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Saturday, April 30, 2022

रूपमाला छंद में गीत:-

 रूपमाला छंद में गीत:-


*तोर नखरा-*


तोर नखरा  आज  मोला, मार  डारे  बान। 

देख ले अब तँय इहाँ ओ,जाय छूँट परान।।

तोर नखरा आज................


जाँव मँय तो छोड़ तोला,मोर मन नइ होय।

छाँद ले हस तँय मया मा,नींद मा मन रोय।।

अब इहाँ तँय आ गियाँ ओ,बात मोरो मान।

तोर नखरा आज.................


नैन मोरो  सूख जावय, काय  गोठ  बताँव।

घर इहाँ अब जेल लागै,कोन डाहर  जाँव।।

आय जाबे  मोर  कुरिया, देख  छूँटय प्रान।

तोर नखरा आज..................


जोर माया छोड़ मोला,आज झन तँय भाग।

ए कलपना मोर तोला,झन परय अब जाग।

दिन बितावँव  रात  जागँव,सोंच  होते आन।

तोर नखरा आज................


बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

मजदूर दिवस विशेष छंदबद्ध कवितायें(प्रस्तुति- छंद के छ परिवार)


 मजदूर दिवस विशेष छंदबद्ध कवितायें(प्रस्तुति- छंद के छ परिवार)


रोला छंद


मजबूर मैं मजदूर


करहूँ का धन जोड़, मोर तो धन जाँगर ए।

रापा गैंती संग, मोर साथी नाँगर ए।

मोर गढ़े मीनार, देख लौ अमरे बादर।

मोर धरे ए नेंव, पूछ लौ जाके घर घर।


भुँइया ला मैं कोड़, ओगराथौं नित पानी।

जाँगर रोजे पेर, धरा ला करथौं धानी।

बाँधे हवौं समुंद, कुँआ नदिया अउ नाला।

बूता ले दिन रात, हाथ मा उबके छाला।


घाम जाड़ आषाढ़, कभू नइ सुरतावौं मैं।

करथौं अड़बड़ काम, तभो फल नइ पावौं मैं।

हावय तन मा जान, छोड़ दौं महिनत कइसे।

धरम करम ए काम, पूजथौं देवी जइसे।


चिरहा ओन्हा ओढ़, ढाँकथौं करिया तन ला।

कभू जागही भाग, मनावत रहिथौं मन ला।

रिहिस कटोरा हाथ, देख वोमा सोना हे।

भूख मरौं दिन रात, भाग मोरे रोना हे।


आँखी सागर मोर, पछीना यमुना गंगा।

झरथे झरझर रोज, तभे रहिथौं मैं चंगा।

मोर पार परिवार, तिरिथ जइसन सुख देथे।

फेर जमाना कार, अबड़ मोला दुख देथे।


थोर थोर मा रोष, करैं मालिक मुंसी मन।

काटत रहिथौं रोज, दरद दुख डर मा जीवन।

मिहीं बढ़ाथौं भीड़, मिहीं चपकाथौं पग मा।

अपने घर ला बार, उजाला करथौं जग मा।


पाले बर परिवार, नाँचथौं बने बेंदरा।

मोला दे अलगाय, बदन के फटे चेंदरा।

कहौं मनुष ला काय, हवा पानी नइ छोड़े।

ताप बाढ़ भूकंप, हौसला निसदिन तोड़े।।


सच मा हौं मजबूर, रोज महिनत कर करके।

बिगड़े हे तकदीर, ठिकाना नइहे घर के।

थोरिक सुख आ जाय, विधाता मोरो आँगन।

महूँ पेट भर खाँव, रहौं झन सबदिन लाँघन।।


मोर मिटाथे भूख, रात के बोरे बासी।

करत रथौं नित काम, जाँव नइ मथुरा कासी।

देखावा ले दूर, बिताथौं जिनगी सादा।

चीज चाहथौं थोर,  मेहनत मागौं जादा।


आँधी कहुँती आय, उड़ावै घर हा मोरे।

छीने सुख अउ चैन, बढ़े डर जर हा मोरे।

बइठ कभू नइ खाँव, काम मैं मांगौं सबदिन।

करके बूता काम, घलो काँटौं दिन गिनगिन।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

मजदूर दिवस अमर रहे,,,,

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*हरिगीतिका छंद - बनिहार*


बनिहार मन के दुःख ला, अब कोन देखत हे बता।

कइसन जमाना आय हे, सब टूट गे रिश्ता नता।।

जाथे कमाये बर सबो, घर छोड़ के परदेश मा।

मनखे अपन ये भोगथे, जिनगी गरीबी क्लेश मा।।


दुनिया रचइया देखले, अब झोपड़ी के हाल ला।

रहिथे सड़क के तीर मा, छाए रथे तिरपाल ला।।

भूखे पियासे रात दिन, करथे गजब ये काम ला।

टावर बनाथे अउ महल, डर्राय नइ जी घाम ला।।


बेटा  महूँ  बनिहार के, ईंटा  उठाथँव  हाथ मा।

गारा मताके के बोहथँव, दाई - ददा के साथ मा।।

सब पेट के खातिर इहाँ, छोटे कमावै अउ बड़े।

नइ लाज लागै थोरको, धनवान देखयँ जी खड़े।।


रचनाकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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: सोरठा छंद


भूख प्यास मजदूर, करथे बूता रातदिन। 

जीये बर मजबूर, तंगहाल मा देखलौ।।


स्वारथ मा हे लोग, कोन समझथे दुख इँखर।

लगे हवै का रोग, चूसत दुनिया खून हे।।


सपना लगे अँजोर, अँधियारी घपटे हवै।

नवा सुरुज सुख भोर, कब उगही जिनगी इँखर ।।


सिर मा नइये छाँव, हाल बुरा मजदूर के। 

उँखरा हावय पाँव, कपड़ा तन मा नइ घलो।।


काम इँमन चुपचाप, भूख प्यास रहिथे करत।

जिनगी ले संताप, कइसे होही दूर अब।।


ज्ञानु

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 मैं बनिहार ( आल्हा छंद )

बड़े बिहनिया जाथँव संगी,काम बुता मा मैंहर रोज।

घर के संसो छाये रहिथे,जाके करथँव दिनभर खोज।।


एती ओती जाके करथँव,काम बुता ला मैं बनिहार।

जब थक हारे घर मा आथँव,हो जाथे गा बड़ अँधियार।।


बड़ करलाई हावय भइया, देखव लइका मनके मोर।

रोजी रोटी बर मैं लड़थँव,अपन कमाथँव जाँगर टोर।।


घाम प्यास ला मैं नइ देखँव,करथँव काम बुता दिन रात।

लाँघन भूखन झन राहय जी,लइका मनहा सोचँव बात।।


भरे मझनिया करते रहिथँव,नही कभू मैं खोजँव  छाँव।

लक लक तीपे रहिथे भुइयाँ,चट ले जरथे मोरो पाँव।।


कभू खनव मैं माटी गोदी,अउ ढेला पथरा ला फोड़।

महल अटारी घलो बनाथँव,रच रच ईंटा मैंहर जोड़।।


टप टप चूहे भले पसीना,राहय खुश मोरो परिवार।

जउन बुलाही काम बुता मा,जाके करहूँ मैं बनिहार।।


रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद (समोदा) जिला रायपुर छत्तीसगढ़

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 बनिहार (सार छंद गीत)

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मैं मजूर बनिहार कहाथँव, मिहनत के गुन गाथँव। 

आथँव खाली रहिथँव खाली, जग ले खाली जाथँव। ।

मिहनत ले चतवारँव सब झन के रद्दा के काँटा। 

नइ देखँव मैं मोर भाग मा, सुख दुख के का बाँटा। ।

नइ सोचँवआघू पाछू बस, जाँगर टोर कमाथँव।

आथँव खाली----

महीं बनावँव महल अटारी, सड़क नहर अउ पुलिया। 

मोर परिश्रम के मारे ले, बदलै जग के हुलिया। ।

भरँव तिजोरी कतको झन के,खुद नँगरा रहि जाथँव।

आथँव खाली-----

मोर बुता ले सब सुख पाथें, पेट सबो के भरथें। 

मोर पछीना के गंगा मा, दुनिया सरलग तरधें। ।

भगीरथ भले कहाथँव मैंहा, कहाँ मान  धन पाथँव।

आथँव खाली------


दीपक निषाद---लाटा (बेमेतरा)

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धन धन तैं मजदूर किसान।

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धन धन तैं मजदूर किसान ।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


 किसम किसम के अन उपजाय।

 सरी जगत के भूख मिटाय।

हलधरिया नइ कभू थिराय।

 फेर अपन हक ला नइ पाय।

 चुहक डरिन तोला धनवान।

 धन धन तैं मजदूर किसान।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


 मिलै नहीं रोजी भरपूर।

 तेकर सेती हे मजबूर।

 त्राहि-त्राहि करथे मजदूर ।

सजा भुगतथे बिना कसूर ।

जिनगी हावै जेल समान।

 धन धन तैं मजदूर किसान।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


 सरी जिनिस ला जे  सिरजाय।

 जे हा रेल जिहाज बनाय।

 ऊँचा ऊँचा महल उठाय।

 सुख-सुविधा बर वो लुलवाय।

 कारीगर के मरे बिहान ।

धन धन तैं मजदूर किसान।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


 चिंता मा झटके बनिहार।

 फुन्नावै शोषक बटमार।

 सत्ता होगे हवै लचर।

झूठा वादा के बौछार।

हे गरीब हा लहू लुहान।

 धन धन तैं मजदूर किसान ।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


'बादल' के कहना हे फेर।

 समे बदलही नइये देर।

  जाग जही मजदूर किसान।

 होही तभ्भे नवा बिहान।

 सबले हावच तहीं महान।

 धन धन तैं मजदूर किसान।

मेहनती सच्चा इंसान।

जय जय जय जय वीर जवान।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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 लावणी छंद 

शीर्षक-मजदूर 


मँय मजदूरी करथौं भइया,

दुनिया ला सिरजाये हँव।

पेज-पसइया पी के मँय हा,

जाँगर सदा चलाये हँव।।1


जंगल झाड़ी नदी पहाड़ी,

सब ला मँय सुघराये हँव।

पेट भरे बर मँय दुनिया के,

धान घलो उपजाये हँव।।2


गारा पखरा जोरे टोरे,

तन ला अपन तपाये हँव।

गाँव गली अउ शहर घलो ला,

संगी महीं बसाये हँव।।3


मोर करम ले दुनिया बदले,

सब ला कथा सुनाये हँव।

सगरी करम करे हँव संगी,

एक्को नहीं बचाये हँव।।4


बाढ़ करे हँव ये दुनिया के,

मँय मजदूर कहाये हँव।

का कुरिया का महल अटारी,

सब ला महीं बनाये हँव।।5


सबो कारखाना मा जाके,

लहू अपन बोहाये हँव।

डबरा डिलवा पाट पाट के,

रद्दा घलो बनाये हँव।।6


सब खदान मा छाती पेरँव,

करिया ला उजराये हँव।

हीरा मोती सोना चाँदी,

कतको ला चमकाये हँव।।7


नहर कुआँ तरिया बाँधा मा,

मँय हा  पानी लाये हँव।

मोर बाँह मा टिके जमाना,

दुनिया पार लगाये हँव।।8


द्वारिका प्रसाद लहरे "मौज"

कवर्धा छत्तीसगढ़

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 *बनिहार.*(मजदूर) 


जाँगर टोर कमाथँव मैं हर, माटी के बनिहार |

मोर मेहनत धरम करम हे, जिनगी के आधार ||


किसम किसम के चीज बनइया,मैं जग सिरजनहार |

मोर हाथ ले गइस बसाये, ये जम्मो संसार ||


ईंटा ईंटा जोर अटारी, देथँव मैं हर तान |

जेमा छोटे बड़े बिराजै, मनखे अउ भगवान ||


दगदग करत कारखाना मा, लोहा ला टघलाँव |

छोटे बड़े मशीन बना के, आगु देश बढ़ाँव ||


पढ़ लिख इंजीनियर रूप धर, गढ़थँव मैं हर देश |

वैज्ञानिक डाक्टर हितवा के, धरँव कई ठन वेश ||


सरहद सैनिक बन के गरजँव,अपन खून बोहाँव |

सेवा करथँव माटी के मैं, दूलरु बेटा ताँव ||


जब जब लेवँव जनम इहाँ मैं, धरँव रूप बनिहार |

सेवा महतारी के निशदिन, करँव लहू ओगार ||


अशोक कुमार जायसवाल

    भाटापारा

सत्र- 13

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 *दोहा छंद*

बनिहार 


हाँवव मैं बनिहार गा, करथँव बूता काम।

कतको बूता मैं करँव, उचित मिलय नइ दाम।। 


खाके बासी घाम मा, करथँव दिन भर काम।

रथँव मगन मँय काम मा, करँव नहीं आराम।। 


संगी जाँगर ले मोर गा , बनगे बड़े मकान।

छितका कुरिया मा रथँव, दे हँव सब ला शान।। 


मँय पानी ओगारथँव, बनके गा बनिहार।

बूता करथँव रात दिन, तभो हवँव लाचार।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*

 *पाली जिला कोरबा*

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: मजदूरी अउ मजबूरी


हाड़ा टोर पेरथे जाँगर, अन्न जऊन उपजाथे।

माटी के कुरिया ले लेके महल खड़ा कर जाथे।।

साफ सफाई जेकर जिम्मा, कचरा उही हटाथे।

गली खोर ले गाँव शहर तक सुंदर स्वच्छ बनाथे।।

कउन जघा हावै जी अइसन मिहनत नही ज़रूरी।

देस तरक्की करही कइसे बिन मिहनत मजदूरी।।

                     

जिंदगी मा जान लौ जी आलसी के का दसा।

काम के ना धाम के वो झेलथे जी हादसा।।

आय हौं का काम सेती सोचथन का हम कभू।

चाह तो हे खाय ला दै फोकटे मा ए प्रभू।।


पाय मानुष तन हवन  हम ज्ञान के वरदान पा।

पढ़ बने झन सोच जी सरकार ले अनुदान पा।।

घूम झन तैं भीख माँगत,  पढ़ पढ़ावत ले कमा।

पाल घर परिवार अउ कर चार पइसा ला जमा।। 


बिना मेहनत के होथे का, दुनिया के एको ठन काम।

तभो देखथन मजदूरी ला,मजबूूरी के करत प्रनाम।।

मजदूरी से महल अटारी, नाता ला रखथे बड़ दूर।

अन्न बसन घर सबला देथे, कलकुत मा रहिके मजदूर।।


जय जोहार....


सूर्यकान्त गुप्ता

सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

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: *किसान मजदूर  मन ला समर्पित  दोहा* 


बरसत मूसर धार मा, बोंथे कोदो धान।

जाड़ घाम बरसात ले, हारै नहीं किसान।।

बइला ला ललकार के, नाँगर धरके खाँध।

जावत हवय किसान हर, मूँड़ी फेंटा बाँध ।।

बलहा बइला कोढ़िया, धौंरा बड़ बलवान।

नाँगरजोत्ता धाकड़ा, लहुटे पहेलवान ।।

बन दूबी ला खन सबो, चातर करके खेत।

बतर पाग के देख के, बीजा बोंवत नेत।।

सावन भादो के घरी, मुँही मेड़ अउ पार ।

खेत-खार पानी मड़ा, गोड़ धोत बनिहार।।

जात कमइया खेत मा, धरके बासी पेज।

रूख छाँव थक माँद के, सुतगे काँदी सेज।।

बन उखान मूठा धरत, पाना ला सहलात।

मया देख बनिहार के, बाली माथ नवात ।।

दररत ले बूता करत, जाके खेत किसान।

हाड़ा हपटत रात दिन, तब्भे उपजत धान ।।

भुँइया के भगवान ला, करत देख किरवार।

लहसे बाली धान के, करत हवय जोहार।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

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मजबूरी मा मजदूरी 


मजबूरी मा मजदूरी हर, कहाँ बने मिल पाथे। 

शोषण होथे बपुरा मन के, जिनगी सबो पिसाथे। 


दिनभर काम कराके पइसा, देवत हें दू आना। 

पेट बिकाली के मजबूरी, लूटत आज जमाना।  

पसिया पीके काम चलावयँ, पेट भरे कब पाथे। 

शोषण होथे बपुरा मनके, जिनगी सबो पिसाथे।


छोड़ गाँव कतको जावत हें, पैसा बहुत कमाबो। 

आधा रखबो घर के खातिर, अउर पेट भर खाबो। 

कुछ मन वापस आवत हें अउ, कुछ बँधुवा रह जाथे।  

शोषण होथे बपुरा मनके, जिनगी सबो पिसाथे।


शहर जाय कुछ धंधा खोलयँ, पइसा चार कमावयँ। 

पर कानूनी डंडा खाके, तितर बितर हो जावयँ।  

रोज बनावयँ रोज उजाड़यँ, कहाँ ठहर उन पाथे। 

शोषण होथे बपुरा मनके, जिनगी सबो पिसाथे। 


अभी हाल कुछ अइसन हे अउ, बाढ़त हवय अबादी। 

अपने पाँव कुल्हाड़ी मारे, करत हवय बरबादी। 

खाये बर घर दाना नइ हे, लइका चार बियाथे। 

कतको रोज कमावयँ तब ले, कहाँ सम्हल फिर पाथे। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

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गीतिका छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

हे गजब मजबूर ये,मजदूर मन हर आज रे।
पेट बर दाना नहीं,गिरगे मुड़ी मा गाज रे।।
रोज रहि रहि के जले,पर के लगाये आग मा।
देख लौ इतिहास इंखर,सुख कहाँ हे भाग मा।।

खोद के पाताल ला,पानी निकालिस जौन हा।
प्यास मा छाती ठठावत,आज तड़पे तौन हा।
चार आना पाय बर, जाँगर खपावय रोज के।
सुख अपन बर ला सकिस नइ,आज तक वो खोज के।

खुद बढ़े कइसे भला,अउ का बढ़े परिवार हा।
सुख बहा ले जाय छिन मा,दुःख के बौछार हा।
नेंव मा पथरा दबे,तेखर कहाँ होथे जिकर।
सब मगन अपनेच मा हे,का करे कोनो फिकर।

नइ चले ये जग सहीं,महिनत बिना मजदूर के।
जाड़ बरसा हा डराये, घाम देखे घूर के।
हाथ फोड़ा चाम चेम्मर,पीठ उबके लोर हे।
आज तो मजदूर के,बूता रहत बस शोर हे।।

ताज के मीनार के,मंदिर महल घर बाँध के।
जे बनैया तौन हा,कुछु खा सके नइ राँध के।
भाग फुटहा हे तभो,भागे कभू नइ काम ले।
भाग परके हे बने,मजदूर मनके नाम ले।।

दू बिता के पेट बर,दिन भर पछीना गारथे।
काम करथे रात दिन,तभ्भो कहाँ वो हारथे।
जान के बाजी लगा के,पालथे परिवार ला।
पर ठिहा उजियार करथे,छोड़ के घर द्वार ला।

आस आफत मा जरे,रेती असन सुख धन झरे।
साँस रहिथे धन बने बस,तन तिजोरी मा भरे।
काठ कस होगे हवै अब,देंह हाड़ा माँस के।
जर जखम ला धाँस के,जिनगी जिये नित हाँस के।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

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आल्हा छन्द - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

गरमी घरी मजदूर किसान

सिर मा ललहूँ पागा बाँधे,करे  काम मजदूर किसान।
हाथ मले बैसाख जेठ हा,कोन रतन के ओखर जान।

जरे घाम आगी कस तबले,करे काम नइ माने हार।
भले  पछीना  तरतर चूँहय,तन ले बनके गंगा धार।

करिया काया कठवा कस हे,खपे खूब जी कहाँ खियाय।
धन  धन  हे  वो महतारी ला,जेन  कमइया  पूत  बियाय।

धूका  गर्रा  डर  के  भागे , का  आगी  पानी  का  घाम।
जब्बर छाती रहै जोश मा,कवच करण कस हावै चाम।

का मँझनी का बिहना रतिहा,एके सुर मा बाजय काम।
नेंव   तरी   के  पथरा  जइसे, माँगे  मान  न माँगे नाम।

धरे  कुदारी  रापा  गैतीं, चले  काम  बर  सीना तान।
गढ़े महल पुल नँदिया नरवा,खेती कर उपजाये धान।

हाथ  परे  हे  फोरा  भारी,तन  मा  उबके हावय लोर।
जाँगर कभू खियाय नही जी,मारे कोनो कतको जोर।

देव  दनुज  जेखर  ले  हारे,हारे  धरती  अउ  आकास।
कमर कँसे हे करम करे बर,महिनत हावै ओखर आस।

उड़े बँरोड़ा जरे भोंभरा,भागे तब मनखे सुखियार।
तौन  बेर  मा  छाती  ताने,करे काम बूता बनिहार।

माटी  महतारी  के खातिर,खड़े पूत मजदूर किसान।
महल अटारी दुनिया दारी,सबे चीज मा फूँकय जान।

मरे रूख राई अइलाके,मरे घाम मा कतको जान।
तभो  करे माटी के सेवा,माटी  ला  महतारी मान।

जगत चले जाँगर ले जेखर,जले सेठ अउ साहूकार।
बनके  बइरी  चले पैतरा,मानिस नहीं तभो वो हार।

धरती मा जीवन जबतक हे,तबतक चलही ओखर नाँव।
अइसन  कमियाँ  बेटा  मनके, परे  खैरझिटिया हा पाँव।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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दुर्मिल सवैया-मजदूर

मजदूर रथे मजबूर तभो दुख दर्द जिया के उभारय ना।
पर के अँगना उजियार करे खुद के घर दीपक बारय ना।
चटनी अउ नून म भूख मिटावय जाँगर के जर झारय ना।
सिधवा कमियाँ तनिया तनिया नित काज करे छिन हारय ना।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
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Sunday, April 24, 2022

बर बिहाव सम्बन्धी छंदबद्ध कविता

बर बिहाव सम्बन्धी छंदबद्ध कविता


 अरसात सवैया - बोधन राम निषादराज

विधान - भगण×7+रगण×1 

(बिहाव)


देख बिहाव लगीन धराय बरात चले सब नाचत गात हे।

जोर सँवांग बने कपड़ा पहिरे दुलहा अब हाँसत जात हे।।

मौर सजे गर मा बढ़िया मुसकावत देखत पान चबात हे।

होत बिहाव बड़े मनभावन जीवन मा खुशियाँ अब छात हे।।


बोधन राम निषादराज"विनायक"

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आभार सवैया - बोधन राम निषादराज

विधान - तगण×8 

(बिहाव)


बाजा बजै ढोल नाचै बराती खुशी ला मनावै ग ठौका मजा पाय।

घूमै सबो गाँव जम्मों घराती सगा हा अघावै बने जी बफे खाय।।

दूल्हा सजे ठाठ राजा दिखै शान भारी फभै रूप मोला बने भाय।

गौना कराके बिदा माँग लावै बराती सबो साथ मा जी बहू लाय।।


बोधन राम निषादराज"विनायक"

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 ताटंक छंद - बोधन राम निषादराज

(बिहाव के लगन)


बाजा बाजय लगिन धरावै,

                  पहुना आवै  जावै  गा।

एती  ओती  चारो  कोती,

                 मनखे मन सकलावै गा।।1।।


मड़वा गड़गे पहुना जुर गे,

                 गीत मया के गावै जी।

हरदी चढ़गे ओखर अंग म,

                 नवा बहुरिया लावै जी।।2।।


नाता-सैना जम्मों  आवय,

                 अउ अशीष ल देवै गा।

जोड़ी जुग-जुग तोरे राहय,

                  हँसी खुशी सब लेवै गा।।3।।


जनम-जनम के नाता जुड़गे,

                लगन लगे सुख पावै जी।

जीवन भर बर बन सँगवारी,

               जिनगी अपन बितावै जी।।4।।


किरपा ले सब जुड़थे नाता,

                 लिखे भाग के होथे गा।

बिना लगन के मँगनी-जचनी,

                उही दुःख ला बोथे गा।।5।।


बोधन राम निषादराज"विनायक"

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: विषय: मड़वा हा सजही ( विष्णु पद छंद )


एसो के अक्ती मा  मोरो , मड़वा हा सजही।

जम्मो पहुना मन सकलाही ,बाजा हा बजही।।


हरदी तेल चढ़ाही सुग्घर, देही जी अँचरा।

दीदी भाँटो के सँग आही, अउ भाँची भँचरा।।


मोतीचूर खवाही लाड़ू , माँदी मा मन के।

खीर बरा अउ पापड़ देही , सथरा सब झन के 


 मउर सजाके मँयहा जाहूँ ,मोटर मा चढ़के।

जाही सँग मा मोर बरतिया ,  एक सेक बढ़के।।


बाजा -गाजा मा परघाही, मान गौन करही।

दुल्हिन हा मुस्कावत आही , पाँव मोर परही।।


विधि विधान ले पंडित पढ़ही , साखोचार हमर।

देही शुभ आशीष सबो झन , रइहव सदा अमर।।


सुग्घर दुल्हनिया के सँग मा,सब सुख हा मिलही।

घर आही धरके खुशहाली,मया कमल खिलही।।


                        

                    बृजलाल दावना

                         भैंसबोड़ 

                  6260473556

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मड़वा तरी(सार छंद)


बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।

गदबिद गदबिद करत हवै घर, गाँव गली अउ पारा।


मड़वा भीतर बइठे दुलरू, मुचुर मुचुर मुस्कावै।

गीत डोकरी दाई गावै, मामी तेल चढावै।।

कका कमर मटकावत हवै, लगा लगा के नारा।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।।


दीदी भाँटो मामा मामी, सब पहुना सकलाहे।

नेंग जोग मड़वा मा होवै, पारा भर जुरियाहे।

लाड़ू खीर बरा सोंहारी, खावै झारा झारा।।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।


बबा ददा दाई भाई सँग, खुश हे आजी आजा।

रात करत हे रिगबिग रिगबिग, दिनभर बाजे बाजा।

माड़ जाय मन मड़वा भीतर, चमके तोरन तारा।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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Saturday, April 23, 2022

विश्व पुस्तक दिवस पर छंदबद्ध कविता



 

विश्व पुस्तक दिवस पर छंदबद्ध कविता


 बरवै छंद........

बिषय..............पोथी


पोथी पतरा पढ़लौ, मिलही ज्ञान।

धरम करम ला जानव,पावव मान।


पोथी गंगा गीता,लगय पुरान।

चार धाम कस जानव, देव समान।


बिनहा उठ मुख देखव, पोथी लान।

काम सफल होवय सब,.सुख सम्मान।


रोज पढ़व पोथी ला, पावव ज्ञान।

संस्कार बनय घर मा,.राखव ध्यान।


भगवत दर्शन पावव, ब्रम्ह समान।

मधुरस कस रस घोरव, कर गुणगान।


पोथी पतरा के कर ,झन अपमान।

वेद ज्ञान होवय जे, मिलथे मान।


पंडि़त पोथी बाचय,.सुनय सुजान।

ज्ञान बात के प्रवचन,.सुन लौ ध्यान।


पोथी घर मा राखव,.जे संस्कार।

भगवान बिराजय गा,पा उपहार।


शक शंका मइला ला, करथे दूर।

पोथी अनमोल लगय, आँख म घूर।


सुधर जही जिनगी हा,पढ़ ले पाठ।

पोथी मा ज्ञान भरे, कतको साठ।


पाप धोय पोथी हा,, झन कर देर।

पुण्य भाग जाघी गा, देर सबेर।


*धनेश्वरी सोनी गुल बिलासपुर*✍️

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हरिगीतिका छंद - बोधन राम निषादराज

2212 2212, 2212 2212


विषय - पुस्तक


महिमा बतावँव का सखा,पुस्तक हवै बड़ काम के।

जम्मों भराए ज्ञान हे,गीता रमायन नाम के।।

इतिहास देखव खोल के,सुग्घर दिखावै आज जी।

पुरखा जमाना के सबो,पढ़ लौ लिखाए काज जी।।


सरकार के सब काम के,लेखा घलो पुस्तक कथे।

कानून चलथे देश मा,सब नीति मन हा जी रथे।।

कविता कहानी गीत ला,सुग्घर सबो पढ़ लौ बने।

खेती किसानी काम के,रद्दा सबो गढ़ लौ बने।।


सब जानकारी विश्व के,पाथे अबड़ जी ज्ञान ला।

जिनगी बनाथे पढ़ इहाँ,रखथे अपन ईमान ला।।

सब लोक दरशन हा घलो,होथे पढ़े ले आज जी।

होके सबो शिक्षित इहाँ, करथे बने सब काज जी।।


बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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 *हरिगीतिका छंद*

*विषय-पुस्तक*


पुस्तक बने पढ़लौ तुमन, येमा रथें सब ज्ञान हा।

जिनगी जिये के ढंग अउ, मिलथें सबो ला मान हा।।

रद्दा बताथे सत्य के, अउ नीति के सब गोठ गा।

येहा बना देथे बने, जिनगी सबो के पोठ गा।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*

 *पाली जिला कोरबा*


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मीता अग्रवाल: कुंडलियाँ छंद

पुस्तक

 (1) 

पुस्तक ले मिलथे सदा, सबला सुग्घर ज्ञान। 

आखर आखर बाच के, गुणी  करय संधान । 

गुणी करय संधान,खोजथे  ज्ञान उजाला। 

करिया आखर भैस,लगय आखर मति भाला । 

गुणव मधुर के गोठ,कान ले सुनलव दस्तक ।   

पढव ध्यान ले रोज,खजाना होथे पुस्तक।। 


(2) 

पुस्तक मनखे के सदा, सच्चा होथे मित्र। 

सुख-दुख हर-पल साथ दे, जिनगी पट चलचित्र। 

जिनगी पट चलचित्र, होत हे सच्चा नायक।  

संग रहय सद ज्ञान,साधना बड सुखदायक। 

गुनय मधुर ये गोठ,मान दे ऊचा मस्तक। 

ज्ञान वान विद्वान, बनाथे संगी पुस्तक।। 


डॉ मीता अग्रवाल मधुर

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पुस्तक-विष्णुपद छंद


 सार हवय जी इही जगत मा, पुस्तक जे पढ़थे। 

ज्ञान जोत के फइलत रहिथे, राह नवा गढ़थे।। 


पार लगाथे भवसागर ले, दुख पीरा हरथे। 

मन अँधियारी मेट भगाथे,मनखे तब तरथे।। 


कभू जाय नइ बिरथा संगी, विद्या पुस्तक के। 

मान बढ़ाथे दुनिया मा जी,सबके मस्तक के।। 


अलख जगाथे ज्ञान जोत के, विपदा ला हरथे। 

पढ़के पुस्तक भटकत मनखे, राह सही धरथे।। 


गागर मा सागर ये कहिथे, ज्ञान अबड़ मिलथे। 

किस्मत गढ़थे योग बदलथे, पढ़के मन खिलथे।। 


विजेंद्र वर्मा

नगरगाँव (धरसीवाँ)

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हरिगीतिका छंद 

विषय-पुस्तक


पुस्तक पढौ ज्ञानी बनौ,कहिथे सबो विद्वान जी।

शिक्षा मिले संस्कार के, बोले गुणी इंसान जी।

आशीष हो भगवान के, खुलथे तभे तकदीर हा।

जग मा मिले पहिचान जी,करथे करम जब वीर हा।।



पढ़के बने पोथी इहाँ, बाँटव तुमन अब ज्ञान ला।

रद्दा नवा गढ़हू तभे,पाहू सुघर सब मान ला।

तब साज सजही माथ मा,रचहू नवा इतिहास जी।

मिलही सदा आशीष तब,जिनगी बने उजवास जी।।


संगीता वर्मा भिलाई छत्तीसगढ़


Friday, April 22, 2022

विधान-*सुखी सवैया*

 विधान-*सुखी सवैया*


विधान - 


पद के संख्या - चार डाँड़ (पद)

तुकांतता - चारों पद आपस मा तुकांत


प्रत्येक पद मा गण व्यवस्था - 

8 सगण अउ अंत मे दू लघु


माने 


8 सगण + लघु + लघु


उदाहरण - 


*मइके के सुरता* (सुखी सवैया) 


अकती मड़वा  पुतरा पुतरी , सुरता करके  मन हा मुसकावय।

बटकी पसिया  मिरचा चटनी , अमली अउ बोइर खूब सुहावय।

लकड़ी चुलहा धुँगिया फुँकनी, चिमटा हँड़िया सुरता नइ जावय। 

कउड़ी  पथरा  लँगड़ी फुगड़ी ,  मइके अँगना कइसे बिसरावय  ||


*अरुण कुमार निगम*

विधान-सरसी छंद

विधान-सरसी छंद


*सरसी छन्द (१६-११)* 


डाँड़ (पद) - २, ,चरन - ४

  

तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा 

माने सम-सम चरन मा, 


हर डाँड़ मा कुल मात्रा – २७ ,


विषम चरन मा मात्रा  – १६, 

सम चरण मा मात्रा - ११ 

यति / बाधा – १६, ११ मात्रा मा


खास- सम चरण  के आखिर मा गुरु, लघु (२,१)


उदाहरण - *भोले भगवान  (सरसी छन्द)* 


जब सागर-मंथन मा निकरिस, अपन करिस बिखपान। 

बिपदा ले  दुनिया - ल बचाइस , जै  भोले भगवान ।।


बिख  के आगी तपिस  गरा - मा, जइसे के बैसाख । 

मरघट-मा जा के सिव-भोला , बदन चुपर लिस राख ।। 


गंगा जी  ला जटा  उतारिस , अँधमधाय  के  नाथ  । 

मन नइ माढ़िस तब चन्दा ला , अपन बसाइस माथ ।। 


तभो  चैन  नइ  पाइस  भोला , धधके गर के आग। 

अपन नरी - मा हार बना के , पहिरिस बिखहर नाग ।। 


सीतलता खोजत - खोजत मा , जब पहुँचिस कैलास 

पारबती के  संग  उहाँ  सिव , अपन बनालिस वास।।


 *अरुण कुमार निगम*

चइत नवरात्रि

 नवा बछर अउ नवरात्रि के हार्दिक बधाई--


चइत नवरात्रि

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चइत मास के पाख अँजोरी, जोत भगत जलाय।

आदि शक्ति दुरगा मइया ला, विनय अपन सुनाय।

एकम तिथि हावय बड़ पावन, शक्ति के अवतार।

आजे के दिन ब्रह्मा जी हा, रचे हे संसार।1


सीतापति श्रीराम सम्हालिस, अयोध्या के राज।

रामराज के डंका बाजिस, उही दिन हे आज।

द्वापर युग मा धरमराज हा,धरम धजा उठाय।

राजा हो बइठिस गद्दी मा, कृष्ण के बल पाय।2


नवा बछर हा शुरु होवत हे, मनाबो नवरात ।

पर्व गुड़ी पड़वा के हावय,आदि युग शुरुआत।

लीप दुवारी चँउक सजाबो, दिया रिगबिग बार।

दया मया धर अंबे आही, सुने हमर पुकार।3


नवा साल के पहिली दिन हे, हवय भरे उमंग।

गावत हावय सारस मैना, कोइली के संग।

उलहोये हे पीपर पाना, लीम गद हरियाय।

नवा नवा सब कोती दिखथे,नवा खुशी सुहाय।4


महमाई के पूजा करबो, पान फूल चढ़ाय।

सुमर सुमर के झूम झूम के, गीत जस के गाय।

 जोत जलाबो घी भर नाँदी,चलौ रहे उपास।

मातु भवानी किरपा करही, दु:ख होही नास।5


चोवा राम 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

जै बजरंग बली ------------------ (वीर छंद)

 

जै बजरंग बली

------------------

(वीर छंद)

पइयाँ लागवँ हे बजरंगी,पवन तनय अँजनी के लाल।

शंकर सुवन केशरी नंदन,भूत प्रेत के सँउहे काल।।

रामदूत अतुलित बलधारी,संकट मोचक सुमरौं नाम।

जेकर हिरदे के मंदिर मा, सदा बिराजै सीता राम।।

अजर अमर तैं चारों जुग मा,पल मा विपदा देथच टोर।

बाधा बिधन हटा दौ हनुमत,दंडाशरण परे हँव तोर।।

तैं कपिपति सुग्रीव सहायक,करे हवस बड़का उपकार।

रघुराई के संग मिलाये, होगे बालि तको भवपार।।

भक्त विभीषण के उपकारी,पागे वो लंका के राज।

तोर नाम के सुमरन करते,बनके रहिथे बिगड़े काज।।

शक्तिबाण मा लछिमन मूर्छित,लाके बूटी प्राण बँचाय।

भरत असन भाई अच कहिके,रघुनंदन हा कंठ लगाय।।

तहस नहस निसचर दल करके,दाँत कटर के ठाने युद्ध।

दसकंधर हा मूर्छित होगे,मारे मुटका होके क्रुद्ध।।

अहिरावण के भुजा उखाड़े, जाके मारे लोक पताल।

भक्तन रक्षक हे बजरंगी, बइरी बर अच तैं हा काल ।।।

जय जय जय बजरंग बली जय,जय जय जय जय जय श्रीराम।

हाथ जोर के बिनती हावय, भारत भुँइया हो सुखधाम।।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

आल्हा छन्द-।। बीर हनुमान ।।

 आल्हा छन्द-।। बीर हनुमान ।।


रामदूत सुन हे बजरंगी, पवन तनय तै हर हनुमान।

नइहे कोनो ये दुनिया मा, तोर असन देवा बलवान।।1


देह वज्र के जइसन तोरे, गति हा हावय पवन समान।

महावीर विक्रम बजरंगी, हावस तै अब्बड़ गुणवान।।2


राम काज ला तहीं बनाये, लिये हवस देवा अवतार।

पता लगाये मातु सिया के, सौ जोजन जा सागर पार।।3


लंका जा के लंक जराये, टोरे रावण के अभिमान।

थर थर काँपै तोर नाम ले, बड़े बड़े सब मरी मशान।।4


राम नाम के हरदम मन मा, करथस देवा तैं गुणगान।

रामभक्त जग नाम पुकारे, मिले हवै तोला वरदान।।5 


-गुमान प्रसाद साहू 

 समोदा (महानदी) ,आरंग 

जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ 

छन्द साधक सत्र-6

हनुमान वंदना - अमृतध्वनि छंद

 हनुमान वंदना - अमृतध्वनि छंद


वंदन हे हनुमान जी,बड़ तँय बुद्धि निधान।

तोर शरन मा  आय हँव, देवव मोला ज्ञान।।

देवव  मोला, ज्ञान  मारुती, अड़हा  हावँव।

छंद लिखेबर,मँय तो थोकन,गुन ला पावँव।।

लाल पवनसुत, तँय बजरंगी, अँजनी नंदन।

ये लइका  बर, बनौ  सहाई, करथौं  वंदन।।


बोधन राम निषादराज✍️

मनहरण घनाक्षरी- बजरंगबली

 मनहरण घनाक्षरी

बजरंगी हनुमान,संकट करे निदान,

देख के शक्ति उँकर,सब थरराय जी।

राम बसे कण कण, पावन सुग्घर मन,

सिया राम छाती मा तो,चीर के दिखाय जी।।

लक्ष्मण ला लगे शक्ति,जागिस हावय भक्ति,

तुरते उड़े तँय हा,संजीवनी लाय जी।

काज करे उपकारी,बजरंगी बलिहारी,

दुष्ट दलन ला सब,मार के भगाय जी।।

विजेंद्र वर्मा

नगरगाँव (धरसीवाँ)

Tuesday, April 19, 2022

विधान- *अरसात सवैया*

विधान- *अरसात सवैया*

विधान- 7भगन+रगन

(7बार211)+(1बार 212)


उदाहरण

ठुम्मक ठुम्मक पाँव उठावय, आँगन मा ठुमके मनमोहना।

छुन्नुक छुन्नुक पैजन के जब छुन्न सुनै कुलके मनमोहना।

माखन खावय हाँसत जावय, बाँसुरिया धरके मनमोहना

देख जसोमति लाड करे बर माखन ला फुरके मनमोहना।

 अरुण निगम

विधान- अरविंद सवैया

 विधान- अरविंद सवैया 

अरविंद सवैया- 

8 घव सगन + लघु

112×8 + लघु


उदाहरण-

खँइता तन के खँइता मन के, खँइता धन के करथे मतवार।

डउके तरसे लइका कलपे कब के बिसराइन तीज तिहार।

नहकाय भला कइसे नदिया घुनही घनई टुटहा पतवार।

तज दे भइया मँद नास करे, मनखे सँग मा समुहे परिवार।


   अरुण निगम

विधान- मंदारमाला सवैया

 विधान- मंदारमाला सवैया


*मंदारमाला सवैया-7 पइत* *तगण +गुरु*

                    (221×7+2)

चारो पद के अंत मा तुकांत


बोझा उठाके पढ़ाना लिखाना

221,  221,   221 ,22

दिखे मीठ खाये म लागे करू 

1,  221,  221,     221,2


उदाहरण 

बोझा उठाके पढ़ाना लिखाना दिखे मीठ खाये म लागे करू। 

कालेज ब्यौपार के आज अड्डा जिहाँ फीस बस्ता दुनो हे गरू।

आवै कहाँ सीख के गाँव मा लाट साहेब साही फिरै बोंदरू। 

का फायदा देख पावै नही ओह माँ बाप के पाँव के गोखरू। 


अरुण कुमार निगम 

विधान-मुक्ताहारा सवैया

विधान-मुक्ताहारा सवैया


मुक्ताहरा सवैया-8घाव जगण(121×8)


किसान कहे लइका मन ला तुम 

121 ,  12 1, 12 1,   121, 1

नाँगरिहा बन अन्न उगाव

21, 12 1,121,   121


उदाहरण-


किसान कहे लइका मन ला तुम नाँगरिहा बन अन्न उगाव।

इहाँ अपने मन बीच बसो झन गाँव तियाग विलायत जाव।

मसीन बरोबर लोग उहाँ न दया न मया न नता न लगाव।

सबो सुख साधन हे इहिचे धन दौलत देख नहीं पगलाव। 


 अरुण कुमार निगम जी


विधान-वाम सवैया-

 विधान-वाम सवैया-

विधान-(7जगण)+(1यगण)

                 (121×7)+(122)


किसान उठावय नाँगर ला अउ 

121 ,   121, 121 , 121, 1

जोतय खेत बिना सुसताए 

21,  121,  121,  122


उदाहरण-

किसान उठावय नाँगर ला अउ जोतय खेत बिना सुसताए।

कभू बिजरावय घाम कभू अँगरा बरसे तन खून सुखाए। 

तभो नइ मानय हार सदा करमा धुन गा मन मा मुसकाए।

असाढ़ घिरे बदरा करिया बरखा बरसे हर पीर भुलाए।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-लवंगलता सवैया

 विधान-लवंगलता सवैया 


लवंगलता सवैया-(8जगण)+(1लघु)

                         (121×8)+(लघु 1)

चार डाँड़,चारो आपस मा तुकांत


-किसान हवै भगवान बरोबर 

  121,   121, 121,121,1

चाँउर दार गहूँ सिरजावय 

21,  121,121, 121,1


उदाहरण-

किसान हवै भगवान बरोबर चाँउर दार गहूँ सिरजावय ।

सबो मनखे मन पेट भरें गरुवा बइला मन प्रान बचावय। 

चुगे चिड़िया धनहा-दुनका मुसुवा खलिहान म रार मचावय।

सदा दुख पाय तभो बपुरा सबला खुश देख सदा हरषावय। 


 अरुण कुमार निगम 

विधान-मोद सवैया

 विधान-मोद सवैया


मोद सवैया मा भगण के संगेसंग मगण अउ सगण के प्रयोग होथे।


विधान- 5घाव भगण+मगण +सगण+गुरु

(211×5)+(222)+(112)+(गुरु)


दू दिन के रहना बसना बस काबर 

211,  211, 211 , 211,  211

माया मोह भुलाना

22 2,   112,  2


उदाहरण -

दू दिन के रहना बसना बस काबर माया मोह भुलाना।

सुग्घर बाँट मया सबला मनखे जिनगी के काय ठिकाना।

काम कभू कखरो नइ आवय छोड़ सकेले माल खजाना।

सार इही जगमा सबला बस हावय जी आना अउ जाना।


 अरुण कुमार निगम

विधान-जल-हरन घनाक्षरी

 विधान-जल-हरन घनाक्षरी


 १६,१६ बरन मा यति (हर दांड मा कुल बरन ३२) अउ आखिर मा नान्हें , नान्हें  माने लघु , लघु आथे  (८,८,८,८ आखिर मा  नान्हें, नान्हें) 


*उदाहरण*


*रखिया बरी (जल-हरण घनाक्षरी)*


(1)

रखिया   के    बरी   ला    बनाये   के   बिचार    हवे

धनी  टोर  दूहू   छानी  फरे  रखिया के  फर.

उरिद  के  दार  घलो   रतिहा   भिंजोय  दूहूँ

चरिह्या-मा  डार , जाहूँ   तरिया  बड़े  फजर

दार  ला नँगत  धोहूँ  चिबोर  -  चिबोर  बने

फोकला  ला  फेंक दूहूँ , दार  दिखही  उज्जर.

तियारे  पहटनीन  ला  आही    पहट   काली      

सील  लोढ़हा मा दार पीस देही  वो सुग्घर।।


(2)

मामी  , ममा  दाई , मटकुल  मोर  देवरानी

आही  काली  घर  मोर बरी ला  बनाये  बर.

काकी  ह कहे हे  काली करो  दूहूँ रखिया ला

कका  काकी  दुनो  झिन खा लिहीं इही डहर.

रखिया  के  बरी  के तियारी हे  तिहार कस

सबो  सकलाये  हवैं   घर  लागथे   सुग्घर.

कोन्हों बैठें खटिया मा, कोन्हों बैठे पीढ़्हा मा

भाँची भकली तँय माची, लान दे न काकी बर।।


(3)

फेंट - फेंट  घेरी - बेरी , कइसे  उफल्थे  बरी

पानी  मा बुड़ो  के देखे , ममा दाई के नजर.

टुप - टुप  बरी डारैं , सबो  झिन  जुर मिल

लुगरा  बिछा  के  बने ,  फेर   पर्रा  ऊपर.

पीसे  दार  बटकी  मा ,  अलगा के मंडलीन

तात - तात बरा  ला , बनात हे खवाये  बर.

लाल  मिरचा  लसुन  पीस  के  पताल  संग

चुरपुर   चटनी   बरा   के  संग  खाए  बर ।।


(4)

दार  तिल्ली अउ बीजा रखिया के सानथवौं

पर्रा  भर  बिजौरी  बना  लेहूँ  सुवाद  बर

नान्हे  बेटी  ससुरार  ले  संदेसा  भेजे हावे

दाई  पठो  देबे  बरी -बिजौरी  दमाद  बर.

रखिया  के  बरी  अऊ  बिजौरी हमार  इहाँ

मइके  के  हाल चाल  के  पहुँचाथे   खबर

बरी – बिजौरी के  अउ  कतका बखान करौं

दया-मया , नाता-रिस्ता, ला बढ़ाथे ये सुग्घर ।।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-रूप घनाक्षरी

 विधान-रूप घनाक्षरी


विधान - 8, 8, 8, 8 वर्ण मा यति

अंत मा गुरु-लघु 


*उदाहरण*


*गाँधी के गोठ*

 (रूप घनाक्षरी)

(8,8,8,8 अंत गुरु, लघु)


गाँधी जी के गोठ ला भुलावौ झन भैया हो रे

हाथ के कूटे-पीसे चाँउर-दार आटा खाव

ठेलहा बेरा मा रोज चरखा चलाव अउ

खादी बुन पहिनत अउर ओढ़त जाव ।

गाँव-गोड़ा छोंड़ के सहर जाके बसौ झन

गाँव के खेती-बारी उद्योग-धन्धा पनपाव

एक माई के पिलवा साहीं रहो सब झन

सहकारिता मा तुम सुखी सब ला बनाव ।।

 जनकवि कोदूराम "दलित" जी*

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विधान- घनाक्षरी छन्द –

विधान- घनाक्षरी छन्द –

 घनाक्षरी ला कवित्त घलो कहिथें. येहर बारनिक छन्द आय फेर येमा गन वाले बन्धन नइ रहाय. एमा मातरा नइ गिने जावय. बरन गिने जाथय. आधा बरन घलो नइ गिने जाये. ४ डाँड़ के घनाक्षरी मा ३०, ३१, ३२ या ३३ बरन होथे. बरन के गिनती अनुसार येखरो भेद रहिथे. ३० अउ ३३ बरन वाले घनाक्षरी छन्द मा लय वतिक गुरतुर नइ लागय, ते पाय के ३१ अउ ३२ बरन के घनाक्षरी छन्द ज्यादा लिखे गे हे. वहू मा मनहरन  घनाक्षरी अउ रूप घनाक्षरी छन्द ज्यादा लोकप्रिय होय हें.


*मनहरण घनाक्षरी* – १६,१५ बरन मा यति (हर दांड मा कुल बरन ३१) अउ आखिर मा बड़कू माने गुरु आथे. 


( ८,८,८,७ के यति अउ आखिर मा नान्हें-बड़कू (लघु,गुरु) आये ले ज्यादा अच्छा माने जाथे.) 


विधान =8-8-8-7 (अंत मा लघु गुरु)

*विषय - भ्रष्टाचार*


भ्रष्टाचार बाढ़े देखौ,सुरसा वो ठाढ़े देखौ,

जघा-जघा मनखे हा,होवै हलकान गा।

बिन पैसा काम नहीं,आसरा के नाम नहीं,

चपरासी घलो देखौ,होगे बइमान गा।।

आफिस मा बाबू बैठे,साहब हा मेंछा ऐंठे,

रिश्वत के बिना कुछु,काम न आसान गा।

मनखे हा भटकथे,भ्रष्टाचारी झटकथे,

होवत  लाचार सबो, छूटथे परान गा।।

अरुण निगम

वार्णिक छंद - ~~~~~~~~~~~~

 वार्णिक छंद - 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

*अभी तक आप मन जउन जउन छन्द के अभ्यास करे हव, ओमन सब मात्रिक छन्द कहे जाथें।  अब हम वार्णिक छन्द के अंतर्गत सवैया के अभ्यास करबो। मात्रिक छन्द मा मात्रा के गणना करे जाथे।वइसने वार्णिक छन्द मा वर्ण के गिनती करे जाथे*


राम के मात्रा गुरु + लघु 

           माने   2  + 1 

कुल 3 मात्रा हे। 


राम के वर्ण  रा + म

          माने  1 +  1

कुल 2 वर्ण हे।


माने वार्णिक छन्द मा वर्ण या अक्षर के गिनती होथे। 


आवारा के मात्रा 6 गिने जाही फेर आवारा मा 3 वर्ण गिने जाही। माने 3 अक्षर के शब्द ।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

 *गण के पाठ*


सवैया सीखे के पहिली हमन ला गण के पाठ पढ़ना पढ़ही। आज के पाठ मा जानव कि गण का होथे ?


3 अक्षर के शब्द मा लघु अउ गुरु मात्रा लगाना हे त कतिक प्रकार से लगाए जा सकथे ? 

एखर उत्तर हे 8 प्रकार । अब देखव ये 8 प्रकार कइसे होही। 

(1) लघु, लघु, लघु माने 1, 1, 1

(2) गुरु, गुरु, गुरु  माने  2, 2 2

(3) लघु, लघु, गुरु माने 1, 1, 2

(4) लघु, गुरु, लघु माने 1, 2, 1

(5) लघु, गुरु, गुरु  माने 1, 2, 2

(6) गुरु, लघु, गुरु  माने  2, 1, 2

(7) गुरु, गुरु, लघु  माने  2, 2, 1

(8) गुरु, लघु, लघु  माने 2, 1, 1


3 अक्षर वाला कोनो शब्द मा लघु, गुरु मात्रा के प्रयोग करके ऊपर के 8 के अलावा कोनो 9 वां प्रकार बन सकथे का ? कोशिश करके देखव। 🙏

ये 8 प्रकार के गण के नाम अउ मात्रा के क्रम याद रखे बर एक सूत्र बनिस हे, शायद आप मन हाई स्कूल के जमाना मा हिंदी विषय मे पढ़े होहू। सूत्र अइसन हे - 

*यमाताराजभानसलगा*


ये सूत्र मा कुल 10 अक्षर हें। पहिली के 8 अक्षर मा गण के नाम बनथे। 

य -  यगण 

मा - मगण 

ता - तगण 

रा -  रगण 

ज - जगण 

भा - भगण

न  -  नगण

स - सगण

ये 8 प्रकार के गण के नाम होगे। अंतिम दू अक्षर *लगा* हें।

ल के मतलब - लघु, अउ

गा के मतलब - गुरु होथे। 


सूत्र के हर अक्षर के मात्रा देखव - 


यमाताराजभानसलगा

 12 2 2 1 2 11 12


जउन गण के मात्रा जानना हे ओखर अक्षर ला लेके लगातार तीन अक्षर के मात्रा मा लघु, गुरु के क्रम देखव। संबंधित गण के मात्राक्रम मिल जाही।


यगण के मात्रा - य ला पहिली अक्षर गिनव। एखर बाद के दू अक्षर अउ लेवव। 

यमाता 1,2,2 


माने जब एक लघु के बाद दू गुरु आही ओला यगण कहे जाही। 


अब अगर ये जानना हे कि रगण के मात्रा कइसे होही, तब र ले गिनती शुरू करव। 

राजभा   2, 1, 2 माने गुरु, लघु, गुरु जहाँ आही, वोहर रगण कहे जाही। 


दोहा के अभ्यास मा आप सुने रहेव कि कोनो चरण के शुरुवात जगण से नइ होना चाही। अब ये सूत्र मा देखव कि जगण के मात्राक्रम का रही - 

जभान माने 1, 2, 1 माने लघु, गुरु, लघु के मात्राक्रम जहाँ आही वोहर जगण कहे जाही। 


सगण का होथे ? ये जाने बर *स* ला पहला अक्षर गिनव अउ एखर बाद के दू अक्षर अउ लेवव। 


सलगा माने 1, 1, 2 माने लघु, लघु, गुरु के मात्राक्रम जिहाँ आही उहाँ सगण होही। 


*ये सूत्र ला कॉपी मा नोट करके तब तक रटव, जब तक ये कंठस्थ न हो जाय*


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

 *अभ्यास*


पाठ ला पढ़े अउ सूत्र ला रटे के बाद निम्नांकित शब्द मन के मात्राक्रम लिख के गण के नाम लिखव। 


*उदाहरण* 

बियासी   122   यगण


अभ्यास बर शब्द - 

रतन, व्यापारी, कलगी, सुपारी, लगान, पाताल, गोरसी, सावन


उत्तर लिखे बर हड़बड़ी नइ करना हे। पाठ ला आराम से पढ़व । सूत्र ला समझव ओखर बाद उत्तर लिखव।

🙏🙏🙏🙏🙏


 अरुण कुमार निगम 

विधान-सुमुखी सवैया

 विधान-सुमुखी सवैया


विधान-(7घाव जगण)+(लघु+गुरु)

              कुल चार पद,आपस मा तुकांत

किसान उगाय तभे मिलथे 

121,   121, 12 1,  12

अन पेट भरे बर ये जग ला

1, 1 21,121,12 1,1 2


उदाहरण-

किसान उगाय तभे मिलथे अन पेट भरे बर ये जग ला।

अजी सुध चेत नही इन ला धनवान सबो समझे पगला।

अनाज बिसा सहुकार भरे खलिहान किसान रहे कँगला।

सहे अनियाय तभो बपुरा नइ छोड़य ये सत के सँग ला।।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-महाभुजंग प्रयात सवैया* –

 *विधान-महाभुजंग प्रयात सवैया* –


ये यगण आधारित सवैया आय। यगण माने यमाता माने लघु, गुरु, गुरु माने मात्राक्रम 122


विधान - 


कुल पद (डाँड़) संख्या - 4


तुकांतता - चारों पद आपस मा तुकांत होना जरूरी।


हर पद मा सरलग 8 यगण होना चाही।


*उदाहरण* -


धान के कटोरा (महा भुजंग-प्रयात सवैया) 


नवा देस जाबे कमाये ब पैसा , न संगी न साथी न रद्दा ठिकाना ।

ददा हे न दाई  न भाई - हितेसी, घड़ी दू घड़ी थाह ले फेर जाना ।

इहाँ का कमी नौकरी - चाकरी के, इहाँ आन हे मान हे कारखाना ।

इहाँ खेत मा सोन के खान हे, धान के ये कटोरा कहे जी ज़माना ।।


नवा देस जाबे कमाये ब पैसा , 

122   122    122   122


न संगी न साथी न रद्दा ठिकाना

122    122     122   122


अरुण कुमार निगम 

विधान,-*मत्तगयंद सवैया*

 विधान,-*मत्तगयंद सवैया*

उदाहरण-


होय हवै मनखे कइसे समझे नइ काबर झूठ लबारी।

दानव हे बनके बइठे इतरावत हावय देखव भारी।

देख दशा बिगड़े बिगड़े अब रोवत हे धरती महतारी।

कोन लगावय पार इहाँ अब हे मनमोहन कृष्ण मुरारी।


विधान-7 भगण +गुरु+गुरु

211×7+(22)


होय हवै मनखे कइसे सम 

211   211  211  211

झै नइ काबर झूठ लबारी

211    211  211(22)


येला माताली सवैया घला कहिथे।

 श्री अरुण कुमार निगम

विधान-किरीट सवैया

 विधान-किरीट सवैया


आज नवा सवैया के अभ्यास करबो


विधान 

8 भगण(211×8)

चार डाँड़ 

हर डाँड़ आपस मा तुकांत


उदाहरण 

बोइर कूट गटागट खावत प्राइमरी इसकूल म जावन। 

दू पइसा मिल जाय कहूँ झट भाग बजार कुछू कहिं खावन।

मार पड़े अउ दाँड़ लगे तब ले लुक भाग नही घर आवन।

नैन म झूलय का बतलावँव वो दिन के सुरता मनभावन।


बोइर कूट गटागट खावत

211- 21 1-211- 211

प्राइमरी इसकूल म जावन

211-211-211- 211


 अरुण कुमार निगम 

विधान-बागीस्वरी सवैया

 विधान-बागीस्वरी सवैया


विधान-7पईत यगण+लघु+गुरु

           (122×7+12)


पढ़ाबो सबो ला सिखाबो सबो ला

122     122    122      122

पढ़ाई बिना जिंदगानी कहाँ 

122   122    122    12


उदाहरण 


पढ़ाबो सबो ला सिखाबो सबो ला पढ़ाई बिना जिंदगानी कहाँ। 

न ऐंठो न बैठो चलो खेत संगी पराया भरोसा किसानी कहाँ। 

उगाबो नवा झाड़-पौधा उगाबो बिना पेड़-पौधा रवानी कहाँ। 

इही के भरोसा म संसार बाँचे बिना झाड़-झंखाड़ पानी कहाँ। 


 अरुण कुमार निगम 

विधान- चकोर सवैया

विधान- चकोर सवैया


विधान-7 घाव भगण +बड़कू+नान्हे

           भगण 211×7+(गुरु+लघु)


तूकय माखन के मटकी अउ 

211   211   211  211

लूटय खावय माखनचोर

211   211   211  21


उदाहरण 


तूकय माखन के मटकी अउ लूटय खावय माखनचोर।

हाथ गुवालिन के जब आवय माँगय दान छिपा करजोर।

छोड़य सूरत देख गुवालिन भागय हाँसय दाँत निपोर।

गोकुल मा सबके मन मोहय ये मनमोहन नंदकिशोर।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-सर्वगामी सवैया-7 पइत तगण +(बड़कू-बड़कू)

 विधान-सर्वगामी सवैया-7 पइत तगण +(बड़कू-बड़कू)

(221×7+2+2)


गिल्ली न डंडा कबड्डी  न खो खो

221 ,221,221,22

न हाँकी न कुश्ती न पंजा लड़ाई

1, 221, 221,221,22


उदाहरण 

गिल्ली न डंडा कबड्डी न खो खो न हाँकी न कुश्ती न पंजा लड़ाई।

भौंरा न बाँटी न गेड़ी गड़ौला भदौला अखाड़ा न बोझा उठाई। 

तीरी न पासा न कौड़ी न गोंटा न रस्सी न मस्ती न मेला मड़ाई। 

भैया नँदागे सबो खेल देसी बिना खेल खेले नहीं हे भलाई।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-आभार सवैया

 विधान-आभार सवैया



विधान- 8घाव तगण (221×8)


लोटा धरे गाँव मा मोर आएव

221    221   221    221

आके बड़े जान कोठी बनालेव 

221    221      221  221


उदाहरण-

लोटा धरे गाँव मा मोर आएव आके बड़े जान कोठी बनालेव।

नाता जता सोनहा खेत लूटेव बारी नदी खान ला पोगराएव।।

बाँचे खुचे झोपड़ी ला घलो आप छोड़े नहीं हौ वहू ला नँगाएव।

बाँटे लुटावै तभो हाँसथे रोज आवै इहाँ लोग भोला महादेव।।

 अरुण कुमार निगम 

विधान- गंगोदक सवैया

विधान- गंगोदक सवैया

विधान-8घाव रगण(212×8)

         चार पद,आपस में तुकांत


खेत मा साँस हे खेत मा आस हे

212     212     212   212

खेत हे तो इहाँ देह मा जान हे

212    212   212   212


उदाहरण 

खेत मा साँस हे खेत मा आस हे,खेत हे तो इहाँ देह मा जान हे।

देख मोती सही दीखथे जी गहूँ,धान के खेत मा सोन के खान हे।

माँग के खेत ला का बनाबे इहाँ ,खेत ला छोड़ ये मोर ईमान हे।

कारखाना लगा जा अऊ ठौर मा,मोर ये खेत मा आन हे मान हे।


 अरुण कुमार निगम 

विधान-मदिरा सवैया

 विधान-मदिरा सवैया

विधान -7बार भगण +बड़कू


(211×7)+बड़कू(गुरु)

चारों पद आपस मा तुकांत


तीज तिहार सदा सुख दे मन 

211,211,211,211

मा उलहास उमंग भरे।

211,211,211,2


उदाहरण

तीज- तिहार सदा सुख दे मन मा उलहास उमंग भरै ।

कातिक दीप अँजोर करे फगुनावय तो रस रंग झरै।।

मेल-मिलाप बढ़ाय सदा सुविचार इहाँ सतसंग करै।

तीज-तिहार बतावँव का दुनिया भरके सब दु:ख हरै।।


* अरुण कुमार निगम *

विधान-शक्ति छन्द*



*विधान-शक्ति छन्द*  



*डाँड़ (पद) - ४*



तुकांत के नियम - *दू-दू डाँड़ मा, आखिरी मा*


*डाँड़ के आख़िरी मा लघु, लघु, गुरु (११२) या गुरु, लघु, गुरु (२१२) या लघु, लघु, लघु (१११) आना चाही*



*हर डाँड़ मा कुल मात्रा – १८*


*हर डाँड़ मा पहिली अक्षर के मात्रा लघु होना चाही*


खास - *हर डाँड़ मा १, ६ ,११ अउ १६ वीं मातरा लघु होना चाही*


*उदाहरण*


*गाँव मा (शक्ति छन्द)*


दया हे मया हे , सगा ! गाँव मा

चले आ कभू , लीम के छाँव मा ।

हवै  जिंदगी का ? इहाँ जान ले

सरग आय सिरतोन , परमान ले।।


सचाई  चघे  हे , सबो  नार मा

खिले फूल सुख के , इहाँ डार मा ।

सुगंधित हवा के चिटिक ले मजा

चिटिक झूम के आज माँदर बजा।।


मजा आज ले ले न , चौपाल के

भुला दे  सबो दु:ख , जंजाल के ।

दया हे मया हे , सगा ! गाँव मा

चले आ कभू , लीम के छाँव मा।।


*अरुण कुमार निगम*

: शक्ति छंद के

सूत्र - 122 - 122 - 122 - 12

विधान-छन्न पकैया छंद

 विधान-छन्न पकैया छंद


येहर सार छन्द के एक किसिम हे. येमा “छन्न पकैया- छन्न पकैया” एक टेक बरोबर सुरु मा आथे. माने हर छन्द के पहिली विषम चरण के शुरुवात “छन्न पकैया- छन्न पकैया” ले होथे। बाकी सब नियम सार छन्द के लागू होथे. 


*उदाहरण* 



सियानी गोठ (छन्न पकैया)



छन्न पकैया छन्न पकैया , सुन भइया बैसाखू 

केन्सर साहीं लाय बिमारी , माखुर अऊ गुड़ाखू  | 


छन्न पकैया छन्न पकैया, तन-घर लूटै दारू 

तहूँ छोड़ दे पीना-पाना , छोड़ दिहिस बुधवारू | 


छन्न पकैया छन्न पकैया, मानौ गोठ सियानी 

नसा नास के कारन होथे, कहैं  डाकटर ग्यानी |


छन्न पकैया छन्न पकैया, शौचालय बनवावौ

खेत-खार अउ सड़क तीर मा, लोटा धर झन जावौ ||


छन्न पकैया छन्न पकैया,बीमारी दुखदाई 

परन करौ  घर गाँव गली मा, रखबो हमन सफाई ||


छन्न पकैया छन्न पकैया, इस्कुल हम बनवाबो

नान-नान लइका ला ओमा, भरती हम करवाबो ||


छन्न पकैया छन्न पकैया, खोलौ  बैंक म खाता 

काम न आवै बिपत काल मा, भइया कोन्हों नाता ||  

  

छन्न पकैया छन्न पकैया, पानी सबो बचावौ 

वाटर-हार्वेस्टिंग के टंकी, घर-घर मा खनवावौ ||


छन्न पकैया छन्न पकैया, जंगल हे जिनगानी 

जिहाँ झाड़ जंगल हे ज्यादा, उहुँचे बरसै  पानी ||


*अरुण कुमार निगम*

विधान- दुर्मिल सवैया* -

 

*विधान- दुर्मिल सवैया* - 


विधान - कुल पद के संख्या 4

तुकांत - चारों पद आपस मा तुकांत 

गण के संख्या - प्रत्येक पद मा 8 सगण 


*उदाहरण -*

 (दुर्मिल  सवैया)  – सगण 112 X 8


*बलराम* - 


लडुवा पपची खुरमी अरसा मुठिया गुझिया बिरिया बबरा।

खसता मुरकू मिरची भजिया मिरचा चटनी अउ मूँग बरा।

पकवान बनाय जसोमति माँ अउ बोलय ये बलराम करा।

बस आवन दे किसना, पकवान परोस दुहूँ तुम्हला सँघरा।


8 सगण - 

लडुवा पपची खुरमी अरसा

  112  112  112   112

मुठिया गुझिया बिरिया बबरा।

112    112    112    112


*आपमन अब 8 सगण वाले 4 पद लिखव, चारों पद आपस मा तुकांत होना चाही।*


*मोर उदाहरण जइसे हर शब्द के नीचे 112 लिखे के जरूरत नइये। ये समझाये बर उदाहरण रहिस। आप केवल 4 पद लिखव।*



मोर उदाहरण मा  बरा, बरा, करा अउ घरा के तुकांत हे। 


एमा *बरा* के तुकांत दू बार होगे हे। ये नइ होना चाही।


 चारों तुकांत चार अलग-अलग रखना हे। 

🙏🙏🙏🙏🙏


* अरुण कुमार निगम*

विधान-सुन्दरी सवैया*

 *विधान-सुन्दरी सवैया*                           




- 8 घाव सगण+ एक गुरु


सगण।।s यानि (112 X 8) अउ एक गुरु(s)


तुकांत - चारों पद मा होना चाही।


गरुवा बछरू मुरली धर के,

112   112  112  112


(सँग गो)(प-गुवा)(लन जा)

  112     112      112


(वय का) (न्हा)

   112      2


*उदाहरण*


*कान्हा (सुन्दरी सवैया)* 


गरुवा बछरू मुरली धर के, सँग गोप-गुवालन जावय कान्हा ।

मथुरा बिंदराबन के बन मा , मुरली मदमस्त सुनावय कान्हा ।

मटकी भर माखन मंझन के, सबला बलवाय खवावय कान्हा ।

जब साँझ ढले लहुटे घर मा , अउ गोधन संग म लावय कान्हा ।।


पुन: ध्यान देवावत हँव-


*सवैया के 20 प्रकार हे।*


 *हर सवैया मा चार पद (पंक्ति) होथे।*


 *चारों पद के आपस मा तुकांत होना अनिवार्य हे।*


 *सवैया लिखे के पहिली चार तुकांत शब्द सोच के रखना चाही।*


 *सवैया, वार्णिक छन्द आय। एमा गण के प्रयोग होथे।*


 *गण के संख्या अउ अंत मा लघु, गुरु के संख्या के आधार मा सवैया के 20 प्रकार होथे।*


 *अभी हम सगण आधारित सवैया के अभ्यास करत हन।*


 *दुर्मिल सवैया मा 8 सगण ।*


 *अब,*

 *सुंदरी सवैया मा 8 सगण के अलावा अंत मे एक गुरु रही*


*अरुण कुमार निगम*

विधान- *चौपई छन्द*

विधान-

*चौपई छन्द* 

 (15-15)



*विधान* -

 15 - 15  मात्रा के 4 चरण वाले समपाद मात्रिक छन्द आय.

*विशेष बात-*

हर चरण के शुरू मा 2 मात्रा (द्विकल)अउ आखिरी मा गुरु-लघु माने 2,1 के त्रिकल आथे. अगर चौपाई छन्द के आख़िरी के 1 मात्रा  कम कर दिये जाय तो चौपई छन्द बन जाथे. 


*तुकान्त -*

 चारों चरण या प्रत्येक 2 चरण आपस मा तुकान्त होना चाही।


खास – *येला जयकरी या जयकारी छन्द घलो कहिथें*


*उदाहरण* - 


*छत्तीसगढ़ के भाजी-पचीसा*

              (चौपई छन्द) 


तिनपनिया के पाना तीन | झंगलू झटकै खावै छीन ||

गरमी के  भाजी  हे  चेंच | कस डारे भेजा के पेंच ||


महँगी  हे  भाजी बोहार | खीसा मोर हवै लाचार ||

चौलाई के बात न पूँछ | चैतू खावै  अइंठय मूँछ ||


भाजी लाल खाय लतखोर ।बिक्कट हाँसे दाँत निपोर ||

पालक पकलू के मन भाय | पचकौड़ी ला नँगत सुहाय ||


करमत्ता जब मंगतू खाय | अउ दे कहिके माँगत जाय ||

दार चना सँग भाजी प्याज |खाहूँ कहै  समारू आज ||


मुस्केनी मुच-मुच मुस्काय | पहिली असन नजर नइ आय ||

खाँसै  तभो खोटनी खाय | खोरबाहरा  मन लुलुवाय ||


बरबट्टी के भाजी मीठ | बंठू बनके खावै ढीठ ||

खाय पथरिया ला पतिराम | गूने घरवाली के नाम ||


कनवा समधी जंगल जाय | कोंवर देख चरोंटा लाय ||

मुनगा भाजी के गुन जान | खावै मंगलू मोर मितान || 


खावै जब सरसों के साग |  फगुवा  खूब सुनावै फाग || 

जब जब पोई भाजी लाय | भगतू भइया भजिया खाय || 


मनबोधी मेथी रँधवाय | करु लागै पर गजब मिठाय || 

मस्त मुरौठी गजब सुवाद | माँगै मगन मदन उस्ताद || 


गुन्डरू खावै गंगाराम | दिनभर करै  हकन के  काम || 

पटवारी जब पटवा खाय | पट्टा-खाता तुरत बनाय || 


भाजी- चना हवै चितचोर | मन मा हरियर उठे हिलोर ||

खाय गोल भाजी गुन गाय | गनपत गुन-गुन गावत जाय ||


कोंवर-कोंवर कोंहड़ा पान | भाजी आज बनाबो लान || 

इडहर बर अटके हे प्रान | लावौ  झटकुन कोचइ पान || 


गोभी भाजी गजब मिठाय |  खावै गुहाराम हरसाय ||

भाजी के लेवव आसीस। गिन डारव होगे पच्चीस।।

अरुण निगम

*अरुण कुमार निगम*

विधान-*चौपाई छन्द*


विधान-*चौपाई छन्द*  


16-16 मात्रा के 4 चरन वाले समपाद मात्रिक छन्द आय. 


4 चरन के एक चौपाई होथे. 

2 चरन के एक अर्द्धाली

 (आधा चौपाई) होथे 


*चरन के आख़िरी मा-*

 2 2, 

1 1 2, 

 2 1 1 या 

1 1 1 1


*खास-* 

अंत मा जगण(121) या तगण(221) के मनाही हे.


उदाहरण - 


*छत्तीसगढ़ के बियंजन-छत्तीसा (चौपाई)*




बर-बिहाव के माड़िस मड़वा | रोज छनत हे पपची लड़वा || 

बाँट तसमई के परसादी | गदगद होवत हे पड़-दादी || 


आठ ठेठरी सरलग खावै | तभो तिहारू नहीं अघावै ||    

सैघो एक अँगाकर खावै | तब बंठू बूता बर जावै || 


जुडवाँ जुगरू-जगन जुगाड़ू | खावैं खूब करी के लाड़ू ||

नरियर अउर चिरौंजी लावै |तब खेदू खुरमी बनवावै || 


होटल के झन खाव कचौरी | लाव मसूर बनाव बफौरी ||  ,

मुठिया ला चटनी सँग खावौ  | अउ सुस्ती ला दूर भगावौ ||  


हाट सनिच्चर के जब जावौ | रइपुरहिन के अरसा लावौ ||

घेरी-बेरी खा झन किरिया | आज बरातू खा ले बिरिया || 


फिरतू कहै फरा मँय  खाहूँ | तब्भे काम करे बर जाहूँ ||  

आलू-गोभी के तरकारी | खूब सपेटत हे सोंहारी ||


दही बरा के ले चटखारा | तब जावै भइया के सारा ||

सारा के हे नाम भखाड़ू , तूकत हावै मुर्रा लाड़ू ||


पितर-पाख मा पुरखा आवैं | उरिद बरा खा के हरसावैं  ||  

चनाबूट भूँजै मनटोरा | हाट-बजार म बेंचै होरा ||


इडहर बर कोचइ के पाना | लाने हे नन्दू के नाना ||

बिन कुसली के होरी कइसे | बिना रंग पिचकारी जइसे ||        


बरी बिजौरी के महिमा ला | पूछौ जी छत्तिसगढ़िया ला |

जउन गोंदली-बासी खावैं  | सरी जगत बढ़िया कहिलावैं ||   


तिखुर सिंघाड़ा कतरा खावौ | कमजोरी ला दूर भगावौ ||

डबकत तेल म बबरा छानैं | नवा बहुरिया मन नइ जानैं ||  


आम-पना पी घाम म भागै | कहै  सियनहा लू नइ लागै ||

तिलिया रांधे बर तिल हेरै | फेर तिहारू घानी फेरै ||           


पिठिया नुनछुर नुनछुर लागै | खाये मा ये कुरकुर लागै  || 

रसगुल्ला जइसे दहरौरी | राँधे बर जानै बस गौरी ||           


बिनसा के अब नाम नँदागे | जउन पनीर सहीं हे लागे ||        

कोन केवचनिया ला जाने | ये हर ताकत दे मनमाने ||          


नान्हेंपन के सुरता गुरतुर | अमली-लाटा चुरपुर चुरपुर ||

बोइर कूट सबो ला भावै | टूरा टूरी दुन्नों खावै  ||


अमरस के पपड़ी खट-मिट्ठा | ओकर आघू सबकुछ सिट्ठा ||

हम्मन खावन गुड़ के पपड़ी | मरवाड़ी मन झड़कैं रबड़ी ||  


गुरतुर-गुरतुर गुलगुल भजिया | फगनू हर खावै फुरसतिया ||

खावैं जुरमिल माई-पीला | सादा नुनहा गुरहा चीला ||


भाई बहिनी पेलमपेला | खावन छीन-झपट चौसेला || 

बर-बिहाव के जोरन खाजा | खायँ बरतिया दुलहा राजा || 


* अरुण कुमार निगम*

आल्हा छन्द-विधान*

 *आल्हा छन्द-विधान*

 *(१६-१५ / बड़कू, नान्हें)*


डाँड़ (पद) - २, ,चरन - ४ 


तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा (सम-समय चरन मा) आखिर मा बड़कू, नान्हें (२,१)


हर डाँड़ मा कुल मातरा – ३१ , 


बिसम चरन मा मातरा – १६  , सम चरन मा मातरा- १५  मातरा मा  


यति / बाधा – १६, १५ मातरा मा  , 


खास - *वइसे त आल्हा छन्द मा अतिशयोक्ति अलंकार जरूरी होथे, फेर बिना अतिशयोक्ति अलंकार प्रयोग के घलो लिखे मा कोनो बुराई नइये*


*उदाहरण* - 


*मँय  हलधरिया सोन उगाथवँ  (आल्हा छन्द)*


महूँ पूत हौं भारत माँ  के, अंग-अंग मा भरे  उछाँह 

छाती का नापत हौ साहिब, मोर कहाँ तुम पाहू थाह ॥ 


देख गवइहाँ झन हीनौ  तुम, अन्तस मा बइठे महकाल  

एक नजर देखौं  तो तुरते,  जर जाथय बइरी के खाल  ॥ 


सागर-ला छिन-मा पी जावौं,  छर्री-दर्री करौं पहार  

पट-पट ले दुस्मन मर जावैं, मन-माँ लावौं  कहूँ बिचार ॥  


भगत सिंग के बाना दे दौ, अंग-भुजा फरकत हे मोर 

डब-डब  डबकै लहू लालबम, अँगरा हे आँखी के कोर ॥ 


मँय  हलधरिया सोन उगाथौं , बखत परे धरथौं बन्दूक ॥ 

उड़त चिरैया  मार गिराथौं , मोर निसाना बड़े अचूक ॥    


बजुर बरोबर हाड़ा-गोड़ा, बीर दधीची के अवतार 

मँय  अर्जुन के राजा बेटा, धनुस -बान हे मोर सिंगार ॥ 


चितवा कस चुस्ती जाँगर-मा, बघुआ कस मोरो हुंकार 

गरुड़ सहीं मँय  गजब जुझारू, नाग बरोबर हे फुफकार ॥  


अड़हा अलकरहा दिखथौं मँय , हाँसौ  झन तुम दाँत निपोर 

भारत-माता के पूतन ला, झन समझौ  साहिब कमजोर ॥


*अरुण कुमार निगम*

विधान: *सार छन्द

 


विधान: *सार छन्द 


*विषम चरण* - कुल 16 मात्रा (अंत मा  *2,1* वर्जित)


(1) 4, 4, 4, 4

(2) 4, 3, 3, 2, 4

(3) 3, 3, 2, 4, 4

(4) 4, 4, 3, 3, 2


*सम चरण* - कुल 12 मात्रा

(अंत मा  *2,1* वर्जित)


(1) 4, 4, 4

(2) 3, 3, 2, 4

(3) केवल विशेष स्थिति मा 

      4, 3, 3, 2

     (माने अंत मा 2,1,2 झन आए)


सोला बारा मा यति देके, सार छन्द लिख डारव।

अंत रखव दू गुरु या चौकल, गुरतुर लय मा गा लव।।


सुरता करलव ! लइकाइपन, आही धीरे धीरे।

"यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे।।


सार छन्द के गीत दूसरा, तुम ला याद दिलाहूँ ।

"माँ खादी की चादर ले दे, मैं गाँधी बन जाऊँ"।।


सार छन्द मा सुरता आ गे, गाना एक पुराना !

"ईचक दाना बीचक दाना, दाने ऊपर दाना।।


*अरुण कुमार निगम*

अनुनासिक अउ अनुस्वार

अनुनासिक अउ अनुस्वार


*चंद्रबिंदु* के प्रयोग *अनुनासिक* कहे जाथे। 


*पूर्ण बिंदु* के प्रयोग *अनुस्वार* कहे जाथे। 


दुनों के उच्चारण मा नासिका माने नाक के प्रयोग होथे।


अनुनासिक मा उच्चारण के बलाघात अतिक हल्का होथे (अल्प अवधि) कि जउन वर्ण ऊपर लगथे, वोकर मूल उच्चारण के समय मा कोनो बढ़ोतरी नइ करे। 


अगर लघु अक्षर मा चंद्रबिंदु लगथे तो एला लगा के पढ़ो या बिना लगाके पढ़ो, उच्चारण के समय एक चुटकी बजे के समय के बरोबर रहिथे। 


जब गुरु अक्षर मा लगथे तभो उच्चारण के समय मा फरक नइ आवय (एक चुटकी बजे के समय ले दुगुना समय लेथे)।आप मन उच्चारण करके अनुभव करव - 


हस / हँस


मझला / मँझला  


गाव / गाँव


खाव / खाँव


*अनुस्वार* माने पूर्ण बिंदु - 


जब कोनो लघु अक्षर के ऊपर अनुस्वार लगथे तब वो अक्षर के उच्चारण *गुरु* के उच्चारण के बरोबर समय लेथे। 


हंस (पक्षी के नाम)


अंग, रंग, संग


*अब हँस अउ हंस के उच्चारण करके देखव। हँ के उच्चारण लघुवत होथे अउ हं के उच्चारण गुरुवत होथे*


*मात्रा गणना मा जब लघु अक्षर के ऊपर चंद्रबिंदु लगे हे तब वो 1 गिने जाथे अउ जब पूर्ण बिंदु लगे हे तब 2 गिने जाथे*


*अनुनासिक माने चंद्रबिंदु हमेशा शिरोरेखा के ऊपर लिखे जाथे। अगर शिरोरेखा के ऊपर कोनो मात्रा घलो हे तब चंद्रबिंदु के प्रयोग नइ करे जाय फेर उच्चारण अनुनासिक वाले उच्चारण होथे*


मँय (शिरोरेखा के ऊपर) ✅


*में* (शिरोरेखा के ऊपर ए के मात्रा के डंडी हे एला *मैँ* नइ लिखे जा सके।


में ✅

मेँ ❎

अरुण निगम

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

आधा अक्षर के मात्रा गणना के नियम*

 *आज के पाठ - आधा अक्षर के मात्रा गणना के नियम*


1 *जब शब्द के पहिली अक्षर आधा रही* तब मात्रा गणना मा नइ आय। 


स्तर , आधा स से शब्द के शुरुवात होवत हे। आधा स गणना मा नइ आही। त के 1 मात्रा अउ र के 1 मात्रा मिलके स्तर शब्द के कुल मात्रा 2 गिने जाही।


2 *जब आधा अक्षर, शब्द के बीच मा आथे* तब वो अपन पहिली वाले लघु मात्रा वाले अक्षर के संग मिलके गुरु माने 2 मात्रा बनाथे। 


बस्तर - ये शब्द मा आधा स, बीच मा आये हे। ये अपन पहिली वाले लघु अक्षर ब, के संग मिलके वोकर मात्रा 2 बना देही। ब अउ आधा स ला 2 गिने जाही। त के 1 अउ र के 1 मात्रा गिने जाही।

बस्तर = (बस्)+(त)+(र)

         =    2   +  1 + 1

         =  4

  

(3)  *जब आधा अक्षर, शब्द के बीच मा आथे* तब वो अपन पहिली वाले *गुरु* मात्रा वाले अक्षर के संग मिलथे फिर आधा अक्षर गिनती मा नइ आय। 


वास्तव - ये शब्द मा आधा स, शब्द के बीच मा आये हे। एकर पहिली के अक्षर *वा* हे। अब आधा स, वा के संग आही। वा के मात्रा 2 हे, आधा स गिनती मा नइ आही। त के 1 मात्रा अउ व के 1 मात्रा। 


वास्तव = (वास्)+(त)+(व)

           =    2   +  1 + 1

         =    4


* अरुण कुमार निगम जी *

संयुक्ताक्षर*

 *संयुक्ताक्षर*


*आधा अक्षर के मात्रा गणना समझ मा आय के बाद संयुक्ताक्षर के मात्रा गणना बहुत सरल हो जाथे।*


*क्ष त्र ज्ञ अउ श्र ये चारों संयुक्ताक्षर दू वर्ण के मेल ले बने हे।देखव-*

क्ष=क् +ष*

त्र =त् +र

ज्ञ =ज् +ञ

श्र =श् +र

*पहिली वर्ण आधा अउ दूसर वर्ण पूरा रहिथे।*

*(ऊपर बताये अनुसार ज्ञ के सहीं विभाजन ज् +ञ आय पर आप अभ्यास बर ग् +य लिख सकत हव।ये सिरिफ टाईप करे के सुविधा बर रही।)*

*ये संयुक्ताक्षर जब शब्द के पहिली अक्षर बिना मात्रा के साथ आही तब लघु माने जाही।*

*क्षय=(क् ष )+य =1+1=2*

*जब शब्द के बीच मा आही*तब एखर विभाजन के आधा वर्ण अपन पहिली वाले वर्ण संग मिल के ओला गुरू कर दिही।*

*वक्ष=(व +क्) +ष =2+1=3*


*अगर पहिली वाले अक्षर गुरु हे तब संयुक्ताक्षर के आधा वर्ण गिनती मा नइ आही।*

पात्र=(पा+त्) +र =(2) +1=3


*ये नियम चारों संयुक्ताक्षर बर लागू होही।*



*अभ्यास - 5*


क्षर, क्षार, त्रय, त्रास, ज्ञान, ज्ञाता, श्रम, श्रवण, रक्षा, दक्ष, मित्रा, यत्र, विज्ञान, विज्ञ, श्रीमान, मिश्री। 


अभ्यास के समय 24 घंटा।

अरुण निगम

र के बात*

 *पाठ - 2*


*'र' के बात*


*आधा व्यंजन अक्षर अउ र व्यंजन के मेल ले बने संयुक्त अक्षर* के मात्रा गणना


आधा व्यंजन अक्षर अउ पूर्ण "र" व्यंजन के मेल ले कुछ संयुक्त अक्षर बनथें। जब अइसन संयुक्त अक्षर शब्द के शुरू या बीच मा आथें तब मात्रा गणना कइसे करे जाथे एला ध्यान से सीखव - 


प अउ र के संयोग ले प्र 

क अउ र के संयोग ले क्र 

व अउ र के संयोग ले व्र आदि


प्र = प् + र

क्र = क् + र

व्र  = व् + र  


*अइसने ख्र, ग्र, घ्र , ज्र आदि*


जब कोनो व्यंजन के खड़े लाइन के नीचे तिरछा छोटे से डंडी खींचे जाथे तब मूल ब्यंजन के संग र के उच्चारण होथे। 

अइसन संयुक्ताक्षर मा हमेशा मूल व्यंजन आधा होके पहिली आथे ।बाद मा र आथे। 


अइसन अक्षर जब *शब्द के शुरू* मा आथें तब ओकर मात्रा के अनुसार मात्रा गिने जाथे। मात्रा अगर लघु रही तब 1 अउ मात्रा अगर गुरु रही तब 2 मात्रा गिने जाही। 

प्र, क्र, व्र, ख्र, ग्र, घ्र , ज्र आदि लघु हें, इनकर मात्रा 1 गिने जाही। 


प्रा, क्रा, व्रा,ख्रा ग्रा ज्रा आदि गुरु हें, इनकर मात्रा 2 गिने जाही। 


उदाहरण 


क्रम = क् र + म = 1 + 1 = 2

प्राण = प् रा+ ण = 2 + 1 = 3


अइसन अक्षर जब *शब्द के बीच* मा आथें तब मात्रा गिने के नियम - अइसन स्थिति मा संयुक्त अक्षर के विग्रह (विभाजन) करना पड़थे। 


अग्रज = (अग्)+र + ज= 2 + 1+1 = 4

निद्रा = निद् + रा = 2 + 2 = 4


*अगर आधा अक्षर के पहिली के अक्षर गुरु मात्रा वाले अक्षर रही तब आधा अक्षर अपन पहिली वाले गुरु अक्षर के साथ मिल जाही फेर आधा अक्षर गिनती मा नइ आवय* 


उदाहरण - 


आक्रमण  =आ क् +र+म+ण 

               =      2+1 +1+1  

               = 5


*अरुण कुमार निगम*


ये पाठ ला कॉपी मा पेन से लिखव, समझे मा सुविधा होही।

🙏🙏🙏🙏🙏

र्* रारेफ़ के गोठ

 *आज के पाठ*


*र्* रारेफ़ के गोठ


काली के पाठ मा आप मन देखेव *र* जब व्यंजन के गोड़ ला धरथे माने खाल्हे मा रहिथे (प्र, क्र, ग्र आदि) तब ओ व्यंजन आधा हो जाथे अउ पहिली आथे। *र* ओ व्यंजन के बाद मा आथे, अउ पूरा रहिथे। 


*मनखे के नम्रता घलो अइसने हे । मनखे ला पूरा बना देथे* अब देखव- 


जब *र* काखरो मुड़ी ऊपर बइठथे तब का होथे। एला हमन प्रायमरी कक्षा ले रारेफ़ कहिथन।


*पर्व* इहाँ *व* व्यंजन के मुड़ी मा *र* बइठे हे। एला अइसे गिने जाही - 


प र् + व = 2 + 1 = 3 


जउन व्यंजन ऊपर *र* लगे हे वोहर पूरा रथे अउ र के बाद मा आथे। 


*र* आधा होके अपन पहिली वाले लघु वर्ण ला गुरु बना देथे।


रारेफ़ से कभी कोई शब्द शुरू नइ होय। रारेफ़ के *र*  आधा होके अपन पहिली वाले लघु वर्ण ला गुरु बना देथे। 


मनखे के भी यही हाल है। कोनो ला अपन मुड़ी ऊपर बइठाहू त वोहर दूसर संग मिलके ओखर पॉवर बढ़ा देथे। 


अर्थ =अर्+थ =2+1=3 


*देखत हव ।बइठे हे थ उपर अउ बड़कू बनावत हे अ ला ।*


सिखावत सिखावत विचार आगे त,  र के तुलना मनखे के सुभाव संग कर दे हँव। आप मन व्याकरण के सार सार बात ला सीखव। 


🙏🙏🙏🙏🙏


*आज के अभ्यास* 


सर्द, आर्य, वर्तमान, वार्तालाप, आर्तनाद, सौहार्द्र, निर्वाह, ठेठर्रा, गोर्रा, अकर्मण्य।


 अरूण कुमार निगम

वर्ण अउ अक्षर*

 *पाठ - 3*


*वर्ण अउ अक्षर*


साधारण तौर मा हम वर्ण अउ अक्षर ला एक दूसर के पर्यायवाची मानथन। पर दूनों अलग - अलग आय। कोई भी भाषा ध्वनि द्वारा बोले अउ सुने जाथे। लिपिबद्ध करके लिखे भी जाथे। 


*ध्वनि : - भाषा के सबले छोटे टुकड़ा जो सुने जा सकथे, ध्वनि कहे जाथे।*


*अक्षर :- भाषा के सबले छोटे टुकड़ा, जेखर उच्चारण करे जा सकथे, अक्षर करे जाथे।अक्षर माने जेखर 'क्षर' नइ हो सके।*


*वर्ण :- लिपि के सबले छोटे टुकड़ा वर्ण कहे जाथे। एखर एक निर्धारित आकृति होथे, जो कोनो न कोनो रंग मा अंकित रिथे। रंग के कारण एला वर्ण कहे जाथे।*


 *क् ख् ग् घ् आदि बियंजन आय*। बिना स्वर ला साथ लिए इंकर उच्चारण सम्भव नइ हे।बिना स्वर के ये सिरिफ ध्वनि आय।

*अ आ इ ई उ ऊ आदि स्वर आय।* इंकर उच्चारण सम्भव हे।चूकि हर स्वर भाषा के सुने जा सकने वाला सबले छोटे टुकड़ा आय तो ये *ध्वनि* आय ।अउ भाषा के सबले छोटे टुकड़ा आय जेखर उच्चारण करे जा सकथे तो ये *अक्षर* घलो आय। 

कहे के मतलब बियंजन के ध्वनि आय।

*स्वर मन ध्वनि अउ अक्षर दोनों होथे।*


*बियंजन के मेल जब स्वर के साथ होथे तब वो अक्षर बन जाथे।*


*क् -* 

ध्वनि आय (कोई भी बियंजन)

*क् +अ =क* ये अक्षर के साथ मिल के अक्षर बन गए

*ग् +इ =गि* ये स्वर के साथ मिल के अक्षर बन गे।


हिंदी के किताब मा या चार्ट मा हम जो अ आ इ ई क ग क्ष त्र ज्ञ आदि देखथन अउ पढ़थन, वो वर्ण आय।

*वर्ण के समुह ला हम वर्णमाला कहिथन।*

एक उदाहरण ला देखव तो अक्षर अउ वर्ण के अंतर समझे मा आसानी होही।


शोभामोहन, ये शब्द मा पाँच अक्षर हे।

शो भा मो ह न


श् ओ भ् आ म् ओ ह् अ न् अ

शोभामोहन शब्द मा 10 वर्ण हे। 


ये जानकारी के छन्द के छ: ले कोनों संबंध नइ हे। पर साहित्यकार ला ये सब जानना चाहिए, ये सोच के आप मन ला बताये के प्रयास करे हँव। एखर बारे मा एम.ए.हिंदी संस्कृत वाले साधक मन ज्यादा अच्छा ले जानत होही।मँय अइसने मुख्य बात ला साक्षा करे हँव।



*अरुण कुमार निगम*


🙏🙏🙏🙏🙏🙏

ऋ* के प्रयोग मा मात्रा गणना -

 *पाठ - 4*


*ऋ* के प्रयोग मा मात्रा गणना -


*ऋ* हमेशा लघु व्यंजन मा लगाए जाथे। ये लघु गिने जाथे चाहे शब्द के शुरू मा आय, चाहे अक्षर के बीच मा आये।


मृत         1+1       =2


अमृत      1+1+1  = 3


आकृति    2+1+1  = 4


पृथ्वी     पृ थ्  + वी, 


इहाँ आधा थ के कारण पृ गुरु होही। माने 2+2 


कृपाल     1+2+1


*एला बस सुरता राखव, अभ्यास के जरूरत नइये*

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*मात्रा गणना के नियम के अपवाद* 


एक ठन अउ बात इहाँ धियान देये के हे कि मात्रा गणना के पाठ मा सबो आधा अक्छर मन अपन पहिली वाले अक्छर के संग मातरा भार के कारन ओला बड़कू माने गुरु बना देथे फेर कोन्हों कोन्हों सबद मा आधा अक्छर में भार ओखर पहिली अक्छर ऊपर नहीं परै. अइसन सबद मा आधा अक्छर के पहिली वाले अक्छर हर नान्हें माने लघु च रहिथे 


जइसे कुम्हार सबद मा आधा अक्छर म् के भार पहिली के अक्छर कु ऊपर नहीं परत हे. बोले मा  कुम् हार नहीं बोले जाय, कु म्हार के उच्चारन होथे ते पाय के कु अक्छर के मातरा नान्हें माने लघु गिने जाथे. 


अइसने कन्हैया मा आधा न् के भार क ऊपर नहीं परत हे. 


तुम्हार मा आधा म् के भार तु ऊपर नहीं परत हे. 


अइसन सबद मन मा मातरा के गिनती करत समय बिसेस धियान रखे जाना चाही. 


*उदाहरण* - 


कुम्हार = कु + म्हा + र 

           = १ +   २ + १ = ४ 



कन्हैया = क + न्है + या 


           = १ + २ + २ = ५ 


तुम्हार = तु + म्हा + र 


          = १ +  २ + १ =  ४ 



*अभ्यास - 10*


अपन मन के 10अइसन शब्द चुनव जेमा आधा अक्षर बीच मा आथे, फेर अपन पहिली के लघु अक्षर ला, गुरु नइ बनाय। फेर इंकर मात्रा गणना करव। उदाहरण मा बताये पैटर्न मा मात्रा गणना करना हे।


*दूसर के उत्तर देखे बिना अभ्यास होही तभे आपके फायदा होही, इहाँ फेल होय के डर नइये, ज्यादा से ज्यादा का होही ? गलती होही, सीखे बर गलती होना बने होथे* 


*अरुण कुमार निगम*


[2/6, 1:46 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के नियम*






(1) कोई भी चरण जब चौकल शब्द से शुरू हो तब मात्राबाँट के शुरू मा 4 + 4 आना चाही।




(2) कोनो भी चरण जब त्रिकल शब्द से शुरू हो तब मात्राबाँट 3 + 3 + 2 से चालू होना चाही। 




(3) मात्राबाँट बर कोनो द्विकल शब्द के बाद वाले शब्द के पहिली लघु अक्षर ला मिला के ओला त्रिकल माने जा सकथे।




(4) मात्राबाँट बर कोनो त्रिकल शब्द के बाद वाले शब्द के पहिली लघु अक्षर ला मिलाके चौकल माने जा सकथे।




(5) दू द्विकल शब्द ला आपस मा जोड़ के चौकल माने जा सकथे।




(6) एकल शब्द अउ त्रिकल शब्द ला आपस मा जोड़के चौकल माने जा सकथे।




*उदाहरण* - 




बड़ा हुआ तो क्या हुआ


 3     3    2   2    3




त्रिकल शब्द बड़ा से चरण चालू होय हे, बाद मा हुआ त्रिकल शब्द आय है। 3 अउ 3 मिल के 6 मात्रा माने समकल होगे। एखरे बाद द्विकल शब्द तो आये ले 3,3,2 के मात्राबाँट बन गे।




अगर ये चरण ला 




बड़ा तो हुआ क्या हुआ




पढ़े जाय तो लय नइ बनही।




विषम चरण के अंत 2,1,2 से होना हे । क्या हुआ के मात्रा 2,1,2 आये हे।




चरण के कुल मात्रा 13 होइस।




*अब दूसर उदाहरण देखव* - 




माटी कहे कुम्हार से


 4     3      4     2




ये मात्राबाँट शब्द के अनुसार हे फेर हमला चौकल के बाद चौकल मानना हे।




(माटी) (कहे कु) (म्हार से)


   4         4         2 1 2




इहाँ कहे त्रिकल शब्द हे। बाद के शब्द कुम्हार के पहिली लघु अक्षर कु, के संग चौकल (कहे कु) माने गेहे। अंत मे म्हार से 212, दोहा के विषम चरण के अनुसार आये हे।




*सम चरण के उदाहरण*




तू क्या रौंदे मोय


2   2     4   3




इहाँ दू द्विकल ला एक चौकल मानना पड़ही - 




(तू क्या) (रौंदे) (मोय)


   4         4       3




*सम चरण के एक अउ उदाहरण जो त्रिकल से चालू होय हे*




बड़े न बोलें बोल


 3  1   4     3




इहाँ बड़े त्रिकल अउ न एकल ला जोड़ के चौकल मानना पड़ही।




(बड़े न) (बोलें) बोल


   4         4      3




*एक अउ उदाहरण* - 




धरम करम के बात 


 3     3     2   3




इहाँ त्रिकल के बाद त्रिकल अउ बाद मा द्विकल आये ले 3,3,2 बनिस। अंत मे गुरु-लघु (3)




*नियम ध्यान से पढ़व , कोई शंका हो त बतावव*




* अरुण कुमार निगम*

[2/6, 1:46 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के अभ्यास के पहिली, जरुरी बात* - 




1 - कभी भी मात्रा मिलाये बर मूल शब्द के मात्रा ला कम-ज्यादा नइ करना हे। जइसे पानी ले पानि, माटी ला माटि, दूर ला दुर, टीपा ला टिपा नइ करे जा सके।शब्द ला ओखर मूल प्रचलित उच्चारण अनुसार लिखना हे। 




2 - दोहा के कोई भी चरण के शुरुवात *तीन अक्षर*(4 मात्रा) वाले अइसन शब्द से नइ करना हे जेखर मात्रा 121 माने लघु, गुरु, लघु हवे । अइसन शब्द ला जगण कहे जाथे। किसान, मकान, दुकान, जलाव, कनेर, कुम्हार, रमेश, सुरेश, बिहान- ये सब शब्द जगण आँय।




3. दोहा के कोनो चरण पाँच मात्रा वाले शब्द से नइ करना चाही, लय बाधित होथे। लोहार (221), डोंड़का (212), दसेरा (122), समरपन (11111),  सुहागिन (1211), अँधियार (1121), बिहिनिया (1112), अइसन 5 मात्रा वाले शब्द चरण के शुरू मा नइ आना चाही।




दोहा दू डाँड़ के छन्द आय। देखे मा बहुत सरल होथे फेर सबसे कठिन छन्द आय। 




कठिन ये पाय के कि अपन बात ला कहे बर दुये लाइन मिलथे। दू डाँड़ मा जतिक गहरा भाव लाहू, जतिक कसावट लाहू, दोहा वतके श्रेष्ठ बनही। 




हर दोहा मा *घाव करे गंभीर* वाले लक्षण होना चाहिए। इहाँ घाव के मतलब चोट से नइये, भाव के गहराई से हे। पढ़ने वाला अउ सुनने वाला वाह कहे बर मजबूर हो जाना चाहिए। ये स्थिति अभ्यास करत करत मा आही।




*दोहा लिखे के पहिली जानव*




लय, छन्द के आत्मा होथे। सही शब्द संयोजन के बिना लय नइ आवै। खाली 13,11 मात्रा के गिनती करे ले दोहा नइ बनय।




हमर लिपि "देवनागरी-लिपि" कहे जाथे। ये लिपि के एक खासियत यहू हे कि सम मात्रा के बाद , सम मात्रा आये ले, या विषम मात्रा के बाद विषम मात्रा आये ले लय बनथे। एला गणित मा समझे जा सकथे।




(1) जब दू सम संख्या के जोड़ होथे तब परिणाम सम संख्या मा आथे।




2 + 2 = 4 (सम संख्या)




(2) जब दू विषम संख्या के जोड़ होथे तब भी परिणाम सम संख्या मा आथे।




3 + 3 = 6 (सम संख्या)




छन्द लिखत समय इही बात के ध्यान रखना हे कि त्रिकल शब्द के बाद हमेशा त्रिकल शब्द आये।*दू त्रिकल शब्द के बाद एक द्विकल शब्द रखना जरूरी होथे।




माने मात्राबाँट 3 + 3 + 2 = 8 बने।




वइसने द्विकल शब्द के बाद द्विकल शब्द आये। दू द्विकल शब्द मिल के चौकल बनाथें। चौकल के बाद चौकल आना जरूरी होथे। 




माने मात्राबाँट 4 + 4 = 8 बने।




*ये मात्राबाँट हर चरण बर लागू होही*


अरुण निगम

[2/25, 4:49 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *आज एक नवा छन्द*




*रूपमाला छन्द*  (मदन छन्द) 14-10




डाँड़ (पद) - 4, ,चरण - 8




तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा, गुरु-लघु (2,1)




हर डाँड़ मा कुल मात्रा – २४ , बिसम चरण मा मात्रा – १४, सम चरण मा मात्रा- १० 




यति / बाधा – १४, १० मात्रा मा 




खास- एला मदन छन्द घला कहिथ



*मात्राबाँट*


2122 2122, 2122 21


लय बर अइसे गाके अभ्यास करव -


रूपमाला, रूपमाला, रूपमाला, रूप


या 


लाललाला, लाललाला, लाललाला, लाल


*ध्यान रहे - तीसरा, दसवाँ, सत्रहवाँ अउ चौबीसवाँ मात्रा अनिवार्य रूप ले लघु होना चाही।बाकी जघा एक गुरु के बदला दू लघु घलो हो सकथे*


*उदाहरण*


देह जाही रूप जाही , छोड़ जाही  चाम ।


जोर ले कतको इहाँ धन, कुछु न आही काम ।


कर धरम तँय कर करम तँय, अउ कमा ले साख ।


नाम  रहि  जाही  जगत-मा , देह  होही राख ।।


*कुमार निगम जी*

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: आज के पाठ मनन करे बर हे।






*छन्द के अंग* 






*डाँड़ (पद)* –




छन्द रचना मन डाँड़- डाँड़ मा तुकबंदी करके लिखे जाथे. येखर एक पद ला एक डाँड़ कहे जाथे.




पहिली के ज़माना मा जब लिखे के साधन नहीं रहीस तब कवि मन अपन छन्द रचना ला गावत रहयँ अउ सुनइया मन सुन-सुन के आनंद पावत रहीन. एक डाँड़ (पद) गाये मा हफरासी झन लागे अउ साँस ऊपर घला जोर झन परे इही बिचार करके हर एक डाँड़ के बीच मा नियमानुसार रुक के साँस लेहे के बेबस्था करे गे होही . इही रूकावट ला यति कहे जाथे . एक डाँड़ मा एक घाव रुके ले वो डाँड़ दू बाँटा मा बँट जाथे .डाँड़ के इही टुकड़ा मन चरण कहे जाथे. छन्द के नियम के अनुसार एक डाँड़ मा दू या दू ले ज्यादा चरण हो सकथे . 




सहर गाँव मैदान ला, चमचम ले चमकाव    (पहिला डाँड़) 




गाँधी जी के सीख ला, भइया सब अपनाव    (दूसरइया डाँड़) 




अब ये दू  डाँड़ के छन्द रचना ला देखव. एहर दोहा कहे जाथे  




*यति*  -“सहर गाँव मैदान ला” कहे के बाद छिन भर रुके के बेबस्था हे माने एक यति होगे. तेखर बाद  “चमचम ले चमकाव” कहिके पहिली डाँड़ या पद पूरा होइस हे.




अब दूसर डाँड़ ला देखव “गाँधी जी के सीख ला” कहे के बाद छिन भर रुके के बेबस्था हे माने एक यति होगे. तेखर बाद  “भइया सब अपनाव“ कहिके दूसरइया डाँड़ या पद पूरा होइस हे. 






*चरण* – 




अब चरण  ला जाने बर फेर ध्यान देवव – 






सहर गाँव मैदान ला     (पहिली  चरण ),  




चमचम ले चमकाव    (दूसरइया चरण ) 




गाँधी जी के सीख ला    (तिसरइया चरण ), 




भइया सब अपनाव    (चउथइया चरण ) 




साफ़-साफ़ दीखत हे कि दू डाँड़ (पद) के दोहा छन्द मा पहिला डाँड़ यति के कारन दू चरण  मा बँट गे हे . वइसने  दूसर डाँड़ घला यति के कारन दू चरण  मा बँट गे हे. याने कि दोहा के दू डाँड़ मन चार चरण  बन गे हें . 




पहिली  चरण  अउ तिसरइया चरण  ला बिसम चरण  कहे जाथे. वइसने दूसरइया चरण  अउ चउथइया चरण  ला सम चरण  कहे जाथे. त भइया हो डाँड़ अउ चरण  के भेद ला इही मेर बने असन समझ लौ. . 




दोहा छन्द मा एक यति आये ले एक डाँड़ दू चरण  मा बँटे हे. वइसने छन्द त्रिभंगी के एक डाँड़ दू यति आये ले तीन चरण  मा बँटथे अउ  कहूँ-कहूँ तीन यति आये ले चार चरण  मा घला बँटथे. कहे के मतलब जउन छन्द के जइसे नियम हे तउन हिसाब ले यति होथे अउ चरण  के गिनती तय होथे. मोर बिचार ले आप मन यति अउ चरण के बारे में समझ गे होहू .






*गति* -अब गति (लय) के बारे में जान लौ. कोन्हों छन्द मा गढ़े रचना हो पढ़े या गाये मा सरलग होना चाही इही ला गति या लय कहिथे. 




साफ़ - सफाई  धरम हे , ये मा कइसन लाज  ।


रहय देस मा स्वच्छता , सुग्घर स्वस्थ समाज ।।




(ये दोहा ला गा के देखौ, गाये मा कोनों बाधा नइहे त कहे जाही बने गति या लय हे ) 




अब इही दोहा के शब्द मन ला थोरिक आगू-पाछू करके गा के देखौ – 




धरम साफ़ - सफाई  हे , ये मा कइसन लाज   


देस मा स्वच्छता रहय  , सुग्घर स्वस्थ समाज 




(कोनों नवा शब्द नइ डारे गे हे बस उही शब्द मन ला थोरिक आगू-पाछू करे गे हे. ये मा पहिली असन सरलगता नइ हे. कवि के यही काम हे कि कोन शब्द ला कहाँ रखे जाये कि सरलगता कहूँ झन टूटय.)    




*तुकांत / पदांत* 




डाँड़ / चरन  के आखिर मा एक्के जइसन मात्रा अउ उच्चारन वाले शब्द रहे ले कहे जाथे कि  डाँड़ / चरन  मन तुकांत हें. 






ऊपर के दुन्नों दोहा के डाँड़ के आखिर मा देखव – 




चमकाव/ अपनाव     अउ     लाज / समाज  




ये शब्द मन डाँड़ के आखिर मा आयँ हें इनकर  मात्रा अउ उच्चारन एक्के जइसन हे. एमन तुकांत कहे जाथे. 






अभी तक हमन व्याकरण संबंधित अभ्यास करत रहेन। छन्द के अभ्यास अब शुरू होही। आज के पाठ मा छन्द के अंग के जानकारी हे। कई झन पद अउ चरण मा भरम मा पड़ जाथें।कई किताब मन मा घलो पद ला चरण लिखाय हे। एक सिद्धांत ला अपनावव तब भरम नइ होही।




*पद* माने पूरा पंक्ति (लाइन)




*चरण* माने यति के कारण विभाजित एक हिस्सा।




*यति* माने पूरा पद ला पढ़त समय बीच मा नियमानुसार चिटिक थिराना (रुकना)




*गति* माने प्रवाह। बिना अटके पढ़ना या गाना। 




*शब्द के लघु , गुरु के मात्रा के सही क्रम रहे ले प्रवाह बने रहिथे। सही क्रम कइसे रखे जाथे, यहू बाद के कक्षा मा बताये जाही* 




*तुकान्त* माने कोनो दू पद के अंत के शब्द के एक्के असन उच्चारण। तुकान्त के विस्तृत जानकारी भी बाद मा दे जाही।




अभी बोलचाल के भाषा मा छन्द के अंग ला जाने रहव।




*हर साधक से निवेदन हे कि 24 घण्टा मा 10 से 15 मिनट के समय अभ्यास बर जरूर निकालव, ये कक्षा मन छन्द के नींव आयँ। नींव मजबूत रही त इमारत मजबूत रही*




यहू ला गुनव........... 




मनखे के हाथ, गोड़, नाक, कान, आँखी, गाल, होंठ अउ अन्य बाहरी अंग ला हम अपन आँखी मा देख सकथन। 




हिरदे, फेफड़ा, किडनी जइसे अंदरूनी अंग ला हम नइ देख सकन, फेर सम्बंधित डॉक्टर मन देख सकथें। 




कई किसम के अंग के संग *परान* अउ *धड़कन* घलो होथे फेर परान अउ धड़कन ला कोनो देख नइ सकय, बस महसूस करे जा सकथे। 




वइसने कोई भी छन्द मा पद, चरण, यति, तुकान्त, वर्ण, शब्द ला हम देख सकथन। 




*भाव*  छन्द के धड़कन आय अउ  *लय*  ओखर आत्मा / परान आय। ये दुन्नों देखे नइ जा सकय, महसूस करे जा सकथें। 




*अरुण कुमार निगम*

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *तुकान्तता*




आपला जान के अचरिज होही कि छन्द के मूल विधान मा (संस्कृत के छन्द)  तुकान्तता के अनिवार्यता नइ रहिस। बहुत बाद मा तुकांतता छन्द बर अनिवार्य होगे। 




रीतिकाल अउ भक्तिकाल के छन्द मा तुकांतता दिखथे, आधुनिक काल के छन्द मा घलो तुकांतता अनिवार्य माने गेहे। 




तुकांतता के गुणवत्ता तीन किसम के माने जाथे- 




*उत्तम, मध्यम अउ निकृष्ट*




*उत्तम तुकान्त*




जब कोनो पद या चरण के अंतिम शब्द मा - अंतिम दू अक्षर समान हो ओखर पहली के अक्षर समान स्वर अउ समान मात्रा वाले हो तब *उत्तम गुणवत्ता* के तुकान्त होथे।




उदाहरण - आवय, जावय, खावय इहाँ अंतिम दू अक्षर *वय* सबके समान हे।ओखर पहिली के अक्षर गुरु मात्रा वाले अक्षर आय। क्रमशः आ, जा, खा।




नाल, जाल ,फाल, काल, हाल




इहाँ अंतिम अक्षर *ल* सबमें समान है। सबके पूर्ववर्ती अक्षर आ के मात्रा वाले समान उच्चारण के अक्षर आय। क्रमशः ना, जा, फा, का, हा अइसने अन्य गुरु मात्रा वाले शब्द आहीं। 




मीन, बीन, दीन...... आदि।




*मध्यम गुणवत्ता के तुकान्त*-




जब अंतिम अक्षर समान रहे ओखर पहिली वाले अक्षर समान स्वर अउ समान मात्रा वाले हो लेकिन ये दुनों के पहिली वाले अक्षर स्वर अउ मात्रा मा  *असमान* होथे। 




उदाहरण - सुमत, बीपत 




इहाँ मत अउ पत शुद्ध तुकान्त जरूर हें फेर स के उ के मात्रा अउ ब के ई के मात्रा स्वर अउ मात्रा मा असमान हे। ये मध्यम तुकान्त कहे जाही। 




दूसर उदाहरण - जागत, पावत




इहाँ अंतिम अक्षर त दुनों मा समान है ओखर पहिली के अक्षर क्रमशः ग अउ व स्वर अउ मात्रा मा समान हे पर अलग अलग अक्षर आँय। ये दुनों के पहिली ज के आ के मात्रा अउ प के आ के मात्रा उच्चारण मा समान हे। जागत के शुद्ध तुकान्त लागत, भागत होही। पावत के शुद्ध या उत्तम तुकान्त आवत, भावत, लावत होही। 




*मध्यम तुकान्त के प्रयोग गीत मा ज्यादा करे जाथे अउ मान्य भी हे। छन्द मा घलो मध्यम तुकान्त मान्य हे* फेर एखर गुणवत्ता 24 कैरेट जइसे नइ रही।




*साधक ला चाहिए कि अपन छन्द के गुणवत्ता रखे बर केवल उत्तम तुकान्तता ला अपनावे*




*निकृष्ट तुकान्तता* जउन अंतिम शब्द मा उपरोक्त दुनो बात के पालन नइ होय उहाँ निकृष्ट तुकांतता होथे। 




*निकृष्ट तुकान्तता छन्द मा बिलकुल भी मान्य नइये*




उदाहरण - 




अरपित, सुमिरत 




करय, बनाय 




किसानी, जमीनी 




खेत, पेट 




खजाना, नगीना 




साल, बात




*अरुण कुमार निगम*

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *अभ्यास*


 *एक सम्पूर्ण दोहा के मात्रा गणना*


दोहा मा 1 अउ 3 विषम चरण, अउ 2 अउ 4 सम चरण कहे जाथे। विषम चरण के कुल मात्रा 13 अउ सम चरण के कुल मात्रा 11 होथे। आवन इही ल देखन



*रसरी आवत जात ही, सिल पर पड़त निशान।*

*करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।*


रसरी आवत जात ही,

    4      4     212

           8         5

                13


जड़मति होत सुजान।

     4        3 121

       4        4  3

             8      3

                  11


विशेष- *कोनो भी शब्द के अधिकतम मात्रा 4 होथे ओखर ले जादा नही*


जइसे- अपरिचित

          अ+ परिचित

            1       4


*अब अपन पसंद के दोहा लेके ओखर चारों चरण के मात्रा गिनती करव*

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा छन्द*




दोहा के डाँड़ के मात्रा गणना के अभ्यास मा आप ध्यान देहू त कुछ *विशेषता* नजर आही - 




*दोहा मा दू डाँड़ होथे* 




*हर डाँड़ मा 13 मात्रा के बाद यति होथे* जेखर कारन डाँड़ हर दू चरण मा बँट जाथे। 




*दूसर चरण 11 मात्रा के होथे* माने *दोहा के हर डाँड़ मा चौबीस मात्रा होथे* 




ये हिसाब ले दोहा मा *कुल चार चरण* होथे। 




पहला अउ तीसरा चरण 13 मात्रा के होथे। एला विषम चरण कहे जाथे। 




दूसर अउ चौथा चरण 11 मात्रा के होथे। एला सम चरण कहे जाथे। 




दोहा के हर डाँड़ के अंत मा गुरु, लघु मात्रा होथे। ये बात ला अइसनो बोल सकथव कि दोहा के सम चरण के अंत 2,1 से होथे। 




विषम चरण के अंत लघु-गुरु से होथे माने 1,2 से होथे। विषम चरण कुल 13 मात्रा के होथे अउ अंत 1,2 से होथे एखर मतलब यहू हे कि *दोहा के विषम चरण के ग्यारहवाँ मात्रा लघु होना अनिवार्य हे* 




तुकान्त - कल तक के अभ्यास के दोहा मा ध्यान देहू त पाहू कि




*दोहा के दूनों डाँड़ मन आपस मा तुकान्त रथे*




ये पाठ ला ध्यान देके पढ़व अउ नोटबुक मा नोट कर लेवव। *मन मा कहूँ शंका होही त पूछव*।




शंका पाठ मा बताये जानकारी  के बारे मा होना चाहिए । 




अब दोहा के अभ्यास चालू होने वाला हे। 




हर साधक के नियमित उपस्थिति अनिवार्य रही। 




कक्षा ला साधना मान के समर्पित होके सीखना हे। अगर अइसे लागही कि कोनो साधक टाइम पास बर जुड़े हे, वो कक्षा ले लेफ्ट करे जा सकथे। संगेसंग जउन प्रशिक्षक उदासीन दिखही वहू लेफ्ट करे जा सकथें। 




साधना बर समर्पण जरुरी होथे। समय सबके कीमती होथे। बिना अनुशासन के कोनो साधना पूरा नइ हो सके। 




*आज हर क्षेत्र मा मठाधीशी चलथे, साहित्य के क्षेत्र घलो ये बीमारी ले अछूता नइये। बड़े अउ नामी कवि मन भाव नइ देवैं। नवा कवि ला हाथ धरके सिखैया गिनती के मिलहीं। बजार मा कविता सीखे बर किताब नइ मिलही। छन्द बर जउन किताब मिलही वो अपर्याप्त हे। किताब पढ़ के मनखे ज्ञानी हो जातिन त स्कूल, कालेज के का जरुरत रहितिस*? 




ज्ञान बर अभ्यास अउ साधना जरुरी होथे। मोला विश्वास हे कि ये सत्र के साधक मन समर्पित होके छन्द साधना करहीं अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ बनाहीं। 




ये सत्र मा समर्पित प्रशिक्षक मन आप ला छन्द सीखे बर सहयोग करहीं। हम सब प्रशिक्षक, आप सब के उज्ज्वल भविष्य के कामना करत हन।




*दोहा के संबंध मा कोनो भी प्रकार के शंका हो त बेझिझक पूछव*


अरुण निगम

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के नियम*






(1) कोई भी चरण जब चौकल शब्द से शुरू हो तब मात्राबाँट के शुरू मा 4 + 4 आना चाही।




(2) कोनो भी चरण जब त्रिकल शब्द से शुरू हो तब मात्राबाँट 3 + 3 + 2 से चालू होना चाही। 




(3) मात्राबाँट बर कोनो द्विकल शब्द के बाद वाले शब्द के पहिली लघु अक्षर ला मिला के ओला त्रिकल माने जा सकथे।




(4) मात्राबाँट बर कोनो त्रिकल शब्द के बाद वाले शब्द के पहिली लघु अक्षर ला मिलाके चौकल माने जा सकथे।




(5) दू द्विकल शब्द ला आपस मा जोड़ के चौकल माने जा सकथे।




(6) एकल शब्द अउ त्रिकल शब्द ला आपस मा जोड़के चौकल माने जा सकथे।




*उदाहरण* - 




बड़ा हुआ तो क्या हुआ


 3     3    2   2    3




त्रिकल शब्द बड़ा से चरण चालू होय हे, बाद मा हुआ त्रिकल शब्द आय है। 3 अउ 3 मिल के 6 मात्रा माने समकल होगे। एखरे बाद द्विकल शब्द तो आये ले 3,3,2 के मात्राबाँट बन गे।




अगर ये चरण ला 




बड़ा तो हुआ क्या हुआ




पढ़े जाय तो लय नइ बनही।




विषम चरण के अंत 2,1,2 से होना हे । क्या हुआ के मात्रा 2,1,2 आये हे।




चरण के कुल मात्रा 13 होइस।




*अब दूसर उदाहरण देखव* - 




माटी कहे कुम्हार से


 4     3      4     2




ये मात्राबाँट शब्द के अनुसार हे फेर हमला चौकल के बाद चौकल मानना हे।




(माटी) (कहे कु) (म्हार से)


   4         4         2 1 2




इहाँ कहे त्रिकल शब्द हे। बाद के शब्द कुम्हार के पहिली लघु अक्षर कु, के संग चौकल (कहे कु) माने गेहे। अंत मे म्हार से 212, दोहा के विषम चरण के अनुसार आये हे।




*सम चरण के उदाहरण*




तू क्या रौंदे मोय


2   2     4   3




इहाँ दू द्विकल ला एक चौकल मानना पड़ही - 




(तू क्या) (रौंदे) (मोय)


   4         4       3




*सम चरण के एक अउ उदाहरण जो त्रिकल से चालू होय हे*




बड़े न बोलें बोल


 3  1   4     3




इहाँ बड़े त्रिकल अउ न एकल ला जोड़ के चौकल मानना पड़ही।




(बड़े न) (बोलें) बोल


   4         4      3




*एक अउ उदाहरण* - 




धरम करम के बात 


 3     3     2   3




इहाँ त्रिकल के बाद त्रिकल अउ बाद मा द्विकल आये ले 3,3,2 बनिस। अंत मे गुरु-लघु (3)


*सम चरण(11) के अधिकतम मात्रा बाँट*


 4421, 222221 अउ 33221


*विषम चरण(13) के अधिकतम मात्रा बाँट*


44212, 2222212 अउ 332212, 33412



*नियम ध्यान से पढ़व , कोई शंका हो त बतावव*




*अरुण कुमार निगम*

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के समचरण*


- *दोहा मा दूसरा अउ चौथा चरण सम चरण कहिलाथे।*

- *सम चरण मा कुल 11 मात्रा होथे।*

- *अंत मा गुरु लघु(21) अनिवार्य होथे*

- *11 मात्रा के मात्रा बाँट निम्न हो सकथे*

*332 21* (त्रिकल के चालू होय ता)

* 2222 21, 44 21* (द्विकल या चौकल के चालू होय ता)


यहू ला जानव


दू मात्रा वाले शब्द- द्विकल

(मैं, दिन, शुभ,वह,जग)


तीन मात्रा वाले शब्द- त्रिकल

(जगत, यहाँ, चली, कर्म,)


चार मात्रा वाले शब्द- चौकल

(औषधि, कोठी, कदम्ब,बदला,)


पाँच मात्रा वाले शब्द-पंचकल

(आलाव, बढ़ावा, ओरछा,तलहटी)

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के विषम चरण*


- *दोहा मा पहला अउ तीसरा चरण विषम चरण कहिलाथे।*

- *विषम चरण मा कुल 13 मात्रा होथे।*

- *अंत मा  लघु गुरु(12) अनिवार्य होथे*

- *13 मात्रा के मात्रा बाँट निम्न हो सकथे*

*332 212* (त्रिकल के चालू होय ता)

*2222 212, 44 212* (द्विकल या चौकल के चालू होय ता)


*जगण (121 मात्रा वाले शब्द)अउ पंचकल(221/122/212) ले दोहा के शुरुवात नइ करना हे* एखर बारे मा बाद में बताये जाही

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *दोहा के दू डाँड़ म*-


* गागर म सागर रहे।

* कवि के भाव,बानी,सन्देश आदि सबो स्पस्ट होवय।

* चारो चरण आपस म स्वतंत्र अउ स्पस्ट अर्थ देवव।

* चारो चरण म लिंग,वचन,कारक,कर्ता, क्रिया अउ पुरुष आदि के प्रयोग विधान सम्मत होय।

* दोहा के कोनो भी चरण जगण ल (121)अउ तगण(221) ले शुरुवात नइ करना चाही।

* दोहा म लाक्षणिक प्रयोग(काव्य गुण),अलंकार,रस अउ शब्द चयन कवि के विशेष गुण अउ पांडित्य ल दर्शाथे,एखरो उप्पर ध्यान देना चाही।

* भाषा सरल अउ सहज होय,जेन सुनते ही पाठक के अन्तस् म समा जाय।

* दोहा के प्रत्येक चरण के अर्थ सर्वमान्य अउ प्रायोगिक होना चाही।विरोधाभाषा या संसय के स्थिति नइ उपजना चाही।

* विषय चयन प्रभावी होना चाही। सार्वभौमिक,तात्कालिक या फेर विलुप्तता उपर विचार मंथन उभारना चाही।

* मौलिकता उपर विशेष ध्यान  देना चाही।

* आखर रूपी ब्रम्ह के उपयोग जुड़ाव,आत्मरंजन,समरसता,विकास आदि बर होना चाही, विखंडन,कलह,क्लेश ले परे होके।


*दोहा के दू डाँड़ मा,गुढ़ गुण ग्यान समाय।*

*सरल सहज भाँखा रहे,सबके मन ला भाय।*

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

[2/26, 7:32 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: *अभ्यास* 

नीचे म दिए दोहा अनुसार, प्रश्न मन के उत्तर देवव--


*रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।*

*टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।।*


1- *विषम चरण अउ सम चरण ल अलग अलग करके बतावव?*

उत्तर- विषम चरण(-----)(----)

          सम चरण(----)(-------)


2- *तुकांत/ पदांत शब्द ल छाँट के लिखो? **

उत्तर- सम चरण मा तुकांत------

         विषम चरण में तुकांत----

          


3 - *तीसर चरण के मात्रा बाँट करव?*

उत्तर-


4- *उक्त दोहा मा यति कोन कोन शब्द के बाद हे?*

उत्तर-


5- *उक्त दोहा मा कोन कोन से अलंकार हे?*

ऊत्तर--


6- *पहली चरण अउ चौथा चरण, सम मात्रिक शब्द ले चालू होय हे, या विषम मात्रिक शब्द ले, बतावव?*

उत्तर---


7- *चटकाय अउ जाय तुकांत उत्तम हे, मध्यम हे या फेर निम्न*?

उत्तर--


8- *चटकाय शव्द के जाय के आलावा अउ चार उत्तम तुकांत बतावव*?

उत्तर--


9- *गिरी, दरस, परख, उही, मनुष, धरा जइसन शब्द  सम चरण के आखरी शब्द होही कि विषम चरण के?*

उत्तर--


10- *पहली पद के समाप्ति मा एक लाइन(।) अउ दूसर पद के समाप्ति मा दू लाइन(।।), दोहा मा जरूरी हे का?*

उत्तर---


प्रश्न अउ दोहा ल बने पढ़व समझव अउ अभ्यास करव, 10 में 10 सबके सही होना चाही।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏