माघ महीना-छंदबद्ध कविता
[1/10, 1:28 PM] Dropdi साहू 15 Sahu:
छप्पय छंद -"माघ महीना"
मन ला सुग्घर भाय, आय ले माघ महीना।
फरियर दिखे अगास, जाड़ लागे झिनाझिना।।
रुसरुस बने सुहाय, घाम जोड़ी जाड़ा के।
हलुहलु बिसरत जाय, जाड़ बइरी हाड़ा के।।
पूस भागती जाय ले, माघ मया ले आय जी।
लजकुरहीन लजाय हे, लाग लगिन लगवाय जी।।
लिहे सुवारी आस, मउर बाँधे बर आमा।
गुछी गुछी कोचियाय, माघ पहिरे पैजामा।।
किसम किसम के फूल, झूल पहिरे हे बारी।
आवत देख बसंत, कोइली हे मतवारी।।
लगे सोलवाँ साल हे, परसा फुलवा लाज मा।
लहकत लाली गाल हे, लाल रंग के साज मा।।
आरो दय मधुमास, माघ के पुरवाही मा।
महर महर ममहाय, फूल आवाजाही मा।।
मँगनी लगिन धराय, जान के मुहुरुत नित्ता।
कतको करे बिहाव, फेर हो जाय सुभित्ता।।
माघी पुन्नी आय ले, मेला गजब भराय जी।
नदिया मा असनान के, शिव के दर्शन पाय जी।।
द्रोपती साहू "सरसिज"
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[1/18, 9:57 AM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *माघ महीना (गीतिका छंद)*
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माघ महिना आय ले कमती जनावय जाड़ हा।
रौनिया भावय गजब नइ कँपकँपावय हाड़ हा।।
आय रितुराजा घलो सुघ्घर लगय चहुँओर जी।
देख परसा मौर सरसो नाचथे मन मोर जी।।
दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी) बेमेतरा
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[1/24, 7:55 AM] तातुराम धीवर 21: आल्हा छन्द-
माघ महीना पावन पबरित, सबके मन हावय हर्षाय।
हाँसत कुलकत मौर बाँध के, देखव राजा बसंत आय।।
मकर संक्रांति के शुभ बेरा,दान पून कर धरम कमाय।
बाँधय घर घर तिलि लाड़ू , लइका मन पतंग उड़ियाय।।
माघ महीना मँगनी जँचनी, बिहा तेल हे लगिन धराय।
नोनी बाबू करय सगाई, पर्रा बिजना मौर बिसाय।।
माघ महीना आमा मौरे, परसा सरसों हे मन भाय।
महर महर महमावय धरनी, पुरवाई हे गीत सुनाय।।
तिथि पंचमी बसंत परब हे, मातु सारदा के गुण गाय।
पूजन करके महतारी के, भगतन हे अंतस उजराय।।
ज्ञान कला संगीत कला के, होवय अड़बड़ हे बढ़वार।
पार लगावय मझधारा मा, खेवय नाँव धरे पतवार।।
माघी पुन्नी शिव दरसन बर, देव मनुज तन धरके आय।
गावय बम बम बम शिव भोला, चिमटा डमरू ढोल बजाय।।
होत बिहनिया पुन्य काल मा, गंगा मा सब डुबक नहाय।।
अइसन सुग्घर माघ महीना, मन पावन निर्मल हो जाय।
तातु राम धीवर
भैसबोड़ जिला धमतरी
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