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Thursday, October 1, 2026

अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर म--- गीत--सियान मन

 अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर म---


गीत--सियान मन


ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।

जनम देवइया जतन करइया, भुइयाँ के भगवान मन।


पेड़ पात पानी पुरवा ला, जस के तस सौपिन हम ला।

रखिन बचा के सरी चीज ला,खुद उपभोग करिन कम ला।

लागा, पागा धर नइ करिन, सपना खातिर सुजान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


चिपके रिहिन हावयँ सबदिन, मानवता के गारा मा।

दया मया ला बाँटत फिरिन, गाँव गली घर पारा मा।

लाँघन नइ गिस जिंखर ठिहा ले,जानवर ना इंसान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


सही गलत अउ पाप पुण्य के, लहराइन सबदिन झंडा।

छोड़दिन बैरी ला बदी देके, नइ देखाइन आँखी डंडा।।

अंतर मन ला आनन्द देवयँ, जिंखर सुर अउ तान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


परम्परा अउ संस्कृति के, सौदा करिन नही कभ्भू।

देखावा अउ चकाचौंध बर, लड़िन मरिन नही कभ्भू।

चद्दर देख लमाइन हें पग, उड़िन मनुष नइ महान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


नता रिस्ता ला हाँस निभाइन,पीठ चढ़ाइन नाती ला।

कथा कहानी न्याय सुनाइन, लिखिन पढ़िन पाती ला।।

नवा समय मा नोहर होही, जुन्ना गुण अउ ज्ञान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

विश्व शाकाहार दिवस ये अवसर मा--- गीत-शाकाहार

 विश्व शाकाहार दिवस ये अवसर मा---


गीत-शाकाहार


कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।

मछरी कुकरी भेड़ बोकरा, हरे राक्षसी जन आहार।।


महतारी कस धरती दाई, देथें धान पान फर साग।

सेवा करके पा लौ मेवा, हँस हँस खावव सँहिरा भाग।।

फर फुलवारी के नइ पाये, माँस मटन चिटिको कन पार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


काँदा कूसा के गुण भारी, खाव राँध के दुनो जुवार।

खाव मौसमी फर जर भाजी, तन के भागे रोग हजार।।

खनिज लवण प्रोटीन विटामिन,  सबे तत्व होथे भरमार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


कई किसम के होय वायरस, मास मटन ले भागव दूर।

जीव जानवर ला झन मारव, अपन पेट बर बनके क्रूर।।

कृषि भूमि भारत उपजाथे, भक्कम फर जर चाँउर दार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


विश्व शाकाहार दिवस के बधाई

Wednesday, September 30, 2026

बेटी के बिदा-लावणी छंद

 बेटी के बिदा-लावणी छंद


आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा ।

फूटय जइसे बाँध नदी के, बरखा के बरसाई मा ।।


सोन चिरैया होथे बेटी, घर-अँगना कुरिया चहके।

बगिया के सुग्घर गोंदा कस, महर-महर जिनगी महके।

उजियार रहय चंदा जइसे, तोर हँसी के दियना ले।

सबके पीरा मा चुचुवावय, आँसू तोरे नयना ले।

जगमग राहय अँगना खोली, दिन भर तोर सफाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


शिक्षा सुसंस्कार के पहिरय, बेटी हर सुग्घर गहना।

सबो क्षेत्र मा आघू बढ़थे, मिहनत तप के का कहना ।

जिम्मेदारी सबो उठाथे, धार नदी कस बोहाए।

पिघले लोहा कस ढल जाथे, जइसन औजार बनाए ।

काया कंचन मन हे चंदन, उजरावय घिसाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


सास-ससुर के सेवा करके, दू कुल के मान बढ़ाबे।

मिठबोली व्यवहार सरल रख, माया ममता ला पाबे।

नेह नता ला जोरे रहिबे, परिवार मया के बाढ़य।

कलहा के उड़ जाय चिरैया,घर भर खुशहाली माढ़य।

सुग्घर महकय घर गिरहस्ती, सुनता के ममहाई मा ।।

आँखी भर आथे जी सबके, बेटी करे बिदाई मा।।


डॉ. दीक्षा चौबे,दुर्ग छत्तीसगढ़

Thursday, September 24, 2026

गणपति वंदना*

 *गणपति वंदना*


सबो काज शुभ होथे स्वामी, पहिली पूजँय तोला।

माता पार्वती के ललना, पिता तोर शिव भोला।।


भादो पाख अँजोरी आथस, मुसवा करे सवारी।

चार भुजा अउ सूँड़ लाम बड़, पेट बिकट हे भारी।।

सूपा कस हे कान गजानन, तिलक माथ के प्यारी।

दर्शन करके खुशी मनाथें,पायँ कृपा नर नारी।।

भक्ति भाव ले पूजय जेहर, सब सुख देथस ओला।

सबो काज शुभ होथे स्वामी ..................


एकदंत लाड़ू ला भाथस,खाथस थारी-थारी।

लगे मनोहर रूप विनायक, रिद्धि-सिद्धि सँगवारी।।

चारो डहर उछाव लगे अउ, महके खोर दुवारी।।

गणपति बप्पा जल्दी आबे, कहे भगत ए दारी।।

पान सुपारी धरे मनाथे, कोनो नरियर गोला।

सबो काज शुभ होथे स्वामी ..................


अँधरा ला तँय आँखी देथस, हर लेथस अँधियारी।

पूत बाँझ ला देथस देवा, कर अँगना उजियारी।।

दूध पूत धन धान्य सबो झन, पाथे तोर पुजारी।

काया माया दे हर लेथस, पाप दोष बीमारी।।

चंदन के प्रभु हृदय बिराजव, दर्शन दे दव मोला।

सबो काज शुभ होथे स्वामी ..................


🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा चंदन

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

Sunday, September 20, 2026

संसद (दोहा छंद)

 संसद (दोहा छंद)

1-

संसद मा हल्ला मचै, खूब तमाशा होय।

इक-दूसर ला दोष दँय, कोन दूध के धोय।

2-

संसद मा माते हवै, देख भयानक रार।

इक-दूसर बर भाँजथें, जस बैरी तलवार।।

3-

संसद के हालत दिखै, जस मछरी बाजार।

हल्ला-गुल्ला बड़ मचै, होय बिकट तकरार।।

4-

मचे अखाड़ा अब इहाँ, संसद हे लाचार।

नैतिकता बाँचे कहाँ, खोये सद् ब्यौहार।।

5-

"बाबू" संसद देख ले, बने युद्ध मैदान।

सत्ता बर लड़थे इहाँ, कहाँ प्रजा के ध्यान।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई 

जिला केसीजी छत्तीसगढ़

Saturday, September 19, 2026

चकोर सवैया छत्तीसगढ़ी में।

 चकोर सवैया 

छत्तीसगढ़ी में। 


तीज तिहार मनावत हे बहिनी मन हाँसत आइन मोर। 

ये अँगना सुख छाय हवै सखियाँ मिल होवत भाव विभोर। 

घात मया मइके बर हे भउजी मन बाँधत प्रीत सुडोर। 

रंग बिरंग फभै लुगरा झनकावत पैजन के अति शोर।। 


गोठ करौं कतका सुख के अँचरा भर बाँध रखे हँव प्रीत। 

मात पिता नइहे तबले कमती नइ होवय एक न रीत। 

प्रेम सहोदर के बड़ पावँव हासँव गावँव सुघ्घर गीत। 

मान करै भउजी भइया सुख छाँव सदा बगरावय मीत।। 


सुमित्रा शिशिर

दुर्मिल सवैया

 दुर्मिल सवैया 


चुटकी मुँदरी फुँदरी पहुँची, ककनी नक बेसर घात हवै। 

सुतिया गर शोभत हार सखी, तरकी नथली इठलात हवै। ।

नग साज सजे बिजुरी जइसे,पइरी घुँघरू झनकात हवै। 

गजरा फभथे घनकेश सदा, अखियाँ कजरा ममहात हवै। ।


रोला छंद 


टोंड़ा पइरी पाँव , कमर करधनिया साजे। 

मया पिरित के छाँव, चटक के बिछिया बाजे। ।

कटहर लच्छा शान,  कान मा लुरकी सोहे। 

लक-लक चमके हार , देख के मन ला मोंहे। ।


तिरिया के सिंगार,  गजब मनुहारी होथे। 

इँकरे ले घर द्वार  , सुघर फुलवारी होथे ।।

सोना चाँदी छोड़  , धनी अनमोल खजाना। 

रहय सदा संजोग  , मांघ सिन्दूर सजाना। ।


सुर्रा सूता ढार,  फभै सुग्घर नारी ला। 

करथे मया दुलार,  सजाथे घर बारी ला।।

कतका करँव बखान, फूल कयना हे मनके। 

मधुर-मधुर व्यवहार, इही हे गहना तनके। ।



सुमित्रा शिशिर

श्री गणेश स्तुति

 श्री गणेश स्तुति


श्री गणेश गणपति,लम्बोदर प्रभु ,सूरवीर तँय, महा बला I

गौरी सुत नंदन,सिद्धि विनायक,गजब दिखाये,ललित कला I 

देवों के तँय हा,देव बुद्धिप्रिय,सुमुख भुवनपति,नाथ हरौ I

हे विध्नविनाशक,विद्यावारिधि,विकट चार भुज,हाथ हरौ II


हे शुभगुणकानन,बुद्धिविधाता,मूषक वाहन,देव तहीं I 

हे विश्वाराजा,मात पिता के,सेवक कीर्ति,नेंव तहीं I

हे कपिल कृपाकर, विघने हरता,माता तोरे,पारबती I 

हे वक्रतुंड प्रभु,एकदंत तँय,सबले जादा,हवय मती II  


गजमुख गणनायक,वरदविनायक,नमस्थेतु प्रभु,धरे गदा I 

हे मंगलमूरति,ओमकार जप,जय हो जय हो,तोर सदा I 

एकाक्षर श्वेता,शशिवरणम शुभ,रिद्धि सिद्धि के,नाथ तहीं I 

हे यज्ञकाय प्रभु,भक्तन मन ला,देथस वर अउ,साथ तहींII


जे योगाधिप प्रभु,तरुण यशस्कर,विघ्नराज के,ध्यान धरै I

भागय विपदा हा,धन बल बाँढ़य,भव के सागर,पार करै I

हे शान्ति स्वरूपा,गुण सर्वात्मन,पुण्य काज मा,साथ तहीं I

प्रथमेश्वर स्वामी,शुभ कारज के,वर देवइया,हाथ तहीं II


हे शूपकर्ण प्रभु,दीनन के दुख,भक्ति धार के,रंग हरौ I

हव ज्ञान जोत के,राह दिखइया,गणराजा नित,संग हरौ I

धीरज गहना ये,कहव सदा प्रभु,सुघर चन्द्र के,भाल हरौ I

हे धूम्रवर्ण प्रभु,गणाध्यक्ष तँय,बइरी बर तो,काल हरौ II

 

हे बुद्धिनाथ तँय,तोर कृपा ले,सबके पूरन,काज बने I

लड्डू मोदक के,परसादी ले,मन शरीर ला,साज बने I 

दूर्जा दैमांतुर,लम्बकर्ण प्रभु,हरथस सबके,पीर बने I  

हे अमित अखूरथ,तोला प्रिय हे,मोदक लडुवन,खीर बने II  


हे गुणिन मनोमय,मृत्युंजय प्रभु,विनती हे कर,जोर करौं I

हे रक्त रूद्रप्रिय,माथ नँवाके,भाव-भक्ति ला,तोर करौं I

देव स्क्न्दपूर्वज,महाकाय नित,रक्षा खातिर,खाम बनौ I

देवान्तकनाशक,भटके मन मा,मूरत बनके,धाम बनौ II


हे प्रमोदाय सुन,मँय अगियानी,निचट अपड़ हँव,ज्ञान दवौ I        

हे भीम चतुर्भुज,क्षेमकरी प्रभु,गजनानेटी,ध्यान दवौ I                        

हे मुक्तिदया कृति,सिद्धिप्रिया तँय,बाधा विपदा,टार सदा I

हे शुबान सुमुखा,पुरुष नंदना,बनथस खेवन, हार सदा II 


हे विश्वराज प्रभु,तोर कृपा ले, बिगड़े सबके,भाग बने I

क्षिप्रा विघनेश्वर,गजा हंभवी,ज्ञान जोत के,पाग बने I 

यशवासिन कविशा,हाथ जोर के,महिमा तोरे,गाँव सदा I

हे गुनिना कपिला,तोर कृपा के,मिलत रहय नित,छाँव सदा II


हे देव गजानन,हे अवनीशा,सबके हरथव,क्लेश इहाँ I

हे यशस्करम प्रभु,पनपे झन तो,कखरोंअंतस,द्वेष इहाँ I

पइयाँ लागँव मँय,नाथ उबारव,सबले बड़का,देव तहीं I 

गिरजा के लाला,दीन दयाला,भक्तन के सुध,लेव तहीं II


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवां)

(हरिगीतिका छंद )

 *विश्वकर्मा महराज*

(हरिगीतिका छंद )


हो देव शिल्पी आप प्रभु,शुभ विश्वकर्मा नाम हे।

सिरजन करइया विश्व के,अद्भुत तुँहर ये काम हे।।

सुमिरन करै नर-नार सब,जोड़े दुनों जी हाथ ला।

चौखट खड़े सब हे भगत,देखव झुकाए माथ ला।।


रचना करइया जीव के,मन्दिर महल घर द्वार के।

कल कारखाना ला रचे,वन डोंगरी संसार के।।

अउ बज्र रचना इंद्र के,तिरशूल भोलेनाथ के।

गहना रचे  अद्भुत इहाँ, श्रृंगार नारी माथ के।।


*बोधन राम निषाद*

साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद

 साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद


हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।

बिजली चमके बादर गरजे, घूमन बन बन हाथी कस।।


बादर पानी देखत लइका, घर भीतर आज लुकाये।

फेर हमन ला हवा गरेरा, संगी के असन बुलाये।।

भाग ठिहा ले खेत खार मा, रेंगत राहन पाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


घाम घरी भर खेत खार मा, डारे राहन सब डेरा।

कांदा कूसा फर फुलवा बर, रोज लगावन फेरा।।

बाग बगीचा खेत मेड़ मा, रहन बइठ शरनाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


आमा अमली काइत जामुन, बेल लान बिन बिन के।

एक जघा सँकला के बाँटन, फर फुलवा गिन गिन के।।

खेत खार बन बाग मया ला, गठियाय रहन थाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद

 डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद


हे अवशेष हजार साल के, कागज पाथर रूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


सबें चीज डिजिटल होवत हे, बात खुशी के आये।

लउहा लउहा काम होत हे, सब मनखें अपनायें।।

रुपिया पइसा पोथी पाथर, घूमे डिजिटल लूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


नाम काम तक डिजटल होगे, डिजटल होगे सेवा।

कोन जनी काली का होही, कोन ह खाही मेवा।।

डिजिटल डाटा डिलीट होय त, जाथे अंधा कूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


डिजिटल डाँका के तक डर हे, मनुष बने हे थोरे।

नेट सेट अउ पासवर्ड बिन, डिजिटल दाँत निपोरे।।

मिला डरे हन अमृत मदरस, दूध दही सब सूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


का पीतल सोना चांदी कस, डिजिटल सिक्का चलही।

कोष खजाना कोठी धन बिन, डिजिटल भजिया तलही।।

बिन अवशेष कहाँ हो पाही, अंतर रंक-उ भूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद

 कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद


कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।

हालत हो जाथे जब  खस्ता, तब पड़थे कदम उठाना।।


सिस्टम के टँगरी टूटत हे, विधि विधान नइहे एको।

होवत हवै हियाव धनी के, बाकी मनखें ला फेको।

सत्ता अउ शासन के बूता,  हाँ में हाँ हवैं मिलाना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


नांगर छोड़ किसान खड़े हें, अउ जांगर छोड़ कमैया।

स्कूल छोड़ के खड़े पढ़इया, डूबय मजदूरी नैया।।

फेरी वाले छेरी वाले, खावत हें रहि रहि ताना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


गाड़ी रोवय हाँड़ी रोवय, रोवय टपरी घर ठेला।

अस्पताल दफ्तर बन रोवय, गुरू संग रोवँय चेला।।

कलम धरइया आस बढ़ैया, सबके मुख में हें ताला।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बड़बोलापन ले बचव-सार छंद

 बड़बोलापन ले बचव-सार छंद


जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।

बड़बड़ बड़बड़ बड़ बोले मा, होथे जगत हँसाई।।


मिलत हवै बोले बर कहिके, आँय बाँय झन बोलव।

बानी ब्रह्म ए छल प्रपंच तज, अमृत बोल मा घोलव।।

बोल बढ़ाये मया दया अउ, बोल बढ़ाय लड़ाई।।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


झूठ बचन के उमर कहाँ, झूठ कराय फभीता।

लेय सहारा झूठ ढोंग के, रहै जउन हा रीता।।

काम दिखे बोली बयना मा, फोकट हे चिल्लाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


नव जुग मा रिकार्ड होवत हे, कथनी करनी सबके।

आज पाय नइ बोचक कोनो, बेरा आये अब के।।

कल परखे जाही बोली ला, तब होही करलाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


सिस्टम के गलती ए-लावणी छंद

 सिस्टम के गलती ए-लावणी छंद


जियई मरई पढ़ई लिखई, नव जुग बर सब चलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


चलन बढ़त हावै एकल के, नत्ता रिस्ता दुरिहागे।

सबे शार्टकट कोती भागे, सोय रहे चाहे जागे।।

धीरज हे ना लाज शरम हें, यौवन मोम टघलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


नेता अधिकारी बिगड़े हें, बिगड़े हावैं खुद पालक।

अइसन मा घर के लइकामन, बनबें करहीं कुलघालक।।

कई किसम के कांड सुनावैं, लगगे कलयुग ढलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


निजीकरण के होवत हे सबके, स्कूल औषधालय दफ्तर।

जिहाँ काम पइसा से मतलब, दया मया चूल्हा मा धर।।

नवा जमाना के गाना मा, लपर झपर एडल्टी ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुंडलियाँ छंद-

 कुंडलियाँ छंद-


डिजिटल डिजिटल बोल के, पीटे हन बड़  ढोल।

डिजिटल फोटो वीडियो, अब खोलत हे पोल।।

अब खोलत हे पोल, डहर बन जन सिस्टम के।

उठत देख आवाज, गजब नेता जन बमके।।

फोन कैमरा हाथ, धरे हावँय सब हरपल।

बनत जात हे आज, फाँस टोंटा के डिजिटल।।


खपही एथेनॉल बर, धान कार्न कुसियार।

कम होही खाद्यान हा, मचबे करही रार।।

मचबे करही रार, रोत दिखही घर हाँडी।

पहली हावय पेट, तेखरे पाछू गाड़ी।।

आलू बनही सोन, पेट का माला जपही।

नव जुग मा खाद्यान, कारखाना मा खपही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

फोटू-सार छंद

 फोटू-सार छंद

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।

जुरै गाँव के गाँव तिहाँ अब, दुई चार गिन होगे।।


मया मीत ना भाव भजन हे, दुच्छा हाँड़ी तावा।

चुलुक चढ़े हावय फोटू के, दिखथे बस देखावा।।

हीरा के जस मोल रिहिस ते, लोहा अउ टिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।


लाइक अउ कमेंट पाये बर, सबझन जुगत बनायें।

रील बनाये के चक्कर मा, लाज बेंच तक खायें।।

नर लागत हे अउ ना नारी, आदत हा घिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।


नता निभावै फोटू खातिर, भाव भजन फोटू बर।

रंग रँगोली फौज फटाका, घर अउ बन फोटू बर।।

फोटू विडियो मोबाइल के, दास सबे झिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

आनलेन पेमेंट-रोला छंद

 आनलेन पेमेंट-रोला छंद


आनलेन के दौर, हवै सब झन हा कहिथन।

फेर बखत ला देख, जुगत मा सबझन रहिथन।।

आनलेन पेमेंट, लेत हें पसरा ठेला।

फेर आँख देखाय, जेन ला चाही लेना।।


अफसर बाबू सेठ, पुलिस नेता वैपारी।

माँगे नकदी नोट, कहत झन करबे चारी।।

भरे जेन के जेब, उही हा जेब टटोले।

उँखरे ले हे काम, कोन फोकट मुँह खोले।।


लुका लुका के नोट, धरत हावैं गट्ठी मा।

आनलेन पेमेंट, कहाँ चलथे भठ्ठी मा।।

मांगै नगदी नोट, बार भठ्ठी मुँह मंगा।

सरकारी हे छूट, लूट हौवै बड़ चंगा।।


सट्टा पट्टी खेल, चलत हे चारो कोती।

विज्ञापन के धूम, होत हे जस सुरहोती।

मिले हवै सरकार, खिलाड़ी अउ अभिनेता।

जनता ला बहकाँय, बताके विश्व विजेता।।


मुँहफारे घुसघोर, माँगथे नकदी रुपिया।

आनलेन पेमेंट, लेय ये कइसे खुफिया?

देखे जभ्भे नोट, तभे कारज निपटाये।

आनलेन के नाम, सुनत आँखी देखाये।।


आनलेन पेपेंट, देन कइसे छट्ठी मा।

आनलेन पेपेंट, देन कइसे भट्ठी मा।।

आनलेन मा बोल, देन कइसे नजराना।

आनलेन मा काज, करे नइ  कोरट थाना।।


रोवत लइका लोग, मानही का बिन पइसा।

कइसे करहीं काम, जौन बर आखर भइसा।।

छोड़वाय बर संग, काय अब करना पड़ही।

आनलेन पेमेंट, बता का आघू बढ़ही।।


उद्योगी के हाथ, हवै पावर अउ टॉवर।

रोवय धोवय नेट, इहाँ चौबीसों ऑवर।।

निच्चट हें इस्पीड, फोर जी फाइभ जी के।

सब झन हवन गुलाम, नेट के नौटंकी के।


डिजिटल होही देश, बता कइसे गा भइया।

पर के कुकरी गार, संग दूसर सेवइया।।

नेटजाल सरकार, बुने अउ देवैं सुविधा।

सोसल सेवा होय, तभे दुरिहाही दुविधा।।


आनलेन पेमेंट, कहाँ देथें लेथें सब।

तोर मोर बड़ छोट, यहू मा मिलथे देखब।।

ठगजग तक हें खूब, देख के काँपे चोला।

बढ़िया हो हर काम, तभे तो भाही मोला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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डिजिटल इंडिया-कुंडलियाँ छंद


डिजिटल इंडिया के अभी, आवत हवे रुझान।

यूपीआई बउरबे, ता अब देबे दान।।

ता अब देबे दान, गए अब फ्री के सेवा।

आदत बनवा दीस, सबे ला खवा कलेवा।।

आघू होही काय, कहे नइ जाये कल।

रिकिम रिकिम के चार्ज, लगत हे लुटही डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा


डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।

तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।

हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।

पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।

बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।

सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।


हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।

कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।

फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।

घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।

करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।

सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।


राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।

गुररावत हे साथ पा,  बकरी तक बन शेर।।

बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।

चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।

सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।

डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।


दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।

लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।

आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।

झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।

देखावा अउ झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।

राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।


सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।

दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।

अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।

कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।

होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।

काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।


डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।

छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।

सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।

मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।

पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।

बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रील बनई- दोहा चौपाई

 रील बनई- दोहा चौपाई


पर्दा के तक चीज ला, देखावत हे रील।

का होही अब कोन जन, आघू अउ पा ढील।।


रील बनइया टूरी टूरा। पगला गय हें सच मा पूरा।।

पाये बर कमेंट व्यू लाइक। धरें फिरें नित बक्सा माइक।।


दिखथें मन के गावत नाँचत। लोकलाज सत गत ला काँचत।।

काय सही अउ काय गलत हें। बिन जाँचे परखें झुमरत हें।।


कोनो ज्ञान बघारत दिखथे। कोनो घर बन बारत दिखथे।।

कोनो करत दिखे मनमानी। कोनो बहथे बनके पानी।।


बहरुपिया बन कोनो नाँचे। कोनो उल्टा कविता बाँचे।।

कई कोन जन काये बोले। कोनो बोले ता विष घोले।।


भिड़े हवैं घर भर कतको के। रील बनाये सुधबुध खोके।।

रील बनइया अउ देखइया। गिनती मा नइहे गा भइया।।


पहिर ओढ़ झकझक ले भौजी। रील बनावै नित मनमौजी।

सास ससुर बइठे धर तरवा। देय पँदोली हँस मनसरवा।।


करें नुमाइश कतको तन के। कतको मन नाँचे बन ठन के।।

दर्शक मन ला खींचे खातिर। कतको खेल करें बन शातिर।।


कतको नाँचत दिखे अकेल्ला। खोज खाज के हेल्ला मेल्ला।

कतको नाँचे डहर-बाट मा। कतको पर्वत नदी पाट मा।।


देखावा के राजा रानी। देखावा के दानी ज्ञानी।।

मरही हरनी छट्ठी बरही। रील भीतरी सबके खरही।।


फेमस होये बर मनखे मन। बने फिरें सावित्री सरवन।।

जोंतत हावैं जिद के हरिया।  पार करत हें हद के दरिया।।


इती उती के विडियो फोटू। खींच खींच के डारे छोटू।।

रील बनाये के चक्कर मा। कलह तको होवै बन घर मा।।


अजब नशा सब ला चढ़ गय हे। रीति नीति तन मन बर भय हे।।

बने चीज बगरइया कम हें। गलत चीज उपजत बड़ घम हें।।


बचे रहे इंसानियत, बचे रहे इंसान।

रील खील बन मत गड़े, लाये झन तूफान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

यमराजा- सरसी छंद

 यमराजा- सरसी छंद


चौदह दीया तोर नाँव के, बरत हवय घर खोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


कालदंड अउ गदा पाश धर, घुमत रथस दिन रात।

मोर मुकुट पहिरे भैंसा मा, रहिथस तँय तैनात।।

छोटे बड़े सबे झन काँपे, सुनत नाँव ला तोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


सूर्य पुत्र यमुना के भाई, तोर ठिहा यमलोक।

बैरी हितवा कोनो ला भी, देबे बड़ झन शोक।।

जान अकाल जाय झन कखरो, विनती हावय मोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


सावित्री ला सत्यवान दे, करे हवस उपकार।

हे यमदेवा करबे किरपा, बोहय सुख के धार।।

पाप पुण्य सत गत लत देखत, लेबे सबके शोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


घोर नरक कोनो झन पाये, बने करँय सब काम।

देखा सब ला सत के रद्दा, दया मया सुख धाम।।

नेकी धर्मी उपकारी ला, पीया अमरित घोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


धनतेरस-सार छंद


धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।

धनतेरस मा दीप जलाके, करत हवौं पहुनाई।।


चमकै चमचम ठिहा ठौर हा, दमकै बखरी बारी।

धन तेरस के दीया के सँग, आगे हे देवारी।।

भोग लगावौं फूल हार अउ , नरियर खीर मिठाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


रखे सबे के सेहत बढ़िया , धन्वंतरि देवा हा।

करै कुबेर कृपा सब उप्पर, बरसै धन मेवा हा।।

सुख समृद्धि देबे सब ला, धन वैभव बरसाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


देवारी कस सब दिन लागै, सबदिन बीतै सुख मा।

मनखे बन जिनगी जे जीये , दबे रहै झन दुख मा।

काय जीव का मनखे तनखे, दे सुख सब ला माई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

किरदार-हरिगीतिका छंद

 किरदार-हरिगीतिका छंद


कखरो इशारा मा नहीं अउ ना कहूँ जंजाल मा।

जिनगी सदा नाँचत बिते कर्मा ददरिया ताल मा।।

टीका लगा कुंकुंम सही माटी ला सबदिन माथ मा।

कलगी लगा पागा चढ़ा थिरकँव सँगी मन साथ मा।।


बोझा मुड़ी मा बोह के संस्कृति परब संस्कार के।

सबके जिया मा घर बनावँव काम आवँव चार के।।

आँसू कभू डर दुक्ख मा कखरो नयन ले झन झरे।

विनती करँव कर जोर के सुख शांति सत सब घर फरे।।


पंथी सुआ कर्मा ददरिया पंडवानी भोजली।

भगवत रमायण रामधुनि गौरा गुँजय गाँवे गली।।

मनखे जुरें बिसराय बर दुख नाच गम्मत संग मा।

देखत हबर जायें खुशी सब जायँ रच सुख रंग मा।।



मधुरस झरे हर मंच मा जादू चले संगीत के।

गाना बजाना ले तको शिक्षा मिले नित नीत के।।

छोटे बने सीखत रहँव किरपा करे करतार हर।

जिनगी रहे या मंच कोई लौं निभा किरदार हर।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)




फेक अकड़ गुमान(किरदार)- कुंडलियाँ


धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा अपन किरदार।।

निभा अपन किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद

 चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद


पानी गिरे चौमास मा, बादर करे गड़गड़ गजब।

जिवरा डरे सुनके अजब, बिजुरी गिरे कड़कड़ गजब।


छाये घटा घनघोर अउ, टकराय घन आगास मा।

बिजुरी गिरे के डर रथे, चारो डहर चौमास मा।।


का जानवर अउ का मनुष, सब बर बिजुरिया काल हे।

घर बन घलो जाथे उजड़, बिजुरी बिकट जंजाल हे।।


गिरही कते कोती बिजुरिया, ये समझ मा आय ना।

फोकट मरे झन पेड़ पउधा ना मनुष गरु गाय ना।।


खींचे बिजुरिया ला अपन कोती सुचालक चीज हर।

रहिथे तड़ित चालक जिहाँ तौने सुरक्षित गाँव घर।।


यमराज बनके गिर जथे, अउ प्राण ला लेथे झटक।

पानी गिरत रहिथे गजब ता, बाग बन मा झन भटक।।


बादर गजब गर्जन करे तब, टेप टीवी बंद रख।

नित होश मा रहि काम कर, मुख मा कहानी छंद रख।।


बाहिर हवस ता बैठ उखड़ू, मूंद के मुँह कान ला।

रख जानकारी सावधानी अउ बचाले जान ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

रंग रंग के गहना गुठिया-लावणी छंद

 रंग रंग के गहना गुठिया-लावणी छंद


रंग रंग के गहना गुठिया, पहिरें बेटी माई मन।

खुले रूप सजधज बड़ भारी, सँहिरायें मनखें सबझन।।


सूँता सुर्रा सुँतिया सँकरी, साँटी सिंगी अउ हँसली।

चैन चुड़ी सोना चांदी के, आये असली अउ नकली।।

कड़ा कोतरी करण फूल फर, ककनी कटहर अउ करधन।

रंग रंग के गहना गुठिया, पहिरें बेटी माई मन।।


बिधू बुलाक बनुरिया बहुटा, बिछिया बाली अउ बारी।

बेनिफूल बघनक्खा बिछुवा, माला मुँदरी मलदारी।।

चुटकी चुरवा औरीदाना, पटा पाँख पटिया पैजन।

रंग रंग के गहना गुठिया, पहिरें बेटी माई मन।।


तोड़ा तरकी टिकली फुँदरी, रुपिया लगथे बड़ अच्छा।

पटा लवंग फूल नथ लुरकी, झुमका ऐंठी अउ लच्छा।।

ढार नांगमोरी नकबेसर, पैरी बाजे छन छन छन।

रंग रंग के गहना गुठिया, पहिरें बेटी माई मन।।


कटवा कौड़ी फुल्ली पँहुची, खूँटी खिनवा गहुँदाना।

हार हमेल किलिप हर्रइयाँ, माथामोती पिन नाना।।

सोना चाँदी मूंगा मोती, गहना गुठिया आये धन।

रंग रंग के गहना गुठिया, पहिरें बेटी माई मन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बनगे हवै कबीर- सरसी छंद

 बनगे हवै कबीर- सरसी छंद


कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।

घात लगाये कस रहिरहि के,टीपे धरम ल तीर।।


मइल हवै जे अंतस भीतर, ते तन नइ ममहाय।

जस देखे तस दिखथे दुनिया, अँधरौटी जब छाय।।

धरम सिखाथे गूढ़ जिये के, छीच सुमत सत नीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


पंथ राज दल बल समाज के, सब पहिरें हें ताज।

अपन अपन गुरु इष्ट देव ला, पूजैं सरी समाज।।

जनम मरन ला जान सके नइ, ज्ञानी गुणी अमीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


येला वोला गरियाये मा, करियाये अउ भाग।

ये जग ला बस जोड़े रखथे, मीठ बोल अनुराग।।

माँस मंद मा बूड़े रहिथें, छोड़ दूध अउ खीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


मानवता मनखें मा राहय, जाने जिनगी मोल।

होय करम बढ़िया नित जग मा, कहै शास्त्र मुँह खोल।।

ज्ञान नयन ए धरम जिया ए, करम बनाथे वीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


कबिरा के कथनी करनी मा, रिहिस चिटिक ना भेद।

फेर आज करिया तन उप्पर, हावै बसन सफेद।।

एक आँख मा दिखे कोइला, एक आँख मा हीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


कुकरा आज कबीर बने हे, सुबे शाम दै बांग।

देखावा मा बुड़े रहै नित, पीके गांजा भांग।।

गुण गियान के दरस परख ना, ना अंतस मा पीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


धरम बुरा नइ होय कभू भी, करम लगाथे दाग।

घर उँखरो जलबे करथे, जेन लगाथे आग।।

जिया झाँकना चाही खुद के, भेदभाव पट चीर।

कलम धरे नइ आय तहू हा, बनगे हवै कबीर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन बोहही, उबर असत लत खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

प्रिंट रेट के दुःख(MRP)- सरसी छंद

 प्रिंट रेट के दुःख(MRP)- सरसी छंद


आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।

मूल्य लिखाये रहिथे भारी, देख निकलथे जान।।


दू रुपया के चीज घलो के, रइथे रेट पचास।

कतको मन खा जाथे धोखा, टूट जथे विश्वास।।

फिरिज फटाका दवा दरी के, धरे कोन हा कान।।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


देखत हे सरकार घलो हा, तभो मुँदे हे नैन।

लूट मचे हे चारो कोती, आय कहाँ ले चैन।।

अधिकारी नेता बैपारी, गाँय मिला सुर गान।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


एक बिसाये गार पछीना, एक भरे सन्दूक।

जेन ठगाये तेन बताये, काखर कर जा दुःख।

प्रिंट रेट झन होवै जादा, दै शासन हा ध्यान।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

चउथ के चाँद- लावणी छंद

 चउथ के चाँद- लावणी छंद


घूप दीप आगर इत्तर मा, सजे चउथ के थाली हे।

चाँद निहारत चाँद खड़े हे, चमकत बिंदिया बाली हे।।


भाव भजन व्रत जप तप गूंजे, नाँव सजन के हे मुख मा।

माँगय वर माता करवा ले, बीतय जिनगी नित सुख मा।।

लाली लुगरा लाली लहँगा, महुर मेंहदी लाली हे।

चाँद निहारत चाँद खड़े हे, चमकत बिंदिया बाली हे।।


जप तप देख अशीष सुखी नित, देय विधाता बिन बोले।

जनमो जनम रहय रिस्ता हा, नेव ठिहा के झन डोले।।

हवय सजाना कइसे बगिया, जाने जउने माली हे।

चाँद निहारत चाँद खड़े हे, चमकत बिंदिया बाली हे।।


करवा चउथ उपास रहइया, बाढ़त हावय सब कोती।

मया पिरित मा चहकय डेरा, बरे खुशी सुख के जोती।।

टिके आस मा हे सरि दुनिया, बिन आसा जग खाली हे।

चाँद निहारत चाँद खड़े हे, चमकत बिंदिया बाली हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाढ़त बिजली बिल-(16-12)

 बाढ़त बिजली बिल-(16-12)


टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।

नेता अधिकारी बैपारी, लूटत हावैं मिल के।।


वाट वाट कहि वाट लगावै, रुपिया वसुलै भारी।

छोट वाट के लट्टू पंखा, मीटर के मति हारी।।

बता बजावत रहिबों ताली, अउ केदिन मुँह सिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


बरत बगाबग एक ठिहा हे, एक ठिहा अँधियारी।

सरकारी बिल सर जावत हे, सिस्टम जस गंधारी।।

पाले हमर कोइला पानी, आन लेग के ढिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।


सोलर सिस्टम लेवव कहिके, चलत हवै मनमानी।

हाँसत हावय हिही हिही बड़ , घर मा बइठ अडानी।।

बँटे रेवड़ी आनी बानी, हमर चाम ला छिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

काँसी फूल-सरसी छंद

 काँसी फूल-सरसी छंद


सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।

छटा धरा के लगे सुहावना, जब काँसी मुस्काय।।


हरियर धरती सादा फूल मा, सज हो जाथे खास।

मनुष देव अउ पितर घलो ला, आये फुलवा रास।

देत बिदाई बरसा ऋतु ला, शरद मास परघाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


चारो मूड़ा छाये दिखथे, स्वेत काँस के फूल।

हाथ हलाके नाचे लगथे, पुरवइया मा झूल।।

दिखे गगन कस दिन भर धरती, बिहना बरफ जनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


तना फूल जड़ सब काँसी के, आथे अड़बड़ काम।

माटी ला बोहान देय नइ, पके घास दै दाम।।

डोरी बहरी खटिया मचिया, जाने तौन बनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Sunday, September 13, 2026

तह विकास के-हाकलि छंद

 तह विकास के-हाकलि छंद


तह विकास के पोला हे।

सब खुँट विष के घोला हे।।

बम बारुद गन गोला हे।

सुख मासा अउ तोला हे।।


बरत गाँव घर टोला हे।

उसलत बारी कोला हे।।

गिरे फसल मा ओला हे।

खतरा तोला मोला हे।।


नेता मन बड़बोला हें।

जनता निच्चट भोला हें।।

नश्वर माटी चोला हे।

तब ले नखरा सोला हे।।


इक देखावत रोला हे।

घर भीतर हिंडोला हे।।

इक के हाथ फफोला हे।

चिरहा खीसा झोला हे।।


सत के निकलत डोला हे।

संगी सगा सपोला हे।।

मोला मोला मोला हे।

बरत जिया मा होला हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, September 11, 2026

पिकनिक-कुंडलियाँ

 पिकनिक-कुंडलियाँ


झाड़ी बन नदिया मता, पिकनिक मनुष मनाँय।

मछरी कुकरी बोकरा, आनी बानी खाँय।।

आनी बानी खाँय, मनुष मन जंगल जाके।

नाचे कूदे खूब, सगा संगी जुरियाके।।

हो हल्ला बड़ होय, उड़ावै धुँगिया गाड़ी।

बानर भालू रोय, रोय नदिया बन झाड़ी।


जंगल मा चारों मुड़ा, होवत हवय गोहार।

प्लास्टिक सँग मा काँच के, कचरा हे भरमार।

कचरा हे भरमार, सिसी पतरी दोना के।

मनखें मन बगराय, बीच जंगल मा जाके।

करैं रोज वनभोज, लगे नइ शनि रवि मंगल।

खा पी बड़ इतरायँ, पहुँच मनखें मन जंगल।।


पग मनखें माढ़िस तिहाँ, होवत गिस ऊजाड़।

लाहो लेवत हें गजब, मनखें मन हा ठाड़।।

मनखें मन हा ठाड़, कुदत हें बन मा जाके।

देख मनुष मतवार, सपटगे बाघ डराके।।

संगी पेड़ पहाड़, कहैं मनखें मन बन ठग।

उजड़त गिस बन बाग, पड़िस जब जब मनखें पग।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बाढ़त हे अश्लीलता-सार छंद

 बाढ़त हे अश्लीलता-सार छंद


सोसल मिडिया मा मनखें मन, फूहड़ता बगरावै।

नर होवै चाहे हो नारी, सबझन हँस इतरावै।।


मनखें मन बर होगे लगथे, गारी गिल्ला ठट्ठा।

सेलिब्रिटी हवै तउने मन, बैठारत हें भट्ठा।।

कतको देखत मुहुँ लुकावै, ता कतको ला भावै।

सोसल मिडिया मा मनखें मन, फूहड़ता बगरावै।।


डर नइ हे कोनो ना कखरो, करत हवैं मनमानी।

सबे वाइरल होए खातिर, होरा भूंजँय छानी।।

पढ़े लिखे जन आँख मूंद के, भेड़ी असन झपावै।

सोसल मिडिया मा मनखें मन, फूहड़ता बगरावै।।


सबके हाथ मा हवै मोबाइल, का सियान का लइका।

बाढ़त फूहड़ता मा उघरै, लोक लाज के फइका।।

सजा होय अइसन मनखें ला, सबक सीख सब जावै।

सोसल मिडिया मा मनखें मन, फूहड़ता बगरावै।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छंद-सरगम

 जय गणेश


पहली सुमिरन तोर करत हँव, हे गौरी के लाला।

रबे सहाई मोर कलम के, बाँटत रहँव उजाला।।


कहूँ भगत के सदन बदन मा, दुख झन डेरा डारे।

बढ़े बुद्धि बल धन दोगानी, डर जर आफत हारे।।

सिरजे सत सुम्मत के कुरिया, उझरे इरसा झाला।

पहली सुमिरन तोर करत हँव, हे गौरी के लाला।


सबे गाँव घर गली खोर मा, आ जा बनके संगी।

मन के भाव भजन ला पढ़के, दे दे सुख सतरंगी।।

तोर रूप रँग सब ला भाथे, मुसक सवारी वाला।

पहली सुमिरन तोर करत हँव, हे गौरी के लाला।


मन मंदिर मा रहे बसेरा, तोर सदा हे देवा।

मन के भाव उड़ेल जगत के, करत रहँव नित सेवा।

आखर बने बने बर डोंगा, अउ बइरी बर भाला।

पहली सुमिरन तोर करत हँव, हे गौरी के लाला।



मूरत राम नाम के


मन मन्दिर मा राम नाम के, मूरत तैं बइठाले।

भव सागर ले सहज तरे बर, राम नाम गुण गाले।


राम नाम के माला जपके, शबरी दाई तरगे।

राम सिया के चरण पखारे, केंवट के दुख झरगे।

बन बजरंगबली कस सेवक, जघा चरण मा पाले।

भव सागर ले सहज तरे बर, राम नाम गुण गाले।।


राम नाम के जाप करे ले, सुख समृद्धि सत आथे।

लोहा हा सोना हो जाथे, जहर अमृत बन जाथे।

जिहाँ राम हे तिहाँ कभू भी, दुख नइ डेरा डाले।

भव सागर ले सहज तरे बर, राम नाम गुण गाले।


एती ओती चारो कोती, प्रभु श्री राम समाये।

सुर नर मुनि खग गुनी गियानी, जड़ चेतन गुण गाये।

ये मउका नइ मिले दुबारा, जीवन सफल बनाले।

भव सागर ले सहज तरे बर, राम नाम गुण गाले।



तुलसी तोर रमायण


जग बर अमरित पानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


शब्द शब्द मा राम रमे हे, शब्द शब्द मा सीता।

गूढ़ ग्यान गुण गोठ गँजाये, चिटिको नइहे रीता।

सत सुख शांति कहानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


सब दिन बरसे कृपा राम के, दरद दुःख डर भागे।

राम नाम के महिमा भारी, भाग भगत के जागे।।

धर्म ध्वजा धन धानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


सहज तारथे भवसागर ले, ये डोंगा कलजुग के।

दूर भगाथे अँधियारी ला, सुरुज सहीं नित उगके।

बेघर के छत छानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।


प्रश्न घलो कमती पड़ जाही, उत्तर अतिक भरे हे।

अधम अनाड़ी गुणी गियानी, सबके दुःख हरे हे।

मीठ कलिंदर चानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।



भोले बाबा 


डोल डोल के डारा पाना, भोला के गुण गाथे।

शिव भोला के पबरित महिना, सावन जब जब आथे।।


सावन महिना भर भगतन मन, नहा खोर बिहना ले।

शिव मंदिर मा पान फूल धर, दिखथें डेरा डाले।।

भांग धतूरा चना दार अउ, चाँउर शिव ला भाथे।

शिव भोला के पबरित महिना, सावन जब जब आथे।।


बम बम बोलत सबे चढ़ाथें, लोटा लोटा पानी।

मन के भाव भजन ला देखत, फल देथे शिव दानी।।

सावन महिना भर सब कोती, बम बम रटन सुनाथे।

शिव भोला के पबरित महिना, सावन जब जब आथे।।


चारों मूड़ा भक्ति भाव के ,बोहत दिखथे धारा।

शिव भोला के जयकारा मा, गुँजे गाँव घर पारा।।

रहि उपास लइका सियान सब, भोला के हो जाथे।

शिव भोला के पबरित महिना, सावन जब जब आथे।।



रामराज


राम राम कहि हाथ जोड़हीं, पाछू छुरी चलाही।

बता भला अइसन मा कइसे, राम राज हा आही।


बचन ददा दाई के बिरथा, बिरथा गुरु के बानी।

अपने मन के काम करैं सब, होरा भूँजैं छानी।।

भाई भाई लड़त मरत हें, काय जमाना आगे।

स्वारथ के चक्कर फँसके, अपने अपन खिरागे।।

काय बने अउ का हे गिनहा, तेला समझ न पाही।

बता भला अइसन मा कइसे, राम राज हा आही।।


अहंकार मा सबे चूर हें, जप तप सत नइ जाने।

धन दौलत ला अपने माने, मनखें मन ला आने।।

अपन ठउर के रचना खातिर, पर के नेंव गिरायें।

रक्सा कस सब मनखें होगे, जीव मार के खायें।।

छोड़ सुमत अउ सत के रद्दा, झगरा रोज मताही।

बता भला अइसन मा कइसे, राम राज हा आही।।


कोन तियागे राज सिंहासन, कोन बने बनवासी।

पर के दुःख क्लेश हरे बर, कोन बिगाड़े रासी।।

बानर भालू खग के सँग मा, कउने बदे मितानी।

खुदे पियासे रहिके कउने, पर ला देवैं पानी।।

टाँग अड़ाही पर कारज मा, सत के नाम मिटाही।

बता भला अइसन मा कइसे, राम राज हा आही।।


बिन स्वारथ के सेवा करही, कोन बने बजरंगी।

अंगद कस अब दूत मिले नइ, न सुग्रीव कस संगी।।

भेदभाव ला कोन तोड़ही, कउने हरही पीरा।

कोन बुराई सँग मा लड़ही, तज के घर बन हीरा।।

हाँहाकार मचाही रावण, कुंभकरन अँटियाही।

बता भला अइसन मा कइसे, राम राज हा आही।।



मानत हन नवरात-सार छंद


मानत हन नवरात देख ले, बिन सेवा अउ जस के।

बड़े बड़े पंडाल बने हे, भरे मनुष हें ठसके।।


कानफोड़वा डीजे बाजे, सुन सुन दरके छाती।

जोत जँवारा भाव भजन नइ, काये के नवराती।।

पंडा पहिरे जींस टाउजर, खाय खीर फर कसके।

मानत हन नवरात देख ले, बिन सेवा अउ जस के।।


झाँझ मँजीरा ढोल दिखे नइ, भगत दिखे ना बरुवा।

एती ओती भागत हावँय, मनखे मन बन गरुवा।।

फोटू अउ विडियो के खातिर, बस मोबाइल मसके।

मानत हन नवरात देख ले, बिन सेवा अउ जस के।।


कुदे डांडिया कहिके कतको, कतको नाचें डिस्को।

राज छोकरा मन के हावँय, बुढ़वा सुढ़वा खिसको।।

देखावा ले आज उबारना, नइहे कखरो बसके।

मानत हन नवरात देख ले, बिन सेवा अउ जस के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



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हरेली


खुशी छाय हे सबो मुड़ा मा, बढ़े मया बरपेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।।


रिचरिच रिचरिच बाजे गेंड़ी, फुगड़ी खो खो माते।

खुडुवा खेलैं फेकैं नरियर, होय मया के बाते।।

भिरभिर भिरभिर भागत दिखथें, बैंहा जोर सहेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।।


सावन मास अमावस के दिन, बइगा मंतर मारे।

नीम डार मुँहटा मा खोंचे, दया मया सुख गारे।।

घंटी बाजै शंख सुनावय, कुटिया लगै हवेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।।


चन्दन बन्दन पान सुपारी, धरके माई पीला।

रापा गैंती नाँगर पूजँय, भोग लगाके चीला।।

हवै थाल मा खीर कलेवा, भरभर दूध कसेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।।


गहूँ पिसान ल सान मिलाये, नून अरंडी पाना।

लोंदी खाये बइला बछरू, राउत पाये दाना।।

लाल चिरैंया सेत मोंगरा, महकै फूल चमेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।


बेर बियासी के माते हे, रँग मा हवै किसानी।

भोले बाबा आस पुरावै, बरसै बढ़िया पानी।।

धान पान सब नाँचे मनभर, पवन करै अटखेली।

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, हबरे हवै हरेली।।



कमर्छठ


खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।

चना गहूँ राहेर भुँजाये, झड़के बहिनी भाई।।


भादो मास कमर्छठ होवय, छठमी तिथि अँधियारी।

लीपे पोते घर अँगना हे, चुक ले दिखे दुवारी।।

बड़े बिहनिया नहा खोर के, दतुन घँसे मउहा के।

हलषष्ठी के करे सुमरनी, सब कोनो जुरियाके।।

घर के बाहिर सगरी कोड़े, बइठाये छठ माई।

खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।।


सगरी के मिल पूजा करके, गिनगिन डारें पानी।

पड़ड़ी काँसी पान फूल धर, मुस्काये छठ रानी।।

चुकिया डोंगा बाँटी भँवरा, हे छै जात खिलोना।

हूम धूप बन्दन चंदन मा, महकै सगरी कोना।।

द्वापर युग मा पहिली पूजा, करिन देवकी दाई।

खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।।


पसहर चाँउर भात बने हे, बने हवै छै भाजी।

लाई नरियर के परसादी, लइका मनबर खाजी।।

लइका मन के रक्षा खातिर, हे उपास महतारी।

छै ठन कहिनी बैठ सुने सब, करे नेंग बड़ भारी।।

रानी उतरा नेंग जोग कर, लइका के सुख पाई।

खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।।


खेत खार मा नइ तो रेंगे, गाय दूध नइ पीये।

महतारी के मया गजब हे, लइका मन बर जीये।।

भैंस दूध के भोग लगाये, भरभर मउहा दोना।

करे दया हलषष्ठी दाई, टारे दुख जर टोना।।

पिंवरीं पोती देय पीठ मा, अँचरा बीच छुपाई।

खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।।


चिरई बिलई कुकुर अघाये, सब ला भोग लगाये।

महतारी के दान धरम ले, सुख समृद्धि सत आये।।

घँसे पीठ मा महतारी मन, पोती कइथे जेला।

रक्षा कवच बने लइका के, भागे दुःख झमेला।।

सुख माँगै लइका बर दाई, ममता मया लुटाई।

खनर खनर बड़ चूड़ी बाजे, फोड़े दाई लाई।।



मरना हे तीजा मा


लइका लोग ल धरके गय हे, मइके मोर सुवारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।।


कभू भात चिबरी हो जावै, कभू होय बड़ गिल्ला।

बर्तन भँवड़ा झाड़ू पोछा, हालत होगे ढिल्ला।।

एक बेर के भात साग हा, चलथे बिहना संझा।

मिरी मसाला नून मिले नइ, मति हा जाथे कंझा।।

दिखै खोर घर अँगना रदखद, रदखद हाँड़ी बारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।।


सुते उठे के समय बिगड़गे, घर बड़ लागै सुन्ना।

नवा पेंट कुर्था मइलागे, पहिरँव ओन्हा जुन्ना।।

कतको कन कपड़ा कुढ़वागे, मूड़ी देख पिरावै।

ताजा पानी ताजा खाना, नोहर हो गय हावै।।

कान सुने बर तरसत हावै, लइकन के किलकारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।।


खाय पिये बर कहिही कहिके, ताकँव मुँह साथी के।

चना चबेना मा अब कइसे, पेट भरे हाथी के।।

उम्मर मोर बढ़ावत हावै, मइके मा वो जाके।

राखे तीजा के उपास हे, करू करेला खाके।।

चारे दिन मा चितियागे हँव, चले जिया मा आरी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।।



मोला किसन बनादे 


मोर पाँख ला मूड़ सजादे, काजर गाल लगादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई, मोला किसन बनादे।।


बाँध कमर मा करिया करधन, बाँध मूड़ मा पागा।

हाथ अरो दे करिया चूड़ा, बाँध गला मा धागा।।

चंदन टीका माथ लगादे, पहिरा माला मुंदी।

फूल मोंगरा के गजरा ला, मोर बाँध दे चुंदी।।

हार गला बर लान बनादे, दसमत लाली लाली।

घींव लेवना चाँट चाँट के, खाहूँ थाली थाली।।

मुचुर मुचुर मुसकावत सोहूँ, गुरतुर लोरी गादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई, मोला किसन बनादे।।


दूध दहीं ला पीयत जाहूँ, बंसी मीठ बजाहूँ।

तेंदू लउठी हाथ थमादे, गाय चराके आहूँ।।

महानदी पैरी जस यमुना, रुख कदम्ब बर पीपर।    

गोकुल कस सब गाँव गली हे, ग्वाल बाल घर भीतर।।

मधुबन जइसे बाग बगीचा, रुख राई बन झाड़ी।

बँसुरी धरे रेंगहूँ मैंहा, भइया नाँगर डाँड़ी।।

कनिहा मा कँस लाली गमछा, पीताम्बर ओढ़ादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई, मोला किसन बनादे।।


गोप गुवालीन संग खेलहूँ, मीत मितान बनाहूँ।

संसो झन करबे वो दाई, खेल कूद घर आहूँ।।

पहिरा  ओढ़ा  करदे  दाई, किसन बरन तैं चोला।

रही रही के कही सबो झन, कान्हा करिया मोला।।

पाँव ददा दाई के परहूँ, मिलही मोला मेवा।

बइरी मन ला मार भगाहूँ, करहूँ सबके सेवा।।

दया मया ला बाँटत फिरहूँ, दाई आस पुरादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई, मोला किसन बनादे।।



पुन्नी के चंदा


पुन्नी रात म चमचम चमकत, नाँचत हावै चंदा।

अँधियारी रतिहा ला छपछप, काँचत हावै चंदा।


बरै चँदैनी सँग में रिगबिग, सबके मन ला भाये।

घटे बढ़े नित पाख पाख में, एक्कम दूज कहाये।।

कभू चौथ के कभू ईद के, बनके जिया लुभाये।

शरद पाख सज सोला कला म, अमृत बूंद बरसाये।।

सबके मन में दया मया ला, बाँचत हावै चंदा।

पुन्नी रात म चमचम चमकत, नाँचत हावै चंदा।।


बिन चंदा के हवै अधूरा, लइका मन के लोरी।

चकवा रटन लगावत हावै, चंदा जान चकोरी।।

कोनो मया म करे ठिठोली, चाँद म महल बनाहूँ।

कहे पिया ला कतको झन मन, चाँद तोड़ के लाहूँ।।

बिरह म रोवत बिरही ला अउ, टाँचत हावै  चंदा।

पुन्नी रात म चमचम चमकत, नाँचत हावै चंदा।।


सबे तीर उजियारा हावै, नइहे दुःख उदासी।

चिक्कन चिक्कन घर दुवार हे, शुभ हे सबके रासी।।

गीता रामायण गूँजत हे, कविता गीत सुनाये।

खीर चुरत हे चौक चौक में, मिलजुल भोग लगाये।।

धरम करम ला मनखे मनके, जाँचत हावै चंदा।

पुन्नी रात म चमचम चमकत, नाँचत हावै चंदा।।



तोर रूप दगहा रे चंदा


तोर रूप दगहा हे चंदा, तभो लुभाये सब ला।

मोर रूप हा चमचम चमकै, तबले तड़पौ अबला।


तोर कला ले मोर कला हा, हावै कतको जादा।

तभो मोर परदेशी बलमा, कहाँ निभाइस वादा।।

चकवा रटन लगाये तोरे, मोर पिया दुरिहागे।

करधन ककनी बिछिया कँगना, रद्दा देख खियागे।।

मोर रुदन सुन सुर ले भटके, बेंजो पेटी तबला।

तोर रूप दगहा हे चंदा, तभो लुभाये सब ला।।


पाख अँजोरी अउ अँधियारी, घटथस बढ़थस तैंहा।

मया जिया मा हावै आगर, करौं बता का मैंहा।

कहाँ हिरक के देखे तभ्भो, मोर सजन अलबेला।

धीर धरे हँव आही कहिके, लाद जिया मा ढेला।

रोवै नैना निसदिन मोरे, भला गिनावौ कब ला।

तोर रूप दगहा हे चंदा, तभो लुभाये सब ला।।


पथरा गय हे आँखी मोरे, निंदिया घलो गँवागे।

मोर रात दिन एक बरोबर, रद्दा जोहँव जागे।।

तोर संग चमके रे चंदा, कतको अकन चँदैनी।

मोर मया के फुलुवा झरगे, पइधे माहुर मैनी।।

जिया भीतरी बार दीयना, रोज मनाथँव रब ला।

तोर रूप दगहा हे चंदा, तभो लुभाये सबला।।


अबक तबक नित आही कहिके, मन ला धीर धरावौ।

आजा राजा आजा राजा, कहिके रटन लगावौ।।

पवन पेड़ पानी पंछी सब, रहिरहि के बिजराये।

कइसे करौं बता रे चंदा, पिया लहुट नइ आये।।

काड़ी कस काया हा होगे, कपड़ा होगे झबला।

तोर रूप दगहा हे चंदा,  तभो लुभाये सब ला।।



धनतेरस


धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।

धनतेरस मा दीप जलाके, करत हवौं पहुनाई।।


चमकै चमचम ठिहा ठौर हा, दमकै बखरी बारी।

धन तेरस के दीया के सँग, आगे हे देवारी।।

भोग लगावौं फूल हार अउ , नरियर खीर मिठाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


रखे सबे के सेहत बढ़िया , धन्वंतरि देवा हा।

करै कुबेर कृपा सब उप्पर, बरसै धन मेवा हा।।

सुख समृद्धि देबे सब ला, धन वैभव बरसाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


देवारी कस सब दिन लागै, सबदिन बीतै सुख मा।

मनखे बन जिनगी जे जीये , दबे रहै झन दुख मा।।

काय जीव का मनखे तनखे, दे सुख सब ला माई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।



बधाई नवा बछर के


हवे बधाई नवा बछर के, गाड़ा गाड़ा तोला।

सुख पा राज करे जिनगी भर, गदगद होके चोला।।


सबे खूँट मा रहे अँजोरी, अँधियारी झन छाये।

नवा बछर हा अपन संग मा, नवा खुशी धर आये।।

बने चीज नित नयन निहारे, कान सुने सत बानी।

झरे फूल कस हाँसी मुख ले, जुगजुग रहे जवानी।।

जल थल का आगास नाप ले, चढ़के उड़न खटोला।

हवे बधाई नवा बछर के, गाड़ा गाड़ा तोला।।


धन बल बाढ़े दिन दिन भारी, घर लागे फुलवारी।

खेत खार मा सोना उपजे,बसेमी गोभी बारी।।

बढ़े बाँस कस बिता बिता बड़, यश जश मान पुछारी।

का मनखे का जीव जिनावर, पटे सबो सँग तारी।।

राम रमैया कृष्ण कन्हैया,करे कृपा शिव भोला।

हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला।।


बरे बैर नव जुग मा बम्बर, बाढ़े भाई चारा।

ऊँच नीच के भेद सिराये, खाये झारा झारा।।

दया मया के होय बसेरा, बोहय गंगा धारा।

पुरवा गीत सुनावै सबला, नाचै आरा पारा।।

भाग बरे पुन्नी कस चंदा, धरे कला गुण सोला।

हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला।।



नवा बछर मा नवा आस


नवा बछर मा नवा आस धर, नवा करे बर पड़ही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही, देश राज तब बढ़ही।।


साधे खातिर अटके बूता, डँटके महिनत चाही।

भूलचूक ला ध्यान देय मा, डहर सुगम हो जाही।।

चलना पड़ही नवा पाथ मा, सबके अँगरी धरके।

उजियारा फैलाना पड़ही, अँधियारी मा बरके।।

गाँजे पड़ही सबला मिलके, दया मया के खरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही, देश राज तब बड़ही।।


जुन्ना पाना डारा झर्रा, पेड़ नवा हो जाथे।

सुरुज नरायण घलो रोज के, नवा किरण बगराथे।।

रतिहा चाँद सितारा मिलजुल, रिगबिग रिगबिग बरथे।

पुरवा पानी अपन काम ला, सुतत उठत नित करथे।।

मानुष मन सब अपन मुठा मा, सत सुम्मत ला धरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही, देश राज तब बड़ही।।


गुरतुर बोली जियरा जोड़े, काँटे चाकू छूरी।

घर बन सँग मा देश राज के, संसो हवै जरूरी।।

जीव जानवर पेड़ पकृति सँग, बँचही पुरवा पानी।

पर्यावरण ह बढ़िया रइही, तभे रही जिनगानी।।

दया मया मा काया रचही, गुण अउ ज्ञान बगरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।।




छेरिकछेरा


दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।

जतके देहू ततके बढ़ही, धन दौलत शुभ बेरा।।


पूस पाख मा पुन्नी के दिन, बगरै नवा अँजोरी।

परब छेरछेरा हा आँटै, मया पिरित के डोरी।।

लइका लोग सियान सबे मिल, नाचै गाना गायें।।

धिनधिन धिनधिन ढोलक बाजे, डंडा ताल सुनायें।

थपड़ी कुहकी झांझ मँजीरा, सुनत टरै दुख घेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।


दया मया के सागर लहरै, नाचै जीवन नैया।

गोंदा गमकै घर अँगना मा, गाय गीत पुर्वैया।।

करे जाड़ जोरा जाये के, मांघ नेवता पाये।

बर पीपर हा पात झराये, आमा हा मउराये।।

सेमी गोभी भाजी निकले, झूलै मुनगा केरा।।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।


मीत मया मन भीतर घोरत, दान देव बन दाता।

भरे अन्न धन मा कोठी ला, सबदिन धरती माता।।

रांध कलेवा खाव बाँट के, रिता रहे झन थारी।

झारव इरसा द्वेष बैर ला, टारव मिल अँधियारी।।

सइमो सइमो करै खोर हा, सइमो सइमो डेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।



छेरछेरा तिहार


कूद कूद के कुहकी पारे, नाचे झूमे गाये।

चारो कोती छेरिक छेरा, सुघ्घर गीत सुनाये।।


पाख अँजोरी पूस महीना, आवय छेरिक छेरा।

दान पुन्न के खातिर अड़बड़, पबरित हे ये बेरा।।


कइसे चालू  होइस तेखर, किस्सा एक सुनावौं।

हमर राज के ये तिहार के, रहि रहि गुण ला गावौं।।


युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।

राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।।


आठ साल बिन राजा के जी, काटे दिन फुलकैना।

हैहय वंशी शूर वीर के, रद्दा जोहय नैना।।


सबो चीज मा हो पारंगत, लहुटे जब राजा हा।

कोसल पुर मा उत्सव होवय, बाजे बड़ बाजा हा।।


राजा अउ रानी फुलकैना, अब्बड़ खुशी मनाये।

राज रतनपुर  हा मनखे मा, मेला असन भराये।।


सोना चाँदी रुपिया पइसा, बाँटे रानी राजा।

रहे पूस पुन्नी के बेरा, खुले रहे दरवाजा।।


कोनो  पाये रुपिया पइसा, कोनो सोना-चाँदी।

राजा के घर खावन लागे, सब मनखे मन माँदी।।


राजा रानी करिन घोषणा, दान इही दिन करबों।

पूस महीना के ये बेरा, सबके झोली भरबों।।


ते दिन ले ये परब चलत हे, दान दक्षिणा होवै।

ऊँच नीच के भेद भुलाके, मया पिरित सब बोवै।।


राज पाठ हा बदलत गिस नित, तभो होय ये जोरा।

कोसलपुर माटी कहलाये, दुलरू धान कटोरा।।


मिँजई कुटई होय धान के, कोठी हर भर जावै।

अन्न देव के घर आये ले, सबके मन हरसावै।।


अन्न दान तब करे सबोझन, आवय जब ये बेरा।

गूँजे सब्बे गली खोर मा, सुघ्घर छेरिक छेरा।।


वेद पुराण ह घलो बताथे, इही समय शिव भोला।

पारवती कर भिक्षा माँगिस, अपन बदल के चोला।।


ते दिन ले मनखे मन सजधज, नट बन भिक्षा माँगे।

ऊँच नीच के भेद मिटाके, मया पिरित ला टाँगे।।


टुकनी बोहे नोनी घूमय, बाबू मन धर झोला।

देय लेय मा ये दिन सबके, पबरित होवय चोला।।


करे सुवा अउ डंडा नाचा, घेरा गोल बनाये।

झाँझ मँजीरा ढोलक बाजे, ठक ठक डंडा भाये।।


दान धरम ये दिन मा करलौ, जघा सरग मा पा लौ।

हरे बछर भरके तिहार ये, छेरिक छेरा गा लौ।।



मकर सक्रांति


सूरज जब धनु राशि छोड़ के, मकर राशि मा जाथे।

भारत भर के मनखे मन हा, तब सक्रांति मनाथे।।


दिशा उत्तरायण सूरज के, ये दिन ले हो जाथे।

कथा कई ठन हे ये दिन के, वेद पुराण सुनाथे।।

सुरुज  देवता हा सुत शनि ले, मिले इही दिन जाये।

मकर राशि के स्वामी शनि हा, अब्बड़ खुशी मनाये।।

कइथे ये दिन भीष्म पितामह, तन ला अपन तियागे।

इही बेर मा असुरन मनके, जम्मो दाँत खियागे।।


जीत देवता मनके होइस, असुरन नाँव बुझागे।

बार बेर सब बढ़िया होगे, दुख के घड़ी भगागे।।

सागर मा जा मिले रिहिस हे, ये दिन गंगा मैया।

तार अपन पुरखा भागीरथ, परे रिहिस हे पैया।।

गंगा सागर मा तेखर बर, मेला घलो भराथे।

भारत भर के मनखे मन हा, तब सक्रांति मनाथे।।


उत्तर मा उतरायण खिचड़ी, दक्षिण पोंगल माने।

कहे लोहड़ी  पश्चिम वाले, पूरब बीहू जाने।।

बने घरो घर तिल के लाड़ू, खिचड़ी खीर कलेवा।

तिल अउ गुड़ के दान करे ले, पावय सुघ्घर मेवा।।

मड़ई मेला घलो भराये, नाचा गम्मत होवै।

मन मा जागे मया प्रीत हा, दुरगुन मन के सोवै।।

बड़े बिहनिया नहा खोर के, सुरुज देव ला ध्यावै।

बंदन चंदन अर्पण करके, भाग अपन सँहिरावै।।

रंग रंग के धर पतंग ला, मन भर सबो उड़ाये।

पूजा पाठ भजन कीर्तन हा, मन ला सबके भाये।।

जोरा करथे जाड़ जाय के, मंद पवन मुस्काथे।

भारत भर के मनखे मन हा, तब सक्रांति मनाथे।।


रंग के तिहार मा रँग जाबों


चलव सँगी रँग के तिहार मा, सब दिन बर रँग जाबों।

दया मया सत सुम्मत घोरे, तन मन दुनों रँगाबों।।


नीर नदी नरवा तरिया के, रहै सबे दिन सादा।

झन मइलाय अँटाये कभ्भू, सबें करिन मिल वादा।।

रचे रहै धरती हरियर मा, बन अउ बाग बचाबों।।

चलव सँगी रँग के तिहार मा, सब दिन बर रँग जाबों।।


बने रहे सूरज के लाली, नील गगन मन भाये।

चंदन लागे पिंवरा धुर्रा, महर महर ममहाये।।

परसा अउ सेम्हर कस फुलके, सबके जिया लुभाबों।

चलव सँगी रँग के तिहार मा, सब दिन बर रँग जाबों।।


जे रँग जे हे अधिकारी, वो रँग वोला देबों।

भेद करन नइ जड़ चेतन मा, सबके सुध मिल लेबों।।

दुःख द्वेष डर लत लालच ला, होरी सरिक जलाबों।

चलव सँगी रँग के तिहार मा, सब दिन बर रँग जाबों।।



हिंदी नवा बछर


फागुन के रँग कहाँ उड़े हे, कहाँ उड़े हे मस्ती।

नवा बछर धर चैत हबरगे, गूँजय घर बन बस्ती।।


चैत चँदैनी चंदा चमकै, चमकै रिगबिग जोती।

नवरात्री के पबरित महिना, लागै जस सुरहोती।।

जोत जँवारा  तोरन  तारा, छाये चारों कोती।

झाँझ मँजीरा माँदर बाजै, झरै मया के मोती।।

दाई दुर्गा के दर्शन ले, तरगे कतको हस्ती।

फागुन के रँग कहाँ उड़े हे, कहाँ उड़े हे मस्ती।।


कोयलिया बइठे आमा मा, बोले गुरतुर बोली।

परसा सेम्हर पेड़ तरी मा, बने हवै रंगोली।।

साल लीम मा पँढ़री पँढ़री, फूल लगे हे भारी।

नवा पात धर नाँचत हावै, बाग बगइचा बारी।।

खेत खार अउ नदी ताल के, नैन करत हे गस्ती।

फागुन के रँग कहाँ उड़े हे, कहाँ  उड़े हे मस्ती।।


बर खाल्हे मा माते पासा, पुरवाही मन भावै।

तेज बढ़ावै सुरुज नरायण, ठंडा जिनिस सुहावै।।

अमरे बर आगास गरेरा, रहि रहि के उड़ियावै।

गरती चार चिरौंजी कउहा, मँउहा बड़ ममहावै।।

लाल कलिंदर खीरा ककड़ी, होगे हावै सस्ती।

फागुन के रँग कहाँ उड़े हे, कहाँ उड़े हे मस्ती।।


खेल मदारी नाचा गम्मत, होवै भगवत गीता।

चना गहूँ सरसो घर आगे, खेत खार हे रीता।।

चरे  गाय गरुवा मन मनके, घूम घूम के चारा।

बर बिहाव के बाजा बाजै, दमकै गमकै पारा।।

चैत अँजोरी नवा साल मा, पार लगे भव कस्ती।

फागुन के रँग  कहाँ  उड़े  हे, कहाँ उड़े हे मस्ती।।



चमचम चमके चैत महीना


चमचम चमचम चाँद चँदैनी,चमके रतिहा बेरा।

चैत महीना पावन लागे, गमके घर बन डेरा।।


रंग फगुनवा छिटके हावय, चिपके हे सुख आसा।

दया मया के फुलवा फुलगे, भागे दुःख हतासा।।

हूम धूप मा महकत हावै, गलियन बाग बसेरा।

चमचम चमचम चाँद चँदैनी, चमके रतिहा बेरा।।


नवा बछर अउ नवराती के, बगरे हवै अँजोरी।

चकवा संसो मा पड़ गेहे, खोजै कहाँ चकोरी।।

धरा गगन दूनो चमकत हे, कती लगावै फेरा।

चमचम चमचम चाँद चँदैनी, चमके रतिहा बेरा।।


नवा नवा हरियर लुगरा मा, सजे हवै रुख राई।

गाना गावै जिया लुभाये, सुरुर सुरुर पुरवाई।।

साल नीम हा फूल धरे हे, झूलत हे फर केरा।

चमचम चमचम चाँद चँदैनी, चमके रतिहा बेरा।।


बर बिहाव के लाड़ू ढूलय, ऊलय धरती दर्रा।

घाम तरेरे चुँहै पसीना, चले बँरोड़ा गर्रा।।

बारी बखरी ला राखत हे, बबा चलावत ढेरा।

चमचम चमचम चाँद चँदैनी, चमके रतिहा बेरा।।



मड़वा तरी


बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।

गदबिद गदबिद करत हवै घर, गाँव गली अउ पारा।।


मड़वा भीतर बइठे दुलरू, मुचुर मुचुर मुस्कावै।

गीत डोकरी दाई गावै, मामी तेल चढावै।।

कका कमर मटकावत हवै, लगा लगा जयकारा।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।।


दीदी भाँटो मामा मामी, सब पहुना सकलाहे।

नेंग जोग मड़वा मा होवै, पारा भर जुरियाहे।।

लाड़ू खीर बरा सोंहारी, खावै झारा झारा।।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।।


बबा ददा दाई भाई सँग, खुश हे आजी आजा।

रात करत हे रिगबिग रिगबिग, दिनभर बाजे बाजा।।

माड़ जाय मन मड़वा भीतर, चमके तोरन तारा।

बर बिहाव के बाजा बाजे, छाहे आमा डारा।।



एक दिन के दिवस


का का दिवस मनाथौ भैया, सुनके काँपे पोटा।

नेत नियम कुछु आय समझ नइ, धरा दुहू का लोटा।।


दाई ददा गुरू ज्ञानी ला, दिन तिथि मा झन बाँधौ।

देखावा मा उधौ बनौ झन, देखावा मा माँधौ।।

दया मया नित बड़े छोट ला, हाँस हाँस के बाँटौ।

फूल गुलाब धरे एके दिन, कखरो सर झन चाँटौ।।

पश्चिम के परचम लहरावत, बनव न सिक्का खोटा।

का का दिवस मनाथौ भैया, सुनके काँपे पोटा।।


हूम देय कस काज करौ झन, करौ झने देखावा।

अइसन दिवस मनावौ झन जे, फूटय बनके लावा।।

मीत मितानी रोजे बढ़ही, रोजे धन दोगानी।

एक दिवस मा काम चले नइ, भजौ मीठ नित बानी।।

थामव कर मा डोर मया के, झन धर घूमव सोंटा।

का का दिवस मनाथौ भैया, सुनके काँपे पोटा।।


दाई बाबू के पूजा तो, रोजे होना  चाही।

रोजे जागे देश प्रेम हा, तभे बात बन पाही।।

पवन पेड़ पानी ला जतनौ, रोजे पुण्य कमावौ।

धरती दाई के सुध लेवव, पर्यावरण बचावौ।।

गौरया के गीत सुनौ नित, मारव झन जी गोंटा।

का का दिवस मनाथौ भैया, सुनके काँपे पोटा।।


चर दिनिया हे मानुष काया, हाँसी खुशी गुजारौ।

धरत हवै भुतवा पश्चिम के, दया मया ले झारौ।।

संस्कृति अउ संस्कार बचावौ, आदत नियत सुधारौ।

सबके दिल मा बसव बने बन, कखरो घर झन बारौ।।

मुरुख दिवस कहि मुरुख बनाथौ, अपन उठा के टोंटा।

का का दिवस मनाथौ भैया, सुनके काँपे पोटा।।


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लाल बहादुर शास्त्री जी 


जय जवान अउ जय किसान के, जग ला दिस हे नारा।

लाल बहादुर शास्त्री जी के, चलो करिन जयकारा।।


पद पइसा लत लोभ भुलाके, जीइस जीवन सादा।

बोलिस कम हे जिनगी भर अउ, काम करिस हे जादा।

रिहिस मीत बर मीठ बताशा, बइरी मन बर आरा।।

जय जवान अउ जय किसान के, जग ला दिस हे नारा।


आजादी के रथ ला हाँकिस, फाँकिस दुख दुर्गुण ला।

नित नियाव के झंडा गाड़िस, बता पाप अउ पुण ला।

रिहिस उठाये सिर मा सब दिन, देशभक्ति के भारा।।

जय जवान अउ जय किसान के, जग ला दिस हे नारा।


ताशकन्द मा कइसे सुतगिस, जेन कभू नइ सोवै।

देख समाधी विजय घाट के, यमुना रहिरहि रोवै।।

लाल बहादुर लाल धरा के, नभ के चाँद सितारा।

जय जवान अउ जय किसान के, जग ला दिस हे नारा।




भुलागेन बलिदानी मन ला


कहाँ चिता के आग बुझा हे, हावै कहाँ अजादी।

भुलागेन बलिदानी मन ला, बनके अवसरवादी।


बैरी अँचरा खींचत हावै, सिसकै भारत माता।

देश धरम बर मया उरकगे, ठट्ठा होगे नाता।।

महतारी के आन बान बर, कौने झेले गोली।

कोन लगाये माथ मातु के, बंदन चंदन रोली।।

छाती कोन ठठाके ठाढ़े, काँपे देख फसादी।

भुलागेन बलिदानी मन ला, बनके अवसरवादी।।


अपन देश मा भारत माता, होगे हवै अकेल्ला।

हे मतंग मनखे स्वारथ मा, घूमत हावैं छेल्ला।।

मुड़ी हिमालय के नव गय हे, सागर हा मइलागे।

हवा बिदेसी महुरा घोरे, दया मया अइलागे।।

देश प्रेम ले दुरिहावत हें, भारत के आबादी।

भुलागेन बलिदानी मन ला, बनके अवसरवादी।।


सोन चिरइयाँ अउ बेंड़ी मा, जकड़त जावत हावै।

अपने मन सब बैरी होगे, कोन भला छोड़ावै।।

हाँस हाँस के करत हवैं सब, ये भुँइया के चारी।

देख हाल बलिदानी मनके, बरसे नैना धारी।।

पर के बुध मा काम करे के, होगे हें सब आदी।

भुलागेन  बलिदानी मन ला, बनके अवसरवादी।।


बार बार बम बारुद बरसे, दहले दाई कोरा।

लड़त  भिड़त हे भाई भाई, बैरी डारे डोरा।।

डाह द्वेष के आगी भभके, माते मारा मारी।

अपन पूत ला घलो बरज नइ, पावत हे महतारी।।

बाहिर बाबू भाई रोवै, घर मा दाई दादी।

भुलागेन बलिदानी मन ला, बनके अवसरवादी।।



कइसे जीत होही

भारत माता के सपना ला, करके चानी चानी।।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।


देश प्रेम चिटको नइ जानैं, करैं बैर गद्दारी।

भाई चारा दया मया ला, काटैं धरके आरी।।

झगरा झंझट मार काट के, खोजैं रोज बहाना।

महतारी ले मया करैं नइ, देवैं रहि रहि ताना।।

पहिली ये मन ला समझावव, बात लात के बानी।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।


राजनीति के खेल निराला, खेलैं जइसे पासा।

अपन सुवारथ बर बन नेता, रोजे करैं तमासा।।

मातृभूमि के मोल न जानैं, मानैं बस गद्दी ला।

मनखे मनके मन मा बोथैं, जात पात लद्दी ला।

फौज फटाका धरें फालतू, करैं मौज मनमानी।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।


बरछी भाला तोप देख के, काँपै बैरी डर मा।

फेर भेद बैरी कर खोले, बइठ विभीषण घर मा।

घर मा ये मन जात पात के, रोज मतावैं गैरी।

ताकत हावैं हाल देख के, चील असन अउ बैरी।

हाथ मिलाके बैरी मन ले, बारें घर बन छानी।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।


खावैं ये माटी के उपजे, गावैं गुण परदेशी।

कटघेरा मा डार वतन ला, खुदे लड़त हें पेशी।

अँचरा फाड़ैं  महतारी के, खंजर गोभैं छाती।

मारैं काटैं घर वाले ला, पर ला भेजैं पाती।

पलै बढ़ै झन ये माटी मा, अइसन दुश्मन जानी।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।


घर के बइला नाश करत  हें, हरहा होके खेती।

हारे हन इतिहास झाँक लौ, इँखरे मन के सेती।

अपन देश के भेद खोल के, ताकत करथें आधा।

जीत जोश जज्बा बर बनथें , घर के मनखे बाधा।

पहिली पहटावय ये मन ला, माँग सकैं झन पानी।

अपन देश ला जे मन कोसें, वो का हिदुस्तानी।।



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अमरइया मा जाबों


चलो सँगी खेले बर खुडुवा, अमरइया मा जाबों।

दाई अँचरा कस जुड़ छइहाँ, ओढ़ ओढ़ इतराबों।।


पवन धूकथे पंखा रहि रहि, सुरुज देव बिजराथे।

छमछम नाचय पाना डारा, गीत कोयली गाथे।।

ढेला फेक गिराबों आमा, मिलजुल के सब खाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा, अमरइया मा जाबों।।


गरमी घरी तको जुड़ रहिथे, अमरइया के छइहाँ।

जिहाँ पहुँच सब खेल खेलबों, जोर सबे झन बइहाँ।।

आम तरी मा बाँध झूलना, झुलबों अउ झूलाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा, अमरइया मा जाबों।।


बइहाँ जोड़े पेड़ खड़े हे, सहि जुड़ बादर पानी।

हवा दवा फल फूल लुटाथे, सबदिन बनके दानी।

ठिहा ठौर हे जीव जंतु के, देख देख हरसाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा, अमरइया मा जाबों।।


गली खोर घर खेत खार सँग, साथी ताल तलैया।

गिल्ली डंडा बाँटी भँवरा, के हम सब खेलैया।।

चंदन जइसे धुर्रा माटी, माथा तिलक लगाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा, अमरइया मा जाबों।।




काया काली बर


जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।

सेहत सबले बड़का धन ए, धन दौलत धन जाली।।


काली बर धन जोड़त रहिथस, आज पेट कर उन्ना।

संसो फिकर करत रहिबे ता, काल झुलाही झुन्ना।।

तन अउ मन हा हावय चंगा, ता होली दीवाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


खाय पिये अउ सुते उठे के, होय बने दिनचरिया।

काया काली बर रखना हे, ता रख तन मन हरिया।

फरी फरी पी पुरवा पानी, देख सुरुज के लाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


हफर हफर के हाड़ा टोड़े, जोड़े कौड़ी काँसा।

जब खाये के पारी आइस, अटके लागिस स्वाँसा।।

उपरे उपर उड़ा झन फोकट, जड़ हे ता हे डाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।



हिरदय


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम के नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम नित चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।



नींद ससन भर आही 


बने काम तैं करत रबे ता, नींद ससन भर आही।

संझा बिहना सुख मा कटही, मन मा खुशी हमाही।।


तामझाम तकलीफ बाँटथे, जीवन जी ले सादा।

मना खुशी अउ दुख झन अब्बड़, जोर रतन झन जादा।।

अपन आप ला बने बनाले, सरी जगत गुण गाही।

बने काम तैं करत रबे ता, नींद ससन भर आही।।


संसो फिकर घलो हा चिटिको, नैन मुँदन नइ देवै।

ऊँच नीच खाना पीना हा, नींद चैन हर लेवै।।

अपन काम ला खुदे टारले, तन कसरत हो जाही।

बने काम तैं करत रबे ता, नींद ससन भर आही।।


रोज शबासी लेवत चल गा, झन खा एको गारी।

चलत रहा सत के रद्दा मा, तज के झूठ लबारी।।

गरब गुमान घलो झन करबे, नइ ते दुःख झपाही।

बने काम तैं करत रबे ता, नींद ससन भर आही।।


जान अपन कस जमे जीव ला, लेले सबके आरो।

बेर देख के फल खावत चल, मीठ करू अउ खारो।।

बचपन के बेरा लहुटाले, तन मन तोर हिताही।

बने काम तैं करत रबे ता, नींद ससन भर आही।।



जिनगी के गाड़ी


धीरे धीरे जुन्नावत हे, ये जिनगी के गाड़ी।

हाथ गोड़ मुँह ढिल्ला होवै, पाकै मेछा दाढ़ी।।


सुख के बेरा सरलग भागिस, हवा घलो नइ लागिस।

हाँसत गावत खेलत खावत, जिनगी हा अधियागिस।

केश झरत हे रूप मरत हे, देख  जुड़ावै नाड़ी।

धीरे धीरे जुन्नावत हे, ये जिनगी के गाड़ी।।


बालपना के बात बिसरगे, गये जवानी रानी।

गरब करे के का बाँचे हे, ये तन बोहत पानी।।

धँधर रपट मा बेरा बुलके, जोड़त कौड़ी काड़ी।

धीरे धीरे जुन्नावत हे, ये जिनगी के गाड़ी।।


लइका लोग सियान सबे के, संसो अड़बड़ खाये।

घर दुवार परिवार पार हा, रहिरहि रात जगाये।।

रोज दंदरे कनिहा कूबड़, रसरसाय मुड़ माड़ी।

धीरे धीरे जुन्नावत हे, ये जिनगी के गाड़ी।।



भाजी साग खवादे


रोज रोज के भाँटा आलू, लगगे अब बिट्टासी।

खाये के हावै मन जोही, भाजी के सँग बासी।।


चना चनौरी चेंच चरोटा, चौलाई चुनचुनिया।

मुसकेनी मेथी अउ मुनगा, मुरई मास्टर लुनिया।।

कुरमा काँदा कुसमी कुल्थी, कोचाई करमत्ता।

गुमी लाखड़ी गोभी बर्रे, बरबट्टी के पत्ता।।

प्याज अमारी पटवा पालक, सरसो के मैं दासी।

खाये के हावै मन जोही, भाजी के सँग बासी।।


रोपा गुड़रू मखना झुरगा, कजरा कुसुम करेला।

पोई अउ बोहार जरी के, हरौं बही मैं चेला।।

उरिद लाल चिरचिरा खोटनी, कोइलार तिनपनिया।

भथुवा पहुना लहसुनवा खा, चलहूँ छाती तनिया।

भूँज बघार बनाबे बढ़िया, लागय अबड़ ललासी।

खाये के हावै मन जोही, भाजी के सँग बासी।।


खेत खार बारी बखरी ले, झट लाबों चल टोरी।

खनिज लवण सँग रथे विटामिन, दुरिहाथे कमजोरी।।

तेल बाँचही नून बाँचही, समय घलो बच जाही।

भाजी पाला ला खाये ले, तन मा ताकत आही।।

भाजी कड़ही बरी खोइला, खाथें कोसल वासी।

खाये के हावै मन जोही, भाजी के सँग बासी।।




बासी बासी बासी


साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


काम बूता बर होत बिहनया, पड़थे जल्दी जाना।

जुड़े जुड़ म काम सिधोथँव, खाके बासी खाना।

बिन गुण जाने पेट भरे बर, खाथँव बारा मासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


बड़ही कहिके बँचे भात ला, बोरौं रोजे रतिहा।

सीथा खाथौं चारे कौंरा, पिथों पेट भर पसिया।

पर के हाड़ी के गंध सुंघ के, लगथे गजब ललासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


छोट कुड़ेड़ा के बासी तक, घर भर ला पुर जाथे।

सीथा अउ पसिया हा मिलके, भूख प्यास दुरिहाथे।

महल अटारी बाँध बाँधथँव, करथौं बाँवत ब्यासी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


बासी खावत उमर गुजरगे, होगे जर्जर काया।

नाँगर पुरतिन जाँगर मिलथे, राम मिले ना माया।

बासी खा खा बासी होगें, होवै जग मा हाँसी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।


मोर दरद देखिस नइ कोनो, देख डरिस बासी ला।

महल भीतरी बासी खाइस, बुता जोंग दासी ला।

भूख बैरी ला बासी चढ़ाथौं, मान के मथुरा काँसी।

साग दार कमती पड़ जाथे, पुरे न राशन रासी।

तब खाथौं मैं चटनी सँग मा, नून डार के बासी।।







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किसम किसम के धान


धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।

धरती दाई के कोरा मा, धान गजब लहराही।।


हवै धान के नाम हजारो, कहौं काय मैं भाई।

देशी अउ हरहुना संकरित, मोटा पतला माई।

लाली हरियर कारी पढ़री, धान चँउर तक होथें।

सुविधा देख किसनहा मन हा, खेत खार मा बोथें।

मुंदरिया मरहन महमाया, मछलीपोठी मेहर।

मालवीय मकराम माँसुरी, कार्तिक कैमा कल्चर।

चनाचूर चिन्नउर चेपटी, छतरी चीनीशक्कर।।

बाहुबली बलवान बंगला, बाँको बिरसा बायर।

बिरनफूल बुढ़िया बइकोनी, बिसनी बरही माही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


पंत पूर्णिमा पंकज परहा, परी प्रसन्ना प्यारी।

पूर्णभोग पानीधिन पंसर, नाकपुरी नरनारी।

आईआर अर्चना झिल्ली, अजय इंदिरासोना।

समलेश्वरी सुजाता साम्भा, सागरफेन सरोना।

कालाजीरा कनक कामिनी, करियाझिनी कलिंगा।

साहीदावत सफरी सरना, सरजू सिंदुरसिंगा।।

स्वेतसुंदरी सादसरोना, सहभागी सुरमतिया।

गंगाबारू गुड़मा गोकुल, गोल्डसीड गुरमटिया।

बासमती दुबराज सुगंधा, विष्णुभोग ममहाही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


क्रांति किरण कस्तूरी केसर, नयना बुधनी काला।

कालिमूंछ केरागुल कोड़ा, बरसाधानी बाला।

कंठभुलउ केकड़ा ककेरा, कदमफूल कनियाली।

कावेरी कमोद कर्पूरी, कामेश कुकुरझाली

रामकली राजेंद्रा रासी, राधा रतना रीता।

सहयाद्री सन सोनाकाठी, सोनम सरला सीता।

जसवाँ जीराफूल जोंधरा, जगन्नाथ जयगुंडी।

जया जयंती जयश्री जीरा, लौंगफूल लोहुंडी।

सत्यकृष्ण साठिया शताब्दी , बादशाह अन साही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।


पूसा पायोनियर नन्दिनी, नाजिर नुआ नगेसर।

गटवन गर्राकाट गायत्री, खैरा रानीकाजर।

रतनभाँवरा राजेलक्ष्मी, आदनछिल्पा रामा।

तिलकस्तूरी तुलसीमँजरी, जवाँफूल सतभामा।

गाँजागुड़ा नवीन नँदौरी, काली कुबरीमोहर।

दन्तेश्वरी दँवर डॅक दुर्गा, दांगी खैरा नोहर।

हहरपदुम हंसा सन बोरो, हरदीगाभा ठुमकी।

लुचई भुसवाकोट भेजरी, लूनासंपद झुमकी।

कलम फाल्गुनी फूलपाकरी, इलायची मन भाही।

धान कटोरा हा धन धरके, मुचुर मुचुर मुस्काही।




जइसे गिरे असाढ़ म पानी


जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

निकलै कई किसम के कीरा, रेंगय मुँह ला फारे।


रंग रंग के साँप निकलथे, रंग रंग के कीरा।

सावचेत नइ रहे म होथे, तन मन ला बड़ पीरा।

भरका बिला म पानी भरथे, गिल्ला रहिथे मिट्टी।

सलमल सलमल भागत दिखथे, इती उती पिरपिट्टी।

कीरा काँटा साँप बिच्छु ले, कतको जिनगी हारे।

जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।


रसल वाइपर अजगर डोमी, माम्बा अउ मुड़हेरी।

सुतत उठत बस झूलत रहिथे, नयन म घेरी बेरी।

फिरे करैत ढोड़िहा धमना, जिया देख के काँपे।

बारिस घरी काल बन घूमय, कई किसम के साँपे।

ठौर ठिहा बन खेत खार में, रइथे डेरा डारे।

जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।


फाँफा फुरफुन्दी चमगादड़, झिंगुरा मुसवा चाँटा।

कान खजूरा बत्तर अँधरी, बिच्छी कीरा काँटा।

डाढ़ा टाँग केकरा रेंगय, मेंढक टरटर बोले।

किलबिल किलबिल कीरा करथे, देखत जिवरा डोले।

झन सोवव बिन खाट धरा में, रेंगव नयन उघारे।

जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।




सजन बिन सावन 


दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।

लक्ष्मण रेखा लाँघत हावै, घर घर बइठे रावन।


गरजे घुमड़े घड़घड़ घड़घड़ , बादर घेरी बेरी।

का हो जाही कोन घड़ी मा, फड़के आँखी डेरी।

कइसे जिनगी मोर पहाही, संसो लागे खावन।

दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।


देखत देखत राह सजन के, नाड़ी हाथ जुड़ागे।

डंक साँप बिच्छू नइ मारे, काठ समझ के भागे।

सजन बिना बन बाग बगीचा, नइ लागे मनभावन।

दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।


नजर गड़त हे कतको झन के, देख अकेल्ला मोला।

आस लगा बिहना मैं जीथौं, साँझ मरे नित चोला।

नैन मुँदावय गला सुखावय, चेत लगे छरियावन।

दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।




सावन बइरी


चमक चमक के गरज गरज के,बरस बरस के आथे।

बादर  बइरी  सावन   महिना,मोला   बड़  बिजराथे।


काटे नहीं कटे दिन रतिहा,छिन छिन लगथे भारी।

सुरुर  सुरुर  चलके   पुरवइया,देथे   मोला   गारी।

रहि रहि के रोवावत रहिथे,बइरी सावन आके।

हाँस हाँस के नाचत रहिथे,डार पान बिजराके।

ताना  मारत  मारत  मोला,झींगुर गीत सुनाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


छोड़  गये  परदेस  पिया तैं ,पाँव बजे ना पैरी।

टिकली फुँदरी माला मुँदरी,होगे सब झन बैरी।

महुर  मेंहदी  मूँगा मोती,बिछिया अँइठी लच्छा।

तोर बिना हे मोला जोड़ी,लगे नहीं कुछु अच्छा।

देख मेचका नाचत कूदत,खुश हो टर टर गाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


हरियर  हरियर  होगे डोली,हरियर बखरी बारी।

तोर बिना जिनगी मा मोरे,छाय घटा अँधियारी।

बरसे बादर रिमझिम रिमझिम,चिरई गाये गाना।

जाँवर  जोड़ी  नाच नाच के,खावत रहिथे दाना।

धरके  बासी  मोर  जँवारा ,रोज  खेत  मा  जाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


कउँवा बाटत रहिथे चारा,उड़ उड़ के छानी मा।

मोरो  मन  होथे  भींगे  के ,तोर संग  पानी  मा।

परेवना  के  पाँख देख के,माँगत रहिथों पाँखीं।

फेर देख मोला उड़ जाथे,बरसत रहिथे आँखी।

देख परोसिन अपन पिया ला,चीला राँध खवाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


भुँइया अबड़ हितागे हावय,पाके मनभर पानी।

रोज जरत हे जिवरा मोरे ,हलाकान जिनगानी।

आँखी  मोरे  करिया  गेहे ,बादर  ले बड़ जादा।

झटकुन राजा  तैंहर आजा,करके गे हस वादा।

छत्ता धरके सब झक्कर मा, घुम घुम मजा उड़ाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


नैना मोरे झड़ी करे तब,बादर डरके भागे।

नैन  निहारे  रद्दा  तो रे,बइठ  दुवारी जागे।

मोर  बने  बइरी  रे  धन  तैं,जोड़ी  ला भड़काये।

आजा राजा नइ चाही कुछु,रही जहूँ बिन खाये।

सजनी सजन बइठ ये बेरा, हाँस हाँस बतियाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।


पेट अन्न पानी नइ जाने ,जब ले तँय घर छोड़े।

रद्दा  ला  मैं  जोहत रहिथों ,बइठे माड़ी  मोड़े।

धरे  गाल  मैं  बइठे  हावँव,हाथ  हले ना डोले।

आस मरत हे आजा राजा,मुँह नइ बोली बोले।

माटी के ढेला कस जोड़ी, सब सपना घुर जाथे।

बादर बइरी सावन महिना,मोला बड़ बिजराथे।





साँप मनके पीरा


मोर बिला मा भरगे पानी, मुश्किल मा जिनगानी।

सबे खूँट सीमेंट छाय हे, ना साँधा ना छानी।।


जाके कती लुकावँव मैंहा, कोनो ठउर बतादौ।

भटकँव नही कहूँ कोती मैं, घर ला मोर सुखादौ।।

रझरझ रझरझ गिरथे पानी, तरिया कुँवा भराथे।

मोर बिला भरका नइ बाँचे, पानी मा बुड़ जाथे।।

छत के घर मा सपटँव कइसे, दिख जाथँव आँखी मा।

उड़ा भगावँव कइसे दुरिहा, नइ हँव मैं पाँखी मा।।

पानी बादर के बेरा मा, नित पेरावँव घानी-------।

मोर बिला मा भरगे पानी, मुश्किल मा जिनगानी।।


कटत हवय नित जंगल झाड़ी, नइहे भोंड़ू भाँड़ी।

नइहे डिही डोंगरी परिया, देख जुड़ाथे नाड़ी।।

लउठी धरे खड़े हावव सब, कइसे जान बचावौं।

आथँव ठिहा ठिकाना खोजत, चाबे बर नइ आवौं।।

चाबे मा कतको मर जाथे, बिक्ख हवै बड़ मोरे।

देख डराथस मोला तैंहर, अउ मोला डर तोरे।।

महुँला देवव ठिहा ठिकाना, मनुष आज के ज्ञानी।

मोर बिला मा भरगे पानी, मुश्किल मा जिनगानी।।








वाह रे पानी


पके पकाये धान पान के, अब तो मरना होगे।

खेवन खेवन पानी बरसे, सफरी सरना सोगे।


का कुँवार का कातिक कहिबे,लागत हावै सावन।

रोहों पोहों खेत खार हे, बरसा बनगे रावन।।

धान सोनहा करिया होगे, लगगे कतको रोगे।

पके पकाये धान पान के, अब तो मरना होगे।


लूवे टोरे के बेरा मा, कइसे करयँ किसनहा।

आसा के सूरज हा बुड़गे,बुड़गे डोली धनहा।

जाँगर टोरिस जउन रोज वो, दुख मा अउ दुख भोगे।

पके पकाये धान पान के, अब तो मरना होगे।।


करजा बोड़ी के का होही, संसो फिकर हबरगे।

देखमरी बादर ला छागे, देखे सपना मरगे।

चले धार कोठार खेत मा, सोच सोच सुध खोगे।

पके पकाये धान पान के, अब तो मरना होगे।







धान लुवाई


पींयर पींयर पैरा डोरी, धरके कोरी कोरी।

भारा बाँधे बर जावत हे, देख किसनहा होरी।।


चले संग मा धरके बासी, धान लुवे बर गोरी।

काटय धान मढ़ावय करपा, सुघ्घर ओरी ओरी।


चरपा चरपा करपा माढ़य, मुसवा करथे चोरी।

चिरई चिरगुन चहकत खाये, पइधे भैंसी खोरी।


भारा बाँधे होरी भैया, पाग मया के घोरी।

लानय भारा ला ब्यारा मा, गाड़ा मा झट जोरी।


बड़े बगुनिया मा बासी हे, चटनी भरे कटोरी।

बासी खाये धान लुवइया, मेड़ म माड़ी मोड़ी।


हाँस हाँस के सिला बिनत हें, लइकन बोरी बोरी।

अमली बोइर हवै मेड़ मा, खावत हें सब टोरी।


बर्रे बन रमकलिया खोजे, खेत मेड़ मा छोरी।

लाख लाखड़ी जामत हावय, घटकत हवै चनोरी।


आशा के दीया बन खरही, बाँटे नवा अँजोरी।

ददा ददरिया मन भर झोरे, दाइ सुनावै लोरी।


महिनत माँगे खेत किसानी, सहज बुता ए थोरी।

लादे पड़थे छाती पथरा, चले न दाँत निपोरी।।



बरी अउ बादर


बरी बनाबे ताहन बादर, बरसो बरसो करथे।

घाम उगासे रहिथे बढ़िया, देखत बरी बिगड़थे।


पर्रा पर्रा बरी घाम बिन, भँभा चिटिक नइ पाये।

उरिद दार अउ रखिया तूमा, बिरथा सब हो जाये।।

शहर गांव अब देख मेहनत, इसन बुता ले डरथे।

बरी बनाबे ताहन बादर, बरसो बरसो करथे।।


हाँस हाँस के बरी बिजौरी, सबे चाहथें खाना।

फेर देख पिचकाट अबड़ के, चाहे कोन बनाना।।

कहूँ बनाबे हिम्मत करके, ता घन बैरी झरथे।

बरी बनाबे ताहन बादर, बरसो बरसो करथे।


बरसा घरी सहारा बनथे, बरी बिजौरी घर के।

दाई दीदी मन गर्मी मा, रखथें जोरा करके।।

चुरथे आलू मुनगा सँग मा, खाके टुरा फुदरथे।

बरी बनाबे ताहन बादर, बरसो बरसो करथे।।



मन अरझगे तरिया के कमल फूल मा


एक फूल ले दुसर फूल मा, मन बइठे जा जाके।

फँसा डरे हे अपन जाल मा, कमल फूल तरिया के।।


तरिया भीतर फूल पान हा, चौंक पुरे कस लागे।

दुर्योधन कस अहमी मन हा, धोखा खात झपागे।।

हँसे पार अउ पानी खिलखिल, मन दुबके शरमाके।

फँसा डरे हे अपन जाल मा, कमल फूल तरिया के।।


पात पीस के पिये कभू ता, कभू पोखरा खाये।

कभू ढेंस गुण सुन चुन राँधे, कभू फूल लहराये।।

पाँव परे माता लक्ष्मी के, पग मा कमल चढ़ाके।

फँसा डरे हे अपन जाल मा, कमल फूल तरिया के।।


डर देखा नहवइया मन ला, तरिया ले खेदारे।

कहे पोगरी मोर फूल ए, भौंरा तितली हारे।।

सुरुज देख के सँग सँग जागे, सोये सँग संझाके।

फँसा डरे हे अपन जाल मा, कमल फूल तरिया के।।






कुदरत के कई रूप


नाना रूप देख कुदरत के, ठहर जथे मन नैना।

अँगरी दाँत तरी दब जाथे, मुँह ले फुटे न बैना।।


कई पेड़ जमकरहा मोठ्ठा, अमरे कई गगन ला।

कई किसम के पान फूल फर, देय खुशी बड़ मन ला।।

हूँप हूँप कहि कुदे बेंदरा, गाना गाये मैना।

कुदरत के कई रूप देख के,ठहर जथे मन नैना।।


मस्ती मा इतराय समुंदर, जलरँग धरके पानी।

नदिया झरना डिही डोंगरी, रोज सुनाय कहानी।।

घाटी पानी पथरा लाँघे, हाथी हिरणा हैना।

कुदरत के कई रूप देख के, ठहर जथे मन नैना।।


दुहरा तिहरा पथरा माड़े, देखत लगे अचंभा।

रूप प्रकृति के मन मोहें, लजा जाय रति रंभा।।

बने बने रखबों कुदरत ला, बने रही दिन रैना।

कुदरत के कई रूप देख के, ठहर जथे मन नैना।।









गर्मी मा बरफ गोला


गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।

लइका संग सियान खाय बर, हो जाथे झट राजी।।


काड़ी वाले होय बरफ या, रंग रंग के गोला।

रबड़ी कुल्फी बरफ मलाई, देय नियत ला डोला।।

सस्ता होवय या हो महँगा, कइथे सब झन ला जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।।


आमा गन्ना नीम्बू रस मा, डार बरफ के चूरा।

ठंडा ठंडा मन भर पीले, जिया जुड़ाथे पूरा।।

बरफ संग मा सेवइ कतरी, खा के कहिबे वा जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।


खुशी हमाथे मन मा भारी, देख बरफ के ठेला।

कोनो ला गर्मी नइ भाये, सब ठंडा के चेला।।

फोकट हे धन बल के गर्मी, जुड़ रख जिया जुड़ा जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।।



घाम घरी के फर 


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची लिमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।



जेठ महीना


जेठ महीना जुलुम ढात हे, जरै चटाचट धरती।

धनबोहर मा फूल फुले हे, टपकै आमा गरती।।


लाली फुलवा गुलमोहर के, गावत हावै गाना।

नवा पहिर के हरियर लुगरा, बिरवा मारे ताना।।

छल बल धर गरमाये मनखे, निकलै बेरा ढरती।

जेठ महीना जुलुम ढात हे, जरै चटाचट धरती।।


निमुवा अमवा बर पीपर हा, जुड़ जुड़ छँइहा बाँटै।

तरिया नदिया कुँवा सुखावै, हवा बँवंडर आँटै।।

होय फूल फर कतको झरती, ता कतको के फरती।

जेठ महीना जुलुम ढात हे, जरै चटाचट धरती।


जीव जंतु सब लहकै भारी, पानी तीरन लोरे।

भाजी पाला अब्बड़ निकलै, मोहे बासी बोरे।।

पेड़ प्रकृति हा जिनगी आये, सुख दुख देय सँघरती।

जेठ महीना जुलुम ढात हे, जरै चटाचट धरती।।




पतझड़


पतझड़ आरो ए बहार के, संसो फिकर तियागौ।

नैन मूंद के सुतव रात पा, देख सुरुज झट जागौ।


गरमी के जब आहट आथे, होय लगे कम पानी।

पात पेड़ झर्रा के जीथे, संत सरिक जिनगानी।।

हाँकै नियति सबे के गाड़ी, खड़े रहौ झन भागौ।

पतझड़ आरो ए बहार के, संसो फिकर तियागौ।।


नवा पात हा दुःख झेलथे, घाम झांझ के बेरा।

धीर धीरे नवा करव ता, रही खुशी मा डेरा।।

समय बिगाड़ै नइ सपना ला, लगन आस नित पागौ।

पतझड़ आरो ए बहार के, संसो फिकर तियागौ।।


देख खोंधरा के खग पतझड़, नव छत छानी खोजे।

मरे चढ़े परजीवी बेला, पियय रकत जे रोजे।।

जड़ चेतन सबके भल होही, पाँव नियति के लागौ।

पतझड़ आरो ए बहार के, संसो फिकर तियागौ।।





गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद


देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।

चटचट जरथे चारो कोती, जुड़ जल जिया लुभाथे।।


पार पाय नइ नल अउ बोरिंग, नदिया अउ तरिया के।

भेदभाव नइ करे ताल नद, गुरिया अउ करिया के।

कल कल करथे धार नदी के, लहर ताल के गाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।।


कोनो कूदे कानों तँउरे, कोनो डुबकी मारे।

तन के कतको रोग रई हा, डुबकत तँउरत हारे।

बुड़े बुड़े पानी के भीतर, कतको बेर पहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


लहरा होथे गहरा होथे, डर तक रहिथे भारी।

नइ जाने तँउरें बर तउने, मारे झन हुशियारी॥ 

जीव जंतु तक के ये डेरा, काम सबे के आथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)





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मुसवा


कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।

कुटी  कुटी  कपड़ा  ला  काटे,मति हा जाथे छरिया।


खा खा के भोगाये हावै,धान चँउर फर भाजी।

भँदई पनही घलो तुनागे,नइ बाँचत हे खाजी।

कभू खोधरे परवा छानी,अउ घर अँगना कोड़े।

तावा के रोटी ला झड़के,आरुग कुछु नइ छोड़े।

चोरो बोरो घर हर लागे,कोला परगे परिया---------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।


गदबिद गदबिद भागे भारी,खटिया मा चढ़ जावै।

हाथ  गोड़  ला घलो ककोने,नींद  कहाँ  ले आवै।

कुरिया कोठी कोठा कोला,सबे खूँट हे कोरा।

मुसवा  लेड़ी  मा भरगे हे,पाठ पठउँहा बोरा।

बरी बिजौरी बाँचत नइहे,नइ बाँचत हे फरिया------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।


साँप असन पुछी दिखत हे,खरहा कस हे काया।

मनखे  तनखे  ला  नइ घेपे,मुसवा के बड़ माया।

आँखी लाल ठाढ़ मूँछ हे,देख बिलैया भागे।

छेना खरही माटी होगे,घर हा डोलन लागे।

भारी उधम मचावत हावै,चीं चीं चीं चीं नरिया------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।





दारू पीके सीसी फोड़े


दारू पीके सीसी फोड़े, हत रे अतियाचारी।

पेट पाँव कतको के कटगे, बहे लहू के धारी।।


पार्टी पिकनिक कहिके रोजे, नदी पहाड़ म जाके।

खाये पीये नाँचे गाये, पर्यावरण मताके।।

काँचे काँच म पटगे हावै, नदी बाट बन बारी।

दारू पीके सीसी फोड़े, हत रे अतियाचारी।।


समझाये दरुहा ला कउने, सुने बात ना बानी।

माते ताहन करे बिगाड़ा, होरा भूंजे छानी।।

धरहा धरहा काँच देख के, काँपे पोटा भारी।

दारू पीके सीसी फोड़े, हत रे अतियाचारी।।


दरुहा मन के करनी के फल, आने कोनो भोगे।

लइका लोग सियान कई के, बड़ करलाई होगे।।

हाय लगे हत्यारा मन ला, थमे काज ये कारी।

दारू पीके सीसी फोड़े, हत रे अतियाचारी।।




हथकरघा के बेरा


सबे काम ला झट टारे बर, हे मशीन सब डेरा।

अइसन मा अब काय लहुटही, हथकरघा के बेरा।।


मुसर बाहना ढेंकी जाँता, सिललोढ़ा खलबत्ता।

आरा रेंदा गिरमिट सुंबा, हाथ भुलागे नत्ता।।

कोन गाँथथे माची खटिया, कोन आँटथे ढेरा।

अइसन मा अब काय लहुटही, हथकरघा के बेरा।।


अपन हाथ मा सूत कात के, पहिरिन गाँधी खादी।

मिला हाथ ले हाथ सुराजी, लड़भिड़ लिन आजादी।।

सबें हाथ अब ठलहा होगे, होवै तेरा मेरा।

अइसन मा अब काय लहुटही, हथकरघा के बेरा।।


अपन हाथ हे जगन्नाथ कहि, खुदे करैं सब बूता।

उहू दुसर के अब मुँह ताकें, पहिरे चश्मा जूता।।

नवा नवा तकनीक हबरगे, बदलै बसन बसेरा।

अइसन मा अब काय लहुटही, हथकरघा के बेरा।।





नकली चाल चलन


नवा जमाना नकली कोती, नवगे हे सँगवारी।

हँसी खुशी आँसू हे नकली, नकली रिस्तादारी।


नकली चाँद सुरुज बनगे हे, नकली घर फर बिरवा।

घुरगे मनखे के जिनगी मा,नकली जिनिस ह निरवा।

मनखे मनके नकली सँग मा, पटत हवै बड़ तारी।

नवा जमाना नकली कोती, नवगे हे सँगवारी।।


असली के असलियत उघारे, परखे सिर पग पाँखी।

नकली चीज बिसाये हँसके, बउरे मूंदें आँखी।।

सस्ती नकली चीज बिकत हे, असली महँगा भारी।

नवा जमाना नकली कोती, नवगे हे सँगवारी।।


बुढ़वा के हे बाल घमाघम, दाँत हवै खिसखिस ले।

देखे भर मा बढ़िया लागे, काम बुता बर फिसले।।

कोन कहे नकली ला नकली, सबझन हवै पुजारी।

नवा जमाना नकली कोती, नवगे हे सँगवारी।।


नकली ओढ़त नकली पहिरत, मनखे नकली होगे।

अन्तस् भीतर के सत सुम्मत, दया मया तक सोगे।

बैर बदी लत होवय नकली, होवय असली यारी।

नवा जमाना नकली कोती, नवगे हे सँगवारी।।


चंदन माटी राखड़ भइगे


चंदन माटी राखड़ भइगे,का के तिलक लगावौं।

बंजर होगे खेत खार सब,काय फसल उपजावौं।


सड़क सुते हे लात तान के,महल अटारी ठाढ़े।

मोर नैन  मा निंदिया नइहे,संसो दिनदिन बाढ़े।

नाँव  बुझागे  रुख राई के,धरा  बरत हे बम्बर।

मन भीतर मा मातम छागे,काय करौं आडम्बर।

सिसक सकत नइ हावौं दुख मा,कइसे राग लमावौं।

चंदन माटी राखड़ भइगे,का के तिलक लगावौं---।


मोटर  गाड़ी  कार  बनत हे,उपजै सोना चाँदी।

नवा जमाना जल थल जीतै,पतरी परगे माँदी।

तरिया  परिया  हरिया  हरगे,बरगे मया ठिठोली।

हाँव हाँव अउ खाँव खाँव मा,झरगे गुरतुर बोली।

नव जुग हे अँधियार कुँवा कस,भेड़ी असन झपावौं।

चंदन माटी राखड़ भइगे,का के तिलक लगावौं---।


घुरय हवा पानी मा महुरा ,चूरय  धरती दाई।

सुरसा मुँह कस स्वारथ बाढ़य,टूटय भाई भाई।

हाय विधाता भूख मार दे,तन ला कर दे कठवा।

नवा समै ला माथ नवाहूँ,जिनगी भर बन बठवा।

ठिहा ठौर के कहाँ ठिकाना,दरदर भटका खावौं।

चंदन  माटी  राखड़ भइगे,का के तिलक लगावौं।



नोहर होगे उन्हारी


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, चले मया के आरी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।



बैपारी- सार छंद


ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।

जब किसान के महिनत आथे, सबे चीज बोहाथें।।


अब किसान कर नइहे कोठी, ना पउला ना पैली।

उपज जाय गोदाम खेत ले, भरा भरा के थैली।।

औने पौने दाम थमाके, गरी फेंक ललचाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


आलू मुनगा मेथी धनिया, का बंगाला भाँटा।

बैपारी कर सोना बनथे, अउ किसान कर काँटा।।

बिकै अन्न फर भाजी पाला, बिचौलिया के हाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


कई चीज मा करैं मिलावट, अउ काला बाजारी।

नियम धियम शासन राशन ले, बड़का हें बैपारी।।

अधिकारी अउ नेता चुप हें, आम मनुष गरियाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)





होगे मरना भारी


खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।

रहिरहि रोय किसान छेंव के, कइसे बूता टारी।


धरसा के बिन थमके गाड़ा, थमके नाँगर बइला।

छेंव खेत सब होगे बिरथा, चैन खुशी गे अइला।

फारम बनगे सड़क तीर मा, पइधे हें वैपारी।।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।


सड़क तीर मा जे पइधे हे, ते देखे बन गिधवा।

डहर बाट नइहे कहि डर मा, बेंचैं खेती सिधवा।

लचक के चक्कर मा हावय बड़, रुँधना बँधना जारी।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।


हरिया भर नइ जघा रिता हे, नइ बाँचे हे परिया।

हाय हाय गरु गाय करत हे, गय किसान अउ करिया।

भारी भरकम हे दुख तब ले, चुप शासन अधिकारी।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।



संसो बेटी बिहाव के


बाढ़े बेटी के बिहाव के, संसो दिन दिन खाये।

मांघ बुलकगे के फागुन आगे, सगा एक नइ आये।।


कौड़ी कौड़ी जोड़ जोड़ के, जोरा कर डारे हौं।

पर घर जाही बेटी कहिके, बड़ आँसू ढारे हौं।।

नान्हे नान्हे नोनी मन के, बर बिहाव होगे हे।

फेर मोर बेटी के काबर, लगन बार सोगे हे।।

हाथ रँगाये बिन बेटी के, नइ तो नैन मुँदाये।

बाढ़े बेटी के बिहाव के, संसो दिन दिन खाये।।


बेटी ला पर घर भेजे बर, मैं पापी लउहावौं।

काय करौं कुछु आय समझ ना, बाप बने मैं हावौं।

परखत हावस हाय विधाता, ददा बनाके मोला।

दूल्हा राजा आवै अँगना, सुरिरत हौं मैं तोला।।

चारी चुगली चले गली, गारी घलो सुनाये।

बाढ़े बेटी के बिहाव के, संसो दिन दिन खाये।।





छँइहा के मोल


किम्मत कतका हवै छाँव के,तभे समझ मा आथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


गरम तवा कस धरती लगथे,सुरुज आग के गोला।

जीव जंतु अउ मनखे तनखे,जरथे सबके चोला।।

तरतर तरतर चुँहे पछीना,रहिरहि गला सुखाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


गरमे गरम हवा हा चलथे,जलथे भुइयाँ भारी।

घाम घरी बड़ जरे चटाचट, टघले महल अटारी।

पेड़ तरी के जुड़ छँइहाँ मा,अंतस घलो हिताथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


मनखे मन बर ठिहा ठउर हे,जीव जंतु बर का हे।

तरिया नदिया पेड़ पात हा,उँखर एक थेभा हे।

ठाढ़ घाम मा टघलत काया, छाँव देख हरियाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।


पेड़ तरी के घर जुड़ रहिथे,पेड़ तरी सुरतालौ।

हरे पेड़ पवधा हा जिनगी,सबझन पेड़ लगालौ।

पानी पवन हवै पवधा ले,खुशी इही बरसाथे।

घाम घरी जब सुरुज देव हा,आगी असन जनाथे।




मुखारी


ब्रस मंजन के माँग बाढ़गे, दतुन देख फेकागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


खेत खार अब कोन ह जावै, तोड़ै कोन मुखारी।

मंजन आगे आनी बानी, होवै मारा मारी।

करँव भला का बात शहर के, गाँव ह घलो झपागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


बम्हरी नीम करंज जाम के, दतुन करे सब रोजे।

दवा बरोबर दतुन जान के, पहली सबझन खोजे।

दाँत मसूड़ा मुँह के रोग ह, करत मुखारी भागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


एक मिनट मा दाँत चमकगे, चाबे के नइ झंझट।

जीभी आगे अब नइ हावय, चिड़ी करे के कंझट।

दाँत बरत हे मोती जइसे, चाबत चना खियागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दाँत घलो हा पोंडा परगे, ब्रस घँसे के सेती।

ठेठरी खुरमी चाब सके नइ, काय चबाही रेती।

शरद गरम नइ सहि पावत हे, असली नकली लागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।





रील अउ रीयल


दिखना चाही रीयल मा ता, दिखें रील मा मनखें।

हाँसँय फाँसँय नाँचँय गावँय, खड़ें खील मा मनखें।।


जिनगी ला पिच्चर समझत हें, हिरो हिरोइन खुद ला।

धरा छोंड़ के उड़ें हवा मा, अपन गँवा सुध बुध ला।।

लोक लाज सत रीत नीत तज, हवैं ढील मा मनखें।

दिखना चाही रीयल मा ता, दिखें रील मा मनखें।।


दुनिया ला देखाये खातिर, बदल रूप रँग बानी।

कभू फिरें बनके बड़ दानी, कभू गुणी अउ ज्ञानी।।

मया प्रीत तज मोती खोजें, उतर झील मा मनखें।

दिखना चाही रीयल मा ता, दिखें रील मा मनखें।।


हवैं चरित्तर आज मनुष के, हाथी दाँत बरोबर।

मुख मा राम बगल मा छूरी, दाबे फिरें सबे हर।।

सपना देखें सरी जगत के, खुसर बील मा मनखें।

दिखना चाही रीयल मा ता, दिखें रील मा मनखें।।



 दिखावा नवा जमाना के


जुन्ना कोनो धरम करम हा, ढोंग दिखावा आये।

बता आज ये बात बात मा, केक काटना काये?


फौज फटाका तोरण तारा, स्टेज बफे समियाना।

भकर भिकिर बड़ डीजे बाजे, चले नाचना गाना।

पइसा पानी कस बोहाये, तभो मनुष मुस्काये।।

बता आज ये बात बात मा, केक काटना काये?


छोटे मा संस्कार दिखे नइ, बड़े दिखे नइ सुलझे।

पार्टी कहिके पीये खाये, कहिदे कुछु ता उलझे।।

नता पार परिवार भुलागे, संगत नंगत भाये।

बता आज ये बात बात मा, केक काटना काये?


पंगत पूजा दान दक्षिणा, कहाँ हवै अब बाँचे।

पाँव दिखे नइ मनखे ला अब, फकत मूड़ मा नाँचे।

खुद ला गिनहा कहे कोन हा, छोटे बड़े भुलाये।

बता आज ये बात बात मा, केक काटना काये?



फोटू


का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।

जुरै गाँव के गाँव तिहाँ अब, दुई चार गिन होगे।।


मया मीत ना भाव भजन हे, दुच्छा हाँड़ी तावा।

चुलुक चढ़े हावय फोटू के, दिखथे बस देखावा।।

हीरा के जस मोल रिहिस ते, लोहा अउ टिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।


लाइक अउ कमेंट पाये बर, सबझन जुगत बनायें।

रील बनाये के चक्कर मा, लाज बेंच तक खायें।।

नर लागत हे अउ ना नारी, आदत हा घिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।


नता निभावै फोटू खातिर, भाव भजन फोटू बर।

रंग रँगोली फौज फटाका, घर अउ बन फोटू बर।।

फोटू विडियो मोबाइल के, दास सबे झिन होगे।

का होरी अउ का देवारी, फोटू पुरतिन होगे।।।





काखर गुण जस गावौं


अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।

उड़े हवा मा मैं मैं कहिके, वोला का समझावौं।।


कोनो जल ला कोनो थल ला, कोनो नभ ला नाँपे।

लड़े शेर बघवा भलवा ले, देखत जिवरा काँपे।।

दुर्लभ कारज करे कलेचुप, काखर नाम गिनावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कोनो अतुलित बल के स्वामी, कोनो धन के राजा।

कोनो अद्भुत नाचे गाये, कोनो पीटे बाजा।।

कतको करतब हवै करइया, देख दंग रहि जावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कलाकार के कला गजब हे, हावय सेवक दानी।

शूरवीर रँग रूप तेज मा, हें बड़ ज्ञानी ध्यानी।।

कठिन साधना सत जप तप ला, रोजे माथ नवावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।




पइसा अउ संगी


पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।

रोज चढ़ाथें चना झाड़ मा, ख्वाब दिखा सतरंगी।।


काम करयँ नइ कभू अकेल्ला, रटथें यारी यारी।

जुगत बनाथें खाय पिये के, घूम घूम के भारी।।

चाँटुकार के घोर चासनी, बात कहयँ बेढंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


जिया जीतथें जुरमिल फोकट, झूठमूठ कर दावा।

राहन नइ दय पहली जइसे, रंग रूप पहिनावा।।

बना डारथें सिधवा ला तक, अपने कस हुड़दंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


देवयँ नइ सुझाव फोकट मा, साहब बइगा गुनिया।

किसन सुदामा के जुग नोहे, मतलब के हे दुनिया।

रसा रहत ले चुहके मनभर, तजयँ देख के तंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।




भागत मोटर गाड़ी


हवा संग मा बात करत हे,देखव मोटर गाड़ी।

देखावा अउ जल्दी बाजी,फोड़त हावय माड़ी।


जाने जम्मो झन जोखिम हे,तभो करे अनदेखा।

अपने हाथ बिगाड़त फिरथे,अपन भाग के लेखा।

उहू आदमी लउहा लेवय,जे टारे नइ काड़ी-।

हवा संग मा बात करत हे,देखव मोटर गाड़ी।


मनखे तनखे मोटर गाड़ी,दिनदिन भारी बाढ़े।

साव चेत हो चलना पड़ही,रथे गाय गरु ठाढ़े।

हाल दिखे बेहाल सड़क के,का जंगल अउ झाड़ी।

हवा संग मा बात करत हे,देखव मोटर गाड़ी।


खुदे झपाये अउ दूसर के,हाड़ा गोड़ा टोड़े।

बात बरजना घलो न माने,नशापान नइ छोड़े।

उहू कुदावै मोटर गाड़ी,जउने हवै अनाड़ी--।

हवा संग मा बात करत हे,देखव मोटर गाड़ी।


नवा नवा गाड़ी आगे हे,आगे नवा चलैया।

यमराजा लेआघू निकले,देख सड़क हा भैया।

दुर्घटना ला देख जुड़ाथे,हाथ पाँव अउ नाड़ी।

हवा संग मा बात करत हे,देखव मोटर गाड़ी।



मनखे मन के करनी के फल


छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।

फल ला भोगत हावय फोकट, मनखें के करनी के।।


चिरई चिरगुन मरे घाम मा, नइहे पेड़उ पानी।

लहकत हावय बानर भालू, हलाकान जिनगानी।

बोहय बन विकास के गंगा, धारा बैतरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


धरती दाई के छाती मा, छड़ सीमेन्ट छभागे।

माटी के सेउक मन मरगे, उद्योगी हरियागे।।

इंच इंच ला चाँट खात हें, चटनी कस बरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


आज जनम धर काली मरगे, जीव जंतु मन कतको।

कोनो जुग मा नइ देखें हन, निरदई मनखें अतको।।

स्वारथ बर सरलग माते हे, लूट पाट धरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।



कठपुतली


पद पइसा के आघू नाँचे, बने मनुष कठपुतली।

फेर देख के छोट मँझोलन, फुटें बने बम सुतली।।


जउन चलत हे तेला देखत, आथे रोना हाँसी।

चले एक तपका के चर्चा, होय एक ला फाँसी।।

चमचागिरी चरम मा हावय, सच्चाई हे उथली।

पद पइसा के आघू नाँचे, बने मनुष कठपुतली।।


पइसा वाले रहे कइसनों, भरे सबे झन पानी।

दुख तकलीफ झेलइय्या मन के, नित उजड़े छत छानी।।

बने बने बड़का मन खायें, छोट फोकला गुठली।

पद पइसा के आघू नाँचे, बने मनुष कठपुतली।।


सात खून हे माफ बड़े के, सब मूंदे हें आँखी।

छोट मँझोलन चाहें उड़ना, ता काँटत हें पाँखी।।

आये हावय काय जमाना, चले हुकूमत तुगली।

पद पइसा के आघू नाँचे, बने मनुष कठपुतली।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया
बाल्को, कोरबा(छग)