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Tuesday, June 30, 2020

बबा के मेछा (हास्य कुंडलिया)-मनी राम साहू मितान

बबा के मेछा (हास्य कुंडलिया)-मनी राम साहू मितान

(1)
तापत भुर्री जब बबा, चोंगी ला सिपचाय।
गिरजय आगी के लुकी, मेछा हा जर जाय।
मेछा हा जर जाय, तुरत वो रमँज बुझावय।
हड़बिड़ ले जब होय, छोर धोती फँस जावय
भगय फँसे ला हेर, तोलगी छूटय भागत।
कठलयँ नाती झार, सबो झन भुर्री तापत।

(2)
बूढ़ी दाई हा तुरत, मरदनिया बलवाय।
दिखत हवै ये बिन फबक, मेछा ला बनवाय।
मेछा ला बनवाय, धार ना राहय छूरा।
आधा हा बँच जाय, रोख ना पावय पूरा।
बबा लजावय खूब, मात जय जी करलाई।
जम्मो नाती संग, हँसय बड़ बूढ़ी दाई।

(3)
मरदनिया हा छोड़ के, जा छूरा पजवाय।
बाँचे मेछा ला बने, आ के तुरत बनाय।
आ के तुरत बनाय, नाक के कोर कटावय।
दिखय नाक हा लाल, लहू हा बड़ बोहावय।
काहय लइकन संग, हँसत नतनीन अघनिया।
नकटा बबा हमार, काट दे हे मरदनिया

मनीराम साहू 'मितान'