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Tuesday, May 23, 2023

काया काली बर- सार छन्द

 काया काली बर- सार छन्द


जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।

सेहत सबले बड़का धन ए, धन दौलत धन जाली।।


काली बर धन जोड़त रहिथस, आज पेट कर उन्ना।

संसो फिकर करत रहिबे ता, काल झुलाही झुन्ना।।

तन अउ मन हा हावय चंगा, ता होली दीवाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


खाय पिये अउ सुते उठे के, होय बने दिनचरिया।

काया काली बर रखना हे, ता रख तन मन हरिया।

फरी फरी पी पुरवा पानी, देख सुरुज के लाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


हफर हफर के हाड़ा टोड़े, जोड़े कौड़ी काँसा।

जब खाये के पारी आइस, अटके लागिस स्वाँसा।।

उपरे उपर उड़ा झन फोकट, जड़ हे ता हे डाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सेहत(चौपाई छंद)- जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 विश्व स्वास्थ्य दिवस के आप सबो ला सादर बधाई


सेहत(चौपाई छंद)- जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*आफत तन में आय जब, मन कइसे सुख पाय*

*तन मन तनतन होय तब, माया मोह सुहाय*


हाड़ माँस के तैं काया धर।

हाय हाय झन कर माया बर।

सब बिरथा काया के सुख बिन।

जतन बदन के करले निस दिन।


तन खेलौना हाड़ माँस के।

जे चाबी मा चले साँस के।

जी ले जिनगी हाँस हाँस के।

दुःख दरद डर धाँस धाँस के।


पी ले पानी खेवन खेवन।

समै समै मा खाले जेवन।

समै मा सुत जा समै मा जग जा।

भोजन बने करे मा लग जा।


झन होवय कमती अउ जादा।

कोशिस कर होवय नित सादा।

गरम गरम खा ताजा ताजा।

बजही तभे खुशी के बाजा।


देख रेख कर सबे अंग के।

हरे सिपाही सबे जंग के।

हरा भरा रख तन फुलवारी।

तैं माली अउ तैं गिरधारी।


योग ध्यान हे तन बर बढ़िया।

गतर चला बन छत्तीसगढ़िया।

तन के कसरत हवै जरूरी।

चुस्ती फुर्ती सुख के धूरी।


चलुक चढा झन नसा पान के।

ये सब दुश्मन जिया जान के।

गरब गुमान लोभ अउ लत हा।

करथे तन अउ मन ला खतहा।


मूंगा मोती कहाँ सुहावै।

जब काया मा दरद हमावै।

तन तकलीफ उहाँ बस दुख हे।

तन के सुख तब मनके सुख हे।


जतन रतन कस अपन बदन ला।

सजा सँवार सदन कस तन ला।

तन मशीन बरोबर ताये।

जे नइ माने ते दुख पाये।


तन के तार जुड़े हे मन ले।

का का करथस तन बर गन ले।

जुगत बनाले सुख पाये बर।

आलस तन के दुरिहाये बर।


तन हे चंगा तब मन चंगा।

रहे कठौती मा तब गंगा।

कारज कर झन बने लफंगा।

बने बुता बर बन बजरंगा।।


*सेहत ए सुख साधना, सेहत गरब गुमान*

*सेहत ला सिरजाय जे,उही गुणी इंसान*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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काया काली बर- सार छन्द


जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।

सेहत सबले बड़का धन ए, धन दौलत धन जाली।।


काली बर धन जोड़त रहिथस, आज पेट कर उन्ना।

संसो फिकर करत रहिबे ता, काल झुलाही झुन्ना।।

तन अउ मन हा हावय चंगा, ता होली दीवाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


खाय पिये अउ सुते उठे के, होय बने दिनचरिया।

काया काली बर रखना हे, ता रख तन मन हरिया।

फरी फरी पी पुरवा पानी, देख सुरुज के लाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


हफर हफर के हाड़ा टोड़े, जोड़े कौड़ी काँसा।

जब खाये के पारी आइस, अटके लागिस स्वाँसा।।

उपरे उपर उड़ा झन फोकट, जड़ हे ता हे डाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ छंद(गलत विज्ञापन करत खिलाड़ी अभिनेता)

 कुंडलियाँ छंद(गलत विज्ञापन करत खिलाड़ी अभिनेता)


दारू गुटखा अउ जुआ, देथे जिनगी घाल।

विज्ञापन एखर करे, वोखर नीछव खाल।।

वोखर नीछव खाल, बढ़ावै जे अवगुन ला।

सिर मा झन बइठाव, इसन अभिनेता घुन ला।।

इंखर सुनके बात, बिगड़गे गंगा बारू।

होगे हावय काल, जुआ गुटखा अउ दारू।।


बुता बिगाड़े के करे, बनके बड़का जौन।

वोला दव फटकार मिल, हो जावै झट मौन।

हो जावै झट मौन, स्टार बनके जे फाँसे।

नइ ते सत संस्कार, सबे हो जाही नाँसे।

बड़का पन के मान, रखत सत झंडा गाड़े।

देवँय बढ़िया सीख, कहूँ झन बुता बिगाड़े।।


तास जुआ के खेल हा, बने कभू नइ होय।

विज्ञापन ला एखरो, कई खिलाड़ी ढोय।।

कई खिलाड़ी ढोय, लोभ लालच के गट्ठा।

खेले बर उकसाय, बात नोहे ए ठट्ठा।

बिगड़त हवै समाज, जरूरत हवै दुआ के।

चुक्ता होवय बंद, खेल हा तास जुआ के।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

हरिगीतिका छंद

 हरिगीतिका छंद


मारे मरे के खेल ला मनखे सहज अपनात हे।

कोई बने यमराज हे कोनो जहर जर खात हे।।

जिनगी खुदे हे चार दिन के तेन मा तक ये बला।

मर जात हे धन धान बर हीरा असन तन ला गला।।


कखरो चरित बिगड़े हवे कखरो बिगड़हा चाल हे।

कतको धनी गरजत फिरे कोनो निचट कंगाल हे।।

कोई लबारी मार के अघुवाय हावय हार के।

गुंडा गढ़े निज भाग ला हक मार रोजे चार के।।


पग आज नइ ते कल उखड़ही पाप पोंसे तौन के।

ओखर कभू कुछु होय नइ सत सार करनी जौन के।।

बरकत बुराई देय नइ बारो महीना जान ले।

कर काज बढ़िया आज बर मरना हवै कल मान ले।।


इहि लोक मा सब मोह माया छोड़ के जाना हवै।

नेकी करे मा नाम हे बदमाश बर ताना हवै।।

कब छोड़ जाही पिंजरा के सुख सुवा हा का पता।

जिनगी बने जी हाँस के भुलके कहूँ ला झन सता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

घाम घरी के फर- सार छंद

 घाम घरी के फर- सार छंद


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची लिमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

वीर महाराणा प्रताप -आल्हा

 वीर महाराणा प्रताप -आल्हा


जेठ अँजोरी पाख तीज के, नाचै  अउ गावै  मेवाड़।

बज्र बदन ले बालक जन्मे,काया लगे माँस ना हाड़।


उगे उदयसिंह के घर सूरज,जागे जयवंता के भाग।

राजपाठ के बने पुजारी,बैरी मन बर बिखहर नाग।


अरावली पर्वत सँग खेले,उसने काया पाय विसाल।

हे हजार हाथी के ताकत,धरे  हाथ  मा  भारी भाल।


सुरुज सहीं अंगार खुदे हे,अउ संगी हे आगी देव।

चेतक मा चढ़के जब गरजे,डगमग डोले बैरी नेव।


खेवन हार बने वो सबके,होवय जग मा जय जयकार।

मुगल राज सिंघासन डोले,देखे अकबर  मुँह ला फार।


चले  चाल अकबर तब भारी,हल्दी घाटी युद्ध रचाय।

राजपूत मन ला बहलाके,अपन नाम के साख गिराय।


खुदे रहे डर मा खुसरे  घर ,भेजे  रण मा पूत सलीम।

चले महाराणा चेतक मा,कोन भला कर पाय उदीम।


कई हजार मुगल सेना ले,लेवय लोहा कुँवर प्रताप।

भाला भोंगे  सब ला भारी,चेतक के गूँजय पदचाप।


छोट छोट नँदिया हे रण मा,पर्वत ठाढ़े रहय विसाल।

डहर तंग विकराल जंग हे, हले घलो नइ पत्ता डाल।


भाला  धरके किंजरे रण मा, चले बँरोड़ा संगे संग।

बिन मारे बैरी मर जावव,कोन लड़े ओखर ले जंग।


धुर्रा  पानी  लाली होगे,बिछगे  रण  मा  लासे लास।

बइरी सेना काँपे थरथर,छोड़न लगे सलीम ह आस।


जन्मभूमि के रक्षा खातिर,लड़िस वीर बन कुँवर प्रताप।

करिस नहीं गुलामी कखरो,छोड़िस भारत भर मा छाप।


रचनाकार - श्री जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

9981441795


महाराणा प्रताप जयंती की ढेरों बधाइयाँ

गीत-चिरई बर पानी

 गीत-चिरई बर पानी


चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।

गरमी के बेरा आगे, तड़पे जीव परानी।।


जरत हवय चटचट भुइँया, हवा तात तात हे।

मनखे बर हे कूलर पंखा, जीव जंतु लरघात हे।।

रुख राई के जघा बनगे, हमर छत छानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


बिहना आथे चिंवचिंव गाथे, रोथे मँझनी बेरा।

प्यास मा मर खप जाथे, संझा जाय का डेरा।।

काल बनगे जीव जंतु बर, हमर मनमानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


दू बूँद पानी माँगे, दू बीजा दाना।

पेड़ पात बीच रहिथे, बनाके ठिकाना।।

चिरई बिन कहानी कइसे, कही दादी नानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

जंगल बचाओ-सरसी छन्द

 जंगल बचाओ-सरसी छन्द


पेड़ लगावव पेड़ लगावव, रटत रथव दिन रात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


हवा दवा फर फूल सिराही, मरही शेर सियार।

हाथी भलवा चिरई चिरगुन, सबके होही हार।

खुद के खाय कसम ला काबर, भुला जथव लघिनात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जंगल हे तब जुड़े हवय ये, धरती अउ आगास।

जल जंगल हे तब तक हावै,ये जिनगी के आस।

आवय नइ का लाज थोरको, पर्यावरण मतात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


सड़क खदान शहर के खातिर, बन होगे नीलाम।

उद्योगी बैपारी फुदकय, तड़पय मनखे आम।

लानत हे लानत हव घर मा, आफत ला परघात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


 -

जयकारी छंद (मोर गाँव )

 जयकारी छंद (मोर गाँव )


मोर  गाँव  मा  हे  लोहार।

हँसिया बसुला करथे धार।

रोजे  बिहना   ले  मुँधियार।

चुकिया करसी गढ़े कुम्हार।


टेंड़ा  टेंड़े  बारी    खार।

दिनभर बूता करे मरार।

ताजा  ताजा देवै साग।

तब हाँड़ी के जागे भाग।


राउत भागे होत बिहान।

गरुवा सँकलाये गउठान।

दूध दहीं के बोहय धार।

बइला भँइसा हे भरमार।


फेके रहिथे केंवट जाल।

मछरी बर नरवा अउ ताल।

रंग रंग के मछरी मार।

बेंचे तीर तखार बजार।


लाला धरके बइठे नोट।

सीलय दर्जी कुरथा कोट।

सोना चाँदी धरे सुनार।

बेंचे बिन पारे गोहार।


सबले जादा हवै किसान।

माटी बर दे देवय जान।

संसो फिकर सबे दिन छोड़।

करे काम नित जाँगर टोड़।


उपजावै गेहूँ जौ धान।

तभे बचे सबझन के जान।

बुता करइया हे बनिहार।

गमके गाँव गली घर खार।


बढ़ई गढ़ते कुर्सी मेज।

दरवाजा खटिया अउ सेज।

डॉक्टर मास्टर वीर जवान।

साहब बाबू संत सुजान।


कपड़ा लत्ता धोबी धोय।

पहट पहटनिन रोटी पोय।

पूजा पाठ पढ़े महाराज।

शान गाँव के घसिया बाज।


कुचकुच काटे ठाकुर बाल।

चिरई चिरगुन चहकय डाल।

कुकुर कोलिहा करथे हाँव।

बइगा  गुनिया   बाँधे  गाँव।


हवै शीतला सँहड़ा देव।

महाबीर मेटे डर भेव।

भर्री भाँठा डोली खार।

धरती दाई के उपहार।


छत्तीसगढ़ी गुरतुर बोल।

दफड़ा  दमऊ  बाजे  ढोल।

रंग रंग  के  होय तिहार।

लामय मीत मया के नार।


धूर्रा खेले  लइका  लोग।

बाढ़े मया कटे जर रोग।

गिल्ली भँउरा बाँटी खेल।

खाये अमली आमा बेल।


तरिया नरवा बवली कूप।

बाँधा के मनभावन रूप।

पनिहारिन रेंगे कर जोर।

चिक्कन चाँदुर हे घर खोर।


पीपर पेड़ तरी सँकलाय।

पासा पंच पटइल ढुलाय।

लइकामन हा खेले खेल।

का रंग नदी पहाड़ अउ रेल।


चौक चौक बर पीपर पेड़।

कउहा बम्हरी नाचय मेड़।

नदियाँ नरवा तीर कछार।

चिंवचिंव चिरई के गोहार।


सुख दुख मा गाँवे के गाँव।

जुरै बिना बोले हर घाँव।

तोर मोर के भेद भुलाय।

जुलमिल जिनगी सबे पहाय।


सरग बरोबर लागै गाँव।

पड़े हवै माँ लक्ष्मी पाँव।

हवै गाँव मा मया भराय।

जे दुरिहावय ते पछताय।


छत छानी के घर हे खास।

करे देवता धामी वास।

दाई तुलसी बैइठे द्वार।

मोर गाँव मा आबे यार।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया" छँइहा

 सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


छँइहा


किम्मत कतका हवै छाँव के,तभे समझ मा आथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


गरम तवा कस धरती लगथे,सुरुज आग के गोला।

जीव जंतु अउ मनखे तनखे,जरथे सबके चोला।।

तरतर तरतर चुँहे पछीना,रहिरहि गला सुखाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


गरमे गरम हवा हा चलथे,जलथे भुइयाँ भारी।

घाम घरी बड़ जरे चटाचट, टघले महल अटारी।

पेड़ तरी के जुड़ छँइहाँ मा,अंतस घलो हिताथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


मनखे मन बर ठिहा ठउर हे,जीव जंतु बर का हे।

तरिया नदिया पेड़ पात हा,उँखर एक थेभा हे।

ठाढ़ घाम मा टघलत काया, छाँव देख हरियाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


पेड़ तरी के घर जुड़ रहिथे,पेड़ तरी सुरतालौ।

हरे पेड़ पवधा हा जिनगी,सबझन पेड़ लगालौ।

पानी पवन हवै पवधा ले,खुशी इही बरसाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा

आल्हा छन्द - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया" घाम घरी मजदूर किसान

 आल्हा छन्द - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


घाम घरी मजदूर किसान


बाँध मूड़ मा लाली पागा ,करे काम मजदूर किसान।

हाथ मले बैसाख जेठ हा,कोन रतन के ओखर जान।


जरे घाम आगी कस तबले,करे काम नइ माने हार।

भले  पछीना  तरतर चूँहय,तन ले बनके गंगा धार।


करिया काया कठवा कस हे,खपे खूब नइ कभू खियाय।

धन  धन  हे  वो महतारी ला,जेन  कमइया  पूत  बियाय।


धूका  गर्रा  डर  के  भागे , का  आगी का  पानी   घाम।

जब्बर छाती रहै जोश मा,कवच करण कस हावै चाम।


का मँझनी का बिहना रतिहा,एके सुर मा बाजय काम।

नेंव   तरी   के  पथरा  जइसे, माँगे  मान  न माँगे नाम।


धरे  कुदारी  रापा  गैतीं, चले  काम  बर  सीना तान।

गढ़े महल पुल नँदिया नरवा,खेती कर उपजाये धान।


हाथ  परे  हे  फोरा  भारी,तन  मा  उबके हावय लोर।

जाँगर कभू खियाय नही जी,मारे कोनो कतको जोर।


देव  दनुज  जेखर  ले  हारे,हारे  धरती  अउ  आकास।

कमर कँसे हे करम करे बर,महिनत हावै ओखर आस।


उड़े बँरोड़ा जरे भोंभरा,भागे तब मनखे सुखियार।

तौन  बेर  मा  छाती  ताने,करे काम बूता बनिहार।


माटी  महतारी  के खातिर,खड़े पूत मजदूर किसान।

महल अटारी दुनिया दारी,सबे चीज मा फूँकय जान।


मरे रूख राई अइलाके,मरे घाम मा कतको जान।

तभो  करे माटी के सेवा,माटी  ला  महतारी मान।


जगत चले जाँगर ले जेखर,जले सेठ अउ साहूकार।

बनके  बइरी  चले पैतरा, माने नहीं तभो वो हार।।


धरती मा जीवन जबतक हे,तबतक चलही ओखर नाँव।

अइसन  कमियाँ  बेटा मन के,परे खैरझिटिया नित पाँव।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

सुधरे सेलिब्रेटी मन- लावणी छंद

 सुधरे सेलिब्रेटी मन- लावणी छंद


गलत चीज ला जौन बढ़ाये, तज दव अइसन हस्ती ला।

अपन सुवारथ बर उन मन हा, फूँक दिही घर बस्ती ला।


कोई बेचे दारू घुटका, ता समान कोई घटिया।

ये सब कर उन पइसा जोड़े, हमर जाय बिक घर टठिया।

लाज आय नइ बड़े बने हे, दिखे डुबोवत कस्ती ला।

गलत चीज ला जौन बढ़ाये, तज दव अइसन हस्ती ला।


जुआ चिती मा घर बन उजड़े, तभो करे विज्ञापन ला।

पइसा कौड़ी के लालच मा, बेच डरिस हें तन मन ला।

भले भाड़ मा जाये जनता, नइ छोड़े उन मस्ती ला।

गलत चीज ला जौन बढ़ाये, तज दव अइसन हस्ती ला।


नंगापन अउ गलत नियत लत, लोगन के बीच परोसे।

अइसन मन ला बड़े बनाके, कोन फालतू मा पोसे।।

पथरा ला पारस ए कहिके, महँगा कर दिस सस्ती ला।

गलत चीज ला जौन बढ़ाये, तज दव अइसन हस्ती ला।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


सेलिब्रेटियों द्वारा कुछ भी विज्ञापन किया जा रहा है, जो कि सही नही है।

पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद

 पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद


कतको गाड़ी रद्द हे, कतको मा बड़ झोल।

सफर रेल के जेल ले, का कमती हे बोल।

का कमती हे बोल, रेलवे के सुविधा मा।

देख मगज भन्नाय, पड़े यात्री दुविधा मा।

सिस्टम होगे फेल, उतरगे पागा पटको।

ढोवत हावै कोल, भटकगे मनखे कतको।


ना तो कुहरा धुंध हे, ना गर्रा ना बाढ़।

तभो ट्रेन सब लेट हे, लाहो लेवय ठाढ़।

लाहो लेवय ठाढ़, रेलवे अड़बड़ भारी।

चलत ट्रेन थम जाय, मचे बड़ मारा मारी।

टीटी छिड़के नून, कहै आ टिकट दिखा तो।

यात्री हें हलकान, होय सुनवाई ना तो।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

जू के प्रानी- लावणी छंद

 जू के प्रानी- लावणी छंद


हमर नैन के सुख बर जू मा, कैद रथे कतको प्रानी।

लइका संग सियान झुमरथे, जीव जंतु के सुन बानी।।


चिरई चिरगुन चिंवचिंव चहकै, फुसकारे डोमी अजगर।

भँठेलिया भलुवा बनभैसा, इमू नेवला आय नजर।

नाचे फैला पाँख मँयूरा, करय बेंदरा मनमानी।

हमर नैन के सुख बर जू मा, कैद रथे कतको प्रानी।


हाथी घोड़ा हैना मिरगा, नील गाय चीतल सांभर।

बघवा बिज्जू बारह सिंगा, बनबिलवा गिलहरी मगर।।

मछरी मेढक बतख कोकड़ा, इतराथे पाके पानी।

हमर नैन के सुख बर जू मा, कैद रथे कतको प्रानी।


पांडा गैंडा गोह गोरिल्ला, जेब्रा जगुआर छछूंदर।

कंगारू जिराफ तेंदुवा, शाही चीता शेर सुअर।

लामा उद दरियाई घोड़ा, जू ला माने छत छानी।

हमर नैन के सुख बर जू मा, कैद रथे कतको प्रानी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद

 हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद


भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।

शहर लगे ना गाँव लगत हे, फइले हावै जाल।।


कुटका कुटका कर भुइयाँ ला, बना बना के प्लाट।

बेंचत हावै वैपारी मन, नदी ताल तक पाट।।

धान गहूँ तज समय फसल बो, नाचै दे दे ताल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


माटी हा महतारी जइसे, उपजाये धन सोन।

आफत आगे ओखर ऊपर,जतन करै अब कोन।।

धमकी चमकी अउ पइसा मा, होय किसान हलाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


बड़े बड़े बिल्डर बइठे हें, भुइयाँ मा लिख नाम।

गला घोंट खेती भुइयाँ के, करत हवै नीलाम।।

अइसन मा मुश्किल हो जाही, कल बर रोटी दाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


इंच इंच मा बनगे बासा, नइ बाँचिस दैहान।

जीव जंतु के मरना होगे, देवै कोन धियान।।

तार घेरागे भू कब्जागे, बचिस पात ना डाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Monday, May 1, 2023

बासी जब सम्मानित होही - छत्तीसगढ़ सम्मानित होही"



 "बासी जब सम्मानित होही - छत्तीसगढ़ सम्मानित होही" 


"बासी" खानपान के आइकॉन मात्र नोहय, एहर हर उपेक्षित छत्तीसगढ़िया के प्रतीक आय शायद तभे लक्ष्मण मस्तुरिया जी कहे रहिन -


"ओ गिरे थके हपटे मन अउ परे डरे मनखे मन

मोर संग चलव रे….


अलग-अलग दशक मा छत्तीसगढ़ के कवि मन घलो बासी ला सम्मानित करके छत्तीसगढ़ ला सम्मानित करे के उदिम करे रहिन। आवव, देखव…कोन दशक मा कोन-कोन कवि मन बासी ला कइसे सम्मानित करे हवँय………..


"छत्तीसगढ़ी काव्य मा -  छत्तीसगढ़ के बासी"


अमरीकन न्यूट्रीशन एसोसियेशन के कहना हे कि ‘बासी भात’ मा आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम तथा विटामिन घलो मिल जाथे। एमा विटामिन बी-12 घलो रहिथे।.बासी के वैज्ञानिक अउ अंग्रेजी नाम हे - होल नाइट वाटर सोकिंग राइस। अमरीका के शोध कहिथे कि बासी खाए ले गर्मी और लू नइ लगय। हाइपरटेंशन अउ बीपी घलो नियंत्रण मा रहिथे। नींद बर घलो ए बढ़िया होथे। अमेरिका का कहिथे, हम ला का लेना देना हे ? हमर छत्तीसगढ़ मा बासी एक परम्परा बन गेहे। कुछ शहर वाला मन टेस बताए बर भले नइ खाँय फेर बहुत झन शहर मा अउ जम्मो झन गाँव मा नेत नियम ले बासी खाथें।


छत्तीसगढ़ के कवि मन घलो अपन कविता मा बासी के महिमा ला गावत रहिथें। आवव कुछु कवि मन के कविता के झलक देखे जाय - 


सब ले पहिली लोकगीत ददरिया सुनव - 


बटकी मा बासी अउ चुटकी मा नून

मँय गावsथौं ददरिया, तँय कान दे के सुन।


जनकवि कोदूराम "दलित" के कुण्डलिया छन्द मा बासी के सुग्घर महिमा बताए गेहे - 


बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।

ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव।।

तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन

जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन।

दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी - मा

भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।  


जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी के सुप्रसिद्ध गीत चल चल गा किसान बोए चली धान असाढ़ आगे गा, मा बासी के वर्णन हे -

धंवरा रे बइला कोठा ले होंक दै।

खा ले न बासी बेरा हो तो गै।।


भिलाई के कवि रविशंकर शुक्ल के सुप्रसिद्ध लीम अउ आमा के छाँव, नरवा के तीर मोर गाँव के एक पद बासी ला समर्पित हे - 


खाथंव मँय बासी अउ नून, 

गाथंव मँय माटी के गुन। 

मँय तो छत्तीसगढ़िया आँव।।


खुर्सीपार भिलाई के कवि विमल कुमार पाठक के कविता मा बोरे बासी के सुग्घर प्रयोग देखव - 


छानी चूहय टप टप टप टप

परछी मं सरि कुरिया मा।

बोरे बासी रखे कुंडेरा मा, 

बटुवा मं, हड़िया मा।।


गंडई के लोकप्रिय कवि पीसी लाल यादव के गीत मा गँवई के ठेठ दृश्य देखव - 


चँवरा में बइठे बबा, तापत हवै रऊनिया।

चटनी बासी झड़क़त हे, खेत जाय बर नोनी पुनिया।।


शिक्षक नगर, दुर्ग के कवि रघुवीर अग्रवाल "पथिक" के कविता मा बासी के प्रयोग देखव - 


जनम धरे हन ये धरती मा, इहें हवा पाए हन।

गुरमटिया चाँउर के बासी, अउ अँगाकर खाए हन।।


छन्द के छ परिवार के कवि मन घलो अपन रचना मा बासी के वर्णन करिन हें - 


कचलोन सिमगा के छन्द साधक मनीराम साहू "मितान" के रचना मा पहुनाई ला देखव -


हाँस के  करथे पहुनाई ,

एक लोटा पानी  मा।

बटकी भर बासी खवाथे,

नानुक अथान के  चानी।

कभू तसमई कभू महेरी,

भाटा खोइला मही मा कढ़ी जी ।


चंदैनी बेमेतरा के छन्द साधक ज्ञानुदास मानिकपुरी के घनाक्षरी के अंश मा बासी के महिमा देखव - 


नाँगर बइला साथ, चूहय पसीना माथ

सुआ ददरिया गात, उठत बिहान हे।

खाके चटनी बासी ला,मिटाके औ थकासी ला

भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।


सारंगढ़ के छ्न्द साधक दुर्गाशंकर इजारदार कहिथें कि चैत के महीना मा सबो झन बासी खाथें - (रोला के अंश)


अड़बड़ लगथे घाम, चैत जब महिना आथे

रोटी ला जी छोड़, सबो झन बासी खाथें।


बलौदाबाजार के छन्द साधक दिलीप कुमार वर्मा के कुण्डलिया छन्द के अंश मा बासी के प्रयोग -


खा के चटनी बासी रोटी अब्बड़ खेलन।

गजब सुहाथे रोटी बेले चौकी बेलन।।


डोंड़की,बिल्हा के छन्द साधक असकरन दास जोगी के उल्लाला छन्द मा बासी के स्वाद लेवव - 


बोरे बासी खास हे, खाना पीना नीक जी।

गर्मी लेथे थाम गा, होथे बोरे ठीक जी।।


हठबंद के छन्द साधक चोवाराम "बादल" के रोला छन्द मा बासी के महिमा - 


बासी खाय सुजान, ज्ञान ओखर बढ़ जावय

बासी खाय किसान, पोठ खंती खन आवय।

बासी पसिया पेज, हमर सुग्घर परिपाटी

बासी ला झन हाँस,दवा जी एहा खाटी।।


बाल्को मा सेवा देवत ग्राम खैरझिटी के छन्द साधक जितेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" बासी गीतिका छन्द मा देखव - 


चान चानी गोंदली के, नून संग अथान।

जुड़ हवै बासी झड़क ले, भाग जाय थकान।।

बड़ मिठाथे मन हिताथे, खाय तौन बताय।

झाँझ झोला नइ धरे गा, जर बुखार भगाय।।


खैरझिटिया जी के आल्हा छन्द के एक अंश - 


तन ला मोर करे लोहाटी, पसिया चटनी बासी नून।

बइरी मन ला देख देख के, बड़ उफान मारे गा खून।।


धमधा मा कार्यरत ग्राम गिधवा के युवा छन्द साधक हेमलाल साहू के गीतिका छन्द के अंश देखव - 


लान बासी संग चटनी, सुन मया के गोठ गा।

खा बिहिनिया रोज बासी, होय तन हा पोठ गा।।


एन टी पी सी कोरबा के छन्द साधिका आशा देशमुख के चौपाई के एक अर्द्धाली मा बासी अउ अथान के संबंध के सुग्घर बखान - 


आमा लिमउ अथान बना ले।

बासी भात सबो मा खा ले।।


बिलासपुर के छन्द साधिका वसंती वर्मा के चौपाई छन्द के एक अर्द्धाली मा बासी के प्रयोग -  


लाली भाजी गजब मिठाथे।

बासी संग बबा हर खाथे।।


नवागढ़ के छन्द साधक रमेश कुमार सिंह चौहान के एक गीत के हिस्सा मा बासी के प्रयोग देखव - 

 

जुन्ना नाँगर बुढ़वा बइला, पटपर भुइँया जोतय कोन।

बटकी के बासी पानी के घइला, संगी के ददरिया होगे मोन।।


दुरुग के छन्द साधक अरुण कुमार निगम के छन्द मा बासी के महिमा देखव - 


मँय  बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव।

मँय  गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव।। 

(दोहा)


बरी बिजौरी के महिमा ला।पूछौ जी छत्तिसगढ़िया ला।।

जउन गोंदली-बासी खावैं। सरी जगत बढ़िया कहिलावैं।।

(चौपाई) 


छत्तिसगढ़िया सबले बढ़िया , कहिथैं जी दुनियाँ वाले।

झारा-झार नेवता भइया , आ चटनी-बासी खा ले।।

(ताटंक)


माखनचोर रिसाय हवे कहिथे नहिं जावँ करे ल बियासी

माखन, नाम करे बदनाम अरे अब देख लगे खिसियासी 

दाइ जसोमति हाँस कहे बिलवा बिटवा तँय छोड़ उदासी  

श्री बलराम कहे भइया  चटनी सँग खाय करौ अब बासी

(सवैया)


छत्तीसगढ़ी भाषा के हर कवि के एक न एक रचना मा बासी के वर्णन जरूर मिलही। आज मोर करा उपलब्ध रचना मन के उन डाँड़ के संकलन करे हँव जेमा "बासी" शब्द के प्रयोग होए हे।


आलेख - अरुण कुमार निगम

             आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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"बोर बासी-भात" विषय पर छंदबद्ध रचनाएँ -


कुण्डलिया छन्द -


खावव संगी रोजदिन, बोरे बासी आप |

सेहत देवय देंह ला, मेटय तन के ताप ||

मेटय तन के ताप, संग मा साग जरी के |

भाथे अड़बड़ स्वाद, गोंदली चना तरी के ||

खीरा चटनी संग, मजा ला खूब उडा़वव |

पीजा दोसा छोड़, आज ले बासी खावव ||


सुनिल शर्मा "नील"

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बरवै छन्द - 


पॉलिश वाला चाँउर, बड़ इतराय।

ढेंकी-युग कस बासी, नही मिठाय।।


हवै गोंदली महँगी, कोन बिसाय।

नान-नान टुकड़ा कर, मनखे खाय।।


साग चना हर अपने, महिमा गाय।

देख जरी वोला मुच-मुच मुस्काय।।


आमा-चटनी मुँह मा, पानी लाय। 

खीरा धनिया अड़बड़, स्वाद बढ़ाय।।


शहर-डहर के मनखे, मन अनजान।

नइ जानँय बासी के, गुन नादान।।


फूलकाँस के बटकी, माल्ही हाय!

ये युग मा इन बरतन, गइन नँदाय।।


अरुण कुमार निगम, दुर्ग

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कुण्डलिया छन्द


बासी ला खा के चलै,जिनगी भर मजदूर।

थरहा रोपाई करै,ठेका ले भरपूर।।

ठेका ले भरपूर,कमावय जाँगर टोरत।

डाहर देखय द्वार,सुवारी रोज अगोरत।।

घर आवत ले साँझ,देख लागै रोवासी।

जोड़ी भरथे पेट,नून चटनी खा बासी।।


राजकिशोर धिरही, तिलई, जांजगीर-चाँपा

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दोहा छंद


बोरे बासी गोंदली,अउ खेड़ा के साग।

कतको झन के भाग ले,काबर जाथे भाग।।


मनखे मन समझैं नहीं,मनखे के जज्बात।

एकर से जादा नहीं,जग मा दुख के बात।।


कभू कभू देदे करव,लाँघन मन ला भात।

अइसन पुन के काज ला,जानौ मनखे जात।।


जीतेन्द्र निषाद 'चितेश', सांगली, बालोद

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छप्पय छंद


बासी पसिया पेज, पेट बर पाचुक खाना।

फोकट अब झन फेंक, हरे महिनत के दाना।


खाव विटामिन जान, स्वस्थ रइही जी काया।

चना जरी के साग, रोग के करे सफ़ाया।


जागौ चतुर सुजान मन, जिनगी बर उपहार ये।

कतका गुन हे जान लौ,बात इही हर सार ये।।


संगीता वर्मा, भिलाई, छत्तीसगढ़

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चौपाई छंद  


जिहाँ मारबल टाट हे, ओ का बासी खाय। 

जब खावत हे गोंदली, तहाँ भरोसा आय।1।(दोहा)


जेमन छितका कुरिया रहिथें। 

दुख पीरा ला निशदिन सहिथें।।

दार भात ला जे नइ पावयँ।  

बासी खा दिन रैन बितावयँ।।


कभू गोंदली नइ ले पावयँ।

नून मिरच मा काम चलावयँ।।

ओ का खीरा ककड़ी खाहीं। 

बस आमा के चटनी पाहीं।।


पर ये बासी अलगे लागे।

लगे सौंकिया के मन जागे।।

बासी मा तो मही डराये। 

अउर गोंदली दिये सजाये।।


दुसर प्लेट खीरा ले साजे। 

अउर चना कड़दंग ले बाजे।।

जरी बने हे चट अमटाहा। 

तीर सपासप काहय आहा।।


बासी के सँग जरी खिंचावय। 

अउर गोंदली कर्रस भावय।।

मजा उड़ावय खाने वाला। 

बासी के हे स्वाद निराला।। 


बासी बावयँ छत्तीसगढ़िया।  

कहिथें जिन ला सबले बढ़िया।।

फिर काबर बेकार कहावँव। 

बासी मँय तो मन भर खावँव।।


हबरस हइया कभू न खावव। 

नहिते आफत जान फँसावव।।

बासी नरी बीच जा अटके। 

बिन पानी बासी नइ गटके।।


समे रहे तब माँग के, स्वाद गजब के पाव। 

बइठ पालथी मार के, मन भर बासी खाव।2। (दोहा)


दिलीप कुमार वर्मा, बलौदाबाजार

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त्रिभंगी छंद


नइ लगे उदासी,खा ले बासी ,साग हवै जी ,चना जरी।

चटनी मन भावय,खीरा हावय,मीठ गोंदली,थाल तरी ।।

सब रोग भगावय,प्यास बुझावय,बासी पाचन,खूब करे।

खा ले जी हॅसके,निसदिन डटके,भर के बटकी, ध्यान धरे।।


लिलेश्वर देवांगन, बेमेतरा

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सरसी छन्द - 


छत्तीसगढ़ के बासी पसिया, संग खेड़हा साग।

बइठे आये देख पड़ोसी, खाँवे येला मांग।।


चना साग अउ आमा चटनी, बासी खाँय बुलाय।

खेड़हा झोरहा खीरा मा, बासी गजब मिठाय।।


छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया, बासी हे पहिचान।

बोरे बासी चटनी खा के,जावे खेत किसान।।


वसन्ती वर्मा, बिलासपुर

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कुण्डलिया छंद -

(1)

खालौ अम्मट मा जरी, संग चना के साग।

बोरे बासी गोंदली, मिले हवै बड़ भाग।

मिले हवै बड़ भाग, पेट ला ठंडा करही।

खीरा फाँकी चाब, मूँड़ के ताव उतरही।

हमर इही जुड़वास, झाँझ बर दवा बनालौ।

बड़े बिहनिया रोज, नहाँ धोके सब खालौ।।1।।

(2)

चिक्कट चिक्कट खेंड़हा, चुहक मही के झोर।

बासी ला भरपेट खा,जीव जुड़ाथे मोर।

जीव जुड़ाथे मोर, जरी सस्ता मिल जाथे।

मनपसंद हे स्वाद, गुदा हा अबड़ मिठाथे।

सेहत बर वरदान, विटामिन मिलथे बिक्कट।

बखरी के उपजाय, खेंड़हा चिक्कट चिक्कट।।2।।


चोवाराम 'बादल', हथबंद, छत्तीसगढ़

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कुण्डलिया छन्द - 


बोरे बासी गोंदली,देखत मन ललचाय।

आमा चटनी संग मा,देख लार चुचवाय।।

देख लार चुचवाय, खेड़हा तरी मिठावय

चना साग हे संग,खाय तालू चटकावय।।

कँकड़ी खीरा खाय,घाम कब्भू नइ झोरे।

धनिया ले ममहाय,हाय रे बासी बोरे।।


दुर्गाशंकर ईजारदार, सारंगढ़ (मौहापाली)

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आल्हा छंद


बोरे बासी खालव भैया,झन फेंकव तुम बाॅंचे भात।

अन्न हमर हे जीवन दाता,प्राण बचाथे ओ दिन रात।।


सुग्घर मिरचा चटनी देखव,साग खेड़हा भाजी आय।

स्वाद ग़ज़ब के रइथे ओकर,लार घलो चुचवावत जाय।।


काट गोंदली गरमी जाही,खाबो जी हम मन भर आज।

देशी खाना खालव कइथॅंव,एमा का के हावय लाज।।


ओम प्रकाश पात्रे "ओम", बेमेतरा

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कुंडलिया छंद -


बासी चटनी संग मा, खावँय घर परिवार|

अब तो नइहे गाँव मा, चिटको मया दुलार||

चिटिको मया दुलार, कहाँ अब बँटथे पीरा|

चुचरन चुहकन पोठ, जरी अउ खावन खीरा ||

साग चना के जोर, भेज दँय बतर बियासी

चिटिक मही ला डार, ससन भर झड़कन बासी||


अनुज छत्तीसगढ़िया, पाली जिला कोरबा

 

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सार छंंद -


साग अमटहा खेड़ा के अउ, चना संग मा हावय।

बासी के संग गोंदली ला,  मजा खाय मा आवय।। 


करय गोंदली रक्षा लू ले, बासी प्यास बुझाथे।

भरे बिटामिन खेड़ा मा अउ, शक्ति चना ले आथे।।


अनुज छत्तीसगढ़िया, पाली जिला कोरबा

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सार छंद आधारित गीत - 


बासी मा हे सबो बिटामिन, चवनप्रास नइ लागे।

खा ले भइया कॅवरा आगर, मन उदास नइ लागे।।

(1)

रतिहा कुन के बोरे बासी, गुरतुर पसिया पीबे।

मही मिलाके झड़कत रहिबे, सौ बच्छर ले जीबे।।

नाॅगर बक्खर सूर भराही, करबे तिहीं सवाॅगे……

(2)

बटकी के बारा उप्पर मा, थोरिक नून मड़ाले ।

थरकुलिया के आमा चटनी, गोही चुचर चबाले ।

ठाढ मॅझनिया पी ले पसिया, प्यास ह दुरिहा भागे…

(3)

कातिक अग्घन सिलपट चटनी, धनिया सोंध उड़ाथे ।

पूस माॅघ मा तिंवरा भाजी, बासी संग मिठाथे ।

बासी महिमा ला सपनाबे, रतिहा सूते जागे…..


राजकुमार चौधरी, टेड़ेसरा

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घनाक्षरी छन्द - 

(1)

माड़े  हवै  बटकी मा मही डारे बोरे बासी,

तँउरत ए प्याज देख मन छुछुआत हे।

गाँवे म रहइ अउ बोरे बासी के खवइ के बने,

रहि रहि के तो आज सुरता देवात हे।।

एकर असन कहाँ पाहीं कोनो टॉनिक जी,

शहरी मानुष एला खाए बर भुलात हे।।

फास्ट फुड पिज्जा बर्गर के दीवानगी गा,

नवा पीढ़ी के तो कथौं हेल्थ ला गिरात हे।।

(2)

झोर वाले चना संग माड़े आमा चटनी अउ

परुसाए थरकुलिया मा बने जरी साग।

तिरियाये खीरा चानी कहत शहरिया ल,

अइसन टॉनिक छोड़ फोकटे जाथौ जी भाग।।

बटकी म बासी चुटकी म नून गीत के तो,

अमर ददरिया के सुनव सुनाव राग।

सेहत गिराऔ झन खाके मेगी फास्ट फुड,

अभी भी समे हे संगी चलौ सब जावौ जाग।।


सूर्यकान्त गुप्ता, सिंधिया नगर दुर्ग 

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कुण्डलिया छन्द -

(1)

बासी खाये ले कथे,ठंड़ा रहे शरीर।

बी पी हा बाढ़े नहीं,हरथे तन के पीर।

हरथे तन के पीर,पियो पहिया ला हनके।

दिन भर करलो काम,चलो तुमन हा तनके। 

पिज्जा बर्गर छोड़,खाय ले  लगे थकासी।

मानो सब झिन बात,पेट भर खाने बासी।।

(2)

मँगलू बासी खाइ के, करथे दिन भर काम।

गरमी जबले आय हे, नइतो लागे घाम।

नइतो लागे घाम, गोंदली संग म खाथे।

जरी चना के दार,खाव जी गजब मिठाथे।

खीरा ठंडा होय,नहीं लागय ऊँघासी 

कतको करले काम,गोंदली झड़को बासी।।


केवरा यदु"मीरा", राजिम

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कुण्डलिया छन्द - 

(1)

बासी आय गरीब के, आज सोचथें लोग।

पर ये आवैं काम बड़, जाय खाय मा रोग।

जाय खाय मा रोग, ताकती होथे तन बर।

जरी गोंदली नून, संग सब खाय ससन भर।

राजा हो या रंक, सबे के हरय उदासी।

बचे रात के भात, कहाये बोरे बासी।।

(2)

बासी के गुण हे जबर, हरथे तन के ताप।

भाजी चटनी नून मा, खा मँझनी चुपचाप।

खा मँझनी चुपचाप, खेड़हा राँध मही मा।

होय नही अनुमान, खाय बिन स्वाद सही मा।

बासी खा बन बीर, रेंग दे मथुरा कासी।

छत्तीसगढ़ के शान, कहाये चटनी बासी।।

(3)

थारी मा ले काँस के, नून चिटिक दे घोर।

चटनी पीस पताल के,भाजी भाँटा झोर।

भाजी भाँटा झोर, खेड़हा बरी बिजौरी।

आम अथान पियाज, खाय हँस बासी गौरी।

खा पी के तैयार, सिधोवै घर बन बारी।

अउ बड़ स्वाद बढ़ाय, काँस के लोटा थारी।।

(4)

लगही पार्टी मा घलो, बासी के इंस्टॉल।

खाही छोटे अउ बड़े, सबे उठाके भाल।

सबे उठाके भाल, झड़कही चटनी बासी।

आही अइसन बेर, देख लेहू जग वासी।

पिज़्ज़ा बर्गर चाँट, मसाला तन ला ठगही।

पार्टी परब बिहाव, सबे मा बासी लगही।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया", बाल्को,कोरबा

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छन्नपकैया छंद -


छन्न पकैया छन्न पकैया,खालव बोरे बासी।

जाँगर पेरव बने कमावव,होवय नहीं  उदासी।   


छन्न पकैया छन्न पकैया,बासी  के  गुन  भारी।

जरी खेड़हा घुघरी खीरा,खावव सब सँगवारी।।


छन्न पकैया  छन्न  पकैया, छत्तीसगढ़ी  जेवन।

सुत-उठ के जी बड़े बिहनिया,बोरे बासी लेवन।।


छन्न पकैया छन्न पकैया, खावव  बहिनी भाई।

एमा सबके मन भर जाही,नइ होवय करलाई।।


छन्न पकैया छन्न पकैया,बासी के गुन भारी।

रात बोर के बिहना खावव,संग गोंदली चारी।।


छन्न पकैया छन्न पकैया,सदा  निरोगी  रहना।

खावव बासी फेर देख लव,मोर बबा के कहना।।


छन्न पकैया छन्न पकैया,करौ किसानी जा के।

छत्तीसगढ़ी बोरे बासी,जम्मों देखव खा के।।


बोधनराम निषादराज "विनायक", सहसपुरलोहारा

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कुण्डलिया छंद -

(1)

बोरे-बासी खाय ले, भगथे तन ले रोग।

सुबह मझनिया शाम के, कर लौ संगी भोग।।

कर लौ संगी भोग, छोड़ के कोका कोला।

हरथे तन के ताप, लगे ना गर्मी झोला।।

नींबू आम अथान, मजा के स्वाद चिभोरे।

दही मही के संग, सुहाथे बासी-बोरे।।

(2)

बोरे-बासी खाय ले, पहुँचे रोग न तीर।।

ठंडा रखे दिमाग ला, राखे स्वस्थ शरीर।

राखे स्वस्थ शरीर, चेहरा खिल-खिल जाथे।

धरौ सियानी गोठ, कहे ये उमर बढ़ाथे।।

गाँव शहर पर आज, स्वाद बर दाँत निपोरे।

पिज़्ज़ा बर्गर भाय, भुलागे बासी-बोरे।।

(3)

गुणकारी ये हे बहुत, भरथे तन के घाँव।

बोरे-बासी खाव जी, मेंछा देवत ताव।

मेंछा देवत ताव, मजा मन भर के पा लौ।

जोतत नाँगर खेत, ददरिया करमा गा लौ।।

मिर्चा नून पताल, संग मा पटथे तारी।

बोरे-बासी खाव, हवय ये बड़ गुणकारी।।

(4)

बोरे-बासी संग मा, जरी चना के साग।

जीभ लमा के खा बने, सँवर जही जी भाग।

सँवर जही जी भाग, संग मा रूप निखरही।

वैज्ञानिक हे शोध, फायदा तन ला करही।।

गजानंद के बात, ध्यान दे सुन लौ थोरे।

छत्तीसगढ़ के मान, बढ़ावय बासी-बोरे।।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध", बिलासपुर

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सार छन्द -


नून गोंदली अउ बासी के, टूटिस कहूँ मितानी।

तरुवा तीपत देर न लगही, सुन लेवय रजधानी।


मँहगाई के मार जना गे, पेट पीठ करलागे।

भारी अनचित हमर गोंदली, हमरे ले दुरिहागे।


सरू सकाऊ सरसुधिया मन, ठाढ़े ठाढ़ ठगा गें।

बैंक लूट चरबाँक चतुर मन, रातों-रात भगा गें।


हमरे जाँगर नाँगर बैला, हमरे ले बयमानी।

तरुवा तीपत देर न लगही, सुन लेवय रजधानी।


झोला-झक्कर घाम-तफर्रा, धूँका-गर्रा आथे।

नून गोंदली बोरे बासी, पेट मुड़ी जुड़वाथे।


एनू-मेनू हम का जानी, खाथे तउन बताथे।

जरी खेड़हा मही म राँधे, गउकी गजब सुहाथे।


हँसी उड़ाही कोनो कखरो, कहिके आनी-बानी।

तरुवा तीपत देर न लगही, सुन लेवय रजधानी।


सुखदेव सिंह "अहिलेश्वर ", गोरखपुर, कबीरधाम

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(21) दोहा छन्द - 


भइया नांगर जोत के, बइठे जउने छाँव।

भउजी बासी ला धरे, पहुँचे तउने ठाँव।।


भइया भउजी ला कहय, लउहा गठरी छोर।

लाल गोंदली हेर के, लेय हथेरी फोर।।


बासी नून अथान ला, देय गहिरही ढार।

उँखरु बइठ के खात हे, मार मार चटकार।।


भइया भउजी के मया, पुरवाही फइलाय।

चटनी बासी नून कस, सबके मन ला भाय।।


सुखदेव सिंह "अहिलेश्वर ", गोरखपुर, कबीरधाम

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छप्पय छन्द - 


एक बीज दू नाम, जगत बर बहुत जरूरी।

दू बित्ता के पेट, करावत हे मजदूरी।।

बइठे चूल्हा संग, साग चाउंर अउ पानी।

समय चले दिन रात, बीच झूलय जिनगानी।

जरी चना अउ गोंदली, बइठे बासी संग मा।

गरमी हर मुरझात हे, तन मन रहय उमंग मा।।


आशा देशमुख, एन टी पी सी कोरबा

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संकलन - अरुण कुमार निगम


मजदूर दिवस अउ बासी दिवस विशेष छंदबद्ध कविता

 



मजदूर दिवस अउ बासी दिवस विशेष छंदबद्ध कविता


: रूपमाला छंद
        *मँय मजदूर*

हाँव मँय  मजदूर संगी,काम  करथौं  जोर।
पेट पालत दिन पहावँव,देश हित अउ मोर।
कर गुजारा रात दिन मँय,मेहनत कर आँव।।
रातकुन के पेज पसिया,खाय माथ नवाँव।।

दिन बितावौं मँय कमावँव,फोर पथरा खाँव।
मेहनत के  आड़ संगी, देश  ला  सिरजाँव।।
चाँद में पहुँचे ग भइया,देख सब जर जाय।
कोन हिम्मत अब ग करही,आँख कोन उठाय।।

अब पछीना हा  चुहत हे,टोर  जाँगर  देख।
भाग हा बनही सुनौ जी,ये बिधाता लेख।।
मेहनत मा आज देखौ, स्वर्ग  बनगे  खार।
ईंट  से  जी  ईंट  बजगे, देख लव संसार।।

रचनाकार:-
बोधन राम निषादराज"विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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कुंडलियाँ

शूट-बूट मजदूर (ब्यंग्य) 
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
1-
चारो कोती देख ले, बासी के हे धूम |
नेता पीछू मीडिया, धरे कैमरा घूम ||
धरे कैमरा घूम, घूम के खींचे फोटू |
बोरे बासी संग, दिखत हे मंत्री मोटू ||
कौंरा भर नइ खाय, नजर हे ऐती वोती |
शूट-बूट मजदूर, दिखत हे चारो कोती ||

2-
बासी के महिमा अभी, काला आज बताँव |
देखाये बर एकदिन, बासी कइसे खाँव ||
बासी कइसे खाँव, खिंचाये बर मै फोटू |
देखा देखी आज, खाय सब बड़कू छोटू ||
नेता मंत्री ढोंग, देख ले खरचे रासी  |
बटकी सीथा पेज, बइठ के खावय बासी ||

कमलेश प्रसाद शरमाबाबू 
कटंगी-गंडई जिला-केसीजी 
छग. 9977533375
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 बोरे बासी----- कुंडलिया छंद

बोरे बासी संग मा,  अउ भाजी हे साग ।
खा ले संगी तँय बने, अपन जगाले भाग ।।
अपन जगाले भाग,  रोज बासी ला खा के ।
तन के भागे रोग,  विटामिन एकर पा के ।।
पी के जवाव पेज,  अपन जाँगर ला टोरे ।
ताकत मिलथे खूब, खाव जी बासी बोरे ।।

मुकेश उइके "मयारू"
ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)
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: *बनिहार*
*दोहा छंद*
हाँवव मैं बनिहार गा, करथँव बूता काम।
कतको बूता मैं करँव, उचित मिलय नइ दाम।। 

खाके बासी घाम मा, करथँव दिन भर काम।
रथँव मगन मँय काम मा, करँव नहीं आराम।। 

संगी जाँगर ले मोर गा , बनगे बड़े मकान।
छितका कुरिया मा रथँव, दे हँव सब ला शान।। 

मँय पानी ओगारथँव, बनके गा बनिहार।
बूता करथँव रात दिन, तभो हवँव लाचार।।

मोला नइ हे लाज गा, मँय हँव गा बनिहार।
बूता करथँव घाम मा, सब्बो दुख ला टार।।
*अनुज छत्तीसगढ़िया*
*पाली कोरबा*
*सत्र 14*
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: सार छंद गीत ______
              "" "बासी"" ".         
बासी मा हे सबे बिटामिन, चवनप्रास नइ लागे।
खाले भइया कँवरा आगर, मन उदास नइ लागे।

रतिहा कुन के बोरे बासी, गुरतुर पसिया पीबे।
मही मिलाके झड़कत रहिबे, सौ बच्छर ले जीबे।
नाँगर बक्खर सूर भराही, करबे तिंहीं सवाँगे--------------।

बटकी के बारा उप्पर मा, थोरिक नून मड़ाले।
थरकुलिया के आमा चटनी, गोही चुचर चबाले।
ठाढ मँझनिया पीले पसिया, प्यासो दुरिहा भागे----------------।

कातिक अग्घन सिलपट चटनी, धनिया सोंध उड़ाथे।
पूस माँघ मा तिंवरा भाजी, बासी संग मिठाथे।
बासी महिमा ला सपनाबे, रतिहा सूते जागे--------------------।

राजकुमार चौधरी "रौना"
टेड़ेसरा राजनांदगांव।
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: दोहा

बोरे बासी के मजा,मिरचा चटनी संग।
खाव गोंदली डार के,स्वस्थ रही तब अंग।।

बनी भुती ला रात दिन,करत हवै मजदूर।
घाम प्यास मा हे डटे,जिनगी *हे* मजबूर।।

खड़े हवै बनिहार के,बल मा ये संसार।
पावय नइ जी मान ला,जीथे बिन आधार।।

काम बुता के फेर मा,भटकत रहिथे रोज।
जिनगी के ये खेल हा,कहाँ हवै जी सोज।।

राजेन्द्र कुमार निर्मलकर
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सार छन्द गीत
मजदूर
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।
चटनी बासी पसिया पीके,पेट अपन मँय भरथौं।।

करम करइया मोर सहीं गा,कोनों नइ हें दूजा।
मोर भुजा मा बल हे देखौ,मोर करम हे पूजा।।
महिनत मा ही जीथौं संगी,महिनत मा तो मरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।

राँपा गैंती कुदरी झउहा,कहाँ मोर गा माढ़ै।
आठो पहरी मोर करम ले,दुनिया आगू बाढ़ै।।
ए जाँगर के पाछू मँय हा,दुख पीरा ला हरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।

जाड़ झाँझ अउ पानी बरसा,मोर करम ले डरथे।
लोहा तामा हीरा मोती,मोर करम ले झरथे।
सोना जइसे तपथौं संगी,आगी जइसे बरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
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: गंगोदक सवैया

लाभकारी हवै नून बासी मही डार के खा बिमारी भगाथे सदा।
स्वस्थ काया रखे दूर सुस्ती भगाथे घलो ताप फुर्ती जगाथे सदा।
गोंदली संग दाई ददा औ बबा रोज खा खेतबारी कमाथे सदा।
जाड़ गर्मी लगे हो वर्षा भरे पेट मोला खवाथे सुहाथे सदा।

ज्ञानु
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: गीतिका छंद

पेर जाँगर जौन खाथे, आज भी मजबूर हे।
भूख प्यासे रोज सहिथे, देखले मजदूर हे।
कोस दुरिहाँ हे इंखर ले, आज शासन योजना।
पेट खातिर अउ मरत हे, इन बिचारा रोज ना।

ज्ञानु
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: रोला छंद
मजदूर

महल अटारी देख, मोर मन होथे भारी। 
मँय हँव गा मजदूर, रोज होथे लाचारी। 
रोजी रोज कमाँव, भूल के दुनियादारी। 
दिन भर कनिहा टोर, खाँध मा जिम्मेदारी।। 

जाड़ा गरमी घाम, कभू नइ मोला लागय। 
चेम्मर मोरो चाम, देख बीमारी भागय। 
मँय हँव गा मजदूर, भाग पर के सिरजाथँव। 
सबके बोझा रोज, इहाँ गा मही उठाथँव।। 

मोर करम के मार, कोन दिन जाने टरही। 
भपकत हावय देह, अइसने मरना परही। 
फुटहा मोरो भाग, आँव चुहके  मँय गोही। 
श्रम के सिरजन हार, मही हर हावँव जोही।। 
विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव (धरसीवाँ)
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विजेन्द्र: मनहरण घनाक्षरी

आरती श्रम के गाथौं, जग ला मैं सिरजाथौं, 
महल अटारी इहाँ, मही तो बनाँव जी। 
कतको पहाड़ बड़े, अड़जंग हवै खड़े, 
मार हथौड़ा मा टोर, राह सिरजाँव जी।। 
मिल जथे दाना-पानी, जीये बर जिनगानी, 
भाग गढ़ँव सबके, नइ सहराँव जी। 
अपन करम बोझ, लाद के चलँव सोझ, 
सबके सुख आधार, मजदूर आँव जी।। 
विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव (धरसीवाँ)
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*बनिहार - हरिगीतिका छंद*

बनिहार मन के दुःख ला,अब कोन देखत हे बता।
कइसन जमाना आय हे,सब टूट गे रिश्ता नता।।
जाथे कमाये बर सबो,घर छोड़ के परदेश मा।
मनखे अपन ये भोगथे,जिनगी गरीबी भेष मा।।

दुनिया रचइया देखले,अब झोपड़ी के हाल ला।
रहिथे सड़क के तीर मा,छाये रथे तिरपाल ला।।
भूखे पियासे रात दिन,करथे गजब ये काम ला।
टावर बनाथे अउ महल,डर्राय नइ जी घाम ला।।

बेटा  महूँ  बनिहार के, ईंटा  उठाथँव  हाथ मा।
गारा मताके बोहथँव, दाई - ददा के साथ मा।।
सब पेट के खातिर इहाँ,छोटे कमावै अउ बड़े।
नइ लाज लागै थोरको,धनवान देखयँ जी खड़े।।

रचनाकार:-
बोधन राम निषादराज"विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)
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: बोरे बासी ( दोहा छंद )

बोरे बासी खाव जी, दूर भगावव रोग।
येखर आगू मा हवे, फीका छप्पन भोग।।1।।

बोरे बासी संग मा, खावव भाजी चेंच।
हवे मिठाथे जान ले, येहर जी अबड़ेच।।2।।

बासी खाये मा मिले, पानी जी भरपूर।
पसिया हा पानी कमी, करथे घलो ग दूर।।3।।

बासी चटनी गोंदली, खा के देखव आप।
सारी दुनिया हा घलो, कथे दवा के बाप।।4।।

लगे नहीं जी लू घलो, करथे गरमी शांत।
गैस बने ना पेट मा, करे सफाई आंत।।5।।

दिन ज्यादा जीना हवे, कहूँ आप ला आज।
खाना कर दे तैं शुरू, बोरे बासी प्याज।।6।।

सुधर जथे जी हाजमा, पक्का तेहा मान।
करय नहीं ये थोरको, कोनो ला नुकसान।।7।।

कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी
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*कुण्डलिया - बोरे बासी*

बोरे  बासी  नून मा, बटकी  भर-भर  खाव।
चटनी पीस पताल के,छप्पन भोग ल पाव।।
छप्पन भोग ल पाव,सबो के मन भर जाही।
अइसन सुख ला छोड़,कहाँ ले दुनिया पाही।
इही हमर बर  खीर, इही मा खुश बनवासी।
अब तो  लेवव स्वाद, नून मा  बोरे  बासी।।

बोधन राम निषादराज
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: *त्रिभंगी छंद-- बोरे बासी*,,,,,,

नइ लगे उदासी,खा ले बासी ,साग हवै जी ,चना जरी।
चटनी मन भावय,खीरा हावय,मीठ गोंदली,संग बरी ।।
सब रोग भगावय,प्यास बुझावय,बासी पाचन,खूब करे।
खा ले जी हॅसके,निसदिन डटके,भर के बटकी ,ध्यान धरे।।

लिलेश्वर देवांगन
  गुधेली
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: *सरसी छंद*
विषय- बनिहार.

जाँगर टोर कमाथँव मैं हर, माटी के बनिहार |
मोर मेहनत धरम करम हे, जिनगी के आधार ||

किसम किसम के चीज बनइया,मैं जग सिरजनहार |
मोर हाथ ले गइस बसाये, ये जम्मो संसार ||

ईंटा ईंटा जोर अटारी, देथँव मैं हर तान |
जेमा छोटे बड़े बिराजै, मनखे अउ भगवान ||

दगदग करत कारखाना मा, लोहा ला टघलाँव |
छोटे बड़े मशीन बना के, आगु देश बढ़ाँव ||

पढ़ लिख इंजीनियर रूप धर, गढ़थँव मैं हर देश |
वैज्ञानिक डाक्टर हितवा के, धरँव कई ठन वेश ||

सरहद सैनिक बन के गरजँव,अपन खून बोहाँव |
सेवा करथँव माटी के मैं, दूलरु बेटा ताँव ||

जब जब लेवँव जनम इहाँ मैं, धरँव रूप बनिहार |
सेवा महतारी के निशदिन, करँव लहू ओगार ||
         
अशोक कुमार जायसवाल
भाटापारा
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 छंदकार:- श्री मोहन लाल वर्मा 

विषय :-  मजदूर 
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(1) रोला छंद:- 
कतको बड़े पहाड़, टोरके सड़क बनाथँव ।
महल-अटारी रोज, घलो मँय हा सिरजाथँव ।
जिनगी के आनंद, मेहनत करके पाथँव ।
कहलाथँव मजदूर, आरती श्रम के गाथँव ।।

(2) कुण्डलियाँ छंद:- 
जीवन भर अविराम मँय, करथँव 
श्रम भरपूर ।
सेवा हित संसार मा, कहलाथँव मजदूर ।
कहलाथँव मजदूर, पछीना खून बहाथँव ।
करथँव नव निर्माण, भले भूखा रहि जाथँव ।
मिलय उचित नइ दाम, कभू मोला हे ईश्वर ।
"मोहन" कर संतोष, सुखी हँव मँय जीवन भर।।

(3) हरिगीतिका छंद:- 
मजदूर सत ईमान ले, करथें सबो के काम ला।
कोनो कहाँ देथें उँकर, श्रम के उचित गा दाम ला।
अधिकार बर लड़थें तभो, आवय नहीं कुछु हाथ मा।
श्रम के पुजारी ला सिरिफ, मिलथे पछीना माथ मा।।
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छंदकार- मोहन लाल वर्मा 
पता- ग्राम-अल्दा, पो.आ.-तुलसी (मानपुर), व्हाया- हिरमी, तहसील - तिल्दा,जिला-रायपुर (छत्तीसगढ़)पिन-493195
मोबा.9617247078
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