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Tuesday, January 6, 2026

नवा साल परब तिहार

नवा साल  परब तिहार


: *मनहरण घनाक्षरी छंद* 


*नव वर्ष श्रेष्ठ बनें,*

    *नये राग तर्ज बनें,*

     *आज सभी मिल कर,*

                *प्रेम -गीत गाइए।*


*नव पथ बढ़े चलें,*

  *नये गीत गढ़े चलें,*

     *एक-एक पल क्षण,*

           *प्रेम को बढ़ाइए।।*


*सभी से मिलन करो* 

   *सुख में जीवन भरो,*

        *तम दूर करने को,* 

            *भोर को बुलाइए।*


*खुशियों में साल बीते ,*

       *हँसी से न गाल रिते,*

      *सभी को मंज़िल मिले,*

                 *ऐसे पथ  पाइए।।*


*सुमित्रा शिशिर*

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रोला

नवा बछर के आत,विदा हो जाही जुन्ना। 

सुरता आही रोज,सबो ला लगही सुन्ना।।

दुख-सुख सब मा संग,रहिस वो बन के संगी। 

बखत पहागे फेर,निकल गे कतको तंगी।। 

अँचरा बाँधव आज ये,पाये हंँव जो सोझ मैं। 

बिसरा अंते गोठ ला, हलका कर दँव बोझ मैं।। 


नवा बछर पगराव,झूम के नाचव गाओ। 

जिनगी के दिन चार,बने रद्दा अपनाओ।। 

करव नीक संकल्प,सबे अब डर ला छोड़ो। 

अपन करम ले फेर,कभू तुम मुँह झन मोड़ो।। 

अपन धीर विश्वास ले,पूरा कर लव आस ला। 

हिरदय मा सपना सँजो,छूवव बने अगास ला।।


पल्लवी झा(रूमा) 

रायपुर छत्तीसगढ़

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नवा साल

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(चौपाई छंद)


नवा साल के हवय बधाई। छाहित राहय सारद माई।।

धन दौलत सुख सेहत पावव। फूल सहीं हरदम मुस्कावव।।


 कलम बनै जी सबके हितवा।  गिरे परे के खाँटी मितवा।।

 कालजई साहित सिरजावव। भारत माँ के जस बगरावव।।


 नवा साल मा अइसे ठानौ। गाँव शहर खुशहाली लानौ।।

 करम फसल हो सोला आना।पोठ रहय सब दाना दाना ।।


 रद्दा के काँटा बिन लेहू। अउ सपाट गड्ढा कर देहू।।

 मातु पिता गुरु मन सुख पाहीं। आसिस के फुलवा बरसाहीं।।


नवा साल के सुरुज नवा हे। नवा बिहनिया  नवा हवा हे।।

नवा इरादा ठानौ भाई। माँजौ हिरदे फेंकौ काई।।


 चलौ बाँटबो भाईचारा। हवय नेवता झारा झारा।।

 अलख प्रेम के चलौ जगाबो। असली मनखे तब बन पाबो।।


जात पाँत के आँट ढहाके। सबो धरम के मान बढ़ाके।।

 देश प्रेम के भाव जगाबो। चलौ तिरंगा ला फहराबो।।


 आलस बैरी ले दुरिहाके।मिहनत के हम जोत जलाके।।

 गार पसीना रोटी खाबो।जिनगी मा उजियारा लाबो।।


 साल छबिस हा खड़े दुवारी। हैप्पी काहत हे सँगवारी।।

 हमरो कोती ले न्यू ईयर।गाड़ा गाड़ा हैप्पी डियर।।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

हथबन्द,छत्तीसगढ़


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 *छेर-छेरा* 

*सरसी छंद* 

आज छेर-छेरा माँगत हें, लइका सबो सियान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


डंडा नाचत गावत हें गा, गली-खोर अउ द्वार।

ढोलक मँजिरा झाँझ बजावत, मानत हवें तिहार।।

दीदी-बहिनी सुवा गीत के, गावत हें सब गान।

पारा बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।


बरा ठेठरी-खुर्मी चीला, सब बनात हें आज।

लीपे पोते हें घर अँगना,  करके खेती काज।।

दया-मया के गुरतुर बोली, बने मिलत हे मान।

पारा-बस्ती अउ घर-घर मा, देवत हावँय दान।।

*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला-कोरबा*

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: गीतिका- पूस पुन्नी छेर-छेरा

2122 2122 2122 212


पूस पुन्नी छेर-छेरा पर्व पावन दान के।

पर्व पावन पावनी नदिया म पबरित स्नान के।

स्नान करके दान करले ज्ञान अउ धन धान के।

दान के अवसर मिले हे शुक्र हे भगवान के।


रचना- सुखदेव सिंह अहिलेश्वर


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तरिया


  : काल कस तरिया (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब बाढ़ही, मनखे करही राज।*

*जीव जंतु झूमत हवै,पेड़ पात सँग आज।*


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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[12/8/2025, 7:40 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया छंद*


तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी जल भरैं, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान हा, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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बिषय------- तरिया 


अब तरिया बाचिस नहीं, धरिस शहर के रूप।

पाट-पाट होटल बनिस, जिहाँ मिलय अब सूप।


तरिया पालय गाँव ला, गरुवा गाय समेत।

खेत खार सीचय घलो, पालय सबके पेट।


कमल सिंघरा ढेस अउ, परय पुराइन पान।

मछरी झिगरा पाल के, होवय सब धनवान।।


शोभा बाढ़य गाँव के, खिलय कमल के फूल।

दाई अइसन जानके, धोवय मन के धूल।।


जोंक असन मनखे जमो, चूसत हावय खून।

कागज मा तरिया बनें, मेंटत हे सब पून।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' 

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[12/10/2025, 12:52 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*सार छंद*

*16,12*

 तरिया भीतर पुरइन राहय, कमल फूल बड़ सोहै।

रंग बिरंगी फूल खोखमा, देखत मन ला मोहै।।

ढेंस रतालू कुकरी काँदा, टोर पोखरा लावैं।

का सियान अउ लइका सबझन,  मजा मार के खावैं।।


तौरत राहँय पनबूड़ी मन, सारस ध्यान लगावै।

संझातीकन के बेरा मा, तरिया पार सुहावै।।

बर पीपर अउ आमा गस्ती, राहय चारो मूड़ा।

काँटा खूँटी नइ राहय जी, दिखै नहीं कुछु कूड़ा।।


पीयँय पानी तरिया के सब, तनमन ला फरियावैं।

घाट घटौंधा सफ्फा राखँय, लद्दी साफ करावैं।।

कूड़ा करकट डिस्पोजल मा, तरिया आज पटागे।

मतलाहा दिखथे पानी हा, छूये मन नइ लागे।।


सकलावत हे चारो कोती, अतिक्रमण के मारे।

ध्यान कहूँ नइ देवत हावँय, झंझट कोन उबारे।।

धीरे-धीरे तरिया डबरी, आज नँदा जाही का।

तरिया कइसन होथे तेला, किस्सा म बताही  का।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर*

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[12/11/2025, 10:20 AM] तातुराम धीवर : आल्हा छ्न्द - 16, 15


तरिया के का हाल सुनावँव, देख चढ़े बड़ जोर बुखार।

जब ले घर घर नल जल आहे, तरिया डबरी परे बिमार।।


पानी रहि से कजला कंचन, दरपन जइसे दगदग साफ।

रदखद कचरा मा अब पटगे, जिनगी इनकर होगे हाफ।।


मेंड़ पार सब घुरवा बनगे, फेंकय कचरा घर ले लान।

जन जन ले दुरिया गे हावय,पहिली जस अब नइ ये मान।।


पानी पीयँय सबो परानी, हँउला गगरी भरके लाय।

पावन निर्मल मन हो जावय, शीतल पानी मा हे नहाय।।


थारी जइसे चाकर चाकर, राहँय सुग्घर पुरइन पान।

फूल खोखमा ढेंस रतालू, काँदा लावँय गहरी खान।।


निर्मल राहय गंगा जइसे, आज दिखय घुरवा जस नीर।

स्वारथ भरगे मनखे भीतर, कोन सुनय तरिया के पीर।।


घाट घठौंधा पचरी सुग्घर, सुग्घर राहय रद्दा बाट।

मँदहा मन के अड्डा बनगे, रदियागे सब निर्मल घाट।।


जागव जागव बहिनी भाई, जागव संगी मोर मितान।

तरिया डबरी ताल तलैया, इँखर सुरक्षा बर दव ध्यान।।


सब जीव जन्तु के निस्तारी, तरिया आवय पालनहार।

इन ला आज बचाना हावय, ले लव अपन खाँध मा भार।।


आवव सब झन खावन किरिया, करन नहीं हम अइसन भूल।

कब्भू नइ फेंकन तरिया मा, हूम धूप पूजा के फूल।।


     तातु राम धीवर 

भैसबोड़ जिला धमतरी

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[12/11/2025, 8:43 PM] Jaleshwar Das Manikpuri 21: तरिया -रोला 

सुन्ना तरिया आज,बतावत कहय कहानी।

नाली पानी धार,होय ग गंदला पानी।।

चाकर तरिया तंग,होगे धनहा बानी।

अलकरहा ए चाल, रे मनखे के सियानी।।

                 दोहा 

संकट के दिन आज हे,कहिथे तरिया घाट।

माटी पथरा डार के, मोर मिटावत ठाठ।।

  जलेश्वर दास मानिकपुरी 

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*रोला छंद--तरिया* 

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घर मा नल-जल आज,कोन अब तरिया जावय।

निस्तारी-असनाँद,सबो घर मा निपटावय।।

तरिया कोती चेत ,कहाँ ले जाही काकर।

हवँय सँकीरन सोच, लोभ लोगन के चाकर।।


तरिया के उपयोग,करँय कमती मनखे मन।

होय सिंचाई काम,थोर किन मछरी पालन।।

तबहे तरिया-ताल,पटावँय बनँय इमारत।

ले विकास के नाँव,प्रकृति के बदलँय सूरत।।


दीपक निषाद--लाटा (बेमेतरा)

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[12/12/2025, 7:39 PM] भागवत प्रसाद, डमरू बलौदा बाजार 15: *तरिया*

*कुण्डलिया 

तरिया  रोवत आज हे, अपन दशा ला देख।

रूप रहिस सुघ्घर कभू, उपयोगी अनलेख ।।

उपयोगी अन लेख, बात कोनो नइ मानँय।

नइ हें कहूँ सियान, जौन गुण मोर बखानँय।।

कतको मनखें आज , फेंकथें कचरा फरिया।

घटत अपन आकार, देख रोवत हे तरिया।।


गहिरा राहँव पोठ के, बड़का -बड़का मेड़।

पानी हा सप्फा रहै, हरियर राहय पेड़।।

हरियर राहय पेड़,  छाँव मा सब सुरतावैं।

हउला मरकी हाथ, नहावत  सुशी बुतावैं।।

छिछलत पुरइन पान, मोह लेवय मन बहिरा।

फूलै कमल के फूल, बीच तरिया में गहिरा।।


स्वारथ खातिर लोग अब, पाटत हावँय आज।

तरिया सोंचत रात दिन, कोन बचाही लाज।।

कोन बचाही लाज, सबो के नियत गड़े हे।

लूटे बर मरजाद, एक ले एक खड़े हे।।

भरे सबो मन मैल, कोन करही परमारथ।

नइ बाँचय अब प्राण, भरे सबके मन स्वारथ।।


मन मा गुनथँव आज मैं, का होही भगवान।

का ओ दिन आही कभू, होही मोरो मान।।

होही मोरो मान, भरे गोदी मा लद्दी।

पानी बदबूदार, भरे जन देवत बद्दी।।

कोन कराहीं साफ,  बांधहीं पचरी तन मा।

रइही नाम निशान, मोर मैं गुनथँव मन मा।।


*भागवत प्रसाद चन्द्राकर


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अमृतदास साहू 12: *विधा- सार छंद*

        *विषय - तरिया* 


तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।

आज काल तो भइगे संगी, घुरवा असन पटागे।


घटत दिनों दिन हावय संगी, तरिया के नहवइया।

पहली तरिया ला मानय गा,जइसे गंगा मइया।

अब तो लगथे गाँव-गाँव ले,तरिया घलो नँदागे।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


तइहा के बेरा तरिया मा,होय सबे निस्तारी।

छत्तीसगढ़ी परम्परा के,राहय एक चिन्हारी।

सुन्ना परगे घाट घटौंदा,पानी घलो अँटागे।

तइहा के बेरा मा तरिया, सुग्घर पबरित लागे।


नांदगांव रानी सागर के,राहय अलग चिन्हारी।

अउ रइपुर के बूढ़ा तरिया,लागय जस महतारी।

देख रेख के अभाव मा अब,अलकरहा मइलागे ।

तइहा के बेरा मा तरिया,सुग्घर पबरित लागे।


अमृत दास साहू 

 राजनांदगांव

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   कुण्डलिया छंद "तरिया"

तरिया के बड़ मोल हे, राखव येला साफ।

सबो जीव के आसरा, करथे सब ला माफ।।

करथे सब ला माफ, जीव तरथे जी जेमा।

कचरा दव झन फेंक, घात पबरित हे तेमा।।

तरिया के दिल देख, नेक हे नइ हे करिया।

गिनहा बने सकेल, साफ कर देथे तरिया।।


तरिया कोड़े खार मा, सब के बूझे पियास।

सबो जीव जुरिया जथे, पानी बर धर आस।।

पानी बर धर आस, घाट मा पीथे पानी।

का जंगल के जीव, गाँव के जम्मों प्रानी।।

लेवव जम्मों सीख, एक होवव झन छरिया।

मनुख-मनुख हन एक, एक जस दुनिया तरिया।।


महिमा हवय अपार जी, तरिया हमर सियान।

हिरदे बड़का राख के, गहरा राखे ज्ञान।।

गहरा राखे ज्ञान, मान तब बड़का पाथे।

गिनहा बने सरेख, पेट मा तभे पचाथे।।

सबके हित हो जाय, गोठ भा जाय सही मा।

तरिया सही सियान, एक दोनों के महिमा।।


द्रोपती साहू "सरसिज"


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छत्तीसगढ़ के उतेरा उन्हारी)


 रवि फसल

चना मटर अलसी सबो, बोथे सबझन खेत।

सरसों जीरा सौंफ ला, बो दौ करके चेत।।

बो दौ करके चेत, खेत मा सबला बोहा।

मक्का अलसी बोय, बुद्धि तन बर हे लोहा।।

रबि कटथे मार्च,फसल धरथे सब मनभर।

धरथे मींस किसान, पाय धन अड़बड़ सुघ्घर।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' ✍️बिलासपुर

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सार

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तिवरा भाजी अड़बड़ गुरतुर,अगहन- पूस म आथे।

हरियर-हरियर कोंवर-कोंवर,भाजी गजब मिठाथे।।


ए भाजी हर जड़काला के,आए राजा भाजी।

एला खाए बर लइका ले,बुढ़वा रहिथें राजी।।


भाव भले छूवय अगास ला,लोगन तभो बिसाथें।

दार डार दे सुघ्घर फोरन,साग राँध के खाथें।।


दीपक निषाद--लाटा (भालेसर)

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: (छत्तीसगढ़ के उन्हारी)

कुण्डलिया छंद-- तिवरा भाजी


खावँय अब्बड़ राँध के, आलू सेमी संग।

तिवरा बटकर साग हा, आवय मजा मतंग।।

आवय मजा मतंग, खाय मा येकर होरा।

पाथें सबो किसान, फसल ला बोरा-बोरा।।

ओली भर-भर रोज, टोर के तिवरा लावँय।

येकर भाजी साग, राँध के सब झन खावँय।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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 कुण्डलिया छंद-- तिवरा-बटरा


तिवरा-बटरा मा दिखय, सुग्घर सबके खेत।

रखवारी सब्बो करँय,  बने लगाके चेत।।

बने लगाके चेत,  करँय गा पोठ किसानी।

दार खवाथे रोज, चलय सुग्घर जिनगानी।।

देख-देख ललचाय, खाय बर सबके जिवरा।

हरियर-हरियर खेत, दिखय जी बटरा-तिवरा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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कुंडलिया 

तिवरा भाजी टोर के,ब इठे बंधिया पार।

खाले गजब सुवाद हे, धनिया मिरचा डार।।

धनिया मिरचा डार,ए भाजी बड़ मिठाथे।

जे  नी खावय तेन,घलो ग चाट के खाथे।।

फूलय नीला लाल,एको ठन दिखते पिवरा।

का कहिबे जी बात,लसालस भाजी तिवरा।।

        जलेश्वर दास मानिकपुरी ✍️ मोतिमपुर बेमेतरा

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: उतेरा,उन्हारी 

बरवै छ्न्द -

तिवरा बटकर डारे, आलू संग।

खावत ही बड़ कुलके, आठो अंग।।


गोलेंदा भाटा मा, बटकर डार।

राँध महीं मा चाहे, भूँज बघार।।


खावत आवत हावय, भारी स्वाद।

मिलथे मौका बच्छर, दिन के बाद।।


तिवरा भाजी के हे, अड़बड़ माँग।

खुला घलो ला रखथें, घर घर टाँग।।


चौमासा मा आथे, सुग्घर काम।

सब्जी मन के रहिथें,अलकर दाम।।


चना चनौरी भाजी, गजब सुहाय।

बिना महीं के अमसुर,घात जनाय।।


चाकर चाकर भाजी,उरीद पान।

येला खाये ले नइ, तीपय कान।।


खाये मन नइ माने, कतको बाँध।

कहिथें तिवरा भाजी, बटकर राँध।।


बटरी बटरा तिवरा, खेत उतेर।

कुसुम तिली अउ सरसों, अरसी पेर।।


राहर चना मटर अउ, उरीद दार।

चांँट-चाँट के खावय, डकार मार।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी


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[12/21/2025, 7:03 PM] ज्ञानू : विषय- उन्हारी/ ओन्हारी 

छंद - विष्णुपद 


धान लुवें के बाद उन्हारी, बोववँ खेत चलौ|

किसिम- किसिम के सब्जी- भाजी, करबों चेत घलौ||


मेड़पार राहेर लगे हे, फदके हे तिंवरा|

धारेधार चना भदराये, निक सरसों पिंवरा||


धनहा- डोली हरियर- हरियर, हे लहरात गहूँ|

नइये संसो कुछु कहिके गा, जा तँय घूम कहूँ||


भर्री मा अरसी बोवाएं, कहूँ मटर- बटरा|

देख चोरहा मनके नइते, रहिथे बड़ खतरा||


हरिया भर मसूर बोवाएं, गरुवा हे हरही|

चेत लगा करहूँ रखवारी, गोल्लर हा चरही||


भाटा, पालक, मुरई, धनिया, अउ  पताल मिरचा|

जतन करें बर गा सँगवारी, बड़ लगथे खरचा||


खेत- किसानी के बूता हा, आसानी नइये|

बिना किसानी के दुनिया मा, जिनगानी नइये||


आय जमाना महँगाई के, मूड़ किसान धरे|

संसो कर सरकार हमर बर, हाय परान करे||


ज्ञानु

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[12/22/2025, 11:57: नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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[12/25/2025, 9:36 PM] अमृतदास साहू 12: विषय - ओन्हारी 

विधा - सार छंद 


नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी। 

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसों भारी।


लाख लाखड़ी बटरा अरसी,गहूंँ चना बड़ माते।

हरियर हरियर दिखे खेत हर,लागे सुग्घर घाते।

खेत खार के माँघ पूस मा,राहय अलग चिन्हारी।

नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसो भारी।


गजब मिठावय लाख लाखड़ी,अउ सरसो के भाजी।

राखे राहय सुघर सिल्होके,सुक्सा आजा आजी।

खावन संगी सबझन अड़बड़,चाँट चाँट के थारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


मजा उड़ा के खावन संगी,चना गहूँ भुँज होरा।

खई खजाना जस राखे राहयँ,घर घर झोरा झोरा।

राखे जावन ओन्हारी ला,सबझन आरी पारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


अमृत दास साहू 

  राजनांदगांव


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[12/25/2025, 10:49 PM] रविबाला ठाकुर : छत्तीसगढ़ के उतेरा, उन्हारी

विषय-भाजी


तिंवरा बटरा अउ चना, माते खेतन खेत।

हरियर हरियर निक लगे, ऑंखी ला सुख देत।।


बूढ़ी दाई गय हवय, नतनिन बहू समेत।

मूठा भर भर टोर के , झोला मा धर लेत।।


तीली मिरचा डार के, छन ले बने बघार।

पारा भर ममहा जही, गिरही सबके लार।।


माली धर काकी कही, थोकिन दे दे साग।

महॅंगा हे भाजी गजब, चालिस रुपिया भाग।।


रविबाला ठाकुर

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[12/27/2025, 12:35 PM] Dropdi  "ओन्हारी"

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ  मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।। 


ऊपर चक ले ढारत पानी, खाल्हे तनी निथारे।

ढरकय पानी खेत खार ले, तभे उतेरा डारे।।

खेत खार मा पानी के जब, टूट जाय जी धारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


धान लुवाई के पहिली गा, तिँवरा करे उतेरा।

पानी ला राखे चपचपहा, नित्ता जाने बेरा।।

जिल्लो ला जानव गा करगा, सौ-साँझे‌ चटकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


रचे ढेलवानी सिघियाके, मेंड़ पार ओनारे।

राहर तिल बेलियामूँग हा, भदरे मुस्की ढारे।।

चना गहूँ ला रखे अपासी, गहद लगे मनहारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


नगदी फसल कहे जाथे गा, ये हे रबी किसानी।

थोरिक मिहनत लगथे सकला, खोंचखाच भर पानी।।

दार घरोघर चुरथे खाथें, घुघरी अउ तरकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

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[12/27/2025, 5:37 PM] +91 99265 58239: ""ओन्हारी""  घनाक्षरी 


तिवरा चना के फर, याद आथे पल पल, गाँव मा रेहेन बने, भूंज भूंज खान जी।


पैरा के आगी ताप, मन रहै बने साफ, दाई ददा के मार मा, बने मया पान जी।


कतको कर ले अति, नइ होय कोनो छति, मुच मुच हाँस बने,  होगेन जवान जी।


 होगे नोहर होरा हा,   सब छुटगे कोरा हा, बाढे जिनगी के बोझा,  कोन कोती जान जी।।

  संजय देवांगन सिमगा 

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