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Thursday, January 28, 2021

चौपई छंद ( बेटी )-कुलदीप सिन्हा


 

        चौपई छंद ( बेटी )-कुलदीप सिन्हा


बेटी ला झन अबला जान।

बेटी के सब राखव मान।

होथे बेटी फूल समान।

बगरै खुशबू सकल जहान।।1।।


बेटी लक्ष्मी के अवतार।

कोख म येला तैं झन मार।

जानव इनला मुक्ता हार।

समझौ झन गा कोनो भार।।2।।


बेटी के हे कतको रूप।

जइसे होथे चलनी सूप।

पानी जइसे देथे कूप।

काम घलो गा हवे अनूप।।3।।


बेटी ले हे घर परिवार।

होथे ये दू घर के तार।

मात पिता के मया दुलार।

बैरी बर खंजर तलवार।।4।।


बेटी दुर्गा रूप समान।

इनला राधा सीता जान।

रूप बिष्णु मोहनी ग मान।

वहुला तेहा बेटी जान।।5।।


बेटी चण्डी के अवतार।

जान करो नइ अत्याचार।

नइ ते गला तोर तलवार।

काट मचाही हाहाकार।।6।।


महिमा बेटी के अब जान।

गावय गीता वेद पुरान।

सबो देव के पा वरदान।

जग मा बेटी भइस महान।।7।।


छन्दकार

कुलदीप सिन्हा "दीप"

कुकरेल सलोनी ( धमतरी )

छन्द के छ परिवार की प्रस्तुति-छेरछेरा परब


छन्द के छ परिवार की  प्रस्तुति-छेरछेरा परब


सार छन्द-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 कूद कूद के कुहकी पारे,नाचे   झूमे  गाये।

चारो कोती छेरिक छेरा,सुघ्घर गीत सुनाये।


पाख अँजोरी  पूस महीना,आवय छेरिक छेरा।

दान पुन्न के खातिर अड़बड़,पबरित हे ये बेरा।


कइसे  चालू  होइस तेखर,किस्सा  एक  सुनावौं।

हमर राज के ये तिहार के,रहि रहि गुण ला गावौं।


युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।

राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।


आठ साल बिन राजा के जी,काटे दिन फुलकैना।

हैहय    वंशी    शूर  वीर   के ,रद्दा  जोहय   नैना।


सबो  चीज  मा हो पारंगत,लहुटे  जब  राजा हा।

कोसल पुर मा उत्सव होवय,बाजे बड़ बाजा हा।


राजा अउ रानी फुलकैना,अब्बड़ खुशी मनाये।

राज रतनपुर  हा मनखे मा,मेला असन भराये।


सोना चाँदी रुपिया पइसा,बाँटे रानी राजा।

रहे  पूस  पुन्नी  के  बेरा,खुले रहे दरवाजा।


कोनो  पाये रुपिया पइसा,कोनो  सोना  चाँदी।

राजा के घर खावन लागे,सब मनखे मन माँदी।


राजा रानी करिन घोषणा,दान इही दिन करबों।

पूस  महीना  के  ये  बेरा, सबके  झोली भरबों।


ते  दिन  ले ये परब चलत हे, दान दक्षिणा होवै।

ऊँच नीच के भेद भुलाके,मया पिरित सब बोवै।


राज पाठ हा बदलत गिस नित,तभो होय ये जोरा।

कोसलपुर   माटी  कहलाये, दुलरू  धान  कटोरा।


मिँजई कुटई होय धान के,कोठी हर भर जावै।

अन्न  देव के घर आये ले, सबके मन  हरसावै।


अन्न दान तब करे सबोझन,आवय जब ये बेरा।

गूँजे  सब्बे  गली  खोर मा,सुघ्घर  छेरिक छेरा।


वेद पुराण  ह घलो बताथे,इही समय शिव भोला।

पारवती कर भिक्षा माँगिस,अपन बदल के चोला।


ते दिन ले मनखे मन सजधज,नट बन भिक्षा माँगे।

ऊँच  नीच के भेद मिटाके ,मया पिरित  ला  टाँगे।


टुकनी  बोहे  नोनी  घूमय,बाबू मन  धर झोला।

देय लेय मा ये दिन सबके,पबरित होवय चोला।


करे  सुवा  अउ  डंडा  नाचा, घेरा गोल  बनाये।

झाँझ मँजीरा ढोलक बाजे,ठक ठक डंडा भाये।


दान धरम ये दिन मा करलौ,जघा सरग मा पा लौ।

हरे  बछर  भरके  तिहार  ये,छेरिक  छेरा  गा  लौ।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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 अमृतध्वनि छंद


छेरिक  छेरा  छेर  के, लइका  करै  गुहार।

दरबर दरबर रेंग के,झाँकय सब घर द्वार।।

झाँकय सब घर,द्वार धान ला,माँगे बर जी।

बाँधे कनिहा,बाजै घँघरा,खनर खनर जी।।

नाचय  कूदय,  धूम  मचावय, रेंगत  बेरा।

आय परब तब,हाँसत गावै,छेरिक छेरा।।



बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम

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लावणी छंद - बोधन राम निषादराज


पूस माह के पुन्नी आगे,

             छेरिक   छेरा   आगे   ना।

सुनलव मोरे भाई बहिनी, 

              धरम करम सब जागे ना।

पूस माह के पुन्नी आगे........


होत बिहनिया देखौ लइका,

                बर चौरा सकलावत हे।

कनिहा बाँधे बड़े घाँघरा,

             नाचत अउ मटकावत हे।।

देवव दाई-ददा धान ला,

               कोठी   सबो  भरागे  ना।

पूस माह के पुन्नी आगे........


मुठा मुठा सब धान सकेलय,

                टुकनी हा भर छलकत हे।

छत्तीसगढ़ी रीति नियम ये,

                मन हा सुग्घर कुलकत हे।।

छेरिक छेरा परब हमर हे,

                  भाग घलो लहरागे ना।

पूस माह के पुन्नी आगे........


देखव संगी चारों कोती,

                बने  घाँघरा  बाजत हे।

बोरा  चरिहा  टुकना बोहे,

             बहुते  लइका  नाचत हे।।

छेरिक छेरा नाच  दुवारी,

                 खोंची खोंची माँगे ना।

पूस माह के पुन्नी आगे.........


छंदकार :-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम (छ.ग.)

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मनोज वर्मा:


*अमृत ध्वनि छंद*


धरके झोला खॉंध मा, सब मॉंगत हे धान।

परब छेरछेरा सुघर, हरे धरम अउ दान।।

हरे धरम अउ, दान करौ शुभ, मंगल सब झन।

पसर पसर सब, हाथ बढ़ाके, बॉंटव अन धन।।

पावव अन धन, टुकनी चरिहा, सब भर भरके।

नाचव गावव, खुशी मनावव ,  झोला धरके।।


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

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 कुण्डलियाँ छंद


धर के झोला टोपली,ढोलक अउ मिरदंग।

परब छेरछेरा हबय,रेंगव टोली संग।।

रेंगव टोली संग, कहव सब छेरिक छेरा।

देही कोदो धान,घरो घर बिहना बेरा।।

कर लौ अन के दान,पसर सूपा भर भर के।

बलि ले माँगय दान,रूप हरि वामन धर के।।


कौशल कुमार साहू

छंद साधक  -4 'अ '

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: दोहा छंद- विजेन्द्र वर्मा


पाथे बड़ आशीष वो,करथे जे हा दान।

आय छेरछेरा परब,झोली भर दे धान।।


बढ़थे धन हा दान ले,अतका अब तो जान।

करले बढ़िया काम तँय,मिलही संगी मान।।


अन्न दान सब ले बड़े,होथे जग मा दान।

ज्ञानी ध्यानी संत हा,बात कहे हे जान।।


सब के आस्था के घलो,बड़का आय तिहार।

दान धरम कर के इहाँ,बाँटव मया दुलार।।


दान धरम ले होय जी,मनखे मन के नाम।

भूखे कउनो मत रहय,करलौ अइसन काम।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला- रायपुर

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*छेरछेरा तिहार*

जयकारी छंद


ये पुन्नी के सुघर तिहार।

माँगय लइका चाउँर दार।।

झोला धरके काँधे भार ।

आवय झँगलू सब घर सार।।


बरा फरा अउ अरसा चार।

लेवत सोनू गा बाजार ।।

धान बेच के मनय तिहार।

खुशी मनावय जी संसार।।


नवा साल के बडे़ तिहार।

फसल मिलय सुख के आधार।

गाडा़ गाडा़ कोठी धान।

मिहनत के फल पाव किसान।


दान धरम ला करय किसान।

सगरी जग के दाता जान।

पातर पनियर पसिया झोर।

ताकत मा नइहे कमजोर।


खूब दान करलौ जी आज।

सबझन माँगव नइये लाज।

कहिके छेरिक छेरा सार ।

धान सबो ला देवा ढार।


धनेश्वरी सोनी गुल

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 उल्लाला छंद - श्लेष चन्द्राकर

शीर्षक - छेरछेरा परब


भेद भुलाके लोग सब, करथें अन के दान जी।

परब छेरछेरा हरै, सत मा बड़ा महान जी।।


छोटे बडे़ किसान सब, खुश रहिथें बड़ आज गा।

सूपा ले अन दान कर, करथें सुग्घर काज गा।।


लइका बड़े सियान का, सबझिन बर ये खास हे।

येकर ले सबके जुड़ें, श्रद्धा अउ विश्वास हे।।


देवी माँ शाकंभरी, लेय रिहिन अवतार जी।

उनकर ये सम्मान के, हरै नीक त्यौहार जी।।


आज पूस पुन्नी हरै, भरथे मेला गाँव मा।

सकलाथें सब लोग हा, बर पीपर के छाँव मा।।


लोक परब ये खास गा, इखँर अलग पहिचान हे।

गरब सबो करथन अबड़, हमर राज के शान हे।।


संगी-साथी साथ मा, चिटको बखत बिताव गा।

बने छेरछेरा परब, जुरमिल सबो मनाव गा।।


छंदकार - श्लेष चन्द्राकर,

पता - खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा, महासमुंद (छत्तीसगढ़)

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दोहा


लइका मन माँगत हवे,माई कोठी धान।

भरके राखे हव चलो, कुछ तो कर लव दान।।


परब छेरछेरा सुनो,बछर पुरे ले आय।

छेरिक छेरा धान दे,कहि लइकन चिल्लाय।।


झोला टुकनी हे धरे,पारत हवे गुहार।

दान धरम करलो बने,छेरछेरा तिहार।।


बाजा गाजा हे धरे, लइका अऊ सियान।

भरके सूपा दव बने,हरय बड़े पुन दान।।


धरे मंजीरा हाथ में, ड़फली रहे बजाय।

जय जय जय श्री राम जी,कहि के गीत सुनाय।।


आगे मोर दुवार में, बेटी ओ कर दान ।

देबो बड़ आशीष ओ,होय तोर कल्याण ।।


केवरा यदु "मीरा "

राजिम

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कुंडलियाँ छंद

 (1 )


भेदभाव ला छोड़के, मानँव पूष  तिहार।

अन्न दान के हे परब, बाँटव मया दुलार ।।

बाँटव मया दुलार, जगत मा नाम कमाँलव ।

तज दव मांसाहार, दार अउ 

चटनी खालव ।।

अध्धी बोतल छोड़, तजव जी आज पाव ला ।

पबरित हवय तिहार, , भुलादव भेद भाव ला ।।


कुन्णलियाँ  ( 2) 

छेरिक छेरा गौटिया, दे कोठी के धान ।

मिलही ए संसार मा, तोला सुग्घर मान ।।

तोला सुग्घर मान, मिले अउ धन हा बाढे ।

दे चुरकी भर धान, दुवारी सब झन ठाडे़ ।।

निचट मचायें सोर, धान ला हेरिक हेरा ।

एके सुर नरियाँय , गौटिया छेरिक छेरा ।।


कुन्णलियाँ  ( 3 ) 

डंडा घर घर नाचके, पावँय पैसा धान ।

झूमँय माँदर ताल मा, गावँय गीत सुहान ।।

गावँय गीत सुहान, घरो घर हल्ला भारी ।

परब दान के आय, मनावँय सब नर नारी ।।

कतको मातँय मंद, खाथ हें कुकरा अंडा ।

हुडदंगी मन पोठ, पुलिस के खावँय डंडा ।।


पुरूषोत्तम ठेठवार 

छंदकार (सत्र -5 )

ग्राम - भेलवाँटिकरा 

जिला - रायगढ 

छत्तीसगढ

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मीता अग्रवाल: छेरछेरा 



कुण्डलियां छंद 


झोला टुकनी धर फिरे,टूरा टुरी सियान।

पूस पुन्नी के परब हे,करम धरम के मान।

करम-धरम के मान,फसल पाके हे भाई।

घर-घर माँगय आज,धान अन-धन दे दाई।

माई कोठी धान,बाँटथेआज सबो-ला।

अन्न दान के परब,मानथे भर-धर झोला।।


(2)


जावय संगी साथ मा,पूस पुन्नी माआस।

महापरब हे दान के,छत्तीसगढ़ म खास।

छत्तीसगढ़ म खास, नीक त्यौहार मनावय।

छेरिक छेरा गात,गाँव रद्दा  सकलावय।

बडे बिहनिया आज,घरों घर चाँउर  पावय।

लोक परब के मान,करें बर घर-घर जावय।।


 रचनाकार-मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़

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: चौपई छंद ( छेरछेरा )


पावन पूस महीना जान।

घर मा लावै मिंज किसान।

भरे अपन कोठी मा धान।

पूजा वोखर करे सियान।।1।।


रहे भरे जब घर मा धान।

पुन्नी ला दिन सुघ्घर मान।

खुश होके सब करथे दान।

कोनो पइसा कोनो धान।।2।।


तब ले मानय जान तिहार।

हँसी खुशी जम्मो परिवार।

राँधय चीला रोटी खाय।

कोनो छप्पन भोग बनाय।।3।।


मड़ई गाँव म घलो भराय।

मनखे मन सब देखे जाय।

जम्मो चीज बिके बर आय।

खेल खिलौना लइका लाय।।4।।


हावे कतको अउ इतिहास।

दान दक्षिणा होगिस खास।

आइस गा सब झन ला रास।

जम गे मनखे के विश्वास।।5।।


नाम छेरछेरा हे जान।

पाछू येखर हवे विज्ञान।

जे करथे ये दिन गा दान।

वोला दानी कहे सुजान।।6।।


हवे कथा अउ कतको लेख।

खोल घलो किताब ला देख।

कतको येमा हे मिनमेख।

वेद शास्त्र मा हे उल्लेख।।7।।


कतको करै पुण्य के स्नान।

कोनो करै दीप के दान।

कोनो गंगा तीरथ जाय।

कोनो नदिया ताल नहाय।।8।।


जान छेरछेरा ला मान।

"दीप" डपट के कर तैं दान।

पाबे जग मा तँय सम्मान।

तोर सबो करही गुणगान।।9।।


छन्दकार

कुलदीप सिन्हा "दीप"

कुकरेल सलोनी ( धमतरी )

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Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर मा देशभक्ति पूर्ण छंदबद्ध रचना


 गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर मा देशभक्ति पूर्ण छंदबद्ध रचना

घनाक्षरी-दिलीप वर्मा ( सोन चिरइया ) 


सोन के चिरइया मोर, पिंजरा म बंद रहे, 

तड़फत रहे सदा, होये ल अजाद रे। 

उड़ियाना चाह के भी, उड़ वो सके न कभू, 

काखर करा ले करे, भला फरियाद रे। 

सुत तो सपूत रहे, काम ले कपूत रहे, 

आपस म लड़ मरे, लालची औलाद रे। 

परदेशी कौवा आये, छीन-छीन सब खाये, 

डरा धमका के सबो, होवत अबाद रे। 


कौवा करे काँव-काँव, दिन रात हाँव- हाँव, 

सबो परेसान रहे, कइसे के भगाय रे। 

धात-धात माने नही, प्रेम भाषा जाने नही, 

चाबे बर दौड़ पड़े, तिर तार आय रे। 

सोन के चिरइया बर, फूल भेजे घर-घर, 

सबो एक साथ मिल, आवाज उठाय रे। 

धर के मशाल चले, आपस मा मिले गले, 

कौवा ला भगाये बर, उदिम बताय रे।


धीरे-धीरे एकता के, सूत म बँधाये सबो,  

कौवा ला भगाये बर, करे तइयार हे। 

कोनो शांति राह चल, करत आंदोलन हे, 

कतको लड़े लड़ाई, करे आर पार हे।  

मार काट मचे भारी, सालों साल युद्ध जारी, 

दूनो कोती मरे पर, कहाँ माने हार हे।

लाखों बलिदान दे के, हजारों के जान लेके,  

सोन के चिरइया बर,खोले संसार हे।  


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

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बेरा नव निरमान के-बलराम चन्द्राकर

 उल्लाला छंद के पहला प्रकार

जुलमिल रेंगव साथ ये, बेरा नव निरमान के।

मनुस-मनुस सम्मान के, हिन्द देश जय गान के।।


मुकुट हिमालय देश के, सागर के पहरा हवै। 

युग-युग ले पावन करत, गंगा के लहरा हवै।। 


सत्य अहिंसा न्याय बर, पुरखा तजिन परान ला।

बर्बर दुनिया ले बचा, राखिन हिन्दुस्तान ला।।


ऊँच-नीच के रोग हा, डँसिस फेर ये देश ला।

अइसन अवगुण हा हमर, बाँट डरिस परिवेश ला।।


चलौ ज्ञान विज्ञान ले, लाबो नवा बिहान फिर।

भेदभाव पाखंड हर, करथे अउ खाई गहिर।। 


नारी शिक्षा ले हमर, जग मा बाढ़त मान हर। 

बराबरी अधिकार ले, पढ़त हवै संतान हर।। 


करम-धरम के हर सबक, मन मा धारव नेक रे।

नियम देश कानून ला, मानव हो के एक रे। 


भ्रष्ट तंत्र के नाश कर, गढ़ौ सुघर भारत नवा। 

खावौ किरिया देश बर, शुद्ध रहै पानी हवा।। 


जुन्ना होगे बात हा, राजा लाट नवाब के। 

लोकतंत्र मा तुम इहाँ, मालिक हव हर ख्वाब के।। 


भाग्यविधाता अब तिहीं, नेता अधिकारी तिहीं। 

तँय किसान मजदूर हर, जिम्मेदारी मा तिहीं।


सबो दोष गुण के हमर, हर हिसाब पीढ़ी लिहीं। 

छोड़न स्वारथ भाव ला, छिहीं-बिहीं ये कर दिहीं।। 


बिरथ बड़ाई ले कभू, ककरो झन अपमान हो। 

मनखे बनौ सुजान रे, छोटे बड़े समान हो।। 


तोर मोर के मोह मा, पिसत हवै इंसान रे। 

राजनीति के खेल मा, अउ गड्ढा झन खान रे।। 


धरम पंथ अउ जाति ले, झगरा झंझट दासता। 

राष्ट्र धर्म सब ले उपर, चलन सबो ये रासता ।। 


परन करन हिलमिल रहन, सब मा एक परान रे।

विश्व पटल मा फिर बनै, भारत देश महान रे।। 


रचना :

छंद साधक - 

बलराम चंद्राकर भिलाई

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कुलदीप सिन्हा-   गणतंत्र पर्व  ( आल्हा छंद )


हमर देश हा देथे हरदम,

    विश्व शांति के सब ला मंत्र।

आवव जुरमिल आज मनाबो,

    गाँव शहर में हम गणतंत्र।।1।।


फहर फहर फहराबो झण्डा,

    बाद मनाबो हम त्योहार।

जन गण मन के गाबो गाना,

    बाँट सबो ला मया दुलार।।2।।


सरकारी कार्यालय मन मा,

    आज तिरंगा सब फहराय।

पहिली संझा प्रथम नागरिक,

    जनता ला संदेश सुनाय।।3।।


गाँव गाँव अउ शहर शहर मा

    घर आँगन मा दीप जलाय।

लइका सियान आज सबो मिल,

     मन ही मन मा खुशी मनाय।।4।।


दिवस आज गणतंत्र पर्व हे,

     हँसी खुशी के दिन ये आय।

येखर सेती चारों कोती,

    ढोल नगाड़ा सबो बजाय।।5।।


फहरे हावे अमर तिरंगा,

      इही देश के हरय ग शान।

हम सब भारत वासी मन ला,

     येखर ले मिलथे पहिचान।।6।।


इनला पाये बर गा कतको,

     करे हवे तन के बलिदान।

जेखर करजा कभू नहीं जी,

     छूट सकय गा हिन्दुस्तान।।7।।


अब में जादा का बतलाओं,

      सिरिफ करत हवँ में परनाम।

जेखर जिनगी मा तुम जानो,

      होय समय के पहिली शाम।।8।।


छन्दकार

कुलदीप सिन्हा "दीप"

कुकरेल सलोनी ( धमतरी )

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     शक्ति छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।
अहं जात भाँखा सबे लेस के।
करौं बंदना नित करौं आरती।
बसे मोर मन मा सदा भारती।

पसर मा धरे फूल अउ हार ला।
दरस बर खड़े मैं हवौं द्वार मा।
बँधाये  मया मीत डोरी  रहे।
सबे खूँट बगरे अँजोरी रहे।
बसे बस मया हा जिया भीतरी।
रहौं  तेल  बनके  दिया भीतरी।

इहाँ हे सबे झन अलग भेस के।
तभो हे घरो घर बिना बेंस के--।
पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।
अहं जात भाँखा सबे लेस के।

चुनर ला करौं रंग धानी सहीं।
सजाके बनावौं ग रानी सहीं।
किसानी करौं अउ सियानी करौं।
अपन  देस  ला  मैं गियानी करौं।
वतन बर मरौं अउ वतन ला गढ़ौ।
करत  मात  सेवा  सदा  मैं  बढ़ौ।

फिकर नइ करौं अपन क्लेस के।
वतन बर बनौं घोड़वा रेस के---।
पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।
अहं जात भाँखा सबे लेस के।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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बलिदानी (सार छंद)

कहाँ चिता के आग बुझा हे,हवै कहाँ आजादी।
भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।

बैरी अँचरा खींचत हावै,सिसकै भारत माता।
देश धरम बर मया उरकगे,ठट्ठा होगे नाता।
महतारी के आन बान बर,कौने झेले गोली।
कोन लगाये माथ मातु के,बंदन चंदन रोली।
छाती कोन ठठाके गरजे,काँपे देख फसादी।
भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।

अपन  देश मा भारत माता,होगे हवै अकेल्ला।
हे मतंग मनखे स्वारथ मा,घूमत हावय छेल्ला।
मुड़ी हिलामय के नवगेहे,सागर हा मइलागे।
हवा बिदेसी महुरा घोरे, दया मया अइलागे।
देश प्रेम ले दुरिहावत हे,भारत के आबादी।
भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।

सोन चिरइयाँ अउ बेंड़ी मा,जकड़त जावत हावै।
अपने मन सब बैरी होगे,कोन भला छोड़ावै।
हाँस हाँस के करत हवै सब,ये भुँइया के चारी।
देख हाल बलिदानी मनके,बरसे नैना धारी।
पर के बुध मा काम करे के,होगे हें सब आदी।
भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।

बार बार बम बारुद बरसे,दहले दाई कोरा।
लड़त  भिड़त हे भाई भाई,बैरी डारे डोरा।
डाह द्वेष के आगी भभके,माते मारी मारी।
अपन पूत ला घलो बरज नइ,पावत हे महतारी।
बाहिर बाबू भाई रोवै,घर मा दाई दादी।
भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

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    रोला छंद - बोधन राम निषादराज

(गणतन्त्र दिवस)

झंडा ऊँचा आज,अगासा फहरत हावै।
आजादी के गोठ,चिरइया आज सुनावै।।
जय जवान जय घोष,लगावौ जम्मो भाई।
सुग्घर  राहय  देश, मोर ये भारत  माई।।

संगी चलव  मनाव,आय  हे सुघ्घर  बेरा।
ए गणतंत्र तिहार,देख  ले  सोन  बसेरा।।
पावन मौका आय,झूम के  नाचौ   गावौ।
भूलौ झन उपकार,आज सब खुशी मनावौ।।

लोकतन्त्र  के  पर्व, मनावौ   भारतवासी।
समझौ रे अधिकार,बनौ झन कखरो हाँसी।।
जात-पात के संग,करौ झन आज लड़ाई।
झन हो लहू लुहान,रहौ सब भाई-भाई।।

छंदकार - बोधन राम निषादराज
सहसपुर लोहारा, जिला - कबीरधाम
(छत्तीसगढ़)
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 मनोज वर्मा: गणतंत्र दिवस
चौपई छंद--- तिरंगा


लहर लहर लहराय तिरंगा, भारत माता के हे शान।
जुरमिल करबो आवव हम सब, हिन्द देश के जय जय गान।।

तीन रंग ले सजे तिरंगा, देथे सुग्घर ये संदेश।
एकता अखंडता संस्कृति हे,  हमर देश के परिवेश।।

केसरिया सादा हरियर अउ, संग चक्र कहिथे ये बात।
ताकत साहस धरम शांति शुभ, बढ़त रहय नित भारत मात।।

हमर तिरंगा ऊॅंचा निश दिन, रहय सदा फहरे आगास।
बनय विश्व गुरु रहिके अगुवा, हावय सबझन के ये आस।।

होय हास अब तोर कभू झन, बढ़य जगत मा रोजे मान।
जुरमिल करबो आवव हम सब, हिन्द देश के जय जय गान।
लहर लहर लहराय तिरंगा, भारत माता के हे शान।

मनोज कुमार वर्मा
छंद साधक सत्र 11

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आल्हा छंद- विजेन्द्र वर्मा

आजादी के मोल समझ के,अपने मन ला खुदे टटोल।
लोकतंत्र के रक्षा खातिर,आवव अपने बुध ला खोल।।

जनम भूमि हा सब ले बड़का,होथे येला तुम सब मान।
येकर रक्षा खातिर संगी,चाहे जावय अब तो जान।।

लहू बहे हे पुरखा मन के,अमर रहय ओकर बलिदान।
भारत माँ के सेवा बर जी,जेन गँवाये अपने जान।।

जात पात सब छोड़ छाड़ के,मनखे बन जव एक समान।
देश तभे आगू बढ़ही जी,मनखे बनहू तभे महान।।

अपने बर तो सब जीथे सुन, देश धरम बर जीना सीख।
दया मया ले काम करव अब, कोनों माँगव झन अब भीख।।

राजनीति जे करथे बिक्कट,खाथे भक्कम रिश्वत रोज।
सेवा खाली झूठ लबारी,बन के गिधवा करथे भोज।।

पद पइसा के भूखे हाबय,जेन भरत अपने घर बार।
सरम करम सब बेच खात हे, अइसन मनखे ला धिक्कार।।

अगुवा बनके रेंगव संगी,लावव अब तो नवा बिहान।
तोर मोर के चक्कर छोड़व,तभे हमर बनही पहिचान।।

विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव(धरसीवाँ)
जिला-रायपुर

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घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

आज बिहना के होती, एती वोती चारो कोती।
तन मन मा सबे के, देश भक्ति जागे हवै।
खुश हे दाई भारती, होवय पूजा आरती।
तीन रंग के तिरंगा, गगन मा छागे हवै।
दिन तिथि खास धर, आशा विश्वास भर।
गणतंत्रता दिवस, के परब आगे हवै।
भेदभाव ला भुलाके, जय हिंद जय गाके।
झंडा फहराये बर, सब सँकलागे हवै।

खैरझिटिया

कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

जय जय भारत देश के, जय जय हिंदुस्तान।
जय जय जय माँ भारती, जय सैनिक बलवान।
जय सैनिक बलवान, तान के रेंगें सीना।
दै बैरी ला मात, तभे सम्भव हे जीना।
जेन दिखाये आँख, ओखरो कर देथे छय।
सीमा के रखवार, वीर सैनिक मनके जय।

जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

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जम्मो झन ल गणतंत्र दिवस के हार्दिक 
बधाई जी

कहिथें    जेला   देस  के,    संविधान   इन्सान।
आजे  के दिन  ताय जी,  पारित करिन मितान।।
पारित  करिन  मितान,  नियम  कानून बनावत।
जात  पात  अउ  धरम  बीच  मतभेद  मिटावत।।
कोन   आज    कानून,  बने  अस  मानत रहिथें।
फेर   दिवस  गणतंत्र,  मनावत  हन सब कहिथें।।

आजादी    के    मायने,    हो   गे   हे  स्वच्छंद।
कहना     वंदे    मातरम्,    करवावत   हें   बंद।।
करवावत   हें    बंद,   तिरंगा   तक   फहराना।
चुका  धरम   निरपेक्ष   होय  के  तँय  हरजाना।।
बइहा   गे   हें   काय,   इहाँ   तबका   आबादी।
शायद  लोगन  मान,   इही   मतलब  आजादी।।

एके बिनती    मोर  हे,   अनुशासन   झन   टोर।
मनखे   मनखे  एक  एँ,  सब  सँग  नाता  जोर।।
सब  सँग  नाता  जोर,  समझ  भुँइया-महतारी।
राखन   एकर  लाज,  काज  करके  हितकारी।।
प्रभु तिर मँय कर-जोर ,  माँगथँव   माथा  टेके।
संविधान   के  मान  रखन,  बस  विनती  एके।।


सूर्यकान्त गुप्ता
सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

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*सारछंद* 
*गणतंत्र तिरंगा प्यारा*  

भारत भुइयाँ पुण्य धरा हे,बोली आनी बानी।
मानव हित गणतंत्र बने हे,दिल हे हिन्दुस्तानी ।।

धरे तिरंगा अपन हाथ में,गीत देश के गाबो।
मान करें बर मर मिटबो सब,झंडा ला फहिराबो।।

शान देश के इही तिरंगा,सरी जगत मा न्यारा।
हमर भेष पहिचान इही हे,तीन रंग हे प्यारा।।

मान करव सम्मान करव सब, बाँटव भाई चारा।
न्याय ज्ञानअउ संविधान हे,जनता जिनगी धारा।।

झंडा ऊंचा रहे सदा जी,जब्बर छाती तानों।
हवे हमर पहिचान इही जी,सब ले ऊपर मानों ।।

पहरा देवत रक्षक मन जी,जंगल सकरी घाटी। 
वंदेमातरम जयहिन्द जी,चंदन  भारत माटी।।

परब बड़े गणतंत्र दिवस हे,झंडा ला फहिराबो।
सज-धज घर-घर दीप जलाबों,सेव बूंदी खाबों।।

जुर-मिल रहिबो जात धरम तज,मार भगाबो घाती।
केसरिया बाना धर घूमव,जरे मया के बाती।।

 *रचनाकार-डाॅ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़*
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ज्ञानू: रूपमाला छंद 

देशहित बर काम करले, तोर होही नाम।
छोड़ मौका झन कभू तँय, हाथ सुग्घर काम। 
तोर हावय हाथ मा कर, नाम या बदनाम।
मान पाथे जेन करथे, देशहित बर काम।।

छंदकार- ज्ञानुदास मानिकपुरी 
चंदेनी- कबीरधाम
छ्त्तीसगढ़
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 डी पी लहरे: सार छंद गीत

हमर देश के शान तिरंगा,
झंड़ा ला फहराबो।
चलव चलव जुरमिल के संगी,
तन मन ला हरसाबो।।

हमर देश के संविधान हा,
हावय सबले पावन।
किसम किसम अधिकार मिले हे
हम सब पाये हावन।।

रहय एकता हमर बीच मा,
भाई चारा लाबो।
हमर देश के शान तिरंगा,
झंडा ला फहराबो।।

जान गँवाइन भारत माँ बर,
कतको वीर सिपाही।
आजादी तब पाये हावन,
हे संसार गवाही।।

अमर वीर बलिदानी मनके,
गाथा ला हम गाबो।
हमर देश के शान तिरंगा,
झंडा ला फहराबो।।

द्वारिका प्रसाद लहरे
कवर्धा छत्तीसगढ़

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 ज्ञानू: सोरठा छंद 

आज दिवस गणतंत्र, चलौ मनाबो मिल हमन।
सबले बड़का मंत्र, सत्य अहिंसा देशहित।।

करौ सदा उपकार, सबले बड़का मंत्र ये।
बाँटव मया दुलार, भाईचारा एकता।।

छोड़ राग अउ द्वेष, बाँटव मया दुलार सब।
सर्वोपरि हे देश, त्यागव निज के स्वार्थ ला।।

हम सब बर हरहाल, सर्वोपरि हे देश जी।
बइरीमन बर काल, हितवा बर मितवा बनौ।।

इही समय के माँग, बइरीमन बर काल बन। 
खींचै कोनों टाँग, ओखर खाल उखेड़ दे।।

ज्ञानुदास मानिकपुरी 
चंदेनी- कबीरधाम
छ्त्तीसगढ़
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हमर तिरंगा (लावणी छंद)
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हमर तिरंगा आसमान मा,
            लहर-लहर लहरावत हे।
सुख सुराज के सुग्घर सुर ला,
             सोन चिरइया गावत हे।।

कतका बलिदानी होये हे,
             अपन देश के माटी मा।
अमर तिरंगा सोझ गड़ा दिस,
              ऊँचा पर्वत घाटी मा।।
अइसन वीर जवान सबो के,
             गाथा बड़ मनभावत हे।
हमर तिरंगा आसमान मा..............

तीन रंग के धजा-पताका,
              केशरिया  साजे ऊपर।
सादा  रंग  शांति  संदेशा,
           खुशहाली लाथे हरियर।।
आन बान सम्मान सबो बर,
             दुनिया मा बगरावत हे।
हमर तिरंगा आसमान मा...............

हमर देश के शान तिरंगा,
               निसदिन गुन एखर गाबो।
मान रखेबर ये भुइयाँ के,
               चलौ सँगी मर मिट जाबो।।
रक्षा खातिर भारत माता,
               आवव आज बुलावत हे।।
हमर तिरंगा आसमान मा...............
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छंदकार:-
बोधन राम निषादराज"विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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Monday, January 25, 2021

मोर बेटी भारती हीरा ये-जगदीश साहू


 

. मोर बेटी भारती हीरा ये-जगदीश साहू

दोहा

हावय  बेटी भारती, हीरा कस अनमोल।

दुनिया भर मा नाम हे, बोलय मीठा बोल।।


बेटी के अभियान मा,  जुड़े हवय जी नाम।

बेटी के सम्मान बर, करथे सुग्घर काम।।


जाके जम्मो गाँव मा, देवत हे सन्देश।

बेटा बेटी एक हे, दूनो हरथे क्लेश।।


बेटा घर के मान हे, बेटी घर के शान।

बेटा कुलदीपक हरे, बेटी दय पहचान।।


बेटा तारे एक कुल,  अपन करय  उद्धार। 

बेटी दू कुल तारथे, मइके अउ ससुरार।।


किस्मत वाला के करय, बेटी पूरा साध।

मारव झन गा कोंख मा, होथे बड़ अपराध।।


जगदीश "हीरा" साहू

कड़ार, भाटापारा

Sunday, January 24, 2021

बेटी आल्हा छंद(विजेन्द्र वर्मा)


 

राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर


बेटी आल्हा छंद(विजेन्द्र वर्मा)


भागजनी घर बेटी होथे,नहीं लबारी सच्चा गोठ।

सुन तो वो नोनी के दाई,बात कहत हौं अब मँय पोठ।।


अड़हा कइथे लोगन मोला,बेटा के जी राह अगोर।

कुल के करही नाँव तोर ये,जग ला करही सुघर अँजोर।।


कहिथँव मँय अँधरागे मनखे,बेटी बेटा ला झन छाँट।

एक पेड़ के दुनों डारा,दुआ भेद मा झन तँय बाँट।।


सोचव बेटी नइ होही ते,ढोय कोन कुल के मरजाद।

अँचरा माँ के सुन्ना होही,बोझा अपने सिर मा लाद।।


आवव अब इतिहास रचव जी,गढ़व सुघर जिनगी के राह।

दुनिया दारी के बेड़ी ला,तोड़व अब तो अइसन चाह।।


पढ़ा लिखा के बेटी ला अब,तुमन सुघर देवव सम्मान।

जानव अब बेटी ला बेटा,दव सपना ला उँकर उड़ान।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

अमृतध्वनि छंद-बोधनराम निषाद

 *अमृतध्वनि छंद-बोधनराम निषाद


(1) सकरायत(संक्रांति)


आथे ये पहिली परब,नवा बछर जब आय।

दिन ये चौदह जनवरी,सबके मन ला भाय।।

सबके मन ला,भाय नहा के,बड़े बिहनिया।

सुरुज देव के, करै  आरती, दीदी  भइया।।

तिल औ गुड़ के, मुर्रा लाड़ू, मिलके खाथे।

खुशी मनाथे,शुभ सकरायत,शुभ दिन आथे।।


(2) बसंत पंचमी


हरियाली  चारों  डहर, आथे  माघ बसंत।

सुघर मनाथे पंचमी, जुड़  के  होथे अंत।।

जुड़  के  होथे, अंत  घाम हा, बने सुहाथे।

मातु शारदा,जनम परब ला,सबो मनाथे।।

होली डाँड़ा, मुहुरत  होथे, बड़ खुशहाली।

दिखथे भुइयाँ,सरग बरोबर,औ हरियाली।।


बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कवर्धा

मातु पिता भगवान हे गीत :- कुकुभ छंद

 मातु पिता भगवान हे

गीत :- कुकुभ छंद

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मातु पिता भगवान हमर जी,

              सेवा जप तप करलौ जी।

एखर कोरा सरग बरोबर,

              आवव पइँया परलौ जी।।


जूड़ छाँव आमा छइँहा कस,

               महतारी  के   अँचरा हे।

भोग बरोबर जूठन लगथे,

          अमरित कस जी सथरा हे।।

तीरथ कहाँ-कहाँ जी जाहू,

                 धुर्रा  माथा  धरलौ जी।

एखर कोरा सरग बरोबर............


पाप पुण्य के लेखा जोखा,

              इहें भुगतना परथे जी।

धरम करम हे हाथ सबो के,

            मातु-पिता सब हरथे जी।।

सोना चाँदी माटी हे सब,

               पुण्य गठरिया भरलौ जी।

एखर कोरा सरग बरोबर.........


दुख के छइँहा झन आवय जी,

               बुढ़त काल के बेरा मा।

महल अटारी नइ चाही जी,

               गुजरै दिन इहि डेरा मा।।

आँसू छलकय कभू नहीं झन,

              आवव चरन पकड़लौ जी।

एखर कोरा सरग बरोबर........

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छंद साधक-5

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

माता सरस्वती(अमृतध्वनि छंद)

 माता सरस्वती(अमृतध्वनि छंद)


मन के अँधियारी मिटा,करके ज्ञान अँजोर।

जय हो माता सरस्वती,पइँया लागँव तोर।।

पइँया लागँव, तोर चरन के,मँय गुन गावँव।

दे अशीष ला,मइया जिनगी,सफल बनावँव।।

तोर आसरा,शब्द रचत हँव,साधक बन के।

इच्छा  पूरन, करबे  मइया, मोरो  मन  के।।



बोधन राम निषादराज

नेता जी को समर्पित( दोहा छंद)-कुलदीप सिन्हा


 "नेता जी को समर्पित( दोहा छंद)-कुलदीप सिन्हा

                    "दोहा छंद"


नेता सुभाष चंद्र की, हरय जयंती आज।

जेन करिस हे देश के, स्वतंत्रता के काज।।1।।


नेता जी के नाम ले, जानय जिनला देश।

योगदान गा देश बर, जेखर हवे विशेष।।2।।


मोला देवव खून जी, करवँ देश आजाद।

अइसन नारा दे गइस, आज करत हन याद।।3।।


आजाद हिंद फौज की, करय गठन जे जान।

हवे देश ला गा बहुत, जेखर नाम गुमान।।4।।


अपन आप के कर गइस, जेन स्वयं बलिदान।

नइ जानव ते जान लो, रहो नहीं अनजान।।5।।


अइसन त्यागी वीर ला, नमन करत हे देश।

जेन उड़ै आगास में, धर त्यागी के वेश।।6।।


कुलदीप सिन्हा "दीप"

कुकरेल सलोनी ( धमतरी )

सुभाष चंद्र बोस-उल्लाल :(15-13)-बलराम चंद्राकर

उल्लाल :(15-13)-बलराम चंद्राकर

आर! भारत माता के सुघर, मान बढ़ा तैं काम ले।

जग भर मा अब फहरै ध्वजा, हाथ-हाथ मा थाम ले।।


चल संग मया के गीत ला, गा ले संगी मोर रे।

निक दया धरम के गोठ ला, बगरावत चहुँओर रे ।।


तँय ज्ञानवान बुधियार बन, साध सुघर विज्ञान ला।

झन जात-पात के भेद मा , जोड़ कभू भगवान ला।।


घर-घर मा हर परिवार मा, सत नियाव के गोठ हो।

सुख चैन बसे मन मा सदा, धन-वैभव ले पोठ हो।।


हर बूँद लहू के देश बर, बलिदानी बन जाय जी।

जग बैरी हिम्मत देख के, गजब सुकुड़दुम खाय जी।।


ये मंदिर मस्जिद चर्च के, झन गैरी झगरा मता।

गुरु ग्रंथ वेद के सीख ला, बने-बने सब ला बता।।


वो भाव विचार तियाग दे, खण्ड करै जे देश ला।

तज बनावटी जिनगी सखा, शुद्ध राख परिवेश ला।।


हे संविधान सब ले उपर, जन-जन के कल्यान बर। 

ये अमर जोत जलते रहै, आन बान अउ शान बर।। 


रचना:

छंद साधक-

बलराम चंद्राकर भिलाई

Friday, January 15, 2021

त्रिभंगी छंद-मनोज वर्मा

 त्रिभंगी छंद-मनोज वर्मा


हे वीणापाणी ,हवव अज्ञानी ,ज्ञान जोत ला  ,लाव इहाँ।

तँय सुन ले मइया, प्रेम करइया ,शरन तोर मँय ,पाँव उहाँ।

मँय करलव सुरता ,दुख के हरता मया प्रेम के ,गाँव मिले।

आ माँ बइठ गले ,सुर राग मिले, गीत ल गुरतुर ,छाँव मिले।

हे जगत बनइया, बुद्धि धरइया, पाठ लिखइया ,पाँव परौ।

मँय हवव अज्ञानी ,तँय हँस दानी ,मोरे दुख सब ,कष्ट हरौ।

कब आहूंँ मइया ,धीर बँधइया, मया दया के ,डोर बँधै।

कर किरपा माता, जगत विधाता, मइया सबके ,काज सधै।

मनोज वर्मा

लावणी छंद - बोधन राम निषादराज

 लावणी छंद - बोधन राम निषादराज

"सकरायत"


पहली परब नवा बच्छर के,

                    सकरायत ह कहावत हे।

छोड़ दक्षिणायन ला वो हा,

                    उतरायन मा आवत हे।।


का ले जाही का दे जाही,

                कखरो समझ न आवय जी।

मानत हावय पुरखा हमरो ,

                 संगम आज नहावय जी।।

सुत उठ दर्शन सुरुज देव ला,

                    लोटा नीर चढ़ावत हे।

छोड़ दक्षिणायन ला वो हा,

                   उतरायन मा आवत हे।


दान पुण्य के मुहरत हावय,

                   शुभ दिन सकरायत होथे।

तीली गुड़ के लड़ुवा बाँटय,

                     नवा पतंग मया बोथे।।

सुग्घर लाली सुरुज देव हा,

                      बिहना ले बगरावत हे।

छोड़ दक्षिणायन ला वो हा,

                       उतरायन मा आवत हे।


लहर लहर लहरावत हावै,

                      चारो खूँट अँजोरत हे।

मकर डहर ले कर्क डहर बर,

                      देखव सुकवा बगरत हे।।

मीठ मीठ लागे जाड़ा हा,

                       मनखे सब मुस्कावत हे।

छोड़ दक्षिणायन ला वो हा,

                       उतरायन मा आवत हे।


छंद साधक - 5

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम (छत्तीसगढ़)

अरविंद सवैया - बोधन राम निषादराज

 अरविंद सवैया - बोधन राम निषादराज

*सकरायत*


सकरायत जावत हे अब तो,सब जाड़ घलो तिरियावत जाय।

बिहना उठके नदिया जल में,बहिनी भइया मन देख नहाय।।

लड़ुवा बड़ सुग्घर तील बने,सब मंदिर मा अब भोग लगाय।

कर दान कमावय पुण्य सबो,दुख दारिद पाप घलो मिट जाय।।


छंद साधक-5

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)

Wednesday, January 13, 2021

स्वामी विवेकानंद- विजेन्द्र वर्मा

 स्वामी विवेकानंद- विजेन्द्र वर्मा

(दोहा छंद)


स्वामी जी के गुण धरे,जिनगी बड़ सुख पाय।

ज्ञान जोत हा जब जले,दुख हा भागे जाय।।


भाईचारा बाँट लव,भेद करव ना कोय।

मनखे मनखे एक हो,इही बीज सब बोय।।


हठधर्मी अब मत करव,आज मान लव बात।

खून खराबा ले सदा,मनखे खाथे मात।।


कटुता का अब नाश हो,गढ़े नवा सब राह।

एक लक्ष्य सब के रहय,रखौ यहीं सब चाह।।


मानवता जग मा रहय,मिले नेक ये सीख।

खुशी रहै मनखे सबो,माँगे ना जी भीख।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

Monday, January 11, 2021

अमृतध्वनि छंद*:-

 *अमृतध्वनि छंद*:-

इड़हर(कढ़ी)


खाले इड़हर तँय सँगी,अम्मट मुँह चटकार।

पान  कोचई  काट के, बेसन  ओमा डार।।

बेसन ओमा, डार फेंट के, गढ़ ले भजिया।

या चीला कस,सेंक घलो ले,तँयहा बढ़िया।।

पानी  अँधना, ऊपर पैना, रख झझियाले।

दही मही मा,राँध बने फिर, इड़हर खाले।।



बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कवर्धा

ग्यानु-सरसी छंद

 ग्यानु-सरसी छंद


छलत रही दुनिया मा कब तक, संगी मोर किसान।

नाम बड़े अउ दर्शन छोटे, भुइँया के भगवान।।


करके लागा बोड़ी बपुरा, करथे खेती काम।

तरस एक दाना बर जाथे, अनदाता बस नाम।।


बीज भात अउ खातू महँगा, धरे मूड़ ला रोय। 

बेमौसम बरसा के सेती, नास फसल मन होय।।


होवय बरसा चाहे गरमी, लागय चाहे जाड़।

रोज कमाना काम इँखर हे, टूटत ले जी हाड़।।


भूखे प्यासे कई दिनन ले, बपुरामन सह जाय।

साथ देय जब ठगिया मौसम, तब दाना कुछ पाय।।


बिचौलियामन नजर गड़ाये, रहिथे रस्ता रोक।

औने पौने भाव म लेके, उनमन बेचय थोक।।


हे किसान मन के सेती जी, फलत फुलत व्यापार।

अँधरा बहरा देख बने हे, तब्भो ले सरकार।।


लदे पाँव सिर ऊपर कर्जा, बनके गड़थे शूल।

अइसन मा का करही बपुरा, जाथे फाँसी झूल।।


सुख सुविधा हा सदा इँखर ले, रहिथे कोसों दूर।

भूख गरीबी लाचारी मा, जीये बर मजबूर।।


करव भरोसा झन कखरो तुम, बनव अपन खुद ढ़ाल।

अपन हाथ मा जगन्नाथ हे, तभे सुधरही हाल।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

शक्ति छंद- मोर मयारू 122 122 122 12

 शक्ति छंद- मोर मयारू

122   122   122   12

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चले आ मयारू,हमर गाँव मा।

इहाँ मोर पइरी,बजे पाँव मा।।

गजब तोर सुरता,सतावत रथे।

गुनत रात दिन हा,पहावत रथे।।


न दिन हा सुहावै,नहीं रात हा।

करौं का मयारू,बनै बात हा।। 

बना दे ठिकाना,सुघर ठाँव मा।

चले आ मयारू,हमर गाँव मा।।


भुलावै नहीं रे, मया के डगर।

कहाँ जाहुँ संगी,कहाँ हे बसर।।

लगाले न सँग मा,तुँहर नाँव मा।

चले आ मयारू,हमर गाँव मा।।


दयावान   तैंहा, दिखादे  दया।

बलाले भुला झन,बचाले मया।। 

पिरोहिल अगोरत,रहूँ छाँव मा।

चले आ मयारू,हमर गाँव मा।।

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छंदकार:-

बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा,कबीरधाम

कज्जल छंद- भ्रूण हत्या झन करव*

 *कज्जल छंद- भ्रूण हत्या झन करव*


बेटी हवय बड़ा अमोल।

    येला कखरो सँग न तोल।।

         जग मोहय येखर ग बोल।

              ए लक्ष्मी ये भेद खोल।।१।।

बेटी - बेटा भेद काय।

     बेटा जब ना काम आय।।

          बेटी अपन फरज निभाय।

                सेवा कर बेटा कहाय ।।२।।

देवी के ये हे अवतार।

    पाल -पोस के करय पार।।

         "जलक्षत्री" के सुन पुकार।

                कोख म येला झन ग मार ।।३।।


*छंदकार - अशोक धीवर "जलक्षत्री"*

ग्राम -तुलसी (तिल्दा-नेवरा)

जिला- रायपुर (छत्तीसगढ़)

सचलभास क्र. - ९३००७१६७४०

जी नइ बाचय*(सुखी सवैया)

 *जी नइ बाचय*(सुखी सवैया)


जुड़हा ग हवा ढुढरावत हे अब जी नइ बाँचय लागत हावय।

कतको कथरी लदके रहिबे बड़ घेख्खर जाड़ तभो ग जनावय।

कुहरा म ढँकाय रथे बिहना अउ बादर ओंट सुरूज लुकावय।

चिटको अँगना नइ आवत हे कतको झन घाम बबा ल बलावय।1


सिपचावव गा लकड़ी खरसी झट फूँकव जी कउड़ा ल दगावव।

लमिया तब हाथ ल सेंकव जी  तन आँच परे बढ़िया सुख पावव।

लइका मन थोकुन दूर हटौ तिर मा बइठे झन तो इँतरावव।

छटके लुक हा चट ले जरथे पहिरे कपड़ा ल सकेल बँचावव।2


चोवा राम 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

उल्लाला छंद- वासन्ती वर्मा*

 *उल्लाला छंद- वासन्ती वर्मा* 


               *खान* - *पान*


नुनिया भाजी अउ दही,संग चना के दार जी।

मिरचा लसून कूट के,छँउका देंव बघार जी।।1।।


चाँउर के फुलवा बने,रोटी गजब मिठाय जी।

मिरचा चटनी मा बने,नोनी बाबू खाय जी।।2।।


तिखुर घाटेंव मूंग के,गुर अउ शक्कर डार जी।

भईया-ददा आय हें,तीजा म लेनहार जी।।3।।


बासी खाबो खेत मा,का पानी का घाम जी।

जुरमिल के निपटाय मा,बनथे सब्बो काम जी।।4।।


लाली भाजी लान के,झटकन टोर निमार जी।

बीजा झुनगा संग मा,लसून मिरचा डार जी।।5।।


 रोटी अँगाकर हा  बनही,लानव केरा पान जी।

चुरोथें ग छेना गोरसी ,खाय लइका सियान जी।।6।।


 बनायें रोटी गा पपची,हाथ अब्बड़ पिराय जी।

 पागें जी गुर के चासनी,निचट पपची मिठाय जी।।7।।


चिला-चटनी बरा छोड़ के,लइकन पिज्जा खाय रे।

देख वसन्ती मुड़ ला धरे,कइसे दिन अब आय रे।।8।।


     - वसन्ती वर्मा, बिलासपुर

Monday, January 4, 2021

अमृतध्वनि छंद*-बोधनलाल निषाद

 *अमृतध्वनि छंद*-बोधनलाल निषाद


(1) गुरु वंदना

चरनन माथा टेक के,गुरुवर करौं  प्रणाम।

महिमा तोर अपार हे,पूजँव बिहना शाम।।

पूजँव बिहना,शाम आरती, गुन ला गावँव।

तोर चरन के, धुर्रा माटी, माथ लगावँव।।

मन मन्दिर मा, सदा बिराजौ,दे के दरशन।

गंगा जल कस,बरसत आँसू,धोवँव चरनन।।


(2)

दरशन के  आशा लगे, गुरुवर  पूरनकाम।

महिमा अमित अपार हे,जग मा तुँहरे नाम।।

जग मा तुँहरे, नाम अबड़ हे, बड़ गुनधारी।

सत्  के  डोंगा, पार  लगैया,   तारनहारी।।

सेवा मा हे,तुँहर सदा गुरु,तन-मन जीवन।

सुत उठ पावँव,निसदिन मँय तो,तुँहरे दरशन।।


बोधन राम निषादराज

सहसपुर लोहारा(कबीरधाम)

दोहा दुमछल्ला*)-चोवाराम वर्मा बादल

 


*(दोहा दुमछल्ला*)-चोवाराम वर्मा बादल



जाड़ा लेके आय हे, अंग्रेजी नव वर्ष।

नाचत हे देशी चढ़ा, देखव बेटा हर्ष।।

पर्स हा होगे खाली।

पियाही कोन ह काली।


खाना पीना नाचना, अब तिहार पहिचान।

चढ़ बइठे हे मूँड़ मा, पश्चिम के शैतान।।

गरीबी खड़े दुवारी।

संग मा हे लाचारी।


परबुधिया के शान हा, बाढ़े हाबय आज।

कभू अपन संस्कार मा, करतिच अइसन नाज।।

गुलामी हावय जकड़े।

घेंच ला कसके पकड़े।


खुश होना नइये मना, असली हो आनंद।

बेढंगा सब चाल हा, होना चाही बंद।।

मनै रोज्जे देवारी।

ईद क्रिसमस सँगवारी ।


चोवा राम 'बादल '

हथबन्द, छत्तीसगढ़

सोरठा छंद -ज्ञानू मानुकपुरी

 सोरठा छंद -ज्ञानू मानुकपुरी


सहिके खुद जी धूप, रखथे हम ला छाँव मा।

ददा खुदा के रूप, महिमा ओखर का कहँव।।


इही हमर भगवान, कोरा मा सुख शाँति हे।

गावय बेद पुरान, दाई के महिमा अबड़।।


लेके गुरुके ज्ञान, रंग करम के खुद भरव।

रूप दिए भगवान, जनम दिए दाई ददा।।


कोन दिखाये राह, जग अँधियारा गुरु बिना।

जिनगी लगे अथाह, डेरा माया मोह के।।


सादर मोर प्रणाम, गुरुवर अउ दाई ददा।

बनथे बिगड़े काम, इँखरे किरपा ले इहाँ।।


ज्ञानु मानिकपुरी

Friday, January 1, 2021

छंद के छ परिवार की प्रस्तुति - नवा बछर विशेषांक

छंद के छ परिवार की प्रस्तुति - नवा बछर विशेषांक

बधाई नवा बछर के(सार छंद)


हवे  बधाई   नवा   बछर   के,गाड़ा  गाड़ा  तोला।

सुख पा राज करे जिनगी भर,गदगद होके चोला।


सबे  खूँट  मा  रहे  अँजोरी,अँधियारी  झन  छाये।

नवा बछर हर अपन संग मा,नवा खुसी धर आये।

बने चीज  नित नयन निहारे,कान सुने सत बानी।

झरे फूल कस हाँसी मुख ले,जुगजुग रहे जवानी।

जल थल का आगास नाप ले,चढ़के उड़न खटोला।

हवे  बधाई  नवा  बछर  के,गाड़ा  गाड़ा  तोला----।


धन बल बाढ़े दिन दिन भारी,घर लागे फुलवारी।

खेत  खार  मा  सोना  उपजे,सेमी  गोभी  बारी।

बढ़े बाँस कस बिता बिता बड़,यश जश मान पुछारी।

का  मनखे  का  जीव जिनावर, पटे  सबो सँग तारी।

राम रमैया कृष्ण कन्हैया,करे कृपा शिव भोला-----।

हवे  बधाई  नवा  बछर के,गाड़ा  गाड़ा  तोला------।


बरे बैर नव जुग मा बम्बर,बाढ़े भाई चारा।

ऊँच नीच के भेद सिराये,खाये झारा झारा।

दया मया के होय बसेरा,बोहय गंगा धारा।

पुरवा गीत सुनावै सबला,नाचे डारा पारा।

भाग बरे पुन्नी कस चंदा,धरे कला गुण सोला।

हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला---।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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घनाक्षरी-जीतेंन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"


बिदा कर गाके गीत,बारा मास गये बीत।

का खोयेस का पायेस,तेखर बिचार कर।।

गाँठ बाँध बने बात,गिनहा ला मार लात।

अटके ला बीस के जी, इक्कीस म पार कर।।

बैरी झन होय कोई,दुख मा न रोय कोई।

तोर मोर छोड़ संगी,सबला जी प्यार कर।।

दुनिया म नाम कमा,सबके मुहुँ म समा।

बढ़ा मीत मितानी ग,दू ल अब चार कर।।


अँकड़ गुमान फेक,ईमान के आघू टेक।

तोर मोर म जी मन, काबर सनाय हे।।।

दुखिया के दुख हर,अँधियारी म जी बर।

कतको लाँघन परे, कतको अघाय हे।।।

उही घाट उही बाट,उही खाट उही हाट।

उसनेच घर बन,तब नवा काय हे।। ।।।।

नवा नवा आस धर,काम बुता खास कर।

नवा बना तन मन,नवा साल आय हे।।।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

बाल्को,कोरबा

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 राजेश निषाद: चौपाई छंद।।

सुनलव बहिनी सुनलव भाई, नवा बछर के हवय बधाई।

एक जगह मा सब सकलबो,मिलके खुशियाँ हमन मनाबो।।


उठके देखव बिहना बेरा,मन के मिटगे हवय अँधेरा।

चिरई चिरगुन छोड़त डेरा, आगे हावय नवा सबेरा।।


सुख दुख हमरो कतको आथे,नवा बछर मा सबो भुलाथे।

मन के भेद सबो झन छोड़ो,सबले सुघ्घर नाता जोड़ो।।


 सेवा करव ददा अउ दाई, सुनलव सबझन बहिनी भाई।

करही जउने हर बड़ सेवा,पाही वोहर अड़बड़ मेवा।।


छोड़व सब गा दुनिया दारी,बोलव झन गा झूठ लबारी।।

कर लव पूजा दीप जलाये,मोह मया मा हवव भुलाये।।


मिलके राहव भाई चारा, छोड़व मनके भेद किनारा।

बाँटव मिलके सबो मिठाई,नवा बछर के हवय बधाई।।


रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर छत्तीसगढ़।

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 नवा बछर दोहा - बोधन राम निषादराज


नवा बछर के आय ले,मन मा खुशी समाय।

नवा नवा रद्दा धरव,काम सफल हो जाय।।


नवा सोंच लव काम बर,रद्दा  नवा  बनाव।

आगू आगू बढ़ चलव,दुनिया ला समझाव।।


बछर गुजर गे देख तो,का तँय खाय कमाय। 

आगू बर अब मन लगा,नवा बछर अब आय।।


नवा जोश अउ शक्ति ले,करव देश बर काम।

जोत जगा लव कर्म के,अमर होय जग नाम।।


नवा साल स्वागत करव,धरलव मन मा ध्यान।

पाछू गीत बिसार दव,आगू चलव सियान।।


छंदकार:

बोधन राम निषादराज"विनायक"

सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

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 ज्ञानू -सरसी छंद

नवा बछर के शुभ बेला मा, बाँटव मया दुलार।

का का होवत हे दुनिया मा, थोरिक करव बिचार।।


करम धरम ला भूले मनखे, अउ भूले सत्कार।

छोटे छोटे बात बात मा, टूटय घर परिवार।


धन दौलत पद पाके मनखे, करे गजब मतवार।

आज नता रिश्ता मनखे बर, होगे हे व्यापार।।


दाई ददा अन्न पानी बर, तरसत रहिथे रोज।

मिलय नही प्रभु मंदिर बेटा, करले कतको खोज।।


रिश्वतखोरी के दीमक हा, चाट खाय संसार।

भेंट चढ़े भ्रष्ट्राचारी के, लाखों बंठाधार।।


चक्कर काँटय आँफिस लोगन, अफसर हे अबसेन्ट।।

अफसरशाही मौज करत हे, खा खाके परसेन्ट।।


लोकतंत्र नइ बोट बैंक हे, थोरिक करव बिचार।

जिम्मेदारी भूले काबर, राजनीति बाजार।।


धरती दाई रोवत हावय, देख जगत के हाल।

बेजाकब्जा हा फइलत हे, जइसे मकड़ी जाल।।


कोर्ट कचहरी अपराधी बर, घरघुँदिया के खेल।

मौज करत हे खुल्लमखुल्ला, नियम कायदा फेल।।


 अउ किसान बपुरा के जिनगी,  बीतत हे तँगहाल।

कमा कमा मजदूर बिचारा, के उधड़त हे खाल।।


महँगाई हा सुरसा होगे, बाढ़त कनिहा टोर।

करत हवय सब त्राहि त्राहि गा, कोरोना के शोर।।


नवा बछर के शुभबेला मा, लेवव ये संकल्प।

सरग बनाबो ये भुइँया ला, करबो काया कल्प।।


ज्ञानुदास मानिकपुरी

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 त्रिभंगी छंद- विजेन्द्र वर्मा


दुनिया हे मेला,बिकट झमेला,सत के रस्ता, रेंग तने।

जे झूठ लबारी,बोलय भारी,गारी खाथे,सोच बने।।

जे करथे सेवा,पाथे मेवा,होथे जग मा,नाम बने।

मनखे मन सुनलौ,थोकिन गुनलौ,करलव अइसन,काम बने।।


अब झोंक बधाई,सुन गा भाई,नवा साल मा,आस रहै।

दुख पीरा भागय,मनखे जागय,मया दया हा,पास रहै।।

सब करय कमाई,खाय मलाई,इही कामना,हमर हवै।

अब नवा बछर मा,समता घर मा,लाने बर जी,समर हवै।।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव (धरसीवाँ)

जिला-रायपुर

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 नवा साल (सरसी छंद)


बीते बात मा टेन्सन पाले, अपन बिगाड़े चाल।

मंद नशा मा रात बिताए,नवा कहां ए साल।।


मार काट कुकरी ला खाए,ले डारे तैं जान।

अल्लर अल्लर रेंगत हावस,कहिथस पउवा लान।।


हिन्दू मन के परंपरा ला,भूले काबर आज।

अँगरेजन के रंग रँगे हस ,नइये चिटको लाज ।।


नरियर धरके मंदिर जाते,उठके होत बिहान।

तब तो आही नवा खुशी हा,अँगना तोर मितान ।।


हिन्दू मन के नवा साल हा,आथे महिना चइत।

खुशी मनाबे धरके भगवा,झंडा ला ओ पइत।।


         साधक सत्र 10

परमानंद बृजलाल दावना

        6260473556

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 ताटंक छंद- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।

गये साल के त्रास मिटा के, खुशियाँ धर  ये आये हे।


दीन दुखी कल्याण लिये अउ, मानवता भाईचारा।

जीव चराचर मंगलमय हो, अविरल प्रेम बहे धारा।


मृत शरीर नव प्राण लिये ये, गीत प्रेरणा  नव गाथा।

देश क्षितिज मा ऊँचा राहय, भारत माता के माथा।


तान कोयली सुंदर छेड़त, गीत पपीहा गाये हे।

नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।


ऊँच नीच के भेद मिटे जग, जाति धरम ना खाई हो।

मनखे मनखे एक बरोबर, समरसता परछाईं हो।


मान बढ़े यशगान बढ़े नित, नव प्रकाश उजियारी हो।

मन मंदिर में जोत जले सत, महके मन फुलवारी हो।


सुमता समता भाव सकेले, गजानंद धर लाये हे।

नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

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नवा साल मा सब झन झोंकव, शुभ शुभ हमर बधाई।

काम-बुता ला साज-साध के,खावव खीर मलाई।।


पहली जइसे सुरुज नरायण, चंदा और सितारा।

दिन तिथि अउ जुड़ ताप उही हे, बदले हे बस नारा।

मोल समझ लव कालचक्र के, अउ कर लव गुरुताई ।

नवा साल मा सब... 


गये बछर के सुरता राखत, नवा सोच ला लावव।

नव विचार अंतस मा धरके, जिनगी सफल बनावव।

पुन्नी कस अंजोर करे बर, आभा ला बगराई।

नवा साल मा सब...


आपाधापी हाय हफर मा, अरझे हे जिनगानी ।

चाल चलन लाटा फाॅंदा मा, झन उतरे जी पानी ।

मातु-पिता रिश्ता नाता के, होवय झन रुसवाई।

नवा साल मा सब ...


नाप जोख लव घटे-बढ़े ला, का खोये का पाये।

तोर जतन के पक्का फर मा, ररुहा भूख मिटाये।

झूठ फरेबी आदत वाले, लेसव सब चतुराई।

नवा साल मा सब...


धूप छाॅंव जस निरमल संगी, साफ नियत ला राखव। 

बन अवाज सब दुखिया मन के ,सदा नीत ला भाखव।

बने देख लव दरपन पट मा, अपन करम परछाई।

नवा साल मा सब...


अकड़बाज ला सोज करे बर, चलो टेड़गा बनबो।

नारी मन के मान रखे बर, उठा बेड़गा हनबो।

नेकी के रद्दा मा रेंगत, करबो जी अगुवाई।

नवा साल मा सब...


सपना ला साकार करे बर, अड़बड़ महिनत चाही।

डिगे नहीं जे अपन लक्ष्य ले, उही सदा अघुवाही।

होय फलित जी सबके मनसा, अइसन करव कमाई ।

*नवा साल मा सब झन झोंकव, शुभ शुभ हमर बधाई।*


महेंद्र कुमार बघेल डोंगरगांव जिला राजनांदगांव

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आशा देशमुख

नव साल हे ।खुशहाल हे।

विपदा टरे। सुख हा भरे।


मनमीत रे।गा गीत रे।

जग खुश रहै।गंगा बहै।


सूरुज उगे।किस्मत जगे।

उजियार हो।आधार हो।


सद्भावना।शुभकामना।

जग घूम ले।पग चूम ले।


विश्वास हे।उल्लास हे।

तँय उड़ बने।मन बल सने।


मुँह हार के।फटकार के।

शुभ हाथ मा।जग साथ मा।


आकाश हे ।कैलाश हे।

ईश्वर हवे।ठुड़गा नवे।


जग जीत ले।सच रीत ले।

नेकी करौ।गड्डा भरौ।


घर द्वार मा।परिवार मा।

बसथे मया।रहिथे दया।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

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सरसी छंद- अशोक धीवर "जलक्षत्री"


आये हावय नवा बछर हा, लेके सुख सौगात।

चिंता करना छोड़ हँसव अब, दुख के पल हे जात।।

शुभकामना पठोवत हावँव, नवा बछर के आज।

सबझन ला सुख शान्ति मिले अउ, सुफल  होय सब काज।।

सबके जिनगी सुखी रहय अउ, सुघर चलय घर बार।

धन दौलत पद मान बड़ाई, सब ला मिलय अपार।।

बिते साल मा गलती होही, क्षमा चहँव कर जोर।

"जलक्षत्री" ला बुरा न समझव, विनती हावय मोर।। 



रचनाकार अशोक धीवर जलक्षत्री

तुलसी (तिल्दा-नेवरा)

जिला- रायपुर (छत्तीसगढ़)

सचलभास क्र. - ९३००७१६७४०

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गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


नवा बछर मा नवा आस धर,नवा करे बर पड़ही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


साधे खातिर अटके बूता,डॅटके महिनत चाही।

भूलचूक ला ध्यान देय मा,डहर सुगम हो जाही।

चलना पड़ही नवा पाथ मा,सबके अँगरी धरके।

उजियारा फैलाना पड़ही, अँधियारी मा बरके।

गाँजेल पड़ही सबला मिलके,दया मया के खरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जुन्ना पाना डारा झर्रा, पेड़ नवा हो जाथे।

सुरुज नरायण घलो रोज के,नवा किरण बगराथे।

रतिहा चाँद सितारा मिलजुल,रिगबिग रिगबिग बरथे।

पुरवा पानी अपन काम ला,सुतत उठत नित करथे।

मानुष मन सब अपन मूठा मा,सत सुम्मत ला धरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


गुरतुर बोली जियरा जोड़े,काँटे चाकू छूरी।

घर बन सँग मा देश राज के,संसो हवै जरूरी।

जीव जानवर पेड़ पकृति सँग,बँचही पुरवा पानी।

पर्यावरण ह बढ़िया रइही, तभे रही जिनगानी।

दया मया मा काया रचही,गुण अउ ज्ञान बगरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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करन सुवागत नवा बछर के


कलम किताब अउ कापी धर के।करन सुवागत नवा बछर के।

पूजा कर बावन अक्षर के।करन सुवागत नवा बछर के


सेमी कस हाॅंसत मुस्कावत।धनिया कस सबके मन भावत।

सरसों कस गावत लहरावत।गन्ना जइसे ज्ञान बतावत।


किसिम किसिम भोजन के नेमत,चना सहीं लटलट ले फर के।

कलम किताब अउ कापी धर के, करन सुवागत नवा बछर के।


गहूॅं गियानिक कस हितकारी।गोभी आलू कस तरकारी।

पालक लाल मुराई भाजी। लाल टमाटर कस गुणकारी।


धर के दाना माथ नवाना। सद्गुण अपनावन राहर के।

कलम किताब अउ कापी धर के।करन सुवागत नवा बछर के।


भाव रखन खलिहान बरोबर।जइसे भरथे धान घरों-घर।

सुख सुविधा सब पाॅंय बरोबर।सुमता पावय मान घरों-घर।


लोटा मा जल धर औंछारत,अन्नपुर्णा के पॅंउरी पर के।

कलम किताब अउ कापी धर के।करन सुवागत नवा बछर के।


-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़