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Thursday, March 5, 2026

फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता

 फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता



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आया फागुन मास सुहावन, स्वागत गीत सुनाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


फूलों सा मन खिल-खिल जाए, टेसू वाली होली से।

दुश्मन का भी जीत हृदय लो, मोहक हँसी ठिठोली से।

झूम नगाड़ों की थापों पर, राग फगुनवा गाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


प्रेम रंग में रँगो जरा सा, गोरे-गोरे गालों को।

हो जाने दो मस्त पवन सा, बहकी-बहकी चालों को।

करो शरारत स्नेहिल मितवा, मिल हुड़दंग मचाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


गले लगाओ दीन-दुखी को, ज्यों मधुरस की गोली हो।

बहे रंग की निर्मल धारा, मर्यादित ही होली हो।

भरे हृदय का रिक्त कलश वो, रंग पलाशी लाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*



         *डॉ. इन्द्राणी साहू"साँची"*

         भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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अनुज छत्तीसगढ़ी 14


: कुंडलिया छंद

आगे होली के परब, मया रंग ला बाँट।

मन के खटखट छोड़ के, हिरदे ला तँय साँट।।

हिरदे ला तँय साँट, मया के बाँटा करले।

दया-मया के रंग, हाथ मा संगी धरले।।

जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी-ठिठोली।

भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।

अनुज छत्तीसगढ़िया 

पाली जिला-कोरबा


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 सिंहावलोकन दोहें

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


गाँव-गाँव मानत हवैं, होली परब तिहार।

रंग बिरंगी सब दिखै, नाचत कुहकी पार।


नाचत कुहकी पार के, डंडा धर-धर आज।

झूल-झूल नाचत हवैं, कनिहा फेंटा साज।।


कनिहा फेंटा साज के, जावत टोली संग।

नाक कान बोथाय हे, रंग लगे सब अंग।।


रंग लगे सब अंग मा, नइ चिनहावत लोग।

पहिने चूंदी खोपड़ी, किसम -किसम के जोग।।


किसम-किसम के जोग हे, तुतरू पों-पों शोर।

ढोल नगाड़ा जब बजै, "बाबू" कूदय खोर।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई 

 जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़

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*होली*


आगे फागुन धर के होली,खेलव रंग गुलाल। 

हरिहर पींयर लाल रंग मा,रंगव सबके गाल।। 

जोगीरा सारा रा रा रर


छोड़व झगरा हँस गा लव जी,जुरमिल के हमजोली। 

नाचव गावव खुशी मनावव,आगे फागुन होली।। 

जोगीरा सारा रा रा   ररररर


परसा फूले लाली-लाली, भर लव ओखर रंग। 

मुहूँ  गाल मा चुपर-चुपर के,करव खूब हुड़दंग।।

जोगीरा सारा ररर


वृंदावन बरसाना देखव,मचे हवे बड़ धूम। 

मया पिरित के अद्भुत गाथा,हिय ला लेते चूम।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


लुका - लुका  लइका मन मारें, पिचकारी के धार। 

का नान्हे का बड़का कहिबे,सबके हरे तिहार।। 

जोगीरा सारा  


बन -ठन भाटो हा आइस हे, होरी मा ससुरार। 

उज्जर रंग ह करिया होगे,सारी के सत्कार।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


संगी साथी जीजा -सारी, करँय ठिठोली खूब। 

लजकुरिया भौजाई नाचय,भांग नशा मा डूब।। 


जोगीरा सारा ररर रररर रा


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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शक्ति छंद----- फाग


मजा देख लेवत, हवै फाग के।

जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के।।

लगे फूल मउहा, सबो डार मा।

बने देख झूमत, हवै खार मा।।


गली खोर माते, सबो के मजा।

बने आज कसके, नँगारा बजा।।

लगादे बने रंग,  ला गाल मा।

चले फाग के गीत, अब ताल मा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली कोरबा(छ.ग.)


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होली के रंग, टोली के संग


होली के दिन निकले टोली, उड़ही रंग गुलाल।

प्रेम रंग मा बुड़ही लोगन,  होही  माला माल।।

अंतस बजही ढोल नगाड़ा,  उमड़त आज उमंग।

धरम-करम रद्दा मा चलही, भिजही जम्मो अंग।।

दया दृष्टि के सागर गहरा, नइय मिलय मन थाह।

काम क्रोध मन होथे उथला, एकर  होथे  दाह।।

नशा मुक्त जिनगी ला जीबो,  सुग्घर बनही काज।

ज्ञान सुधा रस कस के पीबो, नइ अऊ गिरय गाज।।

सद्गुण गति के पानी सींचो, भर पिचकारी मार।

अवगुण हा धोवा के निकले, निकलत धारे धार।।

चलो मनाबो सुग्घर होली,  भाई चारा संग।

अमिट रंग मा अंतस भींजे, बदलँव जम्मो ढंग।।

बैर भाव ला श्रवण छोड़ के, परब मनावँव साथ।

बढ़िया मौका आज हरे जी, मत खींचो तुम हाथ।।


रचयिता : धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री

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: छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में। 

रंग डार फगुनवा चटक चढ़े, 

रंग डार फगुनवा में। 


बौर लगे हे अमराई में, 

गूँज उठत मन शहनाई मे, 

सब रस वन्ती फभत बसंती, 

मनुहार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


धरती अंबर सजत बसंती, 

चटक रंग चढ़ते लजवंती,। 

लटक झटक के चल सतवंती, 

ब्रज नार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


वृंदावन के कूँज गली में, 

रंग गुलाल मली मली में, 

खनक झनक पायल करती 

झंकार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


सुमित्रा शिशिर

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होली


आया फागुन लेकर होली,

सजते हैं बच्चों की टोली।

घर आंगन छायी रंगोली,

रंग घड़ा में राधा घोली।।


वो कान्हा की मीठी बोली,

साथ चले आते हमजोली।

मीत सुदामा खाली झोली,

माथे पर है चंदन रोली।।


आज मचेगा धूम धड़ाका,

आया है गोकुल का बांँका।

ज्यों ही लाला माखन ताका

छाया नीरव बंद ठहाका।।


नंद-यशोदा डांट लगाए,

नटखट मोहन दूर भगाए।

जिद्दी कान्हा फिर-फिर आए,

मैया के आंँचल छिप जाए।।


होते घर में खूब तमाशा,

बांँटे सबको खील बताशा।

पिचकारी ने रंग तलाशा,

कान्हा से पूरी हो आशा।।


बीते दिन अब आई रातें,

याद रहे होली की बातें।।

पाँच विकारों पर हो घातें

पावन हो हर रिश्ते नाते।।


✍️ पुनाराम वर्मा बैकुंठ🙏


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कुंडलियां छन्द- *होली*


होली मा तो होलिका, जलथे जी हर साल।

नारी के अपमान ये, नारी करे सवाल।।

नारी करे सवाल, रीति ये कोंन बनाइस।

पुरुष प्रधान समाज, एक नारी ल जलाइस।।

सत्यबोध हुडदंग, करे बर ठाढ़े टोली।

कर नारी अपमान, मनाथें लोगन होली।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[3/4, 3:10 PM] अमृतदास साहू 12: *होली* (सार छंद)

नाचत गावत धूम मचावत,आवत हे हमजोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल ,खेलत हें सब होली।


कोनो पिंवरा कपड़ा पहिरे, कोनो पहिरे सादा।

कोनो मारे लिटिल पैक अउ, कोनो मारे जादा।

मजा उड़ावत हावय अड़बड़,देखव इंकर टोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


फाग गीत के धुन मा सबझन,नाचत हावय भारी।

नन्द लाल के रूप धरे हे ,मारत हें पिचकारी।

लइका बुढ़वा जम्मो झन सब,अड़बड़ करत ठिठोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


माते हावय सबझन संगी, पीके अड़बड़ दारू।

घर के आगू के नाली मा, गिरगे हवय समारू।

डगमग डगमग रेंगत हावय,खाय भांग के गोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली। 


मन ले इर्ष्या द्वेष भुलाके, रंग लगावत लाली।

जात पात तज गला मिलत हे, मानवता के माली।

मीठ मीठ बोलत हावय सब,अड़बड़ गुरतुर बोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल, खेलत हें सब होली।


रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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[3/4, 3:20 PM] पद्मा साहू, खैरागढ़ 14: 33.

    *जिनगी के होली* 

            (आल्हा छंद )

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।

बाहिर के मन रंग छोड़ के, मनवा भीतर के मन रंग।।



रंग गुलाबी मा होली के, अंतस  ला देवव  मुसकान।

मया रंग मा भीगय हिरदे, कर लौ ईश्वर ले पहिचान।।

पक्का  रंग  पिरित  के  पाके, मिट जावय भीतर के जंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


इन्द्रधनुष कस ये जीवन मा, सात रंग के होवय मेल।

देखव अंतस  के आँखी  मा, आत्मिक सुख होली के खेल।।

भक्त  रंग  के  फाग  उड़ै  ले, बदल जाय जिनगी के ढंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


डारव  संगी  रंग  अबीरा, टूटे झन जिनगी के आस।

परमात्मा संग मिले आत्मा, जइसे गुझिया मिले मिठास।।

झन रँगे देह मन रंग जाय, होली के बाजय मिरदंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


थिरक-थिरक के नाचय अंतस, सुनके फागुन होली गीत।

नाता  जोड़के  जगतपति  ले, मन हा मानै  वोला  मीत।।

गली-खोर  उजियारी  लागय, मन के  कोठी  भरै  उमंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


जिनगी के ये पिचकारी मा, किसम-किसम के हावै रंग।

हँस-हँस के झेलव दुख-सुख ला, लाली हरियर होली संग।।

कच्चा रंग छोड़ दुनिया के, करते इही भक्ति ला भंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


रचनाकार 

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी 

खैरागढ़  छत्तीसगढ़

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[3/5, 7:53 AM] तातुराम धीवर 21: होली 

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रूप घनाक्षरी -

आमा अमरइया मा, कदम के छँइया मा,

झुलवा बँधाये हावैं, झूलय सबों यार हे।

फागुन महीना आये, सबके हे मन भाये,

कोयलिया गीत गाये, बइठे आम डार हे।

रंग के कटोरा धरे, मया पिरित ले भरे,

मारे बड़ पिचकारी, गोकुल के द्वार हे।

कहूँ रँगे हरियर, कहूँ लाल हे पींयर,

आनी बानी रंग रँगे, फागुन तिहार हे।।


प्रेम राग गूँजत हे, बैर भाव भूँजत हे,

गली खोर निक लागे, गजब एसो साल मा।

स र र र सररायें, गीत झूम झूम गायें,

माई पीला नाचत हे, नगाड़ा के ताल मा।

हिल मील जायें छोरी, सुग्घर मनायें होरी,

रंग लगवाय लिये, गोरी अपने गाल मा।

गोरी के हे गोरी गाल, होगे हावै लाले लाल,

आठो अंग बोथा गेहे, रंग अउ गुलाल मा।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी

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