बसंत विशेष छंदबद्ध सृजन
[1/28, 2:50 PM] तातुराम धीवर 21:
सरसी छ्न्द -16, 11
नइ तो जादा जाड़ा लागय, नइ तो लागय घाम।
नइ तो जादा कनकन लागय,नइ तो तीपय चाम।।
मउसम बड़ा सुहावन हावय, होय शीत के अंत।
देखव आगे हाँसत कुलकत, मस्ती भरे बसंत।।
ऋतु बसंत के आये ले जी, खिलय प्रकृति के अंग।
अंग-अंग हरियाली छावय, दिखय अनेकव रंग।।
पीँयर -पीँयर सरसों फूलय, परसा फूलय लाल।
जउने देखय तउने बोलय, प्रकृति हावय कमाल।।
नवाँ-नवाँ उलहोवय पाना, रंग बिरंगी फूल।
रखव सदा सनमान प्रकृति के, झिन जावव जी भूल।।
चिरई-चिरगुन जीव-जंतु मा, अड़बड़ के उत्साह।
देखत लागय ऋतु बसंत हे, खड़े पसारे बाँह।।
परब महाशिवरात्रि पंचमी, होरी हर्सोल्लास।
पावन तिहार ऋतु बसंत के, इह तीनों हे खास।।
तातु राम धीवर
भैसबोड़ जिला धमतरी
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[2/1, 10:23 PM] दीपक निषाद, बनसांकरा: *बसंत (कुण्डलिया छंद)*
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रितु बसंत के आय ले, माटी हा ममहायँ।
मउरे आमा मस्त हें,गहूँ गजब लहरायँ।।
गहूँ गजब लहरायँ,नीक सरसो फुलवा मन।
परसा सेम्हर फूल,लगयँ सुघ्घर मनभावन।।
कोयलिया मन कूक, सुनावयँ मन पसंद के।
प्रकृति करय सत्कार, सुवागत रितु बसंत के ।।
दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी)-बेमेतरा
[2/2, 8:40 AM] पात्रे जी: कुण्डलिया छन्द- *बसंत*
छाये रंग बसंत के, हरा गुलाबी लाल।
मउरे हावय आम अउ, कोयल कुहके डाल।।
कोयल कुहके डाल, बिरह के गाये गाना।
रुखवा करे किलोल, सजा तन हरियर पाना।।
रंग बिरंगी फूल, हवय बगिया महकाये।
हे रितुराज बसंत, माह फागुन मा छाये।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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[2/4, 12:25 PM] मीता अग्रवाल: *घनाक्षरी छंद*
मऊरेंआमा के डार, नदिया के आर-पार
कुहकत-कोयलिया,फरे- फूले बाग मा।
मन-डोले तन-डोले,भुनन भंवरा बोले
रितुराज रंग घोलें, फगुनिया राग मा।
गेंदा टेसु फूल फूलें, केसरिया रंग घुले,
मांदर नँगारा बाजे, फागुन के भाग-मा।
बसंत के अगुवाई,करें मिलजुल भाई,
होरी पहिली तैयारी, गावों मिल फाग-मा।
शीत नित भागत हे, धूप-छांँव जागत हे,
छिन-छिन बाढ़ें दिन,सुरूज के ठाँव मा।
बसंती हे पुरवाई,घनन घटा छाईत,
मन-मा उमंग भरे,कदंब के छाँव मा।
रितु ह सिंगार करें,डारा पाना झड़े फरे,
कामदेव बाण धरे,बांटे मया दाँव मा।
बसंती बयार बहे,रुखराई फूले फरे,
अमराई मऊरे हे,गोरी तोरे गाँव मा।।
डॉ मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़
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