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Sunday, November 28, 2021

छत्तीसगढ़ी राज भाषा दिवस विशेष छंदबद्ध कवितायें



 छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के गाड़ा-गाड़ा बधाई...


"छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी के आरती गीत"


छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी, पइयाँ लागँव तोर

पइयाँ लागँव तोर ओ दाई, पइयाँ लागँव तोर 


तहीं आस अस्मिता हमर अउ, तहीं आस पहिचान

आखर अरथ सबद के दे दे, तँय  मोला वरदान।।

खोर गली मा छत्तीसगढ़ के, महिमा गावँव तोर…

पइयाँ लागँव तोर ओ दाई, पइयाँ लागँव तोर


एक हाथ हे हँसिया बाली, दूसर दे वरदान

तीसर हाथ धरे हे पोथी, चौथा देवै ज्ञान।।

पढ़े लिखे बोले बर दाई, चरन पखारँव तोर...

पइयाँ लागँव तोर ओ दाई पइयाँ लागँव तोर


करमा सुआ ददरिया पंथी, गौरा-गौरी फाग

पंडवानी भरथरी तोर बिन, कइसे पावै राग।।

छमछम नाचँव राउत नाचा, दोहा पारँव तोर...

पइयाँ लागँव तोर ओ दाई पइयाँ लागँव तोर

 

कभू दानलीला रचवाये, कभू सियानी गोठ

मस्तुरिया के अन्तस बइठे, करे गीत ला पोठ।।

महूँ रात-दिन सेवा करहूँ, बेटा आवँव तोर

पइयाँ लागँव तोर ओ दाई पइयाँ लागँव तोर


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग

छत्तीसगढ़

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*सरसी छंद गीत- कब होही नवा बिहान?*


कहाँ उड़ागे सोन चिरइँया, सुन्ना हे घर खोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।


बंजर खेती खार दिखत हे, नदी कुँआ अउ ताल।

सुख्खा परगे डोली धनहा, मुरझावत सुख डाल।।

धान कटोरा ये भुइँया मा, कोंन जहर दिस घोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।1


जल जंगल भुइँया के मालिक, पर देशी हे आज।

लुलवावत हे छत्तीसगढ़िया, पाये राज सुराज।।

डाका डारत हमर खुशी मा, बहरुपिया कुछ चोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।2


जहर कारखाना हे उगलत, अरझत हावय साँस।

पतझड़ होगे हरियाली अउ, होगे पेड़ विनाश।।

पुरख़ा के चिनहा बिरवा अब, कटगे ओरी ओर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।3


मान कहाँ पावत भाखा निज, वाजिब दाम किसान।

आँख निटोरत खड़े हवन कब, होही नवा बिहान।।

आँसू आँख भरे छलकत हे, पीरा पोरे पोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।4


गुरु के महता घटत दिनों-दिन, शिक्षा हे बदहाल।

लइका ले बस्ता भारी हे, बिछे लूट के जाल।।

कमर टूटगे महँगाई मा, पीठ परे दुख लोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।5


उल्टा-पुल्टा पाठ पढ़ा के, बदलत हें इतिहास।

मान कहाँ हे पुरख़ा मन के, होवत हे उपहास।।

गजानंद जी बाँध चलौ अब, सुख सुमता के डोर।

रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।

लौट चले आ सोन चिरइँया, सुन्ना हे घर खोर.....6


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' (बिलासपुर)

छंद परिवार- छत्तीसगढ़

छंद साधक- सत्र 2

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सरसी छंद- *मान दिलाये छत्तीसगढ़ी, करना हे मिल काज*


छत्तीसगढ़ी भाखा हावय, अब्बड़ मया दुलार।

सरग बरोबर येकर छइँहा, बहे पिरित के धार।।1


गोद लिये हे सब्बो भाखा, दे के ममता छाँव।

छत्तीसगढ़ी महतारी के, परत हवँव मैं पाँव।।2


सुवा ददरिया पंथी करमा, हमर धरोहर शान।

धान कटोरा महतारी के, छत्तीसगढ़ी मान।।3


सत के अलख जगाये घासी, छत्तीसगढ़ी बोल।

मनखे मनखे एक बरोबर, कहिस बात अनमोल।।4


मान बढाइस महतारी के, सन्त पवन दीवान।।

कोदूराम दलित ये भुइँया, देइस छंद बिधान।।5


दरद सुनाइस महतारी के, मस्तुरिहा के गीत।

तन सोलह सिंगार कराइस, तब खुमान संगीत।।6


स्वर कोकिला दीदी कविता, गावय महिमा गान।।

पाँव पखारय अरपा पैरी, माथ मुकुट हे धान।।7


पँडवानी तीजन बाई के, गूँजय देश विदेश।

अउ भरथरी सुरुज बाई के, छोड़य छाप विशेष।।8


चलौ उठाबो पुरखा बाना, कदम बढ़ाके आज।

मान दिलाये छत्तीसगढ़ी, करना हे मिल काज।।9


इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर 

छंद परिवार- छत्तीसगढ़

साधक- सत्र 2


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धमतरी: दिनांक: 28 नव॰ 2021

विषय: महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी


महतारी भाखा हरे , छत्तीसगढ़ी जान ।

पढ़व लिखव बोलव सबो , सदा करव जी मान ।।

सदा करव जी मान , तभे तुम मान ल पाहू ।

छत्तीसगढ़ी बोल , मया सुग्घर बगराहू ।।

बनहू जब हुँसियार , तभे फुलही फुलवारी।

हरियर सुख के छाँव हरे , भाखा महतारी।।


छत्तीसगढ़ी बोल ले , बहे मया के धार ।

सहज हृदय ला छू जथे , देथे खुशी अपार।।

देथे खुशी अपार , भरे हे सुख के सागर ।

सुवा ददरिया गीत ,  मया ला बाँटय आगर ।।

गजबे स्वाद बताय ,  सुहाथे जइसे कड़ही ।

मँदरस अस हे मीठ , हमर ये छत्तीसगढ़ी।।


बोली मीठा गुड़ सहीं , कतका करँव बखान ।

महतारी छत्तीसगढ़ , इही हमर पहिचान ।।

इही हमर पहिचान , हमन बड़भागी आवन ।

जब तक रही परान , ठेठ भाखा अपनावन ।।

हरियर हे सिंगार , हमर दाई के चोली ।

करबो जग मा राज , बोलके मीठा बोली ।।


                  परमानंद बृजलाल दावना

                                भैंसबोड़ 

                        6260473556

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: छत्तीसगढ़ी भाखा दिवस

28/11/2021

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छत्तीसगढ़ी भाखा सुग्घर,

                           दाई तोर दुलार हे।

गुरतुर बोली मँदरस जइसन,

                    बरसत मया फुहार हे।।

छत्तीसगढ़ी भाखा सुग्घर........


आवव संगी भाई जुरमिल,

                     गुन माटी के गाव जी।

बनके सब किसान नँगरिहा,

                  अन्न सोन उपजाव जी।।

करमा-सुआ-ददरिया सुग्घर,

                      गली - गली गोहार हे।

छत्तीसगढ़ी भाखा सुग्घर.......


बगरत हावै चारो कोती,

                    दाई    के  ईमान   हा।

एखर सेती बाढ़त हावै,

                   दुनिया मा पहिचान हा।।

महतारी भाखा मा सुनलौ,

                       जम्मों ला जोहार हे।

छत्तीसगढ़ी भाखा.......


गंगा कस पबरित भाखा ये,

                   एखर  गुन  गायेंव मँय।

ननपन ले सुन-सुन के भइया,

                 ज्ञान जोत  पायेंव मँय।।

मान मिलत सम्मान मिलत हे,

                 जग मा कृपा तुम्हार हे।

छत्तीसगढ़ी भाखा........

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छंदकार :-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम (छ.ग.)

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 जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: छंद त्रिभंगी


सबके मन भावय, गजब सुहावय हमर गोठ, छत्तीसगढ़ी।

झन गा बिसरावव, सब गुण गावव, करव पाठ, छत्तीसगढ़ी।

भर भरके झोली, बाँटव बोली, सबे तीर, छत्तीसगढ़ी।

कमती हे का के, देखव खाके, मीठ खीर, छत्तीसगढ़ी।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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महतारी भाँखा- दोहा गीत


दया मया के मोटरा, सबके आघू खोल।।

मधुरस कस गुरतुर गजब, छत्तीसगढ़ी बोल।


खुसबू माटी के उड़े, बसे हवै सब रंग।

तन अउ मन ला रंग ले, रख ले हरदम संग।

हरे दवा निसदिन खवा, बोल बने तैं तोल।

दया मया के मोटरा, सबके आघू खोल।।


परेवना पँड़की रटय, बोले बछरू गाय।

गुरतुर भाँखा हा हमर, सबके मन ला भाय।

जंगल झाड़ी डोंगरी, गावय महिमा डोल।

दया मया के मोटरा, सबके आघू खोल।।


इहिमे कवि अउ संत मन, करिस सियानी गोठ।

कहे सुने मा रोज के, भाँखा होही पोठ।।

महतारी ले कर मया, देखावा ला छोल।

दया मया के मोटरा, सबके आघू खोल।।

 

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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छत्तीसगढ़ी बानी(लावणी छंद)- जीतेंन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।

पी के नरी जुड़ा लौ सबझन, सबके मिही निशानी अँव।


महानदी के मैं लहरा अँव, गंगरेल के दहरा अँव।

मैं बन झाड़ी ऊँच डोंगरी, ठिहा ठौर के पहरा अँव।

दया मया सुख शांति खुशी बर, हरियर धरती धानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।।।।।


बनके सुवा ददरिया कर्मा, माँदर के सँग मा नाचौं।

नाचा गम्मत पंथी मा बस, द्वेष दरद दुख ला काचौं।

बरा सुँहारी फरा अँगाकर, बिही कलिंदर चानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


फुलवा के रस चुँहकत भौंरा, मोरे सँग भिनभिन गाथे।

तीतुर मैना सुवा परेवना, बोली ला मोर सुनाथे।

परसा पीपर नीम नँचइया, मैं पुरवइया रानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।


मैं गेंड़ी के रुचरुच आवौं, लोरी सेवा जस गाना।

झाँझ मँजीरा माँदर बँसुरी, छेड़े नित मोर तराना।

रास रमायण रामधुनी अउ, मैं अक्ती अगवानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


ग्रंथ दानलीला ला पढ़लौ, गोठ सियानी धरलौ जी।

संत गुणी कवि ज्ञानी मनके, अंतस बयना भरलौ जी।

मिही अमीर गरीब सबे के, महतारी अभिमानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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*राज भाषा दिवस*  (छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा)


महतारी गुरतुर भाखा ला, बोलव भैया दीदी मन|

जुड़े हवय अस्मिता राज के, बोली मधुरस कस पावन||


महतारी के मया समाये, महिमा गाये सुर मुनि मन |

हिरदे भितरी हवँय बसाये, ये भाखा गुन लव जनजन||


मुखिया बोलय राजा बनके, मनखे भाखा पोहे तन||

माटी के ओ लाल घलो हा, अड़बड़ बोलय जतन जतन||


बारो महिना बउरँय बोली, महक उठे हे हर कनकन|

सुआ ददरिया करमा गाले, नाचा  पंथी मनभावन||


गुरतुर गुरतुर लागय एहर,रचे बसे हे सबो करम |

मनखे मनखे एकबरोबर, ए मानय जी सबो धरम||


ए भाखा के सेवा खातिर,सुंदर  कोदू हवँय अमर|

महतारी भाखा बगराइन, गाँव गली अउ शहर नगर ||

अश्वनी कोसरे 

कवर्धा कबीरधाम

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*सार छंंद*

*विषय-छत्तीसगढ़ी भाखा*


छत्तीसगढ़ी भाखा मा अब, परभाखा  लदकागे।

हमर इहाँ आके पर-रजिहा, भाखा हा पोठागे। 


नेता मन परबुधिया होगे, भाखा अपन भुलागे।।

मान पाय बर महतारी हा, अपन इहाँ पछुवागे।। 


अपन राज मा छत्तीसगढ़ी, कोन्टा मा सकलागे।

आज अपन भाखा बउरे बर, अब सरकार लजागे।। 


क्षेत्रवाद जब कइथें हमला, हमन माँगथन हक ला।

लड़थन हम भाखा संस्कृति बर, सबो समझथें जकला।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

   पाली जिला कोरबा

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छत्तीसगढ़ी राज्य भाषा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ


छत्तीसगढ़ी बोली भाखा, बड़ गुरतुर मोला लागे।

जन्म जन्म के रिश्ता हावे, जेला मोरे मन भागे।


मोर हवय जे दाई भाखा, मानव जेला भगवाने।

मीठ मीठ अउ गुरतुर बोली, बोलव जी सीना 

 ताने।


नाचत पन्थी अऊ सुवा ला, करथन जेमा गुनगाने।

राग ददरिया करमा सुघ्घर, भाषा दे हे पहचाने।


दान दया ला राखे सुघ्घर, मया प्रीत ला हे बाँधे।

करम धरम के गुन ला गाथे, राम नाव ला हे साधे।।


फेर देख हालत भासा के, आँखी ले आँसू आथे।

हमर शहर ला हमरे भाखा, काबर अइसन नइ भाथे। 


छोड़व मन के संका अबतो, राज काज देवव मोरो।

पढ़ लिख ले दाई भाखा मा, भाग जागही अब तोरो।


-हेमलाल साहू 

ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा

तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा

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राजभाषा दिवस विशेष

छत्तीसगढ़ी भाखा हा जी, कइसे पाही मान

कारी घपटे अँधियारी ले, कइसे होय बिहान।


कहूँ कहूँ ला बतराये मा, आथे भारी लाज।

सब दफ्तर मा अंग्रेजी के, बढ़गे भारी काज।

अपने भाखा हा लदका के, पर गे निचट उतान।।

छत्तीसगढ़ी भाखा हा जी, कइसे पाही मान...


आने भाखा बोलव कतको, मत येला बिसराव।

मोह धरे आने भाखा के, झन जादा इतराव।

काबर अपने संस्कृति के जी, नइ हे थोरिक ज्ञान।।

छत्तीसगढ़ी भाखा हा जी, कइसे पाही मान...


घर के जोगी रहै जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध।

नोच झपट के झन ले जावय, कहूँ बहिरहा गिध्द।

हमीं हमन झन रहन उपेक्षित,  सोचव सबो सियान।।

छत्तीसगढ़ी भाखा हा जी, कइसे पाही मान...


उमाकान्त टैगोर, जाँजगीर

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 सूर्यकांत गुप्ता सर: राजभाखा दिवस के बधाई देवत...


जइसे  हम  पखवाड़ा  रखके, हिंदी के करथन सम्मान।

महतारी छत्तीसगढ़ी के,राखन चिटिकुन मान मितान।।

दूसर भाखा शामिल करथे,लिखइ पढ़इ मा तो सरकार।

महतारी के सेवा बर जी, उदिम करन हम अउ  दमदार।।लिखत 'अमर घर चल' कस भाई, छपय एकरो बने किताब।

रहँय लड़कपन ले लइकामन, पढ़े लिखे बर जी बेताब।।

प्रचलित जुन्ना बोली सँग सँग,  एकर भरन शब्द भंडार।

गुरतुर बोली भाखा बर गा, बाढ़य सबके मया दुलार।।

बनै व्याकरण मानक एकर, अउ भाखा कस ठँउका पोठ।

बन के झन रहि जावय खाली, गुरतुर भाखा हर जी गोठ।।


सूर्यकान्त गुप्ता, सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

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कवि बादल: छत्तीसगढ़ी भाषा

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अपने घर मा दासी काबर, छत्तीसगढ़ी भाषा दाई।

अंग्रेजी हा राज करत हे,वोकर पावर हे हाई।।


राजकाज एमा नइ होवय,बनके रहिगे बस शोभा।

पढ़ई लिखई कोन कराही,गड़थे का जइसे खोभा।।


कभू परीक्षा रोजगार बर, काबर नइ  होवय एमा।

साहित के हे भरे खजाना,नीक व्याकरण हे जेमा।।


गूढ़ ज्ञान सँग भाव झलकथे,संस्कृति के घन फुलवारी।

लोकगीत हे,लोककथा हे,तीज तिहार हवै भारी।।


अरथ भरे जस मँदरस गुत्तुर, कान परे अमरित बानी।

बोले मा हे निचट सोझवा, निर्मल जस गंगा पानी।।


मातु कोसला के ममता हे, रघुराई के मरजादा।

करमा सुवा ददरिया पंथी, बोली बतरा बड़ सादा।।


आवव छत्तीसगढ़ी भाखा के, गौरव सबो जगाना हे।

कोटि कोटि हम बेटी बेटा, वोखर हक देवाना हे।।


नइये वो दिन हा अब दुरिहा,छत्तीसगढ़ी हा अगुवाही।

राजकाज हा खच्चित होही, संविधान मा जुड़ जाही।।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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: छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के आप सब ला गाड़ा गाड़ा बधाई💐💐


सरसी छंद गीत- *जतन करव महतारी भाखा*


जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।

इही हमर हे स्वाभिमान अउ, इही हमर हे शान।।


दया-मया के गुरतुर बैना, मधुरस भरे मिठास।

सत संदेश दिये जन-जन ला, सतगुरु घासीदास।।

कहे इही भाखा मा मनखे, मनखे एक समान।

जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।1


लिखिस दानलीला ला बढ़िया, पंडित सुंदर लाल।

कोदूराम दलित के कविता, ऊँच करा दिस भाल।।

जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिहा के, मातृभूमि प्रति गान।

जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।2


रखिन सँजो के पुरख़ा हमरो, सपना आँखी कोर।

छत्तीसगढ़ी आगू बढ़ही, गाँव शहर घर खोर।।

छत्तीसगढ़िया बन परबुधिया, आज भुलागे मान।

जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।


तरसे सुवा ददरिया करमा, राउत गम्मत नाच।

परदेशी भाखा पथरा मा, दिहिस अपन ला काँच।।

झन परलोकिहा बनौ भइया, पढ़े लिखे विद्वान।

जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।4


सुसकत हावय बासी-चटनी, नंगरिहा अउ खेत।

बइला गाड़ी के घँघड़ा हा, कहत हवे कर चेत।।

गजानंद जी जाग-जाग अब, लाबो नवा बिहान।

जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।5


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर 

छंद परिवार- छत्तीसगढ़

छंद साधक- सत्र 2

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 *छत्तीसगढ़ी भाखा दिवस(दोहा छंद)*


महतारी भाखा बनय, राज-काज आधार ।

तब हो जाही गा हमर, सपना हा साकार ।।१


छत्तीसगढ़ी के सदा, राखव सब झन मान ।

पोठ हवय भाखा हमर, सार बात लौ जान ।।२


करलौ भाखा के जतन, भाखा हे अनमोल ।

पढ़व-लिखव संगी तुमन, छत्तीसगढ़ी बोल ।।३


खुदके भाखा ले हमर,  होथे गा पहिचान ।

महतारी के आज हम, कर लन जी सम्मान ।४


आने  भाखा  हा  इहाँ,  ठाड़े  सीना  तान ।। 

छत्तीसगढ़ी बोल के, करिहौ गा अभिमान ।।५



   *मुकेश उइके "मयारू"*

   *छंद साधक-- सत्र 16*

    चेपा(बकसाही) पाली,

    जिला- कोरबा(छ.ग.)

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दिनाँक 28/11/2021

सार छंद__गीत

 *विषय____छत्तीसगढ़ी भाखा* 


मान मिलै छत्तीसगढ़ी ला, मिल के कदम बढ़ावन।

आवव छत्तीसगढ़िया संगी, एला हम सिरजावन।।


छत्तीसगढ़ी भाखा के सब, मिलके मान बढ़ाबो ।

लिखबो छत्तीसगढ़ी मा अउ, गीता पाठ पढ़ाबो।।

छत्तीसगढ़ी भाखा के हम, रस्ता ला चतरावन।

मान मिलै छत्तीसगढ़ी ला, मिल के कदम बढ़ावन।।१


घर दफ्तर मा छत्तीसगढ़ी, हमन बोलबो सुग्घर। 

करबों पोठ अपन संस्कृति ला, शान मान पाये बर।

शान बढ़ै हिंदी के जइसे, आवव अलख जगावन।

मान मिलै छत्तीसगढ़ी ला, मिल के कदम बढ़ावन।।२


करमा सुआ ददरिया नाचा, संस्कृति हरै पुराना।

पुरखा के इही धरोहर, हे अनमोल खजाना ।।

छत्तीसगढ़ी भाखा बर हम, सुनता जोत जलावन।

मान मिलै छत्तीसगढ़ी ला, मिल के कदम बढ़ावन।।३


मान मिलै छत्तीसगढ़ी ला, मिल के कदम बढ़ावन।

आवव छत्तीसगढ़िया संगी, एला हम सिरजावन।।


पद्मा साहू "पर्वणी"

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

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Friday, November 26, 2021

संविधान दिवस विशेष छंदबद्ध कवितायें- प्रस्तुति (छंद के छ परिवार)


 संविधान दिवस विशेष छंदबद्ध कवितायें- प्रस्तुति  (छंद के छ परिवार)

: मनहरण घनाक्षरी- विजेन्द्र वर्मा


संविधान


पढ़ के जी संविधान, नीति औ नियम जान,

ऊँच-नीच खाई पाट,सुमता ला लाव जी।

सब ला हे अधिकार, कोनों ला तो झन मार,

भेदभाव के इहाँ तो,भुर्री ला जलाव जी।।

होय सबके उद्धार,अंतस मा हो सत्कार,

देश के विधान सब,बड़ महकाव जी।

नारी के सम्मान बढ़े,नवा-नवा रद्दा गढ़े,

कहत रिहिन हावै,बाबा भीम राव जी।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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: सरसी छन्द गीत-द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"


ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।

संविधान ले मिले सबो ला,मानवता अधिकार।


सबो  ग्रंथ ले  पावन ऐमा ,भरे ज्ञान के खान।

झन बदलव तुम संविधान ला,राखव ऐखर मान।

सुघ्घर जिनगी ला जीये के,ऐही हे आधार।

ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।


संविधान ला पढ़के सबके,बने जागही भाग।

गावव मिलके नर-नारी मन,भीम राव के राग।।

संविधान के निरमाता ला,वंदन बारंबार।

ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।


दलित मसीहा लिखे हवय जी,भारत के संविधान।

ए जग मा हे अलगे देखव,भारत के पहिचान।।

जानौ समझौ अपनावौ जी,अब तो झारा-झार।

ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।


द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"

कवर्धा छत्तीसगढ़


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मनोज वर्मा: अमृतध्वनि छंद



संविधान निर्माण शुभ, पबरित दिन हे आज।

मनखे के अधिकार बर, भीम करिन हे काज।।

भीम करिन हे, काज गढ़े नव, रसता सब बर।

ऊॅंच नीच ला, मेटत समता, लानिन घर घर।

आवाज दलित, शोशित के बन, दे हवस मान।

नमन करॅंव मॅंय, बाबा साहब, शुभ संविधान।।


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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 दोहा छंद - बोधन राम निषादराज

(भीमराव अंबेडकर)


जय बोलव जय भीम के,भारत माँ के लाल।

सुग्घर रचे विधान ला, पुरखा  करे कमाल।।


छुआ छूत के भेद ला,तँय हा दिए मिटाय।

जय बाबा अंबेडकर,जग मा नाम कमाय।।


संविधान  के  कल्पना, करे  तहीं  साकार।

ऊँच नीच के भेद अउ,दलित करे उद्धार।।


बाबा  तोरे   ज्ञान मा, कोनों  नहीं  समान।

भटके  भूले  ला तहीं, बना  दिए  इंसान।।


बाबा जय हो भीम के, पइँया लागँव तोर।

सुमता के दीया जला,जग मा करे अँजोर।


छंदकार - बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा, जिला - कबीरधाम (छ.ग.)


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 कौशल साहू: अमृत ध्वनि छंद


दलित मसीहा भीम


दलित मसीहा भीम ला, सौ-सौ बार प्रणाम।

नव भारत निर्माण बर, पबरित जेकर काम।।

पबरित जेकर, काम देश मा,घर घर समता।

संविधान मा,गढ़े हबय जी,सब बर रसता।।

सब ला शिक्षा, दाना पानी, छँइहा ठीहा।

ऊँच नीच अउ, पाटे खाई,दलित मसीहा।।


छंदकार :-कौशल कुमार साहू

सुहेला (फरहदा)

जिला:- बलौदाबाजार-भाटापारा

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केंवरा यदु राजिम: कुंडलिया छंद 


जय हो बाबा भीम जी,पाँव परत हौं तोर।

संविधान निर्माण कर, सबला करे सजोर।

सबला करे सजोर,नवा तँय रसता गढ़ के।

ऊँच नीच के भेद,मिटाये आगू बढ़ के।

नाम अमर हे तोर,बोल  हे काशी काबा।

चरण मनावँव तोर,होय जय तोरे बाबा।।


केवरा यदु "मीरा "

राजिम

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*सरसी छंद- संविधान अभिमान हमर हे*


संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।

संविधान अधिकार हमर हे, संविधान वरदान।।


तोड़ गुलामी के बेड़ी ला, थिरकिस हे तब पाँव।

राह विकास सुखी उन्नति के , मिलिस सबो ला छाँव।।

समरसता समभाव दिये हे, बाबा भीम महान।

संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।1


जात-पात अउ ऊँच-नीच के, तोड़िस जग ले फाँस।

दीन दलित पिछड़े बहुजन जन, लेत तभे सुख साँस।।

पढ़ लिख अफ़सर बाबू बनगे, बनगे हें विद्वान।

संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।2


पंचानबे अनुच्छेद हवे, पच्चीस हवे भाग।

बारह अनुसूचियाँ कहे नित, हक बर मानुष जाग।।

अमर रहे संविधान दिवस नित, ऊँचा राहय शान।

संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।3


करिंन सुरक्षा संविधान के, इही हमर कर्तव्य।

पा मौलिक अधिकार सबो हम, बने हवन जी सभ्य।।

शीश झुका गजानंद पात्रे, करत हवे गुनगान।

संविधान अभिमान अमर हे, संविधान पहिचान।।4


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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जगदीश जी: कुंडलियाँ


*भीमराव अंबेडकर*


भारत आगू हे बढ़त, कहना ओकर मान।

भीमराव अंबेडकर, लिखे सुघर संविधान।

कहना ओकर मान, मान पावत हे सब जन।

बढ़गे सबके शान, मान पावय जन गण मन।

तहीं मिटाये भेद, देश के बाधा टारत।

बढ़गे हावय आज , विश्व मा आगू भारत।।


जगदीश "हीरा" साहू

कड़ार (भाटापारा)

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 बरवै छंद.......

बिषय....संविधान


संविधान लिखके वो, दिस आकार।

नियम बना के सबबर,लाइस सार।


भेद भाव मेटिन जी, दिन अधिकार।

ऊँच नीच जानव झन, पाव दुलार।


बनें विधाता तँय हा, कर निर्मान।

रचे नवा इतिहास ल, हे अभिमान।


पथरा कस सहिके सब, आघू आय।

रद्दा नवा बनाके, मंजिल पाय।


उद्धार दलित के कर, बनें सहाय।

मिहनत के बल मा तँय,नाम दिलाय।


भीम राव कहिथे जी, तोरे नाम।

बनके बाबा साहब ,दव पैगाम।


बनें सहारा शोषित ,देहे ज्ञान।

आघू बाढ़य कहिके, जन पहिचान।


जन जन ला संदेसा,बाँटे ध्यान।

शिक्षा पावय मनखे,करे बखान।


खेती बारी धन बर, बड़ अभियान।

कानून बनें कतका, जाग किसान।


धरे समस्या ला तँय,पकडे़ कान।

नियम बना के सबबर, बने महान।


*धनेश्वरी सोनी गुल*

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: पद्मा साहू *पर्वणी* 

दिनांक 26/11/2021

 *_सरसी छंद ___संविधान_*

 

भीमराव अंबेडकर बाबा, वास्तुकार प्रधान।

मान दिलाइस हमर देश ला, संविधान पहिचान ।।


मार्गशीर्ष तिथि शुक्ल सप्तमी, संविधान स्वीकार।

बिक्रम संवत दू हजार छह, नियम बनिस आधार ।।


लोकतंत्र गणराज्य बनाइस, प्रभुता वादी राज।

जात-पात के भेद मिटाइस, करिस धरम के काज।।


राष्ट्र एकता अखंडता बर, भीमराव जी आस।

अउ स्वतंत्रता न्याय प्रतिष्ठा, सामाजिक विश्वास।।


जग समता के पाठ पढ़ाइस, अलख जगाइस ज्ञान ।

न्याय दिलाइस दलित वर्ग ला, रख के समता ध्यान।।


पद्मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

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: *संविधान दिवस*

*सार छंंद*


भारत के संविधान बड़का, सबो देश ले हावय।

पावन हे भारतवासी बर, अधिकार सबो पावय।। 


सब ला दे हवय बरोबर हक, चाहे वो नर-नारी।

जात-धरम के रक्षा करथे, नइ कखरो बर भारी।।

स्वास्थ्य काम अउ शिक्षा देथे, गंगा पावन हावय।

पावन हे भारतवासी बर, अधिकार सबो पावय।। 


भीम राव कानून बनादिस, अधिकार सबो मिलगे।

ऊँच नीच ला पाटिस एहा, सब के जिनगी खिलगे।।

भीम राव ले बढ़िया हावन, भगवान इही हावय।

पावन हे भारतवासी बर, अधिकार सबो पावय।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

 *पाली जिला कोरबा*

     *सत्र 14*

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*संविधान*

(सार छंद)


*हमर देश मा कलकल बहिथे,संविधान के धारा।*

*स्वतंत्रता अउ समानता हे,जेकर दुई किनारा।।*


*भेदभाव हा धर्म-पंथ के,चिटको नइये जेमा।*

*लोकतंत्र के फुलवारी हा, ममहाथे जी एमा।।*


*जनता ले जनता बर शासन,जनता भाग्य विधाता।*

*अपन भाग्य के सिरतो मा तो, जनता हे निर्माता।।*


*डाक्टर भीमराव  के खाँटी,चिंतन के चंदन हे।*

*भारत माँ के शब्द-शब्द मा, जय-जय अउ वंदन हे।।*


*सब बर हावय एक बरोबर,ये कानून हमर तो।*

*आय खजाना एहा सुख के, हिरदे भीतर भर तो।।*


*हे पुकार बापू के जेमा, लौह पुरुष के वाणी।*

*हिंद निवासी कोटि-कोटि बर, ये गंगा कलियाणी।।*


*संविधान के पालन बर तो, 'बादल' माथ नवाथे।*

*जेकर घन  शीतल छँइहा मा , जन-जन बइठ थिराथे।।*



चोवा राम वर्मा 'बादल'

छंद के छ परिवार,छत्तीसगढ़

साधक-- सत्र 2

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*विषय--- संविधान (दोहा छंद)*



संविधान सिरजन करिस,  बाबा भीम महान ।

अइसन विधिवत ग्रंथ ला, सबले बड़का जान ।।१


भेद-भाव ला टार के, दे मौलिक अधिकार ।

दलित पूत सिरजे हवय, संविधान  के  सार ।।२


बनगे हावय न्याय हा, शोषित जन के मान ।

जात- पात ला तँय हरे,  दिए सबो ला ज्ञान ।।३


दलित मसीहा तँय हवस, जन-जन कर्णाधार ।

संविधान तँय हा गढ़े,  करे  हमर  उद्धार ।।४


हम भारतवासी सबो, सदा करन सत्कार ।।

बाबा अरजी तुम सुनव, वंदन  बारंबार ।।५



    *मुकेश उइके "मयारू"*

    *साधक--सत्र 16*

    *चेपा(बकसाही)पाली जिला-कोरबा*

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] बाल्मीकि साहू 17: दोहा छंद


भारत भुइँया मा सदा, होवय जनता राज।

जुरिया पुरखामन करिन, संविधान के काज।।


नोनी बाबू सब करव, संविधान के मान।

ये ला तुम सब जानहू, हमर देश के जान।।


सब झन के मन मा रहय, बरोबरी के भाव।

संविधान मरहम लगे, मिटय विषमता घाव।।


जात पात के डोर ला, दीदी भइया तोड़।

संविधान ला जान के, सब ल हाथ तँय जोड़।।


संविधान बनगे हवय, जस माला के डोर।

जनता मन ह गुँथाय तस, मोती ओरी ओर।


बाल्मीकि साहू🙏

छंद के छ परिवार

साधक-सत्र 17

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 💐💐संविधान के बाट बता जा 💐💐 


भीमराव अम्बेडकर, लिखे हिन्द संविधान ।

शिल्पकार भारत सुदिन, कानूनी विद्वान ।। 


तोर बाट ला मनुख भुलागे ।

अब तो निच्चट कलउ उखरागे ।।

सबके मन मा भेद भरे हे ।

अंते-तंते मंत्र धरे हे ।। 


बिगन बूझे जाने चिचियाथे ।

आने ताने गाना गाथे ।।

फँसत हवै बैरी के फाँसा ।

समझ न पावत ओकर झाँसा ।। 


मनखे गढ़ के नावा नारा ।

भुला गये हे तोर तियारा ।।

भेद भाव के खोदत खाई।

सपना करके राई-छाई।। 


तोर नाम ला करके आगे ।

कोनो स्वारथ साधन लागे ।।

एक बेर अउ बाबा आजा ।

संविधान के बाट बता जा ।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

साधिका सत्र ८

रायपुर छत्तीसगढ़

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: *संविधान दिवस*


आल्हा छंद


भीमराव संविधान बनाके, करिन देश बर बड़ उपकार।

रक्षा बर कानून चलत हे,यही देश के हे आधार।1


ऊँच नीच के खाई पाटे, दे हावँय समता अधिकार।

सब झन बर कानून एक हे,राजा हो या सेवादार।2


पारित होइस हवय सभा मा,ये संविधान ह सन उनचास।

तारीख रहिस छब्बीस नवम्बर,ये दिन बनगे अब्बड़ खास।3


किसम किसम के अनुसूची हे,अबड़ अकन हवय अनुच्छेद।

जाति धरम भाखा कोनो हो,पर मनखे मन मा नइहे भेद।4


ये विधान ला सबझन मानँय,भारत भुइयाँ करय विकास।

सब ला सम अधिकार मिले हे,चारो कोती हवय उजास।5।


बहुत बड़े संविधान हवय जी,होय विश्व मा अब्बड़ मान।

हमर एकता समता प्रभुता,नित होवत हे जन मन गान ।6


सागर से पर्वत तक जानव,  भुइयाँ से जानव आकाश।

अइसे अइसे नियम बने हे,जइसे सुई ल करे तलाश।।7


भीमराव के परसादे मा फूले शिक्षा अउ व्यापार।

बनगे हे कानून व्यवस्था,नर नारी बर सम अधिकार।8


जगत ऋणी हे तोरे बाबा,भीमराव जी पूज्य महान।

जब तक ये दुनिया हा रहही,बाबा के होही यशगान।9



आशा देशमुख

एनटीपीसी कोरबा

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संविधान-रूप घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                   1

मीत मया ममता के,सत सुख समता के।

दीन हीन रमता के,संविधान हे आधार।।


जिनगी ला गढ़े बर,आघू कोती बढ़े बर।

घूमे फिरे पढ़े बर, देय हवे अधिकार।।


उड़े बर पाँख हरे,अँधरा के आँख हरे।

ओखरोच आस हरे,थक गेहे जौन हार।।


सिढ़ही चढाये ऊँच,दुख डर जाये घुँच।

हाँसे जिया मुचमुच,होय सुख के संचार।।1


                    2

गिरे थके अपटे ला,डर डर सपटे ला।

तोर मोर के बँटे ला,थामे हवै संविधान।।


सुख समता के कोठी,पबरित एहा पोथी।

इती उती चारो कोती,जामे हवै संविधान।।


मुखिया के मुख कस,ममता के सुख कस।

छायादार रुख कस,लामे हवै संविधान।।


खुशनुमा हाल रखे,ऊँच नाम भाल रखे।

सबके खियाल रखे,नामे हवै संविधान।।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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Friday, November 5, 2021

देवारी परब विशेष छंदबद्ध कविता


देवारी परब विशेष छंदबद्ध कविता

*सरसी छंंद*
अनुज छत्तीसगढिया
               *(१)*
जगमग दीया के देवारी, आथे बने तिहार।
लीप-पोत के फूल सजाथें, घर अँगना अउ द्वार।। 

सबो जलाथें देवारी मा, दीया ओरी-ओर।
गली-खोर दिखथे चकचक ले, चारों मुड़ा अँजोर।। 

लक्ष्मी दाई के पूजा कर, करथें सब गुणगान।
नरियर अउ फल-फूल चढ़ाके, लेथें धन वरदान।।

                *(२)*

करौ दिखावा झन तुम संगी, देवारी के नाम।
चीज अगरहा अब झन लेवव , जेकर नइ हे काम।। 

मया बाँट के देवारी मा, भेदभाव लौ टार।
बारौ दीया ओखर घर मा, जेन हवय लाचार।। 

झन फोड़व गा तुमन फटाका, पर्यावरण बचाव।
सबो सादगी ले देवारी, मिलके बने मनाव।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*
  पाली जिला कोरबा
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 सरसी छंद-संगीता वर्मा
देवारी

धन तेरस मा यम के दियना,जुरमिल सुघर जलाव।
चौदस मा सब बड़े बिहनिया,उबटन सबो लगाव।।

माँ लक्ष्मी के कृपा बरसही,मिलही तब धन-धान।
दीप जलावव मानवता के,पाहू बड़ सम्मान।।

साफ सफाई कचरा कोरा,मनखे मन ले झार।
माँ लक्ष्मी हा तभे विराजे,दिखे साफ घर द्वार।।

गली खोर अउ धनहा डोली,दिखही बने उजास।
जगमग जगमग दीप जलाहू,होही पूरी आस।।

हवय बधाई देवारी मा,देवव मया दुलार।
सबे खूँट दियना जगमग हो,  होवय जग उजियार।।

आगे हावय देवारी अब,सजगे हे बाजार।
किसिम-किसिम के जिनिस हवय जी,अउ लक्ष्मी के हार।।

चंदैनी कस रिगबिग रिगबिग,दियना के भरमार।
रंग-रंग के रंगोली मा,सजत हवय घर द्वार।।

संगीता वर्मा
अवधपुरी भिलाई
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 दुर्मिल सवैया- गुमान प्रसाद साहू 
।।राम घर आगमन।।
सजगे अँगना घर खोर गली सब मंगल दीप जलावत हे।
बनवास बिता रघुनन्दन राम सिया अउ लक्ष्मण आवत हे।
खुश हे जनता नगरी भर के प्रभु के जयकार लगावत हे।
सब देव घलो मन फूल धरे प्रभु के पथ मा बरसावत हे।।  

साधक सत्र- 6 
गुमान प्रसाद साहू 
ग्राम- समोदा (महानदी),रायपुर 
छत्तीसगढ़
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विजेन्द्र: घनाक्षरी

सब ला जय जोहार,आय हावय तिहार।
नवा राज के बने ले,मन मुसकात हे।
हमर राज के शान,गुरतुर बोली जान।
हवै अबड़ मिठास,मया ला बढ़ात हे।
संस्कृति अउ संस्कार, बोहावत मया धार।
ए माटी ला सब झन,तिलक लगात हे।
हरे धान के कटोरा,मोर भुइयाँ के कोरा।
लोहा कोइला हीरा हा,भाग चमकात हे।

विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव(धरसीवाँ)
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 विजेन्द्र: सरसी छंद
परब आय हे सुघर देवारी,बाँटव सब ला प्यार।
परहित सेवा मा अरपन हो,जिनगी के दिन चार।।

जले ज्ञान के दीप सुघर जी,होय जगत उजियार।
येकर लौ मा सबो जघा ले,भागय द्वेष विकार।।

काम क्रोध मद लोभ मोह मा,डूबव झन तो आज।
बना मुक्ति के मारग अपने,करके जन हित काज।।

नदियाँ नरवा कस छलकय बड़,मया पिरित के धार।
लहर लहर लहरावय जइसे,हरियर खेती खार।।

धन्य धन्य हो जावयँ भुइयाँ, भाई चारा देख।
लामे राहय सुमता डोरी,गढ़व अइसन लेख।।

मानुष तन भागी ला मिलथे,मत बन तँय अनजान।
सत के रसता धरे चलव अउ,दीप जलावव ज्ञान।।

नाँव इहाँ दियना के होथे,बाती हा जलथे हर बार।
नमन करत अउ जलय तेल हा,दियना के जयकार।।

अपन अपन किस्मत हावय जी,मिलके करव अँजोर।
जउँने महिनत करथे जग मा,होथे वोकर शोर।।

विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव (धरसीवाँ)
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घनाक्षरी- जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

कातिक के अँधियारी, चमकत हवै भारी।
मन मोहे सुघराई, घर गली द्वार के।।
आतुर हे आय बर, कोठी मा समाय बर।
सोनहा सिंगार करे, धान खेत खार के।।
सुखी रहे सबे दिन, मया मिले छिन छिन।
डर जर दुख दर्द, भागे दूर हार के।।
मन मा उजास भरे, सुख सत फुले फरे।
गाड़ा गाड़ा हे बधाई, देवारी तिहार के।।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


देवारी त्यौहार के, होवत हावै शोर।
मनखे सँग मुस्कात हे, गाँव गली घर खोर।
गाँव गली घर खोर, करत हे जगमग जगमग।
करके पूजा पाठ, परे सब माँ लक्ष्मी पग।
लइका लोग सियान, सबे झन खुश हे भारी।
दया मया के बीज, बोत हावय देवारी।


भागे जर डर दुःख हा, छाये खुशी अपार।
देवारी त्यौहार मा, बाढ़े मया दुलार।।
बाढ़े मया दुलार, धान धन बरसे सब घर।
आये नवा अँजोर, होय तन मन सब उज्जर।
बाढ़े ममता मीत, सरग कस धरती लागे।
देवारी के दीप, जले सब आफत भागे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

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कुंडलिया (सुरहुत्ती)

सुरहुत्ती मा सुर मिलय, मिलय सबो के राग।
चिटिक कनो छरियाय झन, रहय मया के पाग।
रहय मया के पाग,करी के लाड़ू जइसन।
मिलय खुशी भरमार,नँगत उत्साह भरे मन।
लक्ष्मी आय दुवार, सुरुज सुख लावय उत्ती
धन दौलत शुभ लाभ,दून देवय सुरहुत्ती।

आप सब ला सुरहुत्ती (लक्षमी पूजा) के नँगत नँगत बधाई।
-मनीराम साहू 'मितान'
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Monday, November 1, 2021

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के सुअवसर म, छंदबद्ध कविता

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के सुअवसर म, छंदबद्ध कविता
 

घनाक्षरी


सब ला जय जोहार,आय हावय तिहार।

नवा राज के बने ले,मन मुसकात हे।

हमर राज के शान,गुरतुर बोली जान।

हवै अबड़ मिठास,मया ला बढ़ात हे।

संस्कृति अउ संस्कार, बोहावत मया धार।

ए माटी ला सब झन,तिलक लगात हे।

हरे धान के कटोरा,मोर भुइयाँ के कोरा।

लोहा कोइला हीरा हा,भाग चमकात हे।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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 डी पी लहरे: सार छन्द गीत


हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।

जनम पाय हन ए माटी मा,भाग सबो के जागे।।


हमर राज के बोली भाखा,अंतस मा बड़ पोहय।

पंथी करमा सुवा ददरिया,सबके मन ला मोहय।।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति हा,सउँहे जग मा छागे।

हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।


चटनी बासी खाके संगी,जाँगर टोर कमाथन।

धान कटोरो तभे कहाथे,धान बिकट उपजाथन।।

बंपर उत्पादन ले अब तो,तन मन हा हरियागे।

हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।


आनी-बानी इहाँ परब ला,जुरमिल बने मनाथन।

भेद-भाव मन मा नइ राखन,दया मया बरसाथन।।

आगर झलके दया-मया ले,बैर- भाव दुरिहागे।।

हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।


जंगल झाड़ी नदी पहाड़ी,मन भावन फुलवारी।

किसम किसम के माल खजाना,उत्पादन हे भारी।

होवत हे बड़ इहाँ तरक्की,नवा सुरुज हा आगे।

हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।


डी.पी.लहरे"मौज"

कवर्धा छत्तीसगढ़

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: मनहरण घनाक्षरी - बोधन राम निषादराज


*छत्तीसगढ़ महतारी*


हरियर  खेती  खार,  बने  डोंगरी   पहाड़,

दुलहिन कस  दिखै, दाई  के  सिंगार  हा।

सोना चाँदी हीरा मोती,जेती देखौ तेने कोती,

अन्न  धन  सबो  इहाँ, भरे  हे भंडार  हा।।

इहाँ छत्तीसगढ़िया, दुनिया  ले  हे  बढ़िया,

मानत हे  लोहा  देखौ, जम्मों  संसार  हा।

बाँधा बने बड़े बड़े,बिजली के खम्भा गड़े,

जगमग  गली - खोर,  चमकै   दुवार  हा।।


बोधन राम निषादराज🙏

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छत्तीसगढ़ महतारी

(लावणी छंद)


झलकत हे इक्कीस बरस के, तोर तेज हा मुखड़ा मा।

माथ मटुकिया रुपिया सूँता,  बहुँटा अउ हाथ कड़ा मा। 

अरपा पैरी महानदी के, निरमल पानी गुन गाथे।

बस्तर के घन छँइहा बइठे, सुख हा सिरतो सुख पाथे।


राजिम सिरपुर अउ गिरौद मा, महिमा के चिनहा भारी।

चंद्रखुरी के रहिस दुलौरिन, रामचंद्र के महतारी।

माँ गंगा झलमला बिराजे,धाम रतनपुर महमाई।

राँवाभाँठा के बंजारी,डोंगरगढ़ के बमलाई।


हे खदान करिया सोना के, भंडार भरे लोहा के।

जगा जगा सिरमिट के पथरा, मिल हे उसना पोहा के।

छलकत रइथे धान कटोरा, भरे भरे कोठी रहिथे।

भाईचारा अउ सुन्ता के,फुरहुर पुरवइया बहिथे।


करमा सीख करम के देथे, दरद ददरिया हा हरथे।

राउत नाँच सुआ पंथी हा, अंग अंग मा रस भरथे।

रीत रिवाज सबे हे सुंदर, मँदरस कस मीठा बोली।

तीजा पोरा परब हरेली,देवारी झमकत होली।


निसदिन जाँगर पेर कमइया, हे सपूत सरु हलधरिया।

मन के उज्जर सच के संगी, भले हवै तन हा करिया।

तोर पाँव मा माथ नवावँव,मोर छत्तीसगढ़ महतारी।

अबड़ फबे धाने के बाली, देवी तैं हँसिया धारी।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,  छत्तीसगढ़

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 सार छन्द - श्री सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'


राज्योत्सव गीत 


छत्तीसगढ़ के महिमा गौरव, पढ़व-लिखव अउ गावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव, परब तिहार मनावव।


छत्तीसगढ़ पावन माटी मा, होइन ज्ञानी ध्यानी।

साधू संत समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी।


पॅंउरी मा उनकर श्रद्धा के, आरुग फूल चढ़ावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव, परब तिहार मनावव।


महिनत के ममहावत माटी, धुर्रा लागय चंदन।

सुमता के सुखसागर एला, हावय सौ-सौ बंदन।


धन हे धान कटोरा जस ला, दुनिया मा बगरावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव, परब तिहार मनावव।


परब हरेली तीजा पोरा, सुरहुत्ती देवारी।

गुरू जयन्ती मानौ जे छत्तीसगढ़ राज-चिन्हारी।


खुरमी चवसेला गुड़ चीला, फरा ठेठरी खावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव परब तिहार मनावव।


नॉंगर बइला साजौ बॉंधौ, ये नवनसिया ट्रैक्टर।

दउरी बेलन फॉंदौ नइते, ले लानव हार्वेस्टर।


करही मदद मशीन महाबल, खुश हो मजा उड़ावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव, परब तिहार मनावव।


धरम-करम के उज्जर कारज, होवय गॉंव-गली मा।

जिनगानी सद्भाव सुमत धर, गुजरय हली-भली मा।


सुवा-गीत करमा पंथी गा, नाच भुजा मटकावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव, परब तिहार मनावव।


छत्तीसगढ़ मइयॉं के पइयॉं, इंद्रावती पखारय।

अरपा पैरी महानदी मन ॲंजुरी मा जल ढारॅंय।


हाथ बढ़ा के भक्ति चढ़ा के, चरणामृत ला पावव।

आ गय एक नवम्बर उत्सव,परब तिहार मनावव।


रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के बहुत बहुत बधाई।।


छत्तीसगढ़ी बानी(लावणी छंद)- जीतेंन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।

पी के नरी जुड़ा लौ सबझन, सबके मिही निशानी अँव।


महानदी के मैं लहरा अँव, गंगरेल के दहरा अँव।

मैं बन झाड़ी ऊँच डोंगरी, ठिहा ठौर के पहरा अँव।

दया मया सुख शांति खुशी बर, हरियर धरती धानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।।।।।


बनके सुवा ददरिया कर्मा, माँदर के सँग मा नाचौं।

नाचा गम्मत पंथी मा बस, द्वेष दरद दुख ला काचौं।

बरा सुँहारी फरा अँगाकर, बिही कलिंदर चानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


फुलवा के रस चुँहकत भौंरा, मोरे सँग भिनभिन गाथे।

तीतुर मैना सुवा परेवना, बोली ला मोर सुनाथे।

परसा पीपर नीम नँचइया, मैं पुरवइया रानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।


मैं गेंड़ी के रुचरुच आवौं, लोरी सेवा जस गाना।

झाँझ मँजीरा माँदर बँसुरी, छेड़े नित मोर तराना।

रास रमायण रामधुनी अउ, मैं अक्ती अगवानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


ग्रंथ दानलीला ला पढ़लौ, गोठ सियानी धरलौ जी।

संत गुणी कवि ज्ञानी मनके, अंतस बयना भरलौ जी।

मिही अमीर गरीब सबे के, महतारी अभिमानी अँव।

मैं छत्तीसगढ़ी बानी अँव, गुरतुर गोरस पानी अँव।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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लावणी छंद गीत- दिलीप कुमार वर्मा


पुरखा मन के सपना दाई, आवत बेरा लागिस ओ  

एक नवम्बर दो हजार के, भाग हमर हर जागिस ओ। 


छत्तीसगढ़ हे नाम ह दाई, छत्तीसगढ़ही बोली हे। 

तोर अंग मा पर्वत जंगल, धनहा भाठा डोली हे। 

छत्तीसगढ़िया के मिहनत ले, घोर अँधेरा भागिस ओ। 


 हरियर लुगरा तन मा पहिरे, अछरा हर लहरावत हे। 

सुआ ददरिया कर्मा पंथी, पडकी मैना गावत हे। 

नाचत कूदत जिनगी लागे, अब सुराज हर आगिस ओ। 


तोर सवाँगा खातिर दाई, गाँव सड़क चमकावत हन। 

तोर प्यास बर पानी खातिर, नदिया बांध बनावत हन। 

तोर दिए हीरा लोहा ले, कोठी हमर भरागिस ओ। 


कोना-कोना के विकास बर, जिला बने बत्तीस हवय। 

पर बस्तर अबतक नइ सुधरे, तेखर हमला टीस हवय।  

अपने भाई बहिनी ऊपर, गोला काबर दागिस ओ। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा

बलौदाबाजार

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.हेम के कुकुम्भ छंद


जय छत्तीसगढ़ मोर माटी, जग बर हावच वरदानी।

सबले बढ़िया तोला कहिथे, तोरो हे गजब कहानी।।

सब दुख पीरा तही हरैया, तोला सब माथ लगाथे।

तोर शरण मा रहिके दाई, सुघ्घर जिनगी ल पहाथे।।


तोर हवे ये भुइँया पावन, बसे देवता अउ धामी।

गाँव गाँव माहामाया अउ, बसे राम अन्तर्यामी।।

घर घर रामायण बाचत हे, बहे ज्ञान गंगा गीता।

पावन हवे इहाँ के नारी, पूजे जस लक्ष्मी सीता।।


बगरे हावय खनिज सम्पदा, देख इहाँ कोना कोना।

हीरा मोती के खदान हे, भरे पड़े चाँदी अउ सोना।।

कतको हावय बड़का बड़का, देखव इहाँ कारखाना।

काम करे बाहर ले आवय, इहाँ बनावय ग ठिकाना।।


देख कला संस्कृति ला सँजोय, पावन हवे तोर माटी।

तोरच कोरा मा लइका मन, खेलय भँवरा अउ बाँटी।।

रंग बिरंगी चिरई चिरगुन, जिनकर गुरतुर हे बोली।

आनी बानी के जीव जन्तु, पाबे तँय टोली टोली।।


नाचा गम्मत लोगन मनके, देख खूब मन ला भावे।

सुवा ददरिया करमा पंथी, राग भरथरी जब गावे।।

मातर मड़ई मेला बर जी, गाँव गाँव राउत जागे।

नाच नाच के पारे दोहा, कतका सबला निक लागे।।


धान चना गेहूँ उपजाथस, अउ उपजाथस उँनहारी।

जय छत्तीसगढ़ मोर माटी, महिमा हवे तोर भारी।।

सबले बढ़िया तोला कहिथे, तोरो हे गजब कहानी।।

जय छत्तीसगढ़ मोर माटी, जग बर हावच वरदानी


-हेमलाल साहू

छंद साधक सत्र -1

ग्राम-गिधवा, पोस्ट नगधा

जिला बेमेतरा (छ. ग.)

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छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के गाड़ा गाड़ा बधाई।


दया मया के बँधना बाँधव,मँदरस कस रस घोरव।

मत हिचकौ अब तुमन भइया,छत्तीसगढ़ी मा बोलव।


राज आय हे काज होवय जी,मिलै नवा पहिचान।

बोली भाखा हमर राज के,पावय सुग्घर मान।


आखर आखर जोड़ जोड़ के,भाखा करिन सजोर।

साहित के दुनिया मा बगरै,छत्तीसगढ़ी भाखा के शोर।


मान बढ़ाथे महतारी के,हमर छत्तीसगढ़ी बोल।

अंतस मा अब रचे बसे हे,कखरो से झन तोल।


पढ़े लिखे हन इही माटी मा,बघारव झन गा अब सेखी।

इहें तुँहर गड़े हे नेरवा,करव झन गा अनदेखी।


जेकर कोरा मा बइठे हे,धरती के भगवान।

ओ भुइँया ला माथ नवाथन,जम्मो येकर संतान।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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*हमर छतीसगढ़ी महतारी के नवा रूप के कुकुभ छंद में कल्पना*


नवा सँवागा मा निखरत हे,छतीसगढ़ी महतारी ।

रूप देख के तोरे दाई,मँय जावँव ओ बलिहारी ।1


एक हाथ मा ज्ञान धरे हे,एक हाथ मा बाली हे।

धान कटोरा भरे लबालब,सबो डहर खुशहाली हे।2


कलम सियाही धरके दाई,तहुँ हर वेद रचाए ओ।

आखर आखर मंत्र बनत हे,सबके मन ला भाए ओ।3


तँय हिंदी के राज दुलौरिन ,राज तिलक होवत हावै।

बड़े बड़े ज्ञानी पंडित मन, महिमा तोर लिखत हावैं। 4


अमरित तोरे जिभिया भीतर,कंठ कोयली के बानी।

मस्तुरिया के गीत गोठ मा ,तोरे ओ अमर कहानी।5

कब तक चुप रहिबे वो दाई,मंत्र ज्ञान हे कोरा मा।

जागत हे तोरे बेटा मन,भरही सुख अब बोरा मा।6


मुकुट पहिनबे हीरा के वो,सँथरा मा राजा थारी।

महर महर अँगना ममहाही ,गहदत हे अब फुलवारी।7


आशा देशमुख

एनटीपीसी कोरबा

छतीसगढ़

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