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Sunday, June 28, 2020

कुण्डलियाँ छंद-मोहन निषाद

 (कुण्डलियाँ छंद)-मोहन निषाद

खेती के दिन आत हे , हावय मगन किसान ।
पानी  बादर  देख  के ,  बोथे  सुग्घर  धान ।।
बोथे  सुग्घर  धान , बने  जब  पानी  आथे ।
जोहय रद्दा रोज , देख  जब  बादर  छाथे ।।
 लगगे  हे  आषाढ़ ,  कहाँ हे  पानी  येती ।
सुक्खा मा जी कोन , इहाँ करथे गा खेती ।।

होवत हे पानी बिना , देखव ग हलाकान ।
आगे हे बरसात हा , सुग्घर दिन ला जान ।।
सुग्घर दिन ला जान , करे बर जी तँय खेती ।
मउका ला पहिचान , कहत हँव येखर सेती ।।
होथे मगन किसान ,  धान  ला सुग्घर बोवत ।
संसो  पड़गे  आज , सोच ये कइसन होवत ।।

पानी बरसत जी हवय , अब्बड़ संगी आज ।
भारी मगन  किसान हे , नाँगर बइला साज ।।
नाँगर बइला साज ,  खेत  मा  बावत करथे ।
बिजहा ला जी सींच , बने हरिया ला धरथे ।।
इही खेती के काम ,  तरे  जेमा  जिनगानी ।
जग के पालनहार , हँसय जब बरसै पानी ।। 

   रचनाकार -  मोहन कुमार निषाद
                  गाँव - लमती , भाटापारा ,
            जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)