दोहे
दोहा लिखबो मिल सबो, गुरु के आज्ञा मान।
शब्द सजाबो भाव ले, सिखबो नियम विधान।।
चार चरण के छंद हे, गति-लय यति ठहराव।
कुल मात्रा चौबीस जी, एक डाँड़ बइठाव।।
तेरह मात्रा ले सजे, विषम चरण हा जान।
ग्यारह मात्रा ले बढ़य, सम पद के जी शान।।
त्रिकल-त्रिकल दू बार हो, द्विकल बाद मा आय।
दू चौकल मिलके घलो, अठकल योग बनाय।।
गुरु-लघु-गुरु रखना सदा, विषम चरण के अंत।
सम के अंतिम छोर मा, दीर्घ-ह्रस्व हो संत।।
पचकल ले होवय नहीं, कभू चरण शुरुआत।
जगण बिठावव सोचके, ध्यान रखव ये बात।।
जगण अगर चरणांत हो, अइसे करव निदान।
त्रिकल बाद वोला रखव, कहिथे छंद विधान।।
रखव जगण ला बीच मा, तब मितान दे ध्यान।
आगू-पाछू रख द्विकल, हे उपाय आसान।।
सबो नियम ला साध के, लिख लव दोहा छंद।
पाठक के मन भाय जी, मिलही तब आनंद।।
उषाकिरण निर्मलकर
मगरलोड
धमतरी(छत्तीसगढ़)
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