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Tuesday, January 6, 2026

छत्तीसगढ़ के उतेरा उन्हारी)


 रवि फसल

चना मटर अलसी सबो, बोथे सबझन खेत।

सरसों जीरा सौंफ ला, बो दौ करके चेत।।

बो दौ करके चेत, खेत मा सबला बोहा।

मक्का अलसी बोय, बुद्धि तन बर हे लोहा।।

रबि कटथे मार्च,फसल धरथे सब मनभर।

धरथे मींस किसान, पाय धन अड़बड़ सुघ्घर।।


धनेश्वरी सोनी 'गुल' ✍️बिलासपुर

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सार

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तिवरा भाजी अड़बड़ गुरतुर,अगहन- पूस म आथे।

हरियर-हरियर कोंवर-कोंवर,भाजी गजब मिठाथे।।


ए भाजी हर जड़काला के,आए राजा भाजी।

एला खाए बर लइका ले,बुढ़वा रहिथें राजी।।


भाव भले छूवय अगास ला,लोगन तभो बिसाथें।

दार डार दे सुघ्घर फोरन,साग राँध के खाथें।।


दीपक निषाद--लाटा (भालेसर)

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: (छत्तीसगढ़ के उन्हारी)

कुण्डलिया छंद-- तिवरा भाजी


खावँय अब्बड़ राँध के, आलू सेमी संग।

तिवरा बटकर साग हा, आवय मजा मतंग।।

आवय मजा मतंग, खाय मा येकर होरा।

पाथें सबो किसान, फसल ला बोरा-बोरा।।

ओली भर-भर रोज, टोर के तिवरा लावँय।

येकर भाजी साग, राँध के सब झन खावँय।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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 कुण्डलिया छंद-- तिवरा-बटरा


तिवरा-बटरा मा दिखय, सुग्घर सबके खेत।

रखवारी सब्बो करँय,  बने लगाके चेत।।

बने लगाके चेत,  करँय गा पोठ किसानी।

दार खवाथे रोज, चलय सुग्घर जिनगानी।।

देख-देख ललचाय, खाय बर सबके जिवरा।

हरियर-हरियर खेत, दिखय जी बटरा-तिवरा।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

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कुंडलिया 

तिवरा भाजी टोर के,ब इठे बंधिया पार।

खाले गजब सुवाद हे, धनिया मिरचा डार।।

धनिया मिरचा डार,ए भाजी बड़ मिठाथे।

जे  नी खावय तेन,घलो ग चाट के खाथे।।

फूलय नीला लाल,एको ठन दिखते पिवरा।

का कहिबे जी बात,लसालस भाजी तिवरा।।

        जलेश्वर दास मानिकपुरी ✍️ मोतिमपुर बेमेतरा

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: उतेरा,उन्हारी 

बरवै छ्न्द -

तिवरा बटकर डारे, आलू संग।

खावत ही बड़ कुलके, आठो अंग।।


गोलेंदा भाटा मा, बटकर डार।

राँध महीं मा चाहे, भूँज बघार।।


खावत आवत हावय, भारी स्वाद।

मिलथे मौका बच्छर, दिन के बाद।।


तिवरा भाजी के हे, अड़बड़ माँग।

खुला घलो ला रखथें, घर घर टाँग।।


चौमासा मा आथे, सुग्घर काम।

सब्जी मन के रहिथें,अलकर दाम।।


चना चनौरी भाजी, गजब सुहाय।

बिना महीं के अमसुर,घात जनाय।।


चाकर चाकर भाजी,उरीद पान।

येला खाये ले नइ, तीपय कान।।


खाये मन नइ माने, कतको बाँध।

कहिथें तिवरा भाजी, बटकर राँध।।


बटरी बटरा तिवरा, खेत उतेर।

कुसुम तिली अउ सरसों, अरसी पेर।।


राहर चना मटर अउ, उरीद दार।

चांँट-चाँट के खावय, डकार मार।।


     तातु राम धीवर 

भैंसबोड़ जिला धमतरी


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[12/21/2025, 7:03 PM] ज्ञानू : विषय- उन्हारी/ ओन्हारी 

छंद - विष्णुपद 


धान लुवें के बाद उन्हारी, बोववँ खेत चलौ|

किसिम- किसिम के सब्जी- भाजी, करबों चेत घलौ||


मेड़पार राहेर लगे हे, फदके हे तिंवरा|

धारेधार चना भदराये, निक सरसों पिंवरा||


धनहा- डोली हरियर- हरियर, हे लहरात गहूँ|

नइये संसो कुछु कहिके गा, जा तँय घूम कहूँ||


भर्री मा अरसी बोवाएं, कहूँ मटर- बटरा|

देख चोरहा मनके नइते, रहिथे बड़ खतरा||


हरिया भर मसूर बोवाएं, गरुवा हे हरही|

चेत लगा करहूँ रखवारी, गोल्लर हा चरही||


भाटा, पालक, मुरई, धनिया, अउ  पताल मिरचा|

जतन करें बर गा सँगवारी, बड़ लगथे खरचा||


खेत- किसानी के बूता हा, आसानी नइये|

बिना किसानी के दुनिया मा, जिनगानी नइये||


आय जमाना महँगाई के, मूड़ किसान धरे|

संसो कर सरकार हमर बर, हाय परान करे||


ज्ञानु

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[12/22/2025, 11:57: नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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[12/25/2025, 9:36 PM] अमृतदास साहू 12: विषय - ओन्हारी 

विधा - सार छंद 


नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी। 

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसों भारी।


लाख लाखड़ी बटरा अरसी,गहूंँ चना बड़ माते।

हरियर हरियर दिखे खेत हर,लागे सुग्घर घाते।

खेत खार के माँघ पूस मा,राहय अलग चिन्हारी।

नार बाहरा मा घटके गा,तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर,भाँठा सरसो भारी।


गजब मिठावय लाख लाखड़ी,अउ सरसो के भाजी।

राखे राहय सुघर सिल्होके,सुक्सा आजा आजी।

खावन संगी सबझन अड़बड़,चाँट चाँट के थारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


मजा उड़ा के खावन संगी,चना गहूँ भुँज होरा।

खई खजाना जस राखे राहयँ,घर घर झोरा झोरा।

राखे जावन ओन्हारी ला,सबझन आरी पारी।

नार बाहरा मा घटके गा, तइहा बड़ ओन्हारी।

मेड़ पार मा लहसे राहर, भाँठा सरसो भारी।


अमृत दास साहू 

  राजनांदगांव


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[12/25/2025, 10:49 PM] रविबाला ठाकुर : छत्तीसगढ़ के उतेरा, उन्हारी

विषय-भाजी


तिंवरा बटरा अउ चना, माते खेतन खेत।

हरियर हरियर निक लगे, ऑंखी ला सुख देत।।


बूढ़ी दाई गय हवय, नतनिन बहू समेत।

मूठा भर भर टोर के , झोला मा धर लेत।।


तीली मिरचा डार के, छन ले बने बघार।

पारा भर ममहा जही, गिरही सबके लार।।


माली धर काकी कही, थोकिन दे दे साग।

महॅंगा हे भाजी गजब, चालिस रुपिया भाग।।


रविबाला ठाकुर

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[12/27/2025, 12:35 PM] Dropdi  "ओन्हारी"

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ  मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।। 


ऊपर चक ले ढारत पानी, खाल्हे तनी निथारे।

ढरकय पानी खेत खार ले, तभे उतेरा डारे।।

खेत खार मा पानी के जब, टूट जाय जी धारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


धान लुवाई के पहिली गा, तिँवरा करे उतेरा।

पानी ला राखे चपचपहा, नित्ता जाने बेरा।।

जिल्लो ला जानव गा करगा, सौ-साँझे‌ चटकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


रचे ढेलवानी सिघियाके, मेंड़ पार ओनारे।

राहर तिल बेलियामूँग हा, भदरे मुस्की ढारे।।

चना गहूँ ला रखे अपासी, गहद लगे मनहारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


नगदी फसल कहे जाथे गा, ये हे रबी किसानी।

थोरिक मिहनत लगथे सकला, खोंचखाच भर पानी।।

दार घरोघर चुरथे खाथें, घुघरी अउ तरकारी,

राहर तिँवरा लाखन बटरा, बटरी कुल्थी भारी।

उरिद मूँग अउ मसरी अरसी, किसम-किसम ओन्हारी।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

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[12/27/2025, 5:37 PM] +91 99265 58239: ""ओन्हारी""  घनाक्षरी 


तिवरा चना के फर, याद आथे पल पल, गाँव मा रेहेन बने, भूंज भूंज खान जी।


पैरा के आगी ताप, मन रहै बने साफ, दाई ददा के मार मा, बने मया पान जी।


कतको कर ले अति, नइ होय कोनो छति, मुच मुच हाँस बने,  होगेन जवान जी।


 होगे नोहर होरा हा,   सब छुटगे कोरा हा, बाढे जिनगी के बोझा,  कोन कोती जान जी।।

  संजय देवांगन सिमगा 

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