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Saturday, June 13, 2020

दोहा के 23 प्रकार :- जगदीश "हीरा" साहू

दोहा के 23 प्रकार :- जगदीश "हीरा" साहू

1.भ्रमर :- 22 गुरू, 4 लघु

बैरी घेरे हे इँहा,  साजे संगी भेस।
दुर्गा काली शीतला, काटौ मोरो क्लेस।

2. सुभ्रमर :- 21 गुरू, 6 लघु

माटी मा उपजे बढ़े, माटी खेले खोर।
माटी के चोला बने, होही माटी तोर।।

3. शरभ :- 20 गुरू, 8 लघु

काकी जावै भात ले, चटनी भाजी दार।
डब्बा मा पानी धरे, जावै बुड़ती खार।।

4. श्येन :- 19 गुरू, 10 लघु

दाई के आराधना, करबो मिलके आज।
काली के कर साधना, पूरा होही काज।।

5. मण्डूक :- 18 गुरू, 12 लघु

दाई के किरपा बिना, जिनगी हे बेकार।
करले सेवा काम तैं, होबे भव ले पार।।

6. मर्कट :-  17 गुरू, 14 लघु

दुःख दरद ला झेल के, देथे मया दुलार।
ओ दाई ला झन भुला, जस गाये संसार।।

7. करभ :-  16 गुरू, 16 लघु

धान बोंय ब्यासी करे, खेत निदे सब साथ।
रखवारी चूके कहूँ, कुछु ना आवय हाथ।।

8. नर :-   15 गुरू, 18 लघु

ये जग मा हे तोर गा, बस एके ठन काम।
करत ददा के बंदगी, जप लेना प्रभु नाम।।

9. हंस :-   14 गुरू, 20 लघु

पेट भरे खेती करे, ददा हमर दिन-रात।
झन तड़पा वो बाप ला, इही धरम के बात।।

10. गयंद :- 13 गुरू, 22 लघु

होत बिहनिया जाग के, बासी खावय रोज।
थकय नहीँ जाँगर कभू, करय काम सब खोज।।

11. पयोधर :- 12 गुरू, 24 लघु

भजन करव भगवान के, छोड़ जगत के काम।
कट जाही जग बंधना, सुमिरव सीताराम।।

12. बल :-  11 गुरू, 26 लघु

खेवनहार उही हवय, श्री सीता पति राम।
झन भटकव दूसर डहर, करही हमरो काम।।

13. पान :-  10 गुरू, 28 लघु

पाये बर मनखे जनम, तरसे देव सुजान।
जिनगी अपन सँवार ले, झनकर गरब गुमान।।

14. त्रिकल :- 9 गुरू, 30 लघु

पूरन होवय काज गा, सुखी रहय परिवार।
घर मा बस सुनता रहय, करत रहन जयकार।।

15. कच्छप :- 8 गुरू, 32 लघु

तुँहर पेट कस बुद्धि अउ, बढ़य कान कस ज्ञान।
विपदा मोरे कम रहय, दव अइसन वरदान।।

16. मच्छ :-  7 गुरू, 34 लघु

अरज हवय गणराज जी, सुनलव बिनती मोर।
झन भटकय अब मन कभू, रहँव शरण मा तोर।।

17.शार्दूल :- 6 गुरू, 36 लघु

गरजत घुमड़त हे अबड़, बरसत हवय अषाढ़।
टप-टप टपकय छानही, छलकय नदियाँ बाढ़।।

18.अहिवर :- 5 गुरू, 38 लघु

कइसन दिन आवत हवय, अनपढ़ बाँटय ज्ञान।
पढ़-लिख नटवर नइ सकय, बिरथा करय गुमान।।

19.व्याल :-   4 गुरू, 40 लघु

खरखर-खरखर रुख उपर, मुसवा हर चढ़ जाय।
कटकट-कटकट दाँत करय, कतर-कतर सब खाय।।

20. विडाल :-  3 गुरू, 42 लघु

पढ़व-लिखव अब मन लगा, बनव अबड़ गुणवान।
करम करव सबझन सुघर, बगरय निरमल ज्ञान।।

21.श्वान :-  2 गुरू, 44 लघु

कटत हवय रुख हर अबड़, कउन ल मँय समझाँव।
गरम-गरम घर-बन लगय, मनभर मिलय न छाँव।।

22.उदर :-   1 गुरू, 46 लघु

शरण म लव वरदान दव, भटकय झन मन अउर।
अजर अमर अब मँय रहँव, मिलय तुँहर प्रभु ठउर।।

23.सर्प :-    48 लघु

महर-महर महकत रहय, सुघर हवन कस पउर।
अब सब घर उजड़त हवय, निरमल लगय न ठउर।।

जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा)
25.12.19