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Friday, March 20, 2026

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

Saturday, March 14, 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Tuesday, March 10, 2026

महिला दिवस विशेषांक बरवै छंद

 चित्रा श्रीवास: महिला दिवस विशेषांक


बरवै छंद



नोहवँ मैहा देवी ,अतका जान।

समझव मोला मनखे, देवव मान।।

देवी कहिके करथव, अत्याचार।

हिंसा झगड़ा दाहिज,देथव मार।।

सुन जीये के मोरो, हे अधिकार।

मै हा हाववँ जिनगी, के आधार।।

नारी हावय नर के,आधा भाग।

माँ पत्नी बेटी बन,करथे त्याग।।

भेदभाव ला छोड़व, राखव मान।

दुनो एक गाड़ी के,चक्का आन।।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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 मुकेश 16: (महिला दिवस विशेष)


नारी शक्ति--- बरवै छंद


नारी मन के महिमा, अपरंपार।

सुमता मा राखँय जी, घर परिवार।।


आज करत हें उन मन, जम्मों काम।

पढ़-लिख बने कमावत, हावँय नाम।।


नारी बिन हावय गा, जग अँधियार।

माँ बेटी पत्नी बन, बाटँय प्यार।।


रानी दुर्गा लक्ष्मी, बनिन महान।

बैरी मन ले लड़के, देइन प्रान।।


बने चलावत हावँय, अब सरकार।

राजनीति मा बनके, भागीदार।।


बड़े-बड़े ग्रंथन हा, करय बखान।

शक्ति स्वरूपा नारी, देवव मान।।


मान गउन सब झन ला, दँय हरहाल।

करँय सदा पति सेवा, जा ससुराल।।


दुनिया भर मा अब तो, होवय शोर।

नइहें नारी अबला, अउ कमजोर।।


ओलंपिक उन खेलँय, गा मैदान।

मेडल जीत बनावँय, जी पहिचान।।


नारी मन हें जग के, सिरजनहार।

मातृ रूप मा पूजय, अब संसार।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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नारी के महिमा

( त्रिभंगी छंद)


हिरदे मा ममता, सब बर समता , अँचरा मा सुख, छाँव रहै ।

गुन ला सब गावैँ, माथ नवावैँ , जग महतारी , बेद कहै ।।

वो हर ए नारी, महिमा भारी, बेटी बहिनी , रूप धरै ।

लाँघन तक रहिके, बिपदा सहिके , बाँटत कौंरा , दुःख हरै ।।


जग ला तैं सिक्छा, अगिन परीक्छा, देथस माता , बखत परे।

दुर्गा बन जाथस , लास बिछाथस ,  काली चंडी , रूप धरे ।।

सावित्री मइया , तैं अनुसुइया , मातु जसोदा , आच तहीं ।

हे विस्वमोहनी , करौं सुमरनी , तैं अबला अच , नहीं नहीं ।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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*विषय - नारी शक्ति*

       *सार छंद*


हावय संगी नारी मनके, महिमा अड़बड़ भारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


कभू हार नइ मानै येमन ,कतको बाधा आवै।

अपन आखरी साँस चलत ले ,नारी धरम निभावै।

संत देव ऋषि ज्ञानी ध्यानी,हवय इँकर आभारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


झन समझौ जी अब इनला तुम, शक्तिहीन अउ अबला।

बात रथे जब इँकर मान के,कँपा देत इन जग ला।

करव सदा सम्मान इँकर सब,होथें इन अवतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी। 


अलग अलग रुप मा येमन हा, ये दुनिया मा आथे।

दया मया बगराके सुग्घर,जिनगी ला महकाथे।

इहीं रूप देवी दुर्गा के,आवय जग महतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी।

 

 अमृत दास साहू 

   राजनांदगांव

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दोहा

नारी घर के हे धुरी, नारी ले संसार।

गुन गावत हे देवता, महिमा अपरंपार।।


रौनक सबो तिहार के, सुखी रखय परिवार।

नारी मन ममता भरे, देथे शुभ संस्कार।।


तज देथे सुख ला अपन, दया मया के छाँव।

सरग सही होथे धरव, माँ के पबरित पाँव।।


बेटी बहिनी रूप मा, नारी दव सम्मान।

अन्न रतन धन ले बड़े, होथे कन्यादान।।


सोंध-सोंध महकत रहय, किसम -किसम पकवान।

नारी ले होथे परब, गुन के ओहर खान ।।


डॉ. दीक्षा चौबे

Thursday, March 5, 2026

फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता

 फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता



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आया फागुन मास सुहावन, स्वागत गीत सुनाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


फूलों सा मन खिल-खिल जाए, टेसू वाली होली से।

दुश्मन का भी जीत हृदय लो, मोहक हँसी ठिठोली से।

झूम नगाड़ों की थापों पर, राग फगुनवा गाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


प्रेम रंग में रँगो जरा सा, गोरे-गोरे गालों को।

हो जाने दो मस्त पवन सा, बहकी-बहकी चालों को।

करो शरारत स्नेहिल मितवा, मिल हुड़दंग मचाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


गले लगाओ दीन-दुखी को, ज्यों मधुरस की गोली हो।

बहे रंग की निर्मल धारा, मर्यादित ही होली हो।

भरे हृदय का रिक्त कलश वो, रंग पलाशी लाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*



         *डॉ. इन्द्राणी साहू"साँची"*

         भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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अनुज छत्तीसगढ़ी 14


: कुंडलिया छंद

आगे होली के परब, मया रंग ला बाँट।

मन के खटखट छोड़ के, हिरदे ला तँय साँट।।

हिरदे ला तँय साँट, मया के बाँटा करले।

दया-मया के रंग, हाथ मा संगी धरले।।

जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी-ठिठोली।

भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।

अनुज छत्तीसगढ़िया 

पाली जिला-कोरबा


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 सिंहावलोकन दोहें

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


गाँव-गाँव मानत हवैं, होली परब तिहार।

रंग बिरंगी सब दिखै, नाचत कुहकी पार।


नाचत कुहकी पार के, डंडा धर-धर आज।

झूल-झूल नाचत हवैं, कनिहा फेंटा साज।।


कनिहा फेंटा साज के, जावत टोली संग।

नाक कान बोथाय हे, रंग लगे सब अंग।।


रंग लगे सब अंग मा, नइ चिनहावत लोग।

पहिने चूंदी खोपड़ी, किसम -किसम के जोग।।


किसम-किसम के जोग हे, तुतरू पों-पों शोर।

ढोल नगाड़ा जब बजै, "बाबू" कूदय खोर।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई 

 जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़

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*होली*


आगे फागुन धर के होली,खेलव रंग गुलाल। 

हरिहर पींयर लाल रंग मा,रंगव सबके गाल।। 

जोगीरा सारा रा रा रर


छोड़व झगरा हँस गा लव जी,जुरमिल के हमजोली। 

नाचव गावव खुशी मनावव,आगे फागुन होली।। 

जोगीरा सारा रा रा   ररररर


परसा फूले लाली-लाली, भर लव ओखर रंग। 

मुहूँ  गाल मा चुपर-चुपर के,करव खूब हुड़दंग।।

जोगीरा सारा ररर


वृंदावन बरसाना देखव,मचे हवे बड़ धूम। 

मया पिरित के अद्भुत गाथा,हिय ला लेते चूम।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


लुका - लुका  लइका मन मारें, पिचकारी के धार। 

का नान्हे का बड़का कहिबे,सबके हरे तिहार।। 

जोगीरा सारा  


बन -ठन भाटो हा आइस हे, होरी मा ससुरार। 

उज्जर रंग ह करिया होगे,सारी के सत्कार।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


संगी साथी जीजा -सारी, करँय ठिठोली खूब। 

लजकुरिया भौजाई नाचय,भांग नशा मा डूब।। 


जोगीरा सारा ररर रररर रा


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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शक्ति छंद----- फाग


मजा देख लेवत, हवै फाग के।

जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के।।

लगे फूल मउहा, सबो डार मा।

बने देख झूमत, हवै खार मा।।


गली खोर माते, सबो के मजा।

बने आज कसके, नँगारा बजा।।

लगादे बने रंग,  ला गाल मा।

चले फाग के गीत, अब ताल मा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली कोरबा(छ.ग.)


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होली के रंग, टोली के संग


होली के दिन निकले टोली, उड़ही रंग गुलाल।

प्रेम रंग मा बुड़ही लोगन,  होही  माला माल।।

अंतस बजही ढोल नगाड़ा,  उमड़त आज उमंग।

धरम-करम रद्दा मा चलही, भिजही जम्मो अंग।।

दया दृष्टि के सागर गहरा, नइय मिलय मन थाह।

काम क्रोध मन होथे उथला, एकर  होथे  दाह।।

नशा मुक्त जिनगी ला जीबो,  सुग्घर बनही काज।

ज्ञान सुधा रस कस के पीबो, नइ अऊ गिरय गाज।।

सद्गुण गति के पानी सींचो, भर पिचकारी मार।

अवगुण हा धोवा के निकले, निकलत धारे धार।।

चलो मनाबो सुग्घर होली,  भाई चारा संग।

अमिट रंग मा अंतस भींजे, बदलँव जम्मो ढंग।।

बैर भाव ला श्रवण छोड़ के, परब मनावँव साथ।

बढ़िया मौका आज हरे जी, मत खींचो तुम हाथ।।


रचयिता : धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री

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: छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में। 

रंग डार फगुनवा चटक चढ़े, 

रंग डार फगुनवा में। 


बौर लगे हे अमराई में, 

गूँज उठत मन शहनाई मे, 

सब रस वन्ती फभत बसंती, 

मनुहार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


धरती अंबर सजत बसंती, 

चटक रंग चढ़ते लजवंती,। 

लटक झटक के चल सतवंती, 

ब्रज नार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


वृंदावन के कूँज गली में, 

रंग गुलाल मली मली में, 

खनक झनक पायल करती 

झंकार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


सुमित्रा शिशिर

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होली


आया फागुन लेकर होली,

सजते हैं बच्चों की टोली।

घर आंगन छायी रंगोली,

रंग घड़ा में राधा घोली।।


वो कान्हा की मीठी बोली,

साथ चले आते हमजोली।

मीत सुदामा खाली झोली,

माथे पर है चंदन रोली।।


आज मचेगा धूम धड़ाका,

आया है गोकुल का बांँका।

ज्यों ही लाला माखन ताका

छाया नीरव बंद ठहाका।।


नंद-यशोदा डांट लगाए,

नटखट मोहन दूर भगाए।

जिद्दी कान्हा फिर-फिर आए,

मैया के आंँचल छिप जाए।।


होते घर में खूब तमाशा,

बांँटे सबको खील बताशा।

पिचकारी ने रंग तलाशा,

कान्हा से पूरी हो आशा।।


बीते दिन अब आई रातें,

याद रहे होली की बातें।।

पाँच विकारों पर हो घातें

पावन हो हर रिश्ते नाते।।


✍️ पुनाराम वर्मा बैकुंठ🙏


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कुंडलियां छन्द- *होली*


होली मा तो होलिका, जलथे जी हर साल।

नारी के अपमान ये, नारी करे सवाल।।

नारी करे सवाल, रीति ये कोंन बनाइस।

पुरुष प्रधान समाज, एक नारी ल जलाइस।।

सत्यबोध हुडदंग, करे बर ठाढ़े टोली।

कर नारी अपमान, मनाथें लोगन होली।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[3/4, 3:10 PM] अमृतदास साहू 12: *होली* (सार छंद)

नाचत गावत धूम मचावत,आवत हे हमजोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल ,खेलत हें सब होली।


कोनो पिंवरा कपड़ा पहिरे, कोनो पहिरे सादा।

कोनो मारे लिटिल पैक अउ, कोनो मारे जादा।

मजा उड़ावत हावय अड़बड़,देखव इंकर टोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


फाग गीत के धुन मा सबझन,नाचत हावय भारी।

नन्द लाल के रूप धरे हे ,मारत हें पिचकारी।

लइका बुढ़वा जम्मो झन सब,अड़बड़ करत ठिठोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


माते हावय सबझन संगी, पीके अड़बड़ दारू।

घर के आगू के नाली मा, गिरगे हवय समारू।

डगमग डगमग रेंगत हावय,खाय भांग के गोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली। 


मन ले इर्ष्या द्वेष भुलाके, रंग लगावत लाली।

जात पात तज गला मिलत हे, मानवता के माली।

मीठ मीठ बोलत हावय सब,अड़बड़ गुरतुर बोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल, खेलत हें सब होली।


रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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[3/4, 3:20 PM] पद्मा साहू, खैरागढ़ 14: 33.

    *जिनगी के होली* 

            (आल्हा छंद )

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।

बाहिर के मन रंग छोड़ के, मनवा भीतर के मन रंग।।



रंग गुलाबी मा होली के, अंतस  ला देवव  मुसकान।

मया रंग मा भीगय हिरदे, कर लौ ईश्वर ले पहिचान।।

पक्का  रंग  पिरित  के  पाके, मिट जावय भीतर के जंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


इन्द्रधनुष कस ये जीवन मा, सात रंग के होवय मेल।

देखव अंतस  के आँखी  मा, आत्मिक सुख होली के खेल।।

भक्त  रंग  के  फाग  उड़ै  ले, बदल जाय जिनगी के ढंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


डारव  संगी  रंग  अबीरा, टूटे झन जिनगी के आस।

परमात्मा संग मिले आत्मा, जइसे गुझिया मिले मिठास।।

झन रँगे देह मन रंग जाय, होली के बाजय मिरदंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


थिरक-थिरक के नाचय अंतस, सुनके फागुन होली गीत।

नाता  जोड़के  जगतपति  ले, मन हा मानै  वोला  मीत।।

गली-खोर  उजियारी  लागय, मन के  कोठी  भरै  उमंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


जिनगी के ये पिचकारी मा, किसम-किसम के हावै रंग।

हँस-हँस के झेलव दुख-सुख ला, लाली हरियर होली संग।।

कच्चा रंग छोड़ दुनिया के, करते इही भक्ति ला भंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


रचनाकार 

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी 

खैरागढ़  छत्तीसगढ़

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[3/5, 7:53 AM] तातुराम धीवर 21: होली 

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रूप घनाक्षरी -

आमा अमरइया मा, कदम के छँइया मा,

झुलवा बँधाये हावैं, झूलय सबों यार हे।

फागुन महीना आये, सबके हे मन भाये,

कोयलिया गीत गाये, बइठे आम डार हे।

रंग के कटोरा धरे, मया पिरित ले भरे,

मारे बड़ पिचकारी, गोकुल के द्वार हे।

कहूँ रँगे हरियर, कहूँ लाल हे पींयर,

आनी बानी रंग रँगे, फागुन तिहार हे।।


प्रेम राग गूँजत हे, बैर भाव भूँजत हे,

गली खोर निक लागे, गजब एसो साल मा।

स र र र सररायें, गीत झूम झूम गायें,

माई पीला नाचत हे, नगाड़ा के ताल मा।

हिल मील जायें छोरी, सुग्घर मनायें होरी,

रंग लगवाय लिये, गोरी अपने गाल मा।

गोरी के हे गोरी गाल, होगे हावै लाले लाल,

आठो अंग बोथा गेहे, रंग अउ गुलाल मा।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी

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वासन्ती: वसन्ती वर्मा के सरसी छंद


               होरी

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लाली लाली परसा फूले,आगे फागुन मास।

धर पिचकारी होरी खेलें,देख बहुरिया सास।


मया पिरीत ला बाँटे होरी,मन मइलाये धोय।

जुन्ना झगरा अइसन टोरे,झगरा फेर न होय।


बाजे माँदर ढोल नंगाड़ा,गाँव म चौकी आँट।

गुजिहा भजिया बरा बनाबो,खाबो मिल सब बाँट।


रंग धरे हँव लाली पिंवरा,होरी आज तिहार।

हाँसव खेलँव होरी मैं जी,जोही संग हमार।


        🌹अमरइया के छाँव🌹


रंग धरे आइस वासन्ती,मउरे आमा फूल।

बइठे हावय कोयल कारी,गावय झुलना झूल।


आमा डारा मउरे घम घम,हरियर हरियर पान।

लागय लुगरा पिंवरा पहिरे,दुलहिन जइसन जान।


महर महर महकय अमरइया,सुनें चिरइयाँ चाँव।

गीत सुनें कोयल कारी के,बइठे आमा छाँव।


आमा के डारा मा बइठे,देख सुवा इतराय।

हमर दुनों के जोड़ी संगी,सब्बो झन सहराँय।


देखें झट ले संझा होगे,संझा ले अब रात।

मन मा आशा धर के राखौं,भूलौं दुख के बात

बसंती वर्मा

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