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Wednesday, April 1, 2026

सखी छंद सूरज राजा

 सखी छंद 


सूरज राजा 


सूरज आय दिखै ताजा।

रोज सुबे दरसे राजा।


पूरब ले वो निकले हे।

जइसे कुहकू बुक ले हे।


सुनहा किरण बिखेरे हे।

सात अश्व रथ फेरे हे।


शनि राजा के बाबू जी।

रखै हवै बड़ काबू जी।


दहके धरा भुँजा जाथे।

हे प्रचंड अग्नी माथे।


बड़े छोट वो नइ माने।

सब ला अपने ही जाने।


सब ला सम रौशन देथे।

बदला मा कुछ नइ लेथे।


पत्नी संज्ञा अउ छाया।

बेटी भद्रा हे माया।


सब ले बढ़ के वो दानी।

रोज सुबे देवव पानी।


रखौ एक ताँबा लोटा।

सुबे अर्घ देवव बेटा।


जेन सुरुज के गुन गाही।

"शर्मा बाबू" सुख पाही।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू✍️

कटंगी-गंडई 

जिला केसीजी छत्तीसगढ़

तरु वंदना* *डमरू घनाक्षरी*

 *तरु वंदना* *डमरू घनाक्षरी* 


 कल-कल जल थल, फल भर भर कर, 

सब कर मन हर, तरु वर बन कर।

 तपन हरत पल, नभ तक मग कर,  

जन मन धन भर, पर-हित रट कर।

अचल रहत मग, डगर-डगर पर,  

सघन सरल बन, पवन चलन कर।

मरु थल दल दल, थल जल भर कर,  

हर दम बर बस, फल रस भर कर।


धर धर सर कर, थर-थर नभ थर,  

कमल नयन सम, सजल नयन भर।

उपवन गमन कर, मन हर पल भर,  

नमन करत जन, तरु वर पद पर।

जगत भरत बल, गगन तपन हर, 

डगर डगर चल, शकल सकल भर।

भजन करत मन, अजर अमर कर,  

डगर डगर थल, सफल सकल कर।


सरल गरम पल, नरम नरम कर,  

शहर शहर चल, डगर डगर भर।

करम धरम कर, भजन मनन कर,  

गमन गमन कर, नमन नमन कर।

सघन वरण कर, मरण हरण कर,  

शरण शरण कर, हरण हरण कर।

खग बसत सतत, सतर-मतर कर,  

कलभ नमन कर, चपल चरन धर।


भरत भरत भर, जरत जरत हर,  

परत परत पर, शरत शरत कर।

पवन चलत सर, लपट दहन हर,  

चमन चमन कर, वतन वतन भर।

नवल नवल कर, धवल धवल कर,  

अमल अमल कर, विमल विमल कर।

अकल शकल कर, सकल सफल कर, 

तरु वर बन कर, सब कर मन हर।



तोषण चुरेन्द्र दिनकर 

धनगांव डौंडी लोहारा 

बालोद छत्तीसगढ़

पावन हवय ये देश हा ============= हरि गीतिका छंद

 पावन हवय ये देश हा 

=============

हरि गीतिका छंद 


पावन हवय ये देश हा, श्री राम के जनमन इहाँ।

लेवत सुबेरे नाम ला, मनखे सबो तरथन इहाँ।

वोखर ममा के गाँव हे,अउ कौसला जी नाम हे।

भाँचा हवै हमरो नता, छत्तीसगढ़ हा धाम हे।।


ये भूमि हे भगवान के,कण कण बसे प्रभु राम हे।

जीवन मरन सुख दुख सबो,अब वोखरे ही काम हे।।

तारण उही मारन उही,जम्मो जगत आधार हे।

वोखर बिना जिनगी नही,जीना घलो बेकार हे।


माया रचे वोखर सबो, धरती सरग आकाश मा।

पानी पवन आगी सबो,हे सृष्टि के हर श्वांस मा।

पत्ता घलो हिलय नहीं, प्रभु के बिना संसार मा।

जब-जब बुलाये भक्त,तब-तब दउँड़ आथे प्यार मा।।

कमलेश प्रसाद शर्माबाबू कटंगी-गंडई जिला केसीजी

Friday, March 20, 2026

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

Saturday, March 14, 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Tuesday, March 10, 2026

महिला दिवस विशेषांक बरवै छंद

 चित्रा श्रीवास: महिला दिवस विशेषांक


बरवै छंद



नोहवँ मैहा देवी ,अतका जान।

समझव मोला मनखे, देवव मान।।

देवी कहिके करथव, अत्याचार।

हिंसा झगड़ा दाहिज,देथव मार।।

सुन जीये के मोरो, हे अधिकार।

मै हा हाववँ जिनगी, के आधार।।

नारी हावय नर के,आधा भाग।

माँ पत्नी बेटी बन,करथे त्याग।।

भेदभाव ला छोड़व, राखव मान।

दुनो एक गाड़ी के,चक्का आन।।



चित्रा श्रीवास

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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 मुकेश 16: (महिला दिवस विशेष)


नारी शक्ति--- बरवै छंद


नारी मन के महिमा, अपरंपार।

सुमता मा राखँय जी, घर परिवार।।


आज करत हें उन मन, जम्मों काम।

पढ़-लिख बने कमावत, हावँय नाम।।


नारी बिन हावय गा, जग अँधियार।

माँ बेटी पत्नी बन, बाटँय प्यार।।


रानी दुर्गा लक्ष्मी, बनिन महान।

बैरी मन ले लड़के, देइन प्रान।।


बने चलावत हावँय, अब सरकार।

राजनीति मा बनके, भागीदार।।


बड़े-बड़े ग्रंथन हा, करय बखान।

शक्ति स्वरूपा नारी, देवव मान।।


मान गउन सब झन ला, दँय हरहाल।

करँय सदा पति सेवा, जा ससुराल।।


दुनिया भर मा अब तो, होवय शोर।

नइहें नारी अबला, अउ कमजोर।।


ओलंपिक उन खेलँय, गा मैदान।

मेडल जीत बनावँय, जी पहिचान।।


नारी मन हें जग के, सिरजनहार।

मातृ रूप मा पूजय, अब संसार।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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नारी के महिमा

( त्रिभंगी छंद)


हिरदे मा ममता, सब बर समता , अँचरा मा सुख, छाँव रहै ।

गुन ला सब गावैँ, माथ नवावैँ , जग महतारी , बेद कहै ।।

वो हर ए नारी, महिमा भारी, बेटी बहिनी , रूप धरै ।

लाँघन तक रहिके, बिपदा सहिके , बाँटत कौंरा , दुःख हरै ।।


जग ला तैं सिक्छा, अगिन परीक्छा, देथस माता , बखत परे।

दुर्गा बन जाथस , लास बिछाथस ,  काली चंडी , रूप धरे ।।

सावित्री मइया , तैं अनुसुइया , मातु जसोदा , आच तहीं ।

हे विस्वमोहनी , करौं सुमरनी , तैं अबला अच , नहीं नहीं ।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

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*विषय - नारी शक्ति*

       *सार छंद*


हावय संगी नारी मनके, महिमा अड़बड़ भारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


कभू हार नइ मानै येमन ,कतको बाधा आवै।

अपन आखरी साँस चलत ले ,नारी धरम निभावै।

संत देव ऋषि ज्ञानी ध्यानी,हवय इँकर आभारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको,सगरो दुनिया दारी।


झन समझौ जी अब इनला तुम, शक्तिहीन अउ अबला।

बात रथे जब इँकर मान के,कँपा देत इन जग ला।

करव सदा सम्मान इँकर सब,होथें इन अवतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी। 


अलग अलग रुप मा येमन हा, ये दुनिया मा आथे।

दया मया बगराके सुग्घर,जिनगी ला महकाथे।

इहीं रूप देवी दुर्गा के,आवय जग महतारी।

इँकर बिना नइ चलय थोरको, सगरो दुनिया दारी।

 

 अमृत दास साहू 

   राजनांदगांव

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दोहा

नारी घर के हे धुरी, नारी ले संसार।

गुन गावत हे देवता, महिमा अपरंपार।।


रौनक सबो तिहार के, सुखी रखय परिवार।

नारी मन ममता भरे, देथे शुभ संस्कार।।


तज देथे सुख ला अपन, दया मया के छाँव।

सरग सही होथे धरव, माँ के पबरित पाँव।।


बेटी बहिनी रूप मा, नारी दव सम्मान।

अन्न रतन धन ले बड़े, होथे कन्यादान।।


सोंध-सोंध महकत रहय, किसम -किसम पकवान।

नारी ले होथे परब, गुन के ओहर खान ।।


डॉ. दीक्षा चौबे

Thursday, March 5, 2026

फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता

 फागुन विशेष:छंदबद्ध कविता



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आया फागुन मास सुहावन, स्वागत गीत सुनाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


फूलों सा मन खिल-खिल जाए, टेसू वाली होली से।

दुश्मन का भी जीत हृदय लो, मोहक हँसी ठिठोली से।

झूम नगाड़ों की थापों पर, राग फगुनवा गाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


प्रेम रंग में रँगो जरा सा, गोरे-गोरे गालों को।

हो जाने दो मस्त पवन सा, बहकी-बहकी चालों को।

करो शरारत स्नेहिल मितवा, मिल हुड़दंग मचाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*


गले लगाओ दीन-दुखी को, ज्यों मधुरस की गोली हो।

बहे रंग की निर्मल धारा, मर्यादित ही होली हो।

भरे हृदय का रिक्त कलश वो, रंग पलाशी लाओ रे।

*कभी नहीं उतरे जो चढ़कर*, *रंग वही ले आओ रे।।*



         *डॉ. इन्द्राणी साहू"साँची"*

         भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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अनुज छत्तीसगढ़ी 14


: कुंडलिया छंद

आगे होली के परब, मया रंग ला बाँट।

मन के खटखट छोड़ के, हिरदे ला तँय साँट।।

हिरदे ला तँय साँट, मया के बाँटा करले।

दया-मया के रंग, हाथ मा संगी धरले।।

जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी-ठिठोली।

भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।

अनुज छत्तीसगढ़िया 

पाली जिला-कोरबा


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 सिंहावलोकन दोहें

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


गाँव-गाँव मानत हवैं, होली परब तिहार।

रंग बिरंगी सब दिखै, नाचत कुहकी पार।


नाचत कुहकी पार के, डंडा धर-धर आज।

झूल-झूल नाचत हवैं, कनिहा फेंटा साज।।


कनिहा फेंटा साज के, जावत टोली संग।

नाक कान बोथाय हे, रंग लगे सब अंग।।


रंग लगे सब अंग मा, नइ चिनहावत लोग।

पहिने चूंदी खोपड़ी, किसम -किसम के जोग।।


किसम-किसम के जोग हे, तुतरू पों-पों शोर।

ढोल नगाड़ा जब बजै, "बाबू" कूदय खोर।।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू 

 कटंगी-गंडई 

 जिला केसीजी 

 छत्तीसगढ़

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*होली*


आगे फागुन धर के होली,खेलव रंग गुलाल। 

हरिहर पींयर लाल रंग मा,रंगव सबके गाल।। 

जोगीरा सारा रा रा रर


छोड़व झगरा हँस गा लव जी,जुरमिल के हमजोली। 

नाचव गावव खुशी मनावव,आगे फागुन होली।। 

जोगीरा सारा रा रा   ररररर


परसा फूले लाली-लाली, भर लव ओखर रंग। 

मुहूँ  गाल मा चुपर-चुपर के,करव खूब हुड़दंग।।

जोगीरा सारा ररर


वृंदावन बरसाना देखव,मचे हवे बड़ धूम। 

मया पिरित के अद्भुत गाथा,हिय ला लेते चूम।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


लुका - लुका  लइका मन मारें, पिचकारी के धार। 

का नान्हे का बड़का कहिबे,सबके हरे तिहार।। 

जोगीरा सारा  


बन -ठन भाटो हा आइस हे, होरी मा ससुरार। 

उज्जर रंग ह करिया होगे,सारी के सत्कार।। 

जोगीरा सारा ररर रररर


संगी साथी जीजा -सारी, करँय ठिठोली खूब। 

लजकुरिया भौजाई नाचय,भांग नशा मा डूब।। 


जोगीरा सारा ररर रररर रा


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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शक्ति छंद----- फाग


मजा देख लेवत, हवै फाग के।

जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के।।

लगे फूल मउहा, सबो डार मा।

बने देख झूमत, हवै खार मा।।


गली खोर माते, सबो के मजा।

बने आज कसके, नँगारा बजा।।

लगादे बने रंग,  ला गाल मा।

चले फाग के गीत, अब ताल मा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली कोरबा(छ.ग.)


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होली के रंग, टोली के संग


होली के दिन निकले टोली, उड़ही रंग गुलाल।

प्रेम रंग मा बुड़ही लोगन,  होही  माला माल।।

अंतस बजही ढोल नगाड़ा,  उमड़त आज उमंग।

धरम-करम रद्दा मा चलही, भिजही जम्मो अंग।।

दया दृष्टि के सागर गहरा, नइय मिलय मन थाह।

काम क्रोध मन होथे उथला, एकर  होथे  दाह।।

नशा मुक्त जिनगी ला जीबो,  सुग्घर बनही काज।

ज्ञान सुधा रस कस के पीबो, नइ अऊ गिरय गाज।।

सद्गुण गति के पानी सींचो, भर पिचकारी मार।

अवगुण हा धोवा के निकले, निकलत धारे धार।।

चलो मनाबो सुग्घर होली,  भाई चारा संग।

अमिट रंग मा अंतस भींजे, बदलँव जम्मो ढंग।।

बैर भाव ला श्रवण छोड़ के, परब मनावँव साथ।

बढ़िया मौका आज हरे जी, मत खींचो तुम हाथ।।


रचयिता : धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री

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: छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में। 

रंग डार फगुनवा चटक चढ़े, 

रंग डार फगुनवा में। 


बौर लगे हे अमराई में, 

गूँज उठत मन शहनाई मे, 

सब रस वन्ती फभत बसंती, 

मनुहार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


धरती अंबर सजत बसंती, 

चटक रंग चढ़ते लजवंती,। 

लटक झटक के चल सतवंती, 

ब्रज नार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


वृंदावन के कूँज गली में, 

रंग गुलाल मली मली में, 

खनक झनक पायल करती 

झंकार फगुनवा में। 

छोड़ बैर के भाव सखी री, 

रंग डार फगुनवा में।। 


सुमित्रा शिशिर

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होली


आया फागुन लेकर होली,

सजते हैं बच्चों की टोली।

घर आंगन छायी रंगोली,

रंग घड़ा में राधा घोली।।


वो कान्हा की मीठी बोली,

साथ चले आते हमजोली।

मीत सुदामा खाली झोली,

माथे पर है चंदन रोली।।


आज मचेगा धूम धड़ाका,

आया है गोकुल का बांँका।

ज्यों ही लाला माखन ताका

छाया नीरव बंद ठहाका।।


नंद-यशोदा डांट लगाए,

नटखट मोहन दूर भगाए।

जिद्दी कान्हा फिर-फिर आए,

मैया के आंँचल छिप जाए।।


होते घर में खूब तमाशा,

बांँटे सबको खील बताशा।

पिचकारी ने रंग तलाशा,

कान्हा से पूरी हो आशा।।


बीते दिन अब आई रातें,

याद रहे होली की बातें।।

पाँच विकारों पर हो घातें

पावन हो हर रिश्ते नाते।।


✍️ पुनाराम वर्मा बैकुंठ🙏


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कुंडलियां छन्द- *होली*


होली मा तो होलिका, जलथे जी हर साल।

नारी के अपमान ये, नारी करे सवाल।।

नारी करे सवाल, रीति ये कोंन बनाइस।

पुरुष प्रधान समाज, एक नारी ल जलाइस।।

सत्यबोध हुडदंग, करे बर ठाढ़े टोली।

कर नारी अपमान, मनाथें लोगन होली।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[3/4, 3:10 PM] अमृतदास साहू 12: *होली* (सार छंद)

नाचत गावत धूम मचावत,आवत हे हमजोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल ,खेलत हें सब होली।


कोनो पिंवरा कपड़ा पहिरे, कोनो पहिरे सादा।

कोनो मारे लिटिल पैक अउ, कोनो मारे जादा।

मजा उड़ावत हावय अड़बड़,देखव इंकर टोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


फाग गीत के धुन मा सबझन,नाचत हावय भारी।

नन्द लाल के रूप धरे हे ,मारत हें पिचकारी।

लइका बुढ़वा जम्मो झन सब,अड़बड़ करत ठिठोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली।


माते हावय सबझन संगी, पीके अड़बड़ दारू।

घर के आगू के नाली मा, गिरगे हवय समारू।

डगमग डगमग रेंगत हावय,खाय भांग के गोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल,खेलत हें सब होली। 


मन ले इर्ष्या द्वेष भुलाके, रंग लगावत लाली।

जात पात तज गला मिलत हे, मानवता के माली।

मीठ मीठ बोलत हावय सब,अड़बड़ गुरतुर बोली।

रंग गुलाल लगाके जुरमिल, खेलत हें सब होली।


रचनाकार 

अमृत दास साहू 

ग्राम - कलकसा, डोंगरगढ़

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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[3/4, 3:20 PM] पद्मा साहू, खैरागढ़ 14: 33.

    *जिनगी के होली* 

            (आल्हा छंद )

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।

बाहिर के मन रंग छोड़ के, मनवा भीतर के मन रंग।।



रंग गुलाबी मा होली के, अंतस  ला देवव  मुसकान।

मया रंग मा भीगय हिरदे, कर लौ ईश्वर ले पहिचान।।

पक्का  रंग  पिरित  के  पाके, मिट जावय भीतर के जंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


इन्द्रधनुष कस ये जीवन मा, सात रंग के होवय मेल।

देखव अंतस  के आँखी  मा, आत्मिक सुख होली के खेल।।

भक्त  रंग  के  फाग  उड़ै  ले, बदल जाय जिनगी के ढंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


डारव  संगी  रंग  अबीरा, टूटे झन जिनगी के आस।

परमात्मा संग मिले आत्मा, जइसे गुझिया मिले मिठास।।

झन रँगे देह मन रंग जाय, होली के बाजय मिरदंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


थिरक-थिरक के नाचय अंतस, सुनके फागुन होली गीत।

नाता  जोड़के  जगतपति  ले, मन हा मानै  वोला  मीत।।

गली-खोर  उजियारी  लागय, मन के  कोठी  भरै  उमंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


जिनगी के ये पिचकारी मा, किसम-किसम के हावै रंग।

हँस-हँस के झेलव दुख-सुख ला, लाली हरियर होली संग।।

कच्चा रंग छोड़ दुनिया के, करते इही भक्ति ला भंग।

होली खेल कबीरा ले, अउ मीरा के माधव संग।।


रचनाकार 

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी 

खैरागढ़  छत्तीसगढ़

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[3/5, 7:53 AM] तातुराम धीवर 21: होली 

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रूप घनाक्षरी -

आमा अमरइया मा, कदम के छँइया मा,

झुलवा बँधाये हावैं, झूलय सबों यार हे।

फागुन महीना आये, सबके हे मन भाये,

कोयलिया गीत गाये, बइठे आम डार हे।

रंग के कटोरा धरे, मया पिरित ले भरे,

मारे बड़ पिचकारी, गोकुल के द्वार हे।

कहूँ रँगे हरियर, कहूँ लाल हे पींयर,

आनी बानी रंग रँगे, फागुन तिहार हे।।


प्रेम राग गूँजत हे, बैर भाव भूँजत हे,

गली खोर निक लागे, गजब एसो साल मा।

स र र र सररायें, गीत झूम झूम गायें,

माई पीला नाचत हे, नगाड़ा के ताल मा।

हिल मील जायें छोरी, सुग्घर मनायें होरी,

रंग लगवाय लिये, गोरी अपने गाल मा।

गोरी के हे गोरी गाल, होगे हावै लाले लाल,

आठो अंग बोथा गेहे, रंग अउ गुलाल मा।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी

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वासन्ती: वसन्ती वर्मा के सरसी छंद


               होरी

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लाली लाली परसा फूले,आगे फागुन मास।

धर पिचकारी होरी खेलें,देख बहुरिया सास।


मया पिरीत ला बाँटे होरी,मन मइलाये धोय।

जुन्ना झगरा अइसन टोरे,झगरा फेर न होय।


बाजे माँदर ढोल नंगाड़ा,गाँव म चौकी आँट।

गुजिहा भजिया बरा बनाबो,खाबो मिल सब बाँट।


रंग धरे हँव लाली पिंवरा,होरी आज तिहार।

हाँसव खेलँव होरी मैं जी,जोही संग हमार।


        🌹अमरइया के छाँव🌹


रंग धरे आइस वासन्ती,मउरे आमा फूल।

बइठे हावय कोयल कारी,गावय झुलना झूल।


आमा डारा मउरे घम घम,हरियर हरियर पान।

लागय लुगरा पिंवरा पहिरे,दुलहिन जइसन जान।


महर महर महकय अमरइया,सुनें चिरइयाँ चाँव।

गीत सुनें कोयल कारी के,बइठे आमा छाँव।


आमा के डारा मा बइठे,देख सुवा इतराय।

हमर दुनों के जोड़ी संगी,सब्बो झन सहराँय।


देखें झट ले संझा होगे,संझा ले अब रात।

मन मा आशा धर के राखौं,भूलौं दुख के बात

बसंती वर्मा

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Tuesday, February 17, 2026

विधान- *सोरठा छंद*

विधान- *सोरठा छंद*


विधान-

*ये एक अर्द्धसम मात्रिक छ्न्द आय*

*ये दोहा के उल्टा छंद आय*

*कहे के मतलब एमा 13,11 के जघा 11,13 के नियम होथे, विषम चरण म 11,11 अउ सम चरण म 13,13 मात्रा होथे*

*तुकांत विषम चरण म अनिवार्य रहिथे*

*दोहा के संग राग परिवर्तन बर ये छंद के उपयोग होथे*

*रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ये छंद के बहुतायत प्रयोग करे हे*


उदाहरण-


जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिवर बदन।

करहुँ अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि शुभ-गुन सदन॥


*नील सरोरूह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन।*

*करऊँ सो मम उर धाम, सदा छीरसागर सयन ।।*


तुलसीदास

Saturday, February 7, 2026

माघ महीना-छंदबद्ध कविता

 माघ महीना-छंदबद्ध कविता


[1/10, 1:28 PM] Dropdi साहू 15 Sahu:

 ‌‌   छप्पय छंद -"माघ महीना"

मन ला सुग्घर भाय, आय ले माघ महीना।

फरियर दिखे अगास, जाड़ लागे झिनाझिना।।

रुसरुस बने सुहाय, घाम जोड़ी जाड़ा के।

हलुहलु बिसरत जाय, जाड़ बइरी हाड़ा के।।

पूस भागती जाय ले, माघ मया ले आय जी।

लजकुरहीन लजाय हे, लाग लगिन लगवाय जी।।


लिहे सुवारी आस, मउर बाँधे बर आमा।

गुछी गुछी कोचियाय, माघ पहिरे पैजामा।।

किसम किसम के फूल, झूल पहिरे हे बारी।

आवत देख बसंत, कोइली हे मतवारी।।

लगे सोलवाँ साल हे, परसा फुलवा लाज मा।

लहकत लाली गाल हे, लाल रंग के साज मा।।


आरो दय मधुमास, माघ के पुरवाही मा।

महर महर ममहाय, फूल आवाजाही मा।।

मँगनी लगिन धराय, जान के मुहुरुत नित्ता।

कतको करे बिहाव, फेर हो जाय सुभित्ता।।

माघी पुन्नी आय ले, मेला गजब भराय जी।

नदिया मा असनान के, शिव के दर्शन पाय जी।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

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[1/18, 9:57 AM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *माघ महीना (गीतिका छंद)* 

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माघ महिना आय ले कमती जनावय जाड़ हा।

रौनिया भावय गजब नइ कँपकँपावय हाड़ हा।।

आय रितुराजा घलो सुघ्घर लगय चहुँओर जी।

देख परसा मौर सरसो नाचथे मन मोर जी।।


दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी) बेमेतरा

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[1/24, 7:55 AM] तातुराम धीवर 21: आल्हा छन्द-


माघ महीना पावन पबरित, सबके मन हावय हर्षाय।

हाँसत कुलकत मौर बाँध के, देखव राजा बसंत आय।।


मकर संक्रांति के शुभ बेरा,दान पून कर धरम कमाय।

‌बाँधय घर घर तिलि लाड़ू , लइका मन पतंग उड़ियाय।।


माघ महीना मँगनी जँचनी, बिहा तेल हे लगिन धराय।

नोनी बाबू करय सगाई, पर्रा बिजना मौर बिसाय।।


माघ महीना आमा मौरे, परसा सरसों हे मन भाय।

महर महर महमावय धरनी, पुरवाई हे गीत सुनाय।।


तिथि पंचमी बसंत परब हे, मातु सारदा के गुण गाय।

पूजन करके महतारी के, भगतन हे अंतस उजराय।।


ज्ञान कला संगीत कला के, होवय अड़बड़ हे बढ़वार।

पार लगावय मझधारा मा, खेवय नाँव धरे पतवार।।


माघी पुन्नी शिव दरसन बर, देव मनुज तन धरके आय।

गावय बम बम बम शिव भोला, चिमटा डमरू ढोल बजाय।।


होत बिहनिया पुन्य काल मा, गंगा मा सब डुबक नहाय।।

अइसन सुग्घर माघ महीना, मन पावन निर्मल हो जाय।


     तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी

बसंत विशेष छंदबद्ध सृजन

 बसंत विशेष छंदबद्ध सृजन


[1/28, 2:50 PM] तातुराम धीवर 21:

 सरसी छ्न्द -16, 11


नइ तो जादा जाड़ा लागय, नइ तो लागय घाम।

नइ तो जादा कनकन लागय,नइ तो तीपय चाम।।


मउसम बड़ा सुहावन हावय, होय शीत के अंत।

देखव आगे हाँसत कुलकत, मस्ती भरे बसंत।।


ऋतु बसंत के आये ले जी, खिलय प्रकृति के अंग।

अंग-अंग हरियाली छावय, दिखय अनेकव रंग।।


पीँयर -पीँयर सरसों फूलय, परसा फूलय लाल।

जउने देखय तउने बोलय, प्रकृति हावय कमाल।।


नवाँ-नवाँ उलहोवय पाना, रंग बिरंगी फूल। 

रखव सदा सनमान प्रकृति के, झिन जावव जी भूल।।


चिरई-चिरगुन जीव-जंतु मा, अड़बड़ के उत्साह।

देखत लागय ऋतु बसंत हे, खड़े पसारे बाँह।।


परब महाशिवरात्रि पंचमी,  होरी हर्सोल्लास।

पावन तिहार ऋतु बसंत के, इह तीनों हे खास।।


    तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी


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[2/1, 10:23 PM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *बसंत (कुण्डलिया छंद)* 

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रितु बसंत के आय ले, माटी हा ममहायँ।

मउरे आमा मस्त हें,गहूँ गजब लहरायँ।।

गहूँ गजब लहरायँ,नीक सरसो फुलवा मन।

परसा सेम्हर फूल,लगयँ सुघ्घर मनभावन।।

कोयलिया मन कूक, सुनावयँ मन पसंद के।

प्रकृति करय सत्कार, सुवागत रितु बसंत के ।।


दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी)-बेमेतरा

[2/2, 8:40 AM] पात्रे जी: कुण्डलिया छन्द- *बसंत*


छाये रंग बसंत के, हरा गुलाबी लाल।

मउरे हावय आम अउ, कोयल कुहके डाल।।

कोयल कुहके डाल, बिरह के गाये गाना।

रुखवा करे किलोल, सजा तन हरियर पाना।।

रंग बिरंगी फूल, हवय बगिया महकाये।

हे रितुराज बसंत, माह फागुन मा छाये।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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[2/4, 12:25 PM] मीता अग्रवाल: *घनाक्षरी छंद* 

मऊरेंआमा के डार, नदिया के आर-पार 

कुहकत-कोयलिया,फरे- फूले बाग मा।


मन-डोले तन-डोले,भुनन भंवरा बोले 

रितुराज रंग घोलें, फगुनिया राग मा।


 गेंदा टेसु फूल फूलें, केसरिया रंग घुले,

मांदर नँगारा बाजे, फागुन के भाग-मा।


बसंत के अगुवाई,करें मिलजुल भाई,

होरी पहिली तैयारी, गावों मिल फाग-मा। 


शीत नित भागत हे, धूप-छांँव जागत हे,

छिन-छिन बाढ़ें दिन,सुरूज के ठाँव मा।


बसंती हे पुरवाई,घनन घटा छाईत,

मन-मा उमंग भरे,कदंब के छाँव मा।



रितु ह सिंगार करें,डारा पाना झड़े फरे,

कामदेव बाण धरे,बांटे मया दाँव मा।


बसंती बयार बहे,रुखराई फूले फरे,

अमराई मऊरे हे,गोरी तोरे गाँव मा।।


डॉ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़

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Thursday, January 15, 2026

मकर सक्रांति

 मकर सक्रांति

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(उल्लाला छंद)


हावय आज तिहार जी, पोंगल अउ संक्रांति के ।

सब ला हे शुभकामना, जिनगी मा सुख शांति के।।


तिल अउ गुड़ के दान हे, पबरित संगम स्नान हे।

आज अबड़ फुरमान हे, मानत सकल जहान हे।।


देव सुरुज हा आज ले, उतरायण मा आय हे।

महभारत मा भीष्म जी, महिमा अबड़ बताय हे।।


तिल्ली लाड़़ू रेवड़ी, खावव सब झन बाँट के।

माँघी मेला हे भरे,करलव सौदा छाँट के।।


संगम तिरथ प्रयाग के,महाकुंभ स्नान जी।

हिरदे फरियर हो जही, कर ले सुग्घर दान जी।। 


दिन हा तिल तिल बाढ़थे,खिरथे थोकुन रात जी।

कमती लागय जाड़ हा, तरिया नदी नँहात जी।


मन पतंग के डोर ला,थाम बने उड़वाव जी।

बखत परे मा खींच लव,जादा झन लहराव जी।


फसल पके जब खेत मा, पोंगल तिल संक्रांति हे।

अन्न बिना जिनगी कहांँ,परब मने सुख शांति हे।


वेद शास्त्र मा जी हवय, कथा मकर संक्रांति के।

 गंगासागर स्नान के, शनि देवा के शांति के।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

Tuesday, January 6, 2026

नवा साल परब तिहार

नवा साल  परब तिहार


: *मनहरण घनाक्षरी छंद* 


*नव वर्ष श्रेष्ठ बनें,*

    *नये राग तर्ज बनें,*

     *आज सभी मिल कर,*

                *प्रेम -गीत गाइए।*


*नव पथ बढ़े चलें,*

  *नये गीत गढ़े चलें,*

     *एक-एक पल क्षण,*

           *प्रेम को बढ़ाइए।।*


*सभी से मिलन करो* 

   *सुख में जीवन भरो,*

        *तम दूर करने को,* 

            *भोर को बुलाइए।*


*खुशियों में साल बीते ,*

       *हँसी से न गाल रिते,*

      *सभी को मंज़िल मिले,*

                 *ऐसे पथ  पाइए।।*


*सुमित्रा शिशिर*

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रोला

नवा बछर के आत,विदा हो जाही जुन्ना। 

सुरता आही रोज,सबो ला लगही सुन्ना।।

दुख-सुख सब मा संग,रहिस वो बन के संगी। 

बखत पहागे फेर,निकल गे कतको तंगी।। 

अँचरा बाँधव आज ये,पाये हंँव जो सोझ मैं। 

बिसरा अंते गोठ ला, हलका कर दँव बोझ मैं।। 


नवा बछर पगराव,झूम के नाचव गाओ। 

जिनगी के दिन चार,बने रद्दा अपनाओ।। 

करव नीक संकल्प,सबे अब डर ला छोड़ो। 

अपन करम ले फेर,कभू तुम मुँह झन मोड़ो।। 

अपन धीर विश्वास ले,पूरा कर लव आस ला। 

हिरदय मा सपना सँजो,छूवव बने अगास ला।।


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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नवा साल

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(चौपाई छंद)


नवा साल के हवय बधाई। छाहित राहय सारद माई।।

धन दौलत सुख सेहत पावव। फूल सहीं हरदम मुस्कावव।।


 कलम बनै जी सबके हितवा।  गिरे परे के खाँटी मितवा।।

 कालजई साहित सिरजावव। भारत माँ के जस बगरावव।।


 नवा साल मा अइसे ठानौ। गाँव शहर खुशहाली लानौ।।

 करम फसल हो सोला आना।पोठ रहय सब दाना दाना ।।


 रद्दा के काँटा बिन लेहू। अउ सपाट गड्ढा कर देहू।।

 मातु पिता गुरु मन सुख पाहीं। आसिस के फुलवा बरसाहीं।।


नवा साल के सुरुज नवा हे। नवा बिहनिया  नवा हवा हे।।

नवा इरादा ठानौ भाई। माँजौ हिरदे फेंकौ काई।।


 चलौ बाँटबो भाईचारा। हवय नेवता झारा झारा।।

 अलख प्रेम के चलौ जगाबो। असली मनखे तब बन पाबो।।


जात पाँत के आँट ढहाके। सबो धरम के मान बढ़ाके।।

 देश प्रेम के भाव जगाबो। चलौ तिरंगा ला फहराबो।।


 आलस बैरी ले दुरिहाके।मिहनत के हम जोत जलाके।।

 गार पसीना रोटी खाबो।जिनगी मा उजियारा लाबो।।


 साल छबिस हा खड़े दुवारी। हैप्पी काहत हे सँगवारी।।

 हमरो कोती ले न्यू ईयर।गाड़ा गाड़ा हैप्पी डियर।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबन्द,छत्तीसगढ़


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 *छेर-छेरा* 

*सरसी छंद* 

आज छेर-छेरा माँगत हें, लइका सबो सियान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


डंडा नाचत गावत हें गा, गली-खोर अउ द्वार।

ढोलक मँजिरा झाँझ बजावत, मानत हवें तिहार।।

दीदी-बहिनी सुवा गीत के, गावत हें सब गान।

पारा बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


बरा ठेठरी-खुर्मी चीला, सब बनात हें आज।

लीपे पोते हें घर अँगना,  करके खेती काज।।

दया-मया के गुरतुर बोली, बने मिलत हे मान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला-कोरबा*

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: गीतिका- पूस पुन्नी छेर-छेरा

2122 2122 2122 212


पूस पुन्नी छेर-छेरा पर्व पावन दान के।

पर्व पावन पावनी नदिया म पबरित स्नान के।

स्नान करके दान करले ज्ञान अउ धन धान के।

दान के अवसर मिले हे शुक्र हे भगवान के।


रचना- सुखदेव सिंह अहिलेश्वर


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तरिया विशेष छंदबद्ध कविता


  : काल कस तरिया (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब बाढ़ही, मनखे करही राज।*

*जीव जंतु झूमत हवै,पेड़ पात सँग आज।*


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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[12/8/2025, 7:40 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया छंद*


तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी जल भरैं, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान हा, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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बिषय------- तरिया 


अब तरिया बाचिस नहीं, धरिस शहर के रूप।

पाट-पाट होटल बनिस, जिहाँ मिलय अब सूप।


तरिया पालय गाँव ला, गरुवा गाय समेत।

खेत खार सीचय घलो, पालय सबके पेट।


कमल सिंघरा ढेस अउ, परय पुराइन पान।

मछरी झिगरा पाल के, होवय सब धनवान।।


शोभा बाढ़य गाँव के, खिलय कमल के फूल।

दाई अइसन जानके, धोवय मन के धूल।।


जोंक असन मनखे जमो, चूसत हावय खून।

कागज मा तरिया बनें, मेंटत हे सब पून।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' 

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[12/10/2025, 12:52 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*सार छंद*

*16,12*

 तरिया भीतर पुरइन राहय, कमल फूल बड़ सोहै।

रंग बिरंगी फूल खोखमा, देखत मन ला मोहै।।

ढेंस रतालू कुकरी काँदा, टोर पोखरा लावैं।

का सियान अउ लइका सबझन,  मजा मार के खावैं।।


तौरत राहँय पनबूड़ी मन, सारस ध्यान लगावै।

संझातीकन के बेरा मा, तरिया पार सुहावै।।

बर पीपर अउ आमा गस्ती, राहय चारो मूड़ा।

काँटा खूँटी नइ राहय जी, दिखै नहीं कुछु कूड़ा।।


पीयँय पानी तरिया के सब, तनमन ला फरियावैं।

घाट घटौंधा सफ्फा राखँय, लद्दी साफ करावैं।।

कूड़ा करकट डिस्पोजल मा, तरिया आज पटागे।

मतलाहा दिखथे पानी हा, छूये मन नइ लागे।।


सकलावत हे चारो कोती, अतिक्रमण के मारे।

ध्यान कहूँ नइ देवत हावँय, झंझट कोन उबारे।।

धीरे-धीरे तरिया डबरी, आज नँदा जाही का।

तरिया कइसन होथे तेला, किस्सा म बताही  का।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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[12/11/2025, 10:20 AM] तातुराम धीवर : आल्हा छ्न्द - 16, 15


तरिया के का हाल सुनावँव, देख चढ़े बड़ जोर बुखार।

जब ले घर घर नल जल आहे, तरिया डबरी परे बिमार।।


पानी रहि से कजला कंचन, दरपन जइसे दगदग साफ।

रदखद कचरा मा अब पटगे, जिनगी इनकर होगे हाफ।।


मेंड़ पार सब घुरवा बनगे, फेंकय कचरा घर ले लान।

जन जन ले दुरिया गे हावय,पहिली जस अब नइ ये मान।।


पानी पीयँय सबो परानी, हँउला गगरी भरके लाय।

पावन निर्मल मन हो जावय, शीतल पानी मा हे नहाय।।


थारी जइसे चाकर चाकर, राहँय सुग्घर पुरइन पान।

फूल खोखमा ढेंस रतालू, काँदा लावँय गहरी खान।।


निर्मल राहय गंगा जइसे, आज दिखय घुरवा जस नीर।

स्वारथ भरगे मनखे भीतर, कोन सुनय तरिया के पीर।।


घाट घठौंधा पचरी सुग्घर, सुग्घर राहय रद्दा बाट।

मँदहा मन के अड्डा बनगे, रदियागे सब निर्मल घाट।।


जागव जागव बहिनी भाई, जागव संगी मोर मितान।

तरिया डबरी ताल तलैया, इँखर सुरक्षा बर दव ध्यान।।


सब जीव जन्तु के निस्तारी, तरिया आवय पालनहार।

इन ला आज बचाना हावय, ले लव अपन खाँध मा भार।।


आवव सब झन खावन किरिया, करन नहीं हम अइसन भूल।

कब्भू नइ फेंकन तरिया मा, हूम धूप पूजा के फूल।।


     तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी

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[12/11/2025, 8:43 PM] Jaleshwar Das Manikpuri 21: तरिया -रोला 

सुन्ना तरिया आज,बतावत कहय कहानी।

नाली पानी धार,होय ग गंदला पानी।।

चाकर तरिया तंग,होगे धनहा बानी।

अलकरहा ए चाल, रे मनखे के सियानी।।

                 दोहा 

संकट के दिन आज हे,कहिथे तरिया घाट।

माटी पथरा डार के, मोर मिटावत ठाठ।।

  जलेश्वर दास मानिकपुरी 

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*रोला छंद--तरिया* 

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घर मा नल-जल आज,कोन अब तरिया जावय।

निस्तारी-असनाँद,सबो घर मा निपटावय।।

तरिया कोती चेत ,कहाँ ले जाही काकर।

हवँय सँकीरन सोच, लोभ लोगन के चाकर।।


तरिया के उपयोग,करँय कमती मनखे मन।

होय सिंचाई काम,थोर किन मछरी पालन।।

तबहे तरिया-ताल,पटावँय बनँय इमारत।

ले विकास के नाँव,प्रकृति के बदलँय सूरत।।


दीपक निषाद--लाटा (बेमेतरा)

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[12/12/2025, 7:39 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया 

तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी हाथ, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर


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अमृतदास साहू 12: *विधा- सार छंद*

        *विषय - तरिया* 


तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।

आज काल तो भइगे संगी, घुरवा असन पटागे।


घटत दिनों दिन हावय संगी, तरिया के नहवइया।

पहली तरिया ला मानय गा,जइसे गंगा मइया।

अब तो लगथे गाँव-गाँव ले,तरिया घलो नँदागे।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


तइहा के बेरा तरिया मा,होय सबे निस्तारी।

छत्तीसगढ़ी परम्परा के,राहय एक चिन्हारी।

सुन्ना परगे घाट घटौंदा,पानी घलो अँटागे।

तइहा के बेरा मा तरिया, सुग्घर पबरित लागे।


नांदगांव रानी सागर के,राहय अलग चिन्हारी।

अउ रइपुर के बूढ़ा तरिया,लागय जस महतारी।

देख रेख के अभाव मा अब,अलकरहा मइलागे ।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


अमृत दास साहू 

 राजनांदगांव

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   कुण्डलिया छंद "तरिया"

तरिया के बड़ मोल हे, राखव येला साफ।

सबो जीव के आसरा, करथे सब ला माफ।।

करथे सब ला माफ, जीव तरथे जी जेमा।

कचरा दव झन फेंक, घात पबरित हे तेमा।।

तरिया के दिल देख, नेक हे नइ हे करिया।

गिनहा बने सकेल, साफ कर देथे तरिया।।


तरिया कोड़े खार मा, सब के बूझे पियास।

सबो जीव जुरिया जथे, पानी बर धर आस।।

पानी बर धर आस, घाट मा पीथे पानी।

का जंगल के जीव, गाँव के जम्मों प्रानी।।

लेवव जम्मों सीख, एक होवव झन छरिया।

मनुख-मनुख हन एक, एक जस दुनिया तरिया।।


महिमा हवय अपार जी, तरिया हमर सियान।

हिरदे बड़का राख के, गहरा राखे ज्ञान।।

गहरा राखे ज्ञान, मान तब बड़का पाथे।

गिनहा बने सरेख, पेट मा तभे पचाथे।।

सबके हित हो जाय, गोठ भा जाय सही मा।

तरिया सही सियान, एक दोनों के महिमा।।


द्रोपती साहू "सरसिज"


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छत्तीसगढ़ के उतेरा उन्हारी)


 रवि फसल

चना मटर अलसी सबो, बोथे सबझन खेत।

सरसों जीरा सौंफ ला, बो दौ करके चेत।।

बो दौ करके चेत, खेत मा सबला बोहा।

मक्का अलसी बोय, बुद्धि तन बर हे लोहा।।

रबि कटथे मार्च,फसल धरथे सब मनभर।

धरथे मींस किसान, पाय धन अड़बड़ सुघ्घर।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' ✍️बिलासपुर

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सार

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तिवरा भाजी अड़बड़ गुरतुर,अगहन- पूस म आथे।

हरियर-हरियर कोंवर-कोंवर,भाजी गजब मिठाथे।।


ए भाजी हर जड़काला के,आए राजा भाजी।

एला खाए बर लइका ले,बुढ़वा रहिथें राजी।।


भाव भले छूवय अगास ला,लोगन तभो बिसाथें।

दार डार दे सुघ्घर फोरन,साग राँध के खाथें।।


दीपक निषाद--लाटा (भालेसर)

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: (छत्तीसगढ़ के उन्हारी)

कुण्डलिया छंद-- तिवरा भाजी


खावँय अब्बड़ राँध के, आलू सेमी संग।

तिवरा बटकर साग हा, आवय मजा मतंग।।

आवय मजा मतंग, खाय मा येकर होरा।

पाथें सबो किसान, फसल ला बोरा-बोरा।।

ओली भर-भर रोज, टोर के तिवरा लावँय।

येकर भाजी साग, राँध के सब झन खावँय।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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 कुण्डलिया छंद-- तिवरा-बटरा


तिवरा-बटरा मा दिखय, सुग्घर सबके खेत।

रखवारी सब्बो करँय,  बने लगाके चेत।।

बने लगाके चेत,  करँय गा पोठ किसानी।

दार खवाथे रोज, चलय सुग्घर जिनगानी।।

देख-देख ललचाय, खाय बर सबके जिवरा।

हरियर-हरियर खेत, दिखय जी बटरा-तिवरा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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कुंडलिया 

तिवरा भाजी टोर के,ब इठे बंधिया पार।

खाले गजब सुवाद हे, धनिया मिरचा डार।।

धनिया मिरचा डार,ए भाजी बड़ मिठाथे।

जे  नी खावय तेन,घलो ग चाट के खाथे।।

फूलय नीला लाल,एको ठन दिखते पिवरा।

का कहिबे जी बात,लसालस भाजी तिवरा।।

        जलेश्वर दास मानिकपुरी ✍️ मोतिमपुर बेमेतरा

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: उतेरा,उन्हारी 

बरवै छ्न्द -

तिवरा बटकर डारे, आलू संग।

खावत ही बड़ कुलके, आठो अंग।।


गोलेंदा भाटा मा, बटकर डार।

राँध महीं मा चाहे, भूँज बघार।।


खावत आवत हावय, भारी स्वाद।

मिलथे मौका बच्छर, दिन के बाद।।


तिवरा भाजी के हे, अड़बड़ माँग।

खुला घलो ला रखथें, घर घर टाँग।।


चौमासा मा आथे, सुग्घर काम।

सब्जी मन के रहिथें,अलकर दाम।।


चना चनौरी भाजी, गजब सुहाय।

बिना महीं के अमसुर,घात जनाय।।


चाकर चाकर भाजी,उरीद पान।

येला खाये ले नइ, तीपय कान।।


खाये मन नइ माने, कतको बाँध।

कहिथें तिवरा भाजी, बटकर राँध।।


बटरी बटरा तिवरा, खेत उतेर।

कुसुम तिली अउ सरसों, अरसी पेर।।


राहर चना मटर अउ, उरीद दार।

चांँट-चाँट के खावय, डकार मार।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी


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[12/21/2025, 7:03 PM] ज्ञानू : विषय- उन्हारी/ ओन्हारी 

छंद - विष्णुपद 


धान लुवें के बाद उन्हारी, बोववँ खेत चलौ|

किसिम- किसिम के सब्जी- भाजी, करबों चेत घलौ||


मेड़पार राहेर लगे हे, फदके हे तिंवरा|

धारेधार चना भदराये, निक सरसों पिंवरा||


धनहा- डोली हरियर- हरियर, हे लहरात गहूँ|

नइये संसो कुछु कहिके गा, जा तँय घूम कहूँ||


भर्री मा अरसी बोवाएं, कहूँ मटर- बटरा|

देख चोरहा मनके नइते, रहिथे बड़ खतरा||


हरिया भर मसूर बोवाएं, गरुवा हे हरही|

चेत लगा करहूँ रखवारी, गोल्लर हा चरही||


भाटा, पालक, मुरई, धनिया, अउ  पताल मिरचा|

जतन करें बर गा सँगवारी, बड़ लगथे खरचा||


खेत- किसानी के बूता हा, आसानी नइये|

बिना किसानी के दुनिया मा, जिनगानी नइये||


आय जमाना महँगाई के, मूड़ किसान धरे|

संसो कर सरकार हमर बर, हाय परान करे||


ज्ञानु

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[12/22/2025, 11:57: नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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[12/25/2025, 9:36 PM] अमृतदास साहू 12: विषय - ओन्हारी 

विधा - सार छंद 


नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी। 

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसों भारी।


लाख लाखड़ी बटरा अरसी,गहूंँ चना बड़ माते।

हरियर हरियर दिखे खेत हर,लागे सुग्घर घाते।

खेत खार के माँघ पूस मा,राहय अलग चिन्हारी।

नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसो भारी।


गजब मिठावय लाख लाखड़ी,अउ सरसो के भाजी।

राखे राहय सुघर सिल्होके,सुक्सा आजा आजी।

खावन संगी सबझन अड़बड़,चाँट चाँट के थारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


मजा उड़ा के खावन संगी,चना गहूँ भुँज होरा।

खई खजाना जस राखे राहयँ,घर घर झोरा झोरा।

राखे जावन ओन्हारी ला,सबझन आरी पारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


अमृत दास साहू 

  राजनांदगांव


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[12/25/2025, 10:49 PM] रविबाला ठाकुर : छत्तीसगढ़ के उतेरा, उन्हारी

विषय-भाजी


तिंवरा बटरा अउ चना, माते खेतन खेत।

हरियर हरियर निक लगे, ऑंखी ला सुख देत।।


बूढ़ी दाई गय हवय, नतनिन बहू समेत।

मूठा भर भर टोर के , झोला मा धर लेत।।


तीली मिरचा डार के, छन ले बने बघार।

पारा भर ममहा जही, गिरही सबके लार।।


माली धर काकी कही, थोकिन दे दे साग।

महॅंगा हे भाजी गजब, चालिस रुपिया भाग।।


रविबाला ठाकुर

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[12/27/2025, 12:35 PM] Dropdi  "ओन्हारी"

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ  मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।। 


ऊपर चक ले ढारत पानी, खाल्हे तनी निथारे।

ढरकय पानी खेत खार ले, तभे उतेरा डारे।।

खेत खार मा पानी के जब, टूट जाय जी धारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


धान लुवाई के पहिली गा, तिँवरा करे उतेरा।

पानी ला राखे चपचपहा, नित्ता जाने बेरा।।

जिल्लो ला जानव गा करगा, सौ-साँझे‌ चटकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


रचे ढेलवानी सिघियाके, मेंड़ पार ओनारे।

राहर तिल बेलियामूँग हा, भदरे मुस्की ढारे।।

चना गहूँ ला रखे अपासी, गहद लगे मनहारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


नगदी फसल कहे जाथे गा, ये हे रबी किसानी।

थोरिक मिहनत लगथे सकला, खोंचखाच भर पानी।।

दार घरोघर चुरथे खाथें, घुघरी अउ तरकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

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[12/27/2025, 5:37 PM] +91 99265 58239: ""ओन्हारी""  घनाक्षरी 


तिवरा चना के फर, याद आथे पल पल, गाँव मा रेहेन बने, भूंज भूंज खान जी।


पैरा के आगी ताप, मन रहै बने साफ, दाई ददा के मार मा, बने मया पान जी।


कतको कर ले अति, नइ होय कोनो छति, मुच मुच हाँस बने,  होगेन जवान जी।


 होगे नोहर होरा हा,   सब छुटगे कोरा हा, बाढे जिनगी के बोझा,  कोन कोती जान जी।।

  संजय देवांगन सिमगा 

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