Saturday, December 29, 2018

शोभन (सिंहिका) छंद - शकुन्तला शर्मा

कथा - गीत

सरगुजा - मा हे बिसाहिन, देख हे बिन - हाथ
फेर दायी संग गजहिन, भाग - बाँचय - माथ ।
रोज मजदूरी - बजावय, मोंगरा - सुख - धाम
देख नोनी ला सिखोवय, पन्थ के सत - नाम ।

देवदासा - गुरु - सिखोवय, पन्थ के अन्दाज
रोज - दायी हर पठोवय, सफल होवय काज ।
गोड मा सब काम - करथे, हे बहुत हुसियार
हासथे - गाथे मटकथे, मीठ - सुर - कुसियार ।

सुरुज ऊथे रोज बुडथे, दिन - खियावत रोज
देखते - देखत - गुजरथे, देख ले अब - खोज ।
अब बिसाहिन - नाचथे जब, नाचथे - सन्सार
बिधुन हावय नाच मा सब, छोड़ के घर - बार।

सुन - बजाथे देख माण्दर, नाव हे बन - खार
मन मधुर मुरली - मनोहर, बाजथे - सुकुमार ।
बिकट - पैसा कमावत हे, मोगरा - हर आज
बर बिहा के बात - बोहै, बाज - माण्दर बाज।

मोगरा हर बात कर लिस, माढ गइस - बिहाव
देख मडवा आज गड गिस,सब सुआसिन गाव।
आज खुश हावय बिसाहिन, नाचथे बन - खार
सरगुजा के मन - नहाइन, आज सौ - सौ बार ।

रचनाकार - शकुन्तला शर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

Sunday, December 23, 2018

किसान दिवस विशेषांक

सवैया छन्द - अरुण कुमार निगम

किसान – १ (सुमुखी सवैया)

किसान उगाय तभे मिलथे , अन पेट भरे बर ये जग ला।
अजी सुध-चेत  नहीं इनला,  धनवान सबो समझें पगला।
अनाज बिसा सहुकार भरे खलिहान , किसान रहे कँगला ।
सहे अनियाय तभो बपुरा , नइ छोड़य ये सत् के सँग ला ।

किसान – २ (मुक्ताहरा सवैया)
किसान कहे लइका मन ला तुम नागरिहा बन अन्न उगाव ।
इहाँ अपने मन बीच बसो  झन गाँव तियाग विलायत जाव ।
मसीन बरोबर लोग उहाँ न दया न मया न नता न लगाव।
सबो सुख साधन हे इहिंचे  धन - दौलत देख नहीं पगलाव ।

किसान – ३ (वाम सवैया)

किसान उठावय नागर ला अउ जोतय खेत बिना सुसताये ।
कभू बिजरावय घाम  कभू   अँगरा बरसे  तन-खून सुखाये ।
तभो नइ मानय हार सदा करमा धुन गा मन-मा मुसकाये ।
असाढ़  घिरे  बदरा  करिया  बरखा  बरसे  हर  पीर भुलाये।

किसान – ४ (लवंगलता सवैया)

किसान हवे  भगवान बरोबर  चाँउर  दार  गहूँ सिरजावय ।
सबो मनखे  मन पेट भरें  गरुवा बइला मन प्रान बचावय।
चुगे चिड़िया धनहा-दुनका मुसुवा खलिहान म रार मचावय ।
सदा दुख पाय तभो बपुरा सब ला खुस देख सदा हरसावय।

रचना - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़
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हरिगीतिका छन्द - जगदीश "हीरा" साहू

*किसान के मन के पीरा*

कर मेहनत दिनरात जे, उपजाय खेती धान के।
सेवा करे परिवार मिल, धरती अपन सब मान के।।
समझे जतन पइसा रखे, हँव बैंक मा वो सोंचथे।
मिलके सबो रखवार मन, गिधवा बने सब नोंचथे।।1।।

धोखाधड़ी कर बैंक ले, पइसा निकाले छल करे।
धिक्कार वो बइमान ला, तन मा अबड़ कीरा परे।।
नेतागिरी करवात हे, झन जाँव कहिके जेल वो।
बइमान मन के राज मा, अड़बड़ करत हे खेल वो।।2।।

देखत हवय भगवान सब, करनी करम के फल दिही।
नइ धन रहे बइमान के, आये हवय जस चल दिही।।
मानुस जनम बदनाम कर, दुख भोग जिनगी बीतही।
हारत हवय सच हा भले, सुन एक दिन वो जीतही।।3।।

रचना - जगदीश "हीरा" साहू
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(किसान दिवस विशेष )
 मनहरण घनाक्षरी - चोवा राम "बादल "

"किसान अउ किसानी"

काँटा खूँटी बिन बान, काँद दूबी छोल चान, डिपरा ला खंती खन, खेत सिरजाय जी ।
घुरुवा के खातू पाल, सरे गोबर माटी चाल , राखड़ ल बोरी बोरी, छींच बगराय जी ।
बिजहा जुगाड़ करे, बोरी बोरा नाप धरे, नाँगर सुधार करे , जोखा ल मढ़ाय जी ।
सबो के तैयारी करे , राहेर ओन्हारी धरे ,बरखा असाड़ के ला , किसान बलाय जी । 1 ।

रिमझिम पानी गिरे, कभू तेज कभू धीरे, गरजत बादर हा, भारी डरुवाय जी ।
चमक चमक चम ,बिजुरी के झमाझम , सुपाधार पानी गिरे , डोली भर जाय जी ।
नाँखा मूँही फोर फार, नरवा म बरो धार , बिजहा छिंचाय तेला , सरे ल बँचाय जी ।
दूबारा तिबारा छींचे , कोपर म घलो इँचे , देखत किसान श्रम , श्रम सरमाय जी ।2 ।

देखत बियासी आगे ,बाढ़े धान खुशी लागे , चभरंग चभरंग , नाँगर चलाय जी ।
लेंझा चाले धान खोंचे, बदौरी ल दाब दाब ,साँवा बन नींदे चूहा ,कनिहा नँवाय जी ।
यूरिया पोटाश डार , करगा ला नींच नींच , कीरा फाँफा मारे बर ,  दवई छिंचाय जी ।
पाके धान लुए लाने ,मिंज कूट कोठी भरे, भुईयाँ के भगवान , किसान कहाय जी। 3 ।

रचना - चोवा राम "बादल "
           हथबंद (छग)
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किसान दिवस विशेष

गीतिका छंद मा एक गीत - आशा देशमुख

हाँथ जोड़व मुड़ नवावँव ,भूमि के भगवान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,कर्म पूत किसान हो।

हाँथ मा माटी सनाये ,माथ ले मोती झरे।
सब किसनहा सुन तुँहर ले ,अन्न के कोठी भरे।
धूप जाड़ा शीत तुँहरे ,मीत संगी जान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,भूमि पूत किसान हो।1।

हे जगत के अन्नदाता ,मेटथौ तुम भूख ला।
मेहनत कर रात दिन फेंकव अलाली ऊब ला।
नीर आँखी मा लबालब ,सादगी पहिचान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,कर्म पूत किसान हो।2।

आज तुँहरे दुख सुनैया ,नइ मिलय संसार मा।
सब अपन मा ही लगे हे ,एक होय हज़ार मा।
ये जगत के आसरा हव ,दीन जीव मितान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव,भूमि पूत किसान हो।3।

रचना - आशा देशमुख
कोरबा छतीसगढ़
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रोला छंद - दिलीप कुमार वर्मा

"किसान"

1
कहाँ किसानी खेल,परे जाँगर ला पेरे।
कतको हपट कमाय,तभो दुख भारी घेरे।
दिन-दिन हो बदहाल,सोर कोनो नइ लेवय।
कइसे करय किसान,करज काला ओ देवय।1।

2
खरचा रुपिया होय,मिलत हे बारा आना।
घर कइसे चल पाय,रहे बस आना जाना।
भुइया के भगवान,अन्न के दाता कहिथे।
कोनो जान न पाय, किसनहा का-का सहिथे।2।

3
कभू बाढ़ आ जाय,फसल जम्मो बह जाथे।
सूखा परथे मार,खेत परिया रह जाथे।
दूनो ले बँच जाय,त कीरा अबड़ सताथे।
खड़े फसल बरबाद,रहे कीरा सब खाथे।3।

4
जतका पावय धान,लान कोठी भर देथे।
सुरही कहाँ बँचाय,मजा मुसुवा तक लेथे।
कइसे गढ़ दे भाग,विधाता तही बतादे।
बनही कोन किसान,आज मोला समझादे।4।

5
दुख मा रहे किसान, तभो ले हाँसत रहिथे।
भुइया के भगवान, तभे सब ओला कहिथे।
जग के पालन हार,अन्न ला सदा उगाथे।
भरके सब के पेट,बड़ा सुख ओ हर पावय।5।

रचना - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार, छत्तीसगढ़
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घनाक्षरी - ज्ञानुदास मानिकपुरी

(किसान दिवस विशेष)

नाँगर बइला साथ,चूहय पसीना माथ
सुआ ददरिया गात,उठत बिहान हे।
खाके चटनी बासी ला,मिटाके औ थकासी ला
भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।
गरमी या होवय जाड़ा,तीपे तन चाहे हाड़ा
मूड़ मा बोह के भारा,चलत किसान हे।
करजा लदे हे भारी,जिनगी मा अँधियारी
भूल के दुनियादारी,होठ मुसकान हे।

रचना - ज्ञानुदास मानिकपुरी
ग्राम - चंदैनी, कबीरधाम, छत्तीसगढ़
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घनाक्षरी छन्द - दुर्गाशंकर इजारदार:

*किसान दिवस विशेष*

घाम जाड़ बरसात, सबो दिन मुसकात,
करम करत हावै, देख ले किसान जी,
करम ल भगवान, करम धरम मान,
पसीना ला अपन तो, माने हे मितान जी,
सहि के जी भूख प्यास, रहिथे जी उपवास,
अन्न उपजाय बर , देथे वो धियान जी,
सनिच्चर इतवार, नइ चिन्हे दिनवार,
भुइंया के सेवा बर, उठथे बिहान जी   !

रचना - दुर्गाशंकर इजारदार
सारंगढ़, छत्तीसगढ़
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सरसी छन्द - मीता अग्रवाल

माटी के कोरा मा उपजे ,किसम किसम के धान।
अन्न-धन्न भंडार भरय जी,मिहनत करय किसान।।

सुरुज  देव ला हाथ जोड़ के,विनती करय दुवार ।
करम प्रधान बनावव मोला, नीक लगय  संसार ।।

उठ भिनसरहा फाँदत जावय,बइला गाड़ी खेत।
तत तत तत तत बइला हाँकय ,धरे हाथ मा बेंत ।।

काम बुता कर बासी खावय,तनिक अकन सुसताय।
खेत ख़ार ला बने जतन के,संझा बेरा आय।।

 आघू ले जतनात हवय अब ,खेत ख़ार के काम।
निंदई गुड़ई करय कटाई ,  मशीन दे आराम।।

अंतस चिंता  बड़ बाढत हे,नवा तरक्की द्वार ।
होवत हे कमती पशुधन अब , चलत विकास  बयार।।

रचना - मीता अग्रवाल
रायपुर, छत्तीसगढ़
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कज्जल छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

किसान

भुँइया के बेटा किसान।
खेती मा देथस धियान।
उपजाथस सोनहा धान।
कारज हे सबले महान।

धन धन जगपालक किसान।
अंतस मा नइहे गुमान।
तोर दया जिनगी परान।
तहीं असल देश के मान।

जब ले तैं उपजाय अन्न।
नइहे जी कोनो विपन्न।
करे कड़ाही छनन छन्न।
खाके जन मन हे प्रसन्न।

रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
       गोरखपुर कवर्धा छत्तीसगढ़
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सरसी छंद  - राम कुमार साहू

करजा बोड़ी मूँड़ लदाये,रोवय देख किसान।
चिंता मन मा एके रहिथे,कइसे होही धान।।

खातू कचरा महँगा होगे,मिलय नही बनिहार।
टोरत जाँगर खूब कमाये,बिन पानी बेकार।।

ठोम्हा पैली बिरता होगे,पहुँचय सेठ दुकान।
तब ले करजा कम नइ होवय,सन्सो करय किसान।।

बेंचय खेती धनहा भर्री, करजा नइ बड़हाय।
पतरी पतरी सबो सिरागे,मति ओखर छरियाय।।

सिधवा मनखे सुन नइ पावय,ताना पीरा ताय।
कोनों फाँसी डोरी झूलय,मँहुरा जहर ल खाय।।

रचना - राम कुमार साहू
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दोहा छन्द - पोखन लाल जायसवाल

किसान

लाँघन कोनो मत रहय , चिंता करय किसान ।
लहू पछीना छीत के , उपजावय सब धान ।।

भरथे सबके पेट ला , करथे लाँघन काम ।
चिंता रहिथे खेत के , करय नहीं आराम ।।

जाड़ सीत अउ घाम मा , जाँगर टोर कमाय ।
बरसा बादर मा घला , तन मन अपन लगाय ।।

करजा बोड़ी बाढ़गे ,बाढ़े बेटी हाय ।
कतका होही धान हा , चिंता हवय समाय ।।

गहना ला गहना धरे , ताकत साहूकार ।
करजा देख खवाय का ,भूखन हे परिवार।।

करय भरोसा धान के , मिलही बढ़िया दाम ।
धनहा डोली बाँचही , सुख पाहूँ सुखराम ।।

रचना - पोखन लाल जायसवाल
पठारीडीह पलारी, छत्तीसगढ़

Tuesday, December 18, 2018

सदगुरू बाबा घासीदास जयंती विशेषांक



(1)

आल्हा छंद - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

हमर राज के  माटी मा जी,बाबा लेइस हे अवतार।
सत के सादा झंडा धरके,रीत नीत ला दिये सुधार।

जात पात अउ छुआ छूत बर, खुदे बनिस बाबा हथियार।
जग के खातिर अपने सुख ला,बाबा घासी दिये बिसार।

रूढ़िवाद ला मेटे खातिर,बबा करिस बढ़ चढ़ के काम।
हमर राज के कण कण मा जी,बसे हवे घासी के नाम।

बानी मा नित मिश्री घोरे,धरम करम के अलख जगाय।
मनखे मनखे एक बता के,सुम्मत के रद्दा देखाय।

संत हंस कस उज्जर चोला,गूढ़ ग्यान के गुरुवर खान।
अँवरा धँवरा पेड़ तरी मा,बाँटे सबला सत के ज्ञान।

जंगल झाड़ी ठिहा ठिकाना,बघवा भलवा घलो मितान।
धरे कठौती मा गंगा ला,बाबा लेवय जब कुछु ठान।

झूठ बसे झन मुँह मा कखरो,झन खावव जी मदिरा माँस।
बाबा घासी जग ला बोले,करम करव निक जी नित हाँस।

दुखिया मनके बनव सहारा,मया बढ़ा लौ बध लौ मीत।
मनखे मनखे काबर लड़ना,गावव सब झन मिलके  गीत।

सत के ध्वजा सदा लहरावय,सदा रहे घासी के नाँव।जेखर बानी अमरित घोरे,ओखर मैं महिमा ला गाँव।

रचनाकार -  श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

(2)

जयकारी छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

''सतगुरु बाबा घासीदास''

सतगुरु के संदेश महान।तहूँ समझ ले मन नादान।
लोकतंत्र के हे पहिचान।मनखे मनखे एक समान।

पर नारी माता सम जान।जग जुग जिनगी के सभिमान।
नशापान ला महुरा जान,दूर रहे बर मन मा ठान।

हम जानत हन हावय बोध।सती प्रथा के करिस विरोध।
गुरु घासी के साँच नियाव।विधवा मन के पुनर्बिहाव।

गुरु घासी लेइस संज्ञान।बेगारी हे लूट समान।नाँगर मुठिया धरे कमाय।ते खेती के मालिक आय।

देख ताक के पाँव पसार।चादर ले झन नाकय पार।
उज्जर सतनामी संस्कार।धुवा घलो के सम अधिकार।

नोनी बाबू एक्के भाव।बिना भेद के खूब पढ़ाव।
ठलहा रह ना गाल बजाव।महिनत करके रोटी खाव।

सतगुरु बाबा घासीदास।आज जयन्ती उँखरे खास।
धरे सत्य जिनगी नहकाव।हँसी खुशी से पर्व मनाव।


रचनाकार-महंत सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
               गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

(3)

बरवै छंद - बोधनराम निषादराज

"गुरु घासीदास"

बंदँव  गुरुवर   बाबा,  घासीदास।
सुन  लेहू  जी मोरो, हे अरदास।।

मँय   अज्ञानी   देदे, मोला   ज्ञान।
ददा मोर तँय दाई,अउ भगवान।।

तोर चरन मा जम्मों,सुख ला पाँव।
बाबा मँय तो तोरे, गुन  ला गाँव।।

माता  अमरौतिन  हा,पावय भाग।
बाबा मँहगू  के हे, किस्मत  जाग।

पावन माह दिसम्बर, देखव आय।
अब गिरौदपुर वासी,धज लहराय।।

सत्   रद्दा  देखाइस, बाबा  आज।
आवव संगी चलबो,करबो काज।।
~~~~~~~~~~~~~~
रचना:-
बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता,वाणिज्य
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

(4)

दोहा छन्द - श्रीमती आशा आजाद

जय जय सतनाम गुरु

जय जय कर सतनाम गुरु,पइया  लागौ  तोर।
समता पाठ सिखाय तँय,जिनगी करय अँजोर।।1

जन्में रहे गिरौद मा,धरे सदा तँय ध्यान।
बनगे  बैरागी पुरुष,बाँटे  तँय  हा  ज्ञान।।2

सुग्घर समता भाव ला,जग मा तय बगराय।
गुरु  बाबा के मान ले,सत गुरु नाव कहाय।।3

मनखे-मनखे  एक   हे,बाबा ज्ञान सिखाय।
जात-पात सब छोड़ के,मनखे ला अपनाय।।4

समरसता   संदेश    ला,हिरदे   ले   अपनाव।
कपट भाव ला त्याग दव,जग मा सुमता लाव।।5

जय  बाबा  गुरुपंथ के,नाचौ पंथी आज।
सादा झण्डा थाम लव,छेड़ौ जम्मो साज।।6

घासीदास कहाय गा,जग ला करय अँजोर।
सत के  रद्दा  तँय धरें,चरण  पखारौ  तोर।।7

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

(5)

मनहरण घनाक्षरी - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

संत शिरोमणि गुरु घासीदास जयंती के समस्त मानव जगत ला गाड़ा गाड़ा बधाई

संत गुरु घासीदास 42 अमृतवाणियाँ-

सतनाम  घट   घट, बसे  हवै  मन  पट
भरौ  ज्ञान  पनघट, कहे  घासीदास  हे
सबो संत मोरे आव,महिनत रोटी खाव
जिनगी  सुफल पाव, करम  विश्वास हे
ओतकेच तोर  पीरा,जतकेच मोर पीरा
लोभ मोह  क्रोध कीरा,करे तन नाश हे
सेवा कर दीन दुखी,दाई ददा रख सुखी
धर  ज्ञान  गुरुमुखी ,घट   देव  वास  हे।।

ऊँचा  पीढ़ा  बैरी बर,मया  बंधना ला धर
अन्याय  विरोध  बर,रहौ  सीना  तान  के
निंदा  अउ  चारि हरे,घर  के  उजार  करे
रहौ  दया   मया  धरे,कहना  सुजान  के
झगरा ना जड़ होय,ओखी के तो खोखी होय
सच ला ना  आँच  आय, मान  ले तैं  जान के
धन  ला  उड़ाव  झन,खरचा बढ़ाव  झन
काँटा  ला  गढ़ाव झन,पाँव  अनजान के।।

पानी पीयव छान के,बनावौ गुरु  जान के
पहुना  संत  मान  के,आसन  लगाव  जी
मोला देख तोला देख,बेरा ग कुबेरा  देख
कर सबो  के सरेख, मिल  बाँट खाव जी
सगा के हे सगा बैरी,सगा होथे चना खैरी
अटके  हे देख  नरी,सगा  का बताँव  जी
मोर  हर   संत  बर, तोर   हीरा  मोर  बर
हे  कीरा के  बरोबर,मैं  तो  समझाँव  जी।।

दाई हा तो दाई आय,मया कोरा बरसाय
दूध  झन  निकराय,मुरही  जी  गाय  के
गाय  भैंस नाँगर  मा,इखर गा जाँगर मा
ना रख  बोझा गर मा ,नोहय  फँदाय के
नारी  के सम्मान बर,विधवा  बिहाव बर
रीत  नवा  चालू  कर, चूरी  पहिराय  के
पितर  मनई   लगे,मरे   दाई   ददा  ठगे
जीयत  मा  दूर   भगे,मोह   बइहाय  के।।

सोवै   तेन  सब  खोवै ,जागै  तेन  सब पावै
सब्र  फल  मीठा  होवै,चख  चख  खाव जी
रोस  भरम  त्याग   के,सोये  नींद  जाग  के
ये  धरती  के  भाग  ला,खूब  सिरजाव  जी
कारन ला जाने बिना,झन न्याय ला जी सुना
ज्ञान   रसदा   ना  कभू , उरभट   पाव   जी
मन  ला हे  हार जीत,बाँटौ  जग मया  प्रीत
फिर  सब  मिल  गीत,सुमता  के  गाव  जी।।

दान  देवइया  पापी,दान  लेवइया  पापी
भक्ति भर  मन झाँपी,मूर्ति  पूजा छोड़ दे
जइसे खाबे  अन्न ला,वइसे पाबे  मन ला
सजा झन  ये तन ला,मोह  घड़ा फोड़ दे
ये  मस्जिद   मन्दिर , चर्च  अउ  संतद्वार
बना  झन  गा  बेकार, मन  सेवा  मोड़ दे
गरीब  बर  निवाला, तरिया   धरमशाला
बना कुआँ  पाठशाला ,हित  ईंट जोड़ दे।।

आँख होय जब चूक,अँगरा कस जस लूख
फोकट  के  सुख  करे,जिनगी  ला  राख हे
पर  के भरोसा  झन,खा तीन  परोसा  झन
मास  मद  बसौ  झन,नाश  के  सलाख  हे
एक  धूवा   मारे   तेनो , बराबर खुद  गिनो
जान  के मरई  जानौ,पाप  के  तो शाख़ हे
गुरु घासीदास  कहे ,कहौ  झन  मोला बड़े
सत  सूर्य   चाँद  खड़े, उजियारी  पाख  हे।।

रचना - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर 8889747888

(6)

दोहा छन्द - बोधन राम निषादराज

सादा   तोर  बिचार  हे, बाबा  घासीदास।
ऊँच नीच सब एक हे,सत् मारग के आस।।1।।

मँहगू के घर अवतरे,  ओखर  भाग   जगाय।
बालक घासीदास हा,गिरौदपुर ला भाय।।2।।

गुरु  तँय  मोला  ज्ञान दे, आए  हँव  मँय द्वार।
तोर  शरन  मा  राखले, करव   मोर  उद्धार।।3।।

जइत खाम  सतनाम के,  हावय  तोरे  धाम।
सत् के अलख जगाय बर,धरे ध्यान प्रभु नाम।।4।।

अलख जगा  सतनाम के, सत्  रद्दा  मा जाय।
मानव सेवा कर चले,घासीदास कहाय।।5।।

पंथ चले सतनाम  के, सत्  के  ज्ञान  बहाय।
जन-जन मा तँय प्रेम के,सुघ्घर पाठ पढ़ाय।।6।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
छंदकार:-
बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता वाणिज्य
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

(7)

कुण्डलिया छंद - चोवाराम वर्मा "बादल"

         "जय सतनाम"

महिमा अगम अपार हे, सत्यनाम हे सार ।
सत भाखा गुरु के हवय, बूड़व सत के धार।
बूड़़व सत के धार , मइल मन के जी धोलव।
सादा रखे विचार, बचन मा सत रँग घोलव।
मनखे मनखे एक, एक हे सबके गरिमा।
देथे सत संदेश, अबड़ हे सत के महिमा।

रचना -चोवा राम "बादल "
      हथबंद (छ.ग.)

(8)

🌹🌹गुरु घासीदास जयंती के आप सब ला बधाई अउ शुभकामना 🌹🌹🙏🙏

कुण्डलिया छंद - कौशल कुमार साहू

गुरु घासी ला तैं सुमर, जिनगी के आधार।
जोंत बार सतनाम के, मिट जाही अँधियार।।
मिट जाही अँधियार, सँगी ये मन मा धरलव।
लइका सबो सियान, आरती पूजा करलव।।
कौशल कहना मान, गया झन जावव काशी।
करही बेड़ा पार, हमर सबके गुरु घासी।।

✍कौशल कुमार साहू
सुहेला (फरहदा ) भाटापारा

(9)

बरवै छंद - आशा देशमुख

"गुरू महिमा"

अमरौतिन के कोरा ,खेले लाल।
महँगू के जिनगी ला ,करे निहाल।1।

सत हा जइसे चोला ,धरके आय।
ये जग मा गुरु घासी ,नाम कहाय।2।

सत्य नाम धारी गुरु ,घासीदास।
आज जनम दिन आये ,हे उल्लास।3।

मनखे मनखे हावय ,एक समान।
ये सन्देश दिए हे, गुरु गुनखान।4।

देव लोक कस पावन ,पुरी गिरौद।
सत्य समाधि लगावय ,धरती गोद।5।

जैतखाम  के महिमा ,काय बताँव।
येला जानव भैया ,सत के ठाँव।6।

निर्मल रखव आचरण ,नम व्यवहार।
जीवन हो सादा अउ ,उच्च विचार।7।

बिन दीया बिन बाती ,जोत जलाय।
गुरु अंतस अँंधियारी ,दूर भगाय।8।

अंतस करथे उज्जर ,गुरु के नाम।
पावन पबरित सुघ्घर ,गुरु के धाम।9।

रचना - आशा देशमुख, कोरबा छत्तीसगढ़

(10)

बाबा गुरु घासीदास जयंती के आप सब ला बहुत बहुत बधाई 🌹🙏🌹

सार छंद  - ज्ञानुदास  मानिकपुरी

बाबा घासीदास जगत ला,सत के राह दिखाये।
जाँति पाँति औ ऊँच नीच के,बाढ़े रोग मिटाये।

भरम भूत औ मूर्ती पूजा,फोकत हवय बताये।
मातपिता भगवान बरोबर,सार तत्व ल लखाये।

जप तप सेवा भावभजन ला,मन मंदिर म बसाले।
करम धरम हा सार जगत मा,जिनगी अपन बनाले।

गुरु के बानी अमरित बानी,हिरदै अपन रमाले।
भाईचारा दया मया ला,पग पग तँय अपनाले।

बैर कपट ला दुरिहा फेँकव,लोभ मोह सँगवारी।
चलव सुघर चतवारत रसता,घपटे जग अँधियारी।

परनिंदा औ परनारी हे,राह नरक के जग मा ।
गुरुवर के अनमोल बचन हा,बहय सदा रग रग मा।

रचना - ज्ञानुदास  मानिकपुरी
चंदेनी (कबीरधाम)

Wednesday, November 28, 2018

मनहरण घनाक्षरी - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

संविधान दिवस - (26 नवम्बर)

ना गीता ना बाईबिल,ना ही ग्रन्थ कुरान से।
देश  मोर  चलथे  जी ,भीम   संविधान  से।
अनेकता  में  एकता ,दिखय  भाव  समता।
देश  आगू  बढ़थे  जी, सही दिशा  ज्ञान से।
पढ़  लिख  आगू बढ़ौ, नवा इतिहास  गढ़ौ।
संविधान  सब  पढ़ौ,जी लौ  फिर  शान से।
हाथ मा  कलम  हवै ,सुख के  आलम हवै।
सच  कहौं  मिले  हवै, भीम  बलिदान  से।।

चलै  बने  लोकतंत्र, दिये  भीम  महामंत्र।
रख  मान  प्रजातंत्र,लिखे  संविधान  ला।
हर हाथ काम पाये,सुख रोटी सबो खाये।
झन  कोई  लुलवाये, कपड़ा  मकान ला।
दुख खुद ही  सहिके,चुपचाप  जी रहिके।
सबो  मोर  ये  कहिके,सहे  अपमान  ला।
सत  मैं  बचन  धरौं, नमन   नमन   करौं।
चरन  बंदन   करौं, विभूति   महान   ला।।

 इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

Tuesday, November 27, 2018

चौपाई छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

संविधान दिवस (26 नवम्बर) के संदेश

भोजन पानी छत अउ छानी। मान मया शिक्षा  जिनगानी।।
वंचित जन के करुण कहानी। का मरहम का चोट निशानी।।

बाँचे सपना   आनी-बानी। का का हे?जल्दी पहिचानी।।
आवव हम सब मन मा ठानी। करबो पागा बाँध सियानी।।

छन्दकार - श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
   गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

Saturday, November 24, 2018

दोहा छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

खैरझिटिया के दोहे

सूरज कस उजियार कर,कहूँ हवस तैं एक।
चंदा बन चमकत रहा,तारा बीच अनेक।1।

पसरा  देख  गरीब के,मोल  भाव  के  ठौर।
कीमत बड़े दुकान के,कोन करत हे गौर।2।

मरहम धरके मार झन,छल मत बनके दास।
आसा  बाँधे जौन हा,तोड़ न ओखर आस।3।

कतको  अधमी  लेड़पा, होगे  देख  सुजान।
किरपा ले गुरुदेव के,बाढ़ै जस अउ शान।4।

भाग बना नित भाग के,आलस निंदिया छोड़।
सपना  होथे सच कहाँ,नता करम ले जोड़।5।

फूल  आज  महकय  नही,भले लुभावय नैन।
देखावा हा एक दिन,छीन लिही सुख चैन।6।

समरथ हा बिन साधना,हो जाथे बेकार।
माड़े माड़े जंग मा,सर जाथे तलवार।7।

कुहके  कारी  कोयली,सबके  जिया  लुभाय।
सादा रँग के कोकड़ा,बिन बिन मछरी खाय।8।

पूस म पहरा रात के,जी के हे जंजाल।
चना गहूँ बाँचे कहाँ,फिरे चोर चंडाल।9।

अन्तस्  के  जब गोठ ला,देय कलम आवाज।
वो रचना होवय अमर,करे सबे जुग राज।10।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, November 23, 2018

सरसी छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

हे गुरुनानक देव

जन्म जयन्ती आज आपके,हे गुरु नानक देव।
कर के शब्द ज्ञान उजियारा,अँधियारा हर लेव।

संवत चउदह सौ उनहत्तर,तिथि पंद्रह अप्रेल।
जन्म जयन्ती कातिक पुन्नी,पावन पबरित मेल।

जन्म भूमि गुरु नानक जी के,तलवंडी हे गाँव।
सिक्ख धर्म के पहिली गुरु मा,गुरु नानक के नाँव।

कातिक पुन्नी पाय हवै जी,गुरु पुन्नी अस नाँव।
ए दिन मैं गुरु ग्रंथ कथे का?पढ़ँव सुनँव बगराँव।

कतको नियम धरम व्रत पूजा,करले टेम कुटेम।
आखिर प्रभु चरनन पाये बर,एक राह हे प्रेम।

भेद भरम पाखण्ड छोड़ दे,बनही बिगड़े काम।
मुख मा नानक,राम बसाले,हिरदे मा सतनाम।

रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

Thursday, November 1, 2018

*छत्तीसगढ़ राज स्थापना दिवस विशेषांक*

सरसी छंद -  कतका करँव बखान

बोहावत हे अरपा पइरी, महानदी हे साथ।
पाँव पखारे जेकर संगी, लीलाधर शिवनाथ।।
दक्षिण कोसल जेन कहाये, माटी हवय महान।
अइसन धरती दाई के मै, कतका करँव बखान।।1

हरियर हरियर जंगल झाड़ी, हरियर खेती खार।
धरती उगले सोना जेकर, रतन भरे भरमार।।
जनम धरिन हे ऋषिमुनि ग्यानी, कतको जिहाँ महान।
अइसन धरती दाई के मै, कतका करँव बखान।।2

जेकर कोरा राजिम लोचन, हवय कुलेश्वर धाम।
शिवरी नारायण जस भुइयाँ, जिहाँ परे पग राम।।
भुइयाँ के भगवान कहाथे, संगी जिहाँ किसान।
अइसन धरती दाई के मै, कतका करँव बखान।।3

बागबाहरा चण्डी दाई, अपन बनाये ठाँव।
माता दन्तेश्वरी बिराजे, दन्तेवाड़ा गाँव।।
गाँव गाँव मा हवय शीतला, ममता के पहिचान।
अइसन धरती दाई के मै, कतका करँव बखान।।4

उठके सब झन रोज बिहनियाँ, परथन जेकर पाँव।
चंदन जस हे माटी संगी, माथा तिलक लगाँव।।
अबड़ मयारू हावय दाई, ममता भरे खदान।
अइसन धरती दाई के मै, कतका करँव बखान।।5। 
                                 
रचनाकार - श्री गुमान प्रसाद साहू ग्राम-समोदा ( महानदी ) थाना-आरंग जिला-रायपुर छ.ग.
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दोहा छन्द -
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस  के आप सब ला गाड़ा अकन ले बधाई।

छत्तीसगढ़ी मा करवँ, मँय जिनगी भर गोठ।
मोर बढ़े नित ज्ञान हाँ, होवय भाखा पोठ।।

मोर माटी मोर हावय, देख ले अभिमान रे।
मोर जिनगी बर बने हे, आज जे वरदान रे।।
देख करथौ गान ला मँय, नित धरे मन राग रे।
नाम जेकर जाप करथौ, मोर जागय भाग रे।।

-हेमलाल साहू
ग्राम-गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
छत्तीसगढ़, मो. 9977831273
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दोहा छन्द -

आज देत शुभकामना,अंतस संगी मोर |
बनगे जी छत्तीसगढ़,उड़त हवै बड़ शोर ||

पुरखा ला जोहार हे,जेन लड़िन हें धीर |
पेट-पीठ मन मार के,बनिन क्रांति के बीर ||

खोजँव फेर सुराज ला,खोगे हमर बिहान |
बादर कारी छाय हे,अब तो धरव धियान ||

हमतो हन बनिहार रे,वोमन ठेंकादार |
गजब परोसी चाल हे,बनबो कब सरदार ||

होगे जी अठरा बछर,कहाँ इहाँ दिन मान |
पुरखा भाखा राज के,होवत हे हिनमान ||

सुख-सुख ला हम देखबो,करबो कब दुख पार |
तार-तार तो हाल हे,बोहत आँसू धार ||

रचनाकार - श्री असकरन दास जोगी
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सवाई छन्द -

*छत्तीसगढ़ राज स्थापना दिवस के आप सबो ला गाड़ा गाड़ा बधाई*

छत्तीसगढ़  राज  के सपना,आँख  सँजोइन  पुरखा भाई।
हमला मान दिलाये खातिर,लड़े  रहिन  जी खूब  लड़ाई।1।

एक  नवम्बर   दो  हजार  के ,छतीसगढ़   राज  बनगे  जी।
शहर शहर अउ गाँव गाँव मा,तब सुघ्घर सुराज आगे जी।2।

धान कटोरा येला कहिथे,छत्तीसगढ़  हमर  महतारी।
महिमा के मैं करँव बखानी,ये हम सबके पालनहारी।3।

बड़ मन भावन बड़ा  सुहावन,दक्षिण कोसल  नाम पुराना।
कल कल झरना नदी बोहथे,जिहाँ भरे धन धान्य खजाना।4।

राम चरित मानस के गाथा,हे संत कबीर जिहाँ बानी।
येकर कोरा जनम धरिन हे,बड़े बड़े ऋषि मुनि ज्ञानी।5।

तिलक लगा लौ ये माटी ला,ये  भुइँया  हे मथुरा  काशी।
सत के संदेश दिये खातिर,लिये गिरौद जनम गुरु घासी।6।

गीत पपीहा कोयल कूके,जिहाँ मया के गूँजय बोली।
सुवा  ददरिया करमा पंथी,नाचय झूम झूम के टोली।7।

चरन पखारय निस दिन जेकर,महानदी अरपा के पानी।
तीज  हरेली  अउ  देवारी, होरी  देवय  सुख जिनगानी।8।

मड़ई मातर लागय बढ़िया,हाट बजार लगे जी मेला।
रंग  रंग के  पकवान  बनै,ठेठरी  फरा अउ  चौसेला।9।

हरियाली ला देख नँदावत,सिरतो मोर अदरमा फाटे।
जहर भरे तन सांप सही जी,इहाँ कारखाना हा काटे।10।

बछर अठारह बितगे भाई,मान कहाँ मिल पाइस येला।
परबुधिया मन राज करत हे,हमन धरे हन पथरा ढेला।11।

छंदकार - इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध* बिलासपुर (छ.ग.)
              8889747888
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         छत्तीसगढ़ (कुण्डलिया छंद )

हावय पावन छत्तीसगढ़ , लगथे सरग समान ।
आनी बानी के खनिज , भरे कटोरा धान।
भरे कटोरा धान, अठारा पूरे हावय  ।
तपसी बाला आय, तेज सब ला हरषावय ।
धन दौलत भरपूर ,बरसथे सुख के सावन।
महानदी के नीर ,अमृत कस हावय पावन। 1।

पावन राजिम धाम हे, सोनाखान मल्हार ।
अलख जगै सतनाम के, हे गिरौद भंडार ।
हे गिरौद भंडार , रतनपुर मा महमाई ।
डोंगरगढ़ मा सिद्ध , बिराजे माँ बमलाई ।
सिरपुर देखे देव ,  चलौ जी भाग जगावन।
भोले भोरमदेव ,चढा़ जल दर्शन पावन ।2

बस्तर के दंतेश्वरी , महिमा अगम अपार ।
चित्रकोट इंद्रावती , दूध नदी कस धार।
दूध नदी कस धार , किरंदुल अउ लोहारा ।
लोहा के भरमार, झूमथे मउँहा डारा ।
अब्बड़ सिधवा लोग, गड़े हे छाती नस्तर ।
माते हे आतंक , ढारे बड़ आँसू बस्तर ।3

अबड़े जी उद्योग हे, बिजली हे भरपूर ।
सड़क तनागे देख लव, नइये शहर ह दूर।
नइये शहर ह दूर ,रायपुर दुर्ग भिलाई ।
करथें जाके काम , रोज जी कतकों भाई ।
तभो गरीबी आज , पकड़ के हमला खबड़े ।
मँहगाई के मार , झेलथन संगी अबड़े।4

छन्दकार - श्री चोवा राम "बादल "
******************************

चौपाई छंद-श्रीमती आशा आजाद

हमर छत्तीसगढ़ राज

सुग्घर छत्तीसगढ़ ल मानौ।एक नंवबर सबझन जानौ।
आज राज के दरजा मिलगे।हमर भाग हा सुग्घर खिलगे।।

छत्तीसगढ़ी गुरतुर बोली।कतक हँसी अउ जान ठिठोली।
ज्ञान बरसथे निशदिन जानौ।कतक विदूषी हावै मानौ।।

झरना झिरिया मंदिर सोहे।मया दया सब मन ला मोहे।।
दक्षिण कौशल राज कहाये।सुग्घर गढ़ छत्तीस समाये।।

जान नागवंशी के बसना।देख इतिहास के सब रचना।
ए भुइयाँ के सुग्घर माटी।केशकाल हे सुग्घर घाटी।।

बिकट चीज के हवे खजाना।उर्जा नगरी राज कहाना।
सोना के भंडार भरे हे।दाई कतका खान धरे हे।।

खनिज संपदा कतका जानौ।सहर कोरबा नामी मानौ।
देवभोग मा सोना दिखथे।लोहा बैलाडिला म मिलथे।।

जान पहाड़ी मैना हावै।राजकीय पक्षी कहलावै।
वनभैसा हे अब्बड़ मिलथे। हमर राज मा गोंदा खिलथे।।

न्यायपालिका सुग्घर हावै।बिलासपुर मा मनखे जावै।
अभ्यारण हा सुग्घर भाये।धान कटोरा राज कहाये।।

का-का गुन ला मँय बतलावौ।छत्तीसगढ़ के महिमा गावौ।
खुशहाली हा जम्मो आये।हमर राज सुग्घर कहलाये।।

रचनाकार - श्रीमति आशा आजाद
मानिकपुर कोरबा, छत्तीसगढ़

Wednesday, October 24, 2018

शरद पूर्णिमा विशेषांक

(चित्र - ब्लॉगर श्री ललित शर्मा के कैमरे से साभार)

रोला (शरद पुन्नी ) 

पुन्नी के हर रात,गजब गा सब ला भाथे। 
पर ये पुन्नी रात,साल मा एक्के आथे। 
दाई खीर बनाय, रात कुन रखे अटारी। 
बरसे अमरित धार,शरद पुन्नी के भारी।1। 

खाले बेटा खीर, चाँट के होत बिहानी। 
देखे लसलस खीर, आत हे मुँह मा पानी। 
महिमा अगम अपार,शरद पुन्नी के होथे। 
नइ पावय जे खीर,साल भर ओ हर रोथे।2  

चंदा घर मा आय,खीर मा अमरित घोरे। 
लक्ष्मी भाग जगाय,शरद पुन्नी के तोरे। 
कब अमरित मिल जाय,अमर हो जावय चोला। 
खाले बेटा खीर,बतावत हँव मैं तोला।3। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदा बाज़ार

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"के बरवै छंद

             शरद पुन्नी

दिखही उज्जर जग जग,ले घर खोर।
बगर जही भुँइया मा,मया अँजोर।

हवय शरद पुन्नी के,महिमा खास।
गोप-गुवालिन राधा-किसना रास।

अनहद सरलग बँसरी,के सुर तान।
गोपिन खुद बर होये,रहिन बिरान।

आज उही बँसरी धुन,नंद किशोर।
बगर जही भुँइया मा ,मया अँजोर।

चंदा अपन किरण सँग,अमरित धार।
नील गगन बरसाही,मया अपार।

जड़ी-बुटी सँग बँटही,खीर प्रसाद।
तपसी मन के तप सत,आशीर्वाद।

कोजागर कर ऊही,चाँद अगोर।
बगर जही भुँइया मा,मया अँजोर।

बिरहिन मन बर दर्पण,चाँद अनूप।
जेमा इक टक देखहिं,पिय के रूप।

श्रद्धा करही पबरित,पूजा पाठ।
पहर बीत जय हर दिन,सुख से आठ। 

लमही आज सरग ले,सत के डोर।
बगर जही भुँइया मा,मया अँजोर।

रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
          गोरखपुर कवर्धा छत्तीसगढ़

चौपाई छंद-श्रीमति आशा आजाद

शरद पूर्णिमा के चंदा

आज शरद पूर्णिमा हे संगी।
मउसम  देखौ   रंग  बिरंगी।
चंदा  देखौ  अब्बड़  चमके।
अंतस मन हा सबके दमके।।

नाव कौमुदी  व्रत कहलाये।
देख  शुक्लपक्ष मा हे आये।
चमकय  देखौ  चंदा  भारी।
किरन होय आजे शुभकारी।।

जन्मे  लक्ष्मी आजे सुनलौ।
मनोकामना ला सब गुनलौ।
व्रत होथे  लइका  के आजे।
शुभ  बेरा  मा  बाजा बाजे।।

नोनी   आजे   व्रत  जे  रहिथे।
मिलथे सुग्घर वर  सब कहिथे।
रोग   दूर   हो   जाये    सुनले।
आज शरद दिन ला तँय गुनले।।

आज  जागरन  जम्मो करथे।
हिरदे  ला सब  निर्मल रखथे।
रोग असाध्य सबो मिट जाथे।
आज सुनौ दिन शुभ कहाथे।।

खुशहाली   जी   आजे   आथे।
दिन अइसन सुन आज कहाथे।
निर्मल  मन  तन  सबके   होवै।
रोग   असाध्य    आजे    खोवै।।

चंदा  के  मुख अब्बड़ भाये।
ओला   देखे  बर  सकलाये।
बारत   हावै   दीया    बाती।
शुभ बीते जी दिन अउ राती।।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़


बरवै  छन्द - श्री चोवाराम वर्मा "बादल"
शरद पुन्नी रात

सुन लव संगी द्वापर, जुग के बात ।
अश्विन महिना पावन, पुन्नी रात ।

राधा संग कन्हैया, नाचै रास ।
दसों दिसा मा बगरे,रहय उजास ।

मुरली ला कान्हा जब, झूम बजाय ।
राधा गोपी ग्वाला ,सब मोंकाय ।

झूमै डार कदम के, नाचै मोर ।
जमुना के हिरदे मा,  उठै हिलोर ।

कृष्ण चन्द्र के मुख ला, देख चकोर ।
मिलकी नइ मारय हो,भाव बिभोर ।

रुखुवा नाचैं धरके, मानुस रूप ।
अमृत झरै चन्दा ले, आप सरूप ।

उही लगन सुभ पावन, तिथि हे आज ।
रात जाग पूजा के , करबो काज।

छन्दकार - श्री चोवाराम वर्मा "बादल"
🙏🙏🙏🙏

बरवै छंद  - आशा देशमुख
शरद पुन्नी के रात

बरसत हे चंदा ले ,अमरित धार ।
आजा रे तैं मितवा ,करँव पुकार ।

चकवा चकवी कहिथे ,करबो बात
मधुर मिलन के बेला ,पुन्नी रात ।

ये चंदा के हावय ,बड़ परताप ।
प्रेमी जन के होवय ,मेल मिलाप ।

यमुना तीरे कान्हा ,रचथे रास ।
हर गोपिन के मन मा ,भरे हुलास।

चारो कोती हावय, अति उल्लास ।
दुधिया रँग कस लागय,इहाँ प्रकास ।

बिरहिन के नैना मा ,जागय आस ।
मितवा दरशन होही ,मिटही प्यास ।

पत्ता पत्ता हुलसे ,नाचय आज ।
बाजव झांझ मँजीरा ,ढोलक बाज ।

अमरित से घरती हा ,आज नहाय ।
चिटिक चँदैनी लुगरा ,भर बगराय।
 ।
अँगना अउ ब्यारा मा ,बनही खीर ।
ये परसादी सबके ,हरही पीर ।

छन्दकार -  श्रीमती आशा देशमुख, NTPC, कोरबा
🙏🙏🙏🙏

बरवै छंद - श्री गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा भाये,चंदा रात।
देखव लेके आये,नव सौगात।।

रास रचाये मोहन,गोपी संग।
शरद पूर्णिमा रचगे,तब ले रंग।।

भोर सबेरा उठके,कर लौ स्नान।
पूण्य कमा लौ भाई,कर के दान।।

श्रद्धा रख के मन मा,रख उपवास।
इच्छा पूरा होही,कर विश्वास।।

खीर बनाके रख ले,पुन्नी रात।
जेमा जीवन अमृत,बरसत जात।।

सुत उठ के खाये ले,अमिरत खीर।
तन ब्याधा हा मिटथे,भागय पीर।।

येखर बाद भागथे,जी बरसात।
ठंडा मौसम होथे,फिर शुरुआत।।

छन्दकार - श्री गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर छत्तीसगढ़
🙏🙏🙏🙏

बरवै छंद - श्रीमती वसंती वर्मा:
🌷🌷पुन्नी के चंदा🌷🌷🌷

पुन्नी के चंदा हर,बरय अंजोर ।
नाचत देखय ओला,आज चकोर ।

करे सिंगार सोला,चंदा आय ।
जेहर देखय ओला,मन ला भाय।।

अमरित लेके चंदा,बरसे आय ।
छानी परवा दाई,खीर मढ़ाय ।।

ओरमे धान बाली,अमरित पाय ।
पुन्नी शरद म सुघ्घर, रात नहाय ।।

भुइयाँ महतारी के ,पाँव पखार ।
आगे बेटी लछमी,घरे हमार  ।।

छन्दकार -  श्रीमती वसन्ती वर्मा, बिलासपुर छत्तीसगढ़

🙏🙏🙏🙏🙏

Monday, October 15, 2018

चौपाई छंद - श्रीमति आशा आजाद

दुर्गा दाई ले अवतार

आगे देखव अब नवराती। फेर जलावव दीया बाती।
पाप खतम कइसे होही माँ। नारी कब तक ले रोही माँ।

दुर्गा दाई ले अवतारी। नारी मनके दुख हे भारी।
कतका पीरा ल गोहरावौं। पग-पग दुख ला मँय हा पावौ।।

अवतारी बनके तँय आजा। नारी के पीरा ल मिटाजा।
चारो कोती अत्याचारी। मान लुटे कइसन लाचारी।।

जगा-जगा हे छुपे लुटेरा। नारी राखै कहाँ बसेरा।
आके तँय हा पार लगादे। पापी मन ले न्याय दिलादे।।

नान-नान नोनी के पीरा। जाय सुनावव काखर तीरा।
रोवत बिलखत रोजे सुनले। मात गोहार थोरक गुन ले।।

कलयुग मा नइ जीना मोला। आज बलावव दुर्गा तोला।
चुप्पे बइठे देखत दाई। अनाचार ले हे करलाई।।

मानवता ला देख भुलागे। मानुष कतका आज रुलागे।
खून खराबा बाढ़त जावै। आबे तँय हा आस लगावै।।

तँय ता सबके तारनहारी। कहे जगत तोला महतारी।
दाई कलयुग मा तँय आजा। नारी के अब लाज बचाजा।।

रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

Friday, October 12, 2018

बरवै छन्द - आशा देशमुख

बरवै छंद

आये हे नवराती ,दीया बार।
पारँव तोर दुवारी ,मँय गोहार। 1।

दुख पीरा ला हरदे ,दाई मोर।
बइठे हँव मँय दाई ,शरण म तोर।2।

दे दे दाई मोला ,अँचरा छाँव।
तोर नेवता पाके ,दँउड़त आँव।3।

तिहीं रचाये दाई ,ये संसार।
तोर मया बोहावय ,अमरित धार।4।

तँय दाई हम लइका ,आवँन तोर।
तोर दया के सागर ,करय हिलोर।5।

तोर कृपा से जागय ,सबके भाग।
कोंदा ला भी मिलथे ,वाणी राग।6।

कइसे तोरे महिमा ,करँव बखान।
सर्व शक्ति तँय दाई ,दे वरदान। 7।

छन्दकार - आशा देशमुख,
एन टी पी सी कोरबा

कज्जल छन्द - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नवरात्रि(कज्जल छंद)

लागे महिना,हे कुँवार।
बोहावत हे,भक्ति धार।
बना दाइ बर,फूल हार।
सुमिरन करके,बार बार।

महकै अँगना,गली खोल।
अन्तस् मा तैं,भक्ति घोल।
जय माता दी,रोज बोल।
मनभर माँदर,बजा ढोल।

सबे खूँट हे,खुशी छाय।
शेर सवारी,चढ़े आय।
आस भवानी,हा पुराय।
जस सेवा बड़,मन लुभाय।

पबरित महिना,हरे सीप।
मोती पा ले,मोह तीप।
घर अँगना तैं,बने लीप।
जगमग जगमग,जला दीप।

माता के तैं,रह उपास।
तोर पुराही,सबे आस।
आही जिनगी,मा उजास।
होही दुख अउ,द्वेष नास।

छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)L

Monday, October 1, 2018

सार छन्द - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

सार छंद आधारित गीत

"ये पित्तर के मनई लगथे,मोला जी बइहासी"

जीयत लोटा  पानी तरसे,मरे म  मथुरा काशी।
देख चरित्तर ये दुनिया के,आवत हे बड़ हाँसी।
ये  पित्तर के  मनई लगथे,मोला  जी बइहासी।1।

जीयत भूखन लाँघन तरसे,मरे म  चीला बबरा।
करिया कउँवा  बाप बने हे,हत रे मानुष लबरा।
ताते तात कुकुर बिलई बर,पुरखा खावय बासी।
ये  पित्तर के  मनई  लगथे,मोला  जी  बइहासी।2।

जीयत  मीठा  बोली  तरसे,दउड़े  लेकेे  डंडा।
तर जही हमर पुरखा कहिके,पिंड पराये पंडा।
राह  धरे हे  मनखे  कइसे,मन हे  मोर उदासी।
ये  पित्तर के  मनई लगथे,मोला  जी बइहासी।3।

जीयत  तन  लंगोटी  तरसे,मरे म  धोती  कुरता।
जीयत सेवा करे नही अउ,मरे म करथस सुरता।
इही बात  ला  बोले  हावय,मोर  संत गुरु घासी।
ये  पित्तर के  मनई  लगथे,मोला  जी  बइहासी।4।

छन्दकार -  इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

Wednesday, September 26, 2018

पितृपक्ष विशेषांक

 घनाक्षरी - श्री कन्हैया साहू "अमित"

पितर पाख -

बेटा-बहू बड़ तपे, आगी खा अँगरा खपे, रोज के मरना जपे, मोला तरसाय हें।
राखे रहैं पोरा नाँदी, रोज खाँय बफे माँदी, मोर बर सुक्खा काँदी, पसिया पियाय हें।
उछरँय करू करू, होगे रहँव मैं गरू, पानी कहाँ एक चरू, भारी मेछराय हें।
जीयत मा मारे डंडा, मरे के बाद म गंगा, राँधे हावै सतरंगा, पितर मिलाय हें।

छन्दकार -श्री कन्हैया साहू "अमित"
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पीतर(किरीट सवैया) - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
(1)
काखर पेट भरे नइ जानँव पीतर भात बने घर हावय।
पास परोस सगा अउ सोदर ऊसर पूसर के बड़ खावय।
रोज बने ग बरा भजिया सँग खीर पुड़ी बड़ गा मन भावय।
खेवन खेवन जेवन झेलय लोग सबे झन आवय जावय।
(2)
आय हवे घर मा पुरखा मन आदर खूब ग होवन लागय।
भूत घलो पुरखा मनके बड़ आदर देख ग रोवन लागय।
जीयत जीत सके नइ गा मन झूठ मया बस बोवन लागय।
पाप करे तड़फाय सियान ल देख उही ल ग धोवन लागय।
(3)
पीतर भोग ल तोर लिही जब हाँसत जावय वो परलोक म।
आँगन मा कइसे अउ आवय जेन जिये बस रोक ग टोक म।
पालिस पोंसिस बाप ह दाइ ह राखिस हे नव माह ग कोख म।
हाँसय गावय दाइ ददा नित राहय ओमन हा झन शोक म।
(4)
जीयत मा करले तँय आदर पीतर हा भटका नइ खावय।
छीच न फोकट दार बरा बनके कँउवा पुरखा नइ आवय।
दाइ ददा सँग मा रहिके करथे सतकार उही पद पावय।
वेद पुराण घलो मिलके बढ़िया सुत के बड़ जी गुण गावय।

 हरिगीतिका छंद - गोठ पुरखा के
(1)
मैं छोड़ दे हौं ये धरा,बस नाम हावै साख गा।
पुरखा हरौं सुरता ल कर,पीतर लगे हे पाख गा।
रहिथस बिधुन आने समय,अपने खुशी अउ शोक मा।
चलते रहै बस चाहथौं,नावे ह मोरे लोक मा।
(2)
माँगौं नहीं भजिया बरा,चाहौं पुड़ी ना खीर गा।
मैं चाहथौं सत काम कर धरके जिया मा धीर गा।
लाँघन ला नित दाना खवा कँउवा कुकुर जाये अघा।
तैं मोर बदला दीन के दे डेहरी दाना चघा।
(3)
कर दे मदद हपटे गिरे के मोर सेवा जान के।
सम्मान दे तैं सब बड़े ला मोर जइसे मान के।
मैं रथौं परलोक मा माया मया ले दूर गा।
पीतर बने आथौं इहाँ पाथौं मया भरपूर गा।

छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
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पितर तर्पण - आशा देशमुख

(1) त्रिभंगी छंद

लीपत हे ओरी ,दिया अँजोरी ,पितर पाख मा मान करे।
जीयत नइ भावय ,मरे मनावय ,देखा देखी दान करे।
पुरखा तर जाही ,सब सुख आही ,सरजुगिया ले रीत चले।
पूजत हे दुनियाँ ,साँझ बिहनियां,बिन बाजा के गीत चले।

(2) मदिरा सवैया

मान मरे पुरखा मन के अउ जीयत बाप इहाँ तरसे।
रीत कहाँ अब कोन बतावय ,नीर बिना मछरी हरसे।
देखत हे जग के करनी सब रोवत बादर हा बरसे।
फ़ोकट के मनखे अभिमान दिनों दिन पेड़ सहीं सरसे।

(3) शंकर छंद
जीयत ले नइ पूछय बेटा ,आज पितर मनाय।
दाई मरगे लांघन भूखन ,मरे बाद खवाय।
कोन जनी गा मरे बाद मा, जाथे कहाँ जीव।
हाड़ राख हा गंगा जावय ,कोन पीये घीव।

छन्दकार - आशा देशमुख
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"पितर के बरा" -
एक गीत - श्री बोधनराम निषादराज

देख तो दाई कउँवा,छानी मा सकलावत हे।
पितर के बरा अउ सुहारी,बर सोरियात हे।।

कुँवार पितर पाख,देख ओरिया लिपाये हे।
घरो घर मुहाटी म,सुघ्घर चउँक पुराये हे।।
सबो देवताधामी अउ,पुरखा मन आवत हे।
देख तो दाई कंउवा.......................

तोरई पाना फुलवा, संग मा उरिद  दार हे।
कोनो आथे नम्मी अउ,कोनो तिथिवार हे।।
मान गउन सबो करत हे,हुम गुँगवावत हे।
देख तो दाई कउँवा.......................

नाव होथे पुरखा के,रंग रंग चुरोवत हावै।
दार भात बरा बर, लइका ह रोवत हावै।।
जियत ले खवाये नही, मरे मा बलावत हे।
देख तो दाई कउँवा.......................

रचनाकार :-- श्री बोधनराम निषादराज
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Wednesday, September 19, 2018

हरिगीतिका छंद - इंजी.गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"

अभियंता दिवस- 15 सितम्बर 

अभियांत्रिकी,जनतांत्रिकी,गढ़थे सदा,इतिहास ला।
सुख से परे,सिरजन करे,सबके धरे,कुछ आस ला।
निर्माण जन,बलिहार मन,रखथे सँजो,विसवास ला।
खुद भूल के,श्रम तूल के,सहिथे सबो,जग त्रास ला।1।

बस लोह पथ,गज गामिनी,जल दामिनी,पुलिया बड़े।
बनगे सड़क,चल बेधड़क,अब आसमाँ,मनखे उड़े।
बनगे भवन,छुवथे गगन,अब देख लौ,दुनिया खड़े।
मिल साथ सब,कर बात अब,धर फोन ला,घर मा पड़े।2।

कब रात हे,कब हे सुबह,नइ तो समय,परिवार ला
घर के खुशी,पर के दुखी,तरसे सदा,इतवार ला।
पर देख लौ,अब सोंच लौ,समझौ अपन,अधिकार ला।
अफसर रहै,कुछ ना कहै,डरथे सदा,ठगदार ला।3।

छंदकार- इंजी.गजानन्द पात्रे *सत्यबोध*

Friday, September 14, 2018

"छन्द खजाना के राजभाषा विशेषांक"

आल्हा छंद - हिंदी भाषा

अबड़ सरल हे सीखे मा जी, बोले मा गुरतुर अउ सोझ ।
बड़ सजोर हे हिंदी भाषा , सबो भाव के सहिथे बोझ ।।

नइये कमसल बियाकरन मा, वैज्ञानिकता हे पुरजोर ।
शब्द खजाना भरे ठसाठस , अलंकार रस छन्द चिभोर ।।

दर्जा हे कानून म भारी, हमर राजभाषा कहिलाय ।
सदा सुहागिन फुलवा एहा ,घाम परे मा नइ मुरझाय ।।

कतको भाषा आइन गेइन , अंग्रेजी उर्दू भरमार ।
धमकी चमकी तको लगाइन, फेर कहाँ जी पाइन पार ।।

हिंदी ककरो बैरी नोहय ,कोनो ला नइ दय दुत्कार ।
जेहा एकर शरण म आथे, ओकर होथे बेड़ापार ।।

जन जन के भाखा हे हिंदी ,पढ़ लव गुन लव वेद पुरान ।
हृदय तार एही मा जुड़थे , जानौ एला देव समान ।।

दुनिया भरके मन सीखत हें , हम काबर रहिबो पछुवाय ।
मातु मान के सेवा करबो , गली गली मा जस बगराय ।।

हिंदी के महिमा सब गाबो , कलमकार मन कलम चलाय ।
गीत लिखत अउ रचत कहानी , मन चिटिको जी झन सकुचाय ।।

छन्दकार - श्री  चोवाराम "बादल "
                 हथबंद

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,,,,,,,,,,घनाक्षरी(हिंदी ),,,,,,,,

कहानी कविता बसे,कृष्ण राम सीता बसे,
हिंदी भाषा जिया के जी,सबले निकट हे।
साकेत के सर्ग मा जी,छंद गीत तर्ज मा जी,
महाकाव्य खण्डकाय,हिंदी मा बिकट हे।
प्रेम पंत हे निराला,रश्मिरथी मधुशाला,
उपन्यास एकांकी मा,कथा बड़ विकट हे।
साहित्य समृद्ध हवै,भाषा खूब सिद्ध हवै,
भारत भ्रमण बर,हिंदी हा टिकट हे।

नस नस मा घुरे हे, दया मया हा बुड़े हे,
आन बान शान हरे,भाषा मोर देस के।
माटी के महक धरे,झर झर झर झरे,
सबे के जिया मा बसे,भेद नहीं भेस के।
भारतेंदु के ये भाषा,सबके बने हे आशा,
चमके सूरज कस,दुख पीरा लेस के।
सबो चीज मा आगर,गागर म हे सागर,
भारत के भाग हरे,हिंदी घोड़ा रेस के।

चर्च मा जी चले हिंदी,मंदिर मा पले हिंदी,
बानी गुरु नानक के,आरती अजान के।
सागर के पानी सहीं,बहे गंगा रानी सहीं,
पर्वत पठार सहीं,खड़े सीना तान के।
ज्ञान ध्यान मान धरे,दुख दुविधा ल हरे,
निकले आशीष बन,मुख ले सियान के।
नेकी धर्मी धीर के जी,भक्त देव बीर के जी,
बहे मंदरस बन,हिंदी हिंदुस्तान के।

छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

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समान सवैया - हिंदी भाषा

हिन्दी भाषा परम-पावनी, जस संगम गंगा कालिंदी।
माथ सजे चम चमचम चमके,जस भारत माता के बिंदी ।1।

प्रेम चंद के अमर कथा ये, बच्चन के हावय मधुशाला ।
लिखे सुभद्रा लक्ष्मी बाई, मीरा के ये हरि गोपाला।2।

तत्सम तद्भव देश विदेशी, सबो रंग ला ये अपनाथे ।
एक डोर मा सबला बाँधय, गीत एकता के ये गाथे ।3।

शब्द नाद अउ लिपि मा आघू, हम सबके ये एक सहारा।
सागर कस ये संगम लागे, गंगा कावेरी  के धारा ।4।

सत्तर साल बीत गे तब ले, मान नहीं पाइस हे भाषा।
हमर राष्टभाषा के पूरा, कोन भला करही अभिलाषा।5।

संविधान हा भारत के जी, दिये राज भाषा के दरजा।
मान राष्ट्रभाषा के खातिर,हम सबके ऊपर हे करजा।6।

छन्दकार - इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

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सरसी छंद

पढ़व लिखव अउ बोलव हिंदी,सुंदर गुरतुर बोल।
हमर मातृभाषा ये आवय,छोड़व मारे रोल।

थोकन पढ़ लिखके मनखेमन , करत हवय नादान।
नाश करे अपने संस्कृति के,मारत रहिथे शान।

देखावा के चक्कर छोड़व,हिरदै मारय होल।
दिन दिन बाढ़त हमर देश मा,अंग्रेजी के रोल।

रोवत हे महतारी भाखा ,अबतो आँखी खोल।
दया मया के रस ला घोरत,हिंदी भाषा बोल।

हमर सभ्यता हमर धरोहर,हिंदी हे पहिचान।
अनेकता मा हवय एकता,सुंदर हिन्दुस्तान।

संकल्प करी आवव सब झन,देना हे अब ध्यान।
नाम चलय दुनिया मा दू ठन,हिंदी हिन्दुस्तान।

छन्दकार - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी

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विष्णु छंद - हिंदी मातृभाखा

हिंदी महतारी भाखा हे,शान सबो कहिथे।
ए भाखा हा मान हमर जी,नीक अबड़ रहिथे।।

कतका सुग्घर लेखन शैली,अपन भाव लिखथे।
हिंदी के अक्षर मा जादू,देश भाव दिखथे ।।

जन-जन मा हिंदी पहुँचावौ,मान करव मन मा।
हिंदी के सब नाव बचावव,रंग लौ सब तन मा।।

कविता मा नव जोश आय सुन,खूब लिखौ मन ले।
देश प्रेम ला लिखदव अपने,सीख सबो झन ले।

देख इंगलिस छोड़े हिंदी ,दूर अबड़ रहिथे।
हिंदी मा सम्मान अबड़ हे,शान सबो कहिथे।।

हिंदी भाखा हिरदे राखव,रहय मान जग मा।
हिंदी हा सुन मान बढ़ाथे,नेक   भाव रग मा।।

छन्दकार - श्रीमति आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

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दोहा छन्द - हिन्दी

छत्तीसगढ़ी हे मया, हिन्दी हे अभिमान।
दाई भाखा के सहीं,हिंदी ला तँय जान।।

हिन्दी भाषा राष्ट्र के, एला दव सम्मान।
हिन्दी के उत्थान ले,हमरो हय उत्थान।।

हिन्दी ला हीनव नहीं, अँगरेजी के नाम।
संसकार ले हय भरे,आही इही ह काम।।

हिन्दी ला सम्मान दव,कीमत एखर जान।
नइँ ता फिर से छिन जही,आजादी सच मान।।

छन्दकार - श्रीमती नीलम जायसवाल (भिलाई)-

Sunday, September 9, 2018

पोरा विशेषांक - छन्द के छ परिवार












चौपई छन्द - 

कइसे मानन हमू तिहार।
दँउड़ावन बइला ला यार।।
बइला चुलहा चकला जान।
बरतन भाँड़ा सबो मितान।।

माटी के बरतन सब लान।
नोनी बाबू खेलन जान।।
हर तिहार के महिमा ताय।
खेल खेल मा देत बताय।।

जीये बर सब लागै चीज।
खेलत खेलत सीख तमीज।।
आज ठेठरी डटके खाव।
सुग्घर पोरा  परब मनाव।।

सूर्यकांत गुप्ता..सिंधिया नगर दुर्ग(छ्त्तीसगढ़)

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शंकर छंद - बोधन राम निषाद राज
(1)
हमर राज के जाँता चुकिया,देख सुग्घर आय।
घर घुँदिया मा कइसे साजे,बइला ला सजाय।।
नन्दी  बइला  ला  दउड़ावय,खोर  चारो ओर।
जघा-जघा मा होवत हावय,खेल फुगड़ी सोर।।
(2)
रंग-रंग  के  बने  खजानी, ठेठरी  ला भाय।
लउहा-लउहा टूरी टूरा,आज खुरमी खाय।।
मन उछाह भर जाथे तन मा,अइसन जी तिहार।
मया बँधाथे जम्मो  घर मा,होय खुश परिवार।।
(3)
पटकत पोरा हाँसत कुलकत,नोनी घलो आय।
चीला  चौंसेला ला  राँधत, दाई ह मुस्काय।।
बइठ नँगरिहा बइला बाँधत,कोठा म सुरताय।
बच्छर भर के ये पोरा ला,देखौ सँग मनाय।।

छंदकार:- बोधन राम निषाद राज
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

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कइसे के मानँव पोरा (लावणी छंद-गीत)

अब दुकाल के संसो सँचरे, मन मा परगे बड़ फोरा।
खेत किसानी करजा बूड़े, कइसे के मानँव पोरा।....
बहिनी बेटी बछर बखत मा, मइके के करथें सुरता।
का होही अब थोर-थार मा, कइसे लँव लुगरा कुरता।
जिवरा हा लेसावत हावय, मन होवत हे मनटोरा।-१
कइसे के मानँव पोरा......
चढ़ही कामा तीन तेलई, कइसे के करू करेला।
सावन भादो सुक्खा बीतय, बाढ़त हे सरी झमेला।
बादर बैरी का ठिकना हे, करते हँव तभो अगोरा।-२
कइसे के मानँव पोरा..........
बने-बने के तीज तिहार सब, सम्मत मा सबो सुहाथे,
रिंगी चिंगी रहना बसना, सबके मन 'अमित' लुहाथे।
चिरहा चड्डी फटहा बण्डी, गुनँव फिकर मा भिड़े कछोरा।-3
कइसे के मानँव पोरा.........

✍ *कन्हैया साहू "अमित"*✍
शिक्षक~भाटापारा,
जिला-बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
©संपर्क~9200252055®
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सार छंद - 

दीदी बहिनी जम्मो झन ला, नँगते रहिस अगोरा।
धरके जी खुशहाली सब बर, आये हाबय पोरा।1।
घर घर आये हाबय संगी,पहुना बेटी-माई।
मनवाये बर पोरा तीजा, लाये हाबयँ भाई।2।
नँदिया बइला सजगे हाबय, सजगे चुलहा चुकिया।
जाँता धरके बइठे हाबय, देखव भाँची सुखिया।3।
करत हवयँ जी पूजा मिलके, घर भर माई पीला।
जेंवाये बर राँधे हाबयँ, गुरहा भजिया चीला।4।
नँदिया बइला ला भाँचा मन, झींकयँ धरके डोरी।
हवयँ चलावत गुड़गुड़ गुड़गुड़, देखव ओरी ओरी।5।
जुरियाये सब दीदी बहिनी, बइठे हवयँ दुवारी।
नवा नवा गा लुगरा पहिरे, खुश हाबयँ जी भारी।6।

रचना- मनीराम साहू 'मितान'
कचलोन(सिमगा) , जिला - बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

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पोरा(ताटंक छंद)

बने हवै माटी के बइला,माटी के पोरा जाँता।
जुड़े हवै माटी के सँग मा,सब मनखे मनके नाँता।
बने ठेठरी खुरमी भजिया,बरा फरा अउ सोंहारी।
नदिया बइला पोरा पूजै, सजा आरती के थारी।
दूध धान मा भरे इही दिन,कोई ना जावै डोली।
पूजा पाठ करै मिल मनखे,महकै घर अँगना खोली।
कथे इही दिन द्वापर युग मा,कान्हा पोलासुर मारे।
धूम मचे पोला के तब ले,मनमोहन सबला तारे।
भादो मास अमावस पोरा,गाँव शहर मिलके मानै।
हूम धूप के धुँवा उड़ावै,बेटी माई ला लानै।
चंदन हरदी तेल मिलाके,घर भर मा हाँथा देवै।
धरती दाई अउ गोधन के,आरो सब मिलके लेवै।
पोरा पटके परिया मा सब,खो खो अउ खुडुवा खेलै।
संगी साथी सबो जुरै अउ,दया मया मिलके मेलै।
बइला दौड़ घलो बड़ होवै,गाँव शहर मेला लागै।
पोरा रोटी सबघर पहुँचै,भाग किसानी के जागै।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया", बाल्को(कोरबा)

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घनाक्षरी (पोरा तिहार )

बैला माटी के बना ले,रंग रंग के सजा ले,
चार पाँव चक्का डार, बने पहिराव जी।
माथा मा टीका लगा दे,फूल माला पहिरादे,
पूजा पाठ करेबर, सुग्घर सजाव जी।
पोरा के तिहार आये,रोटी पीठा ला बनाये,
दाई माई दीदी संग, पोरा फोर आव जी।
आनी बानी खेल खेलौ,बोछडे सखी ले मिलौ,
सुख दुख बाँट सबो,तिहार मनाव जी।
दिलीप कुमार वर्मा , बलौदा बाज़ार

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।। छन्न पकैया छंद ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,आगे तीजा पोरा।
झटकुन आबे तैंहर बहिनी,सुनले ओ मनटोरा।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,रखले जोरन जोरे।
लाने हांवव तीजा लुगरा,सुनले बहिनी मोरे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,मया पिरित ला बाँधे।
किसम किसम के रोटी तैंहर,राखे रहिबे राँधे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,नाँदा बइला लाहूँ।
भाँचा भाँची संगे लाबे, बइठे मैं खेलाहूँ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,कपड़ा नावा लेंहा।
भाँचा भाँची बर हे सब हा, सुनले बहिनी तेंहा।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,सबके सुरता आथे।
पोरा धर के सबो सखी मन,पटके बर गा जाथे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी मन के पोरा।
आथे भइया हमरों कहिके,वोमन करय अगोरा।
राजेश कुमार निषाद , ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर (छ. ग.)

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शंकर छन्द--पोरा-

हमर गाँव मा पोरा के दिन, गाँव भर सकलाँय।
ढंग-ढंग के खेल करावँय,बइला ल दँउड़ाँय।
फुगड़ी खोखो दौंड़ कबड्डी, होय सइकिल रेस।
माई-पिल्ला सब झन आवँय,साज सुघ्घर भेस।।१।।
बहिनी मन मइके आयें हें,पोरा के तिहार।
सजे हवय दाई घर अँगना, हाँसय मुख निहार।
बइला मन के छुट्टी हावय, होत हावय साज।
सुघ्घर सज-धज दँउड़ लगाहीं,खाँय जेवन आज।।२।।
किसिम-किसिम के बने कलेवा,सबो जुर-मिल खाव।
ठेठरी-खुरमी बरा सुहारी,मजा गुझिया पाव।
बाबू नाँगर नोनी जाँता,मगन खेलँय खेल।
पोरा के दिन खुशी मनावव,होवय हेल मेल।।३।।

--नीलम जायसवाल(भिलाई)--

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पोरा  (लावणी छंद )

भारत माँ के अबड़ दुलौरिन , माटी हे छत्तीसगढ़ के ।
लोग इहाँ के सिधवा हितवा , धरम करम मा बढ़ चढ़ के ।।
नाँगर बइला संग मितानी , जतन करइया धरती के ।
उवत सुरुज ला जल देवइया, पाँव परइया बूड़ती के ।।
रंग रंग के परब मनइया, होली अउ देवारी जी ।
रक्षाबंधन आठे पोरा , तीजा रहिथे नारी जी ।।
पोरा के महिमा हे भारी , बइला के पूजा करथें
बेटी बहिनी पटके पोरा , मइके के बिपदा हरथें।।
पोरा मा भरके रोटी ला, आथें पटक दुबट्टा जी ।
लइका मन रोटी ला खाथें , करथें लूट झपट्टा जी ।।
गाँव गाँव मा बैल दउँड़ अउ , खुडुवा खो खो  होथे जी ।
नोनी मन जब सुवा नाँचथें , देखत खुशी उनोथे जी ।।
शिव के हवय सवारी नंदी , बैल रूप मा सँगवारी ।
पोरा के दिन ओकर भाई , मान गउन होथे भारी ।।
बइला ला जी नँहवा धोके , सब किसान पूजा करथें ।
तिलक सार के करैं आरती , माथ नवाँ पइयाँ परथें ।।
भाँचा भाँची लइका मन बर , खेलौना लेथें भारी ।
माटी के चुकिया सँग जाँता , माटी के चूल्हा थारी ।।
मिहनत के जी शिक्षा देथे ,  बइला चूल्हा बचपन ले ।
छत्तीसगढ़िया मन के हिरदे , रहिथे भरे समरपन ले ।।

छन्दकार - श्री चोवाराम "बादल"

Wednesday, September 5, 2018

शिक्षक दिवस विशेषांक









दोहावली - शिक्षक दिवस  

आज हवय पावन दिवस , गुरु पूजा त्योहार ।
वंदत हँव गुरु के चरण , शीश नवाँ सौ बार ।।

राधा कृष्णन ला नमन,  जन्म दिवस हे आज ।
शिक्षक जन जेकर उपर , करथें अबड़े नाज ।।

जेन रहिंन चिंतक बड़े , राजनीति के संत ।
बनिन राष्ट्रपति दूसरा , भारत के श्रीमंत ।।

शिक्षा सँग संस्कार के , जेहा अलख जगाय ।
सुग्घर जी सद ज्ञान दय ,वो हर शिक्षक आय ।।

करिया पट्टी  शिष्य के , आखर भरय अँजोर ।
 रटवा दै जी  पाहड़ा  , भाषा भाव चिभोर ।।

ब्रह्मा विष्णु महेश कस ,गुरुजी तभे कहाय ।
मातु पिता कस मानके , सब झन शीश नँवाय।।

छन्दकार - श्री चोवाराम वर्मा

दुर्मिळ सवैया - हे गुरुदेव

घपटे अँधियार हवे मन द्वार बिचार बिमार लचार हवै ।
जग मोंह के जाल बवाल करे बन काल कुचाल सवार हवै ।
मन के सब भोग बने बड़ रोग बढ़ाय कुजोग अपार हवै ।
गुरुदेव उबारव दुःख निवारव आवव मोर पुकार हवै ।1 ।

लकठा म बला निक राह चला सब होय भला बिपदा ल हरो ।
मन ला गुरु मोर जगा झकझोर भगा सब चोर अँजोर भरो ।
हिरदे पथरा परिया कस हे हरिया दव प्रेम के धार बरो ।
अरजी करजोर सुनौ गुरु मोर हवौं कमजोर सजोर करो ।2।

नइ जानँव आखर अर्थ पढ़े अउ भाग गढ़े मति मंद हवै ।
ममता जकड़े अबड़े अँकड़े कस के पकड़े जग फंद हवै ।
अगिनी कस क्रोध जरे मन मा तन मा धन मा छल छंद हवै ।
किरपा करके दव खोल अमोल बिबेक कपाट ह बंद हवै ।3।

छन्दकार - श्री चोवाराम वर्मा

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दोहा छंद - 
गुरु को सादर है नमन, जो साक्षात् भगवान
उसके चरणों से बहे, ज्ञान ध्यान वरदान।

छन्दकार - शकुन्तला शर्मा

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गीतिका छंद - 

देवता मन ले बड़े हे ,गुरु जगत मा जान ले।
राम कृष्णा मन तको जी ,गुरु शरण मा ज्ञान ले।
रोज कतको बार दीया ,मन तभो अँधियार हे।
भाग्य से मिल जाय गुरु तब ,जान जिनगी सार है।

एक दिन जाना हवे जी ,मोह के संसार से।
मँय उऋण नइ हो सकँव गुरु ,आपके उपकार से।
पुण्य से जिनगी मिले हे ,गुरु मिले सौभाग्य से।
गुरु कृपा ला का बखानौं ,छंद रचना काव्य से।

आभार सवैया - विनत भाव 

आभार मानौं गुरु आपके मैं दिये ज्ञान जोती अँधेरा मिटायेव।
संसार के सार निस्सार जम्मो कते फूल काँटा सबो ला बतायेव।
रद्दा ला रोके जमाना तभो ले हवा शीत आँधी म दीया जलायेव।
माथा नवावौं गुरू पाँव मा मैं छुपे जोगनी ला चँदैनी बनायेव।

भुजंग प्रयात छंद -

गुरू मोर रोजे लुटावै खजाना।
सिखाये विधा छंद गाये तराना।
जिहाँ ज्ञान के रोज जोती जले हे।
तिहाँ  एकता प्रेम मोती पले हे।

मया हे दया हे कहे एक नारा।
सबो ला गुरू छाँव लागै पियारा।
बड़े हे न छोटे सबो एक जैसे।
मिले मातु गोदी गुरू प्रेम वैसे।

छन्दकार - आशा देशमुख 

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गुरू(सरसी छंद)

गुरू शरण मा माथ नवाले,गुरू लगाही पार।
भव सागर ले सहज तरे बर,बना गुरू पतवार।

छाँट छाँट के बने चीज ला,अंतस भीतर भेज।
उजियारा करही जिनगी ला,बन सूरज के तेज।
जल जाही जर जहर जिया के,लोभ मोह संताप।
भटक जानवर कस झन बइहा,नता गुरू सँग खाप।
ज्ञान आचमन कर रोजे के,पावन गंगा धार।
भव सागर ले सहज तरे बर,बना गुरू पतवार।

धीर वीर ज्ञानी अउ ध्यानी,सबो गुरू के देन।
मानै बात गुरू के हरदम,पावै यस जश तेन।
गुरू बिना ये जग मा काखर,बगरे हावै नाम।
महिनत करले कतको चाहे,बिना गुरू ना दाम।
ठाहिल हीरा असन गुरू हे,गुरू कमल कचनार।
भव सागर ले सहज तरे बर,बना गुरू पतवार।

गुरू बना जीवन मा बढ़िहा,कर कारज नित हाँस।
गुरू सहारा जब तक रइही,पाँव गड़े ना फाँस।
यस जश बाढ़े जब चेला के,गुरू मान तब पाय।
नेंव तरी के पथरा बनके,गुरू देव दब जाय।
गावै गुण तीनों लोक गुरू के,गुरू करै उपकार।
भव सागर ले सहज तरे बर,बना गुरू पतवार।

छन्दकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

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सरसी छंद - शिक्षक

शिक्षक हे अभिमान देश के ,याद रखव ये बात।
गुरु के तन मन निर्मल होथे,नइहे कोनो जात।।

शिक्षक हे आवाज हृदय के,सृजन भाव आधार।
शिक्षा देके जीवन गढ़थे ,करथे गा उद्धार।।

शिक्षक देखावय नित रद्दा,विद्या के आधार।
देवय शिक्षा देखव हर युग ,करिन सदा उपकार।।

शिक्षा ले शिक्षक बन जाथे,सबके करें विकास।
नेक भाव ले विद्या बाँटय,गुरु ले सबके आस।।

शिक्षक के सम्मान करव जी,करौं साधना रोज।
गुरु के मुख ले सत ही निकलय,राखँय सत के ओज।।

भेद भाव नइ राखँय कोनो,एके हे आगाज।
हर जन के उद्धार करे ये,दय समता आवाज।।

छंदकार - श्रीमति आशा आजाद

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शंकर छंद - गुरु महिमा
(1)
गुरु के महिमा गुरु ही जाने,मोर तारनहार।
चरन परव जी एखर भाई, जीव होही पार।।
ज्ञानवान सागर जइसे हे,आव डुबकी मार।
गंगा जल कस पी लव संगी,आज जिनगी तार।।
(2)
गुरु बिन जिनगी सुन्ना होथे,होय जग अँधियार।
दिया ज्ञान के आज जलाले,तोर मन के द्वार।।
चरन पखारव ए गुरुवर के,देव किरपा जान।
माथ नवावव करलव सेवा,मिल जही भगवान।।

छंदकार - श्री बोधन राम निषाद राज

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दोहा --गुरु महिमा

बिन गुरु भगती नइ मिलै,मिलै नहीं रे ज्ञान।
चलबे गुरु के संग तँय,पाबे तँय भगवान।।

सत् के डोंगा बइठ के,गुरु ला कर परनाम।
गुरु के रद्दा में चलव,मिलही प्रभु के धाम।।

गुरु के भगती पाय के,बन जाबे तँय धीर।
गुरु  के  छाया  में रबे, झन  होबे  गंभीर।।

सुघ्घर पाबे ग्यान ला,मिटही सब अग्यान।
किरपा गुरु के होय ले,बढ़ जाही जी मान।।

हाथ जोर बिनती करँव,चरन परँव मँय तोर।
हे गुरुवर तँय ग्यान दे,जिनगी बनही मोर।।

गुरु के बानी सार हे,गुरु के ग्यान अपार।
जे मनखे ला गुरु मिलय,ओखर हे उद्धार।।

भक्ति शक्ति दूनों मिलय,मिलय ग्यान भंडार।
गुरु पद में तँय ध्यान धर,गुरु हे तारनहार।।

गुरु चरनन मा ध्यान हो,करौ सदा परनाम।
सत् के रसता मा चलव,बनथे बिगड़े काम।।

गुरु बिन जग अँधियार हे,ज्ञान कहाँ ले आय।
हरि दरशन हा नइ मिलय,मुक्ति कहाँ ले पाय।।

छंदकार - श्री बोधन राम निषाद राज

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दोहा छन्द - गुरु 

गुरू बिना मिलथे कहाँ,  कोनों ला जी ज्ञान ।
कर ले कतको जाप तैं , चाहे देदव जान ।।1।।

नाम गुरू के जाप कर , तैंहा बारम्बार ।
मिलही रस्ता ज्ञान के  , होही बेड़ापार ।।2।।

झोड़व झन अब हाथ ला , रस्ता गुरु देखाय ।
दूर करय अँधियार ला , अंतस दिया जलाय ।।3।।

सेवा करले प्रेम से  , एहर जस के काम ।
गुरु देही आशीष तब , होही जग मा नाम ।।4।।

पारस जइसे होत हे , सदगुरु के सब ज्ञान ।
लोहा सोना बन जथे , देथे जेहा ध्यान ।।5।।

देथे शिक्षा एक सँग,  गुरुजी बाँटय ज्ञान ।
कोनों कंचन होत हे , कोनों काँच समान ।।6।।

सत मारग मा रेंग के  , बाँटव सब ला ज्ञान ।
गुरू कृपा ले हो जथे  , मूरख भी विद्वान ।।7।।

शिक्षक के आदर करव , पूजव सबो समाज ।
राह बताथे ज्ञान के  , तब होथे सब काज ।।8।।

शिक्षा जेहा देत हे , वोहर गुरू समान ।
माथ नवावँव पाँव मा , असली गुरु तैं जान ।।9।।

आखर आखर जोड़ के  , बाँटय सब ला ज्ञान ।
मूरख बनय सुजान जी  , अइसन गुरू महान ।।10।।

छन्दकार - श्री महेन्द्र देवांगन माटी 

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कविता - 

हाँ मै शिक्षक आँव

ज्ञान के अलख जगईया। 
कर्म धर्म के पाठ पढ़्ईया। 
अज्ञानता के अन्धकार ला
ये जग ले दूर मिटईया। 

हाँ मै शिक्षक आँव

एक छोटकन बीज ला
बड़े जान पेड़ बनईया। 
रीति नीति सत प्रेम के
खाद पानी डार सिरजईया। 

हाँ मै शिक्षक आँव

अपन दुख पीरा भुलाके
परके दुख मा साथ निभईया। 
गिरे परे रस्ता मा कोनो मिले
धरके हाथ उठईया। 

हाँ मै शिक्षक आँव

जग मा उजियार करे बर
दीया बनके जलईया। 
भूख पियास दुख दर्द सहिके
अपन कर्तव्य निभईया। 

हाँ मै शिक्षक आँव।

रचनाकार - श्री ज्ञानुदास मानिकपुरी

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दोहा छंद - 

बंदन गुरु के मैं करँव,दुनो हाथ ला जोर।
मोर हृदय अँधियार ला,दूर करव बन भोर।1।

माटी तन कच्चा घड़ा,गुरुवर रूप कुम्हार।
ज्ञान रूप के चाक मा,जिनगी गढ़त हमार।2।

जननी जग माता पिता,गुरु सउँहत भगवान।
जनम सुफल सबके करै,अउ जग के कल्यान।3।

जिनगी के गुरु पाहड़ा,गुणा भाग अउ जोड़।
पाठ सिखावय ज्ञान भर,भेदभाव ला छोड़।4।

देव रूप मा गुरु मिलय,जस माही पतवार।
अंधकार मन दूर करय,ज्ञान जोत ला बार।5।

छन्दकार - इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 
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मनहरण घनाक्षरी छंद - 

जीवन अंजोर करे,जीवन संजोर करे ,
गुरु बिना रहिथे जीवन अंधियार गा ।
ज्ञान के दिया ला बार, करथे गा उजियार ,
भरे नदिया मा गुरु ,बने पतवार गा ।
कच्चा माटी थाप थाप,देवय मूरत छाप,
सुग्घर स्वरूप देथे, बनय कुम्हार गा।
चरण शरण ले के ,ज्ञान के भंडार देथे ,
गुरु ला तो देव रूप, मानय संसार गा ।

दोहा - 

अक्षर अक्षर जोड़ के ,गुरु देवय गा ज्ञान ।
यति गति लय अउ छंद के , करवावय जी भान।(1)

गुरु बिन ज्ञान कहाँ मिलय,मिलय कहाँ सम्मान ।
गुरु आषीश ल पाय बर,तरसय खुद भगवान ।(2)

छन्दकार - श्री दुर्गाशंकर इजारदार

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हरिगीतिका छन्द  - गुरु बड़े भगवान ले

भगवान ले बड़का गुरु,कहिथे सबोझन मान ले। 
काबर कहे अइसन सखा,बतलात हँव मँय जान ले। 
भगवान हा सब जीव ला,भेजे हवय बस जान जी। 
आ के सबो कीरा बरोबर,रहत राहय मान जी।1। 

जब ज्ञान पाइस हे मनुज तब,रूप अइसन पाय हे। 
सब ला बताइन हे सखा,तब तो मनुज कहलाय हे। 
जिन ज्ञान बाँटत हे जगत ला,ओ गुरु कहलाय जी। 
भटके मनुज तक संग आवय, राह सुग्घर पाय जी।2। 

भगवान के संसार मा, रहना कहाँ आसान हे। 
बपुरा रहे तिन मार खावय,सब डहर सइतान हे। 
जिन संग गुरु के पाय हावय, बाँचथे हैवान ले। 
बड़का तभे गुरु हा कहाये, जान लव भगवान ले।3। 

जिन सीख के सब ला बतावय, ओ गुरू कहलाय जी। 
जिन मानथे सच बात ला,उन राह सुग्घर पाय जी। 
सुख दुख सबो हिस्सा रहे,सब जीव बर संसार मा। 
गुरु ज्ञान के पाये सखा,दुख आय ना परिवार मा।4। 

भगवान ला हम जान पाइन,ओ गुरू के ज्ञान ले। 
नइ ते कहाँ हम जान पाबो,बात सिरतो मान ले। 
गुरु के चरण माथा नवावत,भाग ला सहरात हँव। 
भगवान के आशीष तक ला,गुरु चरण मा पात हँव।5। 

छन्दकार - श्री दिलीप कुमार वर्मा

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छंंद दोहा - 

गुरु भगाय अँधियार ला , अउ देवय बड़ ज्ञान ।
ठोंक पीट आशीष दय , आव करन सम्मान ।।

छंद ज्ञान दे गुरु *अरुण*, करिन बहुत उपकार ।
पावन पबरित गुरु चरण , बंदँव बारम्बार ।।

गुरु वाणी अनमोल हे , हर आखर मा सीख ।
गुरु गियान तो नइ मिलय, माँगे कोनो भीख ।। 

सदा राखहू ध्यान ए , गुरु के झन हो अपमान ।
छोड़ अपन अभिमान ला , राखव गुरु के शान ।।

छंदकार - श्री पोखन लाल जायसवाल 

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