तेंदू- दोहा- चोपाई छंद
लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।
काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।
तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।
छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।
तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।
टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।
बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।
औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।
तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।
तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।
लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।
अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।
आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।
हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।
तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।
फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।
जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।
भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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