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Thursday, December 23, 2021

राष्ट्रीय किसान दिवस विशेष






 राष्ट्रीय किसान दिवस विशेष

धान लुवाई- सार छंद


पींयर पींयर पैरा डोरी, धरके कोरी कोरी।

भारा बाँधे बर जावत हे, देख किसनहा होरी।।


चले संग मा धरके बासी, धान लुवे बर गोरी।

काटय धान मढ़ावय करपा, सुघ्घर ओरी ओरी।


चरपा चरपा करपा माढ़य, मुसवा करथे चोरी।

चिरई चिरगुन चहकत खाये, पइधे भैंसी खोरी।


भारा बाँधे होरी भैया, पाग मया के घोरी।

लानय भारा ला ब्यारा मा, गाड़ा मा झट जोरी।


बड़े बगुनिया मा बासी हे, चटनी हवै कटोरी।

बासी खाये धान लुवइया, मेड़ म माड़ी मोड़ी।


हाँस हाँस के सिला बिनत हें, लइकन बोरी बोरी।

अमली बोइर हवै मेड मा, खावत हें सब टोरी।


बर्रे बन रमकलिया खोजे, खेत मेड मा छोरी।

लाख लाखड़ी जामत हावय, झटकत हवै चनोरी।


आशा के दीया बन खरही, बाँटे नवा अँजोरी।

ददा ददरिया मन भर झोरे, दाइ सुनावै लोरी।


महिनत माँगे खेत किसानी, सहज बुता ए थोरी।

लादे पड़थे छाती पथरा, चले न दाँत निपोरी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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गीतिका छंद


रोज सबके पेट भरथे,अन्न ला उपजाय जी।

दाम नइये मेहनत के,देख चिंता खाय जी।।

शीत बरसा घाम बादर,रोज बिकटे काम हे।

भूख सहिथे खून जलथे,हाय नइ आराम हे।।


मनहरण घनाक्षरी


धरके राँपा कुदारी,काम करे बड़ भारी,

खेत मुही पार खाँचे,जावय किसान गा।

खेत खार ला साधत,मुही पार ला बाँधत,

काँटा खूँटी चतवार,जमावत धान गा।।

पहिरे हे बड़े पागा,छूटही कइसे लागा,

मन सोचत जात हे,उमर ढलान गा।

करथे अबड़ काम,तभो होथे बदनाम,

पालत पोषत इहाँ,सकल जहान गा।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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छलत रही दुनिया मा कब तक, संगी मोर किसान।

नाम बड़े अउ दर्शन छोटे, भुइँया के भगवान।।


करके लागा बोड़ी बपुरा, करथे खेती काम।

तरस एक दाना बर जाथे, अनदाता बस नाम।।


बीज भात अउ खातू महँगा, धरे मूड़ ला रोय। 

बेमौसम बरसा के सेती, नास फसल मन होय।।


होवय बरसा चाहे गरमी, लागय चाहे जाड़।

रोज कमाना काम इँखर हे, टूटत ले जी हाड़।।


भूखे प्यासे कई दिनन ले, बपुरामन सह जाय।

साथ देय जब ठगिया मौसम, तब दाना कुछ पाय।।


बिचौलियामन नजर गड़ाये, रहिथे रस्ता रोक।

औने पौने भाव म लेके, उनमन बेचय थोक।।


हे किसान मन के सेती जी, फलत फुलत व्यापार।

अँधरा बहरा देख बने हे, तब्भो ले सरकार।।


लदे पाँव सिर ऊपर कर्जा, बनके गड़थे शूल।

अइसन मा का करही बपुरा, जाथे फाँसी झूल।।


सुख सुविधा हा सदा इँखर ले, रहिथे कोसों दूर।

भूख गरीबी लाचारी मा, जीये बर मजबूर।।


करव भरोसा झन कखरो तुम, बनव अपन खुद ढ़ाल।

अपन हाथ मा जगन्नाथ हे, तभे सुधरही हाल।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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किसान - मनहरण घनाक्षरी - विरेन्द्र साहू


उठके बड़े फजर, नाँगर बइला धर, दुनिया के सुख बर, जूझे घाम प्यास ले।

दिन-रात एक करे, सपना सुग्घर धरे, पर बर मर मरे, धरम विश्वास ले।

जग झन भूख मरे, सोच के जतन करे, भुँइया के पाँव परे, श्रम अरदास ले।

जीव-जंतु के मितान, नाम तोर हे किसान, सिरतों मा तोर काम, ऊँच हे अगास ले।


विरेन्द्र साहू बोड़राबांधा (गरियाबंद)

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*करव‌ अन्न के मोल(दोहा गीत)*


करव‌ अन्न‌ के मोल‌ जी, काम हरय ये नेक।

लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।


सहिके घाम किसान मन, करथें खेत तियार।

घेरी बेरी जोंतथें, खातू माटी डार।

बोये बर दिन रात उँन, कर दथें जी एक।

लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।


नींद कोड़ चत्वारथें, पानी खूब पलाँय।

बरसा झड़ी धुँकान मा, भींजत ठुठर कमाँय।

करथें उँन‌ जी प्रान‌ दे, रइथे बुता जतेक।

लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।


फसल‌ कहूँ अब पाकगे, लुवई मिँजई काम।

खँटथे नित दिन जाड़ मा, मिलय नही आराम।

समझव गुनव किसान सब, सहिथें दरद कतेक।

लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।

- मनीराम साहू 'मितान'

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विजेन्द्र: गीतिका छंद


रोज सबके पेट भरथे,अन्न ला उपजाय जी।

दाम नइये मेहनत के,देख चिंता खाय जी।।

शीत बरसा घाम बादर,रोज बिकटे काम हे।

भूख सहिथे खून जलथे,हाय नइ आराम हे।।


मनहरण घनाक्षरी


धरके राँपा कुदारी,काम करे बड़ भारी,

खेत मुही पार खाँचे,जावय किसान गा।

खेत खार ला साधत,मुही पार ला बाँधत,

काँटा खूँटी चतवार,जमावत धान गा।।

पहिरे हे बड़े पागा,छूटही कइसे लागा,

मन सोचत जात हे,उमर ढलान गा।

करथे अबड़ काम,तभो होथे बदनाम,

पालत पोषत इहाँ,सकल जहान गा।।


जाँगर सन मितानी,काम खेती औ किसानी,

खेत खार के माटी मा,बसथे जी प्रान हे।

कमाथे तभे गुजारा,पेट पोंचवा बेचारा,

धुर्रा माटी मा सनाय,रहिथे किसान हे।।

सबके क्षुधा मिटाथे,धान-पान उपजाथे,

जिनगी तको उँकर,मरी औ मसान हे।

खाँय करम कमाई,जग के करै भलाई,

सेवा मा उमर बीतै,नइतो गुमान हे।।



विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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 बरवै छंद......

बिषय....किसान


करय किसानी जी भर, पावय मान।

धान उगावय कतको,हावय ज्ञान।


बिनहा उठके नाँगर,धरके जाय।

बइला फाँदय सरपट,अउ दौडाय।


मुही बाँध जल रोकय,धान उगाय।

खातू माटी डारय,फसल पाय।


धरे अँगाकर रोटी,खाय अथान।

बासी चटनी बढि़या,मिलके खान।


राँपा गैती धरके, चलै किसान।

नाँगर बइला हँसिया, सब पहिचान।


पागा खुमरी खापय, घाम बचाय।

करय किसानी बढि़या,रंग जमाय।


अन्न दान बड़ करथे, सब उपजाय।

कोठी भर भर राखय,बड़ धन पाय।


जाँगर टोर कमावय,सोन उगाय।

मिहनत के बल मा वो,नाम कमाय।


चिखला माटी रेंगय,सदा सनाय।

माथ लगावय धूर्रा, मया बताय।


*धनेश्वरी सोनी गुल*✍️✍️

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गुमान साहू: अरविंद सवैया- 

।।किसान।।

कुकरा जब बासय जावय खेत म साँझ भये ग तभे घर आय।

मजदूर किसान ह पेट भरे बर जाँगर पेर ग खूब कमाय।

धर नाँगर जोत किसान सबो दय बंजर भूमि म सोन उगाय।

भरथे जग के  सब पेट उही भुइयाँ म तभे भगवान कहाय।।


-गुमान प्रसाद साहू 

समोदा (महानदी) ,रायपुर

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 हरिगीतिका छंद - बोधन राम निषादराज

(भुइयाँ के भगवान)


भुइयाँ बिराजे देख लौ,करथे किसानी काम ला।

एला कथे भगवान जी,सहिथे अबड़ जे घाम ला।।

बरसा रहै सर्दी रहै,बड़ भोंभरा रख पाँव ला।

बड़ काम करथे रात दिन,नइ खोजथे सुख छाँव ला।।


चिखला मताके खेत मा,अन सोन कस उपजात हे।

बासी पसइया नून ला,धर खार मा वो खात हे।।

ट्रेक्टर तको आगे तभो,बइला कमावै साथ मा।

कतको मशीनी छोड़ के,नाँगर चलावै हाथ मा।।


छत्तीसगढ़ भुइयाँ हमर,सोना कटोरा धान के।

कर लौ इँखर सम्मान ला,भगवान इन ला जान के।।

सब पेट भर खावत हवौ,इँखरे भरोसा प्रान हे।

दुख दर्द ला समझौ सबो,जग मा तभे तो मान हे।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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आशा देशमुख: किसान दिवस


तुँहर पसीना के कीमत ला ,कोनो नइ पहिचानै।

हे किसान हो तुँहर दरद ला ,धरती दाई जानै।


 साँझ बिहनिया एक बरोबर, घाम जाड़ हे संगी।

जग के थारी अन्न भरत हव,  तुँहरे घर मा तंगी।।


सुरुज देव ले पहली निशदिन ,तुँहर करम हा जागे।

हाथ पाँव के सुमत देख के, आलस दुरिहा भागे।।


बादर अउ आँखी के पानी ,जइसे बदे मितानी।

रहय नमक गुड़ एक तराजू, बीच झुलय जिनगानी।।


नांगर बइला रापा गैंती, हावय तुँहर चिन्हारी।

मिहनत हा जब संग रहय तब, हाँसय खेती बारी।।


लोहा के जुग जब ले आये, माटी बनथे सोना।

अब मशीन मन बइठे हावँय, जग के कोना कोना।।


ट्रेक्टर थ्रेसर हार्वेस्टर सब , मिलके करँय किसानी।

उन्नत खेती पोठ बीज मन, सुघ्घर लिखंय कहानी।।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा


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 लीलेश्वर देवांगन,बेमेतरा: शक्ति छंद


इहाॅ के किसानी,हवय‌ शान जी

उगाथे सदा वो,चना धान जी ।

करे सब किसानी,कमर तोड़ के

कभू नइ भगे वो, मुॅहू मोड़ के ।


रहे खेत मा अउ,सहे घाम ला 

पसीना‌‌ बहाके,करे‌ काम ला।

रखे ध्यान अड़बड़,अपन खेत के

तभे धान उपजे ,गजब नेत के।


लिलेश्वर देवांगन

गुधेली (बेरला)

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: किसान दिवस बर सादर

*भूमिपुत्र* 


भूमिपुत्र श्रमजीवी तैह, तोर जिनगी घाम जी।

उठ बिहनिया पटका बाँधे,तोड़  जाँगर काम जी।।


अन्नदाता अस विधाता,हे पछीना दाम जी।

सोन भुइयाँ होय माटी,धान लहिके लाम जी।

  

धर तुतारी खेत नाँगर,उही चारों धाम जी।

पेज भाजी देह पोषे,पाय जी आराम जी।।


कृषक जब्बर तोर छाती,श्रमिक आठों याम जी।

हाथ लउठी मूड़ पागा,साँझ बेरा राम जी।।


डाॅ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ


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दिलीप कुमार वर्मा 

चौपाई 


कुकरा बासत निकलय घर ले। काँध म नागर लौठी कर ले। 

बइला सँग मा जाय किसनहा। जोतय जाके डोली धनहा। 


तता तता अर्रावत रहिथे। जोर ददरिया गावत रहिथे। 

बइला सँग मा रहे मितानी। दोहा पारय आनी बानी। 


पाही ऊपर पाही बढ़जय। बेरा तक हर ऊपर चढ़जय।  

चेत कहाँ बेरा के राहय। खेत जोतना पूरा चाहय। 


तर-तर तर-तर बहय पछीना। पर साहस भर राखय सीना। 

बइला तक मन संग निभावयँ। पाही पाही जोते जावयँ। 


नरी सुखावय पीयय पानी। जाँगर पेरत करय किसानी। 

बासी धर बाई जब आवय। खाये बेरा ही सुसतावय। 


मिहनत ले ओ अन उपजाथें। सब ला देथे तब खुद खाथें।  

तभे अन्न दाता कहलाथें। देव असन सबझन हा भाथें। 


अपन हाथ मा काम अजब हे। आज काल तो दाम गजब हे।

भटके बर नइ लागय येती। खेती होथे अपनो सेती।


धन्य-धन्य तँय होय किसनहा। तोर रहत मुसकावय धनहा। 

तोरे देहे हम सब खावन। आज तोर सब महिमा गावन। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

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*किसान (दोहा छंद)*


हटर- हटर बूता करै, धूप  रहय  या  छाँव ।

मिहनत हावय संग मा, कभू थकय ना पाँव ।।१


भूख-प्यास तैंहा सहे, अउ सहथस जी घाम।

धनहा- डोली खेत हे,  करथस  खेती  काम ।२


सबके मीत किसान तँय, बोथस गेहूँ धान ।

धुर्रा- माटी तन लगे,  हवस देश के शान ।।३


पागा कलगी शान हे,  माटी तोर मितान ।

नांगर बइला संग मा, इही हवय पहिचान ।।४


कहिथें तोला सब इहाँ, भुइयाँ के भगवान ।

हे किसान मन के सदा, करथे जग गुणगान ।।५


   *मुकेश उइके "मयारू"*

   *छंद साधक- सत्र 16*

   *चेपा(बकसाही)पाली जिला-कोरबा(छ.ग.)*






Sunday, December 19, 2021

संत शिरोमणि बाबा घासीदास जयंती विशेष छंदबद्ध कविता


 संत शिरोमणि बाबा घासीदास जयंती विशेष छंदबद्ध कविता



: *मानव समाज बर संत शिरोमणि गुरु घासीदास बाबा जी के अमर कुछ संदेश * दोहा छंद* मा


*मनखे हर मखने रहे, छोड़े सबो कलेश।*

*जग ला राह दिखाय बर, घासी के संदेश।।*


1. *सतनाम को मानो*


सुग्घर सबले सार हे, जग मा जी सतनाम।

सत के रद्दा जे चलय, बन जय बिगड़े काम।।


2. *मूर्ति पूजा मत करो*


दाई बाबू देव हे, खोजव झन भगवान।

मन के जाला झार रख, मूरत अंतस मान।।


3.*जाति-पाति के प्रपंच से दूर रहो*


ऊॅंच नीच के भेद ला, मूरख मन छोड़।

प्रभु के हम संतान सब, मीत मया रख जोड़।।


4.*मॉंसाहार मत करो जीव हत्या मत करो*


जेवन जेवव जीव झन, बनके मॉंसाहार।

प्राकृति सम सुग्घर रखे, खुशी रहे संसार।।


5. पर स्त्री को माता मानो*


सरग बरोबर मातु के, हावै अॅंचरा छॉंव।

नारी के सम्मान ले, उज्जर रहिथे ठॉंव।।


6.*मदिरा सेवन मत करो*


पीयव झन दारू कभू, उजरे घर परिवार।

कुकुर सरी जिनगी रहे, बने सबो बर भार।।


7.*अपरान्ह खेत में मत जाओ*


जोत मझनिया खेत झन, थोड़कनी सुरताव।

बइला सॅंग सॅंग देह ला,  छइॅंहा बइठ जुड़ाव।।





*मानव समाज बर संत शिरोमणि गुरु घासीदास बाबा जी के अमरित बानी के कुछ संदेश * चौपाई छंद* मा



1. अमरित बानी

*सत्य ही मानव का आभूषण है*


घासी बाबा हावै कहना, सत्य नाम के पहिरव गहना।

हिरदे मा सतनाम बसाले, जाये के तॅंय राह बनाले।।


2. अमरित बानी

*मानव मानव एक समान*


मनखे मनखे सम तुम जानौ,भेद भाव झिन मन मा लानौ।।

बॉंटव समता भाई चारा, जात पात ला मेटव सारा।।


3. अमरित बानी

*गुरु बनाये जान के पानी पीये छान के*


अइसन गुरु के लेवल दीक्षा, करनी जेकर देवय शिक्षा।

करे अशिक्षा दुरिहा गुरुवर, मन मा भाव जगावय सुग्घर।।


4. अमरित बानी

*हीन भावना मन से हटाये*


ऊॅंच नीच के भेद ल छोड़व, धरम करम ले रिस्ता जोड़व।।

सार जगत मा करनी जानौ, हीन मान झिन मन मा लानौ।।


5. अमरित बानी

 *सत्य और ईमान में अटल रहें*


सत्य सार हे जग बलशाली, लाये जिनगी मा खुशहाली।

झूठ लबारी धक्का खाथे, मान कहॉं अउ वोहर पाथे।।



6. अमरित बानी

*जैसा खाये अन्न वैसा बनेगा मन*


मिहनत के रोटी सुख लाथे, रोग दोष ला काट भगाये।

अउ येहर होथे गुणकारी, भर भर खावव रोजे थारी।।


7. अमरित बानी 


*मेहनत ईमान का रोटी सुख का आधार*


मिहनत करके तुम खावव अन, सदा सुखी होही तन अउ मन।

रोग दोष नइ कभू सतावय, गार पसीना जेहर खावय।।


8. अमरित बानी

*क्रोध और बैर को जो त्याग देता है उसका हर कार्य बन जाता है*


छिन छिन मा जे गुस्सा करथे, बैर बढ़ाके भरभर जरथे। 

क्रोध बैर जे मन नइ लावय, काम सुफल वो झट कर जावय।।


9. अमरित बानी

*दान कभी नइ माॅगना चाहिए, और न ही उधार लेना-देना चाहिए*


दान मॉंग जे फोकट खाथे, चोरी बइमानी ल बढ़ाथे।

करजा बोहे जिगनी जीथे, महुरा अपमानी के पीथे।।9।।


10.  अमरित बानी

*दूसरे का धन हमारे लिए कोड़ी के समान है*

 

रोजे जाॅंगर पेर कमावव, पर के धन मत नजर गड़ावव।।

पर के धन ला माटी जानौ, लोभ मोह झिन मन मा सानौ।।


11. अमरित बानी

*मेहमान को साहेब के समान समझो*


गुरतुर बानी पहुॅंना बॉंटव, छोटे बड़का मा मत छॉंटव।

प्रेम करव जइसे के भगवन, रखथे सदा भगत बर नित मन।।


12. अमरित बानी

 *सगा के जबर बैरी सगा होथे*


निज भाई के संग लड़व झन, भाव एकता के राखव मन।

काम इही दुख दुख मा आही, जिनगी ला अउ सरग बनाही।।


13. अमरित बानी

*सबर के फल मीठा होथे*


करनी कर तॅंय धीरज धर रे, आही बेरा लगही फर रे।

जिनगी हर तोरो महहाही, नवा बिहनिया कारज लाही।।



14. अमरित बानी

*मया के बंधना असली ये*


मनखे मनखे सबो बरोबर, जुरमिल राहव हिलमिल सुग्घर।

जिनगी बिरथा मया बिना हे, जइसे तन ला लगे घुना हे।।


15. अमरीत बानी

*दाई-ददा अऊ गुरु ला सनमान देवव*


मान रखव गुरु बाबू दाई, जिनगी गढ़थे ये सुखदाई।

तोर पॉंव दय न गड़न कॉंटा, सरग घलो दे तोरे बॉंटा।।


16. अमरित बानी

*दाई ह दाई आय, मुरही गाय के दूध झन निकालहव*


रखे माह नौ पेट सरेखे, तोर खुशी  निज हित नइ देखे।

अमरित बरसे छाती जेकर, आय बुढ़ापा दुख मत झिन भर।।


17. अमरित बानी

*इही जनम ला सुधारना सॉंचा हे*


मनखे जनम सार हे जानौ, भेद पाप पुन मा तुम मानौ।

आय जाय के राह छुड़ाले, सुघर मुक्ति के राह बनाले।।



18.अमरित बानी

*सतनाम घट घट मा समाय हे*


हे सतनाम खड़े घट घट मा, बसे धरा अउ अगास सत मा।

सुन सतनामी महिमा अड़बड़, सदाचार के जिनगी बड़हर।।


19. अमरित बानी

*गियान के पंथ किरपान के धार ए*


बिरथा जिनगी हे बिन शिक्षा, जइसे मॉंग चलत हे भिक्षा।

ज्ञान पंथ निज हक अधिकारी, जस किरपान धार बड़ भारी।।


20.अमरित बानी

*एक धूबा मारे तुहु तोरे बरोबर आय*


 नीच काज हे करनी जेकर, कर अपमान घलो झन ओकर।

पथरा मारे चिखला छटके, दाग बने रहिथे ये चटके।


21. 

*मोला देख, तोला देख, बेर कुबेर देख, जेन हक तेन ला बॉंट बिराज के खा ले।*


होय नहीं सुख यश धन ले मन, बड़हर मन ला तॅंय देख जतन। 

सब हक रहे पेट भर थारी, खाव बॉंट सम तुम सॅंगवारी ।।

खाव नॅंगा हक झन दूसर के, 



मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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 चौपई छंद)


सुन ले बाबा घासीदास,दिन हवय गा अड़बड़ खास।

करत हवन गा पूजा तोर,मँहगू के तैं लाला मोर।।


कतका करबो तोर बखान,महिमा हावय भारी जान।

सत के मारग ला तैं जान,अपन बनाये गा पहिचान।।


जात पात के भेद मिटाय, सत के बाबा अलख जगाय।

मनखे मनखे एक बताय,भाई चारा रहे सिखाय।।


नशा पान ला सबझन छोड़,राखव सबले नाता जोड़।

सत के राहव दिया जलाय, अंतस बाबा हवय समाय।।


सबला बाबा दे हे ज्ञान,अमरित बानी जेकर जान।

सत के मारग जे बतलाय,धरम धजा ला जी फहराय।।


गिरौदपुरी हवय जी धाम,जपलव संगी सब सतनाम।

सुनलव बाबा के संदेश,सबके मिट जाही गा क्लेश।।


रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर

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अल्हा छंद

मनखेमनखे एक हवै जी,कहगे बाबा घासीदास।

सत्यनाम ला सब झन मानौ,सत मा राखौ जी विश्वास।।

सुमता अउ भाई चारा के,बंधन बाँधे राखव खास।

एक दुसर सहयोग करौ जी,करदौ कुमता के तुम नास।।

सुनौ उदाली झन मारौ जी,चीज बचा के राखौ पास। 

बिपदा  मा तो काम ग आथे,धर गठिया के खासम खास।।

ताश जुआ हे बिगड़े रस्ता,नशा पान  आवय जी काल।

जौन फँसे हे येकर फाँदा, माथा धर होगे बेहाल।।

गुरु बबा के एक बात हा,सच मा कतका मन ला भाय।

काम करत हे जौन खेत मा,खेती सिरतो ओकरे आय।

 बेगारी हे लूट बरोबर,झन करहौ फोकट मा काम।

लइका बर दू रोटी लाना,तबही करना जी आराम।।

पर नारी महतारी जानौ ,पर धन ला जी पथरा जान।

सब झन बर सद्भाव रखौ जी। सदा बचाये राखौ मान।।

सत्त  राह हा भले कठिन हे,सदा बढ़ा हव सत मा पाँव।

कर जाहू कुछ  बने करम ला,जुग जुग चलही तब तो नाँव।।

नोनी बाबू एके हावै,झन करहौ कोनो  मा भेद ।

शिक्षा के हथियार धराहू,गंगा सुख के लाही छेद।।

सती प्रथा हे पाप बरोबर,विधवा मा घलो होथे प्रान।

विधवा  मन के व्याह रचाके,देवव नारी ला सम्मान।।

ऊँच -नीच के भेद मिटावत, छूत छुआ ला माने  रोग।

जीव जगत के सेवा ला तै, कहे हवस ईश्वर से  योग 

धन्य हवै जी गुरु बाबा हा,इहाँ पंथ सतनाम चलाय।

दीन दुखी ला गला लगा के,मानवता के पाठ पढाय।।


✍️जुगेश कुमार बंजारे "धीरज'

छिरहा बेमेतरा छ्ग

9981882618

8739521702

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: मनहरण घनाक्षरी- विजेन्द्र वर्मा


सत के रहे पुजारी,पूजत दुनिया सारी,

जग मा अमर हवै,बाबा तोर नाम हा।

ऊँच-नीच ला मिटाके,सत राह ला दिखाके,

ज्ञान के अलख जगा,बाजिस हे काम हा।।

परहित सेवा करैं,दया मया भाव भरैं,

तभे तो दिखत हवै,आज परिणाम हा।

जय हो बाबा धाम के,जय हो सतनाम के,

सत के देय संदेशा,घासीदास धाम हा।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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सतनाम के पुजारी बबा जय होवय तोर 

जय होवय तोर बबा जय होवय तोर

हे घासी दास मोर बबा घासी दास मोर

सतनाम के पुजारी बबा जय होवय तोर 


जाति पाती भेद भाव जग ले मिटाये हच

मनखे मनखे एके हे सब ला बताये हच

सात वचन ला बबा जग मा बगराये हच

नाचत हावय पंथी मा सब गली खोर 

सतनाम के पुजारी बबा जय होवय तोर 


पशु प्रेम करें के तैं अलख जगाये हच

आगे जन्मदिन तोर सब ला बलाये हच

जैतखाम मा सुग्घर पालो ला चढ़ाबो

सत्य के ध्वजा ला चारों कोती बगराबो 

तोर किरपा ले बगरे सतनाम के अँजोर


सतनाम के पुजारी बबा जय होवय तोर 

जय होवय तोर बबा जय होवय तोर

हे घासी दास मोर बबा घासी दास मोर

सतनाम के पुजारी बबा जय होवय तोर 



राकेश कुमार साहू 

सारागांव ,धरसींवा ,रायपुर

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: जल-हरन घनाक्षरी - बोधन राम निषादराज


*गुरु घासीदास*


जै हो बाबा घासीदास,करत हौं महूँ आस,

सत् के रद्दा जावँव, दे दे मोला ज्ञान ल।

सादा  धजा  लहरावै, नर-नारी गुन गावै,

भक्ति के आशा मिलय,पावँव वरदान ल।।

माता अमरौतीन के,कोख मा जनम धरे,

मँहगू के ललना हा,जपय भगवान ल।

सतनाम भज  डरे, कठिन  तपस्या करे,

जैत खाम ला गड़ाके,अउ तैं दिए मान ल।।


रचना:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

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(रोला छंद)


गुरु हे घासीदास , सत्य के परम पुजारी।

 सत के जोत जलाय, संत जग के हितकारी।

 पावन गांँव गिरौद,मातु अमरौतिन कोरा।

 धन-धन महँगू दास, पिता बन करिन निहोरा।


 सत्य पुरुष अवतार, तोर महिमा हे भारी।

 सुमर-सुमर सतनाम, मुक्ति पाथें नर-नारी। 

ऊँच-नीच के भेद,मिटाये अलख जगाके।

 मनखे- मनखे एक, कहे सब ला समझाके। 


तोर सात संदेश, सार हे मानवता के ।

समता के व्यवहार, तोड़ हे दानवता के।

 छुआछूत हे पाप, पुण्य हे भाईचारा।

 जात पात हे व्यर्थ, सबो झन करौ किनारा। 


मातु पिता हे देव, तपोवन हावय घर हा।

 सबके हिरदे खेत, प्रेम के डारन थरहा।

 गुरु के आशीर्वाद,पाय हन छत्तीसगढ़िया।

 सत मारग मा रेंग, बनन जी सब ले बढ़िया।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़


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*सरसी छंद (गुरु घासीदास बाबा)*


सत्य नाम ला अमर करइया, जय गुरु घासीदास।

जग मा लाये हच तँय बाबा, सुग्घर नवा उजास।।


करम धरम ला पोठ करे हस, बन महान तँय संत।

सुग्घर जग मा अपन चलाये, सत्य नाम के पन्त।।


मनखे मनखे एक बरोबर, सबके बनव हितेश।

भेद भाव ला छोड़ कहे तँय, सबला दे संदेश।।


बिना कर्म के कहाँ मिले फल, जैसे बिन गुरु ज्ञान।

कहे अंध विस्वासी झन बन, बनव सबो विद्वान।।


सादा जिनगी ला धरबे तँय, करबे सद व्यवहार।

छोड़ नशा ले दुरिहा कहिथस, रखबे उच्च विचार।। 


-हेमलाल साहू

छंद साधक सत्र-0१

ग्राम गिधवा, जिला बेमेतरा

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*बरवै छंद*


गुरू महिमा


अमरौतिन के कोरा ,खेले लाल।

महँगू के जिनगी ला ,करे निहाल।1।


सत हा जइसे चोला ,धरके आय।

ये जग मा गुरु घासी ,नाम कहाय।2।


सत्य नाम धारी गुरु ,घासीदास।

आज जनम दिन आये ,हे उल्लास।3।


मनखे मनखे हावय ,एक समान।

ये सन्देश दिए हे, गुरु गुनखान।4।


देव लोक कस पावन ,पुरी गिरौद।

सत्य समाधि लगावय ,धरती गोद।5।


जैतखाम  के महिमा ,काय बताँव।

येला जानव भैया ,सत के ठाँव।6।


निर्मल रखव आचरण ,नम व्यवहार।

जीवन हो सादा अउ ,उच्च विचार।7।


बिन दीया बिन बाती ,जोत जलाय।

गुरु अंतस अँंधियारी ,दूर भगाय।8।


अंतस करथे उज्जर ,गुरु के नाम।

पावन पबरित सुघ्घर ,गुरु के धाम।9।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

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[जय बाबा गुरू घासीदास 

        (सार छंद)

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छत्तीसगढ़ के सुरुज बरोबर, सत अँजोर बगरइया। 

जन जन मा भाईचारा अउ, सुम्मत भाव जगइया। ।

मनखे सबो समान बताके, सत्यनाम गुन गाइन। 

मानवता के सुघ्घर रस्ता, दुनिया ला देखाइन। ।

अइसन संत सुजानी के हर, करम बचन हें पावन। 

बाबा घासीदास गुरु ला, जन जन करथें बंदन। ।

       जय सतनाम!!

दीपक निषाद -बनसाँकरा (सिमगा)

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*सार छंद*


नर तन धरके सत हा खेलय ,अमरौतिन के कोरा।

तोला पाये बर बर जुग जुग ले, धरती करिस अगोरा।।


तेजवान अउ परम प्रतापी, हे महँगू के लाला।

दीया अइसे बारे जग मा ,हटगे भ्रम के जाला।।


घासीदास कहाये जग मा, सत्य पुरुष अवतारी।

सन्त शिरोमणि गुरुवर तोरे , महिमा हावय भारी।।



सादा जीवन सादा बोली , सादा हावय झंडा।

सत्य ज्ञान के अमरित बानी ,भरथे मन के हंडा।।


मनखे मनखे एक बरोबर ,एक सबो नर नारी।

बाबा के सब ज्ञान सूत्र मन ,मनखे बर हितकारी।।


अब्बड़ फइले रहिस जगत मा ,छुआ छूत बीमारी।

महा वैद्य बनके आये गुरु,   सत्य ध्वजा के धारी।


मानवता के पाठ पढाये, सुमता भाई चारा।

ऊँच नीच के गड्डा पाटे, दुखिया दीन अधारा।।



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

18 -12 ,2021

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संत गुरु घासीदास 42 अमृतवाणियाँ-


मनहरण घनाक्षरी-


सतनाम  घट   घट, बसे  हवै  मन  पट

भरौ  ज्ञान  पनघट, कहे  घासीदास  हे

सबो संत मोरे आव,महिनत रोटी खाव

जिनगी  सुफल पाव, करम  विश्वास हे

ओतकेच तोर  पीरा,जतकेच मोर पीरा

लोभ मोह  क्रोध कीरा,करे तन नाश हे

सेवा कर दीन दुखी,दाई ददा रख सुखी

धर  ज्ञान  गुरुमुखी ,घट   देव  वास  हे।।


ऊँचा  पीढ़ा  बैरी बर,मया  बंधना ला धर

अन्याय  विरोध  बर,रहौ  सीना  तान  के

निंदा  अउ  चारि हरे,घर  के  उजार  करे

रहौ  दया   मया  धरे,कहना  सुजान  के

झगरा ना जड़ होय,ओखी के तो खोखी होय

सच ला ना  आँच  आय, मान  ले तैं  जान के

धन  ला  उड़ाव  झन,खरचा बढ़ाव  झन

काँटा  ला  गढ़ाव झन,पाँव  अनजान के।।


पानी पीयव छान के,बनावौ गुरु  जान के

पहुना  संत  मान  के,आसन  लगाव  जी

मोला देख तोला देख,बेरा ग कुबेरा  देख

कर सबो  के सरेख, मिल  बाँट खाव जी

सगा के हे सगा बैरी,सगा होथे चना खैरी

अटके  हे देख  नरी,सगा  का बताँव  जी

मोर  हर   संत  बर, तोर   हीरा  मोर  बर

हे  कीरा के  बरोबर,मैं  तो  समझाँव  जी।।


दाई हा तो दाई आय,मया कोरा बरसाय

दूध  झन  निकराय,मुरही  जी  गाय  के

गाय  भैंस नाँगर  मा,इखर गा जाँगर मा

ना रख  बोझा गर मा ,नोहय  फँदाय के

नारी  के सम्मान बर,विधवा  बिहाव बर

रीत  नवा  चालू  कर, चूरी  पहिराय  के

पितर  मनई   लगे,मरे   दाई   ददा  ठगे

जीयत  मा  दूर   भगे,मोह   बइहाय  के।।


सोवै   तेन  सब  खोवै ,जागै  तेन  सब पावै

सब्र  फल  मीठा  होवै,चख  चख  खाव जी

रोस  भरम  त्याग   के,सोये  नींद  जाग  के

ये  धरती  के  भाग  ला,खूब  सिरजाव  जी

कारन ला जाने बिना,झन न्याय ला जी सुना

ज्ञान   रसदा   ना  कभू , उरभट   पाव   जी

मन  ला हे  हार जीत,बाँटौ  जग मया  प्रीत

फिर  सब  मिल  गीत,सुमता  के  गाव  जी।।


दान  देवइया  पापी,दान  लेवइया  पापी

भक्ति भर  मन झाँपी,मूर्ति  पूजा छोड़ दे

जइसे खाबे  अन्न ला,वइसे पाबे  मन ला

सजा झन  ये तन ला,मोह  घड़ा फोड़ दे

ये  मस्जिद   मन्दिर , चर्च  अउ  संतद्वार

बना  झन  गा  बेकार, मन  सेवा  मोड़ दे

गरीब  बर  निवाला, तरिया   धरमशाला

बना कुआँ  पाठशाला ,हित  ईंट जोड़ दे।।


आँख होय जब चूक,अँगरा कस जस लूख

फोकट  के  सुख  करे,जिनगी  ला  राख हे

पर  के भरोसा  झन,खा तीन  परोसा  झन

मास  मद  बसौ  झन,नाश  के  सलाख  हे

एक  धूवा   मारे   तेनो , बराबर खुद  गिनो

जान  के मरई  जानौ,पाप  के  तो शाख़ हे

गुरु घासीदास  कहे ,कहौ  झन  मोला बड़े

सत  सूर्य   चाँद  खड़े, उजियारी  पाख  हे।।


          रचना- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 बिलासपुर 8889747888


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 संत शिरोमणि गुरु घासीदास जयंती के बहुत बहुत बधाई-


विष्णुपद छंद


मनखे अव मनखे बनके सब, भाई हो रहना।

मनखे मनखे एक बरोबर, बाबा के कहना।।


मानवता हे सार जगत मा, सुग्घर ये गहना।

घाम रहय चाहे हो छइँहा, सुख दुख ला सहना।।


छुआछूत पाखंड ढोंग ले, दूर सदा रहना।

डरना नइये झूठ झूठ ला, सच ला सच कहना।।


हमर बनाये जाँति पाँति अउ, रीति नीति जग मा।

एक माँस हाँड़ा तन सबके, एक लहू रग मा।।


दीन गरीब ददा दाई के, सेवा खूब करौ।

अँधियारी बर दीया बनके, भाई रोज जरौ।।


सच बोलव सतनाम जपौ बस, काँटा पग पग मा।

बाबा घासीदास बताइन, सार इही जग मा।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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  *बरवै छंद*

*बाबा गुरू घासीदास*


दाई अमरौतिन के, रहय दुलार।

करय ददा महँगू हा, मया अपार।। 


नाम रखिस दाई हा, घासीदास।

तोर रहिस बोली हा, बने मिठास।। 


पेड़ तरी धौरा के, धुनी रमाय।

आत्म ज्ञान ला पाके, संत कहाय।। 


कहे सबो ला झन कर, मदिरा पान।

सादा जीवन रखथे, सबके मान।। 


सब मनखे ला माने, एक समान।

सत्य नाम ला गाके, बने महान।। 


करँव तोर महिमा के, मँय गुनगान।

अनुज करत हे बाबा, तोर बखान।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

 *पाली जिला कोरबा*

        *सत्र 14*

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