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Sunday, February 27, 2022

चन्द्रशेखर आजाद (आल्हा छन्द)



 चंद्रशेखर आजाद


गाँव भाभरा के माटी ला, माथा सबझन अपन नवाव

तीरथ कस ये पावन भुइयाँ, एखर महिमा ला सब गाव |


धन्य-धन्य दाई जगरानी, बेटा अइसन तैं हर पाय

जे ला छू नइ पाइन गोरा, जग मा वो आजाद कहाय |


चौंड़ा छाती देख वीर के, बैरी मन के लहू अटाय

जब गरजय तब काँपय पापी, सुनय फिरंगी रहय लुकाय |


उघरा देंह जनेव खान्ध मा, रौबदार मूछा कर्राय

देश अपन आजाद करे के, किरिया ओ अंतस मा खाय |


भारत माँ के दुःख दरद के, चिंता ओला

सदा सताय

नान्हेंपन मा सोंटा खा के, जय-जय भारतमाता गाय |


वीर भगत बिस्मिल के संगी, भारत माता के वो लाल

देशभक्त जननायक जब्बर, दुश्मन मन बर सउहत काल |


काकोरी बमकांड करिस हे, लाला के लेइस प्रतिकार 

मुखबिर सात सैकड़ा मिल के, पा नइ पाइन येखर पार |


वीर भगत कइसे कर छूँटय, करत रहिस इकदिन जब बात

नाट नाव के कुकुर बाग मा, रहिस लगाए अपने घात |


छेंक शेर ला सबो फिरंगी, दल के दल बंदूक  चलाय 

एक अकेला हर बैरी बर, ताकत मा भारी पर जाय |


देख फिरंगी मन आजाद के, काल रूप ला बड़ थर्राय

कखरो माथा कखरो छाती, एक-एक कर छेदत जाय |


दूनो डाहर छूँटय गोली, दनदन दनदन दनदन धाँय 

पत्ता-पत्ता रूख राई सब, शेखर के जय जय जय गाय |


लड़िस वीर सौ-सौ बैरी ले, लहू सनाये जम्मों अंग

देख लगय अभिमन्यु जइसे, लड़त हवय कौरव के संग |


जाव छोंड़ के संगी मोला,आंदोलन ये रूक

झन पाय

कहिस सुनव आजाद राज ले, भले प्राण ये मोर गँवाय |


काया लथपथ रहय लहू ले, गोली मन सब रहय बढ़ाय

एक आखिरी गोली ओ हर, रहय जेब मा अपन लुकाय


माटी ला मूठा धर के ओ, कहिस भारती माता मोर

कर पायेंव अतके भर सेवा, जावत हे बेटा अब तोर |


जब-जब जनम धरँव धरती मा, तोर मया के पाँवव छाँव

फेर इही धरती मा खेलव, फेर मिलय ये सुग्घर गाँव |


कहि पिस्तोल अपन माथा मा, गोली ओहर दिस चलाय

गिरिस देह धम ले भुइयाँ मा, मानो परबत हर गिर जाय |


नइ आवव मैं कभू हाथ मा, जीते जी जे किरिया खाय

शेखर बेटा लड़े शेर कस, किरिया तै सच कर देखलाय |


तोर शहीदी के रद्दा ले ,ये आजादी भारत पाय

त्याग संग बलिदान तोर ला, सकय नहीं कोनो बिसराय ||


सुनिल शर्मा नील

बेमेतरा(छत्तीसगढ़)

7828927284

8839740208

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, February 22, 2022

डॉ खूबचंद बघेल-छत्तीसगढ़ राज के प्रथम स्वप्नदृष्टा*

 *डॉ खूबचंद बघेल-छत्तीसगढ़ राज के प्रथम स्वप्नदृष्टा*

मनहरण घनाक्षरी

डॉ खूबचंद बघेल,दुख तकलीफ झेल,

भारत के आजादी मा,दिस योगदान जी।

नवा राज के सपना,पाले रिहिस मन मा,

प्रथम स्वप्नदृष्टा वो,रिहिन सुजान जी।।

छुआछूत भेदभाव,करत रिहिस घाव,

वोला मिटाये खातिर,बनिन चट्टान जी।

मजदूर औ किसान,शोषण मा दय जान,

उँखर सम्मान बर,देवै बने ध्यान जी।।

विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

Monday, February 21, 2022

गुरतुर बोली हे मैना कस - सार छंद*

 *गुरतुर बोली हे मैना कस - सार छंद*

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गुरतुर बोली हे मैना कस,भाखा छत्तीसगढ़ी।

बने गोठियालौ सब संगी,एखर ले मन बढ़ही।।

हो हो हो........


सुआ ददरिया गीत राग मा,ये मिठास गुरतुर हे।

बोल कोयली मैना कस अउ,पड़की करे गुटुर हे।।

बने जरन दे जरवइया ला,ओखर  छाती जरही।

गुरतुर बोली हे मैना कस.......हो हो हो....


करमा मा झूमय  सब संगी,बने ताल हा माढ़े।

पागा मा कलगी खोंचे अउ,थिरकत कउनो ठाढ़े।।

बने झमाझम माँदर बाजत,नवा साज ला गढ़ही।

गुरतुर बोली हे मैना कस.......हो हो हो....


छत्तीसगढ़ी भाई बहिनी,अउ किसान भुइयाँ के ।

संगी हितवा बनके पूजय,पाँव इही मइयाँ के।।

जाँगर के पेरइया सँग मा,कोन इहाँ जी  लड़ही।

गुरतुर बोली हे मैना कस......हो हो हो....

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रचनाकार :--

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम (छ.ग.)

लावणी छंद* महतारी भाखा के सपना


 *लावणी छंद* 

महतारी भाखा के सपना


सपना साजे भाषा कहिथे, ए भुइँया के सेवाबर।

बर पीपर आमा बनजाहँव, तन रुखुवा के छइँहा धर।।


राज देश के चिनहारी हँव, दया मया के बोली बर।

तरपन बर पानी बन जाहँव, जाति धरम के सुमता कर।।


बादर बनके भरिहँव तरिया, नदियाँ मा बोहँव कल कल।

खेत खार धनहा डोली मा, सिरजन बर हँव अन धनबल।।


सबके चोला मा बस जाहँव, सुरुजनरायन के कण बन।

लहरावँव हरियाली बनके, बाग बगइचा वन उपवन।।


सबके मन ला पबरित करिहँव,संत गुरू के बानी बन।

दुख पीरा हर लेहँव तनके, मगन खुशी मा नाचँय जन।।

छंदकार

अश्वनी कोसरे

कवर्धा कबीरधाम


विषय-छत्तीसगढ़ी भाखा*


 *सरसी छंंद*

*विषय-छत्तीसगढ़ी भाखा*


छत्तीसगढ़ी भाखा बोलव, कर लौ एकर मान। 

हवय हमर भाखा हा गुरतुर, रखलौ मया मितान।। 


सुवा ददरिया करमा पंथी, लिखे हवय सब गीत।

छत्तीसगढ़ी भाखा मा हे, घुरे मया के प्रीत।।

ओइल अउ मैना कस बोली, हयव हमर ये शान।

छत्तीसगढ़ी भाखा बोलव, करलौ एकर मान।। 


पढ़व लिखव सब्बो भाखा ला, अउ सीखव सब गोठ।

फेर तुमन छत्तीसगढ़ी ला, मिलके करलौ पोठ।।

आज हमर भाखा ला राखव, सुन गा मोर सियान।

छत्तीसगढ़ी भाखा बोलव, करलौ एकर मान।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

  *पाली जिला कोरबा*

हमर भाखा-मनहरण घनाक्षरी

 हमर भाखा-मनहरण घनाक्षरी


हमर भाखा हे खास, हवय बड़ मिठास,

अमृत घोरे जिभिया,कोयली के राग हे।

फूलँय बाढ़ँय भाखा,निकले कतको शाखा,

राग रंग के जाल मा,लगै झन दाग हे।।

सिरजाबो सरलग,पड़य झन अलग,

करै सब गुणगान,लपटाय पाग हे।

बोले बर मत डरौ,लाज झन तुम मरौ,

मान देवव भाषा ला,चमकही भाग हे।।


छत्तीसगढ़ी मा बोल,दया मया रस घोल,

अपन बोली बोले मा,मरव झन लाज जी।

तभे बड़ मान बड़ही,भाखा नवा रद्दा गढ़ही,

महतारी भाखा मा,करिहहू काज जी।।

मीठ मँदरस झरही,नोनी बाबू ह पढ़ही,

आघू आघू जाही फेर,हमरो ग राज जी।

खेत खार अउ डोली,मीठ मया भाखा बोली,

भाखा हा बनही इहाँ,मूड़ के तो ताज जी।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

वीर शिवाजी जयंती पर मोर रचना

 वीर शिवाजी जयंती पर मोर रचना


नमन मराठा पूत, छत्रपति वीर शिवाजी।

करय शत्रु से युद्ध, जीत जावंय हर बाजी।

धरे हाथ तलवार, करत जयघोष भवानी।

भरय शिवा हुंकार, काल भी माँगय पानी।


हे जीजा के लाल,  शिवाजी परम प्रतापी।

सत्य धरम अउ न्याय , रखे हिरदे के झांपी।

साहस बल ला देख, मुगल बैरी थर्राये।

सुनत शिवा के नाम, काल हा तको लुकाये।।


हिन्दू मन के मान, धरम के असल पुजारी।

पर्वत छूवय पाँव, भाग्य मा सोना थारी।।

भक्ति शक्ति ले संग, न्याय के धरे तराजू।

ज्ञान बुद्धि बल शान ,खड़े हें आजू बाजू।।



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

Sunday, February 20, 2022

मनहरण घनाक्षरी ""बसंत बहार""

 

मनहरण घनाक्षरी

     ""बसंत बहार""


बसंती बहार आगे, जाड़ घलो दुरिहागे ।

रुख राई धीर लगे, पाना ल झर्रात हे ।

परसा ह फूले माते, सरसों ह बेनी गाॅथे ।

आमा ह मॅउर बाॅधे, मॅउहा गर्रात हे ।

गाॅव बस्ती झूमे पारा, हरियागे लीम डारा ।

पुरवाही बहे न्यारा, गस्ती बिजरात हे ।

बड़ माते गउॅहारी, चना खेत सॅगवारी।

घुघरू के धुन भारी, आरो बगरात हे ।

नॅगारा के ताल मा जी, अबीर गुलाल मा जी

फगुवा के तान मा जी, फागुन सर्रात हे।

प्रेम रॅग घोरे हवे, सब ला चिभोरे हवे ।

जवानी के कला कबे, बुढवा रिझात हे।

पॅड़की परेवा मैना,सुआ बोले मीठ बैना ।

नदिया पहाड़ सॅग , डोंगरी लुभात हे ।

कोइली ह राग धरे, मन मा उमंग भरे ।

छंद नवा गीत राग, कवि सिरजात हे ।


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनादगाॅव🙏

हेम के सार छंद (बेटी)*

 *हेम के सार छंद (बेटी)*


बेटी जग बर वरदान हवे, समझव इखरो पीरा।

झन मारव संगी कोख म, अनमोल एक हीरा।।


लक्ष्मी दाई बनके सुघ्घर, घर मा आथे बेटी।

दया मया के गठरी बांधे, लाये सुख के पेटी।।


दादा दादी के सँगवारी, बनथे मीत मयारू।

दाई बाबू बर सुख दाता, बेटी होय जुझारू।।


पढ़े लिखे मा अव्वल रहिथे, खेल कूद मा आगू।

डॉक्टर सैनिक बने शिक्षिका, नइहे बेटी पाछू।।


दू ठन कुल ला रखें बाँध के, कतको झेल झमेला।

दाई बहनी भाभी पत्नी, बिन जिनगी न कटेला।।


कुल गौरव चरित्र निर्मात्री, बेटी बड़ संस्कारी।

जग हे जेकर बिना अधूरा, महिमा हावे भारी।।

-हेमलाल साहू

छंद साधक सत्र-1

ग्राम -गिधवा, जिला बेमेतरा

हेम के विधाता छन्द (किसान)*

 *हेम के विधाता छन्द (किसान)*


हरे अनमोल हीरा ओ, कमाथे जे किसानी ला।

नफा सूझे कहा भैया, इहाँ ओ अन्न दानी ला।।

कमाये पेर जाँगर ओ, सहे गा घाम पानी ला।

बहाये तन पसीना ओ, खपा देये जवानी ला।।


*-हेमलाल साहू*

छन्द साधक, सत्र -1

ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा


संसोधित

कुन्डलिया छन्द *दाई बाबू*

 कुन्डलिया छन्द

*दाई बाबू*


*दाई बाबू के सबो,कर लव गा सम्मान।*

*देथें खुशी अपार जी,परगट ये भगवान।*

*परगट ये भगवान,करौ सब निस दिन सेवा।*

*इँखरे दे आशीष,समझ लव मिसरी मेवा।*

*पावव ममता छाँव,अपन जिनगी भर भाई।*

*करलव पूजा रोज,देवता बाबू दाई।।*


डी.पी.लहरे"मौज"

कवर्धा छत्तीसगढ़

अमृतध्वनि छंद - तुलसी चौरा*

 *अमृतध्वनि छंद - तुलसी चौरा*


सुघ्घर अँगना द्वार औ,तुलसी चौरा भाय।

गोंदा फूल  रवार के, मोला सुरता आय।।

मोला सुरता,आय गजब जी,अँगना घर के।

तुलसी चौरा,माथ नवावँव,बिनती कर के।।

लीपे  पोते, चारों  कोती, चुक ले  उज्जर।

लहरावत वो,तुलसी मइया,लागय सुग्घर।।


//बोधन राम निषादराज//

Saturday, February 19, 2022

हरिगीतिका छंद-*

 *हरिगीतिका छंद-*


(1) नसा झन करव-

झन आज तँय झन काल तँय,सब छोड़ ये जंजाल ला।

तन देख ले अब जान ले,तँय सोंच ले  जी काल ला।।

रख साफ सुथरा अंग ला,झन तोर तन हा नास हो।

मत मोह कर तँय मानले,अब छोड़ दे झन आस हो।।


(2)

बरबाद ये कर जात हे,घर द्वार सब हलकान जी।

तँय मान जा झन कर नसा,सुख दुःख सब ला जान जी।।

परिवार सुख अउ गाँव खुश,धन बाँचही जी मान ले।

सब धर्म अउ सब कर्म ला,तँय देख ले अउ जान ले।।


(3)

झन कर नशा अब सोंच ले,बइरी नसा के जात हे।

घर लोग लइका भोग थे,फिर खात अउ पछतात हे।।

बन आज तँय हुशियार गा,कर काम सोंच  बिचार के।

घरबार मा सुख नेह के,बरसात होही प्यार के।।


छंदकार:-

बोधन राम निषादराज✍️

छत्रपति वीर शिवाजी


 

छत्रपति वीर शिवाजी जयंती के हार्दिक बधाई।


छत्रपति वीर शिवाजी

---------------------

पइयाँ लागवँ गणपति गुरु के, हाथ जोड़ के माथ नँवाय।

 बिनती सुन लौ शारद माता, भूले बिसरे देहु बताय।।

जस ला वीर शिवा के गाववँ, महिमा जेकर अगम अपार ।

क्षत्रिय कुल में जनम धरे तैं, कुर्मी जाति कहय संसार।।

 किला बखानवँ शिवनेरी के, जनम लिए  सोला सौ तीस।

नाम शिवाजी राखिस दाई,शिव भोला के पाय असीस।।

माता धरमिन जीजाबाई, पिता शाहजी सूबेदार।

 कोणदेव गुरु के किरपा ले, सीखे तैं भाला तलवार।।

 सिधवा बर तो अब्बड़ सिधवा, बैरी बर तो सँउहे काल।

 परम भक्त माता तुलजा के, जय हो भारत माँ के लाल।। 

धरम करम ले पक्का हिंदू, हिंदू के पाये संस्कार।

 गउ माता के रक्षा खातिर, युद्ध करे तैं कतको बार।।

 बालकपन में करे लड़ाई, बैरी मन ला दे ललकार।।

 कब्जा करे किला मा कतको, लड़े लड़ाई छापामार।।

 बीजापुर के राजा बैरी, नाम कहावै आदिलशाह।

 तोर भुजा ला तउलत मरगे, फेर कभू नइ पाइस थाह।।

 समझौता के आड़ बलाके ,लेये खातिर तोरे जान।

 घात लगाये धरे कटारी, कपटी पापी अफजल खान।।

 दाँव ह ओकर उल्टा परगे,समझ गये तैं तुरते चाल।

 बघनक्खा मा ओला भोंगे,यमराजा कस बनके काल।।

 देखे सेना ला मालव के, जीव मुगलिया के घबराय ।

जइसे बघवा के तो छेंके,ठाढ़े हिरना प्रान गँवाय।।

अइसे फुरती जइसे चीता, भुजा म ताकत भीम समान।

रूप दिखय जस पांडव अर्जुन,धरे हाथ मा तीर कमान।।

 औरँगजेब बलाके दिल्ली, पकड़ जेल मा देइस डार।

फल के टुकनी मा छिप निकले, गम नइ पाइन पहरेदार।।

दसों दिशा मा डंका बाजय,धजा मराठा के लहराय।

कतका महिमा तोर बखानवँ,मोरे मति हा पुर नइ पाय।।

 जै जै जै जै वीर शिवाजी, निसदिन तोर करवँ गुणगान।

जै होवय भारत माता के, जेकर बेटा तोर समान।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Tuesday, February 15, 2022

लता दीदी जी ला भावाञ्जली-कुंडलियाँ छंद

 लता दीदी जी ला भावाञ्जली-कुंडलियाँ छंद


सुर के देवी ला नमन, करौं रोज कर जोर।

अमरित घूँट पियाय हे, शब्द शब्द मा घोर।

शब्द शब्द मा घोर, पियाहे अमरित पानी।

दीदी जी के गीत, गढ़े हे अमर कहानी।

करही जुगजुग राज, गीत रगरग मा घुर के।

ये जग मा कहिलाय, लता जी देवी सुर के।


आथे जग मा जौन हा, जाथे तज पर धाम।

पर कतको झन काम ले, छोड़ जथे शुभ नाम।

छोड़ जथे शुभ नाम, जगत मा सबदिन सब बर।

कोई पाय न भूल, काम हा होथे जब्बर।

सबके दिल मा राज, करे वो पद पा जाथे।

अइसन मनके लोग, सबे दिन महिमा गाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर//* (28/09/1929 - 06/02/2022)


 

*//स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर//*

(28/09/1929 - 06/02/2022)

*आल्हा छंद जीवनी*

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स्वर साम्राज्ञी लता रहिन हे,भारत रत्न देश के शान।

कोकिल कंठी दुनिया जानै,इही इँखर हावै पहिचान।।


जनम धरिन इंदौर शहर मा,सरस्वती दाई आशीष।

उन्नईस उनतीस बछर मा,माह सितम्बर अट्ठाईस।।


रहिन लोकप्रिय लता गायिका,कउनो नइ पावयँ जी पार।

भाषा तीस अधिक ले गाइन,सुग्घर गीत पचास हजार।।


हेमा मंगेशकर रहिन हे,नान्हेंपन के इँखरे नाँव।

खेलिस कूदिस घर अँगना मा,दाई-बाबू सुग्घर छाँव।।


पंडित दीनानाथ ददा जी,रहिन बने ब्राम्हण परिवार।

कलाकार वो रंगमंच के,शास्त्री गायक बड़ दमदार।।


लता बड़े बेटी घर भर ले,हृदयनाथ जी भाई एक।

मीना मंगेशकर उषा अउ,बहिन भोसले आशा नेक।।


भले जनम इंदौर शहर मा,महाराष्ट्र जिनगी के धाम।

बनिन जीविका गीत राग हा,बने बनाइन अपन मुकाम।।


नान्हेंपन ले बनिन गायिका,सपना मन मा बने सजाय।

सबले पहिली फ़िल्म इँखर जी,"कीर्ती हसाल" बर वो गाय।।


उमर रहिन तेरह बच्छर के,इँखर ददा जी सरग सिधार।

बचगे पाँचों भाई बहिनी,जिनगी होगिन हे लाचार।।


पालन पोषन जिम्मेदारी,लता उठाइन जम्मों भार।

आजीविका गीत गायन बर,तभे लता होइन तइयार।। 


पहुँचिन फ़िल्मी दुनिया मा वो,अभिनेत्री बनके सिरमौर।

तेरह बच्छर उमर रहिन हे,फिल्म बनाइन "मंगलागौर"।।


लता बाद मा फ़िल्म बनाइन,"चिमूकला" अउ "माझे बाल"।

"गजभाऊ","जीवन यात्रा" अउ,"माँद","बड़ी माँ" गीत कमाल।।


फ़िल्म "बड़ी माँ" नूरजहाँ सँग,अभिनय करिन लता दिल खोल।

छोटी बहिन भोसले आशा,इँखर गीत के सुग्घर बोल।।


फ़िल्म "छत्रपति शिवाजी" घलो,लता करिन हे सुग्घर काम।

उन्नईस चालीस दशक मा,बने कमाइन अपने नाम।।


इँखरे ले तो रोजी रोटी,चलत रहिन हे घर परिवार।

सदा कुँवारी रहिन लता हा,भाई-बहिनी देखनहार।।


सन् सैंतालीस शुरू करिन हे,लता पार्श्वगायन शुरुवात।

एक बसंत जोगलेकर ले,मुलाकात ले होइस बात।।


फ़िल्म "आपकी सेवा में" फिर,गाइन हे सुग्घर वो गीत।

फ़िल्म "महल" उनचास ईसवी,बने सफलता पाइन जीत।।


"आएगा आने वाला" ये,सुपर डुपर हिट गीत कहाय।

चमकिन इँखरे भाग सितारा, आशा, लता, उषा हरषाय।।


सन् उन्नईस सौ अस्सी ले,करिन स्टेज शो के बड़ काम।

आशा बहिन भोसले सँग मा,भाई हृदयनाथ शुभ नाम।।


इँदिरा कला विश्वविद्यालय,खैरागढ़ के पावन धाम।

पाइन डी.लिट.उपाधि मानद,छत्तीसगढ़ राज के नाम।।


पार्श्वगायिका रहिन लता जी,अउ संगीतकार पहिचान।

आनँद घन बैनर मा सुग्घर,फ़िल्म बनाइन पाइन मान।।


जब- जब गावय गीत लता जी,राहय सुग्घर नंगे पाँव।

सरस्वती के रहिन कृपा हा,लता पाय इँखरे सुख छाँव।।


पुरस्कार के नइ गिनती जी,अतका पाइन हे सम्मान।

सन् उनहत्तर अउ निन्यनबे,भूषण- पद्म विभूषण शान।।


दो हजार सन् एक बछर मा,नूरजहाँ के बड़ सम्मान।

महाराष्ट्र भूषण पाइन हे,भारत देश करिन गुणगान।।


दिन तिथि छै फरवरी माह के,दो हजार सन् बाइस छाँव।

अस्पताल ब्रिच केंडी बॉम्बे,कोरोना सँग हारिन दाँव।।


जबले सूरज चाँद चमकही,रही लता दीदी के नाम।

कोन भुलाही ये दुनिया मा,लता करिन बड़ सुग्घर काम।।


सबले जादा गीत सुनाइस,सरस्वती दाई अवतार।

वर्ल्ड रिकार्ड बनाइन सुग्घर,जानत सबो हवै संसार।।

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छंदकार:-

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

Tuesday, February 8, 2022

स्वर कोकिला भारत रत्न लता दीदी


 

स्वर कोकिला  भारत रत्न लता दीदी ला मोर भावांजलि🙏🙏🙏💐


शब्द समुन्दर मा खोजत हँव,  हमर लता दीदी बर नाम।

सब आखर मन चुप हें बइठे, हाथ जोड़ के करँय प्रणाम।।


अतिक बड़े ब्रम्हांड हवय पर , इंखर जैसे हावय कोन।

कोहिनूर के आघू मा तो, सकुचावत कस बइठे सोन।।


दोहा कहिथे मंय दू पद हँव, रोला कहे चार हे गोड़।

हार खाय कस कुण्डलिया हे ,बइठे मुड़ी पुछी ला मोड़।।


उपमा अभिधा अलंकार रस, नइहे इंखरो बस के बात।

सुर के रानी बर कुछ बोलय, हमर असन के का औकात।।


धन्य धन्य हें गीत ग़ज़ल मन, होगे अमर लता के संग।

अइसन सुर ला  शारद मैया, सुनके होवत होही दंग।।


कोन सृष्टि ले माटी लाइन , कोन झील ले लाइन नीर।

गढ़िन लता ला जब ईश्वर हा, धरके पीर धीर ,गम्भीर।।


रुखवा मा चंदन हे जइसे, देवन मा  जइसे श्री राम।

युग युग रहिही अमर लता जी, सकल जगत मा तोरे नाम।।


आशा देशमुख

कोरबा

Saturday, February 5, 2022

बसन्त पंचमी विशेष छंदबद्ध कविता


 

वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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रितु बसंत 


गावय गीत बसंत, हवा मा नाचै डारा।

फगुवा राग सुनाय, मगन हे पारा पारा।

करे  पपीहा शोर, कोयली कुहकी पारे।

रितु बसंत जब आय, मया के दीया बारे।


बखरी बारी ओढ़, खड़े हे लुगरा हरियर।

नदिया नरवा नीर, दिखत हे फरियर फरियर।

बिहना जाड़ जनाय, बियापे मँझनी बेरा।

अमली बोइर आम, तरी लइकन के डेरा।


रंग रंग के साग, कढ़ाई मा ममहाये।

कौंरा ताते तात, अबड़ उपरहा खवाये।

धनिया मिरी पताल, नून बासी मिल जाये।

चिक्कन खाये चाँट, पेट का जिया अघाये।


हाँस हाँस के खेल, लोग लइकन मन खेलैं।

चना चिरौंजी चार, टोर के मनभर झेलैं।

झुलैं झूलना बाँध, आम अमली के डारा।

किसम किसम के फूल, फुलै महके घर पारा।


मेथी मटर मसूर, देख के मन मुसकावय।

खन खन करे रहेर, हवा सँग नाचय गावय।

हवे उतेरा खार, लाखड़ी सरसो अरसी।

घाम घरी बर देख, बने कुम्हरा घर करसी।


मुसुर मुसुर मुस्काय, लाल परसा हा फुलके।

सेम्हर हाथ हलाय, मगन हो मन भर झुलके।

पीयँर पीयँर पात, झरे पुरवा आये तब।

मगन जिया हो जाय, गीत पंछी गाये तब।


हाट बजार भराय, लुभावै लाड़ू मुर्रा।

डहर बाट मा छाय, गाँव के कुधरिल धुर्रा।

बर बिहाव के बात, चले नोनी बाबू के।

लोरी गावत रोज, हवा हा पंखा धूके।।


माँघ पंचमी होय, शारदा माँ के पूजा।

कहाँ पार पा पाय, महीना कोई दूजा।

ढोल नँगाड़ा झाँझ, आज ले बाजन लागे।

आगे मास बसन्त, सबे कोती सुख छागे।


जीतेंन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा(छग)

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सार छंद गीत

ऋतु बसंती के आये ला,बउरागे अमराई।

मौसम हा मन भावन होगे,जन-जन बर सुखदाई।।


परसा फुलवा लाली लाली,सरसो फुलवा पिंवरा।

ममहावत हे चारो कोती,भावत हावय जिंवरा।।

रंग बिरंगा फुलवा मन के,नीक लगे मुस्काई।।

ऋतु बसंती के आये ला,बउरागे अमराई।।


कुहके कारी कोयलिया हा,मारत हावय ताना।

फूल फूल मा झूमे नाचे,भौंरा गावय गाना।।

तन मन ला हरसावय अब्बड़,फुरहुर ए पुरवाई।

ऋतु बसंती के आये ला,बउरागे अमराई।।


फागुन के आये के अब तो,होगे हे तइयारी।

गाँव गली मा ढ़ोल नँगारा,चलही जी पिचकारी।।

रंग लगाही हँसी खुशी ले,होही बड़ पहुनाई।।

ऋतु बंसती के आये ला,बउरागे अमराई।।


द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"

बायपास रोड़ कवर्धा 

छत्तीसगढ़

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बसन्त ऋतु-घनाक्षरी


अमरइया मा जाबों,कोयली के संग गाबो

चले सर सर सर,पुरवइया राग मा।।

अरसी हे घमाघम,चना गहूँ चमाचम

सरसो मँसूर धरे,मया ताग ताग मा।

अमली झूलत हवै,अमुवा फुलत हवै,

अरझ जावत हवै,जिवरा ह बाग मा।

रौंनिया म माड़ी मोड़,पापड़ चना ल फोड़

खाबों तीन परोसा गा,सेमी गोभी साग मा।


जब ले बसंत लगे,बगुला ह संत लगे

मछरी ल बिनत हे, कलेचुप धार मा।।

चिरई के बोली भाये, पुरवा जिया लुभाये

लाली रंग रंगत हे, परसा ह खार मा।।

खेत खार घर बन,लागे जैसे मधुबन

तरिया मा मुँह देखे,बर खड़े पार मा।।

बसंत सिंगार करे,खुशी दू ले चार करे

लइका कस धरती ह,हाँसे जीत हार मा।।


दोहा-


परसा सेम्हर फूल हा,अँगरा कस हे लाल।

आमा बाँधे मौर ला,माते मउहा डाल।1।


पुर्वाही सरसर चले,डोले पीपर पात।

बर पाना बर्रात हे,रोजे दिन अउ रात।2।


खिनवा पहिरे सोनहा,लुगरा हरियर पान।

चाँदी के पइरी सजा,बम्हरी छेड़े तान।3।


चना गहूँ माते हवै,नाचे सरसो खेत।

अरसी राहर लाखड़ी,हर लेथे सुध चेत।4।


नाचत गावत माँघ मा,आथे देख बसन्त।

दुल्हिन कस लगथे धरा,छाथे खुशी अनन्त।5।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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सरसी छंद गीत


दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।

इहाँ कोइली कूक नँदागे,अउ कउआँ के काँव।।


बिछगे चारो-कोती संगी,कंक्रिटिंग के जाल।

बिन आगी के जरगे जंगल,जीव-जंतु बेहाल।।

फुलवारी खोजे नइ पाबे,शहर बने हे गाँव।

दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।


महुरा घोरे जइसे होगे,पुरवाई तो आज।

कोन बिगाड़त हावय संगी,ए धरती के साज।।

एमा काखर हाथ हवय गा,काखर लेवँव नाँव।।

दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।


पहली जइसे ए धरती मा,आवय कहाँ बसंत।

बड़हर मन जी कर दे हावँय,अब तो एखर अंत।।

रितु बसंत करलावत हावय,का दुख ला बतियाँव।

दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।


डी.पी.लहरे"मौज"

कवर्धा छत्तीसगढ़।

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रितु राज बसंत


रितु राज बसंत बहार धरे जब आवय रंग बड़े बगरायय।

रुख मा पतिया फर फूल लगे सब रंग बिरंग दिखे ममहाय।

शुभ सुग्घर नेवरनीन लगे रुखवा सबके मन ला हरसाय।

कुहके कुक कोयलिया बइठे अमुवा मउरे मन ला बड़ भाय।


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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बसंत आय हे-मनहरण घनाक्षरी

(1)

उलहा डारा पाना हे,कोयली गावै गाना हे,

गमकत दमकत,बसंत हा आय हे।

मउँरे अमुवा डाल,परसा फूले हे लाल,

अंतस मारे हिलोर,खुशी बड़ छाय हे।।

बाँधय मया के डोरी,दाई सुनावय लोरी,

झूमत मन मँजूर,पाख फइलाय हे।

चना सरसों तिंवरा,देख जुड़ाय जिंवरा,

मउँहा मतौना बने,गंध बगराय हे।।


(2)

परसा सेम्हर डाल,अँगरा बरत लाल,

मुचमुच हाँसे गोंदा,बड़ बिजरात हे।

ताल मा खिले कमल,सुघर दल के दल,

मया रंग भर रति,रस बरसात हे।।

बोहाय मया के रंग,मन मा जागे उमंग,

पींयर पींयर पात,पुरवा झर्रात हे।

ताल तलैया के नीर,देख के भागय पीर,

ऋतु बसंत हा आय,खुशी बड़ छात हे।।

विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

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मनहरण घनाक्षरी:-

बसंत बहार आगे, चारो मुड़ा हरियागे,नवा जी उमंग लेके,ॠतुराज आत हे।

सरसों पिंयर फुले,आमा डार मौर झुले,प्रकृति दुल्हन कस,रूप दमकात हे।

परसा हा फुले लाल,लहसे महुँआ डाल,

महर महर देख,बड़ ममहात हे। 

पेड़ मा उल्होय पाना,कोयली गावय गाना,फूल फूल मा मगन,भौंरा मंडरात हे।।1


घपटे हे ओनहारी,आनी बानी तरकारी,भाँड़ी चढ़े सेमी नार,छछलत जात हे।

झूनला बँधाये डार, झूलै जम्मो संगी यार,अमली के फर देख,मन ललचात हे।

जाड़ अब कम होगे,मौसम सुगम होगे, बर बिहाव के घलो ,दिन लकठात हे।

मेला मड़ई भराही,देखे सब सकलाही, इही सेती ॠतुराज,बसंत कहात हे।।2


गुमान साहू

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[2/5, 9:43 AM] विजेन्द्र: बसंत आय हे-मनहरण घनाक्षरी

(1)

उलहा डारा पाना हे,कोयली गावै गाना हे,

गमकत दमकत,बसंत हा आय हे।

मउँरे अमुवा डाल,परसा फूले हे लाल,

अंतस मारे हिलोर,खुशी बड़ छाय हे।।

बाँधय मया के डोरी,दाई सुनावय लोरी,

झूमत मन मँजूर,पाख फइलाय हे।

चना सरसों तिंवरा,देख जुड़ाय जिंवरा,

मउँहा मतौना बने,गंध बगराय हे।।


(2)

परसा सेम्हर डाल,अँगरा बरत लाल,

मुचमुच हाँसे गोंदा,बड़ बिजरात हे।

ताल मा खिले कमल,सुघर दल के दल,

मया रंग भर रति,रस बरसात हे।।

बोहाय मया के रंग,मन मा जागे उमंग,

पींयर पींयर पात,पुरवा झर्रात हे।

ताल तलैया के नीर,देख के भागय पीर,

ऋतु बसंत हा आय,खुशी बड़ छात हे।।

विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

[2/5, 10:46 AM] अनुज छत्तीसगढ़ी 14: *हरिगीतिका छंद*

*आगे बसंती*

आगे बसंती झूम के अब, देख जोही बाग ला।

ये पेड़ के पतझड़ हवा हा, शोर देवत फाग ला।।

चंपा-चमेली रातरानी, मन बने भावत हवें।

अउ देख भौंरा मन मया के, गीत ला गावत हवें।।


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

 *पाली जिला कोरबा*

[2/5, 12:01 PM] बोधन जी: *जल-हरन घनाक्षरी - ( बसन्त)*


मन मोर  झुमें  नाचे, पड़की  परेवा बाचे,

लागथे  लगन  अब, शोर   बगराय बर।

परसा के फूल लाली,गोरी होगे मतवाली,

कुहके कोयलिया हा,जिवरा जलाय बर।।

आमा मउँर महके, जिवरा  घलो  बहके,

सरसो  पिँयर  सोहे, मन  ललचाय  बर।

हरियर     रुखराई,    चलतहे     पुरवाई,

आस ला बँधावत हे,मया ला जगाय बर।।


*किरीट सवैया - (बसन्त)*


आय बसन्त फुले परसा गुँगवावत आगि लगावत हावय।

देख जरै जिवरा बिरही मन मा बहुँते अकुलावत हावय।।

कोकिल राग सुनावत हे महुआ मीठ फूल झरावत हावय।

रंग मया पुरवा बगरे चहुँ ओर इहाँ ममहावत हावय।।


*सुखी सवैया - (बसन्त)*


ऋतुराज बसन्त लुभावत हे,मन मा खुशियाँ अब छावन लागय।

अमुवा मउरे पिँउरावत हे,कुँहु कोकिल राग सुनावन लागय।।

सरसो अरसी महुआ महके,सब डाहर फूल सुहावन लागय।

मन मोर अगास उड़ै जस बादर गीत मया बरसावन लागय।।


छंदकार - बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,जिला - कबीरधाम

(छत्तीसगढ़)

[2/5, 12:56 PM] अश्वनी कोसरे 9: *रोला छंद* 

 *बसंत आगे* -अश्वनी कोसरे


आइस राज बसंत, पेड़ उलहोवँय पाना।

तिवँरा चना मसूर, गहूँ के पाकँय दाना।। 

सुरुज मुखी के फूल, लागय घातेच पिवँरा।

सरसों पीयँर फूल, लुभोवत हे अब जिवँरा।।


फूलत हवय पलास, अमराइ बौरन लागे।

झूमत हवय कनेर, बसंती खुमार छागे।।

 मंद पवन के टोर, खुशी के बयार आगे।

सजगे खेती खार, बड़ा मनभावन लागे।।


फूले हवँय मँदार, सेमहर लाली लाली।

हाथ मुड़ी ला जोर, बजावय अरसी ताली।।

करिया करिया डार, करायत झनकत जावय।

धनहा डोली पार, राहेर खनकत हावय।।


होवत हवय बिहाव, गवन के आगे बेरा।

बाजत हवय निशान, मड़वा मा घुमँय फेरा।।

दुल्हा दुल्हन देख, बरतिया गावन लागे।

मन मा उठे उमंग, सखा के बसंत आगे।।


छंदकार

अश्वनी कोसरे

[2/5, 1:05 PM] आशा देशमुख: बसंत पंचमी मा माँ शारदे बर भाव पुष्प🙏🙏🙏💐💐💐


हरिगीतिका छंद


 माँ सरसती माँ सरसती, दिन रात करथंव प्रार्थना।

घेरे हवे अज्ञान हा,  हर दे सबो दुख वेदना।

कागज धरे बइठे हवंव, मन भाव सब करिया दिखे।

तोरे चरण मन बुद्धि ला, निर्मल कृपा तरिया दिखे।


धोवय समुन्दर  पाँव ला, पूजा करँय सब द्वीप मन।

मोती रतन अनगिन धरे ,कविता कला के सीप मन।।

आखर धरे ब्रम्हांड के, उजियार सूरुज देव के।

वरदान माँगय मातु से, शुभ शांति सुमता नेंव के।।


 स्वागत करय ऋतुराज हा, माला बसंती ला धरे।

ममहात पुरवाई चले, आमा घलो फूले फरे।।

मेधा प्रभा मन बुद्धि के ,माता तहीं हस स्वामिनी।

पाथें कृपा माँ जेन मन, वो मन हवें सबले धनी।।



आशा देशमुख

एनटीपीसी कोरबा


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[2/5, 1:10 PM] इजारदार: दुर्गा शंकर इजारदार के

 *गीतिका छंद*

सरसती वंदना

ज्ञान  देवी सरसती माँ,ज्ञान के भंडार दे ।

देश हित मँय लिख सकँव माँ ,अतक मोला प्यार दे ।

आय हाँवव तोर कोरा ,हाथ रख दे माथ ओ ।

राग दे माँ साज दे माँ , छंद दे अउ साथ ओ ।


हाथ वीणा वेद धर के ,कमल आसन तोर हे ।

हंस वाहन मा विराजे ,प्रार्थना कर जोर हे ।

मोर डोंगा बहत हावय ,'देख ना मँझधार मा ।

तोर छोड़े कोन थामे ,हाथ ला संसार मा ।


कोयली के कूक बानी ,बाँसुरी के राग ओ ।

वेद के तँय मंत्र दाई , साधु के बैराग ओ ।

करत हाँवन तोर वंदन , हाथ दूनो जोड़ के ।

संग मा तै राख दाई ,समझ धुर्रा गोड़ के ।


दुर्गा शंकर ईजारदार

सारंगढ़(मौहापाली)

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Tuesday, February 1, 2022

मुक मजदूर (रूपमाला छन्द)


 राजभासा आयोग सम्मेलन- राजिम


मुक मजदूर (रूपमाला छन्द)


जाड़ अब कुछ दिन जनाही, पूस गे हे पूर।

एक महिना माँघ जाही, आ धमकही धूर।

एक ठन कम्बल लपेटे, सोय मुक मजदूर।

मन न बोधय तव करै का,‌ आदमी मजबूर।


वोट के बेरा बखत मा, हो जथे कुछ चेत।

तेखरो ऊपर धरम अउ, जातिवादी केत।

दू कुवाटर झन अँकावय, आज ले औकात।

आसमाने के तरी मा, हे कटत दिन रात।


दू समोसा खाय हावय, लंच टाइम आज।

चार कप अमसुर कढ़ी हा, बड़ रखे हे लाज।

दू पहर लटपट पहाइस, बइठ आगी ताप।

नींद झपकी आय लागिस, चोर कस चुप-चाप।


जाड़ मा निमगा जुड़ागे, आज आठो अंग।

हार झन जावय बिचारा, जिन्दगी के जंग।

ओंठ डोलय गोड़ काँपय, किटकिटावय दाँत।

चेत गे हे पेट कोती, भात खोजय आँत।


हाथ जुरगे हे दुनोठन, सच म अपने आप।

भोरहा मा झन समझहू, प्रार्थना व्रत जाप।

खाँध मा जेखर खड़े हे, लाख नव निर्माण।

जीवलेवा जाड़ हा पल-पल हरत हे प्राण।


हे विधाता ये जगत के, तँय कहाथस बाप।

तोर इन लइकन ल आखिर, कोन दे हे श्राप।

बड़ नपइया तँय कहाथस, छाय हे परताप।

खेद हे इनकर दरद दुख, नइ सके हस नाप।


रचना-सुखदेव सिंह "अहिलेश्वर"

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़