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Tuesday, March 10, 2026

महिला दिवस विशेषांक बरवै छंद

 चित्रा श्रीवास: महिला दिवस विशेषांक


बरवै छंद



नोहवँ मैहा देवी ,अतका जान।

समझव मोला मनखे, देवव मान।।

देवी कहिके करथव, अत्याचार।

हिंसा झगड़ा दाहिज,देथव मार।।

सुन जीये के मोरो, हे अधिकार।

मै हा हाववँ जिनगी, के आधार।।

नारी हावय नर के,आधा भाग।

माँ पत्नी बेटी बन,करथे त्याग।।

भेदभाव ला छोड़व, राखव मान।

दुनो एक गाड़ी के,चक्का आन।।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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 मुकेश 16: (महिला दिवस विशेष)


नारी शक्ति--- बरवै छंद


नारी मन के महिमा, अपरंपार।

सुमता मा राखँय जी, घर परिवार।।


आज करत हें उन मन, जम्मों काम।

पढ़-लिख बने कमावत, हावँय नाम।।


नारी बिन हावय गा, जग अँधियार।

माँ बेटी पत्नी बन, बाटँय प्यार।।


रानी दुर्गा लक्ष्मी, बनिन महान।

बैरी मन ले लड़के, देइन प्रान।।


बने चलावत हावँय, अब सरकार।

राजनीति मा बनके, भागीदार।।


बड़े-बड़े ग्रंथन हा, करय बखान।

शक्ति स्वरूपा नारी, देवव मान।।


मान गउन सब झन ला, दँय हरहाल।

करँय सदा पति सेवा, जा ससुराल।।


दुनिया भर मा अब तो, होवय शोर।

नइहें नारी अबला, अउ कमजोर।।


ओलंपिक उन खेलँय, गा मैदान।

मेडल जीत बनावँय, जी पहिचान।।


नारी मन हें जग के, सिरजनहार।

मातृ रूप मा पूजय, अब संसार।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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नारी के महिमा

( त्रिभंगी छंद)


हिरदे मा ममता, सब बर समता , अँचरा मा सुख, छाँव रहै ।

गुन ला सब गावैँ, माथ नवावैँ , जग महतारी , बेद कहै ।।

वो हर ए नारी, महिमा भारी, बेटी बहिनी , रूप धरै ।

लाँघन तक रहिके, बिपदा सहिके , बाँटत कौंरा , दुःख हरै ।।


जग ला तैं सिक्छा, अगिन परीक्छा, देथस माता , बखत परे।

दुर्गा बन जाथस , लास बिछाथस ,  काली चंडी , रूप धरे ।।

सावित्री मइया , तैं अनुसुइया , मातु जसोदा , आच तहीं ।

हे विस्वमोहनी , करौं सुमरनी , तैं अबला अच , नहीं नहीं ।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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*विषय - नारी शक्ति*

       *सार छंद*


हावय संगी नारी मनके, महिमा अड़बड़ भारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


कभू हार नइ मानै येमन ,कतको बाधा आवै।

अपन आखरी साँस चलत ले ,नारी धरम निभावै।

संत देव ऋषि ज्ञानी ध्यानी,हवय इँकर आभारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


झन समझौ जी अब इनला तुम, शक्तिहीन अउ अबला।

बात रथे जब इँकर मान के,कँपा देत इन जग ला।

करव सदा सम्मान इँकर सब,होथें इन अवतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी। 


अलग अलग रुप मा येमन हा, ये दुनिया मा आथे।

दया मया बगराके सुग्घर,जिनगी ला महकाथे।

इहीं रूप देवी दुर्गा के,आवय जग महतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी।

 

 अमृत दास साहू 

   राजनांदगांव

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दोहा

नारी घर के हे धुरी, नारी ले संसार।

गुन गावत हे देवता, महिमा अपरंपार।।


रौनक सबो तिहार के, सुखी रखय परिवार।

नारी मन ममता भरे, देथे शुभ संस्कार।।


तज देथे सुख ला अपन, दया मया के छाँव।

सरग सही होथे धरव, माँ के पबरित पाँव।।


बेटी बहिनी रूप मा, नारी दव सम्मान।

अन्न रतन धन ले बड़े, होथे कन्यादान।।


सोंध-सोंध महकत रहय, किसम -किसम पकवान।

नारी ले होथे परब, गुन के ओहर खान ।।


डॉ. दीक्षा चौबे