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Sunday, August 9, 2026

विष्णु पद छंद गीत- *गुरु महिमा*

 विष्णु पद छंद गीत- *गुरु महिमा*


माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।

गुरु के ज्ञान सरोवर जइसे, शीतल चंदन हे।।


गुरु ही सत के राह दिखाथे, उँगरी ला धरके।

मन मा निरमल ज्ञान बहाथे, झरना कस झरके।।

गुरु के तप आगी मा तपके, चमके कुंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


भव सागर ले पार लगइया, बन पतवार खड़े।

ज़िनगी मा गुरु ज्ञान कवच बन, हे रखवार बड़े।।

मानवता के भाव धरे गुरु, बन सुखनंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


अगम अगोचर गुरु के महिमा, संत सुजान कहे।

पा के गुरु के सत संगत ला, लोभ घमंड ढहे।।

सत्यबोध कर जोर करे नित, गुरु अभिनंदन हे।

माथ नवावँव गुरु चरनन मा, शत-शत वंदन हे।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/07/2026

रोला-छंद

 रोला-छंद 


छत्तीसगढ़ी लोकगीत के गौरव

1- 

रामचंद जी नाम, सुनव सब छत्तिसगढ़िया । 

लोकमंच हे देन ,  चंँदैनी गोंदा बढ़ि‌या ॥ 

राहय साव खुमान, धरै संगीत ल सुर मा । 

जम जावय सुरताल, धूम मातै रइपुर मा ।।

2-

जनकवि कोदूराम, रचै माटी के गाना । 

सुन के लागय गाँव, हवै जी कतिक सुहाना ।। 

मस्तुरिया के गीत, जीत लेथय जनमन ला । 

करथे भाव विभोर, सुहाथे जी जन- जन ला।।

3-

कौशल भाइ मुकुंद, लिखै बड़ रचना सुघ्घर । 

दानेश्वर जी गीत, रचै बड़ उज्जर-उज्जर ॥ 

चंद्राकर जी प्रेम, गिरीवर लिखथें गाना। 

छत्तिसगढ़ के सौंध, रिथे सब ताना-बाना ॥

4- 

नारायण परमार, लिखै जीवन यदु रचना । 

धनहा खेती खार, पेड़ अउ माटी पखना ॥ 

रामेश्वर के लेख, सुहाथे सब ला भारी । 

बद्री लाल विशाल, नरेन्द सबो संँगवारी ॥

5-

दूधमोंगरा के नाम, सुनत मन हा ममहाथे।

मास्टर पीसी लाल, जनक जेखर कहलाथे।।

गायक रचनाकार, कलम मा ताकत भारी।

लिखथें बढ़िया शोध, पढ़ै जी सब नर नारी ।।

6-

गायक जब केदार, उठै सब के मन मोहय । 

जब-जब गावय गीत, कंठ मा मदरस पोहय ॥ 

परस जवाहर लाल, पवन अउ नवल ह गावय । 

लगय कृष्ण ब्रजधाम, बाँसुरी मधुर सुनावय।

7-

पंचराम के गान, संग मा जनता बाचैं । 

बैतल थिरके मंच, झूम के लोगन नाचैं।।

गजानंद अनुराग, तान मा सुघ्घर गाथें । 

बिंदु खुशी जी दास, गजब के लय लहराथें ।।

8-

दुखिया धुरवा राम, बटोरँय कसके ताली । 

ममता जब जब गाँय, मंच नइ राहय खाली ॥ 

बासंती देवार, कंठ सरस्वती बिराजै। 

गावय पुनम विराट, आँख मा आँसू साजै ॥

9- 

गायक गौतम चंद, कान मा मदरस घोलय।

कविता के आवाज, खनक जस मयना बोलय ।। 

लता खापर्डे गाँय, लगै कोयल के बानी । 

सफरी गीत सुनाय, करेजा होवय चानी ॥

10- 

आवय भैया लाल, मंच मा गदर मचावँय । 

हेड़ाऊ जी और, कहत जनता चिल्लावँय ॥ 

हिरवानी महदेव, बाँध के सुर ला साजँय । 

गोरे बर्मन गाँय, सुनत जनता पगलावंँय ।।

11- 

प्रीतम झल्लूराम, द्वारिका गावंँय बढ़िया ।

लागय सुघ्घर नीक, मदन जी छत्तिसगढ़िया ।। 

मंसूरी संतोष, कुलेश्वर हा जब गावँय । 

सुन लेवन इक बार, कान मा उही सुनावँय ।।

12- 

गावय शेख हुसैंन, बढ़े दिल के बड़‌ धड़कन । 

सुनन भगत के गीत, दही बासी हम झड़कन ॥ 

माधव जी जब गाँय, गाँव के दरशन होवय । 

ललिता गीत सुनाय, प्रेमिका मन-मन रोवय ।।

13-

आशा येलिस जान, साधना संग जयंती । 

गावय गंगादास, अनचुरी अउ कुलवंती || 

अलका कंचन गाँय, निर्मला कंठ सुहावय । 

चतुर कांति के गीत, शैल छाया मन भावय ॥ 

14- 

ज्योती सुघ्घर मीठ, सरसती गावय करमा । 

सीमा गावय गीत, गूँजै सब के घर-घर मा ।। 

रेखा रजनी संग, सुमित्रा गुरुतुर बोली। 

साधराम के शोर, कुवाँरा लागय भोली ।।

15- 

सुर मा राजकुमार, रामनारायण बानी । 

गयाराज के बोल, आँख मा लावय पानी ।। 

रविशंकर सुरेन्द्र, संजना स्वर के ग्यानी । 

दीपक लालू गाँय , चढ़े सब लोग जुबानी ।।

16- 

मुरली जी मन भाय, कुसुम ठाकुर अउ बरसन । 

महासिंग के बोल, सुने बर हम सब तरसन ।।

ननकी अउ मिथलेश, झुमुक झमकावय गाना । 

अउ किस्मत देवार, छेड़ दंँय नवा तराना ।।

17-

चिन्ता गंगाराम, नायडू सुर बड़ भाँजय । 

भुलुवा न्यायिक दास, गीत ला झाँझी माँजय ।। 

सुशील सीताराम, कलम के गजब सिपाही । 

हरिठाकुर के गीत, सबो के मन ला भाही ॥

18- 

नीता गीता भट्ट, फरीदा अउ सुरिखयारिन । 

गावंँय बढ़ि‌या गीत, मया के गठिया पारिन ।। 

सावित्री के गान, सुचित्रा स्वर फरियावय । 

अनुसुइया मन भाय, इंदिरा तान लमावय ॥

19- 

नील कमल लहराय, किरण शरमा सुर मीठी । 

स्वर्णा गरिमा गाँय, रुकय नइ कखरो सीटी ॥ 

पदमा पायल तान, छेड़ के गावंँय गाना । 

पुष्प लता नेताम, कंठ बड़ लगै सुहाना ।।

20-

फिरतु विष्णु अउ हेम, गजब के हावय मोती । 

लिखे भगवती गीत, सुनय सब चारों कोती ।। 

मीनाक्षी मन जीत, दीप माला के गाना । 

गावय गजब विवेक, झुमैं सब लोग दिवाना।।

21 -

गावंँय राम प्रसाद,अंजली शुक्ला सविता । 

लक्ष्मी सालिक राम, सुहावय सपना कविता ।। 

बिमला मुन्ना पाल, त्रिवेणी गावँय  बढ़िया। 

मेरी डिमान गाँय, चमन के लागय पुड़िया।

22- 

सुघ्घर लागय बोल, उदल गीता ध्रुव मथुरा । 

केशव सुनिता संग, उत्तरा गावँय गजरा ॥ 

सोनी जी घनश्याम, माधुरी नत्थू तोड़े । 

जीवन तीरथ राम, जानकी सुर बड़ छोड़े ।।

23- 

जय प्रकाश गजराज, शारदा बढ़िया गाथें । 

तुलसी गोराचंद, बखत मा सुरता आथें । 

मधु मेहत्तर राम, केशरी गौरी नीका । 

अनिता तोरणलाल, बिना सब लागय फीका ।।

24-

पदम मदन चौहान, अजय जलक्षत्री रेखा । 

सुर ला भाजँय खूब, करँव मैं कइसे लेखा ।। 

खोमचंद थनवार, मालती छाँया माया । 

सुघ्घर गावँय गीत, हिलोरय मन अउ काया ।।

25- 

पीलू रामाधार, सुशीला गावय ठमकय । 

अउ सुनील बंसोड़, धरे माइक ला बमकय ॥ 

भरय जोश दुष्यंत, गिरी नारायण बाबा । 

शशि नरेश झम गीत, लगै बड़ नावा-नावा ॥

26- 

रामशरण सुर साज, नर्मदा गाय ददरिया । 

पिताम्बर के संग, गाँय कमला हा बढ़ि‌या ।। 

चंदराम के गान, मधुलिका तुलसी गावय । 

कौशल उरमी संग, दलेश्वर के सुर भावय ॥

27- 

दुकालु जस सम्राट, कारतिक के जस गाना । 

चढ़ै देवता लोग, मँगै नरियर अउ बाना ।। 

जस गावय शहनाज, भकाभक देवन उनडंँय । 

दिलिप षडंगी मंत्र, पढ़ै देबी मन घुनडँय।।

28-

तीजन झाडूराम, पंड‌वानी के नायक । 

सुरुज उषा प्रहलाद, रीतु पूना बड़ गायक।।

मानदास के गीत, फिदा रेखा मन मोहय । 

देवदास इक नाम, नचावत पंथी सोहय ।।

29- 

शिव सुनील राकेश, अनुज के जादू भारी। 

रचना रचै मिनेश, सुनै मिलजुल सँगवारी ।। 

चम्पा मोना सेन, अनुपमा गावय जमके । 

आरु स्वेच्छा आज, कनक तारा कस चमके ।।

30- 

राहय बढ़िया राज , रेडियो घर-घर बाजय।

नवा बहुरिया रोज, सुनत पैरी ला माँजय ॥ 

भक्ति गीत के संग, सबेरा सबके होवय । 

जागंँय ओखर संग, ओखरे संग म सोवंँय।।

31- 

बाबू के चौपाल, दाइ के हे घर आँगन । 

लइका किसलय बाल, सुनय जे हे मनभावन ॥ 

बहिनी बिंदिया भाय, कहानी सुनथे बाई | 

जोहत रहिथे राह, फोन फरमाइश भाई ।।

32-  

युववाणी के गोठ, हमू मन उही म आथन । 

आथे भुइँया गोठ, सुने बर हम डट जाथन ।। 

कवि लेखक के बात, सुने बर बढ़िया मिलथे । 

सुघ्घर-सुघ्घर गोठ, कमल तरिया कस खिलथे ॥

33- 

आज-काल के गीत, लजावंँय लोगन सुन के । 

फुहड़ता भरमार, भरे हे जी चुन चुन के।। 

मिट जाही संस्कार, बनाहीं अइसन गाना । 

"शर्मा बाबू” रोय, आँख हो झन बन काना ॥


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

कटंगी-गंडई जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़ 491888

साधक सत्र -20

प्रकाशनाधिन संकलन-छंद च्यवनप्राश

गुरु

 छ्न्द साधना गुरु हवै, सुग्घर लय संगीत।

अंतस मैल मिटात हे, बना अपन हे मीत।।


गुरु पँवरी मा हे नवा, सदा जोर कर माथ।

बिपत घड़ी मा देत हे, देव हमेशा साथ।।


गुरु के आशीर्वाद ले, जग ला लेवव जीत।

जन जन के मन मा भरौ, गुरुवर के ही गीत।।


कोटि-कोटि कर के जतन, जनम जनम गे बीत।

होय नहीं बिन गुरु कृपा, राम किशन ले प्रीत।।


गुरु के पँवरी मा हवै, जम्मो तीरथ धाम।

जेन भजे इन मन लगा, पावैं खुशी तमाम।।


गुरुवर तारनहार हे, करें सदा भव पार।

नाँव उबारत हे फँसे, बीच नदी मझधार।।


गुरु के पद नख मा हवै, शीतल गंगा नीर।

जिनकर पूजन ध्यान ले, कट जावै दुख पीर।।



कल्प वृक्ष गुरुदेव हे, जानैं मन के बात।

मन इच्छा पूरन करें, देत नवाँ सौगात ।।


मन करथे रहितेंव मँय, गुरुवर के ही ठाँव।

कारज कर हनुमान अस, सेवक मँय बन जाँव।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी 

मो. 6267792997

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गुरुदेव के पँवरी मा सादर नमन वंदन हे!

हरि गीतिका छंद छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन स्थल

 हरि गीतिका छंद 


छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन स्थल


राजिम 

राजिम जिहाँ के धाम हे, बसथे उहाँ भगवान हा।

दरशन हवय वो रूप के, तरथे दुखी धनवान हा ॥


खिचरी लगे हे भोग मा, करमा खवाये हाथ मा ।

पावन त्रिवेणी हे घलो, देखव कुलेश्वर साथ मा॥


डोंगरगढ़ बमलाई

ऊँचा पहाड़ी मा बसे, देखव ग बमलाई सती ।

डोंगर हवै चारों मुड़ा, मैदान हे खाल्हे कती।

मनखे इहाँ सब दूर से, आवत रिथें सब वार मा ।

ज्योती जला वर माँगथें, उन चैत मास कुँवार मा ।।


सिरपुर

सिरपुर चलौ देखव उहाँ, तीरथ बरोबर लागथे ।

लक्ष्मण लला मंदिर हवै, देखत सबो दुख भागथे ।

आवत रिथें भिक्षुक इहाँ, धरमी सबोझन बौध के ।

चारों मुड़ा बिखरे हवय, अवशेष जुन्ना शोध के ।।


चम्पारन

वल्लभ इहाँ के हे गुरु, अउ नाम चम्पारन हवै ।

बड़ दिव्य आलौकिक भरे, ब्रजधाम कस येहा भवै।।

गोठान हे गोलोक कस, गिरिराज के ये धाम हे ।

शिवलिंग बिराजे हे घलो, कतकोन शिव के नाम हे ।।

खल्लारी

हे सीढ़ि‌याँ सुघ्घर बने, सौ आठ आगर साठ हे ।

साक्षात खल्लारी हवै, दुरलभ मनोहर पाठ हे।।

बइठे रिथे दू शेर हा, देखव उहाँ बनवाय हे ।

हे कामना कतको धरे, लोगन उहाँ सब आय हें ।।


घटारानी

देखौ घटा रानी सुघर, जल के बने परपात हे । 

चारों मुड़ा फइले बिकट, जंगल घलो मन भात हे ।।

रद्दा हवै उपर घलो, नीचे बने हे पास मा ।

जनता नँगत आवत रिथें,  दरशन करे के आस मा ।।


भोरमदेव

भोरम हवै बड़ देवता, फइले सघन वन घाँस हे।

लोगन धरे काँवर इहाँ, सावन उहाँ बर खास हे ।।

मंदिर जघा तरिया बने, वोटिंग करैं सब लोग जी ।

भोला दरस बर झूम के, आवत रिथें सब रोज जी ।।


शिवरी नारायण

शिवरी नरायण धाम हे, शबरी खवाइस बेर ला ।

आवत हवै देखत रिहिस, वो देख माया फेर ला।।

पा गे नरायाण के दरस, वो तप जघा अब धाम हे ।

पावन हवै तीरथ बरत, शिवरी नरायण नाम हे ।।


झलमला

बालोद मा चल देख लौ, मंदिर हवै बड़ भव्य जी ।

गंगा झलमला हा फबै, सोहत हवै बड़ दिव्य जी ।।

कैलाश कस भीतर गुफा, मैया रहै जस लोक मा ।

लहरात हे कतको जगह, तैं देख झंडा फोक मा ।।


चंडी माता

चंडी बिराजे हे चलौ, ऊँचा पहाड़ी पाठ मा ।

आवत रिथें दरशक उहाँ, घूँमत रिथें सब घाट मा ।।

वो बागबाहारा बड़ा, जंगल जिहाँ सब आत हें ।

"बाबू” घुँचापाली देखौ, भलुवा प्रसादी खात हें ।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

(साहित्यकार छत्तीसगढ़ी भाषा)

 कटंगी-गंडई जिला केसीजी छत्तीसगढ़ 

छंद साधक -सत्र-20

(छंद के छः)

प्रकाशनाधिन संकलन-छंद च्यवनप्राश

गुरु पूर्णिमा

 गुरु पूर्णिमा



मोरो कर  दे गुरु उद्धार, आप  ह  सबके  पालनहार।

तब  चलथे  जम्मो  संसार, होथे  जिनगी  बेड़ा पार।।


बदले हस जीए के ढंग, सबला ले  हस  अपने संग।

तैही  सब के  प्राणाधार, तब  ले  होवत  नैया पार।।


सजथे सुग्घर जिनगी साज, खुशी ल भर के लाथे राज।

सँग-सँगवारी करथे बात, हँसी-खुशी के इहि सौगात।।


जे  हा  जपथे  गुरु के नाम, हर दिन होथे उँखरे काम।

वो भला-बुरा  करथे  भेद, काम-क्रोध  के  करथे छेद।।


विनती करबो गुरु के आज,खुलही भीतर दिल के राज।

आत्म ज्ञान के होही बोध, अड़बड़  करथे गुरुजी शोध।।


छंद-बंध के बहथे धार, अरुण निगम गुरुजी आधार।।

चेला मन ल बताथे सार, ओहा करत  हमर  उपकार।।


साधक  मन बर  मया  दुलार, छंद सिखैय्या बर उपहार।

फूल  हार  पहिराबो  साथ, चरणन  धूल  लगाबो  माथ।


इही  हमर  बर  खेती  खार, बीज छंद ला बोअन सार।

एहा  जही  बीज  भंडार,   कंपनी  ह  करही  उपचार।।

छंद छ के करथँव जोहार, सुग्घर  रहे  निगम  परिवार।

मिले बधाई हा भरमार, सुग्घर देवत छंद संस्कार।।


सुधि बुधि गुणि मन गुरुवर खास, करथँव मैंहा सब विश्वास।

लिखथँव महुँ हा बनके दास, बीतत हाबे सावन मास।। 

गुरु जी के मँय करँव बखान, सूझ - बूझ ले बढ़थे शान।

गुरतुर बोली के पहिचान, हाथ जोड़ करथँव गुणगान।।


धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री 

बालोद

💐💐💐💐



गुरु

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शब्द-शब्द मा जेकर होथे,

सबो शास्त्र के सार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,

महिमा अगम अपार।।


जेहा चेला के हिरदे के,हर लेथे अज्ञान।

बरत रथे मन के मंदिर मा, जोत अखंड समान।।

मातु-पिता कस दया-मया के,जे छलकत भंडार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


कइसे जीना हे दुनिया मा, जेन बताथे मर्म।

फोर-फोर समझाथे जे हा, का हे मानव धर्म।

अँगरी धर सद राह चलाथे, करथे बड़ उपकार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।


मिलै नहीं सिरतो कोनो ला, कभू बिना गुरु ज्ञान।

गुरु के चरण वंदना करथें, संत सिद्ध भगवान।

गुरु के किरपा बिन साधक के, नइ होवय बढ़वार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


टूटी-फूटी गुन गावत हँव, अड़हा चोवा राम।

पूज्यनीय गुरुदेव निगम के, सुमर-सुमर के नाम।

पाये हाववँ मैं जेकर ले,  छंद- सुधा रसधार।

तीन देव कस सँउहे गुरु के,महिमा अगम अपार।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।

अरुण निगम गुरु पेड़ बने हे, हम ओखर अन डाली।।


रंग बिरंगी छंद फूलवा, ये भुइँया के कोरा मा।

शब्द ज्ञान के भरय खजाना, छत्तीसगढ़ कटोरा मा।।

जतन करिन महतारी भाखा, बन के हम सब माली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।1


गाँठ बाँध के छंद लिखत हन, हम तो गोठ सियानी।

गाँव-गाँव अउ ठाँव-ठाँव मा, गूँजय छंद जुबानी।।

पुरखा सपना पूरा करबो, आज नही तो काली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।2


जोड़ रखे हे छोट बड़े ला, छंद मया के बानी।

सुमता समता के बिरवा ला, सींचत हन  दे पानी।।

छत्तीसगढ़ के छंद छाँव ले, आवय जग खुशहाली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।3


छंद के छ परिवार बने हे, छत्तीसगढ़ के माटी।

दया मया सुख दुख मिल बाँटय, सुग्घर हे परिपाटी।।

सकलाये हन साधक गुरु जन, मिलन परब दीवाली।

छंद के छ महकत फुलवारी, फूल खिले सुख लाली।।4


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

साधक: सत्र 2

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हावय गुरु के जन्मदिन, का देवँव उपहार।

देने वाला हा दिये, मया भरे संसार।।

मया भरे संसार, करत अरजी हम हावन।

गुरुवर ले आशीष, सदा दिन हम सब पावन।।

सुवासिता गुरु चाँद, गगन ला छूते जावय।

हर पल रहँय निरोग, कामना प्रभु से हावय।।


सुवासिता 


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[7/29, 6:34 AM] नारायण वर्मा बेमेतरा: *दोहा-गुरू वंदना*


करँव वंदना आरती, मन के दियना बार।

हरव मोर अज्ञानता, देवव ज्ञान फुहार।।


शरण परे हँव तोर मँय, हाबँव निचट गँवार।

हाथ मूड़ मा राख दे, भव ले पार उतार।।


बानी ले अमरित झरै, करथे बहुत दुलार।

दिल के सरल उदार बड़, हाबय गुरू हमार।।


दूधारी तलवार कस, लगथे ये संसार।

ज्ञान रतन हा सार हे, बाकी माया झार।।


मोर बुद्धि हे नानकुन, महिमा तोर अपार।

टूटी फूटी गात हँव, दुरगुन सबो बिसार।।


हाड़ माँस के देह मा, अइसन दिव्य विचार।

गुरू तोर पइँया परँव, कर मोरो उद्धार।।


🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

[7/29, 8:00 AM] अमृतदास साहू 12: सार छंद *गुरू महिमा*


गुरु के महिमा अड़बड़ भारी,होथें अवघड़ दानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


कठिन तपस्या करके अड़बड़,शक्तिवान बन जाथें।

अपन तेज अउ तपो शक्ति ले, उजियारा बगराथें।

कहलाथें जग मा येमन हा,ऋषि मुनि ध्यानी ज्ञानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


रहिथें‌ गुरु मन सहनशील अउ,दृढ़ निश्चय विश्वासी।

दुख पीरा चिंता हर लेथें,दूर भगाय उदासी।

सूरज कस चमके सूरत हा,अद्भुत अनुपम बानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस,विरल दूध ले पानी।


विनम्रता के आवँय मूरत,सत के हरयँ पुजारी।

सादा जीवन जीथें सुग्घर,होथें गुरु बलिहारी।

करव सदा सदगुरु के संगत,होथें बड़ वरदानी।

शक्ति अतक के करयँ हंस जस, विरल दूध ले पानी।


अमृत दास साहू 

ग्राम कलकसा, डोंगरगढ़

[7/29, 8:12 AM] आशा देशमुख: गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर मा मोर काव्य गुरु मन ला समर्पित काव्य पुष्प


गुरु चालीसा


दोहा


करत हवँव गुरु वंदना, चरणन माथ नँवाय ।।

भाव भक्ति मन मा धरे , श्रद्धा फूल चढ़ाय।।


सदा रहय गुरु के कृपा,अतकी विनती मोर।

अंतस रहय अँजोर अउ,भागे अवगुण चोर।।


चौपाई


गुरु ब्रह्मा अउ विष्णु महेशा। गुरु हे पहिली पूर्ण अशेषा।।

बरन बरन हे गुरु के वंदन।आखर आखर बनथे चंदन।।


 गुरु ला जानव सुरुज समाना।  गुरु आवय जी ज्ञान खजाना।।

गुरु जइसे नइहे उपकारी।गुरु के महिमा सब ले भारी।।


गुरु सउँहत भगवान कहाये। गुण अवगुण के भेद बताये।।

सात समुंदर बनही स्याही।गुरु गुण बर कमती पड़ जाही।।


गुरु के बल ला ईश्वर  जाने। तीन लोक  महिमा पहिचाने।।

गुरुवर सुरुज तमस हर लेथे। उजियारा जग मा भर देथे।।


जब जब छायअमावस कारी। गुरु पूनम  लावय उजियारी।।

गुरु पूनम के अबड़ बधाई।माथ नँवा लव बहिनी भाई।।


शिष्य विवेकानंद कहाये।परमहंस के मान बढ़ाये।।

द्रोण शिष्य हें पांडव कौरव ।अर्जुन बनगे गुरु के गौरव।।


त्याग तपस्या मिहनत पूजा।गुरु ले बढ़के नइहे दूजा।।

वेद ग्रंथ हे गुरु के बानी।पंडित मुल्ला ग्रंथी ज्ञानी।।


ज्ञान खजाना जेन लुटाए।जतका बाँटय बाढ़त जाए।।

गुरु के वचन परम हितकारी।मिट जाथे मन के बीमारी।।


जेखर बल मा हे इंद्रासन।बलि प्रहलाद करे हें शासन।।

ये जग गुरु बिन ज्ञान न पाये।गुरु गाथा हर युग हे गाये।।


सत्य पुरुष गुरु घासी बाबा। गुरु हे काशी गुरु हे काबा।।

 देवै ताल कबीरा साखी।

 उड़ जावय  मन भ्रम के पाखी।।


गुरु के जेन कृपा ला पाथे। पथरा तक पारस बन जाथे।।

माटी हा बन जावय गगरी। बूँद घलो हा लहुटय सगरी।।


महतारी पहली गुरु होथे । लइका ला संस्कार सिखोथे।।

देवय जे अँचरा के छइयाँ।दूसर हावय धरती मइयाँ।।


जाति धरम से ऊपर हावय।डूबत ला गुरु पार लगावय।।

आदि अनादिक अगम अनन्ता।जाप करयँ ऋषि मुनि अउ संता।।


गुरु के महिमा कतिक बखानौं।    ज्योति रूप के काया जानौं।।

बम्हरी तक बन जाथे चंदन। घेरी बेरी पउँरी वंदन।।


हाड़ माँस माटी के लोंदी।बानी पाके बोले कोंदी।।

पथरा के बदले हे सूरत। गढ़थे छिनी हथौड़ी  मूरत।।


भुइयाँ पानी पवन अकाशा।कण कण में विज्ञान प्रकाशा।।

समय घलो बड़ देथे शिक्षा।रतन मुकुट तक माँगे भिक्षा।।


अमर हवैं रैदास कबीरा। निर्गुण सगुण  बसावय मीरा।।

सातों सुर मन कंठ बिराजे। तानसेन के सुर धुन बाजे।।


कण कण मा गुरु तत्व समाये।सबो जिनिस कुछु बात सिखाये।।

गोठ करत हे सूपा चन्नी।कचरा ला छाने हे छन्नी।।


गुरु के दर हा सच्चा दर हे। मुड़ी कटाये नाम अमर हे।।

एकलव्य के दान अँगूठा। अइसन हे गुरु भक्ति अनूठा।।


श्रद्धा से गुरु पूजा करलव। ज्ञान बुद्धि से झोली भरलव।

जे निश्छल गुरु शरण म जावै।।अष्ट सिद्धि नवनिधि जस पावै।।


गुरु चालीसा जे पढ़े,ओखर जागे भाग।

दुख दारिद अज्ञानता ,ले लेथे बैराग।।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

[7/29, 8:29 AM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।

 साधक मन ला देवत हावँय, जम्मो छंद विधान।।


सहज-सरल व्यक्तित्व धनी हें,उत्तम हे व्यवहार। 

मिलनसार अरु मृदुभाषी हें,  सुंदर शील विचार।।

जन -मानस के हावँय प्रेमी, मनखे हवँय सुजान।

अरुण निगम गुरुदेव हमर हें,खूब छंद विद्वान।।



 करौं कामना शुभ भविष्य के, बाढ़य साल हजार।

हाँसत- मुस्कावत दिन गुजरे, सुख के हो गुलजार।।

उर विराट धर बनथें छोटे, ये ऊँखर पहिचान। 

अरुण निगम गुरुदेव हमर हें, खूब छंद विद्वान।।


भागवत प्रसाद चन्द्राकर🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

💐💐💐💐💐💐💐💐


गुरु चरणन मा जेहर रहिथे, वो खुशहाल हवै |

ओखर जिनगी ले दुरिहा गा, सब जंजाल हवै ||


कतको घपटे अँधियारी हा, ज्ञान अँजोर करै ||

दिव्य ज्ञान ले पुंज प्रकाशित, सुग्घर भोर करै ||


सही गलत पहिचान करावय, शिक्षा दान करै |

तीनों लोक भुवन चौदा मा, थाथी ज्ञान भरै ||


गुरु के महिमा के दुनिया मा, अगम अनन्त हवै |

गुरु चरणन मा तन - मन अर्पित, मूड़ी रोज नवै ||


भाई कोनो कभू कपट छल, गुरु ले झन करहू |

ज्ञान बताये अमरित बानी, हिरदै मा धरहू ||


काम अबड़ आथे जिनगी मा, गुरु के ज्ञान दिए |

नाम तोर होवत दुनिया मा, वो पहिचान दिए ||


ज्ञानु


💐💐💐💐💐💐💐💐💐

[जग के खेवनहार गुरुजी ।

सबके पालनहार गुरुजी ।

जनम जनम के कालिख धोकर

ऐसे करे निखार गुरुजी ।

माया बीज सदा  को नाशै

है मेरे करतार गुरुजी ।

करुणा कृपा सदा बरसाते 

प्रेम भरे पुचकार गुरुजी ।

सत अरु असत दिखाएं हंसा

 हर जीवन का सार गुरुजी ।

[7/29, 11:06 AM] गुमान साहू: जलहरण घनाक्षरी 

।। गुरू महिमा।। 

गुरू गुण के खदान, गुरू देथे ज्ञान दान, पाके ज्ञान सब झन, जिनगी सँवार लव।

अज्ञान के अंधियार, देथे गुरू हर टार, ज्ञान के प्रकाश गुरू, सब उजियार लव।

पथरा ला सोना करे,गुरू वो पारस हरे, आके शरण इँखर, जिनगी उबार लव।

सच-झूठ भला-बुरा, भेद बतावय पूरा, जीवन सफर बर, रस्ता(रद्दा) चतवार लव।। 


-गुमान प्रसाद साहू 

समोदा (महानदी) 

साधक- सत्र-6

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोहा-


गुरुवर संत सुजान है , गुरुवर ज्ञान प्रकाश। 

गुरुवर ग्रंथ कुरान है, गुरुवर से आकाश। ।


सुमित्रा शिशिर

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: दोह- 


गुरुवर के वंदन करव, हे गुरु गुन के खान। 

अग्यानी ला ज्ञान दे, गुरुवर हवे  महान।। 


मिलथे गुरुवर भाग ले, खोजत फिरथे लोग। 

सँउहत मिलगे गुरु दरस, बने रहिस सँजोग।। 


भीतर मधुरस मीठ हे, ऊपर हवय कठोर। 

कोवँर मन भीतर रखय, अउ देवय बड़ जोर।। 


देवय दीक्षा ज्ञान के, गरब गुमान ल छोड़। 

रद्दा सहीं दिखाय के,  टूटे मन दे जोड़।। 


ज्ञान उजाला बाँट के, हृदय रखय पट खोल। 

भीतर उपजे आस ला, लेवत रहय टटोल।। 


कण-कण गुरु के बास हे, गुरुवर हे भगवान। 

पीरा हर हीरा करय, गुरुवर हे धनवान।। 


मात पिता हे गुरु हमर, येला नवाँव शीश। 

इँकर चरण मा हे सदा, अबड़ अकन आशीष।। 


सुमित्रा कामड़िया शिशिर "

[7/29, 11:09 AM] Sumitra कामड़िया 15: चरण कमल वंदन करूं, गुरुवर आप महान। 

मुझ अनगढ़ को गढ़ दिया, गुरुवर श्री भगवान। ।


भाव पुष्प अर्पित करूं, भरकर मन उल्लास। 

दीजै आशीर्वाद मम, याद रखे इतिहास। ।


सादर प्रणाम गुरुवर सदा आशीर्वाद बनाए रखिएगा 🌹🌹🙏🙏

[7/29, 11:09 AM] विजेन्द्र: गुरु

करथे जिनगी ला उजियार I 

माथ नवावँव बारंबार II

कतका हे गुरु के उपकार I

 उही लगाथे भव के पार II


बाँटय चेला मन ला ज्ञान I

 मूरख तको बनय विद्वान II

जिनगी सुग्घर वो सिरजाय I 

नेक राह ला धरव बताय II


खुलय ज्ञान के सबो कपाट I

 दमके सुग्घर उँकर ललाट II

गुरुवर के जे मानय बात I

 बइरी मन खा जावय मात II


अड़चन अलहन देवय टार I 

बोली-भाखा अमरित धार II

ज्ञान-दान के वोहर खान I

 गुरु ला देवव गा सम्मान II


गुरु ले बड़का हावय कोन I

 पथरा ला कर दय वो सोन II

हरथे मन के सबो विकार I

 जिनगी सुग्घर देय सँवार II


विजेंद्र


[7/29, 11:57 AM] बोधन जी: गुरु वंदना - मत्तगयंद सवैया 


श्री गुरु वंदन पाँव पखारत साँझ-बिहान सदा गुण गावौं।

हे गुरुदेव कृपा बरसादव ये जग मा मँय नाम कमावौं।।

ज्ञान बिना अँधियार सबो तुँहरे बिन थाह कहाँ मँय पावौं।

राह दिखा सद् मारग के मँय ज्ञान अँजोर हिया बगरावौं।।


मातु-पिता गुरुदेव तहीं अँगरी धरके लिखना सिखवाए।

आखर-आखर जोरत-जोरत छंद सुजान तहींच बनाए।।

सोझ चलौं सद् मारग मा अइसे बढ़िया  गुरु ज्ञान बताए।

आज उतार सकौं करजा नइ, हे गुरुदेव कृपा बरसाए।।


पार करौं भवसागर ले पतवार धरौ गुरुदेव उबारौ।

ये जग भार सहौं कतका अब जीव बियाकुल आवव तारौ।।

कोन इहाँ रखवार हवै गुरुदेव सम्हालौ काज सँवारौ।

हे विनती गुरुजी सुनले गलती कछु होय हमार बिसारौ।।


रचना :-

बोधन राम निषाद

[7/29, 6:09 PM] +91 89639 56080: दोहे

गुरु महिमा


अड़बड़ मया दुलार दय, हिरदे मा रख लेव।

राखय सब ला बाँध के, अरुण निगम गुरुदेव।।


सुरुज देव के सारथी, बन उजियारा लाय।

वइसन ही गुरुदेव हा, दया-मया बगराय।।


बरगद के जस पेड़ जी, देथे सुग्घर छाँव।

गुरुवर के आशीष हा, हावय शीतल ठाँव।।


छंद के छ परिवार ला, सींचय पिता समान।

राखय सबके ध्यान जी, अइसन हे अवदान।।


अनुशासित संस्कार दय, जइसे छंद बँधाय।

अंतस करय उजार गा, अवगुण सब मिट जाय।।


उषाकिरण निर्मलकर

मगरलोड

धमतरी(छत्तीसगढ़)

कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा

 कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा


डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।

तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।

हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।

पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।

बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।

सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।


हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।

कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।

फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।

घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।

करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।

सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।


राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।

गुररावत हे साथ पा,  बकरी तक बन शेर।।

बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।

चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।

सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।

डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।


दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।

लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।

आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।

झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।

देखावा अउ झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।

राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।


सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।

दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।

अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।

कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।

होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।

काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।


डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।

छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।

सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।

मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।

पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।

बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी

 ताटंक छन्द गीत

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी


तरिया-नदिया मन भर जाथें, भुइयाँ हा हरियाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


बिजली चमकय बादर गरजय, इंदर दागय गोली ला ।

बड़ उपकारी हावय देवा, भर देवय नित झोली ला ॥


नइ राहय आगी कस गरमी, बरसा देख जुड़ाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


नाँगर-बइला धरे किसनहा, जावय बहरा डोली मा ।

मोर-पपीहा झूमँय-नाचँय, मया भरँय हमजोली मा ॥


ये पानी ले सुग्घर जिनगी, सुख-सुविधा घर आथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


सुवा-ददरिया-करमा गावँय, नर-नारी के टोली हा ।

अन्तस के पीरा हर लेवँय, हँसी-ठिठोली बोली हा ॥


सावन-भादो-क्वाँर महीना, चउमासा कहलाथे जी ।

रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम पानी, सबके मन ला भाथे जी ॥


ओम प्रकाश पात्रे 'ओम'

Thursday, July 9, 2026

अपन खेत म ऐसो का का धान बोवत हव? किसम किसम के धान(सार छंद)

 अपन खेत म ऐसो का का धान बोवत हव?


किसम किसम के धान(सार छंद)


धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।

धरती दाई के कोरा मा, धान गजब लहराही।।


हवै धान के नाम हजारो, कहौं काय मैं भाई।

देशी अउ हरहुना संकरित, मोटा पतला माई।

लाली हरियर कारी पढ़री, धान चँउर तक होथें।

सुविधा देख किसनहा मन हा, खेत खार मा बोथें।

मुंदरिया मरहन महमाया, मछलीपोठी मेहर।

मालवीय मकराम माँसुरी, कार्तिक कैमा कल्चर।

चनाचूर चिन्नउर चेपटी, छतरी चीनीशक्कर।।

बाहुबली बलवान बंगला, बाँको बिरसा बायर।

बिरनफूल बुढ़िया बइकोनी, बिसनी बरही माही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


पंत पूर्णिमा पंकज परहा, परी प्रसन्ना प्यारी।

पूर्णभोग पानीधिन पंसर, नाकपुरी नरनारी।

आईआर अर्चना झिल्ली, अजय इंदिरासोना।

समलेश्वरी सुजाता साम्भा, सागरफेन सरोना।

कालाजीरा कनक कामिनी, करियाझिनी कलिंगा।

साहीदावत सफरी सरना, सरजू सिंदुरसिंगा।।

स्वेतसुंदरी सादसरोना, सहभागी सुरमतिया।

गंगाबारू गुड़मा गोकुल, गोल्डसीड गुरमटिया।

बासमती दुबराज सुगंधा, विष्णुभोग ममहाही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


क्रांति किरण कस्तूरी केसर, नयना बुधनी काला।

कालमूंछ केरागुल कोड़ा, बरसाधानी बाला।

कंठभुलउ केकड़ा ककेरा, कदमफूल कनियाली।

कावेरी कमोद कर्पूरी, कामेश कुकुरझाली

रामकली राजेंद्रा रासी, राधा रतना रीता।

सहयाद्री सन सोनाकाठी, सोनम सरला सीता।

जसवाँ जीराफूल जोंधरा, जगन्नाथ जयगुंडी।

जया जयंती जयश्री जीरा, लौंगफूल लोहुंडी।

सत्यकृष्ण साठिया शताब्दी , बादशाह अन साही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


पूसा पायोनियर नन्दिनी, नाजिर नुआ नगेसर।

गटवन गर्राकाट गायत्री, खैरा रानीकाजर।

रतनभाँवरा राजेलक्ष्मी, आदनछिल्पा रामा।

तिलकस्तूरी तुलसीमँजरी, जवाँफूल सतभामा।

गाँजागुड़ा नवीन नँदौरी, काली कुबरीमोहर।

दन्तेश्वरी दँवर डॅक दुर्गा, दांगी खैरा नोहर।

हहरपदुम हंसा सन बोरो, हरदीगाभा ठुमकी।

लुचई भुसवाकोट भेजरी, लूनासंपद झुमकी।

कलम फाल्गुनी फूलपाकरी, इलायची मन भाही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

पंडवानी गौरव: पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई

 पंडवानी गौरव: पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई 


आल्हा छन्द- *श्रद्धांजलि सुमन*


तीजन बाई जनम धरे जी, जिला दुर्ग गनियारी गाँव।

सुना महाभारत के गाथा, दया-मया के पाइस छाँव।।


तेरह बछर उमरिया मा ही, पहिली बेर मंच मा आय।

धरे पंडवानी के बाना, लिये तमूरा हाथ बजाय।।


बइठे-बइठे गांय सबो ता, तीजन ठाढ़े सुर ला तान।

कभू धनुष ता कभू गदा के, लिये तमूरा बाना जान।।


कड़क अवाज सुनावत जग ला, दुस्सासन के छाती चीर।

करिस परख हीरा के संगी, गुरु तनवीर गुनी गंभीर।।


देश-विदेश म डंका बाजिस, सत्रह देश करे परनाम।

पद्मश्री अऊ पद्मविभूषण, दुनिया जानय तीजन नाम।।


पाँच जुलाई एम्स रायपुर, मा तीजन के छूटिस प्रान।

छत्तीसगढ़ के कंठ सिरागे, रोवत हावय आज जहान।।


लोक कला के सुरुज भुतागे, आँखी मा हे आँसू आय।

अमर रही तीजन बाई हा, जुग-जुग तोर सुजस जग गाय।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2026

विषय-- आवव अइसन गीत लिखन

 गीत 

मात्रा--16--14

विषय-- आवव अइसन गीत लिखन 


मन मानस के द्वार खोल दे,

आवव अइसन गीत लिखन।

जेला सुनके हिरदे झूमय, 

दया मया संगीत लिखन। ।


जिनगी मा संघर्ष भरे अब,

कइसे अजब जमाना हे ।

आज इहाँ अउ काली ऊँहाँ,

ककरो नहीं ठिकाना हे।।

उरभट रद्दा पाट-पाट के, 

ये भुइँया बर प्रीत लिखन। 

मन मानस के द्वार खोल दे। 

आवव अइसन गीत लिखन। ।


भेद-भाव मा भरगे दुनिया, 

बिन सुर राग अलापत हे।

अपने धुन मा मस्त हवय सब,

देखत बड़ा बियापत हे। ।

रहय धरोहर हिरदे भीतर, 

हर मनखे मन मीत लिखन। 

मन मानस के द्वार खोल दे, 

आवव अइसन गीत लिखन। ।


मनखे-मनखे एक बरोबर, 

संदेश हवय भुइँया के। 

दया धरम अउ मीत मितानी,

पहिचान हवय गुइँया के। ।

पबरित होवय सबके अंतस, 

ज्ञान भरे सब रीत लिखन। 

मन मानस के द्वार खोल दे, 

आवव अइसन गीत लिखन। 


सुमित्रा शिशिर

गणात्मक दोहा*

 *गणात्मक दोहा*

18/06/2026



*यगण (122)- *(सृजन शब्द-- नवेली)* 4 बार

नार नवेली रात के, चले सहेली संग।

हँसी ठिठोली गोठ मा, बहुत बिखेरे रंग।।


*मगण (222)-*

घर चौबारा देख लव, कर  पैबारा गोठ।

ये दूराहा प्रेम ला, आजादी दे पोठ।।


*तगण (221)-*

दुखिया ला तत्काल ही, मिलै नहीं आधार।

दुश्मन ये संसार मा, झूठ भरे बाजार।।


*रगण (212)-*

छंद के छ हे गीतिका, मिलै रीतिका ज्ञान।

उज्जर मन मा शोभते, करै साधिका ध्यान।।


*जगण (121)-*

देखव मया दुकान मा, का गरीब के मोल।

देशी सबो समान हे, हमला कहय अमोल।।


सुमित्रा शिशिर

बरखा

 ‎‎‎आजा बरखा रानी* (चौपाई छंद)

‎आजा-आजा बरखा रानी।

‎इहाँ गिरादे झटकुन पानी।।

‎सुरुज देव आगी फेंकत हे।

‎हरर हरर सब ला सेंकत हे।।

‎घाम जनावत हावय भारी।

‎लू मा उपजत हे बीमारी।।

‎तरिया नदिया सबो अँटागे।

‎कुँआ बावली सबो सुखागे।।

‎सुख्खा के आगी तड़पावत।

‎हैंडपंप घलो लड़खड़ावत।।

‎टैंकर आगू नाच लगावत।  

‎पानी बर रोजे कल्लावत।।  

‎बोरवेल के मोटर हाँफय।

‎पानी बिन मशीन हा काँपय।।

‎नल-जल के पाइप रोवत हे।

‎पेड़ काट मनखे सोवत हे।।

‎छोड़व बरखा आना-कानी।

‎तरसत हावँय सबो परानी।।

‎दिखही कब ये बदरी कारी।

‎आही कब तोर इहाँ बारी।।

‎आजा कँसके मार झकोरा।

‎हावँय सब ला तोर अगोरा।।

‎फेर मया बरखा बरसादे।

‎कारी-कारी बदरी ला दे।।

‎टर्र मेचका राग सुनाही। 

‎खेती खार फेर हरियाही।।

‎तरिया नदिया उफान मारे।  

‎दाई आँखी अँसुवन ढारे।।

‎रचनाकार-हेमलाल साहू

‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

चौपई छन्द- *बरसात*

 चौपई छन्द- *बरसात*


तक-तक अम्बर नैना हार। कर दौ बादर अब उपकार।।

सुखगे धरती मरत पियास। बइठे हवॅंय किसान उदास।।


अँगरा कस बरसत हे घाम। रुकगे हे सब खेती काम।।

फटगे भुइॅंया छागे त्रास। टूटत हावय मन के आस।।


भूख पियासे लइका आज। बढ़गे करजा बढ़गे ब्याज।।

सुक्खा अँगना दिखे बिरान। कब आही सुख धरे बिहान।।


जइसे चातक रोवय रात। कब होही कहिके बरसात।।

तइसे तरसत हवॅंय किसान। बोयें बर धनहा मा धान।।


घूमड़-घूमड़ बस करथस शोर। फेर न होवय दर्शन तोर।

करिया बादर अब तो आव। ये जियरा ला मोर जुड़ाव।।


बरसव झमझम धरके धार। मिट जावय दुख हाहाकार।।

अमरित बरसा कर दौ दान। तभे बाॅंचही सबके प्रान।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/06/2026

21 जून अंतरास्ट्रीय योग दिवस पर...... रोला छंद- *योग*

 21 जून अंतरास्ट्रीय योग दिवस पर......


 रोला छंद- *योग*


योग करव सब लोग, योग ले मन हरसाथे।

दूर भगय सब रोग, देह सुग्घर खिल जाथे।।

मन मा भरत उमंग, शक्ति के स्रोत जगाथे।

रहिथे स्वस्थ शरीर, कष्ट तुरते दुरिहाथे।।


चिंता मिटय तमाम, योग मा जब मन लागे।

नइ भटकय जी ध्यान, चेतना भीतर जागे।।

प्राणायाम अनूप, श्वास के गति ला साधे।

मिटे सकल संताप, कभू नइ रोग बियाधे।।


इक्किस जून महान, दिवस ये मंगलकारी।

गूँजत हे सब ओर, योग के महिमा न्यारी।।

नमन करय सब देश, ज्ञान भारत हा पाये।

काया रखे निरोग, मंत्र सब हें अपनाये।।


आवव मिलके आज, प्रतिज्ञा मन मा धारिन।

करबो निशदिन योग, प्रदूषण मन के मारिन।।

स्वस्थ बनय ये देश, इही हे असली पूजा।

योग सरीखे मीत, न जग मा कोई दूजा।।


सिर्फ क्रिया ना योग, कर्म के सीख सिखाथे।

समता के ये भाव, सरी दुनिया मा लाथे।।

योग करे ले लोग, बरस सौ ऊपर जीथें।

गजानंद आनंद, धरे सुख रस ला पीथें।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)21/06/2026

मानसून के अगोरा*

 *मानसून के अगोरा*


मान बात अउ सुन अरजी ला, मानसून महराज।

तोर अगोरा अरझे हावय, जग के जम्मो काज।।

नदियाँ तरिया हर डबकत हे, सुक्खा परगे खार।

फटत करेजा हर भुइँया के, कर दे तैं उपकार।

तालाबेली करत जीव मन,  जमके बरसव आज।।

मान बात अउ सुन अरजी ला...........


पंखा कूलर हफरत अड़बड़, एसी होगे फेल।

तोर बिना सब ठलहा बइठे, तीरी पासा खेल।

बोरे बासी गजब सुहाथे, चटनी संग पियाज।।

मान बात अउ सुन अरजी ला............


बिसा डरे हँव खातू बिजहा, दवई घलो उधार।

माढ़े मूड़ पउँर के करजा, हावय असो करार।

साहूकार के चुकता करहूँ, गिरही नइ ते गाज।।

मान बात अउ सुन अरजी ला..........


तोर आसरा हावन जम्मो, मालिक अउ बनिहार।

घर मा बाढ़े बेटी हावय, दाई परे बिमार।

खेती ले सब आस हमर हे, रखबे तैंहर लाज।।

मान बात अउ सुन अरजी ला...........


काँटा खूँटी लेस डरे हन, जोहत रस्ता तोर,

धरती माँ के प्यास बुझादे, कसके पानी झोर,

कान सुने खातिर तरसत हे, घड़-घड़ के आवाज।।

मान बात अउ सुन अरजी ला, मानसून महराज।

तोर अगोरा अरझे हावय,जग के जम्मो काज।।


                     🙏🙏🙏🙏

              नारायण प्रसाद वर्मा "चंदन"

            ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा(छ.ग.)

                    7354958844

कसके बने दमोर

 सरसी - छंद 

विधान – 16 - 11 

डाड़ – 2 / चरण चार


कसके बने दमोर


सब ला तोरे हवय सहारा, धुर्रा उड़गे खोर । 

तरिया नदिया घलो सुखागे, सुक्खा परगे बोर ।।

लगगे अब चौमासा भगवन, अब तो पानी झोर । 

नाँगर बइला घलो निकलही, कसके बने दमोर ॥


गरमी ले अब प्रान छुट्त हे, लाइन होथे गोल । 

आँधी अंधड़ चलथे भारी, टूटत हावय पोल ॥ 

गिर जा पानी झन तरसा तैं, जादा नइ तो थोर । 

नाँगर बइला घलो निकलही,  कसके बने दमोर ।।


तीपत लकलक चारों कोती, देखव आके हाल । 

सब के मालिक एक तहीं हस, भर दे नदिया ताल।।  

तरतर-तरतर चुहत पसीना, चट चट जरथे खोर । 

नाँगर बइला घलो निकलही,  कसके बने दमोर ।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई जिला केसीजी छत्तीसगढ़

Thursday, June 11, 2026

03 जून विश्व साइकिल दिवस विशेष -

 03 जून विश्व साइकिल दिवस विशेष -


*दोहा छंद- साइकिल*


बिना धुआं के कार ये, बिना तेल के शान।

जेन चलावय साइकिल, वो हे चतुर सुजान।।


सेहत बर वरदान बन, रखथे तन खुशहाल।

पैडल मारव प्यार से, बदल जही हर चाल।।


दूर करय ये रोग सब, तन मा जगय उमंग।

बचपन के सुरता दिला, भरय खुशी के रंग।।


भेद अमीर गरीब के, छोड़ रहय सब साथ।

सस्ता सुंदर सारथी, थामय सबके हाथ।।


आज धरा रोवत हवय, देख प्रदूषण भार।

अपनावव सब साइकिल, करव प्रकृति उद्धार।।


चलव चलिन पटरी पकड़, छू लिन नवा अगास।

करिन सवारी साइकिल, होही जगत विकास।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)03/06/2026

[6/3, 3:26 PM] वासन्ती: साइकिल दिवस के अवसर मा 

मोर रचना सार छंद मा 


    

शीर्षक (  साइकिल  )


1) एक सीट अउ दू पहिया के,सुविधा जनक सवारी।

तीन जून साइकिल दिवस हे,जगत चलावे सारी।।

2)बिगन तेल के येहर चलथे,साइकिल बिसा लेवा।

लइका सियान बड़का छोटे,सबो ला बता देवा।।

3)गाँव गाँव अउ सहर सहर मा,आज साइकिल चलथे।

डामर रोड चला के देखव,हवा से बात करथे।।

4)इस्कुल जाथे लइका मन जी,सबो साइकिल चढ़के।

केरियर मा चिपे रइथे जी,बस्ता  ला भर भरके।।

   

    वसन्ती वर्मा बिलासपुर 🍂

पर्यावरण दिवस विशेष

 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस विशेष*


सरसी छंद- *पर्यावरण*


पर्यावरण दिवस के सब ला, हावय जय जोहार।

रुख-राई ला चलव बचाबो, सुन लौ मोर पुकार।।


रोवत हावय धरती दाई, संकट मा हे प्रान।

पेड़ उजाड़त मनखे मूरख, धरे सुवारथ ध्यान।।


नदिया नरवा कुआँ सुखागे, जल के स्तर गहिराय।

अमरित बोली अमरित पानी, कइसे अब बच पाय।।


जहर घुले हे सबो डहर अब, अधरे लटके साँस।

धुआँ कारखाना हा छोड़े, जिनगी बर बन फाँस।।


प्लास्टिक के उपयोग बढ़ाके, धरा करे बीमार।

कूड़ा कचरा ढेर लगे हे, दुर्गंध के अम्बार।।


जागव-जागव संगी सब अब, सुध लेवव जी आज।

रोकव पेड़ कटाई ला मिल, रखव धरा के लाज।।


एक-एक सब पेड़ लगावव, कर लौ नेक उदीम।

कउहा करंज कसही सॅंग मा, बर पीपर अउ नीम।।


कूक सुने बर पंछी मन के, जंगल पेड़ बचाव।

पशु-पक्षी सब जीव सुखी हो, गीत खुशी के गाव।।


आनी-बानी के संकट ला, मिलके दूर भगाव।

धरती दाई के अँचरा मा, सुख के नदी बहाव।।


करव प्रतीज्ञा मिलके जम्मो, रखबो पेड़ सहेज।

आने वाला पीढ़ी बर हम, रखबो हरियर सेज।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026

[6/5, 8:35 AM] कवि हेम: झन काँटव जंगल झाड़ी ला

‎झन काँटव जंगल झाड़ी ला, जेमन हे जिनगानी।

‎हावय सबके डेरा ओमा, झन कर तँय मनमानी।।

‎  

‎रुख राई सुग्घर घर हावय, सबके ठउर ठिकाना।

‎जीव जंतु हर ओमा रहिथे, झन तँय खोज बहाना।।

‎अपने स्वारथ बर उजार तँय, झन ककरो डेरा।

चिरई चुरगुन रोवत हावय, करहीं कहाँ बसेरा।।

‎दीया बूतागे जिनगी के, मिलय कहीं ना बाती।

‎जब कटे लगिन हे रुख राई, जरगे धरती छाती।।

‎मिले नहीं जी निरमल पुरवाई, अटकत हावे साँसी।

‎बून्द बून्द पानी बर तरसय, जिनगी होगय फाँसी।।

‎सोचव समझव आवव संगी, लगाबोन रुख राई।

‎बाग बगइचा खूब लगावन, निरमल हो पुरवाई।।

‎सुघ्घर धरती ला सम्हारन, पहिरा हरियर लुगरा।

‎मान प्रकृति के रखहूँ संगी, करहूँ झन जी उँघरा।।

‎जंगल झाड़ी रुख राई मा, कतको हवे कहानी।

‎चिरई चुरगुन जीव जन्तु के, अनमोल निसानी।।

‎-हेमलाल साहू

‎गाँव गिधवा, जिला बेमेतरा

[6/5, 1:41 PM] विजेन्द्र: कुण्डलिया छंद -विश्व पर्यावरण दिवस पर 


1.

पीपल बरगद नीम ला, संत सरीखा जानI

गुण के कतका खान ये, जिनगी बर भगवानI

जिनगी बर भगवान, हवा साँसा बर देथेI

बरसा जल गति रोक, प्रदूषण ला हर लेथेI

सहिके गरमी जाड़, हवा ला करथे शीतलI

जिनगी के आधार, नीम बरगद अउ पीपलII


2.

धरती ला बचाय बर, सुघर लगावव पेंड़I

बाचय झन कोनों जगा, मुही पार अउ मेंड़I

मुही पार अउ मेंड़, सुघर दिखही गा हरियरI

आबो-हवा सुहाय, शुद्ध करही गा फरियरI

काटव झन जी पेड़, होय झन भुइयाँ परतीI

इही उदिम हो आज, बचाये खातिर धरतीII


3.

जंगल जम्मो काट के, शहर बसे हें  आजI

घात करत मनखे खुदे, आवत नइये लाजI

आवत नइये लाज, मिटा के सब सुघराईI

हितवा हमरे ताय, काट झन गा रुखराईI

येकर ले संसार, धरा मा मंगल-मंगलI

स्वार्थ अपन तँय छोड़, बाचही तब गा जंगलII


4.

जंगल झाड़ी पेड़ ले, होथे बने बचावI 

रुकथे माटी के तभे, होथे जेन कटावI 

होथे जेन कटाव, फसल बर बड़ नुकसानीI 

आथे पूरा बाढ़, लबालब पानी-पानीI 

माटी रखव सहेज, तभे जिनगी मा मंगलI 

रोकय बने कटाव, पेड़ झाड़ी अउ जंगलII


5.

जंगल मा आरी चलय, प्यासा जम्मों खेतI

पर्यावरण सँवार लव, हो जव तुमन सचेतI

हो जव तुमन सचेत, वृक्ष हे बहुत जरूरीI

वातावरण सुधार, कामना होही पूरीI

पेड़ लगावव आज, सबो के होही मंगलI

टिके सबो संसार, नहीं काटव जी जंगलII


6.

नंदन कानन तब रिहिस, मरूभूमि हे आजI

सुधरय नइ गा आदमी, आवय नइ अउ बाजI 

आवय नइ अउ बाज, जहर महुरा घोरत हेI

काट-काट के पेड़, भाग अपने बोरत हेI 

हवा होय बेकार, रिहिस ममहवना चंदनI 

सूखा पूरा बाढ़, उजरगे कानन नंदनII


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवांँ)

[6/5, 6:50 PM] विजेन्द्र: कुण्डलिया छंद -विश्व पर्यावरण दिवस पर 


1.

पीपल बरगद नीम ला, संत सरीखा जानI

गुण के कतका खान ये, जिनगी बर भगवानI

जिनगी बर भगवान, हवा साँसा बर देथेI

बरसा जल गति रोक, प्रदूषण ला हर लेथेI

सहिके गरमी जाड़, हवा ला करथे शीतलI

जिनगी के आधार, नीम बरगद अउ पीपलII


2.

धरती के श्रृंगार बर, सुघर लगावव पेंड़I

बाचय झन कोनों जगा, मुही पार अउ मेंड़I

मुही पार अउ मेंड़, सुघर दिखही गा हरियरI

आबो-हवा सुहाय, शुद्ध करही गा फरियरI

काटव झन जी पेड़, होय झन भुइयाँ परतीI

इही उदिम हो आज, बचाये खातिर धरतीII


3.

जंगल जम्मो काट के, शहर बसे हें  आजI

घात करत मनखे खुदे, आवत नइये लाजI

आवत नइये लाज, मिटा के सब सुघराईI

हितवा हमरे ताय, काट झन गा रुखराईI

येकर ले संसार, धरा मा मंगल-मंगलI

स्वार्थ अपन तँय छोड़, बाचही तब गा जंगलII


4.

जंगल झाड़ी पेड़ ले, होथे बने बचावI 

रुकथे माटी के तभे, होथे जेन कटावI 

होथे जेन कटाव, फसल बर बड़ नुकसानीI 

आथे पूरा बाढ़, लबालब पानी-पानीI 

माटी रखव सहेज, तभे जिनगी मा मंगलI 

रोकय बने कटाव, पेड़ झाड़ी अउ जंगलII


5.

जंगल मा आरी चलय, प्यासा जम्मों खेतI

पर्यावरण सँवार लव, हो जव तुमन सचेतI

हो जव तुमन सचेत, वृक्ष हे बहुत जरूरीI

वातावरण सुधार, कामना होही पूरीI

पेड़ लगावव आज, सबो के होही मंगलI

टिके सबो संसार, नहीं काटव जी जंगलII


6.

नंदन कानन तब रिहिस, मरूभूमि हे आजI

सुधरय नइ गा आदमी, आवय नइ अउ बाजI 

आवय नइ अउ बाज, जहर महुरा घोरत हेI

काट-काट के पेड़, भाग अपने बोरत हेI 

हवा होय बेकार, रिहिस ममहवना चंदनI 

सूखा पूरा बाढ़, उजरगे कानन नंदनII


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवांँ)


सुधार कर पुनः 🙏

[6/5, 7:41 PM] बोधन जी: *पर्यावरण - मत्तगयन्द सवैया*


पेड़ कटावत जंगल के अब चातर होवत कोन बचाही।

जीव जिनावर जाय कहाँ इँखरो सुख सोचव जी छिन जाही।।

बाँध सुखावत नीर बिना विपदा अब देखव दौड़त आही।

चेत करौ अब पेड़ लगावव ये भुइयाँ तब तो हरियाही।।


शुद्ध हवा बिन पेड़ कहाँ अब दूषित होवत जावत हावै।

साँस इहाँ महँगा कस लागय देखव लोग बिसावत हावै।।

देख अगास धुआँ सब डाहर जाहर रूप उड़ावत हावै।

सूरज देव घलो अब तो धमका बहुते बरसावत हावै।।


बाढ़त हे गरमी अब तो नदिया-नरवा-रुख आज सुखावै।

का दिन बादर आय हवै अब सूरज देव जरावत हावै।।

नीर बिना तड़पै सब जीव बता कइसे अब प्राण बचावै।

हे भगवान करौ बरसा सब जीव इहाँ हिरदे जुड़वावै।।


रचना :-

बोधन राम निषादराज "विनायक"

सहसपुर लोहारा, जिला - कबीरधाम (छ. ग.)

[6/6, 3:44 PM] बृजलाल दावना, धमतरी: पेड़ कहे झन काटव रे -मत्तगयंद सवैया 211×7+22


स्वारथ खातिर काटत हौ ,  मनखे मन आज सबे रुखराई।

पेड़ कहे झन काटव रे ,  मँय जीयत हौं तुँहरे बर भाई ।

घेर लिही तुमला कुछु रोग त  , मैंहर देहुँ अचूक दवाई।

वंश ल मोर बचाव तभे , तुँहरो सब वंश रही सुखदाई। 



संत कहै सुनले मनवा , तरिया नदिया खँड़ पेड़ लगाबे।

काज हरे परमारथ के , जिनगी म कभू झन तैं ग भुलाबे।

सींचत साँझ बिहान सदा , अपने लइका अस तैं सुख पाबे ।

बाढ़ जही जब ओ रुखवा ,  छँइहा म तँहू हर जीव जुडाबे।


बृजलाल दावना भैंसबोड़

Tuesday, May 26, 2026

नवटप्पा के मार (मनहरण घनाक्षरी )

 नवटप्पा के मार 

(मनहरण घनाक्षरी )

--------

ताते तात झाँझ झोला , लेसावत हावै चोला,

जेठ लगे नवटप्पा ,भारी इँतरात हे।

सुक्खा कुआँ तरिया हे, मरे मरे झिरिया हे,

बोरिंग हा ठाढ़े ठाढ़े , रोज्जे दुबरात हे।

रोवत हें रुखराई, नदिया के मुँह झाँई,

धरती के देख देख, जीवरा कल्लात हे।

ईंटा भट्ठी आवा कस, भँभकत जग हावै,

भात बासी नइ भावै ,धूँकनी सुहात हे ।1।


बूँद बूँद पानी बर, लोगन बेहाल हावैं,

तरस तरस पशु , तजत परान हें ।

भाँय भाँय खेत खार, सुन्ना लागे घर द्वार ,

धरे रोग माँदी दाबे, सब हलकान हें।

धमका धमक आगे, हवा देख उठ भागे,

भोंभरा मा पाँव जरे, जरे मुँह कान हें।

वो असाड़ कब आही, जेन जीव ला बँचाही,

लागथे अबड़ संगी, रुठे भगवान हें ।2।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Thursday, May 14, 2026

कुंडलियाँ छ्न्द-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 कुंडलियाँ छ्न्द-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


*घरो घर सरकार के दारू*


दारू हा सरकार के, घर घर पहुँचय आज।

बिगड़े शिक्षा स्वास्थ हे, आय कहे मा लाज।

आय कहे मा लाज, देख के अइसन सब ला।

जनता हें लाचार, बजावै नेता तबला।

पीयाये बर मंद, हवै सरकार उतारू।

आफत के हे बेर, तभो घर पहुँचय दारू।


पानी बादर देख के, संसो करय किसान।

बंद बैंक बाजार हे, नइहे खातू धान।

नइहे खातू धान, किसानी कइसे होही।

बिन खातू बिन बीज, खेत मा काला बोही।

भटके बहिर किसान, करे बर धरती धानी।

पहुँचावय सरकार, घरों घर दारू पानी।।


जइसे दारू देत हव, तइसे दव सब चीज।

घर मा शिक्षा स्वास्थ सँग, देवव खातू बीज।

देवव खातू बीज, योजना ला सरकारी।

पावै मान किसान, भरे लाँघन के थारी।

रहिथे बड़ दुरिहाय, जरूरी सुविधा कइसे।

काबर नइ पहुँचाव, यहू ला दारू जइसे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Monday, May 4, 2026

सरसी छंद-पहुना बेटी*

 *सरसी छंद-पहुना बेटी*


सातो भाँवर सात वचन अउ,चुटकी भर सिंदूर।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर।।

छूट जथे सग भाई बहिनी, गाँव सखी परिवार,

खेल खिलौना संग सहेली,मंदिर तरिया पार,

गोद ददा दाई के छूटे,समय बने बड़ क्रूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर...


हाय विधाता अजब बनाए, तैंहर जग के रीत,

पर के बेटी पर के बेटा, जोड़ दिये बड़ प्रीत,

पर के कुँदरा बने बसेरा, एखर काय कसूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर....


आँसू मा भींगे अँखियाँ हर,मन मा खुशी अपार,

नवाँ नता माँ बाप पिया घर,एक नवाँ संसार,

फूल मिलय चाहे काँटा सब,नोनी ला मंजूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर.......


     🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छ.ग.

       7354958844

*दोहा-बिहतरा कपड़ा*

 *दोहा-बिहतरा कपड़ा*


चार हाथ के चेंदरा, कइसन रीत निभाय।

काम आय ना काखरो, नाँचत खाँध लजाय।।

कोनो हर पहिरय नही, नइ कोनो हर भाय।

फेर इही फरिया बिना, पहुना घात रिसाय।।


कपड़ा नेंग बिहाव के, देथन जे उपहार।

देखा-देखी मा बने, लिलहर के मुड़ भार।।

विरथा उरकय जेब हर, पनकत साहूकार।

फँसत उधारी मा कहूँ, बेंचत खेती-खार।।


लेनदेन मा हे टिके, अगर प्रेम व्यवहार।

फेर हमर रिश्ता नता, हाबय सब बेकार।। 

हमर प्रीत के बीच मा, वस्तु बनय आधार।

चिंतन करव सुजान तब, माँगत समय सुधार।।


सोंच बने आवय नही, जब ये कखरो काम।

फेर दिखावा ले भला, का मिलही परिणाम।।

सुग्घर छाँट निमार के, देथन भारी दाम।

तब ले आय पसंद ना, देवव फेर विराम।।


का गिनहा बनही बने, नइहे जब उपयोग।

अइसन रीति रिवाज तब, हे समाज बर रोग।।

नवाँ गृहस्थी ला मिलय, जमके आशीर्वाद।

दव पंदोली थोरकिन, हो जाही आबाद।।


दू आत्मा मिलथे जिहाँ, होवय जबर उछाव।

फरिया खातिर फेर झन, मन मा आय कुभाव।।

प्रथा कहूँ अड़चन बनय, करय विवश लाचार।

छोंड़व जुन्ना रीत तब, टोरव ये दीवार।।


लगे रीत मा खोट जब, करलव बने विचार।

सुधर जही मतभेद हा, बस लगही दिन चार।।

बनही परिपाटी नवाँ, करबो जब व्यवहार।

बढ़ही देश समाज हा, होही नित उजियार।।



🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

आल्हा छंद- *मजदूर*

 आज एक मई मजदूर दिवस मा मजदूर भाई मन ला सादर समर्पित-


 आल्हा छंद- *मजदूर*


जेखर खून पसीना ले ये, धरती चमके सोन समान।

उड़े मेहनत के खुशबू हा, बनके जग जन बर वरदान।।


जेखर दम ले दुनिया चलथे, सदा ओखरे जय-जयकार।

माथ नवाँ के गजानंद जी, करय नमन नित सौ-सौ बार।।


बड़े-बड़े घर महल अटारी, सिरजाये जे खुद के हाथ।

खेल बिधाता तोर गजब हे, आज उही हे देख अनाथ।।


लोहा काट बनावय रद्दा, देवय बज्जर फोड़ पहाड़।

नवजुग के बन इही रचयिता, भरथे शेर समान दहाड़।।


माटी सॅंग माटी हो जाथे, तब जाके उपजाथे अन्न।

भारत भुइॅंया के सेवा कर, रहिथे जी मजदूर प्रसन्न।।


भीख काखरो ले नइ माँगय, नइ तो हाथ कभू फइलाय।

अपन पसीना करम कमाई, के दम मा घर द्वार चलाय।।


कोनों छोटे बड़े नहीं हे, श्रम हा सब ले बड़े प्रधान।

सुन संगी मजदूर बचाथे, हमर देश के ऊँच मियान।।


आज मई के पहिली तारिख, आवव गढ़बो नवा सुराज।

हक अधिकार दिलाये खातिर, करबो मिलके संगी काज।।


न्याय मिलय सम्मान मिलय अउ, सबो हाथ मा राहय काम।

मजदूर हवय आधार जगत के, उॅंखर बदौलत हे सुख धाम।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

चकोर सवैया -"बनिहार के दिन"

 चकोर सवैया -"बनिहार के दिन"

एक मई गुण गावव आवव‌ देवव ये मजदूर ल मान।

ये जग मा जतका गढ़ना गढ़थे सुरता कर लौ गुणगान।।

जाँगर टोर कमावत हें जिनगी भर छाँव न हे पहिचान।

दूसर ला महला मँजला अपने घर छावत झोपड़ तान।।


झेलत हावँव जी दुख हार न मानत जींयत खावत जाँव।

खोजत जाथँव आस लगावत आज भला मिलही ग थिराँव।।

पेलत जाथँव घात पछेलत भोगत रोवत फेर मनाँव।

होवत देख खुवार खड़े मन मा बनिहार हरौं पछताँव।।


हाँसत गावत बीतत जावत हे जिनगी अब सुग्घर मोर।

चार सखा मन संग बितावत बाँटत लेवत जाँव अँजोर।।

पाथँव प्रेम पिरीत सबो मन ले बिसराथँव पीर बटोर।

तीरथ मोर हरे गँवई सगरो बर राहय गंग चिभोर।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

दोहे

 दोहे


दोहा लिखबो मिल सबो, गुरु के आज्ञा मान।

शब्द सजाबो भाव ले, सिखबो नियम विधान।।


चार चरण के छंद हे, गति-लय यति ठहराव।

कुल मात्रा चौबीस जी, एक डाँड़ बइठाव।।


तेरह मात्रा ले सजे, विषम चरण हा जान।

ग्यारह मात्रा ले बढ़य, सम पद के जी शान।।


त्रिकल-त्रिकल दू बार हो, द्विकल बाद मा आय।

दू चौकल मिलके घलो, अठकल योग बनाय।।


गुरु-लघु-गुरु रखना सदा, विषम चरण के अंत।

सम के अंतिम छोर मा, दीर्घ-ह्रस्व हो संत।।


पचकल ले होवय नहीं, कभू चरण शुरुआत।

जगण बिठावव सोचके, ध्यान रखव ये बात।।


जगण अगर चरणांत हो, अइसे करव निदान।

त्रिकल बाद वोला रखव, कहिथे छंद विधान।।


रखव जगण ला बीच मा, तब मितान दे ध्यान।

आगू-पाछू रख द्विकल, हे उपाय आसान।।


सबो नियम ला साध के, लिख लव दोहा छंद।

पाठक के मन भाय जी, मिलही तब आनंद।।


उषाकिरण निर्मलकर

मगरलोड

धमतरी(छत्तीसगढ़)

Tuesday, April 21, 2026

स्थापना दिवस

 स्थापना दिवस


छंद के तो साधना मा, बीते हे ये दस साल,

सबो के तो मीत सदा, मिले संग-संग हे।

"छंद के छ" छाया मा जी, ज्ञान के अलख जगे,

मन मा रचे हे गाढ़ा, गुरु कृपा रंग हे।।

भाव के हे सेतु बंधे, छंद रस नित बहे, 

हर शनि रविवार, मंच मा उमंग हे।

अक्षय तृतीया आज, सधही जी शुभ काज,

साधक पुराना नवा, छंद मा मतंग हे।।


दशक पड़ाव पार, लाये हे खुशी अपार,

"छंद के छ" सुमन ले तो, सजे परिवार हे।

भाषा के सेवा मा लगे, छंद परिवार सदा,

व्याकरण लय-ताल, लेखन आधार हे।।

कोना-कोना महके हे, सोन चिड़ी चहके हे,

छंद के प्रकाश ले तो, मिटे अंधकार हे।

छंद कारवां हा बढ़े, नव इतिहास गढ़े,

सत्यबोध छत्तीसगढ़, गूॅंजे जयकार हे।।


✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/04/2026

साधक - सत्र-2

सरसी छंद-पहुना बेटी*

 *सरसी छंद-पहुना बेटी*


सातो भाँवर सात वचन अउ,चुटकी भर सिंदूर।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर।।

छूट जथे सग भाई बहिनी, गाँव सखी परिवार,

खेल खिलौना संग सहेली,मंदिर तरिया पार,

गोद ददा दाई के छूटे,समय बने बड़ क्रूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर...


हाय विधाता अजब बनाए, तैंहर जग के रीत,

पर के बेटी पर के बेटा, जोड़ दिये बड़ प्रीत,

पर के कुँदरा बने बसेरा, एखर काय कसूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर....


आँसू मा भींगे अँखियाँ हर,मन मा खुशी अपार,

नवाँ नता माँ बाप पिया घर,एक नवाँ संसार,

फूल मिलय चाहे काँटा सब,नोनी ला मंजूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर.......


     🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छ.ग.

       7354958844

अक्ती तिहार -------------------



अक्ती तिहार

-------------------

शुभ मुहरत अक्षय तिथि हावय, कहिथें वेद पुरान।

एही दिन तो सतयुग त्रेता, रचे रहिस भगवान।।


चलौ मनाबो जुरमिल अक्ती, पावन तीज तिहार।

कर बिहाव पुतरा पुतरी के, सुग्घर साज सँवार।।


अक्षय फल मिलथे ये दिन तो,करना चाही दान।

जइसन देथे तइसन पाथे, पुण्यात्मा इंसान।।


प्यासा पंछी बर बिरछा मा, भरे सकोरा टाँग।

प्याऊ खोले भरदे करसी, राही पीही माँग।।


हे बइसाख मास मा गरमी,मनखें बइठ थिरायँ।

छोटे मोटे कुँदरा छादे,आसिस देके जायँ।।


कोनो दुखिया के बेटी के, करदे आज बिहाव।

भुँखहा ला दू कौर खवादे, लेही तोरे नाव।।


दीन हीन के आँसू पोंछे,  होही गंगा स्नान।

तिरथ बरत घर मा हो जाही, सफल जिंदगी मान।।


मन पतंग के डोरी थामौ, उड़ही भरे उमंग।

अनुशासन जीवन मा आही,सुख नइ होही भंग।।


देश प्रेम के अलख जगाबो, नइ त्यागन संस्कार।

भेदभाव के खाई पाटे, समता भाव उभार।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Sunday, April 19, 2026

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

अक्ती तिहार -------------------

 

अक्ती तिहार

-------------------

शुभ मुहरत अक्षय तिथि हावय, कहिथें वेद पुरान।

एही दिन तो सतयुग त्रेता, रचे रहिस भगवान।।


चलौ मनाबो जुरमिल अक्ती, पावन तीज तिहार।

कर बिहाव पुतरा पुतरी के, सुग्घर साज सँवार।।


अक्षय फल मिलथे ये दिन तो,करना चाही दान।

जइसन देथे तइसन पाथे, पुण्यात्मा इंसान।।


प्यासा पंछी बर बिरछा मा, भरे सकोरा टाँग।

प्याऊ खोले भरदे करसी, राही पीही माँग।।


हे बइसाख मास मा गरमी,मनखें बइठ थिरायँ।

छोटे मोटे कुँदरा छादे,आसिस देके जायँ।।


कोनो दुखिया के बेटी के, करदे आज बिहाव।

भुँखहा ला दू कौर खवादे, लेही तोरे नाव।।


दीन हीन के आँसू पोंछे,  होही गंगा स्नान।

तिरथ बरत घर मा हो जाही, सफल जिंदगी मान।।


मन पतंग के डोरी थामौ, उड़ही भरे उमंग।

अनुशासन जीवन मा आही,सुख नइ होही भंग।।


देश प्रेम के अलख जगाबो, नइ त्यागन संस्कार।

भेदभाव के खाई पाटे, समता भाव उभार।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Wednesday, April 1, 2026

सखी छंद सूरज राजा

 सखी छंद 


सूरज राजा 


सूरज आय दिखै ताजा।

रोज सुबे दरसे राजा।


पूरब ले वो निकले हे।

जइसे कुहकू बुक ले हे।


सुनहा किरण बिखेरे हे।

सात अश्व रथ फेरे हे।


शनि राजा के बाबू जी।

रखै हवै बड़ काबू जी।


दहके धरा भुँजा जाथे।

हे प्रचंड अग्नी माथे।


बड़े छोट वो नइ माने।

सब ला अपने ही जाने।


सब ला सम रौशन देथे।

बदला मा कुछ नइ लेथे।


पत्नी संज्ञा अउ छाया।

बेटी भद्रा हे माया।


सब ले बढ़ के वो दानी।

रोज सुबे देवव पानी।


रखौ एक ताँबा लोटा।

सुबे अर्घ देवव बेटा।


जेन सुरुज के गुन गाही।

"शर्मा बाबू" सुख पाही।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू✍️

कटंगी-गंडई 

जिला केसीजी छत्तीसगढ़

तरु वंदना* *डमरू घनाक्षरी*

 *तरु वंदना* *डमरू घनाक्षरी* 


 कल-कल जल थल, फल भर भर कर, 

सब कर मन हर, तरु वर बन कर।

 तपन हरत पल, नभ तक मग कर,  

जन मन धन भर, पर-हित रट कर।

अचल रहत मग, डगर-डगर पर,  

सघन सरल बन, पवन चलन कर।

मरु थल दल दल, थल जल भर कर,  

हर दम बर बस, फल रस भर कर।


धर धर सर कर, थर-थर नभ थर,  

कमल नयन सम, सजल नयन भर।

उपवन गमन कर, मन हर पल भर,  

नमन करत जन, तरु वर पद पर।

जगत भरत बल, गगन तपन हर, 

डगर डगर चल, शकल सकल भर।

भजन करत मन, अजर अमर कर,  

डगर डगर थल, सफल सकल कर।


सरल गरम पल, नरम नरम कर,  

शहर शहर चल, डगर डगर भर।

करम धरम कर, भजन मनन कर,  

गमन गमन कर, नमन नमन कर।

सघन वरण कर, मरण हरण कर,  

शरण शरण कर, हरण हरण कर।

खग बसत सतत, सतर-मतर कर,  

कलभ नमन कर, चपल चरन धर।


भरत भरत भर, जरत जरत हर,  

परत परत पर, शरत शरत कर।

पवन चलत सर, लपट दहन हर,  

चमन चमन कर, वतन वतन भर।

नवल नवल कर, धवल धवल कर,  

अमल अमल कर, विमल विमल कर।

अकल शकल कर, सकल सफल कर, 

तरु वर बन कर, सब कर मन हर।



तोषण चुरेन्द्र दिनकर 

धनगांव डौंडी लोहारा 

बालोद छत्तीसगढ़

पावन हवय ये देश हा ============= हरि गीतिका छंद

 पावन हवय ये देश हा 

=============

हरि गीतिका छंद 


पावन हवय ये देश हा, श्री राम के जनमन इहाँ।

लेवत सुबेरे नाम ला, मनखे सबो तरथन इहाँ।

वोखर ममा के गाँव हे,अउ कौसला जी नाम हे।

भाँचा हवै हमरो नता, छत्तीसगढ़ हा धाम हे।।


ये भूमि हे भगवान के,कण कण बसे प्रभु राम हे।

जीवन मरन सुख दुख सबो,अब वोखरे ही काम हे।।

तारण उही मारन उही,जम्मो जगत आधार हे।

वोखर बिना जिनगी नही,जीना घलो बेकार हे।


माया रचे वोखर सबो, धरती सरग आकाश मा।

पानी पवन आगी सबो,हे सृष्टि के हर श्वांस मा।

पत्ता घलो हिलय नहीं, प्रभु के बिना संसार मा।

जब-जब बुलाये भक्त,तब-तब दउँड़ आथे प्यार मा।।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू कटंगी-गंडई जिला केसीजी

Friday, March 20, 2026

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

Saturday, March 14, 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Tuesday, March 10, 2026

महिला दिवस विशेषांक बरवै छंद

 चित्रा श्रीवास: महिला दिवस विशेषांक


बरवै छंद



नोहवँ मैहा देवी ,अतका जान।

समझव मोला मनखे, देवव मान।।

देवी कहिके करथव, अत्याचार।

हिंसा झगड़ा दाहिज,देथव मार।।

सुन जीये के मोरो, हे अधिकार।

मै हा हाववँ जिनगी, के आधार।।

नारी हावय नर के,आधा भाग।

माँ पत्नी बेटी बन,करथे त्याग।।

भेदभाव ला छोड़व, राखव मान।

दुनो एक गाड़ी के,चक्का आन।।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

💐💐💐💐💐💐💐💐

 मुकेश 16: (महिला दिवस विशेष)


नारी शक्ति--- बरवै छंद


नारी मन के महिमा, अपरंपार।

सुमता मा राखँय जी, घर परिवार।।


आज करत हें उन मन, जम्मों काम।

पढ़-लिख बने कमावत, हावँय नाम।।


नारी बिन हावय गा, जग अँधियार।

माँ बेटी पत्नी बन, बाटँय प्यार।।


रानी दुर्गा लक्ष्मी, बनिन महान।

बैरी मन ले लड़के, देइन प्रान।।


बने चलावत हावँय, अब सरकार।

राजनीति मा बनके, भागीदार।।


बड़े-बड़े ग्रंथन हा, करय बखान।

शक्ति स्वरूपा नारी, देवव मान।।


मान गउन सब झन ला, दँय हरहाल।

करँय सदा पति सेवा, जा ससुराल।।


दुनिया भर मा अब तो, होवय शोर।

नइहें नारी अबला, अउ कमजोर।।


ओलंपिक उन खेलँय, गा मैदान।

मेडल जीत बनावँय, जी पहिचान।।


नारी मन हें जग के, सिरजनहार।

मातृ रूप मा पूजय, अब संसार।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

💐💐💐💐💐💐💐

 


नारी के महिमा

( त्रिभंगी छंद)


हिरदे मा ममता, सब बर समता , अँचरा मा सुख, छाँव रहै ।

गुन ला सब गावैँ, माथ नवावैँ , जग महतारी , बेद कहै ।।

वो हर ए नारी, महिमा भारी, बेटी बहिनी , रूप धरै ।

लाँघन तक रहिके, बिपदा सहिके , बाँटत कौंरा , दुःख हरै ।।


जग ला तैं सिक्छा, अगिन परीक्छा, देथस माता , बखत परे।

दुर्गा बन जाथस , लास बिछाथस ,  काली चंडी , रूप धरे ।।

सावित्री मइया , तैं अनुसुइया , मातु जसोदा , आच तहीं ।

हे विस्वमोहनी , करौं सुमरनी , तैं अबला अच , नहीं नहीं ।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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*विषय - नारी शक्ति*

       *सार छंद*


हावय संगी नारी मनके, महिमा अड़बड़ भारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


कभू हार नइ मानै येमन ,कतको बाधा आवै।

अपन आखरी साँस चलत ले ,नारी धरम निभावै।

संत देव ऋषि ज्ञानी ध्यानी,हवय इँकर आभारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


झन समझौ जी अब इनला तुम, शक्तिहीन अउ अबला।

बात रथे जब इँकर मान के,कँपा देत इन जग ला।

करव सदा सम्मान इँकर सब,होथें इन अवतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी। 


अलग अलग रुप मा येमन हा, ये दुनिया मा आथे।

दया मया बगराके सुग्घर,जिनगी ला महकाथे।

इहीं रूप देवी दुर्गा के,आवय जग महतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी।

 

 अमृत दास साहू 

   राजनांदगांव

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

दोहा

नारी घर के हे धुरी, नारी ले संसार।

गुन गावत हे देवता, महिमा अपरंपार।।


रौनक सबो तिहार के, सुखी रखय परिवार।

नारी मन ममता भरे, देथे शुभ संस्कार।।


तज देथे सुख ला अपन, दया मया के छाँव।

सरग सही होथे धरव, माँ के पबरित पाँव।।


बेटी बहिनी रूप मा, नारी दव सम्मान।

अन्न रतन धन ले बड़े, होथे कन्यादान।।


सोंध-सोंध महकत रहय, किसम -किसम पकवान।

नारी ले होथे परब, गुन के ओहर खान ।।


डॉ. दीक्षा चौबे

Thursday, March 5, 2026

फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता

 फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता



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आया फागुन मास सुहावन, स्वागत गीत सुनाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


फूलों सा मन खिल-खिल जाए, टेसू वाली होली से।

दुश्मन का भी जीत हृदय लो, मोहक हँसी ठिठोली से।

झूम नगाड़ों की थापों पर, राग फगुनवा गाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


प्रेम रंग में रँगो जरा सा, गोरे-गोरे गालों को।

हो जाने दो मस्त पवन सा, बहकी-बहकी चालों को।

करो शरारत स्नेहिल मितवा, मिल हुड़दंग मचाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


गले लगाओ दीन-दुखी को, ज्यों मधुरस की गोली हो।

बहे रंग की निर्मल धारा, मर्यादित ही होली हो।

भरे हृदय का रिक्त कलश वो, रंग पलाशी लाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*



         *डॉ. इन्द्राणी साहू"साँची"*

         भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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अनुज छत्तीसगढ़ी 14


: कुंडलिया छंद

आगे होली के परब, मया रंग ला बाँट।

मन के खटखट छोड़ के, हिरदे ला तँय साँट।।

हिरदे ला तँय साँट, मया के बाँटा करले।

दया-मया के रंग, हाथ मा संगी धरले।।

जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी-ठिठोली।

भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।

अनुज छत्तीसगढ़िया 

पाली जिला-कोरबा


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 सिंहावलोकन दोहें

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


गाँव-गाँव मानत हवैं, होली परब तिहार।

रंग बिरंगी सब दिखै, नाचत कुहकी पार।


नाचत कुहकी पार के, डंडा धर-धर आज।

झूल-झूल नाचत हवैं, कनिहा फेंटा साज।।


कनिहा फेंटा साज के, जावत टोली संग।

नाक कान बोथाय हे, रंग लगे सब अंग।।


रंग लगे सब अंग मा, नइ चिनहावत लोग।

पहिने चूंदी खोपड़ी, किसम -किसम के जोग।।


किसम-किसम के जोग हे, तुतरू पों-पों शोर।

ढोल नगाड़ा जब बजै, "बाबू" कूदय खोर।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई 

 जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़

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*होली*


आगे फागुन धर के होली,खेलव रंग गुलाल। 

हरिहर पींयर लाल रंग मा,रंगव सबके गाल।। 

जोगीरा सारा रा रा रर


छोड़व झगरा हँस गा लव जी,जुरमिल के हमजोली। 

नाचव गावव खुशी मनावव,आगे फागुन होली।। 

जोगीरा सारा रा रा   ररररर


परसा फूले लाली-लाली, भर लव ओखर रंग। 

मुहूँ  गाल मा चुपर-चुपर के,करव खूब हुड़दंग।।

जोगीरा सारा ररर


वृंदावन बरसाना देखव,मचे हवे बड़ धूम। 

मया पिरित के अद्भुत गाथा,हिय ला लेते चूम।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


लुका - लुका  लइका मन मारें, पिचकारी के धार। 

का नान्हे का बड़का कहिबे,सबके हरे तिहार।। 

जोगीरा सारा  


बन -ठन भाटो हा आइस हे, होरी मा ससुरार। 

उज्जर रंग ह करिया होगे,सारी के सत्कार।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


संगी साथी जीजा -सारी, करँय ठिठोली खूब। 

लजकुरिया भौजाई नाचय,भांग नशा मा डूब।। 


जोगीरा सारा ररर रररर रा


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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शक्ति छंद----- फाग


मजा देख लेवत, हवै फाग के।

जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के।।

लगे फूल मउहा, सबो डार मा।

बने देख झूमत, हवै खार मा।।


गली खोर माते, सबो के मजा।

बने आज कसके, नँगारा बजा।।

लगादे बने रंग,  ला गाल मा।

चले फाग के गीत, अब ताल मा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली कोरबा(छ.ग.)


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होली के रंग, टोली के संग


होली के दिन निकले टोली, उड़ही रंग गुलाल।

प्रेम रंग मा बुड़ही लोगन,  होही  माला माल।।

अंतस बजही ढोल नगाड़ा,  उमड़त आज उमंग।

धरम-करम रद्दा मा चलही, भिजही जम्मो अंग।।

दया दृष्टि के सागर गहरा, नइय मिलय मन थाह।

काम क्रोध मन होथे उथला, एकर  होथे  दाह।।

नशा मुक्त जिनगी ला जीबो,  सुग्घर बनही काज।

ज्ञान सुधा रस कस के पीबो, नइ अऊ गिरय गाज।।

सद्गुण गति के पानी सींचो, भर पिचकारी मार।

अवगुण हा धोवा के निकले, निकलत धारे धार।।

चलो मनाबो सुग्घर होली,  भाई चारा संग।

अमिट रंग मा अंतस भींजे, बदलँव जम्मो ढंग।।

बैर भाव ला श्रवण छोड़ के, परब मनावँव साथ।

बढ़िया मौका आज हरे जी, मत खींचो तुम हाथ।।


रचयिता : धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री

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: छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में। 

रंग डार फगुनवा चटक चढ़े, 

रंग डार फगुनवा में। 


बौर लगे हे अमराई में, 

गूँज उठत मन शहनाई मे, 

सब रस वन्ती फभत बसंती, 

मनुहार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


धरती अंबर सजत बसंती, 

चटक रंग चढ़ते लजवंती,। 

लटक झटक के चल सतवंती, 

ब्रज नार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


वृंदावन के कूँज गली में, 

रंग गुलाल मली मली में, 

खनक झनक पायल करती 

झंकार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


सुमित्रा शिशिर

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होली


आया फागुन लेकर होली,

सजते हैं बच्चों की टोली।

घर आंगन छायी रंगोली,

रंग घड़ा में राधा घोली।।


वो कान्हा की मीठी बोली,

साथ चले आते हमजोली।

मीत सुदामा खाली झोली,

माथे पर है चंदन रोली।।


आज मचेगा धूम धड़ाका,

आया है गोकुल का बांँका।

ज्यों ही लाला माखन ताका

छाया नीरव बंद ठहाका।।


नंद-यशोदा डांट लगाए,

नटखट मोहन दूर भगाए।

जिद्दी कान्हा फिर-फिर आए,

मैया के आंँचल छिप जाए।।


होते घर में खूब तमाशा,

बांँटे सबको खील बताशा।

पिचकारी ने रंग तलाशा,

कान्हा से पूरी हो आशा।।


बीते दिन अब आई रातें,

याद रहे होली की बातें।।

पाँच विकारों पर हो घातें

पावन हो हर रिश्ते नाते।।


✍️ पुनाराम वर्मा बैकुंठ🙏


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कुंडलियां छन्द- *होली*


होली मा तो होलिका, जलथे जी हर साल।

नारी के अपमान ये, नारी करे सवाल।।

नारी करे सवाल, रीति ये कोंन बनाइस।

पुरुष प्रधान समाज, एक नारी ल जलाइस।।

सत्यबोध हुडदंग, करे बर ठाढ़े टोली।

कर नारी अपमान, मनाथें लोगन होली।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[3/4, 3:10 PM] अमृतदास साहू 12: *होली* (सार छंद)

नाचत गावत धूम मचावत,आवत हे हमजोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल ,खेलत हें सब होली।


कोनो पिंवरा कपड़ा पहिरे, कोनो पहिरे सादा।

कोनो मारे लिटिल पैक अउ, कोनो मारे जादा।

मजा उड़ावत हावय अड़बड़,देखव इंकर टोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


फाग गीत के धुन मा सबझन,नाचत हावय भारी।

नन्द लाल के रूप धरे हे ,मारत हें पिचकारी।

लइका बुढ़वा जम्मो झन सब,अड़बड़ करत ठिठोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


माते हावय सबझन संगी, पीके अड़बड़ दारू।

घर के आगू के नाली मा, गिरगे हवय समारू।

डगमग डगमग रेंगत हावय,खाय भांग के गोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली। 


मन ले इर्ष्या द्वेष भुलाके, रंग लगावत लाली।

जात पात तज गला मिलत हे, मानवता के माली।

मीठ मीठ बोलत हावय सब,अड़बड़ गुरतुर बोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल, खेलत हें सब होली।


रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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[3/4, 3:20 PM] पद्मा साहू, खैरागढ़ 14: 33.

    *जिनगी के होली* 

            (आल्हा छंद )

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।

बाहिर के मन रंग छोड़ के, मनवा भीतर के मन रंग।।



रंग गुलाबी मा होली के, अंतस  ला देवव  मुसकान।

मया रंग मा भीगय हिरदे, कर लौ ईश्वर ले पहिचान।।

पक्का  रंग  पिरित  के  पाके, मिट जावय भीतर के जंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


इन्द्रधनुष कस ये जीवन मा, सात रंग के होवय मेल।

देखव अंतस  के आँखी  मा, आत्मिक सुख होली के खेल।।

भक्त  रंग  के  फाग  उड़ै  ले, बदल जाय जिनगी के ढंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


डारव  संगी  रंग  अबीरा, टूटे झन जिनगी के आस।

परमात्मा संग मिले आत्मा, जइसे गुझिया मिले मिठास।।

झन रँगे देह मन रंग जाय, होली के बाजय मिरदंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


थिरक-थिरक के नाचय अंतस, सुनके फागुन होली गीत।

नाता  जोड़के  जगतपति  ले, मन हा मानै  वोला  मीत।।

गली-खोर  उजियारी  लागय, मन के  कोठी  भरै  उमंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


जिनगी के ये पिचकारी मा, किसम-किसम के हावै रंग।

हँस-हँस के झेलव दुख-सुख ला, लाली हरियर होली संग।।

कच्चा रंग छोड़ दुनिया के, करते इही भक्ति ला भंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


रचनाकार 

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी 

खैरागढ़  छत्तीसगढ़

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[3/5, 7:53 AM] तातुराम धीवर 21: होली 

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रूप घनाक्षरी -

आमा अमरइया मा, कदम के छँइया मा,

झुलवा बँधाये हावैं, झूलय सबों यार हे।

फागुन महीना आये, सबके हे मन भाये,

कोयलिया गीत गाये, बइठे आम डार हे।

रंग के कटोरा धरे, मया पिरित ले भरे,

मारे बड़ पिचकारी, गोकुल के द्वार हे।

कहूँ रँगे हरियर, कहूँ लाल हे पींयर,

आनी बानी रंग रँगे, फागुन तिहार हे।।


प्रेम राग गूँजत हे, बैर भाव भूँजत हे,

गली खोर निक लागे, गजब एसो साल मा।

स र र र सररायें, गीत झूम झूम गायें,

माई पीला नाचत हे, नगाड़ा के ताल मा।

हिल मील जायें छोरी, सुग्घर मनायें होरी,

रंग लगवाय लिये, गोरी अपने गाल मा।

गोरी के हे गोरी गाल, होगे हावै लाले लाल,

आठो अंग बोथा गेहे, रंग अउ गुलाल मा।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी

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वासन्ती: वसन्ती वर्मा के सरसी छंद


               होरी

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लाली लाली परसा फूले,आगे फागुन मास।

धर पिचकारी होरी खेलें,देख बहुरिया सास।


मया पिरीत ला बाँटे होरी,मन मइलाये धोय।

जुन्ना झगरा अइसन टोरे,झगरा फेर न होय।


बाजे माँदर ढोल नंगाड़ा,गाँव म चौकी आँट।

गुजिहा भजिया बरा बनाबो,खाबो मिल सब बाँट।


रंग धरे हँव लाली पिंवरा,होरी आज तिहार।

हाँसव खेलँव होरी मैं जी,जोही संग हमार।


        🌹अमरइया के छाँव🌹


रंग धरे आइस वासन्ती,मउरे आमा फूल।

बइठे हावय कोयल कारी,गावय झुलना झूल।


आमा डारा मउरे घम घम,हरियर हरियर पान।

लागय लुगरा पिंवरा पहिरे,दुलहिन जइसन जान।


महर महर महकय अमरइया,सुनें चिरइयाँ चाँव।

गीत सुनें कोयल कारी के,बइठे आमा छाँव।


आमा के डारा मा बइठे,देख सुवा इतराय।

हमर दुनों के जोड़ी संगी,सब्बो झन सहराँय।


देखें झट ले संझा होगे,संझा ले अब रात।

मन मा आशा धर के राखौं,भूलौं दुख के बात

बसंती वर्मा

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Tuesday, February 17, 2026

विधान- *सोरठा छंद*

विधान- *सोरठा छंद*


विधान-

*ये एक अर्द्धसम मात्रिक छ्न्द आय*

*ये दोहा के उल्टा छंद आय*

*कहे के मतलब एमा 13,11 के जघा 11,13 के नियम होथे, विषम चरण म 11,11 अउ सम चरण म 13,13 मात्रा होथे*

*तुकांत विषम चरण म अनिवार्य रहिथे*

*दोहा के संग राग परिवर्तन बर ये छंद के उपयोग होथे*

*रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ये छंद के बहुतायत प्रयोग करे हे*


उदाहरण-


जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिवर बदन।

करहुँ अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि शुभ-गुन सदन॥


*नील सरोरूह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन।*

*करऊँ सो मम उर धाम, सदा छीरसागर सयन ।।*


तुलसीदास

Saturday, February 7, 2026

माघ महीना-छंदबद्ध कविता

 माघ महीना-छंदबद्ध कविता


[1/10, 1:28 PM] Dropdi साहू 15 Sahu:

 ‌‌   छप्पय छंद -"माघ महीना"

मन ला सुग्घर भाय, आय ले माघ महीना।

फरियर दिखे अगास, जाड़ लागे झिनाझिना।।

रुसरुस बने सुहाय, घाम जोड़ी जाड़ा के।

हलुहलु बिसरत जाय, जाड़ बइरी हाड़ा के।।

पूस भागती जाय ले, माघ मया ले आय जी।

लजकुरहीन लजाय हे, लाग लगिन लगवाय जी।।


लिहे सुवारी आस, मउर बाँधे बर आमा।

गुछी गुछी कोचियाय, माघ पहिरे पैजामा।।

किसम किसम के फूल, झूल पहिरे हे बारी।

आवत देख बसंत, कोइली हे मतवारी।।

लगे सोलवाँ साल हे, परसा फुलवा लाज मा।

लहकत लाली गाल हे, लाल रंग के साज मा।।


आरो दय मधुमास, माघ के पुरवाही मा।

महर महर ममहाय, फूल आवाजाही मा।।

मँगनी लगिन धराय, जान के मुहुरुत नित्ता।

कतको करे बिहाव, फेर हो जाय सुभित्ता।।

माघी पुन्नी आय ले, मेला गजब भराय जी।

नदिया मा असनान के, शिव के दर्शन पाय जी।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

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[1/18, 9:57 AM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *माघ महीना (गीतिका छंद)* 

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माघ महिना आय ले कमती जनावय जाड़ हा।

रौनिया भावय गजब नइ कँपकँपावय हाड़ हा।।

आय रितुराजा घलो सुघ्घर लगय चहुँओर जी।

देख परसा मौर सरसो नाचथे मन मोर जी।।


दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी) बेमेतरा

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[1/24, 7:55 AM] तातुराम धीवर 21: आल्हा छन्द-


माघ महीना पावन पबरित, सबके मन हावय हर्षाय।

हाँसत कुलकत मौर बाँध के, देखव राजा बसंत आय।।


मकर संक्रांति के शुभ बेरा,दान पून कर धरम कमाय।

‌बाँधय घर घर तिलि लाड़ू , लइका मन पतंग उड़ियाय।।


माघ महीना मँगनी जँचनी, बिहा तेल हे लगिन धराय।

नोनी बाबू करय सगाई, पर्रा बिजना मौर बिसाय।।


माघ महीना आमा मौरे, परसा सरसों हे मन भाय।

महर महर महमावय धरनी, पुरवाई हे गीत सुनाय।।


तिथि पंचमी बसंत परब हे, मातु सारदा के गुण गाय।

पूजन करके महतारी के, भगतन हे अंतस उजराय।।


ज्ञान कला संगीत कला के, होवय अड़बड़ हे बढ़वार।

पार लगावय मझधारा मा, खेवय नाँव धरे पतवार।।


माघी पुन्नी शिव दरसन बर, देव मनुज तन धरके आय।

गावय बम बम बम शिव भोला, चिमटा डमरू ढोल बजाय।।


होत बिहनिया पुन्य काल मा, गंगा मा सब डुबक नहाय।।

अइसन सुग्घर माघ महीना, मन पावन निर्मल हो जाय।


     तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी

बसंत विशेष छंदबद्ध सृजन

 बसंत विशेष छंदबद्ध सृजन


[1/28, 2:50 PM] तातुराम धीवर 21:

 सरसी छ्न्द -16, 11


नइ तो जादा जाड़ा लागय, नइ तो लागय घाम।

नइ तो जादा कनकन लागय,नइ तो तीपय चाम।।


मउसम बड़ा सुहावन हावय, होय शीत के अंत।

देखव आगे हाँसत कुलकत, मस्ती भरे बसंत।।


ऋतु बसंत के आये ले जी, खिलय प्रकृति के अंग।

अंग-अंग हरियाली छावय, दिखय अनेकव रंग।।


पीँयर -पीँयर सरसों फूलय, परसा फूलय लाल।

जउने देखय तउने बोलय, प्रकृति हावय कमाल।।


नवाँ-नवाँ उलहोवय पाना, रंग बिरंगी फूल। 

रखव सदा सनमान प्रकृति के, झिन जावव जी भूल।।


चिरई-चिरगुन जीव-जंतु मा, अड़बड़ के उत्साह।

देखत लागय ऋतु बसंत हे, खड़े पसारे बाँह।।


परब महाशिवरात्रि पंचमी,  होरी हर्सोल्लास।

पावन तिहार ऋतु बसंत के, इह तीनों हे खास।।


    तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी


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[2/1, 10:23 PM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *बसंत (कुण्डलिया छंद)* 

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रितु बसंत के आय ले, माटी हा ममहायँ।

मउरे आमा मस्त हें,गहूँ गजब लहरायँ।।

गहूँ गजब लहरायँ,नीक सरसो फुलवा मन।

परसा सेम्हर फूल,लगयँ सुघ्घर मनभावन।।

कोयलिया मन कूक, सुनावयँ मन पसंद के।

प्रकृति करय सत्कार, सुवागत रितु बसंत के ।।


दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी)-बेमेतरा

[2/2, 8:40 AM] पात्रे जी: कुण्डलिया छन्द- *बसंत*


छाये रंग बसंत के, हरा गुलाबी लाल।

मउरे हावय आम अउ, कोयल कुहके डाल।।

कोयल कुहके डाल, बिरह के गाये गाना।

रुखवा करे किलोल, सजा तन हरियर पाना।।

रंग बिरंगी फूल, हवय बगिया महकाये।

हे रितुराज बसंत, माह फागुन मा छाये।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[2/4, 12:25 PM] मीता अग्रवाल: *घनाक्षरी छंद* 

मऊरेंआमा के डार, नदिया के आर-पार 

कुहकत-कोयलिया,फरे- फूले बाग मा।


मन-डोले तन-डोले,भुनन भंवरा बोले 

रितुराज रंग घोलें, फगुनिया राग मा।


 गेंदा टेसु फूल फूलें, केसरिया रंग घुले,

मांदर नँगारा बाजे, फागुन के भाग-मा।


बसंत के अगुवाई,करें मिलजुल भाई,

होरी पहिली तैयारी, गावों मिल फाग-मा। 


शीत नित भागत हे, धूप-छांँव जागत हे,

छिन-छिन बाढ़ें दिन,सुरूज के ठाँव मा।


बसंती हे पुरवाई,घनन घटा छाईत,

मन-मा उमंग भरे,कदंब के छाँव मा।



रितु ह सिंगार करें,डारा पाना झड़े फरे,

कामदेव बाण धरे,बांटे मया दाँव मा।


बसंती बयार बहे,रुखराई फूले फरे,

अमराई मऊरे हे,गोरी तोरे गाँव मा।।


डॉ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़

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Thursday, January 15, 2026

मकर सक्रांति

 मकर सक्रांति

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(उल्लाला छंद)


हावय आज तिहार जी, पोंगल अउ संक्रांति के ।

सब ला हे शुभकामना, जिनगी मा सुख शांति के।।


तिल अउ गुड़ के दान हे, पबरित संगम स्नान हे।

आज अबड़ फुरमान हे, मानत सकल जहान हे।।


देव सुरुज हा आज ले, उतरायण मा आय हे।

महभारत मा भीष्म जी, महिमा अबड़ बताय हे।।


तिल्ली लाड़़ू रेवड़ी, खावव सब झन बाँट के।

माँघी मेला हे भरे,करलव सौदा छाँट के।।


संगम तिरथ प्रयाग के,महाकुंभ स्नान जी।

हिरदे फरियर हो जही, कर ले सुग्घर दान जी।। 


दिन हा तिल तिल बाढ़थे,खिरथे थोकुन रात जी।

कमती लागय जाड़ हा, तरिया नदी नँहात जी।


मन पतंग के डोर ला,थाम बने उड़वाव जी।

बखत परे मा खींच लव,जादा झन लहराव जी।


फसल पके जब खेत मा, पोंगल तिल संक्रांति हे।

अन्न बिना जिनगी कहांँ,परब मने सुख शांति हे।


वेद शास्त्र मा जी हवय, कथा मकर संक्रांति के।

 गंगासागर स्नान के, शनि देवा के शांति के।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Tuesday, January 6, 2026

नवा साल परब तिहार

नवा साल  परब तिहार


: *मनहरण घनाक्षरी छंद* 


*नव वर्ष श्रेष्ठ बनें,*

    *नये राग तर्ज बनें,*

     *आज सभी मिल कर,*

                *प्रेम -गीत गाइए।*


*नव पथ बढ़े चलें,*

  *नये गीत गढ़े चलें,*

     *एक-एक पल क्षण,*

           *प्रेम को बढ़ाइए।।*


*सभी से मिलन करो* 

   *सुख में जीवन भरो,*

        *तम दूर करने को,* 

            *भोर को बुलाइए।*


*खुशियों में साल बीते ,*

       *हँसी से न गाल रिते,*

      *सभी को मंज़िल मिले,*

                 *ऐसे पथ  पाइए।।*


*सुमित्रा शिशिर*

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रोला

नवा बछर के आत,विदा हो जाही जुन्ना। 

सुरता आही रोज,सबो ला लगही सुन्ना।।

दुख-सुख सब मा संग,रहिस वो बन के संगी। 

बखत पहागे फेर,निकल गे कतको तंगी।। 

अँचरा बाँधव आज ये,पाये हंँव जो सोझ मैं। 

बिसरा अंते गोठ ला, हलका कर दँव बोझ मैं।। 


नवा बछर पगराव,झूम के नाचव गाओ। 

जिनगी के दिन चार,बने रद्दा अपनाओ।। 

करव नीक संकल्प,सबे अब डर ला छोड़ो। 

अपन करम ले फेर,कभू तुम मुँह झन मोड़ो।। 

अपन धीर विश्वास ले,पूरा कर लव आस ला। 

हिरदय मा सपना सँजो,छूवव बने अगास ला।।


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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नवा साल

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(चौपाई छंद)


नवा साल के हवय बधाई। छाहित राहय सारद माई।।

धन दौलत सुख सेहत पावव। फूल सहीं हरदम मुस्कावव।।


 कलम बनै जी सबके हितवा।  गिरे परे के खाँटी मितवा।।

 कालजई साहित सिरजावव। भारत माँ के जस बगरावव।।


 नवा साल मा अइसे ठानौ। गाँव शहर खुशहाली लानौ।।

 करम फसल हो सोला आना।पोठ रहय सब दाना दाना ।।


 रद्दा के काँटा बिन लेहू। अउ सपाट गड्ढा कर देहू।।

 मातु पिता गुरु मन सुख पाहीं। आसिस के फुलवा बरसाहीं।।


नवा साल के सुरुज नवा हे। नवा बिहनिया  नवा हवा हे।।

नवा इरादा ठानौ भाई। माँजौ हिरदे फेंकौ काई।।


 चलौ बाँटबो भाईचारा। हवय नेवता झारा झारा।।

 अलख प्रेम के चलौ जगाबो। असली मनखे तब बन पाबो।।


जात पाँत के आँट ढहाके। सबो धरम के मान बढ़ाके।।

 देश प्रेम के भाव जगाबो। चलौ तिरंगा ला फहराबो।।


 आलस बैरी ले दुरिहाके।मिहनत के हम जोत जलाके।।

 गार पसीना रोटी खाबो।जिनगी मा उजियारा लाबो।।


 साल छबिस हा खड़े दुवारी। हैप्पी काहत हे सँगवारी।।

 हमरो कोती ले न्यू ईयर।गाड़ा गाड़ा हैप्पी डियर।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबन्द,छत्तीसगढ़


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 *छेर-छेरा* 

*सरसी छंद* 

आज छेर-छेरा माँगत हें, लइका सबो सियान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


डंडा नाचत गावत हें गा, गली-खोर अउ द्वार।

ढोलक मँजिरा झाँझ बजावत, मानत हवें तिहार।।

दीदी-बहिनी सुवा गीत के, गावत हें सब गान।

पारा बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


बरा ठेठरी-खुर्मी चीला, सब बनात हें आज।

लीपे पोते हें घर अँगना,  करके खेती काज।।

दया-मया के गुरतुर बोली, बने मिलत हे मान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला-कोरबा*

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: गीतिका- पूस पुन्नी छेर-छेरा

2122 2122 2122 212


पूस पुन्नी छेर-छेरा पर्व पावन दान के।

पर्व पावन पावनी नदिया म पबरित स्नान के।

स्नान करके दान करले ज्ञान अउ धन धान के।

दान के अवसर मिले हे शुक्र हे भगवान के।


रचना- सुखदेव सिंह अहिलेश्वर


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तरिया विशेष छंदबद्ध कविता


  : काल कस तरिया (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब बाढ़ही, मनखे करही राज।*

*जीव जंतु झूमत हवै,पेड़ पात सँग आज।*


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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[12/8/2025, 7:40 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया छंद*


तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी जल भरैं, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान हा, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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बिषय------- तरिया 


अब तरिया बाचिस नहीं, धरिस शहर के रूप।

पाट-पाट होटल बनिस, जिहाँ मिलय अब सूप।


तरिया पालय गाँव ला, गरुवा गाय समेत।

खेत खार सीचय घलो, पालय सबके पेट।


कमल सिंघरा ढेस अउ, परय पुराइन पान।

मछरी झिगरा पाल के, होवय सब धनवान।।


शोभा बाढ़य गाँव के, खिलय कमल के फूल।

दाई अइसन जानके, धोवय मन के धूल।।


जोंक असन मनखे जमो, चूसत हावय खून।

कागज मा तरिया बनें, मेंटत हे सब पून।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' 

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[12/10/2025, 12:52 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*सार छंद*

*16,12*

 तरिया भीतर पुरइन राहय, कमल फूल बड़ सोहै।

रंग बिरंगी फूल खोखमा, देखत मन ला मोहै।।

ढेंस रतालू कुकरी काँदा, टोर पोखरा लावैं।

का सियान अउ लइका सबझन,  मजा मार के खावैं।।


तौरत राहँय पनबूड़ी मन, सारस ध्यान लगावै।

संझातीकन के बेरा मा, तरिया पार सुहावै।।

बर पीपर अउ आमा गस्ती, राहय चारो मूड़ा।

काँटा खूँटी नइ राहय जी, दिखै नहीं कुछु कूड़ा।।


पीयँय पानी तरिया के सब, तनमन ला फरियावैं।

घाट घटौंधा सफ्फा राखँय, लद्दी साफ करावैं।।

कूड़ा करकट डिस्पोजल मा, तरिया आज पटागे।

मतलाहा दिखथे पानी हा, छूये मन नइ लागे।।


सकलावत हे चारो कोती, अतिक्रमण के मारे।

ध्यान कहूँ नइ देवत हावँय, झंझट कोन उबारे।।

धीरे-धीरे तरिया डबरी, आज नँदा जाही का।

तरिया कइसन होथे तेला, किस्सा म बताही  का।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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[12/11/2025, 10:20 AM] तातुराम धीवर : आल्हा छ्न्द - 16, 15


तरिया के का हाल सुनावँव, देख चढ़े बड़ जोर बुखार।

जब ले घर घर नल जल आहे, तरिया डबरी परे बिमार।।


पानी रहि से कजला कंचन, दरपन जइसे दगदग साफ।

रदखद कचरा मा अब पटगे, जिनगी इनकर होगे हाफ।।


मेंड़ पार सब घुरवा बनगे, फेंकय कचरा घर ले लान।

जन जन ले दुरिया गे हावय,पहिली जस अब नइ ये मान।।


पानी पीयँय सबो परानी, हँउला गगरी भरके लाय।

पावन निर्मल मन हो जावय, शीतल पानी मा हे नहाय।।


थारी जइसे चाकर चाकर, राहँय सुग्घर पुरइन पान।

फूल खोखमा ढेंस रतालू, काँदा लावँय गहरी खान।।


निर्मल राहय गंगा जइसे, आज दिखय घुरवा जस नीर।

स्वारथ भरगे मनखे भीतर, कोन सुनय तरिया के पीर।।


घाट घठौंधा पचरी सुग्घर, सुग्घर राहय रद्दा बाट।

मँदहा मन के अड्डा बनगे, रदियागे सब निर्मल घाट।।


जागव जागव बहिनी भाई, जागव संगी मोर मितान।

तरिया डबरी ताल तलैया, इँखर सुरक्षा बर दव ध्यान।।


सब जीव जन्तु के निस्तारी, तरिया आवय पालनहार।

इन ला आज बचाना हावय, ले लव अपन खाँध मा भार।।


आवव सब झन खावन किरिया, करन नहीं हम अइसन भूल।

कब्भू नइ फेंकन तरिया मा, हूम धूप पूजा के फूल।।


     तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी

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[12/11/2025, 8:43 PM] Jaleshwar Das Manikpuri 21: तरिया -रोला 

सुन्ना तरिया आज,बतावत कहय कहानी।

नाली पानी धार,होय ग गंदला पानी।।

चाकर तरिया तंग,होगे धनहा बानी।

अलकरहा ए चाल, रे मनखे के सियानी।।

                 दोहा 

संकट के दिन आज हे,कहिथे तरिया घाट।

माटी पथरा डार के, मोर मिटावत ठाठ।।

  जलेश्वर दास मानिकपुरी 

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*रोला छंद--तरिया* 

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घर मा नल-जल आज,कोन अब तरिया जावय।

निस्तारी-असनाँद,सबो घर मा निपटावय।।

तरिया कोती चेत ,कहाँ ले जाही काकर।

हवँय सँकीरन सोच, लोभ लोगन के चाकर।।


तरिया के उपयोग,करँय कमती मनखे मन।

होय सिंचाई काम,थोर किन मछरी पालन।।

तबहे तरिया-ताल,पटावँय बनँय इमारत।

ले विकास के नाँव,प्रकृति के बदलँय सूरत।।


दीपक निषाद--लाटा (बेमेतरा)

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[12/12/2025, 7:39 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया 

तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी हाथ, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर


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अमृतदास साहू 12: *विधा- सार छंद*

        *विषय - तरिया* 


तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।

आज काल तो भइगे संगी, घुरवा असन पटागे।


घटत दिनों दिन हावय संगी, तरिया के नहवइया।

पहली तरिया ला मानय गा,जइसे गंगा मइया।

अब तो लगथे गाँव-गाँव ले,तरिया घलो नँदागे।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


तइहा के बेरा तरिया मा,होय सबे निस्तारी।

छत्तीसगढ़ी परम्परा के,राहय एक चिन्हारी।

सुन्ना परगे घाट घटौंदा,पानी घलो अँटागे।

तइहा के बेरा मा तरिया, सुग्घर पबरित लागे।


नांदगांव रानी सागर के,राहय अलग चिन्हारी।

अउ रइपुर के बूढ़ा तरिया,लागय जस महतारी।

देख रेख के अभाव मा अब,अलकरहा मइलागे ।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


अमृत दास साहू 

 राजनांदगांव

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   कुण्डलिया छंद "तरिया"

तरिया के बड़ मोल हे, राखव येला साफ।

सबो जीव के आसरा, करथे सब ला माफ।।

करथे सब ला माफ, जीव तरथे जी जेमा।

कचरा दव झन फेंक, घात पबरित हे तेमा।।

तरिया के दिल देख, नेक हे नइ हे करिया।

गिनहा बने सकेल, साफ कर देथे तरिया।।


तरिया कोड़े खार मा, सब के बूझे पियास।

सबो जीव जुरिया जथे, पानी बर धर आस।।

पानी बर धर आस, घाट मा पीथे पानी।

का जंगल के जीव, गाँव के जम्मों प्रानी।।

लेवव जम्मों सीख, एक होवव झन छरिया।

मनुख-मनुख हन एक, एक जस दुनिया तरिया।।


महिमा हवय अपार जी, तरिया हमर सियान।

हिरदे बड़का राख के, गहरा राखे ज्ञान।।

गहरा राखे ज्ञान, मान तब बड़का पाथे।

गिनहा बने सरेख, पेट मा तभे पचाथे।।

सबके हित हो जाय, गोठ भा जाय सही मा।

तरिया सही सियान, एक दोनों के महिमा।।


द्रोपती साहू "सरसिज"


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