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Friday, September 11, 2026

पिकनिक-कुंडलियाँ

 पिकनिक-कुंडलियाँ


झाड़ी बन नदिया मता, पिकनिक मनुष मनाँय।

मछरी कुकरी बोकरा, आनी बानी खाँय।।

आनी बानी खाँय, मनुष मन जंगल जाके।

नाचे कूदे खूब, सगा संगी जुरियाके।।

हो हल्ला बड़ होय, उड़ावै धुँगिया गाड़ी।

बानर भालू रोय, रोय नदिया बन झाड़ी।


जंगल मा चारों मुड़ा, होवत हवय गोहार।

प्लास्टिक सँग मा काँच के, कचरा हे भरमार।

कचरा हे भरमार, सिसी पतरी दोना के।

मनखें मन बगराय, बीच जंगल मा जाके।

करैं रोज वनभोज, लगे नइ शनि रवि मंगल।

खा पी बड़ इतरायँ, पहुँच मनखें मन जंगल।।


पग मनखें माढ़िस तिहाँ, होवत गिस ऊजाड़।

लाहो लेवत हें गजब, मनखें मन हा ठाड़।।

मनखें मन हा ठाड़, कुदत हें बन मा जाके।

देख मनुष मतवार, सपटगे बाघ डराके।।

संगी पेड़ पहाड़, कहैं मनखें मन बन ठग।

उजड़त गिस बन बाग, पड़िस जब जब मनखें पग।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)