Followers

Monday, May 4, 2026

सरसी छंद-पहुना बेटी*

 *सरसी छंद-पहुना बेटी*


सातो भाँवर सात वचन अउ,चुटकी भर सिंदूर।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर।।

छूट जथे सग भाई बहिनी, गाँव सखी परिवार,

खेल खिलौना संग सहेली,मंदिर तरिया पार,

गोद ददा दाई के छूटे,समय बने बड़ क्रूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर...


हाय विधाता अजब बनाए, तैंहर जग के रीत,

पर के बेटी पर के बेटा, जोड़ दिये बड़ प्रीत,

पर के कुँदरा बने बसेरा, एखर काय कसूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर....


आँसू मा भींगे अँखियाँ हर,मन मा खुशी अपार,

नवाँ नता माँ बाप पिया घर,एक नवाँ संसार,

फूल मिलय चाहे काँटा सब,नोनी ला मंजूर।।

बेटी हर पहुना बन जाथे,दुनिया के दस्तूर.......


     🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढ़ाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छ.ग.

       7354958844

*दोहा-बिहतरा कपड़ा*

 *दोहा-बिहतरा कपड़ा*


चार हाथ के चेंदरा, कइसन रीत निभाय।

काम आय ना काखरो, नाँचत खाँध लजाय।।

कोनो हर पहिरय नही, नइ कोनो हर भाय।

फेर इही फरिया बिना, पहुना घात रिसाय।।


कपड़ा नेंग बिहाव के, देथन जे उपहार।

देखा-देखी मा बने, लिलहर के मुड़ भार।।

विरथा उरकय जेब हर, पनकत साहूकार।

फँसत उधारी मा कहूँ, बेंचत खेती-खार।।


लेनदेन मा हे टिके, अगर प्रेम व्यवहार।

फेर हमर रिश्ता नता, हाबय सब बेकार।। 

हमर प्रीत के बीच मा, वस्तु बनय आधार।

चिंतन करव सुजान तब, माँगत समय सुधार।।


सोंच बने आवय नही, जब ये कखरो काम।

फेर दिखावा ले भला, का मिलही परिणाम।।

सुग्घर छाँट निमार के, देथन भारी दाम।

तब ले आय पसंद ना, देवव फेर विराम।।


का गिनहा बनही बने, नइहे जब उपयोग।

अइसन रीति रिवाज तब, हे समाज बर रोग।।

नवाँ गृहस्थी ला मिलय, जमके आशीर्वाद।

दव पंदोली थोरकिन, हो जाही आबाद।।


दू आत्मा मिलथे जिहाँ, होवय जबर उछाव।

फरिया खातिर फेर झन, मन मा आय कुभाव।।

प्रथा कहूँ अड़चन बनय, करय विवश लाचार।

छोंड़व जुन्ना रीत तब, टोरव ये दीवार।।


लगे रीत मा खोट जब, करलव बने विचार।

सुधर जही मतभेद हा, बस लगही दिन चार।।

बनही परिपाटी नवाँ, करबो जब व्यवहार।

बढ़ही देश समाज हा, होही नित उजियार।।



🙏🙏🙏🙏

नारायण प्रसाद वर्मा *चंदन*

ढाबा-भिंभौरी, बेमेतरा छग

7354958844

आल्हा छंद- *मजदूर*

 आज एक मई मजदूर दिवस मा मजदूर भाई मन ला सादर समर्पित-


 आल्हा छंद- *मजदूर*


जेखर खून पसीना ले ये, धरती चमके सोन समान।

उड़े मेहनत के खुशबू हा, बनके जग जन बर वरदान।।


जेखर दम ले दुनिया चलथे, सदा ओखरे जय-जयकार।

माथ नवाँ के गजानंद जी, करय नमन नित सौ-सौ बार।।


बड़े-बड़े घर महल अटारी, सिरजाये जे खुद के हाथ।

खेल बिधाता तोर गजब हे, आज उही हे देख अनाथ।।


लोहा काट बनावय रद्दा, देवय बज्जर फोड़ पहाड़।

नवजुग के बन इही रचयिता, भरथे शेर समान दहाड़।।


माटी सॅंग माटी हो जाथे, तब जाके उपजाथे अन्न।

भारत भुइॅंया के सेवा कर, रहिथे जी मजदूर प्रसन्न।।


भीख काखरो ले नइ माँगय, नइ तो हाथ कभू फइलाय।

अपन पसीना करम कमाई, के दम मा घर द्वार चलाय।।


कोनों छोटे बड़े नहीं हे, श्रम हा सब ले बड़े प्रधान।

सुन संगी मजदूर बचाथे, हमर देश के ऊँच मियान।।


आज मई के पहिली तारिख, आवव गढ़बो नवा सुराज।

हक अधिकार दिलाये खातिर, करबो मिलके संगी काज।।


न्याय मिलय सम्मान मिलय अउ, सबो हाथ मा राहय काम।

मजदूर हवय आधार जगत के, उॅंखर बदौलत हे सुख धाम।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

चकोर सवैया -"बनिहार के दिन"

 चकोर सवैया -"बनिहार के दिन"

एक मई गुण गावव आवव‌ देवव ये मजदूर ल मान।

ये जग मा जतका गढ़ना गढ़थे सुरता कर लौ गुणगान।।

जाँगर टोर कमावत हें जिनगी भर छाँव न हे पहिचान।

दूसर ला महला मँजला अपने घर छावत झोपड़ तान।।


झेलत हावँव जी दुख हार न मानत जींयत खावत जाँव।

खोजत जाथँव आस लगावत आज भला मिलही ग थिराँव।।

पेलत जाथँव घात पछेलत भोगत रोवत फेर मनाँव।

होवत देख खुवार खड़े मन मा बनिहार हरौं पछताँव।।


हाँसत गावत बीतत जावत हे जिनगी अब सुग्घर मोर।

चार सखा मन संग बितावत बाँटत लेवत जाँव अँजोर।।

पाथँव प्रेम पिरीत सबो मन ले बिसराथँव पीर बटोर।

तीरथ मोर हरे गँवई सगरो बर राहय गंग चिभोर।।


द्रोपती साहू "सरसिज"

दोहे

 दोहे


दोहा लिखबो मिल सबो, गुरु के आज्ञा मान।

शब्द सजाबो भाव ले, सिखबो नियम विधान।।


चार चरण के छंद हे, गति-लय यति ठहराव।

कुल मात्रा चौबीस जी, एक डाँड़ बइठाव।।


तेरह मात्रा ले सजे, विषम चरण हा जान।

ग्यारह मात्रा ले बढ़य, सम पद के जी शान।।


त्रिकल-त्रिकल दू बार हो, द्विकल बाद मा आय।

दू चौकल मिलके घलो, अठकल योग बनाय।।


गुरु-लघु-गुरु रखना सदा, विषम चरण के अंत।

सम के अंतिम छोर मा, दीर्घ-ह्रस्व हो संत।।


पचकल ले होवय नहीं, कभू चरण शुरुआत।

जगण बिठावव सोचके, ध्यान रखव ये बात।।


जगण अगर चरणांत हो, अइसे करव निदान।

त्रिकल बाद वोला रखव, कहिथे छंद विधान।।


रखव जगण ला बीच मा, तब मितान दे ध्यान।

आगू-पाछू रख द्विकल, हे उपाय आसान।।


सबो नियम ला साध के, लिख लव दोहा छंद।

पाठक के मन भाय जी, मिलही तब आनंद।।


उषाकिरण निर्मलकर

मगरलोड

धमतरी(छत्तीसगढ़)