Friday, August 16, 2019

रक्षा बंधन विशेषांक

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ताटंक छंद - विरेन्द्र कुमार साहू

गजब अगोरे बहिनी मन हा , परब मया के राखी ला।
गुन-गुन गढ़यँ रेशमी डोरी , सजा मोर के पाखी ला।।

नइ माँगे सोना अउ चाँदी ,बहिनी पहिरा के धागा।
माँगे मया मया के बदला , वोहर रिश्ता के लागा।।

बैर भुलाके मिलथे जुलथे , दुनिया के बहिनी भाई।
बनथे नवा महल रिश्ता के , जुड़य मया पाई पाई।।

राखी के तिहार ला जानौ ,परब बहिन अउ भाई के।
भारत के संस्कृति मा ए , अवसर हे सुखदाई के।।

छंदकार:- विरेन्द्र कुमार साहू , ग्राम बोड़राबाँधा (पाण्डुका) , वि.स. राजिम जि. गरियाबंद , छ.ग.  
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
हरिगीतिका छंद - द्वारिका प्रसाद लहरे
(1)
अब्बड़ मयारू मोर बहिनी,आज राखी लाय हे।
देवत खुशी भरमार मोला,मोर मन हरसाय हे।
बहिनी बचन सुग्घर निभावय, हाथ राखी बाँध के।
लाने हवय जी खीर रोटी,मोर बर जी राँध के।।
(2)
रसधार बोहय गा मया के,आज घर परवार मा।
सबले बड़े व्यवहार भइया,देख ये संसार मा।
रक्षा करव भाई हवव सब,दुःख बहिनी पाय झन।
नाता सदा हरियर रहय,ये फूल कस मुरझाय झन।।2

छंदकार - द्वारिका प्रसाद लहरे
कबीरधाम छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छन्नपकैया छंद - आशा देशमुख

छन्नपकैया छन्नपकैया ,किसम किसम के राखी।
भाई बहिनी मन चहकत हे ,जइसे चहके पाखी।1।

छन्नपकैया छन्नपकैया,भैया देखे रस्ता।
अबड़ मोल राखी के डोरी,झन  जानँव गा सस्ता।2।

छन्नपकैया छन्नपकैया,मन पहुना लुलवाथे।
ननपन के सब मान मनौवा, अब्बड़ सुरता आथे।3।

छन्नपकैया छन्नपकैया,भठरी मन सब आवैं।
पहली के सब रीत चलागन,अब तो सबो नँदावैं।4।

छन्नपकैया छन्नपकैया ,मँय बहिनी मति भोरी।
भाई बहिनी के तिहार मा, बगरे मया अँजोरी।5।

छन्नपकैया छन्नपकैया,घर घर बने मिठाई।
माथ सजे हे मंगल टीका, राखी सजे कलाई।6।

छन्नपकैया छन्नपकैया,कहुँ हो जाये देरी।
निकल निकल के बहिनी देखे,रस्ता घेरी बेरी।7।

छन्दकार - आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
सरसी छन्द - बोधन राम निषादराज

दया मया के बँधना हावै, राखी के त्योहार।
कच्चा डोर बँधाये देखौ,बहिनी-भाई प्यार।।
दया मया के बँधना.....................

ननपन के गा खेले-कूदे,अँगना  परछी खोर।
सावन मा जी आथे सुरता,दीदी मन के लोर।।
राखी लेत बहाना जाथे ,बहिनी के घर द्वार।
दया मया के बँधना...................

जनम जनम के रक्छा के तो,भाई बचन निभाय।
भाई बने सहारा होथे,बहिनी जब दुख पाय।।
करके भाई जी के सुरता,बहिनी रोय गुहार।
दया मया के बँधना....................

रंग-रंग के राखी धरके ,थारी  खूब सजाय।
आवत होही भाई कहिके,बहिनी ह सोरियाय।।
देख बनाये  हे मेवा अउ, करे खड़े  सिंगार।
दया मय के बँधना.....................

सावन के हे पबरित महिना,भाई आस लगाय।
छम-छम-छम-छम नाचय बरखा,बहिनी के मन भाय।।
सराबोर भींजे झूमे सब, राखी देख बहार ।
दया मया के बँधना...................

छंदकार - बोधन राम निषादराज
गाँव - सहसपुर लोहारा, जिला-कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
सार छंद - रामकली कारे

कुलकत हाबय बहिनी के मन , हम अब मइके जाबो ।
बाँध कलाई भाई के जी , राखी सुघर मनाबो ।।

चुन चुन बहिनी राखी लेवय ,रक्षा बन्धन आगे ।
तिलक लगाहव भाई ला कह , मया अबड़ जी लागे ।।

सावन सबले पावन महिना , बहिनी के मन भावय ।
रेशम डोरी बाँध मया के ,मान मया ला पावय ।।

जब जब दुख के बादर  छावय ,आघू आवय भाई ।
बहिनी बर सुख छत्ता बनके ,वोकर करय भलाई ।।

छंदकार - रामकली कारे
बालको नगर कोरबा, छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
गीतिका छंद - अशोक धीवर "जलक्षत्री"

सूँत के तागा हरय जी, फेर सुँतरी हय नही।
ये बहिन भाई दुनो के, भाव मन के लव कही।।
प्रेम अउ रक्षा वचन के, पाय दिन बहिनी सबो।
दूर कतको वो रहय जी, बाँधही राखी तभो।।
छंदकार - अशोक धीवर "जलक्षत्री"
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
विष्णुपद छंद - श्रीमती आशा आजाद

मँय राखी ला आज बाँधिहौ,शान सबो कहिथें।
सैनिक हावय मान हमर जी,अबड़ दरद सहिथें।।

कतका पीड़ा सहिथें ओमन,रात रोज जगथें।
दुश्मन ले लोहा ओ लेथें,हमर लाज रखथें।।

बहिनी बनहू हर सैनिक के,मान रखे मन मा।
रक्षा करके लाज बचावय,साहस हे तन मा।।

रोवत रहिथे लइका ओखर,दूर अबड़ रहिथें।
घरवाली मन देख अगोरत,रोज दरद सहिथें।।

भूख प्यास सब भुला जथे गा,रहय सबो बन मा।
दुश्मन कतको मार गिराथे,निडर भाव मन मा।।

भारत माँ के बेटा मन के,पाव सबो पर लौ।
हाथ बधाँये सुग्घर डोरी,नेक काज कर लौ।।

सैनिक हे सम्मान देश के,प्रेम भाव धर लौ।
लाज बचावत मान हमर जी,नमन सबो कर लौ।।

छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर,कोरबा,छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
अमृत ध्वनि छंद - सरस्वती चौहान

भाई-बहिनी के मया,राखी हवै तिहार।
पबरित डोरा प्रेम के,बस ये ही हे सार।।
बस ये ही हे,सार मया ये,सबले सुग्घर।
भाई-बहिनी,ले दुवार घर,होथे उज्जर।।
लाज बचा लव,अपनें हें सब,बहिनी दाई।
झन टूटय ये,प्रेम भाव हा,बहिनी-भाई।।

छंदकार-श्रीमती सरस्वती चौहान
ग्राम- बरडांड़, पोस्ट-नारायणपुर, तहसील-कुनकुरी
जिला-जशपुर नगर,छत्तीसगढ़

कुंडलिया छंद- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
(1)
राखी बंधन प्रेम के,रिस्ता ये विश्वास।
भाई रखथे मान ता,बहिनी रखथे आस।।
बहिनी रखथे आस,सदा दिन सुख ये पावँव।
रखबे खुला दुवार,कभू जब घर मैं आवँव।।
तोर सहारा आज,उड़त हँव धर मैं पाखी।
रिस्ता ये विश्वास,मया के बंधन राखी।।
(2)
बहिनी बइठ दुवार मा,झाँकय अँगना खोर।
भाई नइहे भाग मा,अँधियारी सुख भोर।।
अँधियारी सुख भोर,मया बर तरसे नयना।
जिनगी के सुख राह,दिखाथे भाई अयना।।
एक फूल दू डार,लगे हे सुंदर टहनी।
बिन भाई के आज,दुखी बइठे हे बहिनी।।
(3)
सून कलाई मोर हे,बहिनी नइ हे पाठ।
जिनगी भारी बोझ हे,संग बँधे दुख गाँठ।।
संग बँधे दुख गाँठ,खोर अँगना महकाये।
बड़का जेकर भाग,उही हा बहिनी पाये।।
बड़ा अभागा आँव,सुनावँव दुख मैं भाई।
राखी आज तिहार,मोर हे सून कलाई।।

इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छप्पय छंद - मोहन लाल वर्मा

सावन पुन्नी खास,मनाथें रक्षाबंधन ।
बहिनी राखी बाँध, लगाथे रोली चंदन।
भाई दे उपहार, मया बहिनी के पाथे।
रक्षा के जब डोर, कलाई मा बँध जाथे।।
भाई-बहिनी के मया, हे अटूट संसार मा।
रक्षाबंधन के परब, दिखथे जे परिवार मा।।

छंदकार - मोहनलाल वर्मा ,
पता-  ग्राम-अल्दा,वि.खं.तिल्दा, जिला- रायपुर, छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
बरवै छंद - जितेन्द्र कुमार निषाद

राखी हावय पबरित,हमर तिहार ।
सावन पुन्नी के दिन,बँटे दुलार।।

बहिनी बाँधे राखी,भइया हाथ ।
तिलक लगावै रोली,चमकै माथ ।।

बैरी बनगे मनखे,आज मितान ।
करे निर्भया घटना,बन शैतान ।।

बहिनी खातिर भइया,दे वरदान ।
तोर लाज बर देहूँ,मैंहा प्रान ।।

हे भाई-बहिनी के,मया अपार ।
रहे सदा जगदीश्वर,सुन गोहार ।।

छंदकार - जितेन्द्र कुमार निषाद
गाँव-सांगली, जिला-बालोद (छत्तीसगढ़)
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
उमाकांत टैगोर: लावणी छन्द- उमाकान्त टैगोर

आगे संगी राखी आगे, खुशी जमो कोती छागे।
जम्मो भाई बहिनी मन के, पावन हिरदे हरियागे।।

भाई बहिनी के नाता हा, सब ले पावन होथे जी।
भाई जब जब दुख मा परथे, बहिनी धर धर रोथे जी।।

राखी हर डोरी भर नोहय, येमा ताकत हे भाई।
बाँध मया ला राखे रहिथे, जमय नहीं मन मा काई।।

जे भाई के बहिनी होथे, वो बड़ किस्मत वाला ये।
जे बहिनी के कदर करय ना, ओकर जिनगी काला ये।।

बहिनी सब के बहिनी होथे, हमला ये गुनना चाही
तभे सबो नोनी बहिनी मन, आघू आघू बढ़ पाही।।

छंदकार- उमाकान्त टैगोर
कन्हाईबन्द, जाँजगीर, छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
छन्न पकैया छंद -  राजेश कुमार निषाद

छन्न पकैया छन्न पकैया, बहिनी मन हा आके।
बाँधय राखी भाई भइया, माथा तिलक लगाके।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,अड़बड़ दिन मा आथे।
रंग रंग के राखी संगी,सबके मन ला भाथे।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी मन घर आथे।
बाँध कलाई राखी हमरों, अबड़े मया जगाथे।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, खाव मिठाई जादा।
करहू बहिनी मन के रक्षा, कर लव भाई वादा।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, बहिनी हमरों आही।
मया पिरित के राखी लाही, बाँध कलाई जाही।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, आथे छोड़े डेरा।
बाँधे बिना कभू नइ जावय,होवय कतको बेरा।।

छंदकार - राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
लावणी छंद - श्लेष चन्द्राकर

जम्मो भारतवासी मन बर, खास महीना हे सावन।
परब मनाथें माह अंत मा, रक्षाबंधन के पावन।।

बहन सजाथे थारी मा जी, अक्षत रोली अउ चंदन।
तिलक लगाके आज बाँधथे, भाई ला रक्षाबंधन।।

बहन वचन लेथे भाई ले, मोर सदा रक्षा करबे।
साथ निभाबे जिनगी भर गा, सबो दु:ख पीरा हरबे।।

भाई हा वादा कर कहिथे, तोर सबो संकट हरहूँ।
देथे आशीर्वाद बहन ला, तोर सदा रक्षा करहूँ।।

माने जाथे हमर देश मा, महापरब रक्षाबंधन।
बड़े शान से इहाँ मनाथें, मनखे मन येला सबझन।।

मया प्रेम विस्वास बढ़ाथे, ये तिहार हे मनभावन।
हरय परब भाई बहिनी के, रक्षाबंधन जी पावन।।

छंदकार - श्लेष चन्द्राकर
पता - खैराबाड़ा, गुड़रुपारा, महासमुन्द(छत्तीसगढ़)
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
कुण्डलिया छंद-संतोष कुमार साहू
(1)
राखी गजब तिहार ये,देथे खुशी अपार।
भाई बहिनी बीच मे,खूब बढ़ाथे प्यार।।
खूब बढ़ाथे प्यार,कभू नइ होवन दे कम।
इही ह एखर सार,याद रहिथे गा हरदम।।
रिश्ता रखथे नेक,इही एखर बैशाखी।
खास परब ये जान,बहन भाई के राखी।।
(2)
सावन पुन्नी मे गजब,राखी आय तिहार।
एक साल मा एक दिन,ये सब दिन ले सार।।
ये सब दिन ले सार,खुशी हा दिखथे भारी।
भाई बहिनी नेक,लगे जी प्यारा प्यारी।।
कतको इहाँ तिहार,बड़े हे राखी पावन।
सबमे होही भूल,बहन नइ भूले सावन।।

संतोष कुमार साहू
रसेला(छुरा) जिला-गरियाबंद, छत्तीसगढ़
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
सार छंद - डॉ. तुलेश्वरी धुरंधर

सुरता मा बहिनी मन के जी,पथराजाथे आँखी।
भाई बहिनी के तिहार ये, सुघ्घर बाँधव राखी।।

रद्दा जोहत रहिथे भाई, ये दिन हा कब आही।
बाँध हाथ मा राखी बहिनी,बइठ मिठाई खाही।।

कबके तोला देखे हावँव, सुरता आथे तोरो।
भेजत हावँव राखी भाई, लेबे आरो मोरो।

बचपन के खेलना हा भाई, रहि रहि सुरता आथे।
सुघ्घर परब ल भाई बहिनी, मिल जुल संग मनाथे।।

बाँध हाथ मा राखी बहिनी, रक्षा कवक्ष बनाथे।
गुरतुर गुरतुर खवा मिठाई, ममता अबड़ लुटाथे।।

छन्दकार - डॉ. तुलेश्वरी धुरंधर अर्जुनी बलौदाबाजार
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸