मकर सक्रांति
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(उल्लाला छंद)
हावय आज तिहार जी, पोंगल अउ संक्रांति के ।
सब ला हे शुभकामना, जिनगी मा सुख शांति के।।
तिल अउ गुड़ के दान हे, पबरित संगम स्नान हे।
आज अबड़ फुरमान हे, मानत सकल जहान हे।।
देव सुरुज हा आज ले, उतरायण मा आय हे।
महभारत मा भीष्म जी, महिमा अबड़ बताय हे।।
तिल्ली लाड़़ू रेवड़ी, खावव सब झन बाँट के।
माँघी मेला हे भरे,करलव सौदा छाँट के।।
संगम तिरथ प्रयाग के,महाकुंभ स्नान जी।
हिरदे फरियर हो जही, कर ले सुग्घर दान जी।।
दिन हा तिल तिल बाढ़थे,खिरथे थोकुन रात जी।
कमती लागय जाड़ हा, तरिया नदी नँहात जी।
मन पतंग के डोर ला,थाम बने उड़वाव जी।
बखत परे मा खींच लव,जादा झन लहराव जी।
फसल पके जब खेत मा, पोंगल तिल संक्रांति हे।
अन्न बिना जिनगी कहांँ,परब मने सुख शांति हे।
वेद शास्त्र मा जी हवय, कथा मकर संक्रांति के।
गंगासागर स्नान के, शनि देवा के शांति के।
चोवा राम वर्मा 'बादल '
हथबंद, छत्तीसगढ़