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1 सुगती छंद ( 7 मात्रा=त्रिकल चौक

काज कर ले, प्राण धर ले।

देश खातिर, देंह हाजिर।।

इहें मर के, जनम धर के।

फेर आवँव, कोंख पावँव।।

हमर भारत, जोत बारत।

ग्यान वाणी, सुखी परानी।।

मया कोरा, मिटय फोरा।

'अमित' भाथे, गीत गाथे।।

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2.छबि छंद (8 मात्रा+अंत जगण)

जिनगी हमार, साँसा उधार।

होथे कतेक, जी ले जतेक।।

काबर महींच, जाना अभीच।

सबके हियाव, सुग्घर नियाव।।

बढ़िया विचार, सब ला सँघार।

मनखे सुभाव, सँघरा मिलाव।।

बड़का गियान, परहित धियान।।

जगत परिवार, सिरतोन सार।।

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3.गंग छंद (9 मात्रा+अंत दो गुरु)

जाँगर भरोसा, मिलथे परोसा।

झनकर अलाली, बिरथा उदाली।।

मुँह ला लमाये, नइ तो कमाये।

खइता जवानी, नइ मिलय पानी।।

मन जोश भर ले, अब काज कर ले।

खाबे कमाबे, धन मान पाबे।।

बड़ सुखी होबे, नींद भर सोबे।

कुछु दान करबे, जग काम परबे।।

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4.निधि छंद (9 मात्रा+अंत जगण)

झन बनव अघोर, झन धरव बटोर।

सइँता सुख सार, ए खुशी अधार।।

झन होव अधीर, सोचव ग गहीर।

मिल बाँट गुजार, तब मिलय दुलार।।

अब सुनव मयारु, अब भरव हुँकारु।

लव संग सकेल, झन करव ढ़केल।।

करव नेक काज, काबर अब लाज।

मेटव मन बैर, सबके तय खैर।।

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5.दीप छंद (10 मात्रा,अंत लघु लघु, जगण)

आवव हमर गाँव, छानी खदर ठाँव।

बखरी रहट टार, बगरे बड़ बहार।।

बोंथें फसल धान, रहिथें जय किसान।

लीपे घर दुआर, जिनगी जग अधार।।

गुरतुर सुघर गोठ, मन मा गुजर पोठ।

मान मिलय अपार, नता बनय हजार।।

अंतस मगन होय, संग सब समोय।

जुड़हा गजब छाँव, आवव हमर गाँव।।

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6.अहीर छंद 11 मात्रा अंत जगण

झन कर हृदय अधीर, मिलथे धीर म खीर।

उराठील झन बोल, मया-दया मन खोल।।

बनथे अंतस गाँठ, बोली बतरस टाँठ।

पहिली अंतस देख, अपने करम सरेख।।

मन ला राखव साफ, गलती करदव माफ।

जुरमिल बनव सजोर, बोली मधुरस घोर।।

राहव ईश भरोष, अपने झारव दोष।

कोनो झन उभराव, बढ़िया रखव सुभाव।।

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7.शिव छंद 11 मात्रा अंत रगण

3, 6, 9 मात्रा लघु

काज नेक सब करौ, देख ताक पग धरौ।

मारग सत चुनव जी, अंतस अति गुनव जी।।

अपन हाथ मा करम, छोड़ जगत के भरम।

त्याग बैर भाव ला, मेट खोंट घाव ला।।

जौन जे करम करै, भाग म तस फल भरै।

करम हा अधार हे, करम म सुखसार हे।।

दान धरम काज हे, पुण्य अब आज हे।

'अमित' करम कर बने, नाँव हा रहव तने।।

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8.भव छंद 11 मात्रा अंत यगण

मया मोह भुलाये, अधर प्रान झुलाये।

बँधना पोठ बाँधे, मन ला गजब छाँधे।।

कब कहना ल माने, भइगे गरब ताने।

बने घात सुजानी, करे काम  नदानी।।

पइसा बड़ कमाये, पर के हक दबाये।

अपने नाँव बोरे, अंतस बैर घोरे।।

गोठ सबो लहाना, सूर बीर कहाना।

भाव भजन तियागे, प्रभु ले 'अमित' भागे।।

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9.तोमर छंद 12 मात्रा अंत गुरु लघु

मोर बड़ सुग्घर गाँव, लीम बर पीपर छाँव।

हवय निक खेती खार, अन्न धन के भंडार।।

तरिया, कुआँ के पार, नँदिया नहर अउ टार।

भाँठा खेत कोठार, अँगना कुरिया परसार।।

गुरतुर हृदय के गोठ, सुमता इहाँ जी पोठ।

लामय नता के डोर, बरसय मया घनघोर।।

सरधा भक्ति के संग, रंगे एक सब रंग।

ठाकुर देव के ठाँव, मोर बड़ सुग्घर गाँव।।

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10.ताण्डव छंद 12 मात्रा (आ ल अ ल)

करव झन करुहा बात, कभू पर सकथे लात।

बने-बात झन बिगाड़, गड़े लाश झन उखाड़।।

अपन बाट रेंगव चुप, भले होय गजब कुलुप।

रखव भर अंतस धीर, तभे मीठ मिलै खीर।।

रखव नेक चाल चलन, मन भीतर घलो जतन।

झन पर के दोष झाँक, पहिली निज ला ढाँक।।

करव कभू झन जुगाड़, पर के होवय बिगाड़।

मया के मधुरस बाँट, सबो ला सँघरा साँट।।

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11.लीला छंद 12 मात्रा अंत जगण

पालव झन मन गुमान, छोड़ तुरत गरब साथ।

जिनगी पानी गुबार, साँसा चलथे उधार।।

एखर काहे भरोस, तज मन के गरब रोस।

मन के मनसुभा मेट, संग अपन तैं लपेट।।

रहि भलमानुस समान, तज सब अंतस गुमान।

माथा चढ़थे अपार, बाँचे नइ घर दुवार।।

करलव बस नेक काज, बंदय तुँहला समाज।

नाँव करव अपन हाथ, छोड़ तुरत गरब साथ।।

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16. नित छंद 12 मात्रा लग/गगग

गोठ-बात मीठ करव, दया-मया संग धरव।

इरखा छल कपट तजौ, हिरदे ले बने सजौ।।

तामछाम तियाग तैं, मन ले अपन जाग तैं।

करले निक काम-बुता, धरले तैं ग्यान कुता ।।

राखे तन म काय हे, हंसा कब उड़ाय हे।

माटी तहन मोल हे, खइता चाम खोल हे।।

छोड़ँव अहम बात जी,  अब 'अमित' समझात जी।

जिनगी ह अनमोल जी, बोलव सुघर बोल जी।।

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13. उल्लाला छंद 13-13 मात्रा

उल्लाला~(13~13 मात्रा/ सम-विषम तुकांत)

लिखलव सुग्घर गोठ जी, भाव शिल्प सब पोठ जी।

छंद सृजन मा नाँव हे, अनुशासन घन छाँव हे।।

महिमा बहुते छंद के, विधि विधान आनंद के।

लपर-झपर नइ काम हे, सोलाआना नाम हे।।

कालजयी ये काज हे, भले मेहनत आज हे।

छंद स्वयं सुर ताल हे, सधे छंद के चाल हे।।

छंद काव्य के प्राण हे, छंद सृजन कल्याण हे।

छंद वेद के देय हे, छंद सहज अउ गेय हे।।

खरही कस झन गाँजबे, कलम अपन तैं माँजबे।

सिखना लिखना छंद हे, इही 'अमित' आनंद हे।।

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उल्लाला~(15~13 मात्रा/सम-सम तुकांत)

पढ़ लिखलव संगी हो बने, शिक्षा जिनगी सार हे।

बिन पढ़े-लिखे मनखे इहाँ, बोझा अउ बेकार हे।।

आखर-आखर के ज्ञान ले, मनखे के गुन बाड़थे।

ग्यान पराक्रम ले मान के, नवा धजा ला गाड़थे।

पढ़थे-लिखथे बड़ जौन हा, ओखर सुलझे बोल जी।

कला कलम के वो धनी, बुद्धि विनय अनमोल जी।।

करलव मनवा मिलजुल जतन, मिलय सफलता ग्यान के।

रंग-रूप नइ हे काम के, कदर करव वरदान के।।

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14.चंडिका छंद 13 मात्रा अंत रगण

कान सुने झन तानबे, आँखी देखे मानबे।

अड़बड़ होथे भोरहा, कभु जादा कभु थोरहा।।

सच खातिर मन चोहले, खोज खबर सत टोहले।

भरम जाल ला छानबे, सत्य तभे तैं जानबे।।

झन बन तैं हा रेलहा, अपने मन के पेलहा।

भरम अपन तैं छाँटले, अकल बने तैं आँटले।।

जाला-माला झारले, अंतस दीया बारले।

'अमित' अकल कर ओलहा, तन-मन झन कर पोलहा।।

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15. कज्जल छंद 14 मात्रा अंत ग ल

होत पहट होत-होत, ढ़िलव गरू दइहान कोत।

करय पहटिया गोठ सोज, बड़े बिहनिया रोज-रोज।।

कुलकत कुहकी मीठ राग, कहय उठव अब जाग-जाग।

आरो आवव कहूँ ग्वाल, गरवा बछरू ह बेहाल।।

भागय बछरू रटाटोर, कहे पहटिया होर-होर।

जब-जब पठरू मेछराय, तब-तब अड़चन बाढ़ जाय।।

नोई टाँगे अपन खाँध, देथे गइया गोड़ बाँध।

धरे कसेली रउत आय, हाँसत गावत दूह जाय।।

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16. सखी छंद 14 मात्रा अंत गगग/लगग

जिनगी के समझ इशारा, कुदरत बिन कहाँ गुजारा।

पेड़ हवा माटी पानी, एखर बिन खतम कहानी।।

जुरमिल करबो रखवारी, खेत-खार बखरी बारी।

सुख मा दिनरात पहाबो, प्राण प्रकृति के हमन बचाबो।।

भुँइया अब गजब खरावै, रुखराई सब इहाँ हरावै।

जंगल के पेड़ सिराही, धरती हा ठाड़ रिसाही।।

आवव करबो 'अमित' सकेला, टर जाही सबो झमेला।।

रुखुवा घन जगत फभौती, माँग इही सुघर मनौती।।

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17. विजाति छंद 14 मात्रा आदि लघु

जुरमिल सँघरा सब राहव, उराठील झन कभु काहव।

मया पिरित अंतस घोरव, परे-डरे सब ला जोरव।।

कब का होही का जानी, करव नहीं तुम मनमानी।

गिनहा के गोठ बिसारव, अपन दोष छाँट निमारव।।

पुरथे सुग्घर के सँइता, धर रपोट होवय खइता।

झन धन दोगानी नापव, सुमत निसैनी ला खापव।।

छुआछूत मन ले झारव, बड़े-छोट बैगुन टारव।

सुफल अपन जिनगी करलव, 'अमित' गोठ हे तुम धरलव।।

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18. हाकलि छंद 14 मात्रा अंत गुरु

कहना मन के मानव जी, राय सबो के जानव जी।

भल ला अपनो जान बने, फोकटिहा झन रहौ तने।।

परहित जग मा काज करौ, सेवा बर झन लाज मरौ।

मधुरस बानी बोलव जी, करू कसा झन ठोलव जी।।

कोन दुबारा जनम मिलै, फूल झरे हा काय खिलै।

भाग अपन तैं जतन बने, गोठ गुनत रहि अपन मने।।

बीतय दिन झन काँखत जी, गुजरय छिन-छिन हाँसत जी।

अपने मन हा नोहर हे, सबले बढ़के वोहर हे।।

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19. मानव छंद 14 मात्रा अंत गुरु

खेत-खार बारी बखरी, नदी कुआँ तरिया डबरी।

बँधे रथे छेरी गरुवा, खातु होय गोबर घुरुवा।।

बड़े फजर बासय कुकरा, तहाँ उड़य छानी कुहरा।

हमर गाँव के ये कहनी, बिकट भाय बासी चटनी।।

गली-खोर चिक्कन लीपे, तात-ताप परवा तीपे।

सजे रथे तुलसी के चौंरा, अपन बाँट खाथें कौंरा।।

लीम छाँव गुड़ी जमाये, ऊँच-नीच मिल निपटाये।

कका बड़ा 'अमित' सुजानी, दया-मया संग मितानी।।

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20.मधुमालती छंद 7~7 मात्रा अंत लघु गुरु

कर काम ला, तैं हा बने, जग मा रहै, मस्तक तने।

झन खाँच पर, बर खाँचबे, नइ तहूँ हा, रे बाँचबे।।

मन भीतरी, तैं झाँकले, झट दोष ला, तैं ढ़ाँकले।

झन खोज तैं, पर दोष ला, झन झेल तैं, पर रोष ला।।

झन हाँसना, झन फाँसना, मत खोभिया, तन लोभिया।

कलजुग इही, परहित सही, सत सार हे, भवपार हे।।

रख नाम ला, कर काम ला, अब चेत जा, सुध लेत जा।

बन नेक तैं, दिख नेक तैं, जिद छोड़ दे, सुख जोड़ ले।।

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21..सुलक्षण छंद 7~7 मात्रा अंत गुरु लघु

जतके काम, वतके दाम। जइसे कर्म, वइसे नाम।

अतके जान, सबके आन। बड़ अनमोल, होथे मान।।

हे मरजाद, अपने हाथ। सबले ऊँच,  राखव माथ।

सुग्घर सोज, करलव काज, झन तो आय, पाछू लाज।।

तन रंगाय, मन मोहाय। भगवन भक्ति, छोड़ भुलाय।

घर परिवार, ममता मोह, प्रभु बिसराय, माते चोह।।

सुग्घर सोंच, सुग्घर कर्म। अंतस झाँक, समझव मर्म।

मनखे जोनि, एक समान, मानुष जन्म, 'अमित' महान।।

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22. मनमोहन छंद 8~6 मात्रा अंत ललल

मनभावन हे, गाँव हमर। लइकापन के, कटे उमर।

फुतका माटी, खेल गढ़न। तरिया तउरन, पेड़ चढ़न।।

झगरा झंझट, छीन झपट। तुरते मिलना, तीर लपट।

आवव थोरिक, गाँव डहर। फुर पुरवाही, कहाँ शहर।।

सुरता करलन, बिते उमर। कइसे होवव, गुजर बसर।

चिरहा चड़डी, चलन मटक। पटकू बंडी, गजब चटक।।

पढ़ई लिखई, कलम पकड़। बड़ हुशियारी, 'अमित' अकड़।

मारन सबके, नँगत नकल। कमती राहय, हमर अकल।।

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23. सरस छंद 7~7 मात्रा (2,3,2)

धर बात सत, कर ले करम। बस जान  तैं, मनखे धरम।

तज जात कुल, मन मेल कर। सब एक हन, बस सार धर।।

गिन चार पल, कब अंत तन। जग छोड़ चल, अब सोच झन।

सत राह चल, कर अब जतन, परलोक बर, जश सोन धन।।

तैं त्याग सब, मन के कपट। होथे अजब, आगी लपट।

भरके लगन, भल काज कर। देखय जगत, कल आज कर।।

झन काट गर, मत चाल चल। सत भाव भर, अब छोड़ छल।

नित होय हित, बस धीर रख। मनसुभा तज, फल मीठ चख।।

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24. मनोरम छंद 14 मात्रा अंत गलल/लगग

आव गाँव कोती जाथन, टोर चार तेंदू खाथन।

लीम छाँव मा सुरताथन, कूद-कूद नदी नहाथन।।

गोठ-बात गुरतुर लागय, देख-देख आलस भागय।

हे गंज कमिया सुजानी, होथे ग बढ़िया किसानी।।

गाँव के महिमा अपारा, भारत के प्राण अधारा।

जाँगर ला पेर कमाथें, अन्न के दाता कहाथें।।

गाँव हमर सरग समाना, लोककला हवय बचाना।

खेत-खात गँवई जानन, देश धर्म सिरतों मानन।।

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25. चौबोला छंद 15 मात्रा अंत लघु गुरु

हमर करम तो, बस खेत हे, बसे इही मा, सब चेत हे।

उपजाथन हम, धन धान ला, हमीं बचाथन, जग प्रान ला।।

करथन अपने, हर काम ला, पाथे दुसरे, सब दाम ला।

इही गोठ  हा, मन भात हे, हमर भरोसा, जग खात हे।।

लहू पछीना ला गार के, बोझा जग के हम भार के।

सरदी गरमी बरसात का, धरती सेवा दिनरात गा।।

चाहे पँवरी काँटा गड़े, अन्नदान करथन बड़े।

चिखला माटी फुतकी सने, छाती चाकर रहिथे तने।।

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26. गोपी छंद 15 मात्रा आदि त्रिकल, अंत गुरु

गाँव गँवई सुख के हरिया, गजब हरियर भाँठा परिया।

चलय नित फुरहुर पुरवाही, भरय अंतस 'अमित' उछाही।।

खदर खपरा छपरी छानी, हवा आरुग निर्मल पानी।

नहर नँदिया नरधा नरवा, गाय गरुवा गोबर घुरुवा।।

गाय बछरू भैंसी छेरी, दूध घी अउ खीर महेरी।

भरे रहिथें सब कोठी डोली, गोठियाथें गुरतुर बोली।।

बंभरी बर पीपर परसा, सुहावय पैडगरी धरसा।

इहें जिनगी मैं पहवावँव, गाँव के मैं महिमा गावँव।।

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27. चौपई छंद 15 मात्रा अंत गुरु लघु

महतारी भाखा के मान, करव जवनहा करव सियान।

होश सँभाले बोले जोन, अब काबर कहिथस तैं कोन।।

अपने भाखा अपने गोठ, बउरव जादा होही पोठ।

छत्तीसगढ़ी भाखा बोल, झन तैं अंते-तंते डोल।।

एमा काके हावय लाज, करलव जुरमिल जम्मों काज।

मया-दया के गुरतुर भाख, एखर तैं मरजादा राख।।

अंतस मा ये करय अँजोर, छत्तीसगढ़ी रंग चिभोर।

'अमित' अकारथ झन तैं डार, बहुते बाढ़य मया दुलार।।

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28. गुपाल छंद 15 मात्रा अंत जगण

जेखर घर मा पटे पटाव, वोला कहाँ  जियानय ताव।

गरमी मा सुग्घर जुड़ छाय, सरदी मा नइ सरद जनाय।।

बारो महिना एक समान, ऊँच पठउँहा रखैं सुजान।

छानी परवा दिखै उठान, घर कुरिया हा लगै उँचान।।

फाटा चिरवा चाकर लान, पटऊँहा ला पातर तान।

फोकटिहा ला उप्पर फेंक, धुर्रा फुतका कचरा छेंक।।

दूमंजिल ले कम झन जान, सुख सुविधा एखर पहिचान।

'अमित' पटउँहा, रखौ जुगाड़, कोनो काँही कहाँ बिगाड़।।

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29. उज्वला छंद 15 मात्रा गुरु लघु गुरु

गाँव गली गंगा लागथे, भाग हमर इँहचे जागथे।

माटी धुर्रा हा पोठ हे, दया-मया के बस गोठ हे।।

गँवईहा जिनगी सार हे, मिलजुल सँइता निस्तार हे।

साँझर सपहा सब काम हे, खेत किसानी सुखधाम हे।।

कुकरा बासत जन जागथें, भुँइया सेवा मा भागथें।

संझा पासा के चाल हे, तन-मन सिरतों खुशहाल हे।।

सरबस सुमता सद्भाव हे, मया मयारू गहिराव हे।

जिहाँ सहज सुख के ठाँव हे, 'अमित' उही हा तो गाँव हे।।

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30. पुनीत छंद 15 मात्रा अंत तगण

काबर कइसन रोथे गाँव, बेजा कब्जा खोथे ठाँव।

जब ले अइसनहा होय, सुख सुमता सगरो खोय।।

जिनगी खातिर ये जंजाल, कतको बर ठाढ़े काल।

फोकट मा भुँइया पोटार, सुनय कहाँ कोनो गोहार।।

बड़ मुसकुल निस्तारी आज, कोनो ला नइ लागै लाज।

छेंके खोर गली दैहान, हरगे मरघटिया मैदान।।

'अमित' चरागन सब चपले जाय, भाँठा परिया अब नंदाय। 

बेजा कब्जा हा रोग हे, कोन कहाँ करथे सोग हे।।

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31. पदपादाकुलक छंद 16 मात्रा आदि द्विकल

चल संगी पढ़हे ला जाबो, पढ़लिख के हम भाग जगाबो।

नइ कहान जी अप्पढ़ अड़हा, नइ होही ये जिनगी कड़हा।।

अब किताब कापी ला जोरव, मन ले आलस नाता टोरव।

बुध विद्या ला चलव बढ़ाबो, धन दौलत अउ मान कमाबो।।

जग जिनगी के रद्दा गढ़बो, हम जतके अउ जादा पढ़बो।

बढ़ चलीन अब आगू कोती, सुख के होवय नित सुरहोती।।

हे पढ़ई लिखई सुखदाई, ये होथे जी सबल सहाई।

तज आलस बन चंगा, झट पी 'अमित' तैं ज्ञान गंगा।।

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32. पादाकुलक छंद 16 मात्रा चार चौकल

आवव संगी पेड़ लगाबो, परदूसन के भूत भगाबो।

मिलही शुद्ध हवा अउ पानी, सुघर सँवरही जग जिनगानी।।

फर फूल दवा बड़ नित पाबो, जुड़हा छँइहा बइठ जुड़ाबो।

मिलही बड़ फुरहुर पुरवाही, साँसा चलही हाहीमाही।।

तरपँवरी नइ तात जियानय, रुखुवामन जब छँइहाँ तानय।

पैडगरी नइ लायग दुरघट, बिन रुखराई जिनगी उरभट।।

रुखराई के रक्षा करबो, गुण ला एखर अंतस धरबो।

पेड़ 'अमित' धरती पहिरावन, आवव संगी पेड़ बचावन।।

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33. पद्धरि छंद 16 मात्रा अंत जगण

धरती सिरतों हे सुख खदान, नइ तो करे सकँव मैं बखान।

पालय पोसय बहुते दुलार, मया लुटावव सरलग अपार।।

दाना पानी करथे जुगाड़, होवन दय नइ कखरो बिगाड़।

भुँइया सुख ला देवय परोस, जिनही बीतय एखर भरोस।।

जीव जंतु सब अँचरा समेट, दया-मया ले राखय लपेट।

हिरदय मा हरहिन्छा हुलास, धरती कोरा सबके निवास।।

पानी पसिया पुरता परोस, सँइता सुख हे, झन तो खबोस।

आवव करथन सुग्घर विचार, चुकचुक ले हम देथन सँवार।।

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34. अरिल्ल छंद 16 मात्रा अंत गग या लगग

खेत-खार मा प्रान बसाये, रटाटोर तैं गजब कमाये।

जाँगर-नाँगर बदे मितानी, लहू पछीना संग किसानी।।

थोरउचा मा नँगत अघाये, अपन ससनभर रोज कमाये।

सरदी गरमी हवा गरेरा, खेत खार हा बनै बसेरा।।

लाँघन-भूखन रहय बिचारा, छितका कुरिया करय गुजारा।

अनदाता जब हाथ पसारे, 'अमित' जगत ला कोन उबारे।।

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35. डिल्ला छंद 16 मात्रा अंत गलल

सरी जगत ला पोसय पालय, नहीं कभू कोनो ला घालय।

जाँगर पेरय अन उपजावय, देख-देख मन अपन मढ़ावय।।

उम्मर बीतय खेत कमावत, सबके मन मा रहय समावत।

जी परान निज दाँव लगावय, सरी जगत मा सुख बगरावय।।

खँचवा डिलवा करदय चातर, पीयत पानी पसिया पातर। 

जिनगी जीयँय हाँसत गावत, खेती खार मया पहिलाँवत।

बाढ़य फभित धरय जब नाँगर, जय होवय खरतरिहा जाँगर।

मैं किसान के महिमा गावँव, सबले पहिली माथ नवावँव।।

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36. उपचित्रा छंद 16 मात्रा एक जगण अनिवार्य

तपय ठाड़ अउ लाहो लेथे, जिनगी भर मुँड़ पीरा देथे।

खाँचा पर बर जे हा खाँचे, भरे जवानी वो नइ बाँचे।

जे ढ़पेल के आगू जाथे, पाछू बहुते वो लुलवाथे।

समझ सोच ले छोड़ दिखावा, पल बीते झन हो पछतावा।।

झन तैं बन संगी इरखाहा, फल पाबे तब जी मनचाहा।

पर ला दुख पीरा देबे, नँगत सरापा तैंहा लेबे।।

चुगरी चारी बात पहाबे, गड़ही काँटा पाँव मड़ाबे।

छोड़ सुवारथ,राख न कॉही, तिरियाही सब संसो बाँही।।

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37.  पज् झटिका छंद 16 मात्रा जगण वर्जित

परहित मा जे हा दुख पीथे, सुख के जिनगी अपने जीथे।

पर पीरा ला बोहय जौने, जानय जनहित सेवा तौने।।

अपन समझ जे कारज करथे, बखत परे मा पीरा हरथे।

खावय रोटी बाँट बिराजे, ओखर मन ले दुनिया राजे।।

करथे जे हा गरब गुमानी, बिरथा ओखर धन दोगानी।

जन-जन के जे पीरा जानय, सिरतों जग हा मनखे मानय।।

जीना चरदिनिया हे सबके, काल हमर कब आही हबके।

एखर पहिली भाग जगाले, अंतस सँचरे दोष भगाले।।

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38.  सिंह छंद 16 मात्रा आदि लल, अंत ललग

बड़ सुग्घर हे देखव गँवई, बर पीपर सिरसा सरई।

निक लागय पैडगरी धरसा, मन मतंग मँउहा अउ परसा।।

धन दोगानी उपजय धनहा। बहुते गदगद होवय मन हा।

बड़ जुड़वासा करसी गगरी, तउँरे खातिर नँदिया डबरी।।

बन बगईचा भाँठा परिया, सुख के बढ़चढ़ हावय हरिया।

मनभावन मिलथे सब सुभिता, नइ तो होवय काँही फधिता।।

जुड़ पुरवाही फुरहुर रुखुवा, झट-झट  हरथे तन के दुखुवा।

बड़ पबरित हे गँवई भुँइया, मन हा इँहचे रमथे गुँइया।।

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39. मत्त समक 16 मात्रा, 9 वी मात्रा लघु

बिन किसान के दुनिया सुन्ना, 'अमित' किसानी बिन सब उन्ना।

अनदाता जब अन उपजाथे, तभे जगत के क्षुधा मिटाथे।।

जीव-जंतु अउ जनता जानय, सब किसान ला भगवन मानय।

इँखर बुता हे परहितकारी, जग जिनगी भरथें उजियारी।।

खाँय अपन के करम कमाई, जनम धरे हें जगत भलाई।

अनदाता के पदवी पाये, धरती सेवा उमर पहाये।।

लोहा पखराकस तन साजै, महिनत बँसरी सुर मा बाजै।

बितय इँखर कइसन जिनगानी, दुख दुभिता मा रहिथे दानी।

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40. विश्लोक छंद 16 मात्रा, 5वी व 8वी मात्रा लघु

धरती हम सबके महतारी, हावय बड़ सँउहें सुखकारी।

किम्मत कुछु नइ एहा लेवय, जिनगी भर बहुते देवय।।

अपने तन-मन सबकुछ धारय, हम ला हँस-हँस जग ले तारय।

अलहन अलकर जम्मों छाँटय, ममता समरस धरती बाँटय।।

एखर करलन सेवा सटका, राखन नइ मन भीतर खटका।

धरती कइसन धीरज धरथे, पीरा परहित सरलग हरथे।।

सिरतों इही हवय उपकारी, आवव करथन हम रखवारी।

भुँइया 'अमित' जगत आधारा, पावव तन-मन मा उजियारा।। 

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41. चित्रा छंद 16 मात्रा 5,8,9 वाँ मात्रा लघु

हरियर-हरियर धरती मँइया, सुग्घर फरहर सुखकर भुँइया।

टारय अनभल अनमन धरती, सिगबिग-सिगबिग सुख के भरती।।

महर-महर बड़ महकय माटी, छाहित परबत पटपर घाटी।

पाँव परत हन धरती दाई, तहीं हमर बर सबल सहाई।।

खलबल-खलबल बहथे नँदिया, तन-मन फुरहुर करथे बढ़िया।

रुखुवा झुरमुट जलघस जंगल, जींयत भर इन करथें मंगल।।

धरती सरलग सबला सहिथे, कोनो ल कुछु कहाँ ये कहिथे।

अँचरा भर-भर मया लुटाथे, जग के भुसभुस 'अमित' मिटाथे।।

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42. वनवासिका छंद 16 मात्रा, 9,12 वीं मात्रा लघु

धरती के हे जउँहर छाती, दया-मया हे पबरित थाती।

हरहर-कटकट हरमन सहिथे, कोनो ला तो कुछु नइ कहिथे।।

भुँइया सबके हरय बसेरा, हरहिन्छा हें  हर छिन बेरा।

महतारी कस मनभर ममता, एक बरोबर सब बर समता।।

एखर बिन नइ मिलय ठिकाना, जनम मरन सब इहें बिताना।

धरती सेवा जुरमिल करलव, उपकार 'अमित' अंतस धरलव।।

मिलय आसरा अलमल आगर, हाथ जोर के करलव आदर।

धरती तोरे जुग-जुग जय हे, तोर बिना जग गथफत तय हे।।

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43. चौपाई 16 मात्रा अंत गुरु लघु वर्जित

पायलगी हे धरती मँइयाँ, अँचरा तोरे पबरित भुँइयाँ।

संझा बिहना माथ नवावँव, जिनगी तोरे संग बितावँव।।

छाहित ममता छलकै आगर, सिरतों तैं सम्मत सुख सागर।

जीव जगत जन सबो सुहाथे, धरती मँइयाँ मया लुटाथे।।

फुलुवा फर सब दाना पानी, बेवहार बढ़िया बरदानी।

तभे कहाथे धरती दाई, करते रहिथे सदा भलाई।।

देथे सबला सुख मा बाँटा, चिरई चिरगुन चाँटी चाँटा।

मनखे बर तो खूब खजाना, इहें बसेरा ठउर ठिकाना।।

रुख पहाड़ नँदिया अउ जंगल, करथें मिलके जग मा मंगल।

खेत खार पैडगरी परिया, धरती दाई सुख के हरिया।।

जींयत भर दुनिया ला देथे, बदला मा धरती का लेथे।

धरती दाई हे परहितवा, लगथे बहिनी भाई मितवा।।

टीला टापू परबत घाटी, धुर्रा रेती गोंटी माटी।

महिमा बड़ धरती महतारी, दूधभात फुलकँसहा थारी।।

आवव अमित जतन ला करबो, धरती के हम पीरा हरबो।

देख दशा अपने ये रोवय, धरती दाई धीरज खोवय।।

बरफ करा गरमी मा गिरथे, मानसून अब जुच्छा फिरथे।

छँइहाँ भुँइयाँ ठाड़ सुखावय, बरबादी बन बाढ़ अमावय।।

मतलबिया मनखे मनगरजी, हाथ जोड़ के हावय अरजी।

धरती ले चल माफी माँगन, खुदे पाँव झन टँगिया मारन।।

बंद करव गलती के पसरा, छदर-बदर झन फेंकव कचरा।

दुखदाई डबरा  ला पाटव, रुखराई मत एको काटव।।

करियावय झन उज्जर अँचरा, कूड़ादानी  डारव  कचरा।

कचरा के करबो निपटारा, चुकचुक चमकै ये संसारा।।

लालच लहुरा लउहा नाशा, धरती सँउहें खीर बताशा।

महतारी कस एखर कोरा, काबर सुख के भूँजन होरा।।

मीठ पेड़ बड़ पथरा परथे, हुमन करे मा हँथवा जरथे।

नदियाँ खुद कब पीथे पानी, परहित मा काटँय जिनगानी।।

धरती सबला करथे धारन, कभू करय नइ कखरो बारन।

संग मया के बाँधय सुमता, महतारी बन बाँटय ममता।।

जीव जन्तु जग के हे हितवा, धरती माता सबके मितवा।

बिन महतारी का जिनगानी, भुँइयाँ ले सब करव मितानी।।

सँइता सुख के सुग्घर सिढ़िया, बाँटव बाढ़व राहव बढ़िया।

साहू अमित करय हथजोरी, धर रपोट झन बनव अघोरी।।

आवव राजा आवव परजा, उतारबो धरती के करजा।

उड़ती बुड़ती उँचहा उज्जर, दिखही दुनिया बहुते सुग्घर।।

देथे धरती जिनगी भर जी, झन सकेल, तैं सँइता कर जी।

बाँटे मा मिलथे सुख गहना, एकमई सब हिलमिल रहना।।

आवव छूटन धरती करजा, राजा मंत्री अउ सब परजा। 

नदिया तरिया रुखुवा जंगल, हिलमिल रहना मा हे मंगल।।

●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆◆◆●44. श्रृंगार छंद 16 मात्रा अंत गुरु लघु

गाँव जग जिनगी के आधार, दिखय सब एकमई परिवार।

मया छप छप छलकै घर द्वार, सबो के इहाँ सुघर निस्तार।।

सुआ करमा पंथी के बोल, ददरिया मधुरस कस रस घोल।

पंडवानी लोरिक के गोठ, कान देके सुनईया पोठ।

गुड़ी मा संझौती सकलाँय, सुजानिक कस सब बात बताँय।

रहय गँवई भलमानुस जात, मया बरसय अंतस दिनरात।।

मया अउ दया गाँव पहिचान, मेहनत इहाँ हवय वरदान।

'अमित' जन मन रहिथें खुशहाल, सदा सुमता सुग्गर सुखकाल।।

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45. श्रृंगारिका छंद 16 मात्रा अंत लघु गुरु

सजय जब सजनी हा मन लगा, सजन के मन जावय डगमगा।

पाँव मा पैरी छमछम बजा, लता लजवंती जावय लजा।।

फभय करधन कनिहा मा तने , कान के झुमका झूलय बने।

बाँह मा बहुटा पहुँची परे, हाथ मा चूरी ककनी भरे।।

नाक मा नथली फुल्ली फभे, मयारू मन मोहावय तभे।

घेंच मा सूँता पुतरी जमे, होठ के लाली, साँसा थमे।।

माथ मा सेंदुर टिकली चढ़े, गाँथ के बेनी पाटी कस गढ़े।

सजत सँवरत सजनी मन कहे, 'अमित' मन तोरे मोरे लहे।।

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45. राम छंद 17 मात्रा, 9,8 अंत लगग (यगण)

चल गाँव कोती, भाग जगाबो। धर खाँध नाँगर, खेत कमाबो।

बस अपन जाँगर, करन भरोसा। भर पेट खाबो, तीन परोसा।।

बरसाय बहुँते, मया मितानी, चल आव करबो, हमूँ किसानी।

मन लगा के हम, बुता बनाबो, तन कीच फुतकी, रोज सनाबो।।

मिल बाँट रोटी, भूख मिटाबो, फल मेहनत के, मीठ कमाबो।

मन मोर काहय, गाँव रमाले, सुख सुघर पाबे, करम कमाले।।

जन सबो बनथें, सबल सहारा। मन मया ममता, 'अमित' अपारा।

बन मीत मितवा, मया गढ़ाबो। अब असल जिनगी, पाँव बढाबो।

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46. चन्द्र छंद 17 मात्रा, 10,7 अंत मुक्त

गाँव के सब गली, दिखे उज्जर। खेत बखरी खार, लगय सुग्घर।

नहर नरवा नदी, कुआँ तरिया। चउक चाकर इहाँ, हवय परिया।।

दिखे चिक्कन खोर, गली चमके। लिपे पोते द्वार, घात दमके।

छरा छिटका रोज, अशुभ भागय। देख सिरतों गाँव, सरग लागय।।

रमे खेती खार, एक बनके। बिकट सिधवा संग, रहँय तनके।

पोठ महिनत सार, गजब जाँगर। चलैं बइला संग, धरे नाँगर।।

सोन बाली धरे, धान धनहा। देख कुलकय बिकट, 'अमित' मन हा।

गीत गावँय मीठ, बाँह जोरे। सुआ करमा राग, कहँय होरे।।

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47. राजीवगण छंद 18 मात्रा (9,9)

चल जाबो अपन, गँवई गाँव मा। सुख पाबो हमन, अपने ठाँव मा।

घर अँगना द्वार, सब परिवार हे। ये भुँइया हमर, जग संसार हे।।

माटी झन मान, माटी सोन हे। दुनिया मा हमर, अउ अब कोन हे।

करबो हम जतन, सेवा सार हे। धरती हा असल, सुख भंडार हे।।

हे पुरखा ददा, महतारी इही। जाबो अउ कहाँ, अब इँहचे रही।

उपजे हँन जिहाँ, उँहचे मान हे। नइ जा परदेश, बड़ नसकान हे।।

कर सेवा जतन, अपने हाथ मा। धरती आशीष, हमरे साथ मा।

झन भटकव तुमन, आवव छाँव मा। दुनिया ला छोड़, राहव गाँव मा।।

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48. शक्ति छंद 18 मात्रा अंत सगण

घटा तैं बने अब बरस गाँव मा। मजा तैं करे बड़ अपन ठाँव मा।

घटा आज तैं झन अनादर कमा। मया मान तैं पोठ आदर कमा।

चटाचट जरत हे इहाँ घाम ले। पछीना फुटत हे गजब चाम ले।

जरत हे बहुत पेड़ के छाँव मा। घटा तैं बने अब बरस गाँव मा।

कलेचुप मढ़ा झन इहाँ पाँव रे। बरस तोर लेवँय सबो नाँव रे।

धरे सेठ हावय करज खेत ला। हरा गे 'अमित' के बड़े चेत हा।

बचा जिंदगी ला अपन हाथ ले। सजा दे मजा दे तभो साथ दे।

लगे मान मरजाद सब दाँव मा। गिरा मूसलाधार अब गाँव मा।

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49. बंदन छंद 18 मात्रा 10, 8 अंत गुरु लघु

खेती बारी मा, बड़ बुता काम। करँय किसानी का, नइ मिलय दाम।

लहू पछीना ला, इन अपन गार। कब किसान होइन, बने सुखियार।।

उपजावँय अन धन, निज पेट काट। दया मया अंतस, दँय सबो बाँट।

सेठ महाजनमन, लहुटे दलाल। कमिया रोवय अउ, हाँसय अलाल।।

अमरबेल कस इन, चुहकँय चटोर। करजा बोड़ी दे, धरलँय बटोर।

सिधवा गिधवा इन, करलँय जुगाड़। मयर सरय चाहे, होवय बिगाड़।।

'अमित' कमावँय अति, दँय जी पराण। तभो कहाँ ले, कब हे कल्याण।

सिधवा तन-मन ले, बड़ दयावान। जग पालनहारी, लाँघन किसान।।

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50. पुरारि छंद 18 मात्रा 7, 11 अंत गुरु

जय जोहार, करँव धरती मँइया। सुन गोहार, रबे सुख के छँइया।।

अपने जान, सरी विपदा हरबे। अलहन टार, सुखी जग ला करबे।।

कोरा तोर, जीव जम्मों पलथे। रुखुवा तोर, जगत साँसा चलथे।।

हावय कोन, हमर हितवा जग मा। रहिथस संग, लहू जस रग रग मा।।

दाई ददा, सहीं छाहित तनके। जानस तहीं, गोठ सबके मन के।।

धरके धीर, बिकट सहिथच सगरो। बनके नेंव, सदा रहिबे हमरो।।

करजा तोर, चुकावन हम कइसे। जीयत हवन, हमन जइसे तइसे।।

माटी माध, लगावन चंदन कहिके। सेवा करन, तोर हम लइका रहिके।।

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51. पीयूषवर्ष छंद 19 मात्रा 10,9 लघु गुरु

अपन गँवई गाँव, आके मन रमे। 

रहन कोनो मेर, बड़ सुरता लमे।।

हवय कतको धाम, अपने घर बने। 

सबो बिरथा जान, जौन महल तने।।

जनम भुँइया खास, अपन माथ लगा।

विपत कतको आय, झन करबे दगा।।

हवय अंतस बोल, नइ गोहार हे। 

हमर धरती देश, जय जोहार हे।।

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52. सुमेरू छंद 19 मात्रा 12,7 या 10,9 अंत लगग

कब कहाँ काय होही, कोन जानै।

जिद छोंड़य मनखे, गोठ झन तानै।।

करथे ईश इशारा, समझ वोला।

करना हावय कारज, सुघर तोला।।

मनखे के चोला, अंतस सजाले।

मया-दया करुणा, मन मा बसाले।।

जग मा जिनगी हावय, जब्बर चुनौती।

नइ आवय कोई, काँही मनौती।।

●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●53. तमाल छंद 19 मात्रा अंत गुरु लघु

कुआँ बावली तरिया नदिया घाट।

पैडगरी धरसा बड़ चिक्कन बाट।।

आमा अमली बर अउ पीपर छाँव।

बसे देवता देवी सगरो ठाँव।।

बड़े फजर ले कुकरा बासय रोज।

पुछी टाँग के बछरू भागय सोज।

छानी बइठे कउवाँ करथे काँव।

मोर मयारू जइसे लागय गाँव।।

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54. सगुण छंद 19 मात्रा आदि लघु, अंत जगण

पखारँव चरण तोर मैं गा किसान।

जगत बर तहीं हा बने गा मितान।।

फसल ला उगाये अपन तैं भरोस।

कभू नइ धरे तैं सबो ला खबोस।।

सुखी बड़ रहँव जीवमन हा अपार।

हवच तैं मयारू भरे मन दुलार।।

करम हे गजब तोर जग मा महान।

पयलगी 'अमित' पाँव तोरे किसान।।

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55. नरहरी छंद 19 मात्रा 14,5 अंत नगण गुरु

देख-देख धनहा डोली, मन खिले।

हावा पानी अबगा आरुग, सुख मिले।।

तरिया डबरी अउ नदिया, तन खुले।

बाग बगीचा अउ बारी, मन बुले।।

जाँवर जोड़ी हमजोली, हें गड़ी।

दया-मया बरसै बादर, जस झड़ी।।

सुग्घर सुमता मा सबझन, निक रहे।

'अमित' गाँव के किस्सा ला, सब कहे।।

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56.दिंड़ी छंद 19 मात्रा 9,10 अंत मे गुरु गुरु

गाँव के भाखा, बड़ गुरतुर बोली।

मया ले भरथे, सब रीता झोली।।

बँधे बिन बँधना, सब इहाँ बँधाये।

डोर नाजुक हे, फेर सब छँधाये।।

रखँय मरजादा, दँय मान बड़ाई।

मया मयारूक, नइ होंय लड़ाई।।

सुमत के सूरुज, इहँचे नित आथे।

कपट इरखा ला, लेस के भगाथे।।

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57. योग छंद 20 मात्रा 12,8 अंत लघु गुरु गुरु

पुण्य कमाले अब तो, पेड़ लगाले।

रुखुवा सेवा करके, भाग जगाले।।

चिरई चिरगुन के हे, इही बसेरा।

फुरहुर पुरवाही अउ, हवा गरेरा।।

रुख धरती के गहना, गजब सुहाथे।

पेड़ तरी थोरिक सुरता, जीव लुहाथे।।

रुख राई ला संगी, 'अमित' बना ले।

बादर बरसा ला तैं, खूब बला ले।।

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58. शास्त्र छंद 20 मात्रा शुरुआत मा लघु अउ आखिर मा गुरु लघु

रहय चारो मुड़ा मा पोठ गा पेड़।

सजय भाँठा सजय परिया सरी मेड़।।

दिखय धरती गजब हरियर मिलय छाँव।

लगय बढ़िया हवा जुड़हा अपन ठाँव।।

सुघर सेवा तहूँ करले बुता काम।

जतन रुख के करे होही अमर नाम।।

हरहि धुँगिया करहि बरसा हमर खेत।

सँवर जाही हमर किस्मत धरव चेत।।

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59. हंसगति छंद 20 मात्रा, 11,9 मा यति, अंत यगण।

साफ सफाई बात, सबोझन मानव।

हवय भलाई पोठ, चिटिक पहिचानव।।

कचरा काड़ी खोर, गली ले टारव।

घर अँगना ला रोज, तुमन हा झारव।।

पानी पीयव छान, कसर सब भागय।

जेवन राखव ढाँक, सरी सुख जागय।।

लीपे पोते साफ, अपन घर साजव।

उज्जर सुग्घर देख, तहाँ ले नाचव।।

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60. मंजुतिलका छंद 20 मात्र, 12,8 यति, अंत जगण

चलव गाँव घर कोती, झन दव बिसार।

शहर छोड़ दन अब तो, अंतस पुकार।।

जहर बरोबर हावा, पानी पताल।

अपने धरती दाई, देही सँभाल।।

छुटे संगवारी हे, सुरता बिचेत।

बाग बगीचा बरछा, खार अउ खेत।।

कुआँ बावली तरिया, नँदिया कछार।

कहाँ शहर मा पाबे, 'अमित' लगवार।।

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61. अरुण छंद 20 मात्रा, 5,5,10 यति, अंत रगण

आन अब, शान सब, हमर अभिमान हें।

छंद  के, बंध  के, ग्यानी  महान  हें।।

संग दय, रंग दय, हाथ ला थाम के।

देव सम, हृदय नम, 'अरुण' गुरु नाम के।।

सियानी, सुजानी, 'दलित' कस पारखी।

जानलव, मानलव, जम्मों सखा सखी।।

शब्द के, गठरिया, बाँध  गुरु  ग्यान  दैं।

चइत  के,  चँदैनी, सहीं  लय  तान  दैं।।

टार भय, सीख दय, दोष ल सुधार के।

मीत कस, रोज दस, गलती बिसार के।।

ग्यान ला, ध्यान ला, होय खुश बाँट के।

जात  ला,  पात  ला, मेट  दय साँट के।।

काम  कर, नाम  कर, सुग्घर  बिचार दैं।

गोठ  ले, अपन  इन, पोठ  संस्कार  दैं।।

कर्म  कर, मर्म  धर,  इही  गुरु  मंत्र  हे।

बने लिख,तने दिख, सिरजन सुतंत्र हे।।

गाँव  घर, राज  भर,  पुरातन  छंद  ला।

सिखोवत,पठोवत, 'अमित' आनंद ला।।

करज  हे, अरज  हे, गुरु  तोर  पाँव मा।

तम  घटे, दिन  कटे, छंद  के छाँव मा।।

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62. प्लवंगम छंद 21 मात्रा, 8~13 यति, अंत गुरु, अंत जगण गुरु

नोनी बाबू, एके हावय मान लौ।

आँखी खोलव, अपन लहू पहिचान लौ।।

कोनो नइ हे, काँही अंतर आज मा।

हावँय दूनों, एक बरोबर काज मा।।

भेदभाव ला, अंतस के सब टार दे।

जोर जार के, इरखा ला झट बार दे।।

हीरा मोती, सच चाँदी अउ सोन हें।

बेटी बेटा, धन दौलत सिरतोन हें।।

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63.चान्द्रायण छंद  21 मात्रा, 11~10 पर यति

नोनी पोठ पढ़ाव, भलाई जान के।

जग मा नाम कमाय, सरी गुण खान के।।

अंतस ग्यान जगाय, इही मन आस हे।

 पाही मया दुलार, गजब विश्वास हे।।

बेटी ऊँच उठाय, बाप के माथ ला।

पढ़के भाग सजाय, अपन दय साथ ला।।

नइ तो हाथ लमाय, कमा धन जोरथे।

पाके सत गियान, भरम सब टोरथे।।

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64. सिन्धु छंद 21 मात्रा, 7~7 तीन बेर, शुरुवात लघु

चलव संगी, धरव बस्ता, अबड़ पढ़बो।

नवा रद्दा, नवा मंजिल, अपन गढ़बो।।

चलव चलबो, समझ मंदिर, इही दुनिया।

सबो सँघरव, छगन झगरू, झड़ी झुनिया।।

अपन मन के, सुघर तन के, उदिम करबो।

बने कापी, बने पुस्तक, कलम धरबो।।

गरम खाबो, मजा पाबो, मगन बढ़बो।

करत सेवा, बढ़त रद्दा, सरग चढ़बो।।

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65. संत छंद 21 मात्रा, 3,6,6,6 यति

बनौ नेक सबो एक सदा संग रहौ।

करू करू कभू कहूँ ल झन बोल कहौ।।

भला करव भला होय इही बात धरौ।

कटै नाक हमर अइसन झन काज करौ।।

छुआछूत भेदभाव टार नेक बनौ।।

दया मया जोर झन पर बर खाँच खनौ।।

रहव जुर मिल के आपस मा सबो इहाँ।

हमर ये दुनिया अब जाबो बता कहाँ।।

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66. भानु छंद, 21 मात्रा 6,15, अंत गुरु लघु

हम पढ़बो, सबले आगू बढ़बो काल।

पढ़ लिख के, जिनगी होही बड़ खुशहाल।।

बस राखव, अंतस भर-भर बहुते आस।

हम करबो, नाँव जगत मा अपने खास।।

बड़ जरुरी, हावय पढ़ना लिखना आज।

घर बाहिर, बिगड़य सब अप्पढ़ के काज।।

जग जिनगी, हावय सबले बढ़के ग्यान।

धन दौलत, मिलथे हम ला जग मा मान।।

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67. रास छंद 22 मात्रा, 8,8,6 यति, अंत सगण

काम-बुता ला, करलव सुग्घर, लाज तजौ।

खाव कमावव, पहिरव ओढ़व, खूब सजौ।।

बइठे-बइठे, तरिया पानी, न पुर परै।

हाथ-गोड़ ला, धरे सकेले, भूख मरै।।

भरे जवानी, जोश मितानी, गजब बड़े।

पथरा फोरे, ओगराय जल, सहज खड़े।।

ठलहा बइठव, तुमन कभू झन, एक घड़ी।

जाँगर वाले, दव महिनत ले, जोड़ कड़ी।। 

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68. राधिका छंद 22 मात्रा, 13-9 यति,

सबले पहिली हे देश, फेर कुछु दूजा।

भारत माँ के जयकार, इही  हे  पूजा।।

जनमभूमि सरग समान, अंतस अमाये।

महतारी  ऐला  जान, सुधबुध  लमाये।।

चंदन जइसन ममहात, सोनहा माटी।

पाँव-पाँव बड़ उपकार, 'अमित' परिपाटी।।

जनम-मरण बर हे देश, कहाँ अब जाबो।

हवय हृदय के कामना, साँसा बसाबो।।

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69. बिहारी छंद 22 मात्रा, 14,8 यति, अंत यगण (122)

भारत  के  बघवा  बेटा, धाक  जमाये।

बलकर बलिदानी सैनिक, नाँव कमाये।।

खरतरिहा बड़ खरखर इन, देश जगाये।

पीट-पीट  बैरीमन  ला,  मार  भगाये।।

दूध  पियें  महतारी  के, करज  उतारैं।

रखवारी  कर  सीमा  के,  देश  उबारैं।।

जनमभूमि रक्षा खातिर, वीर कहावैं।

हाँसत-हाँसत  हरहिंछा, लहू  बहावैं।।

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70. कुंडल छंद 22 मात्रा, 12,10 यति, अंत दू गुरु

कुंडल छंद

मनखे के तोर जात, कर्म अपन त्यागे।

रमे तैं माया मोह, धर्म छोड़ भागे।।

पाछू परय पछताय, कहाँ कभू माने।

बरपेली सबो काम, सहीं गलत जाने!!

माया के मोहफाँश, बँधागेच तैंहा।

अहंकार वशीभूत, कहत फिरत मैंहा।।

बिरथा झन जनम डार, काज सुघर राखौ।

पाप दोष लोभ त्याग, 'अभित' पुण्य चाखौ।।

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71. उड़ियाना छंद 22 मात्रा, 12,10 अंत सगण

साफ सफाई राखव, अँगना घर कुरिया।

तन मन हा फरियाही, रोग भगे दुरिया।।

कचरा  घुरुवा  डारव, खातू  ये  बनही।

स्वच्छ स्वस्थ सब राहव, रोज 'तीज' मनही।।

गाँव गली हा चिक्कन, बड़ सुग्घर दिखही।

'अमित' सफलता कहिनी, उहीमन ह लिखही।

मिलजुल चमकावव, अपन गाँव गँवई।

साफ  सफाई ले ही, हावय सब भलई।।

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72. सुखदा छंद- 22 मात्रा, 12,10 यति, अंत एक गुरु

लहू पछीना गारत, जौने घाम सहै।

जिनगी मा ओखर,  सुख हा सरी लहै।।

बइठे  राहय  अँइठे, अपने  हाथ धरै।

सुक्खा  तरिया मा तो, वोहा डूब मरै।।

आलस असकट अपने, तुरत जे छोड़ लै।

महिनत ले तन मन ला, सुघर जे जोड़ लै।।

अपन हाथ मनचाही, अपने भाग जगै।

होय रंग  चोखा तब, एक  न दाम लगै।।

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73. उपमान छंद- 23 मात्रा, 13,10 यति, अत दो गुरु

पाके पाके धान हे, सोन सहीं बाली।

उपजे हावय खेत मा, पिंयर-पिंयर खुशहाली।।

ममहावत हावय नँगत, महर-महर खेती।

लहू पछीना रातदिन, हे एखर सेती।।

बेरा लुअई टोरई, अब हँसिया पाजौ।

पैराडोरी डोर धर, जाँगर  ला साजौ।।

धूर खिली असकुड़ जुड़ा, टेंकनी सुमेला।

बइला गाड़ी सज चले, तुम रहव पछेला।।

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74. हीर छंद 23 मात्रा, 6,6,11यति, अंत रगण 

खड़े-खड़े, पाखड़ अब, होत धान खेत मा।

नींद उड़े, काय करँव, चलत इही चेत मा।।

ये कुँवार, कातिक मा, बादर बउछाय हे।

बुड़े लगय, डोंगा हा, आशा धोवाय हे।।

सरर-सरर, बड़ गरेर, सुतय धान सोनहा।

दुब्बर बर, दू असाड़, अंतस अब रोनहा।।

बनगे हे, मिटकाहा, कइसे भगवान हा।

अँधियारी, रात लगय, अब तो दिनमान हा।

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75. जग छंद 23 मात्रा, 10,8,5 यति, अंत गुरु लघु

जादा लइका मा,  संगी होबे,  हलकान।

नसबंदी करवा, अस्पताल जा, दे ध्यान।।

बड़ किलीर-कालर, किचकिच कंझट, बढ़वार।

दू नोनी बाबू, नँगत कुसाली, सुखसार।।

लुलवावय लइका, लइकोरी हा, दिनरात।

खँगते जावय सब, चटनी बासी, अउ भात।।

सोंच समझ संगी, नान्हें रख ले, परवार।

'अमित' खुशी मिलही, बन जा अब तैं, हुसियार।।

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76. संपदा छंद 23 मात्रा, 11,12 यति, अंत जगण

सुग्घर जँचकी होय, राखव एखर खियाल।

कहत हवय सरकार, ले आनव अस्पताल।।

मिलहीं डॉक्टर नर्स, लकर-धकर भाग आव।

जच्चा बच्चा स्वस्थ, पइसा संगे म पाव।

साधन मिलही सोज, एक फोन बस घुमाव।

लगय इहाँ ना दाम, हाथ कहूँ झन लमाव।

मितानीन दय संग, एको करय नइ ढेर।

'अमित' दोहरा लाभ, करव कभू मत अबेर।।

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77. अवतार छंद-23 मात्रा, 13,10 यति, अंत रगण

हमर गाँव बिगड़े हवय, दँव दोष कोन ला।

लेगे लबरा लूट के, सुमत के सोन ला।।

बाती बाता बात मा, मउका धरे खड़ें।

दाई भाई बाप ले, जउँहर भिड़े लड़ें।।

बीड़ी गाँजा दारु मा, माते गिरे परे।

खेलत सट्टा अउ जुआ, गहना सरी धरे।।

चुगली-चारी बस बुता, दिन-रात हें जुड़े।

बइठाँगुर बन बहिरहा, बकबक सबो बुड़े।।

भाँठा परिया मरघटी, कहाँ मइदान हे।

खोर-गली अब सोलखी, कहाँ दइहान हे।

बेंवारस कस गायगरु, फिरँय चारों मुड़ा।

नाँगर-जाँगर नइ दिखय, माढ़े परे जुड़ा।।

गजब फसल के लोभ मा, रसायन के दवा।

नकली खातू बीजहा, बिखहर भरे हवा।।

बदले-बदले ढ़ंग ले, सँचरगे रोग हा।

देखँव जब-जब गाँव ला, बढ़य बस सोग हा।।

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78. सुजान छंद-23 मात्रा, 14~9 यति, अंत ग ल

जग के उठाय भार खाँध, धन्य हवय काम।

लाँघन मरै किसान, भरय, सेठ के गुदाम।।

करजा करै कमाय गजब, आस घात जोर।

लहुटें सबो दलाल, फसल, लेगजँय बटोर।।

खँटथें इन दिनरात नँगत, अपन खेत खार।

महिनत मोती ला लूटय, कोचिया ह झार।।

भंडारी हा भूख मरै, कहाँ के विधान।

दाना-दाना मोहताज, दानिया किसान।।

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79. निश्छल छंद-23 मात्रा, 16~7 यति, अंत ग ल)

गाँव शहर मा बेजा-कब्जा, बाढ़े रोग।

नइ बाँचत हे मरघटिया हा, लागै सोग।।

चरी चरागन परिया भाँठा, सब चपलाय।

चौरस चाकर चउँक गलीमन, बस सकलाय।।

जेखर लाठी भँइस ओखरे, काय नियाव।

कनिहा बाहिर भिड़े कछोरा, कहाँ हियाव।।

देश राज के 'अमित' कहानी, देखव आज।

अपन पाँव मा टँगिया मारैं, नइ हे लाज।।

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80. मोहन छंद-23 मात्रा, 5,6,6,6 यति, अंत ल ग

देख ले, गाँव शहर, दूनों के, अंतर ला।जान ले, मया दया, सुमता के, मंतर ला।।

कहाँ हे, पुरखा के, मान गौन, लगा पता।

सुवारथ, संग-संग, मतलबिहा, कोन नता।।

गाँव मा, आपस मा, सबके सब, सुमत बँधे।

बुता बर, रजवाथें, एकमई, तुरत खँधे।।

शहर मा, मिठलबरा, मनखेमन, बिकट रथें।

गाँव हा, सिरतों मा, सुघर 'अमित'  सबो कथें।।

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81. रोला छंद-24 मात्रा, 11~13 यति

आखर-आखर जोड़, सबद तैं सुघर बना ले।

गा के गुरतुर गीत, सजन तैं अपन मना ले।।

लिख हिरदे के भाव, लेखनी सब ला भाही।

मिलही मनभर मान, मया अंतस मा छाही।।

हवय कलम ले आस, गोठ सिरतों ये करथे।

भरके भीतर भाव, अगन कस धधकत बरथे।।

सोज-सोज सब बात, लिखे बर खच्चित परही।

कलमकार के काम, कलम हा कड़कत करही।।

लिखबो मन के बात, जरूरी नइ हे छपना।

नइ खोजन जी मान, कलम के संगे खपना।।

मनभर आगर आस, भरे हे मन मा आसा।

महिनत करबो खास, पोठ होवय निज भासा।।

देखत जाही बीत, समय के सगरो पल हा।

आवय नइ तो काम, इहाँ अब कखरो छल हा।

सुरता रहिथे कर्म, जौन कर जाथे सुग्घर।

जौन निभाथे धर्म, नाँव रहि जाथे उज्जर।।

लिख ले सिरतों सार, छंद के साधक बन के।

धार कलम के टेंव, गजब तैं कर ले मन के।।

ताकत हे भरपूर, तोर अंतस मा आगर।

बिरथा झन तैं मेट, नाँव कर अपन उजागर।।

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82. दिगपाल छंद-24 मात्रा, 12~12

खा पताल तैं लाली, डार अपन तरकारी।

विटामीन भरपुरहा,  गुण एखर हे भारी।।

खा पताल चटनी पिस, मिरचा लहसुन धनिया।

मन ला भाथे सबके, बावा बाम्हन बनिया।।

बनथे झोझो फदका, जब-जब सस्ती होवय।

महर-महर ममहावय, भितरहीन जब खोवय।।

मोटापा अउ केंसर, ये पताल ले भागै।

सोजे कच्चा खावव, तन-मन हा झट जागै।।

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83. रूपमाला छंद-24 मात्रा, 14~10, अंत ग ल

मान देबे मान मिलही, मान महिमा जान।

मान हे मरजाद सिरतों, राख सबके मान।।

मान मरगे शान हरगे, खोय खइता नाम।

मान कहिथे पाव मोला, नेक करके काम।।

मान के ना मोल होथे, मान बड़ अनमोल।

मान के कीमत इही हे, मान ला झन तोल।।

मान देके मान लेले, मान जग आधार।

मान के बिन काय जिनगी, आदमी बेकार।।

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84. शोभन छंद-24 मात्रा, 14~10 यति, अंत जगण

काट रुखुवा बैर के जी, मेल भाव जगाव।

खोंट खँइटा खार मन ले, खीख बात भगाव।।

रोप थरहा प्रेम के तैं, छोड़ गरब गुमान।

छींच खातू मन मया के, रोज नवा बिहान।।

लेस दे तैं छल कपट ला, मेट सब मनभेद।

लोभ मन के झार दे तैं, इरखा रोग खेद।।

मन अपन अब खोल मनभर, दया मया ल बाँट।

का अपन अउ का पराया, संग सबो ल साँट।।

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85  लीला छंद- 24 मात्रा, 7,7,10 यति, अंत सगण

लाल भाजी, लाली रथे, सरदी मा मिलथे।

पौष्टिक भरे, साग होथे, तन-मन हा खिलथे।।

आयरन के, कमी ला ये, झट पूरा करथे।

तन भीतरी, कमजोरपन, जड़ समेत हरथे।।

लोहा तत्व, सोना धातु, भाजी लाल भरे।

लुसलुस पान, अउ डेंटरा  बड़ सेवाद  धरे।।

कमती लहू, बढ़ती होय, भाजी खाव कँसके।

सुघर जिनगी, स्वस्थ राहव, जीयव सबो हँसके।।

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86.  सुमित्र छंद- 24 मात्रा, 10,14 यति, आदि अंत जगण

गिलास भर पानी, करसी के बहुते मिठास।

सवाद सेहत अउ, करथे तन मन ल जुड़वास।।

रथे बने जुड़हा, माटी के गुण हा समाय।

हरे जिनिस देशी, धाक घरोघर ये जमाय।।

घड़ा कहे कोनो, कोनो मटका कहि बताय।

विकार मेटय ये, प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाय।।

सरी दिन मौसम म, उपयोगी एक्के समान।

बिशेषता एखर, जानय तौने हा सुजान।।

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87. सारस छंद-12,12 यति, आदि गुरु

काम बुता करे बिना, काम कहाँ तोर चलै।

काम बिना का जिनगी, कोन उदिम पेट पलै।

दाम मिलै भूख मिटै, दोष सबो दूर भगै।

जौन करय काम बुता, ओखर बड़ भाग जगै।।

काम बुता होय नहीं, देख कभू छोट बड़े।

लाज भुला पोठ कमा, हाथ धरे काय खड़े।।

होय भला रोज बने, बात 'अमित' जानत हे।

सार इही हे सिरतों, गोठ असल मानत हे।।

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88. गगनांगना छंद-25 मात्रा, 16,9 यति, अंत रगण

उठव बिहनिया योग करव जी, तन सुखियार हे।

सरलग महिनत करही तेखर, मन उजियार हे।।

योग जगत खातिर सिरतों मा, बड़ वरदान हे।

स्वस्थ रहे बर चलत घरो-घर, ये अभियान हे।।

तन-मन खच्चित चंगा होथे, भागय रोग हा।

देंह ठोसलग बाहिर भीतर, करथे योग हा।।

चाम चमकथे, पाचन बढ़थे, अपने अंग मा।

'अमित' योग झटपट अपनावव, जुरमिल संग मा।।

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89. मुक्तामणि छंद-25 मात्रा, 13,12 यति, अंत ग ग

घाम तापले जाड़ मा, आगे अब जड़काला।

कुनकुनहा गरमी मिलय, भागय जुड़ जंजाला।।

बादर बाहिर बेर ला, छेल्ला छाहित देखौ।

अपने काया के जतन, पहिली घाम सरेखौ।।

अकड़न हटही देंह के, विटामीन डी पाहौ।

छत परछी अँगना बइठ, थोरिक बेर बिताहौ।।

खस्सू खजरी खाज मा,  घामे जबर दवाई।

'अमित' रौनियाँ जाड़ के, होथे बड़ सुखदाई।।

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89. सुगीतिका छंद-25 मात्रा, 15,10 यति, आदि ल, अंत ग ल

सिला बिने बर चलव जाबो, तीर तखार खेत।

सिलहोबो सब सिला सुग्घर, लगावत हम चेत।।

मुठा-मुठा धान सकलाही, अन्नपूर्णा मान।

लहू पछीना के कमाई, मोल एखर जान।।

कटे धान सकेलत करपा, रखँय ओरी ओर।

दुनों हाथ ले बाँध बीड़ा, रचय गाड़ी जोर।।

इही समय सोनहा बाली, जाय कतको छूट।

बिने सिला ला खेत भर मा, 'अमित' लेबो कूट।।

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90. मदनाग छंद-25 मात्रा, 17,8 यति, अंत सगण

रनावत परे हावय धान हा, माढ़े चरपा।

बनेधर चेतलग तैं आज गा, बगरत करपा।।

ससनभर कमायेहन खेत मा, बइहा जइसे।

परे हे देख महिनत सोन हा, काबर कइसे।।

रखाये रखाये का हाल के, गुनले भकला।

कमाई करम हे ये तोर गा, करले सकला।।

पछीना लहू गारे पोठ तैं, अब झन सुरता।

लगे हे आस अमित रपोट ले, सबके पुरता।।

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91. नाग छंद-25 मात्रा, 10,8,7 यति, अंत ग ल

गरमी मा मिलथे, गजब मिठाथे, ये बोहार।

चना दार सँघरा, मही-दही मा, भूँज बघार।।

कली फूल पाना, कोंवर-कोंवर, बड़ रसदार।

मिलय माँघ फागुन, बहुते मँहगी, बिकय बजार।।

गुरतुर कस्सा फर, पींयँर भुरुवा, सुघर सुवाद।

होथे बिखहारी, जुड़हा पाचक, गुण ह अगाद।।

बारह महिना मा, खच्चित खावव, जानव भेद।

सुक्खा खाँसी ला, फर के काढ़ा, देथे खेद।।

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92. शंकर छंद-26 मात्रा, 16,10 यति, अंत ग ल

पेड़ कटागे सङक तीर के, कहाँ छँइहाँ पाँव।

चुहे पछीना तरतर अब्बङ, कहाँ देंह लुकाँव।।

हरियर हरियर रुखुवा राई, कती डहर लुकाय।

पथरा गिट्टी रेती छङिया, मुँड़ी ऊँच उठाय।।

देख तमाशा गाँव शहर के, खूब लगे हदास।

अपन गोड़ टँगिया मार के, यहा काय बिकास।।

बने खोंदरा बने रहन दे, भरव सबके घाव।

फुरहुर पुरवाही फर चाही, पेड़ अखन लगाव।

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93. विष्णुपद छंद-26 मात्रा, 16,10 यति, अंत ल ग

चोंगी के चस्का चक्कर मा, गर मा फाँस परे।

रोग तपेदिक तन मा होथे, खाँसी खोख धरे।।

धुआँ उड़ाके मजा मनाये, हुक्का गजब इँचे।

सेखी मारत उपरछवा तैं, नइ तो कभू जँचे।।

तोर करेजा करिया परगे, फुक्का देंह दिखे।

रोगी केंसर के तैं लहुटे, नइ तो तभो सिखे।।

धीर रास के जहर बरोबर, अब चुलुक छोंड़ दे।

जिनगी नइ तो मिलय दुबारा, संग सुख जोंड़ ले।।

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94. कामरूप छंद-26 मात्रा, 9,7,10 यति, अंत ग ल

कोन का करथे, जौन धरथे, ओखर हे विनास।

देख के जरथे, भभक परथे, अंतस मा हतास।।

मानथे मन के, रथे तन के, करथे अपन काम।

का कहव वोला, निचट भोला, ओखर सुखी नाम।।

हिजगा जे करे, अपने मरे, खुद करय नुकसान।

इरखा मा सने, जब्बर तने, काय के इंसान।।

जनम धरे इहाँ, मानुस जिहाँ, एक बेर बिचार।

दया-मया करव, परहित मरव, जग सबो परिवार।।

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95. झूलना छंद-26 मात्रा, 7,7,7,5 यति, अंत ग ल

ये देंह के, हर अंग के, आवव करन, हम दान।

ये लहू ला, ये नयन ला, परहित म दन, ये ठान।।

हे काम के, हर जिनिस हा, जींयँत मरत, तन तोर।

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कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ़

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