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Thursday, June 11, 2026

पर्यावरण दिवस विशेष

 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस विशेष*


सरसी छंद- *पर्यावरण*


पर्यावरण दिवस के सब ला, हावय जय जोहार।

रुख-राई ला चलव बचाबो, सुन लौ मोर पुकार।।


रोवत हावय धरती दाई, संकट मा हे प्रान।

पेड़ उजाड़त मनखे मूरख, धरे सुवारथ ध्यान।।


नदिया नरवा कुआँ सुखागे, जल के स्तर गहिराय।

अमरित बोली अमरित पानी, कइसे अब बच पाय।।


जहर घुले हे सबो डहर अब, अधरे लटके साँस।

धुआँ कारखाना हा छोड़े, जिनगी बर बन फाँस।।


प्लास्टिक के उपयोग बढ़ाके, धरा करे बीमार।

कूड़ा कचरा ढेर लगे हे, दुर्गंध के अम्बार।।


जागव-जागव संगी सब अब, सुध लेवव जी आज।

रोकव पेड़ कटाई ला मिल, रखव धरा के लाज।।


एक-एक सब पेड़ लगावव, कर लौ नेक उदीम।

कउहा करंज कसही सॅंग मा, बर पीपर अउ नीम।।


कूक सुने बर पंछी मन के, जंगल पेड़ बचाव।

पशु-पक्षी सब जीव सुखी हो, गीत खुशी के गाव।।


आनी-बानी के संकट ला, मिलके दूर भगाव।

धरती दाई के अँचरा मा, सुख के नदी बहाव।।


करव प्रतीज्ञा मिलके जम्मो, रखबो पेड़ सहेज।

आने वाला पीढ़ी बर हम, रखबो हरियर सेज।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026

[6/5, 8:35 AM] कवि हेम: झन काँटव जंगल झाड़ी ला

‎झन काँटव जंगल झाड़ी ला, जेमन हे जिनगानी।

‎हावय सबके डेरा ओमा, झन कर तँय मनमानी।।

‎  

‎रुख राई सुग्घर घर हावय, सबके ठउर ठिकाना।

‎जीव जंतु हर ओमा रहिथे, झन तँय खोज बहाना।।

‎अपने स्वारथ बर उजार तँय, झन ककरो डेरा।

चिरई चुरगुन रोवत हावय, करहीं कहाँ बसेरा।।

‎दीया बूतागे जिनगी के, मिलय कहीं ना बाती।

‎जब कटे लगिन हे रुख राई, जरगे धरती छाती।।

‎मिले नहीं जी निरमल पुरवाई, अटकत हावे साँसी।

‎बून्द बून्द पानी बर तरसय, जिनगी होगय फाँसी।।

‎सोचव समझव आवव संगी, लगाबोन रुख राई।

‎बाग बगइचा खूब लगावन, निरमल हो पुरवाई।।

‎सुघ्घर धरती ला सम्हारन, पहिरा हरियर लुगरा।

‎मान प्रकृति के रखहूँ संगी, करहूँ झन जी उँघरा।।

‎जंगल झाड़ी रुख राई मा, कतको हवे कहानी।

‎चिरई चुरगुन जीव जन्तु के, अनमोल निसानी।।

‎-हेमलाल साहू

‎गाँव गिधवा, जिला बेमेतरा

[6/5, 1:41 PM] विजेन्द्र: कुण्डलिया छंद -विश्व पर्यावरण दिवस पर 


1.

पीपल बरगद नीम ला, संत सरीखा जानI

गुण के कतका खान ये, जिनगी बर भगवानI

जिनगी बर भगवान, हवा साँसा बर देथेI

बरसा जल गति रोक, प्रदूषण ला हर लेथेI

सहिके गरमी जाड़, हवा ला करथे शीतलI

जिनगी के आधार, नीम बरगद अउ पीपलII


2.

धरती ला बचाय बर, सुघर लगावव पेंड़I

बाचय झन कोनों जगा, मुही पार अउ मेंड़I

मुही पार अउ मेंड़, सुघर दिखही गा हरियरI

आबो-हवा सुहाय, शुद्ध करही गा फरियरI

काटव झन जी पेड़, होय झन भुइयाँ परतीI

इही उदिम हो आज, बचाये खातिर धरतीII


3.

जंगल जम्मो काट के, शहर बसे हें  आजI

घात करत मनखे खुदे, आवत नइये लाजI

आवत नइये लाज, मिटा के सब सुघराईI

हितवा हमरे ताय, काट झन गा रुखराईI

येकर ले संसार, धरा मा मंगल-मंगलI

स्वार्थ अपन तँय छोड़, बाचही तब गा जंगलII


4.

जंगल झाड़ी पेड़ ले, होथे बने बचावI 

रुकथे माटी के तभे, होथे जेन कटावI 

होथे जेन कटाव, फसल बर बड़ नुकसानीI 

आथे पूरा बाढ़, लबालब पानी-पानीI 

माटी रखव सहेज, तभे जिनगी मा मंगलI 

रोकय बने कटाव, पेड़ झाड़ी अउ जंगलII


5.

जंगल मा आरी चलय, प्यासा जम्मों खेतI

पर्यावरण सँवार लव, हो जव तुमन सचेतI

हो जव तुमन सचेत, वृक्ष हे बहुत जरूरीI

वातावरण सुधार, कामना होही पूरीI

पेड़ लगावव आज, सबो के होही मंगलI

टिके सबो संसार, नहीं काटव जी जंगलII


6.

नंदन कानन तब रिहिस, मरूभूमि हे आजI

सुधरय नइ गा आदमी, आवय नइ अउ बाजI 

आवय नइ अउ बाज, जहर महुरा घोरत हेI

काट-काट के पेड़, भाग अपने बोरत हेI 

हवा होय बेकार, रिहिस ममहवना चंदनI 

सूखा पूरा बाढ़, उजरगे कानन नंदनII


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवांँ)

[6/5, 6:50 PM] विजेन्द्र: कुण्डलिया छंद -विश्व पर्यावरण दिवस पर 


1.

पीपल बरगद नीम ला, संत सरीखा जानI

गुण के कतका खान ये, जिनगी बर भगवानI

जिनगी बर भगवान, हवा साँसा बर देथेI

बरसा जल गति रोक, प्रदूषण ला हर लेथेI

सहिके गरमी जाड़, हवा ला करथे शीतलI

जिनगी के आधार, नीम बरगद अउ पीपलII


2.

धरती के श्रृंगार बर, सुघर लगावव पेंड़I

बाचय झन कोनों जगा, मुही पार अउ मेंड़I

मुही पार अउ मेंड़, सुघर दिखही गा हरियरI

आबो-हवा सुहाय, शुद्ध करही गा फरियरI

काटव झन जी पेड़, होय झन भुइयाँ परतीI

इही उदिम हो आज, बचाये खातिर धरतीII


3.

जंगल जम्मो काट के, शहर बसे हें  आजI

घात करत मनखे खुदे, आवत नइये लाजI

आवत नइये लाज, मिटा के सब सुघराईI

हितवा हमरे ताय, काट झन गा रुखराईI

येकर ले संसार, धरा मा मंगल-मंगलI

स्वार्थ अपन तँय छोड़, बाचही तब गा जंगलII


4.

जंगल झाड़ी पेड़ ले, होथे बने बचावI 

रुकथे माटी के तभे, होथे जेन कटावI 

होथे जेन कटाव, फसल बर बड़ नुकसानीI 

आथे पूरा बाढ़, लबालब पानी-पानीI 

माटी रखव सहेज, तभे जिनगी मा मंगलI 

रोकय बने कटाव, पेड़ झाड़ी अउ जंगलII


5.

जंगल मा आरी चलय, प्यासा जम्मों खेतI

पर्यावरण सँवार लव, हो जव तुमन सचेतI

हो जव तुमन सचेत, वृक्ष हे बहुत जरूरीI

वातावरण सुधार, कामना होही पूरीI

पेड़ लगावव आज, सबो के होही मंगलI

टिके सबो संसार, नहीं काटव जी जंगलII


6.

नंदन कानन तब रिहिस, मरूभूमि हे आजI

सुधरय नइ गा आदमी, आवय नइ अउ बाजI 

आवय नइ अउ बाज, जहर महुरा घोरत हेI

काट-काट के पेड़, भाग अपने बोरत हेI 

हवा होय बेकार, रिहिस ममहवना चंदनI 

सूखा पूरा बाढ़, उजरगे कानन नंदनII


विजेन्द्र कुमार वर्मा 

नगरगाँव (धरसीवांँ)


सुधार कर पुनः 🙏

[6/5, 7:41 PM] बोधन जी: *पर्यावरण - मत्तगयन्द सवैया*


पेड़ कटावत जंगल के अब चातर होवत कोन बचाही।

जीव जिनावर जाय कहाँ इँखरो सुख सोचव जी छिन जाही।।

बाँध सुखावत नीर बिना विपदा अब देखव दौड़त आही।

चेत करौ अब पेड़ लगावव ये भुइयाँ तब तो हरियाही।।


शुद्ध हवा बिन पेड़ कहाँ अब दूषित होवत जावत हावै।

साँस इहाँ महँगा कस लागय देखव लोग बिसावत हावै।।

देख अगास धुआँ सब डाहर जाहर रूप उड़ावत हावै।

सूरज देव घलो अब तो धमका बहुते बरसावत हावै।।


बाढ़त हे गरमी अब तो नदिया-नरवा-रुख आज सुखावै।

का दिन बादर आय हवै अब सूरज देव जरावत हावै।।

नीर बिना तड़पै सब जीव बता कइसे अब प्राण बचावै।

हे भगवान करौ बरसा सब जीव इहाँ हिरदे जुड़वावै।।


रचना :-

बोधन राम निषादराज "विनायक"

सहसपुर लोहारा, जिला - कबीरधाम (छ. ग.)

[6/6, 3:44 PM] बृजलाल दावना, धमतरी: पेड़ कहे झन काटव रे -मत्तगयंद सवैया 211×7+22


स्वारथ खातिर काटत हौ ,  मनखे मन आज सबे रुखराई।

पेड़ कहे झन काटव रे ,  मँय जीयत हौं तुँहरे बर भाई ।

घेर लिही तुमला कुछु रोग त  , मैंहर देहुँ अचूक दवाई।

वंश ल मोर बचाव तभे , तुँहरो सब वंश रही सुखदाई। 



संत कहै सुनले मनवा , तरिया नदिया खँड़ पेड़ लगाबे।

काज हरे परमारथ के , जिनगी म कभू झन तैं ग भुलाबे।

सींचत साँझ बिहान सदा , अपने लइका अस तैं सुख पाबे ।

बाढ़ जही जब ओ रुखवा ,  छँइहा म तँहू हर जीव जुडाबे।


बृजलाल दावना भैंसबोड़

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