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Monday, May 31, 2021

ताटंक छंद-अश्वनी कोसरे

 ताटंक छंद-अश्वनी कोसरे


नहना जुँड़ा तुतारी धर के, जाथे अपन सियारी मा|

जागे हे पँगपँगहाआही, सोपा परत बियारी मा||


चीर अँगौछी तन मा पहिरे, मुड़ मा बाँधे पागा हे| 

संसो तन-मन फिकर समाये, सावकार के लागा हे||


करिया माटी चंदन तोरे, महर - महर ममहाथे जी|

आरी - पारी करिया बादर, भुइँया ला सरसाथे जी||


जावत हावँय खेत किसनहा, आगे पारी बांवत के|

तरिया - नँदिया भरही डबरी, नाँगर चलही सांवत के||


सतरोहन तिरलोचन भइया, खेत खार अब जाहीं गा|

करमइतिन के चटनी - बासी, खार - खार ममहाहीं गा||


दून तिगुन चौगुन होगे हे, धनहा टिकरा बारी हा|

बड़े़ मुँधरहा उठ गे भइया, नेंग धरे महतारी हा||


छेना ला सिपचाये हावय, गुँगवावत हे आगी हा|

गुरमटिया दुबराजा सफरी, छँटगे बिजहा दागी हा|


खेती - खार सुहावन लागे, घुमरत बादर पानी हा|

जरइ जाम गे हे पिकिया के , घुर मा गोही चानी हा||


तर - तर चूहत हावय परवा, खपरा वाले छानी हा|

हिम्मत करबे तभ्भे होथे, जाँगर टोर किसानी हा||


किसम - किसम के सपना साजे, सोंचत हें आनी - बानी|

कहूँ इही बेरा मा होतिस, घात नँगत दाना-पानी|| 


राजा बेटा कॉलज जाही, मोटर सइकिल लेना हे|

गहना -गुरिया टोंड़ा पैंजन, लान मयारू देना हे||


लेंटर वाले छत हो जातिस, सुधर जतिस परवा छानी|

मार परे हे पउर बछर के, तरसाये बादर-पानी||


देख किसनहा के जिनगानी,  नरक बरोबर लागे जी|

जरके जाँगर करिया होगे, जस छोइहा सुखागे जी|| 


कहूँ चेत करही शासन ता, उबर जहीं करलाई ले|

कोन उठाहीं बीड़ा देखन, माटी हीत भलाई ले||

🙏

 

अश्वनी कोसरे "रहँगिया"

कवर्धा कबीरधाम

नवटप्पा के मार -चोवाराम वर्मा बादल


 

नवटप्पा के मार -चोवाराम वर्मा बादल

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(मनहरण घनाक्षरी)


ताते तात झाँझ झोला , लेसावत हावै चोला,

जेठ लगे नवटप्पा ,भारी इँतरात हे।

सुक्खा कुआँ तरिया हे, मरे मरे झिरिया हे,

बोरिंग हा ठाढ़े ठाढ़े , रोज्जे दुबरात हे।

रोवत हें रुखराई, नदिया के मुँह झाँई,

धरती के देख देख, जीवरा करलात हे।

ईंटा भट्ठी आवा कस, भँभकत जग हावै,

भात बासी नइ भावै ,धूँकनी सुहात हे ।1।


बूँद बूँद पानी बर, लोगन बेहाल हावैं,

तरस तरस पशु , तजत परान हें ।

भाँय भाँय खेत खार, सुन्ना लागे घर द्वार ,

धरे रोग माँदी दाबे, सब हलकान हें।

धमका धमक आगे, हवा देख उठ भागे,

भोंभरा मा पाँव जरे, जरे मुँह कान हें।

वो असाड़ कब आही, जेन जीव ला बँचाही,

लागथे अबड़ संगी, रुठे भगवान हें ।2।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

Friday, May 21, 2021

लावणी छंद-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 लावणी छंद-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


धन्यवाद कहिके बोचकना,बता हमर का रीत हरे।

देखा देखी हमू कहत हन, इही हमर का जीत हरे।


धन्यवाद कहि बाप ल बेटा, अउ कहि बाप ह बेटा ला।

धन्यवाद कहि लुका जही ता, बने कबे का नेता ला।।

सुख दुख के सब साथी आवन, इही मया अउ मीत हरे।

धन्यवाद कहिके बोचकना,बता हमर का रीत हरे।।।।।।


बखत परे मा काम आय के, करजा हा रथे उधारी।

दीन दुखी के पीरा हरथे, उँखरे होथे नित चारी।।

नेक नियत हा धन दौलत अउ, गुरतुर बानी गीत हरे।

धन्यवाद कहिके बोचकना,बता हमर का रीत हरे।।।


धन्यवाद के बिना घलो तो, पुरखा मन गुणवान रिहिन।

मदद करैया मनखे मन हा, मनखे बीच महान रिहिन।।

बात बात मा बरसत हे ते, शब्द बता सत प्रीत हरे।।

धन्यवाद कहिके बोचकना,बता हमर का रीत हरे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सार छन्द- श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'


 सार छन्द- श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

                    "सावन आही"

गय अषाढ़ अब सावन आही, रिमझिम छन्द सुनाही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

खेत छिपरवानी भर जाही, आही बखत बियासी।
बोंता धान फोरही कंसा, तज के अपन उदासी।

खेत मताही कोपरियाही, संगी मोर किसनहा।
देख नजर भर एक बरोबर, थारी जइसे धनहा।

नौ नइते दस बजे किसनहिन, रोटी पानी लाही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

बनिहारिन मन भिरे कछोरा, निहरे खनहीं थरहा।
निहरे के निहरे पलघुच्चा, खोंचत जाहीं परहा।

बइठ मेढ़ मा मेठ मुकड़दम, माखुर मलही खाही।
करिया करिया दॉंत दिखावत, चिचियाही चिल्लाही।

मुड़ी नवा के नवा बहुरिया, तरी तरी मुस्काही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

सोयाबीन सरकही सर-सर, राहर हा कनिहा धर।
उरिद जोंधरी मूंगफली मन, खोभे बर धरहीं जर।

लेदी हा लउहाये लेही, हरय बॉंस के चेला।
तिल्ली के हिरदे हरषाही, देख घुरनहा ढेला।

बन-कचरा मनला धकियावत, कोदो मुड़ी उचाही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

चढ़ही रखिया तुमा कोहड़ा, जॉंगर जोर लगा के।
सेमी नार लपेटन लगही, पास ढेखरा पा के।

कुॅंदरू परवल करू करेला, संग खेखसी आही।
बरबट्टी चुरचुटिया भिंडी, पछुआ के पछताही।

हाट बजार हरषही देखत, तरकारी सवनाही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

नदिया नरवा राग ताल मा, गावन लगही गाना।
ऑंखी खोलत सउॅंहे दिखही, पुरखा मन के हाना।

छलके लगही डबरी तरिया, पा असीस ला पावन।
जन गण मन सुनके सुख पाही, नाम भजन मनभावन।

घर घर भजिया प्याज-पकौड़ा, झड़िहारा ममहाही।
ओदर भर अमरित रस पी के, खेती खार अघाही।

रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

Friday, May 14, 2021

अक्ती पर्व विशेष-छंदबध्द कवितायें

 




 अक्ती पर्व विशेष-छंदबध्द कवितायें


अक्ती तिहार(दोहा चौपाई)

उल्लाला-
*बेरा मा बइसाख के,तीज अँजोरी पाख के।*
*सबे तीर मड़वा गढ़े,अक्ती भाँवर बड़ पड़े।*

हरियर मड़वा तोरन तारा,सजे आम डूमर के डारा।
लइका लोग सियान जुरें हे,लीप पोत के चौक पुरें हे।

पुतरी पुतरा के बिहाव बर,सकलाये हें सबे गाँव भर।
बाजे बाजा आय बराती,मगन फिरय सब सगा घराती

खीर बरा लाड़ू सोंहारी,खाये जुरमिल ओरी पारी।
अक्ती के दिन पावन बेरा,पुतरी पुतरा लेवव फेरा।  

सइमो सइमो करे गली घर,सबे मगन हें मया पिरित धर।
अचहर पचहर परे टिकावन,अक्ती बड़ लागे मनभावन।

दोहा-
*परसु राम भगवान के,गूँजय जय जय कार।*
*ये दिन भगवन अवतरे,छाये खुसी अपार।।*

शुभ कारज के मुहतुर होवय,ये दिन खेती बाड़ी बोवय।
बाढ़य धन बल यस जस भारी,आस नवा बाँधे नर नारी।

माँगै पानी बादर बढ़िया,जुरमिल के सब छत्तीसगढ़िया।
दोना दोना धान चढ़ावय,दाइ शीतला ला गोहरावय।

सोना चाँदी कोनो लेवय,दान दक्षिणा कोनो देवय।
पुतरी पुतरा के बिहाव सँग,पिंवरावै कतको झन के अँग।

दोहा-
*देवी देवन ला मना,शुरू करे  सब  काज।*
*पानी बादर के परख,करे किसनहा आज।*

*करसी मा पानी मढ़ा,बारह चना डुबाय।*
*भींगय जतकेकन चना,ततके पानी आय।*

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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हरिगीतिका छंद-अक्ती

मिलजुल मनाबों चल चली अक्ती अँजोरी पाख में।
करसा सजा दीया जला तिथि तीज के बैसाख में।।
खेती किसानी के नवा बच्छर हरे अक्ती परब।
छाहुर बँधाये बर चले मिल गाँव भर तज के गरब।।

ठाकुरदिया में सब जुरे दोना म धरके धान ला।
सब देंवता धामी मना बइगा बढ़ावय मान ला।।
खेती किसानी के उँहे बूता सबे बइगा करे।
फल देय देवी देंवता अन धन किसानी ले भरे।।

जाँगर खपाये के कसम खाये कमइयाँ मन जुरे।
खुशहाल राहय देश हा धन धान सुख सबला पुरे।।
मुहतुर किसानी के करे सब पाल खातू खेत में।
चीला चढ़ावय बीज बोवय फूल फूलय बेत में।।

ये दिन लिये अवतार हे भगवान परसू राम हा।
द्वापर खतम होइस हवै कलयुग बनिस धर धाम हा।
श्री हरि कथा काटे व्यथा सुमिरण करे ले सब मिले।
धन धान बाढ़े दान में दुख में घलो मन नइ हिले।

सब काज बर घर राज बर ये दिन रथे मंगल घड़ी।
बाजा बजे भाँवर परे ये दिन झरे सुख के झड़ी।।
जाये महीना चैत आये झाँझ  झोला के समय।
मउहा झरे अमली झरे आमा चखे बर मन लमय।

करसी घरोघर लाय सब ठंडा रही पानी कही।
जुड़ चीज मन ला भाय बड़ शरबत मही मट्ठा दही।
ककड़ी कलिंदर काट के खाये म आये बड़ मजा।
जुड़ नीम बर के छाँव भाये,घाम हे सब बर सजा।

लइकन जुरे पुतरा धरे पुतरी बिहाये बर चले।
नाँचे गजब हाँसे गजब मन में मया ममता पले।
अक्ती जगावै प्रीत ला सब गाँव गलियन घर शहर।
पर प्रीत बाँटे छोड़के उगलत हवै मनखे जहर।।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
9981441795

अक्ती तिहार के बहुत बहुत बधाई
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मड़वा हा सजही 

एसो के अक्ती मा  मोरो , मड़वा हा सजही।
जम्मो पहुना मन सकलाही ,बाजा हा बजही।।

हरदी तेल चढ़ाही सुग्घर, देही जी अँचरा।
दीदी भाँटो के सँग आही, अउ भाँची भँचरा।।

मोतीचूर खवाही लाड़ू , माँदी मा मन के।
खीर बरा अउ पापड़ देही , सथरा सब झन के 

 मउर सजाके मँयहा जाहूँ ,मोटर मा चढ़के।
जाही सँग मा मोर बरतिया ,  एक सेक बढ़के।।

बाजा -गाजा मा परघाही, मान गौन करही।
दुल्हिन हा मुस्कावत आही , पाँव मोर परही।।

विधि विधान ले पंडित पढ़ही , साखोचार हमर।
देही शुभ आशीष सबो झन , रइहव सदा अमर।।

सुग्घर दुल्हनिया के सँग मा,सब सुख हा मिलही।
घर आही धरके खुशहाली,मया कमल खिलही।।

                छंद साधक कक्षा १०
            परमानंद बृजलाल दावना
                         भैंसबोड़ 
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गंगोदक सवैया- विजेन्द्र वर्मा

देव धामी करा आज तो गाँव के, लोग हा जी चढ़ाये चले धान ला।
काज अक्ती घड़ी मा बने होय के,लोग दीया जला के करै दान ला।
खेत मा जाय खातू बने पाल के,आज के बेर मा देय जी ध्यान ला।
प्रीत बाढ़ै किसानी फलै आज तो,गात हे आदमी जी इहाँ गान ला।
विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव(धरसीवाँ)

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 कवि बादल: अक्ती तिहार
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शुभ मुहरत अक्षय तिथि हावय, कहिथें वेद पुरान।
एही दिन तो सतयुग त्रेता, रचे रहिस भगवान।।

चलौ मनाबो जुरमिल अक्ती, पावन तीज तिहार।
कर बिहाव पुतरा पुतरी के, सुग्घर साज सँवार।।

अक्षय फल मिलथे ये दिन तो,करना चाही दान।
जइसन देथे तइसन पाथे, पुण्यात्मा इंसान।।

प्यासा पंछी बर बिरछा मा, भरे सकोरा टाँग।
प्याऊ खोले भरदे करसी, राही पीही माँग।।

हे बइसाख मास मा गरमी,मनखें बइठ थिरायँ।
छोटे मोटे कुँदरा छादे,आसिस देके जायँ।।

कोनो दुखिया के बेटी के, करदे आज बिहाव।
भुँखहा ला दू कौर खवादे, लेही तोरे नाव।।

दीन हीन के आँसू पोंछे,  होही गंगा स्नान।
तिरथ बरत घर मा हो जाही, सफल जिंदगी मान।।

मन पतंग के डोरी थामौ, उड़ही भरे उमंग।
अनुशासन जीवन मा आही,सुख नइ होही भंग।।

देश प्रेम के अलख जगाबो, नइ त्यागन संस्कार।
भेदभाव के खाई पाटे, समता भाव उभार।।

चोवा राम वर्मा 'बादल '
हथबंद, छत्तीसगढ़

Saturday, May 1, 2021

मजदूर दिवस विशेष छंदबध्द कवितायें-प्रस्तुति छंद के छ परिवार


 

मजदूर दिवस विशेष छंदबध्द कवितायें-प्रस्तुति छंद के छ परिवार


त्रिभंगी छंद - बोधन राम निषादराज

विषय - मजदूर

(1)

दिन रात कमाथे,सुख नइ पाथे,जाँगर पेरत,रथे सबो।

बोझा दुनिया के,ये भुइयाँ के,इही उठइया,कथे सबो।।

घर के सिरजइया,सड़क बनइया,बड़े-बड़े जी,बाँध घलो।

लोहा उगलाथे,पूल बनाथे,भार बोहथे,खाँध घलो।।


(2)

ये माटी कोड़त,पथरा फोड़त,ईंट बनावत,दिखै इहाँ।

अउ लहू पछीना,घुट घुट जीना,अपन कहानी लिखै इहाँ।।

बासी बटकी भर,नुन चुटकी भर,खाके देखव,काम करै।

अउ घाम पियासे,मिलके हाँसे,जग मा सुग्घर,नाम करै।।


(3)

हो हलाकान ये,दे परान ये,अपने दम मा,काम करै।

भोजन पाये बर,सुख लाये बर,जिनगी दुख के,नाम करै।।

दुनिया सिरजइया,इही कमइया,गाँव शहर मा,शोर हवै।

करथे मजदूरी,हो मजबूरी,महिनत इँखरे,जोर हवै।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहरा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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 मैं बनिहार ( आल्हा छंद )

बड़े बिहनिया जाथँव संगी,काम बुता मा मैंहर रोज।

घर के संसो छाये रहिथे,जाके करथँव दिनभर खोज।।


एती ओती जाके करथँव,काम बुता ला मैं बनिहार।

जब थक हारे घर मा आथँव,हो जाथे गा बड़ अँधियार।।


बड़ करलाई हावय भइया, देखव लइका मनके मोर।

रोजी रोटी बर मैं लड़थँव,अपन कमाथँव जाँगर टोर।।


घाम प्यास ला मैं नइ देखँव,करथँव काम बुता दिन रात।

लाँघन भूखन झन राहय जी,लइका मनहा सोचँव बात।।


भरे मझनिया करते रहिथँव,नही कभू मैं खोजँव  छाँव।

लक लक तीपे रहिथे भुइयाँ,चट ले जरथे मोरो पाँव।।


कभू खनव मैं माटी गोदी,अउ ढेला पथरा ला फोड़।

महल अटारी घलो बनाथँव,रच रच ईंटा मैंहर जोड़।।


टप टप चूहे भले पसीना,राहय खुश मोरो परिवार।

जउन बुलाही काम बुता मा,जाके करहूँ मैं बनिहार।।


छंदकार:- राजेश कुमार निषाद 

ग्राम चपरीद (समोदा) जिला रायपुर छत्तीसगढ़

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रोला छंद


मजबूर मैं मजदूर


करहूँ का धन जोड़, मोर तो धन जाँगर ए।

रापा गैंती संग, मोर साथी नाँगर ए।

मोर गढ़े मीनार, देख लौ अमरे बादर।

मोर धरे ए नेंव, पूछ लौ जाके घर घर।


भुँइया ला मैं कोड़, ओगराथौं नित पानी।

जाँगर रोजे पेर, धरा ला करथौं धानी।

बाँधे हवौं समुंद, कुँआ नदिया अउ नाला।

बूता ले दिन रात, हाथ मा उबके छाला।


घाम जाड़ आषाढ़, कभू नइ सुरतावौं मैं।

करथौं अड़बड़ काम, तभो फल नइ पावौं मैं।

हावय तन मा जान, छोड़ दौं महिनत कइसे।

धरम करम ए काम, पूजथौं देवी जइसे।


चिरहा ओन्हा ओढ़, ढाँकथौं करिया तन ला।

कभू जागही भाग, मनावत रहिथौं मन ला।

रिहिस कटोरा हाथ, देख वोमा सोना हे।

भूख मरौं दिन रात, भाग मोरे रोना हे।


आँखी सागर मोर, पछीना यमुना गंगा।

झरथे झरझर रोज, तभे रहिथौं मैं चंगा।

मोर पार परिवार, तिरिथ जइसन सुख देथे।

फेर जमाना कार, अबड़ मोला दुख देथे।


थोर थोर मा रोष, करैं मालिक मुंसी मन।

काटत रहिथौं रोज, दरद दुख डर मा जीवन।

मिहीं बढ़ाथौं भीड़, मिहीं चपकाथौं पग मा।

अपने घर ला बार, उजाला करथौं जग मा।


पाले बर परिवार, नाँचथौं बने बेंदरा।

मोला दे अलगाय, बदन के फटे चेंदरा।

कहौं मनुष ला काय, हवा पानी नइ छोड़े।

ताप बाढ़ भूकंप, हौसला निसदिन तोड़े।।


सच मा हौं मजबूर, रोज महिनत कर करके।

बिगड़े हे तकदीर, ठिकाना नइहे घर के।

थोरिक सुख आ जाय, विधाता मोरो आँगन।

महूँ पेट भर खाँव, रहौं झन सबदिन लाँघन।।


मोर मिटाथे भूख, रात के बोरे बासी।

करत रथौं नित काम, जाँव नइ मथुरा कासी।

देखावा ले दूर, बिताथौं जिनगी सादा।

चीज चाहथौं थोर,  मेहनत करथौं जादा।


आँधी कहुँती आय, उड़ावै घर हा मोरे।

छीने सुख अउ चैन, बढ़े डर जर हा मोरे।

बइठ कभू नइ खाँव, काम मैं मांगौं सबदिन।

करके बूता काम, घलो काँटौं दिन गिनगिन।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

मजदूर दिवस अमर रहे,,,,

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आल्हा छंद- विजेन्द्र वर्मा

मजदूर


बनी करत अब कटत हवै दिन,कइथे मोला गा मजदूर।

दिन भर कनिहा तोड़ कमाथौं,हाबव आज तभो मजबूर।।


महिनत करथौं दिन भर खपथौं,करते रहिथौं बिक्कट काम।

तभो मरत हँव लाँघन भूखन, उचित कहाँ के मिलथे दाम।।


भ्रष्टाचारी मनखे मन हा,भरथे अब तो अपने पेट।

मोरो बर चिल्लाथे बिक्कट,कभू काम मा होथँव लेट।।


महल अटारी मही बनाथौं,नदियाँ नरवा के तो बाँध।

बनी करइयाँ मँय हा संगी,खाथँव रूक्खा सुक्खा राँध।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

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 सार छंद- विजेन्द्र वर्मा

मजदूर

जावय जी मजदूर कमाए,खाके चटनी बासी।

पथरा फोड़य किस्मत जोड़य,घर मा तभो उदासी।।


कभू कभू तो पी के पसिया,कनिहा टोर कमाथे।

जाँगर अपन खपाथे संगी,तब परिवार चलाथे।।


लहू पछीना छींच छींच के,रोजी रोज कमाथे।

लाँघन भूखन रहिके वोहा,जाँगर अपन खपाथे।।


भेदभाव नइ जानय वोहा,रोज काम मा जाथे।

महल अटारी सब बर गढ़के,छपरी मा सुसताथे।।


नींद गँवाके बेच पछीना,भूखे प्यासे रहिथे।

अतका महिनत दिन भर करथे,मार गरीबी सहिथे।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

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 आल्हा छंद---- मनोज कुमार वर्मा


गार पसीना रोज कमावौ, हे मजदूर मोर जी नाम।

चले भरोसा मोरे जग हा, करौ रात दिन पोठे काम।।


चीर धरा के सीना मॅंय हर, धान सोनहा जान उगॉंव।

भरके जगके पेट रोज के, बिन खाये नित मॅंय सुत जॉंव।


महल अटारी ला सिरजाके, मोड़ नदी के देथौ धार।  

पर्वत सागर जंगल नापे, पॉंव रुके नइ हे थक हार।।


मोर भाग नइ लिखे विधाता, काबर एकोकनी आराम।

चले भरोसा मोरे जग हा, करौ रात दिन पोठे काम।।

गार पसीना रोज कमावौ, हे मजदूर मोर जी नाम.......


करके मिहनत रोटी खाथॅंव, पथरा ले ओगारॅंव नीर।

हीरा पन्ना सोना चाॅंदी, रोज निकालॅंव धरती चीर।।


चोरी बेईमानी नइ जानौ, इज्जत के जी हॅंव धनवान।

रापा गैंती संग मितानी, इही मोर बर हे भगवान।।


भेद भाव ले दूर सदा जी, धरम करम ला जानौ सार।

पूजा करथौ मिहनत के मॅंय, नइ खावॅंव कखरो हक मार।।


चलौ नेक के रद्दा निश दिन, रखबे प्रभु जी हाथ ग थाम।

चले भरोसा मोरे जग हा, करौ रात दिन पोठे काम।।

गार पसीना रोज कमावौ, हे मजदूर मोर जी नाम.......


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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पद्मा साहू "पर्वणी"

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

 *विद्या___ दोहा* 

 *विषय____मजदूर /बनिहार* 


रोज कमाथे पेट बर, खेतन मा बनिहार।

सरदी गरमी शीत मा, करथे काम अपार।।१


गार पछीना रोज के, पाथे रोटी चार।

करथे काम विधून गा, मिहनतकश  बनिहार।।२


फोरे पथरा रोज गा, धरै हथौड़ी हाथ। 

तड़पय झन मजदूर हा, देवव इनकर साथ।।३


अपन सबो सुख-दुख भुला , काम करय  बनिहार।

मालिक  महल सजाय के, रहिथे छपरी द्वार।।४


कहिथे जब मजदूर तब, लगथे बड़ आघात ।

का होइस बनिहार हा, खाथे चटनी भात।।५


मोर नाम मजदूर हे, भावै नहीं  हराम।

मिहनत करथो रोज गा, रोटी करँव प्रणाम।।६


पद्मा साहू "पर्वणी"

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

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: कुण्डलिया छंद- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


मजदूर दिवस मा मजदूर मन ला सादर समर्पित- 


कहिथे जग मजदूर ला, भुइँया के भगवान।

जेखर श्रम के सामने, नत मस्तक इंसान।।

नत मस्तक इंसान, झुका श्रम पग मा माथा।

जुग जुग ले गुनगान, करे जन गा गा गाथा।।

जाड़ घाम बरसात, सबो बर दुख ला सहिथे।

भुइँया के भगवान, तभे तो दुनिया कहिथे।।1


छाला दिखथे हाथ मा, दिखे बिवाई पाँव।

बोझ रखे दुख काँध मा, दूर रहे सुख छाँव।।

दूर रहे सुख छाँव, गरीबी घाँव अघौना।

करथे गुजर अभाव, खुला आकाश बिछौना।।

भाग लिखे मजबूर, खुशी मा लटके ताला।

श्रम हे बस पहिचान, कहे तोर हाथ के छाला।।2


सुख सुविधा ले दूर हे, काबर जी मजदूर।

खुद के श्रम अधिकार ला, पाये बर मजबूर।।

पाये बर मजबूर, बखत दू सुख के रोटी।

काम करे दिन रात, ढके तब बदन लँगोटी।।

अरजी हे सरकार, इँखर मिट जाये दुविधा।

बढ़िया करौ उपाय, मिले इन ला सुख सुविधा।।3


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

मो. नं.- 8889747888

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐: कुण्डलिया (मजदूर) - अजय अमृतांशु


खाथे सब मजदूर मन, अपन पसीना गार।

नँगत कमाथे पेट बर, नइ मानँय जी हार ।।

नइ मानँय जी हार, मुफ्त के इन नइ खावय।

देथे जाँगर टोर, अपन गुन खुद नइ गावय।

खून पसीना गार, इही मन महल उठाथे।

निसदिन करथें काम, तभे दू रोटी खाथे।।


झन करहू मजदूर के, जीवन मा अपमान।

मनखे छोटे या बड़े, सब ला एके जान।।

सब ला एके जान, कामचोरी नइ जानय।

रहँय भले मजबूर, हार इन कभू न मानय।

काम करँय मजदूर, तपाके रोजे तन मन।

पाथे तभे पगार, दुखावव कोनो ला झन।


अजय अमृतांशु 

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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: उल्लाला छंद (चंद्रमणि छंद) - श्लेष चन्द्राकर

शीर्षक - बनिहार


मँय सिधवा बनिहार हँव, करथँव अड़बड़ काम गा।

खेत-खार मा बीतथे, मोर बिहिनिया शाम गा।।


मिहनत करथँव मँय तभे, पइसा मिलथे चार जी।

इही कमाई ले चलत, बने मोर परिवार जी।।


फैलावँव मँय हाथ नइ, खुद मा बड़ विश्वास हे।

सुख के जिनगी जी सकँव, अतके मोर प्रयास हे।।


खुद बर नइ सोचव कभू, हितवा हरँव समाज के।

सदा भलाई चाहथँव, अपन देश अउ राज के।।


धरम निभावत हँव बने, जे होथे बनिहार के।

धन-दौलत के लोभ नइ, भूखा हँव मँय प्यार के।।


जानव नइ छल अउ कपट, मँय सिधवा बनिहार गा।

फरज निभाये बर सदा, रहिथँव मँय तइयार गा।


छंदकार - श्लेष चन्द्राकर

पता - खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा, वार्ड नं.-27,

महासमुंद (छत्तीसगढ़)

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छप्पय छ्न्द-दिलीप वर्मा

कोन हरे मजदूर, समझ कोनो नइ पावयँ। 

करे तिहाड़ी काम, तेन ला सबो बतावयँ। 

हम का धन्ना सेठ, चाकरी जेन करत हन। 

हपटत हन दिन रात, पाँव मा ताप जरत हन। 

जम्मो झन मजदूर हन, करत हवन सब काम जी।  

जइसन जेकर चाकरी, तइसन पावन दाम जी।   


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा

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(अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष)

मजदूर

जग ला सब सुख देने वाला, तैं हावस सब ले मजबूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।।


रिबी रिबी बर तरसत रहिथें,तोर सुवारी लइका लोग।

खून पछीना तोर कमाई, बइठाँगुर मन करथें भोग।

तोर काम के दाम तको ला, बइरी मन नइ दँय भरपूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


तोर भुजा के बल मा आइस, ये दुनिया मा आज विकास।

पाँव तोर धरती मा गड़गे, नेता चढ़गें कूद अगास।

हक नइ माँगच रार मँचाके,हावय तोरे इही कसूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


जाँगर पेर कमावत रहिथस, घाम भूख अउ सहिके प्यास।

भोग आन मन छप्पन झड़थें,रहिथे हँड़िया तोर उपास।

देख तमाशा हाँसत रहिथें, सेठ धनी मन मद मा चूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


जादा सिधवा झन रा संगी, तभे बाँचही तोरे लाज।

मूँड़ उठाके रेंग बने तैं, पटकू बंडी पागा साज।

'बादल' के अरजी हे अतके,झन चिखबे खट्टा अंगूर।

दुच्छा निसदिन थैली तोरे, पेट बियाकुल तैं मजदूर।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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 सुखदेव: मँय मरहा मजदूर


मँय मरहा मजदूर,खाँध मा जग बोहे हँव।

तभो चपक के पेट,मजूरी बर जोहे हँव।


करत करत निर्माण,ददा पुरखा मन मरगे।

सुख सुविधा ले दूर,कई जुग जनम गुजरगे।


मोरे अघुवा पाँव,रोड़ रस्ता मा गे हे।

मोर हाथ हा नेव,बाँध बाँधा के दे हे।


झोपड़पट्टी एक,खदानन दूसर घर हे।

संग साथ बिन मोर,कारखाना अध्धर हे।


बनके काँड़ मियार,छत्त छानी बोहे हँव।

तभो चपक के पेट,मजूरी बर जोहे हँव।


ईंटा गार जोर,गढ़ँव देवालय मन ला।

बड़े बड़े संस्थान,महाविद्यालय मन ला।


छिनी हथौड़ी थाम,करँव पथरा ला मूरत।

पथरा अब हे नाथ,न देखय मोरे सूरत।


गरमाला बर फूल,टोर के महीं ह लाथँव।

शंकर के तिरछूल,घला ल महीं बनाथँव।


धागा बनके हार तरी मँय हर पोहे हँव।

तभो चपक के पेट,मजूरी बर जोहे हँव।


मतदाता भगवान,कथें सरकारन मोला।

संख्या देखत लोक-तंत्र के धारन मोला।


पाँच बछर मा एक,बार भर खोज खबर हे।

जोतिस कथे बिचार,अवइया भाग जबर हे।


देथें उन भुलियार,पीठ मा हाथ फेर के।

कारण दू का चार,बता देथें अबेर के।


इतिहासन के माथ,मकुट बनके सोहे हँव।

तभो चपक के पेट,मजूरी बर जोहे हँव।


दाता तोर असीस,मोर बर उपर-छवाँ हे।

भूख दरद दुख कष्ट,रोज के नवाँ नवाँ हे।


न तो ठिकाना मोर,न लइकन के भविष्य के।

तोर बिना अब कोन,कल्पना करय दृश्य के।


का हे हाल निहार,कभू तो तँय घर आ के।

मनबोधत हस मोर,एक दिन दिवस मना के।


बिन सोंचे परकीति,तोर सुख बर दोहे हँव।

मँय मरहा मजदूर,खाँध मा जग बोहे हँव।


रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

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जयकारी छन्द-

कमिया जांगर टोर कमाय

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कमिया जांगर टोर कमाय।लेकिन बढ़िहा दाम न पाय।

जावय बेरा उगते खार।बाँधय ओहर मेड़ अउ पार।

चटनी बासी अबड़ सुहाय।जेला धर बनिहारिन लाय।

अड़बड़ दिनभर करथे काम।  जेखर पड़गे कमिया नाम।

करके मिहनत ओ  दुख पाय।कइसे  घर मा  राशन लाय।

कइसे लइका अपन पढ़ाय। ओ पइसा  मुसकिल म  कमाय।

पेट बिकाली भटकत जाय।कोनो कोती ठउर न पाय।

 लाँघन भूखन सूतत जाय।कइसे ओ खुशहाली लाय।

कमिया  जाँगर टोर कमाय-------

रचनाकार- डॉ तुलेश्वरी धुरंधर,अर्जुनी - बलौदाबाजार


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भुजंगप्रयात छंद


करे काम वो हाथ मजबूत होथे।

करम बाँचथे जेन श्रमदूत होथे।

अबड़ होत सिधवा कहव झन अनाड़ी।

करे काम निशदिन मजूरी दिहाड़ी।1।


भुजा बल भरोसा सदा दिन करे हे।

मजूरी करत अउ पसीना धरे हे।

खड़े हे महल अउ बने कारखाना।

न पाये उही मन कभू एक दाना।2।


करे जेन मिहनत उही है पुजारी।

उठे रोज बिहने चले खेत बारी।

भरे पेट सबके इही अन्नदाता।

निभावत हवय श्रम जगत संग नाता।3


कभू धर कुदारी कभू फावड़ा ला।

कुचर देत पथरा व लोहा कड़ा ला।

न नदिया न सागर उगारे पसीना।

दिखे माथ मोती धरे श्रम नगीना।4


बने जग धनी जेन श्रम दान पाके।

सबो फूल बगिया खिले मान पाके।

चलव आज सब श्रम दिवस ला मनावौ।

करव मान श्रम के सरग ला बुलावौ।5

आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

(छत्तीसगढ़)

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*जयकारी छंद*-*चित्रा श्रीवास*

*मजदूर*

करथँव मिहनत जाँगर तोड़। ईटा पथरा गारा जोड़।

देथँव महल अटारी तान।पावँव कभू नही मँय मान।


कहिथे मोला सब मजदूर।कतका हावँव मँय मजबूर।

लाँघन गुजरे कतको रात।खुश हँव खाके चटनी भात।


जरके करिया होगे चाम।मिलथे कम मिहनत के दाम।

पानी पथरा ले ओगार।रद्दा बनगे देख पहार।


आथँव सबके मँय हा काम।देथँव सबला मँय आराम।

मोरो मिहनत ला पहचान।देवव मनखे मोला मान।

चित्रा श्रीवास

बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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