी ये नइ हच तँय,नसा तोला पी यत हे।
तोरे तन ला खाय,मजा मा ओ जीयत हे।
दारू छोड़व आज,काल जिनगी मिल जाही।
हरियाही तन काल,ख़ुशी हो सुख ला पाही।।4।।

रचनाकार श्री दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

Wednesday, September 20, 2017

विधान, दोहा छन्द - अरुण कुमार निगम

विधान, दोहा छन्द - अरुण कुमार निगम

बन्दौं  गनपति  सरसती, माँगौं  किरपा  छाँव
ग्यान अकल बुध दान दौ, मँय अड़हा कवि आँव |

जुगत करौ अइसन कुछू, हे गनपति गनराज
सत् सहित मा बूड़ के , सज्जन बने समाज

रुनझुन बीना हाथ मा, बाहन हवे मँजूर
जे सुमिरै माँ सारदा, ग्यान मिलै भरपूर

लाडू  मोतीचूर  के , खावौ  हे गनराज
सबद भाव वरदान मा, हमला देवौ आज

हे सारद हे सरसती , माँगत हौं वरदान
सबल होय छत्तीसगढ़ , भाखा पावै मान

दोहा छन्द के विधान - 

डाँड़ (पद) - , ,चरन -  
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (,)
हर डाँड़ मा कुल मातरा२४ , बिसम चरन मा मातरा१३, सम चरन मा मातरा- ११
यति / बाधा१३, ११ मातरा मा , खास- बिसम चरन के सुरु मा जगन मनाही.
बिसम चरन  के आखिर मा सगन, रगन या नगन या नान्हें,बड़कू(,)
सम चरन  के आखिर मा बड़कू,नान्हें (,)

पहिली डाँड़ (पद)
बन्दौं         गनपति        सरसती-        बिसम चरन
(२+२)+(१+१+१+१)+(१+१+१+२) = १३
माँगौं       किरपा      छाँव -                     सम चरन   
(२+२)+(१+१+२)+(२+१) = ११
दूसर डाँड़ (पद)
ग्यान       अकल       बुध        दान     दौ         बिसम चरन 
(२+१)+(१+१+१)+(१+१)+(२+१)+(२) = १३
मँय।        अड़हा       कवि    आँव-           सम चरन   
(१+१)+(१+१+२)+(१+१)+(२+१) = ११

बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा रसती (सगन ११२) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा दान दौ (रगन २१२) आय हे.
तुकांत- दू-दू डाँड़ के आखिर मा (छाँव / आँव) माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (,)


सहर  गाँव मैदानला, चमचम  ले  चमकाव
गाँधी जी के सीखला , भइया  सब अपनाव ||

लख-लख ले अँगना दिखै, चम-चम तीर-तखार
धरौ   खराटा   बाहरी,  आवौ    झारा  -   झार ||

भारत भर - मा चलत हवै , सफई के अभियान
जुरमिल करबो साफ हम , गली  खोर खलिहान ||
 
आफिस  रद्दा  कोलकी  ,  घर  दुकान  मैदान
रहैं साफ़सुथरा सदा, सफल होय अभियान ||

साफ - सफाई   धरम  हे , एमा  कइसन  लाज
रहै  देस - मा स्वच्छता, सुग्घर स्वस्थ समाज ||
रचनाकार - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़