Tuesday, March 20, 2018

कुण्डलिया छन्द - शकुन्तला शर्मा,

गौरैय्या बचावव -

(1)
गौरैय्या मन मा गुनै, खाए बर दव धान
अपने मा बौराय हव, मोर बचावव प्रान।
मोर बचावव प्रान, सुखावत हावै पोटा
मुश्किल मा हे जान, सबो टूटै परकोटा।
सब्बो जीव समान, कहिस बलदाऊ भैया
खाए बर दव धान, गुनै मन मा गौरैया।

(2)
गौरैय्या - खाही बने, देहे हाववँ भात
भुखही हावै खात हे, दाल भात हे तात।
दाल भात हे तात, फूँक के खावत हावै
मोरे टठिया तीर, बैठ के बढिया खावै।
संगी कस दिन रात, खेलथन भूल भुलैया
देहे हाववँ भात, बने खाही गौरैय्या।

रचनाकार -  शकुन्तला शर्मा,
भिलाई, छत्तीसगढ़

11 comments:

  1. बहुत सुघ्घर कुण्डलिया दीदी बधाई हो

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  2. वाह्ह्ह्ह्ह् सुग्घर सिरजाय हव दीदी।
    गौरैया सिरतो म भूख पियास ले ब्याकुल हे।अब तो ये लुप्त घलो होवत हे।

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  3. वाहःहः दीदी
    बहुत सुघ्घर चिरई के गोठ ला सुने हव
    अउ बड़ सुघ्घर बुने हव।

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  4. बहुत सुघ्घर चिरई के गोठ ला बने हव दीदी
    वाह....

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  5. वाह्ह दीदी शानदार सृजन।

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  6. अब्बड़ सुग्घर दीदी गौरैय्या ला बचाय बर प्रेरित करत सुग्घर
    रचना दीदी पायलगी

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  7. अनुपम रचना दीदी।सादर बधाई

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  8. अनुपम रचना दीदी।सादर बधाई

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  9. सुघ्घऱ सन्देश देवत शानदार रचना,बधाई अउ नमन दीदी।

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  10. कुण्डलियां छंद मा सुग्घर संदेश देवत रचना हे,दीदी।सादर प्रणाम।

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  11. आजकाल गौरइया चिरई ह देखे बर नइ मिलत हे । पहिली घरो घर एकर खुंदरा राहय ।सचमुच में येला बचाना जरुरी हे।
    बहुत सुंदर रचना दीदी जी
    बहुत बहुत बधाई ।

    माटी

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