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Tuesday, September 28, 2021

जनकवि कोदू राम दलित जी के 54वीं पुण्य तिथि म पूज्यनीय दलित जी ल शत शत नमन--


 जनकवि कोदू राम दलित जी के 54वीं पुण्य तिथि म पूज्यनीय दलित जी ल शत शत  नमन--



छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय, छंद शास्त्री,जनकवि कोदू राम दलित जी के 54वीं जयंती के अवसर म, उन ल शत शत नमन, 

दोहा छंद

करिस छंद के जौन हा,हमर इँहा शुरवात।

श्रद्धा सुमन चढाँव मैं, माथा अपन नँवात।


साहित के वो देंवता,जनकवि वो कहिलाय।

बगरे  बाँढ़य  छंद  बड़,आस  ओखरे आय।


नाँव मिटाये नइ मिटै,करनी जेखर पोठ।

साहित के आगास मा,बरे सियानी गोठ।


पैरी जब जब बाजही,मुख मा आही गीत।

बैरी पढ़ पढ़ काँपही,फुलही फलही मीत।


रचना रिगबिग हे बरत,भले बछर के बीत।

डहर नवा गढ़ते रही,जनकवि जी के गीत।


नाँव अमर जुगजुग रही,जइसे  गंगा धार।

जनकवि कोदू राम जी,छंद मरम आधार।


सपना उही सँजोय हे,अरुण निगम जी आज।

पालत  पोंसत  छंद ला,करत हवे निक काज।


साधक बन सीखत हवै,कतको कवि मन छंद।

महूँ  करत  हँव साधना,लइका  अँव  मतिमंद।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)

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दोहा छंद

अलख जगाइन साँच के, जन कवि कोदू राम।

जन्म जयंती हे उँकर, शत शत नमन प्रणाम।


सन उन्नीस् सौ दस बछर, जड़काला के बाद।

पाँच मार्च के जन्म तिथि, हवय मुअखरा याद।


राम भरोसा ए ददा, जाई माँ के नाँव।

जन्म भूमि टिकरी हरै, दुरुग जिला के गाँव।


पेशा से शिक्षक रहिन, ज्ञान बँटई काम।

जन्म जयंती हे उँकर, शत शत नमन प्रणाम।


राज रहिस ॲंगरेज के, देश रहिस परतंत्र।

का बड़का का आम जन, सब चाहिन गणतंत्र।


आजादी तो पा घलिन, दे के जीव परान।

शोषित दलित गरीब मन, नइ पाइन सम्मान।


जन-मन के आवाज बन, हाथ कलम लिन थाम।

जन्म जयंती हे उँकर, शत शत नमन प्रणाम।


जन भाखा मा भाव ला, पहुँचावँय जन तीर।

समझय मनखे आखरी, बहय नयन ले नीर।


दोहा रोला कुंडली, कुकुभ सवैया सार।

किसिम किसिम के छंद मा, गीत लिखिन भरमार।


बड़ ज्ञानी उन छंद के, दया मया के धाम।

जन्म जयंती हे उँकर, शत शत नमन प्रणाम।


रचना-सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर"

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

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कुंडलियाँ छंद

पुरखा जनकवि के हवय, पुण्य जयंती आज।

श्रीमन कोदू राम जी,करिन नेक जे काज।

करिन नेक जे काज,छंद मा रचना रचके।

सुग्घर के सुरताल, भाव मनभावन लचके।

गाँधी सहीं विचार, रहिंन उन उज्जर छवि के।

 अमर रही गा नाम, सदा पुरखा जनकवि के।


आइस बालक ले जनम,पावन टिकरी गाँव।

मातु पिता जेकर धरिन,  कोदू राम जी नाँव।

कोदू राम जी नाँव, पिता श्री राम भरोसा।

घोर गरीबी झेल, करिन उन पालन पोसा।

अर्जुन्दा के स्कूल, ज्ञान के गठरी पाइस।

गुरुजी बनके दुर्ग, शहर मा वो हा आइस।


बड़का रचनाकार वो,गद्य-पद्य सिरजाय।

हास्य व्यंग्य के धार मा, श्रोता ला नँहवाय।

श्रोता ला नँहवाय, गोठ वो लिखिन सियानी।

माटी महक समाय, गठिन बड़ कथा-कहानी।

अलहन के जी बात,व्यंग्य के डारे तड़का।

दू मितान के गोठ, करिन वो कविवर बड़का।


श्रद्धावनत

चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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आल्हा छंद-#सुरता_पुरखा_मन_के


करके सुरता पुरखा मन के, चरन नवावँव मँय हा माथ।

समझ धरोहर मान रखव जी, मिलय कृपा के हर पल साथ।।


इही कड़ी मा जिला दुर्ग के, अर्जुन्दा टिकरी हे गाँव।

जनम लिये साहित्य पुरोधा, कोदूराम दलित हे नाँव।।


पाँच मार्च उन्निस सौ दस के, दिन पावन राहय शनिवार।

माता जाई के गोदी मा, कोदूराम लिये अवतार।।


रामभरोसा पिता कृषक के, जग मा बढ़हाये बर नाँव।

कलम सिपाही जनम लिये जी, बगराये साहित के छाँव।।


बचपन राहय सरल सादगी, धरे गाँव  सुख-दुख परिवेश।

खेत बाग बलखावत नदिया, भरिस काव्य मन रंग विशेष।।


होनहार बिरवान सहीं ये, बनके जग मा चिकना पात।

अलख जगाये ज्ञान दीप बन, नीति धरम के बोलय बात।।


छंद विधा के पहला कवि जे, कुण्डलिया रचना रस खास।

रखे बानगी छत्तीसगढ़ी, चल के राह कबीरा दास।।


गाँधीवादी विचार धारा, देश प्रेम प्रति मन मा भाव।

देश समाज सुधारक कवि जे, खादी वस्त्र रखे पहिनाव।।


ढ़ोंग रूढ़िवादी के ऊपर, काव्य डंड के करे प्रहार।

तर्कशील विज्ञानिकवादी, शोधपरक निज नेक विचार।।


गोठ सियानी ऊँखर रचना, जग-जन ला रस्ता दिखलाय।

मातृ बोल छत्तीसगढ़ी के, भावी पीढ़ी लाज बचाय।।


आज पुण्यतिथि गिरधर कवि के, गजानंद जी करे बखान।

जतका लिखहूँ कम पड़ जाही, कोदूराम दलित गुनगान।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़ी)


Sunday, September 26, 2021

विश्व बेटी दिवस के पावन अवसर म, छंदबद्ध कवितायें-छंद के छ परिवार

 विश्व बेटी दिवस के पावन अवसर म, छंदबद्ध कवितायें-छंद के छ परिवार



कुकुभ छन्द - बोधन राम निषादराज


फुरफुन्दी बन के तँय उड़बे,

                        दुनिया मा छा जाबे ओ।

दया-मया दाई-बाबू के,

                         सोर सबो बगराबे ओ।।


सोन चिरइया तँय अँगना के, 

                       तहीं फूल अउ फुलवारी।

दाई-बाबू के घर-कुरिया,

                     पारत रहिथस किलकारी।।

बेटी मोर दुलौरिन तँय हा,

                     पढ़ लिख नाम कमाबे ओ।

फुरफुन्दी बन के तँय उड़बे,.................


धरम-करम इज्जत मरजादा,

                       अपन हाथ मा रख ले बे।

सत् के मारग मा चल बेटी,

                        जिनगी रद्दा गढ़ ले बे।।

महर-महर गोंदा चम्पा के,

                        फूल सहीं ममहाबे ओ।

फुरफुन्दी बन के तँय उड़बे,.................


अपन देश के मान रखे बर,

                      बइरी सँग तँय लड़ जाबे।

रानी लक्ष्मी बाई बन के,

                      नाम अमर तँय कर जाबे।।

देश राज मा नारि जाति के,

                          सुग्घर मान बढ़ाबे ओ।

फुरफुन्दी बन के तँय उड़बे,................


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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हरिगीतिका छंद-द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"

शीर्षक-बेटी


बेटी घलो संतान होथे,दे बने सम्मान गा।

झन मार एला कोख मा, तँय लेत काबर जान गा।

लछमी कहाही तोर बेटी,लेन दे अवतार जी।

पढ़ लिख जगाही नाँव सुग्घर,लेगही भव पार जी।


बेटी कहाँ कमजोर होथे,देखले संसार ला।

अँचरा म सुख के छाँव देथे,गाँव अउ घर द्वार ला।

ए फूल कस जी महमहाथे,जोड़थे परवार ला।

अनमोल हीरा ताय बेटी,तारथे ससुरार ला।।


द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"

बायपास रोड कवर्धा

छत्तीसगढ़

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: दोहा छंद :- मोर बेटी भारती हीरा ये


हावय बेटी भारती, हीरा कस अनमोल।

दुनिया भर मा नाम हे, बोलय मीठा बोल।।


बेटी के अभियान मा, जुड़े हवय जी नाम।

बेटी के सम्मान बर, करथे सुग्घर काम।।


जाके जम्मो गाँव मा, देवत हे सन्देश।

बेटा बेटी एक हे, दूनो हरथे क्लेश।।


बेटा घर के मान हे, बेटी घर के शान।

बेटा कुलदीपक हरे, बेटी दय पहचान।।


बेटा तारे एक कुल, अपन करय उद्धार। 

बेटी दू कुल तारथे, मइके अउ ससुरार।।


किस्मत वाला के करय, बेटी पूरा साध।

मारव झन गा कोंख मा, होथे बड़ अपराध।।


जगदीश "हीरा" साहू (व्याख्याता)

कड़ार (भाटापारा)

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 दोहा छंद- राजेश कुमार निषाद


जीये के आशा हवै, बेटी आवँव तोर।

मारव झन गा कोख मा,गलती का हे मोर।।


होही रोशन  नाम हा, जग मा मोला लान।

करहूँ सेवा रोज मैं,बेटा मोला मान।।


पढ़ लिख के मैं एक दिन,साहब बनके आँव।

गाँव गली अउ खोर मा,पूछत हावय नाँव।।


राखी के दिन आय ले,करथे सुरता मोर।

भाई बहिनी के मया, जग मा हावय शोर।।


दो कुल मा दीपक जला,करहूँ मैं उजियार।

घर में बेटी के बिना,सुन्ना है परिवार।।


छंदकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर


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ज्ञानू कवि: विष्णुपद छंद


बेटी ले घर द्वार सजे हे, अउ परछी अँगना।

बेटी ले संसार चलत हे, बँधे मया बँधना।।


दया मया ले सींचत राहव, फूल बरोबर हे।

मुरझावन देहू ओला झन, निच्चट कोंवर हे।।


जनमदायिनी महतारी बन, जिनगी नव गढ़थे।

सहिके दुख चुपचाप दरद ला, बस आगू बढ़थे।।


बेटी बहिनी दाई सुग्घर, रूप अनेक धरे।

बखत परे चंडी काली बन, पापी नाश करे।।


छोड़ ददा दाई ला देथे, बेटा जब भइया।

बेटा बनके बेटी करथे, पार सदा नइया।।


बेटी ला अभिशाप इहाँ झन, अब कोनो  समझौ।

पुल बन बेटी सदा जोड़थे, कुल दोनो समझौ।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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: मोर गरीबिन बेटी हा

(गीत)


मोर गरीबिन बेटी हा गढ़त हे नवा रसता।

 मूँड़ बोहे बोजहा अउ पीठ लादे बसता।


 नइये सइकिल मोटर गाड़ी, बंगला महल अटारी।

 नइये ओला कुछु शिकायत, नइये ककरो बर गारी।

 गुणवंतीन हे दुनियादारी के नइये अता पता ।

मोर गरिबिन बेटी ह गढ़त हे नवा रसता।।


छुट्टी होथे लहुटत खानी, लकड़ी बीनत आथे।

 धो मांज के पानी भरथे, जेवन घलो बनाथे।

दाई ददा मन बनी जाथें, घर के हालत खसता।

मोर गरीबिन बेटी ह गढ़त हे नवा  रसता।।


बड़े बाढ़ के मान बढाही, मइके अउ ससुरार के।

बेटी बिना कहाँ हे सुख ,धरती मा परिवार के।

कन्या रतन अनमोल हे संगी, मूरख समझे ससता।

मोर गरीबिन बेटी ह गढ़त हे नवा रसता।


बात ल मानौ ,जल्दी भेजव ,बेटी ल स्कूल।

बड़ ममहाथे दौना कस वो, मोंगरा के जस फूल।

अबड़ मयारू होथे "बादल" ,बेटी माई के नता।

मोर गरीबिन बेटी ह गढ़त हे नवा रसता।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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*शंकर*  छंद

        *भारत*  *के*  *बेटी* 



जनमें भारत मा तँय बेटी,हो गिस धन्य भाग।

आ गे कोरी एक सदी ता,झन रह सुते जाग।।1।।


पढ़ाई के गियान ल बेटी,बना ले तलवार।

बन जा झाँसी के अब रानी,सह झन अत्याचार।।2।।


लड़बे बेटी अपन लड़ाई,ककरो नि कर  आस।

बिजली कस चमकत बेटी तँय,जीत ले अकास।।3।।


इंदिरा कल्पना सरोजनी,जग मा करिन नाम।

बेटी अइसन नाम बढ़ाबे,करके बड़े काम।।4।।


बेटी कोन ल करिहौं सुरता,बहुतेचकन नाम।

लता मंगेशकर अउ प्रतिभा,सिंधु मेरीकाम।।5।।

       वासंती वर्मा

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दोहा-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


नाम छोड़ बस काम ला, बेटी मन सिरजाय।

हाथ मेहनत थाम के, सरग धरा मा लाय।।


मनखे सब रटते रथें, बेटी बेटी रोज।

तभो सुनत हें चीख ला, रुई कान मा बोज।


बोज रुई ला कान मा, होके मनुष मतंग।

करत हवैं कारज बुरा, बेटी मनके संग।


लेख विधाता का लिखे, दुख हावै दिन रात।

काम बुता करथें सदा, खाथों भभ्भो लात।


शान दुई परिवार के, बेटी माई होय।

मइके ले ससुराल जा, सत सम्मत नित बोय।


आज राज नारी करे, चारो कोती देख।

अपन हाथ खुद हे गढ़त, अपने कर के लेख।


नारी शक्ति महान हे, नारी जग आधार।

नारी ले निर्माण हे, नारी तारन हार।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)

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छप्पय छंद- जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


दुख माँ बाप मनाय, जनम बेटी लेवय जब।

बेटा घर मा आय, लुटावय धन दौलत तब।

भेदभाव के बीज, कोन बोये हे अइसन।

बेटी मन तक काम, करे बेटा के जइसन।

बेटी मनके आन हा, बेटी मनके शान हा।

छुपे कहाँ जग मा हवै, जानय सकल जहान हा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा

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        चौपई छंद ( बेटी )


बेटी ला झन अबला जान।

बेटी के सब राखव मान।

होथे बेटी फूल समान।

बगरै खुशबू सकल जहान।।1।।


बेटी लक्ष्मी के अवतार।

कोख म येला तैं झन मार।

जानव इनला मुक्ता हार।

समझौ झन गा कोनो भार।।2।।


बेटी के हे कतको रूप।

जइसे होथे चलनी सूप।

पानी जइसे देथे कूप।

काम घलो गा हवे अनूप।।3।।


बेटी ले हे घर परिवार।

होथे ये दू घर के तार।

मात पिता के मया दुलार।

बैरी बर खंजर तलवार।।4।।


बेटी दुर्गा रूप समान।

इनला राधा सीता जान।

रूप बिष्णु मोहनी ग मान।

वहुला तेहा बेटी जान।।5।।


बेटी चण्डी के अवतार।

जान करो नइ अत्याचार।

नइ ते गला तोर तलवार।

काट मचाही हाहाकार।।6।।


महिमा बेटी के अब जान।

गावय गीता वेद पुरान।

सबो देव के पा वरदान।

जग मा बेटी भइस महान।।7।।


छन्दकार

कुलदीप सिन्हा "दीप"

कुकरेल सलोनी ( धमतरी )

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बेटी

आल्हा छंद- विजेन्द्र वर्मा


भागजनी घर बेटी होथे, नहीं लबारी सच्चा गोठ।

सुन तो वो नोनी के दाई,बात कहत हौं मँय हा पोठ।।


अड़हा कइथे लोगन मोला,बेटा के जी राह अगोर।

कुल के करही नाँव तोर ये,जग ला करही बिकट अँजोर।।


कहिथँव मँय अँधरागे मनखे,बेटी बेटा ला झन छाँट।

एक पेड़ के दुनों डारा,दुआ भेद मा झन तँय बाँट।।


सोचव बेटी नइ होही ते,ढोय कोन कुल के मरजाद।

अँचरा माँ के सुन्ना होही,बोझा अपने सिर मा लाद।।


आवव अब इतिहास रचव जी,गढ़व सुघर जिनगी के राह।

दुनियादारी के बेड़ी ला,तोड़व अब तो अइसन चाह।।


पढ़ा लिखा के बेटी ला जी,देव सुघर सब झन सम्मान।

जानव अब बेटी ला बेटा,दव सपना ला उँकर उड़ान।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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बेटी

रोला छंद-संगीता वर्मा


बेटी ले परिवार, नाँव ये कुल के करथे।

देवव मया दुलार,पीर सबके जी हरथे।

सुख के होथे छाँव, जिहाँ बेटी मन रहिथे।

कतको दुख ला फेर, हाँस के वो हा सहिथे।।


बेटी लक्ष्मी आय, दूर करथे अँधियारा।

दया मया के छाँव, दुनों कुल के वो तारा।

करके घर उजियार, सुघर बिजली कस बरथे।

बड़का बड़का काम, तको बेटी मन करथे।।


नोहय बेटी बोझ, भाग झन उँखर उजारव।

बोझ जान के फेर, कोख मा झन तो मारव।

कुल के तारणहार, इहाँ बेटी ला जानव।

इही बात हे सार, छुरी झन अब तो तानव।।


संगीता वर्मा

अवधपुरी भिलाई

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Saturday, September 18, 2021

भगवान विश्वकर्मा जयंती विशेष


 भगवान विश्वकर्मा जयंती विशेष


जय बाबा विश्वकर्मा (सरसी छंद)


देव दनुज मानव सब पूजै,बन्दै तीनों लोक।

बबा विश्वकर्मा के गुण ला,गावै ताली ठोक।


धरा धाम सुख सरग बनाइस,सिरजिस लंका सोन।

पुरी द्वारिका हस्तिनापुर के,पार ग पावै कोन।


चक्र बनाइस विष्णु देव के,शिव के डमरु त्रिशूल।

यमराजा के काल दंड अउ,करण कान के झूल।


इंद्र देव के बज्र बनाइस,पुष्पक दिव्य विमान।

सोना चाँदी मूँगा मोती,बीज भात धन धान।


बादर पानी पवन बनाइस,सागर बन पाताल।

रँगे हवे रुख राई फुलवा,डारा पाना छाल।


घाम जाड़ आसाढ़ बनाइस,पर्वत नदी पठार।

खेत खार पथ पथरा ढेला,सबला दिस आकार।


दिन के गढ़े अँजोरी ला वो,अउ रतिहा अँधियार।

बबा विश्वकर्मा जी सबके,पहिली सिरजनकार।


सबले बड़का कारीगर के,हवै जंयती आज।

भक्ति भाव सँग सुमिरण करले,होय सुफल सब काज।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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हरिगीतिका छंद - बोधन राम निषादराज

(विश्वकर्मा महराज)


हो देव शिल्पी आप प्रभु,शुभ विश्वकर्मा नाम हे।

सिरजन करइया विश्व के,अद्भुत तुँहर ये काम हे।।

सुमिरन करै नर-नार सब,जोड़े दुनों जी हाथ ला।

चौखट खड़े सब हे भगत,देखव झुकाए माथ ला।।


रचना करइया जीव के,मन्दिर महल घर द्वार के।

कल कारखाना ला रचे,वन डोंगरी संसार के।।

अउ बज्र रचना इंद्र के,तिरशूल भोलेनाथ के।

गहना रचे  अद्भुत इहाँ, श्रृंगार नारी माथ के।।


सुग्घर पुरी अउ द्वारिका,रामा अवध श्री धाम ला।

सार्थक करे रचना गजब,कारीगरी के नाम ला।।

सागर बँधाए सेतु अउ,पुलिया बड़े बाँधा बड़े।

औजार सब बनिहार बर,महिनत सिखाए जी खड़े।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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भगवान विश्वकर्मा पहिली, कारीगर जग मा।

आनी बानी जिनिस बनाये, हे सुग्घर जग मा।।


महल अटारी हवय बनाये, अउ औजार घलो।

बखत परे मा मायानगरी, जस संसार घलो।।


तोर बनाये पुरी द्वारिका, हावन धाम सुने।

पांडव मन के इंद्रप्रस्थ के, हावन नाम सुने।।


शंख पदुम अउ चक्र सुदर्शन, मा तँय प्राण भरे।

इंद्रपुरी अउ इंद्र सिंहासन, के निर्माण करे।।


 तोर बनाये ये दुनिया सब, अद्भुत अनुपम हे।

रिहिस सोन के तोर बनाये, लंका चमचम हे।।


तोर कला गुण अउ महिमा हा, अपरम्पार हवै।

तोर बिना प्रभु सदा अधूरा, ये संसार हवै।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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सरसी छंद


कारीगरी देवशिल्पी के ,महिमा अगम अपार।

तोर कला के सिरजन अद्धभुत ,जानत हे संसार।।


गढ़ दिन अमरावती इंद्र बर , वज्र सही औजार।

मन मोहन बर पुरी द्वारका ,चक्र सुदर्शन धार।।


सब देवन के महल अटरिया , अलग अलग हे नाम।

कारीगर हवे विश्वकर्मा , अद्धभुत अनुपम काम।।


पांडव मन के इंद्रप्रस्थ ला ,कहँय कल्पना लोक।

कला देवशिल्पी के देखत ,भागे मन के शोक।।


अतुल अचंभित कला देखके ,सोचय पालनहार।

जग के दू झन सर्जक आवन ,दुनो बराबर भार।।


शिल्प क्षेत्र व्यापार जगत के , इही देव आराध्य।

श्रद्धा पूजा भाव भक्ति से ,चमकावत हे भाग्य।।


हवय कारखाना कलयुग मा ,मिले हवय परसाद।

बबा विश्वकर्मा हा देवय ,श्रम ला आशीर्वाद।।




आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

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Friday, September 17, 2021

विश्व ओजोन-परत संरक्षण दिवस" (छत्तीसगढ़ी)*



*"विश्व ओजोन-परत संरक्षण दिवस" (छत्तीसगढ़ी)*


कुदरत के ओजोन परत हा, रक्षा करत हवय दिन-रात

पराबैगनी किरण रोक के, ये नइ होवन दे आघात।


पराबैगनी किरण हमर बर, ले के आथे घातक रोग

बी पी साँस मोतियाबिंद सँग, कैंसर के बनथे संजोग।


ऊपर इकतिस मील भुईं के, येकर परत बने हे ढाल

बिना परत के जीव जंतु के, खच्चित होही बाराहाल।


क्लोरोफ्लोरोकार्बन कारण, होवत हावै एमा छेद

फ्रिज ए सी के गैस कवच ला, ऊपर जाके देथे भेद।


आवव भइया जुरमिल के अब, संरक्षण बर करन उपाय

कसनो कर ओजोन परत ला, हर हालत मा जाय बचाए।


*अरुण कुमार निगम*

Wednesday, September 15, 2021

हिंदी दिवस विशेष

 हिंदी दिवस विशेष





हिंदी दिवस म रचना प्रस्तुत हे


हवै पराया हिंदी भाषा, आज अपन घर मा।

जानबूझ के परे हवन हम, काबर चक्कर मा।।


देवनागरी लिपि ला दीमक, बनके ठोलत हे।

अंग्रेजी हा आज इहाँ बड़, सर चढ़ बोलत हे।।


अलंकार रस हे समास अउ, छंद अलंकृत हे।

हिंदी भाषा सबले सुग्घर, जननी संस्कृत हे।।


अपन देश अउ गाँव शहर मा, होगे आज सगा।

दूसर ला का कहि जब अपने, देवत आज दगा।।


सुरुज किरण कस चम चम चमकय, अब पहिचान मिले।

जस बगरै दुनिया मा अड़बड़, अउ सम्मान मिले।।


पढ़व लिखव हिंदी सँगवारी, आगू तब बढ़ही।

काम काज के भाषा होही, रद्दा नव गढ़ही।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

             1

कहिनी कविता बसे,कृष्ण राम सीता बसे,

हिंदी भाषा जिया के जी,सबले निकट हे।

साकेत के सर्ग म जी,छंद गीत तर्ज म जी,

महाकाव्य खण्डकाय,हिंदी मा बिकट हे।

प्रेम पंत अउ निराला,रश्मिरथी मधुशाला,

उपन्यास एकांकी के,कथा अविकट हे।

साहित्य समृद्ध हवै,भाषा खूब सिद्ध हवै,

भारत भ्रमण बर,हिंदी हा टिकट हे।1।।।

               2

नस नस मा घुरे हे, दया मया हा बुड़े हे,

आन बान शान हरे,भाषा मोर देस के।

माटी के महक धरे,झर झर झर झरे,

सबे के जिया मा बसे,भेद नहीं भेस के।

भारतेंदु के ये भाषा,सबके बने हे आशा,

चमके सूरज कस,दुख पीरा लेस के।

सबो चीज मा आगर,गागर म ये सागर,

भारत के भाग हरे,हिंदी घोड़ा रेस के।2।

                3

सबे कोती चले हिंदी,घरो घर पले हिंदी।

गीत अउ कहानी हरे, थेभा ये जुबान के।।

समुंद के पानी सहीं, बहे गंगा रानी सहीं।

पर्वत पठार सहीं, ठाढ़े सीना तान के।।

ज्ञान ध्यान मान भरे,दुख दुखिया के हरे।

निकले आशीष बन,मुख ले सियान के।।

नेकी धर्मी गुणी धीर,भक्त देव सुर वीर।

बहे मुख ले सबे के,हिंदी हिन्दुस्तान के।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)छत्तीसगढ़


हिंदी दिवस की आप सबको सादर बधाई

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 हिंदी दिवस के आप सब मन ला गाड़ा गाड़ा बधाई 🙏💐

छत्तीसगढ़ी भाखा मा हिंदी दिवस ला समर्पित एक छंद रचना .....

ताटंक छंद - (हिंदी भाषा)

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हमर राष्ट्र हे हिंदी भाषी, ज्ञान ध्यान सिरजाये हे।

अलख जगाये विश्व पटल मा, दुख सुख सबो समाये हे।। 


सूर जायसी तुलसी मीरा, कहें कबीरा के बानी।

देव नागरी अवधी बोली, धरे धरोहर हें ज्ञानी।।


आखर-आखर मुखरित हो के, स्वर व्यंजन बन जाथे जी।

उदित भाव मन के अभिव्यक्ति, भाखा अपन कहाथे जी।।


शब्द-शब्द मा भरे हवय रस, मधुर मधुर मधुरस बोली।

सखी-सहेली भोली प्यारी, ननपन के हे हमजोली।।


छंद-सोरठा कविता-दोहा, गीत-गजल अउ चौपाई।

गौरव-गाथा वीरन मन के, कहिथें  हिंदी भाषाई।।


उगती-बुड़ती बगरे हाबय, भारत भर हिंदी भाखा।

पढ़ो-लिखो अउ पोठ करौ जी, राज-काज सब मा राखा।।


मलयाली गुजराती गोंडी, उड़िया द्रविड़ हवै भाषा।

हलबी भतरी अउ सरगुजिया, हिंदी मन के अभिलाषा।। 


एक-सूत्र मा बाॅधय जन-जन, सरल-सहज हिंदी बोली।

देश राज के घर अॅगना मा, रंग भराये रंगोली।।


रामकली कारे बालको नगर


हिंदी दिवस की आप सबको सादर बधाई

Friday, September 10, 2021

गणेश चतुर्थी विशेष






























मूर्तिकार-श्री अशोक धीवर जलक्षत्री जी(छंदसाधक, सत्र-7)

गणेश चतुर्थी विशेष



: बिष्णु पद छंद- बोधन राम निषादराज

*जय गणेश*


जय  गणेश गणनायक देवा,बिपदा  मोर हरौ।

आवँव तोर दुवारी मँय तो, झोली  मोर भरौ।।1।।


दीन-हीन  लइका  मँय देवा,आ के  दुःख हरौ।

मँय अज्ञानी दुनिया में हँव,मन मा ज्ञान भरौ।।2।।


गिरिजा नन्दन हे गण राजा, लाड़ू  हाथ धरौ।

लम्बोदर अब हाथ बढ़ाओ,किरपा आज करौ।।3।।


शिव शंकर के सुग्घर ललना,सबके ख्याल करौ।

ज्ञानवान तँय सबले जादा,जग में ज्ञान भरौ।।4।।


जगमग तोर दुवारी चमके,स्वामी चरन परौं।

एक दंत स्वामी हे प्रभु जी,तोरे बिनय करौं।।5।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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 *सात दोहा गणेंश के*


एकाक्षर एकदंत ए, गणाध्यक्ष गणराज ।

भादों चौथ विराजथे, पूरण करथे काज ।।


देवन मा सबले बड़े गौरी सुत कहलाय ।

मंगलमय गणराज ला, मोदक सुग्घर भाय ।।


विघ्नेश्वर भगवान के, होवय जय जयकार ।

शंकर सुवन गणेंश के, मुसुवा हवै सवार ।।


कपिल कविश कविराय के, लेखन हावै सार ।

लिखे महाभारत कथा, जानें सब संसार ।।


परसा सोहय हाथ मा, भागय डर मा काल ।

सकल जगत के पाप ला, हरे उमा के लाल ।।


विकट विनायक वीर हे, पेट बड़े मन भाय ।

हाथी जइसन सूंड हे, लंबा कान सुहाय ।।


ठेठ नवाये माथ ला, कृपा करो करतार ।

भव के अटके नाव ला, लउहा करदो पार ।।


पुरूषोत्तम ठेठवार 

छंदकार 

ग्राम -भेलवाँटिकरा 

जिला -रायगढ 

छत्तीसगढ


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 सरसी छंद- राजेश कुमार निषद

    गौरी पुत्र गणेश

करबो पूजा हम सब तोरे, गौरी पुत्र गणेश।

अरजी हमरों सुनलव प्रभु जी,काटहु मन के क्लेश।।

एकदन्त के तैंहर धारी,सुनलव गा गणराज।

रिद्धि सिद्धि के हव तुम दाता,  करहू पूरन काज।।


मुसवा के तैं करे सवारी,लडुवन लागय भोग।

जेन शरण मा तोरे आवय,हरथव ओकर रोग।।


सबले पहिली होथे पूजा,जग मा देवा तोर।

 जोत ज्ञान के तहीं जला के, करथस जगत अँजोर।।


महादेव अउ पार्वती के,हावस नटखट लाल।

बड़े बड़े तैं लीला करके,करथस अबड़ कमाल।।


तीन लोक मा होथे प्रभु जी,तोरे जय जयकार।

हे गणपति तैं हे गणराजा,विपदा हरव हमार।।


छंदकार :- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा रायपुर छत्तीसगढ़

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गनपति जी देख ले (बाल दोहा गीत)

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गनपति जी देख ले,

तपथे मुसवा तोर।

देहे कुतर किताब ला,

सबो बिषय के मोर।


ओकर मारे नइ बँचय,

कोठी मन के धान।

खाथे चाँउर दार ला,

करथे बड़ नसकान।


आय अकेल्ला वो नही,

लाथे अउ सँग जोर।

गनपति....


बिला बनाथे टोंक मा,

माई कुरिया रोज।

कोरा अबड़ निकालथे,

रहय नही वो सोज।


मोर खजेना लेगथे,

हाबय नँगते चोर।

गनपति....


नानी मोरे ले रहिस,

सुग्धर कुरता लाल।

आके चुप्पे जेब ला,

चुनदिस रतिहा काल।


पाके आरो भागथे,

लउहे लउहे खोर।

गनपति....


-मनीराम साहू ''मितान'

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दोहा छंद


मंगलकारी देव तँय, करथे जउँन पुकार।

पार लगा के तो इहाँ, देथस खुशी अपार।।


सबले पहिली आज तो, होथे पूजा तोर।

भक्ति भाव ले लोग मन,वर माँगय पुरजोर।।


गौरी शंकर लाल तँय, ऋद्धि सिद्धि के नाथ।

देवों के तँय देव अच, थामे सबके हाथ।।


तीन लोक मा गूँजथे, तोरे जय जयकार।

जेन शरण मा आ जथे, करथस बेड़ा पार।।


बिगड़े सबके काज ला, तहीं बनाथस देव।

ज्ञान बुद्धि बल के सदा,बनथस सुग्घर नेव।।


झूठ लबारी त्याग के, करय पुण्य के काज।

छाहित रहिथस देव तँय, रखथस ओकर लाज।।


अड़बड़ तोला प्रिय हवै, लडुवन के जी भोग।

रोज करै जे आरती, भागय ओकर रोग।।


मात-पिता ला पूजके, मानें चारों धाम।

तेकर सेती आज तक, गूँजत जग मा नाम।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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गौरी शंकर लाल तॅंय, हर्ता विघ्न गणेश।

सुख समृद्धि सॅंग लाय तॅंय, दुरिहा रखे कलेश।।


पहिली पूजा तोर हे, मुसवा करे सवार। 

आये भादो चौथ के, सुग्घर तोरे वार।।


सबले बड़का देव तॅंय, देवन मा गणराज।

मोदक तोला भाय जी, पूरन करथस काज।।


रिद्धि सिद्धि सॅंग रहे, दुख दरिद्र ला लेश।

सुख समृद्धि सॅंग लाय तॅंय, दुरिहा रखे कलेश।।

गौरी शंकर लाल तॅंय, हर्ता विघ्न गणेश......


हाथी सरि हे पेट अउ, सूपा जस जी कान।

कथे बुद्धि के देवता, भारी हस बलवान।।


खीरा तोला भोग मा, भक्तन सबो चढ़ाय।

संझा बिहना आरती, करे मनौती पाय।।


सुमरत हवै मनोज हर, आवव हमरो द्वार।

अपन चरन मा राख प्रभु, सुखी रहै परिवार।।


भक्ति तोर मन मा रहे, आय कभू झन द्वेष।

सुख समृद्धि सॅंग लाय तॅंय, दुरिहा रखे कलेश।।

गौरी शंकर लाल तॅंय, हर्ता विघ्न गणेश.......


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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: गणेश चतुर्थी के हार्दिक बधाई

विष्णुपद छंद


एकदंत गजबदन गजानन, बिघ्न विनाशक जी।

पहिली पूजा तोर जगत मा, हे गननायक जी।।


गनपति देव गनेश उमा सुत, पितु शिवशंकर हे।

नाम अनेक हवै अउ महिमा, तोर भयंकर हे।।


दाई के आज्ञा ला पाके, तैंहा द्वार खड़े।

रोके रस्ता अपन ददा के, ओखर संग लड़े।।


गुस्सा मा तब शिव त्रिनेत्र प्रभु, काटे मूड़ हवै।

जोड़े हाथी मूड़ बाद मा, तबले सूँड़ हवै।।


अँधरा देखय अउ कोंदा हा, पोथी बाँचत हे।

पाके किरपा तोर खोरहा, परवत लाँघत हे।।


रिध्दि सिद्धि बल बुध्दि प्रदाता, हे गनराज तही।

भक्तन के तँय इहाँ बनाथस, बिगड़े काज तही।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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[अशोक कुमार जायसवाल: *सुमिरन*

            अमृत ध्वनि छंद

गणपति सुमिरन मैं करँव, धरे सोनहा थाल |

तोर उतारँव आरती, महादेव के लाल ||


महादेव के, लाल हमर तैं, विनती सुन ले |

तोर चरण मा, करथँव अर्जी, थोकुन गुन ले ||


नइ जानव मैं, भक्ति भाव ला, मोर मूढ़ मति |

लाज हमर तैं, आज राख ले, जय हो गणपति ||


    अशोक जायसवाल

साधक -13

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*गणपति देवा-आल्हा छंद गीत(खैरझिटिया)


मुस्कावत हे गौरी नंदन, मुचुर मुचुर मुसवा के संग।

गली गली घर घर मा बइठे, घोरत हवै भक्ति के रंग।


तोरन ताव तने सब तीरन, चारो कोती होवय शोर।

हूम धूप के धुवाँ उड़ावय, बगरै चारो खूँट अँजोर।

लइका लोग सियान सबे के, मन मा छाये हवै उमंग।

मुस्कावत हे गौरी नंदन, मुचुर मुचुर मुसवा के संग।।


संझा बिहना होय आरती, लगे खीर अउ लड्डू भोग।

कृपा करे जब गणपति देवा, भागे जर डर विपदा रोग।

चार हाथ मा शोभा पाये, बड़े पेट मुख हाथी अंग।

मुस्कावत हे गौरी नंदन, मुचुर मुचुर मुसवा के संग।।


होवै जग मा पहली पूजा, सबले बड़े कहावै देव।

ज्ञान बुद्धि बल धन के दाता, सिरजावै जिनगी के नेव।

भगतन मन ला पार लगावै, होय अधर्मी असुरन तंग।

मुस्कावत हे गौरी नंदन, मुचुर मुचुर मुसवा के संग।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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चौपई छंद - बोधन राम निषादराज

विषय - *जय गणेश*


जय गणेश गिरिजा के लाल । मुकुट बिराजे सुग्घर भाल ।।

शिव शंकर के बेटा आय । ऋद्धि सिद्धि के मन ला भाय।।


आवौ करलौ पूजा पाठ । देखौ कइसे एखर ठाठ ।।

मुसुवा मा बइठे भगवान । मनचाहा देथे बरदान।।


जबर पेट हे हाथी जान । कतका मैंहा करँव बखान ।।

गणनायक हे सुख ला देत । बिपदा ला छिन मा हर लेत ।।


बुद्धि देत हे माँगव आज । सफल होय जी जम्मों काज ।।

सेवा करके मेवा पाव । चल भइया सब गुन ला गाव ।।


ग्यारा दिन अउ ग्यारा रात । करलौ भगती बनही बात ।।

धीरज मा मिलथे जी खीर । झन हो जाहू आज अधीर ।।


देवो मा तँय बड़का देव । मोरो बिनती ला सुन लेव।

पाँव परत हँव तोरे आज । दे आशीष तहीं महराज ।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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:🌸🌸जय गणपति🌸🌸

          (गीतिका छन्द)



पार्वती-शिवशंभु के सुत, तोर गणपति नाम हे।

मूँड़ हा हाथी सँही अउ, सूँड़ हा बड़ लाम हे।।

प्रार्थना शुरु तोर होथे,फेर हर शुभ काम हे।

तोर बर दाई-ददा के, पाँव तीरथ धाम हे।।


फूल लाली घास दूबी, आप ला स्वीकार हे।

घीव अउ गुड़ भोग प्यारा, मीठ लाड़ू सार हे।।

मोहना मुसवा सवारी, बुध्दि के भण्डार हे।

मास भादो बड़ खुशी ले, मान बारम्बार हे।।


दाँत सोहत एक सुग्घर, तोर सूपा कान हे ।

रिद्धि स्वामी सिध्दि स्वामी, लाभ-शुभ संतान हे।।

पेट बड़का विघ्नहर्ता, आपके पहिचान हे।

साँझ-बिहना आरती मा, हे विनायक ध्यान हे।।

***

कमलेश कुमार वर्मा,शिक्षक

भिम्भौरी,बेमेतरा

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Thursday, September 9, 2021

तीजा परब विशेष

 


तीजा परब विशेष


 *हरिगीतिका छंद - बोधन राम निषादराज*

तीजा (हरतालिका)


तीजा अँजोरी तीज मा,भादो रथे महिना सखा।

जम्मों सुहागिन मानथे,पहिरे रथे गहना सखा।।

शिव पाय बर माँ पार्वती,उपवास ला पहिली करिन।

जानव इही खातिर सबो,नारी इहाँ व्रत ला धरिन।।


पति के उमर लम्बा रहै, दाई - ददा के घर सबो।

करुहा करेला खाय के,व्रत राखथे दिन भर सबो।।

कतको कुँवारी मन घलो,रखथे इही उपवास ला।

सुग्घर मिलै वर सोंच के,मन मा सजाथे आस ला।।


पूजा रचा शिव-पार्वती,अउ गीत बाजा बाजथे।

जम्मों सुहागिन रात भर,सुग्घर फुलेरा साजथे।।

होवत मुँधरहा सब नहा,लुगरा नवा तन डार जी।

व्रत टोरथे मिलके बहिन,करथे सबो फरहार जी।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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विजेन्द्र: मनहरण घनाक्षरी


गिरत हवै फुहार,बोहावत मया धार।

मन हा आज सबके,बने हरियाय हे।

आय हे तीज तिहार,खुशियाँ लेके अपार।

बेटी माई दाई मन,सब सकलाय हे।

मइके के गोठ करै,बाँह भर चूरी भरै।

कहै मोर मेंहदी हा,जादा ललियाय हे।

करके सोला श्रृंगार,पहिरे गजरा हार।

भोला ला मनाये बर,आरती सजाय हे।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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कुण्डलिया -अजय अमृतांशु


तीजा मा भाँटो करत, घर के जम्मो काम। 

खुदे राँध के खात हे, कहाँ मिलय आराम।।

कहाँ मिलय आराम, रात के नींद न आवय।

अलवा जलवा साग, भात चिबरी ला खावय।

झाड़ू पोंछा मार, जबर कंझावय जीजा।

दीदी बड़ मुसकाय, आय माने बर तीजा।


अजय अमृतांशु, भाटापारा

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सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


लइका लोग ल धरके गेहे,मइके मोर सुवारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आगे हे पारी।


कभू भात चिबरी हो जावै,कभू होय बड़ गिल्ला।

   बर्तन भँवड़ा झाड़ू पोछा,हालत होगे ढिल्ला।

   एक बेर के भात साग हा,चलथे बिहना संझा।

मिरी मसाला नमक मिले नइ,मति हा जाथे कंझा।

दिखै खोर घर अँगना रदखद,रदखद हाँड़ी बारी।

   खुदे बनाये अउ खाये के,अब आगे हे पारी।1।


सुते उठे के समय बिगड़गे,घर बड़ लागै सुन्ना।

  नवा पेंट कुर्था मइलागे,पहिरँव ओन्हा जुन्ना।

कतको कन कुरथा कुढ़वागे,मूड़ी देख पिरावै।

     ताजा पानी ताजा खाना,नोहर होगे हावै।

कान सुने बर तरसत हावै,लइकन के किलकारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आगे हे पारी।2।


खाये बर कहिही कहिके,ताकँव मुँह साथी के।

चना चबेना मा अब कइसे,पेट भरे हाथी के।

मोर उमर बढ़ावत हावै,मइके मा वो जाके।

राखे तीजा के उपास हे,करू करेला खाके।

चारे दिन मा चितियागे हँव,चले जिया मा आरी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आगे हे पारी।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

पता-बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

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Tuesday, September 7, 2021

कुण्डलिया- विजेन्द्र वर्मा

 कुण्डलिया- विजेन्द्र वर्मा


आसन प्राणायाम ले, भाग जथे सब रोग।

रोज करिन जी योग तो,काया होय निरोग।

काया होय निरोग,सुघर जिनगी तब चलही।

जीवन होही धन्य,पीर नइ कोनों सहही।

मनखे जम्मो आज,खाव अब कम जी राशन।

निस दिन प्राणायाम,करिन हम सब जी आसन।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

कुण्डलिया- विजेन्द्र वर्मा

 कुण्डलिया- विजेन्द्र वर्मा


राखी


बचपन के तो आज जी,सुरता बहुते आय।

राखी रेशम के बने, सबले जादा भाय।

सबले जादा भाय, हाथ भर पहिरन अतका।

रिकिम रिकिम के लाय, बाँध दय बहिनी जतका।

आनी-बानी खान, भोग राखी मा छप्पन।

होगे हवन जवान, याद आथे अब बचपन।।


बंधन बाँधय हाँस के, बहन निभावय रीत।

हिरदे मा भर प्रीत ला, मन भाई के जीत।

मन भाई के जीत,  प्रीत के बाँधय धागा।

कुमकुम तिलक लगात, सुघर पहिराये पागा।

भाई हे अनमोल, करत हे प्रभु  ला वंदन।

हाँसत अउ हँसवात, आज बाँधत हे बंधन।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

अमृतध्वनि छंद- विजेन्द्र वर्मा

 अमृतध्वनि छंद- विजेन्द्र वर्मा


महतारी मन आज तो, रहिथे सुघर उपास।

बेटा बेटी खुश रहय, माँगय वर जी खास।

माँगय वर जी,खास सबो के,उम्मर बाढ़य।

पोती मारय,मुड़ मा विपदा, झन तो माढ़य।

एक ठउर मा,अउ जुरियाके,जम्मो नारी।

महादेव के,पूजा करथे,सब महतारी।।


घर के बाहिर कोड़ के, सगरी ला दय साज।

गिन गिन पानी डार के, करथे पूजा आज।

करथे पूजा,आज नेंग जी,करथे भारी।

लइका मन के,रक्षा बर तो,हे तैयारी।

हूम धूप अउ,फूल पान ला,सुग्घर धरके।

सुमिरन करथे, महतारी मन,जम्मो घरके।।


पतरी महुआ पान के, भाजी के छै जात।

चुरथे घर-घर मा इहाँ, पसहर के अउ भात।

पसहर के अउ,भात संग मा,दूध दही ला।

महतारी मन,खाय थोरकिन,डार मही ला।

गहूँ चना अउ,महुआ के सन,लाई-लुतरी।

सुघर चघावै,नरियर काँशी,दोना पतरी।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

मनहरण घनाक्षरी- विजेन्द्र वर्मा

 मनहरण घनाक्षरी- विजेन्द्र वर्मा

(1)

सकलाये रिश्ता नाता,माटी के हे पोरा जाँता।

नँदिया बइला बर इहाँ,आरती सजात हे।

घर घर बने चीला,खाय इहाँ माई पीला।

आगे हावय पोरा जी,खुशियाँ मनात हे।

पटके बर हे पोरा, सखियन के अगोरा।

घेरी-बेरी झाँक अब,खोर कोती जात हे।

मया पिरित ला बाँधे,छप्पन भोग ला राँधे।

ठेठरी खुरमी बरा,के मजा उड़ात हे।


(2)

सकलाये रिश्ता नाता, माटी के हे पोरा जाँता।

दाई माई दीदी मन, पोरा फोरे जात हे।

सबो कोही जुरियाये,भाठा मा सकलाये।

मन मा उछाह भरे,सुघर मुसकात हे।

आनी-बानी खेल खेले,रेंधई ले लेके पेले।

फुगड़ी खो-खो मा बने,समे ला बितात हे।

पहिरे नवा लुगरा,गीता सरिता उत्तरा।

सुख दुख बाँट इहाँ, तिहार मनात हे।

विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

विष्नुपद छंद-ज्ञानु

 


विष्नुपद छंद-ज्ञानु


भादों माह अमावस पोरा, दिन बड़ पबरित हे।

फसल लहलहावत ओखर बर, सिरतो अमरित हे।।


धान पोटरावत हे सुग्घर, देख किसान इहाँ।

हँसी खुशी सब परब मनाये, मारत शान इहाँ।।


माटी के नंदी बइला के, पूजा आज करै।

हमर किसानी इही मितानी, सब्बो काज करै।।


नोनी मन जाँता चुकिया धर, मिलजुल खेलत हे।

बाबू मन बइला गाड़ी ला, खींचत पेलत हे।।


खोखो दउँङ कबड्डी खेलत, शोर मचावत हे।

लइका संग जवान इहाँ सब, परब मनावत हे।।


छतीसगढ़ी परब परंपरा, हमर धरोहर हे।

बरा ठेठरी खुरमी अड़बड़, बनय घरोघर हे।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

हरिगीतिका छन्द - सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

 



हरिगीतिका छन्द - सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'


                      पोरा


भादो अमावस आज हे, आये हवय पोरा परब।

संदेश सुख समृद्धि के, लाये हवय पोरा परब।

गाना भजन लिख छन्दमय, गाये हवय पोरा परब।

ए साल इन्टरनेट मा, छाये हवय पोरा परब।


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शुभकामना बगरे हवय, पोरा परब के नाम मा।

परसन्न पालनहार के, जॉंगर किसानी काम मा।

सउॅंहत सरग उतरे हवय, तैं देख धरती धाम मा।


पोरा परब के मान्यता, ज्ञानी गुणी मनके अकल।

रतिहा धनइया के हमर, भरथे गरभ मा दूध जल।

पूजा अरज आराधना, श्रम मेहनत होथे सुफल।

दू चार दिन मा फोरथे, जब पोटरी पाना फसल।


मौसम करे हावय मदद, बादर कृपा बरसाय हे।

बइला किसानी काम मा, सहयोग देवत आय हे।

आशीष देये हें गजब, सब ग्राम देबी देव मन।

उज्जर भविस खातिर गड़े, हें जेन पुरखा नेव मन।


अंतस म आदर भाव हे, उपकार बर आभार हे।

घर मा किसानन के हमर, पोरा परब त्यौहार हे।

चुरही ग खुरमी ठेठरी, चीला चुरत हावय अभी।

ॲंगना म नोनी हा हमर, चौंका पुरत हावय अभी।


कोठा म बइला हा हमर , पागुर करत हावय अभी।

बढ़ही फबित खुर सींग मा, पालिस लगत हावय अभी।

बइला ह माटी के घलो, सम्हरत सजत हावय अभी।

नोनी जतुलिया मा अपन, कुछ नइ दरत हावय अभी।


दे हूम-धुप जेंवात हे, ॲंगुरी दसोठन जोर के।

पोरा परब के नेग मा, दू एक सतफर फोर के।

सुखदेव ये छत्तीसगढ़, आवय कटोरा धान के।

पोरा परब हरिगीतिका, लिख ले तहूॅं गुणगान के।


रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

Monday, September 6, 2021

शिक्षक दिवस विशेष


 शिक्षक दिवस विशेष

 छप्पय छन्द-द्वारिका प्रसाद लहरे


गुरू चरण के छाँव,सरग के जइसे लागय।

गुरू ज्ञान ले आज,भाग हा मोरो जागय।

टारय जग अँधियार,ह्दय मा भरय प्रकाशा।

अमरित धार बहाय,लगे जस मीठ बताशा।।

करौं गुरू के वंदना,निसदिन माथ नवाँव जी।

गुरू भक्ति मा बूड़ के,शिष्य महूँ कहलाँव जी।।


द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"

बायपास रोड़ कवर्धा 

छत्तीसगढ़

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पाकर गुरुवर की कृपा, लिख पाता कुछ छंद।

नहीं  दिखाता   विद्वता,  द्वार  बुद्धि  का  बंद।।

द्वार  बुद्धि  का  बंद, सूत्र  विस्मृत  हो  जाता।

केवल   लय    आधार,   रखा   छंदों  से  नाता।।

बिना  सूत्र  लय  ज्ञान, ब्लॉग में लिखता जाकर।

आज धन्य यह शिष्य,'अरुण' सम गुरुवर पाकर।।

सूर्यकांत गुप्ता कांत

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सदा बनाये रखहु गुरू अपन आशीष के छाँव 

आप मन के आशीष ले ही कुछ बन पाय हँव

धन्य होगे मोर भाग जबले 

आपके चरण मा आय हँव

मयँ तो अज्ञानी रहेंव ज्ञान के भण्डार होगे 

महु कुछु बन गेव आपके उपकार होगे 

जुग जुग जीयव गुरू सदा आपके नाम रहय

पहली वन्दन आप मन के चरण मा गुरू 

चाहे दुनिया मा काही काम रहय

आपमन किरपा बरसे जौन डहर जाँव 

जम्मो गुरूदेव अउ गुरुदीदी मन के परत हँव पावँ

सदा बनाये रखहु गुरू अपन आशीष के छाँव 


राकेश कुमार साहू 

सारागांव ,धरसींवा ,रायपुर 

छन्द साधक  सत्र -14

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हरिगीतिका छंद - बोधन राम निषादराज*

(शिक्षक दिवस)


शिक्षक रथे माँ-बाप कस,रद्दा दिखाथे ज्ञान के।

रक्षा करौ जुरमिल सबो,संगी इँखर सम्मान के।।

माटी  सहीं  लइका रथे,जिनगी  इही  गढ़थे बने।

पा के सबो शिक्षा इहाँ, अँगरी पकड़ बढ़थे बने।।


जलके बने दीया सहीं,करथे अँजोरी ज्ञान के।

अज्ञान मिट जाथे  सुनौ, रद्दा सँवरथे मान के।।

धर के कलम पट्टी बने,आखर सिखाथे जोड़ के।

नइ भेद कखरो ले करै,नइ जाय मुख ला मोड़ के।।


शिक्षा बिना जग सून हे,शिक्षा बिना अँधियार हे।

शिक्षा बिना अनपढ़ सबो,जिनगी इँखर बेकार हे।।

आवव करौ सम्मान ला,आवव पखारव पाँव ला।

मिलही बने आशीष हा, पाहव सुखी के छाँव ला।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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विष्णुपद छंद


बिन स्वारथ के ज्ञान जगत मा, वो बगरावत हे।

रोज छात्र मन ला शिक्षक हा, देख पढ़ावत हे।।


पढ़ा रोज लइका ला शिक्षक, देवय ज्ञान इहाँ।

परमारथ बर जिनगी अर्पित, काम महान इहाँ।।


जइसे बरसा ये भुइँया के, प्यास बुझावत हे।

जइसे रद्दा मनखे मन ला, घर पहुँचावत हे।।


नदी कुआँ अउ रुखराई, पर सेवा करथे।

जंगल पर्वत खेतीबारी, सबके दुख हरथे।।


माटी के लोंदा ला सुग्घर, दे आकार इहाँ।

आनी बानी जिनिस बनाथे, रोज कुम्हार इहाँ।।


शिक्षक हा शिक्षक के शिक्षक, लइका  मास्टर हे।

नेता अधिकारी वकील अउ, कोनो डॉक्टर हे।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

चंदेनी- कवर्धा

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हरिगीतिका छंद -बोधन राम निषादराज (पोरा के परब)



 

हरिगीतिका छंद -बोधन राम निषादराज

(पोरा के परब)


भादो अमावस मा इहाँ,पोरा परब आथे सखा।

खुरमी अनरसा बोबरा,सब ठेठरी खाथे सखा।।

भगवान  भोलेनाथ के, नंदी  सवारी साथ मा।

करथे सबो पूजा इहाँ, फल फूल  थारी  हाथ मा।।


सुग्घर परब होथे इही,अउ गर्भधारण धान के।

देथे  सधौरी  रात  मा, देवी  बरोबर  मान के।।

दीया चुकलिया खेलथे,लइका सबो घर द्वार मा।

बइला  सजाके  दउड़थे, पोरा इही  त्यौहार मा।।


माटी बने गाड़ा सिली,लेके जहुँरिया खोर जी।

जाँता पिसनही खेल मा,करथे सबो मिल सोर जी।।

मिलके सबो संगी इहाँ,पोरा पटकथे गाँव मा।

खो-खो कबड्डी खेलथे,जुरियाय सब बर छाँव मा।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)