नवा साल परब तिहार
: *मनहरण घनाक्षरी छंद*
*नव वर्ष श्रेष्ठ बनें,*
*नये राग तर्ज बनें,*
*आज सभी मिल कर,*
*प्रेम -गीत गाइए।*
*नव पथ बढ़े चलें,*
*नये गीत गढ़े चलें,*
*एक-एक पल क्षण,*
*प्रेम को बढ़ाइए।।*
*सभी से मिलन करो*
*सुख में जीवन भरो,*
*तम दूर करने को,*
*भोर को बुलाइए।*
*खुशियों में साल बीते ,*
*हँसी से न गाल रिते,*
*सभी को मंज़िल मिले,*
*ऐसे पथ पाइए।।*
*सुमित्रा शिशिर*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
रोला
नवा बछर के आत,विदा हो जाही जुन्ना।
सुरता आही रोज,सबो ला लगही सुन्ना।।
दुख-सुख सब मा संग,रहिस वो बन के संगी।
बखत पहागे फेर,निकल गे कतको तंगी।।
अँचरा बाँधव आज ये,पाये हंँव जो सोझ मैं।
बिसरा अंते गोठ ला, हलका कर दँव बोझ मैं।।
नवा बछर पगराव,झूम के नाचव गाओ।
जिनगी के दिन चार,बने रद्दा अपनाओ।।
करव नीक संकल्प,सबे अब डर ला छोड़ो।
अपन करम ले फेर,कभू तुम मुँह झन मोड़ो।।
अपन धीर विश्वास ले,पूरा कर लव आस ला।
हिरदय मा सपना सँजो,छूवव बने अगास ला।।
पल्लवी झा(रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
नवा साल
-----------
(चौपाई छंद)
नवा साल के हवय बधाई। छाहित राहय सारद माई।।
धन दौलत सुख सेहत पावव। फूल सहीं हरदम मुस्कावव।।
कलम बनै जी सबके हितवा। गिरे परे के खाँटी मितवा।।
कालजई साहित सिरजावव। भारत माँ के जस बगरावव।।
नवा साल मा अइसे ठानौ। गाँव शहर खुशहाली लानौ।।
करम फसल हो सोला आना।पोठ रहय सब दाना दाना ।।
रद्दा के काँटा बिन लेहू। अउ सपाट गड्ढा कर देहू।।
मातु पिता गुरु मन सुख पाहीं। आसिस के फुलवा बरसाहीं।।
नवा साल के सुरुज नवा हे। नवा बिहनिया नवा हवा हे।।
नवा इरादा ठानौ भाई। माँजौ हिरदे फेंकौ काई।।
चलौ बाँटबो भाईचारा। हवय नेवता झारा झारा।।
अलख प्रेम के चलौ जगाबो। असली मनखे तब बन पाबो।।
जात पाँत के आँट ढहाके। सबो धरम के मान बढ़ाके।।
देश प्रेम के भाव जगाबो। चलौ तिरंगा ला फहराबो।।
आलस बैरी ले दुरिहाके।मिहनत के हम जोत जलाके।।
गार पसीना रोटी खाबो।जिनगी मा उजियारा लाबो।।
साल छबिस हा खड़े दुवारी। हैप्पी काहत हे सँगवारी।।
हमरो कोती ले न्यू ईयर।गाड़ा गाड़ा हैप्पी डियर।।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
हथबन्द,छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
*छेर-छेरा*
*सरसी छंद*
आज छेर-छेरा माँगत हें, लइका सबो सियान।
पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।
डंडा नाचत गावत हें गा, गली-खोर अउ द्वार।
ढोलक मँजिरा झाँझ बजावत, मानत हवें तिहार।।
दीदी-बहिनी सुवा गीत के, गावत हें सब गान।
पारा बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।
बरा ठेठरी-खुर्मी चीला, सब बनात हें आज।
लीपे पोते हें घर अँगना, करके खेती काज।।
दया-मया के गुरतुर बोली, बने मिलत हे मान।
पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।
*अनुज छत्तीसगढ़िया*
*पाली जिला-कोरबा*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
: गीतिका- पूस पुन्नी छेर-छेरा
2122 2122 2122 212
पूस पुन्नी छेर-छेरा पर्व पावन दान के।
पर्व पावन पावनी नदिया म पबरित स्नान के।
स्नान करके दान करले ज्ञान अउ धन धान के।
दान के अवसर मिले हे शुक्र हे भगवान के।
रचना- सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐